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CBSE • कक्षा X • Social Science • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

संसाधन एवं विकास

पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य है, 'संसाधन' कहलाती है। मानव स्वयं संसाधनों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो पर्यावरण, प्रौद्योगिकी और संस्थाओं के मध्य अंतर्संबंध कायम करता है। संसाधनों का अंधाधुंध दोहन वैश्विक पारिस्थितिक संकटों—जैसे भूमंडलीय तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग), ओजोन परत का क्षय, और पर्यावरण प्रदूषण—को जन्म दे रहा है। अतः 'सतत पोषणीय विकास' (Sustainable Development) और संसाधनों का न्यायसंगत वितरण आज के युग की अनिवार्य आवश्यकता है। 1992 का रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन और 'एजेंडा 21' इसी दिशा में मील के पत्थर थे। भारत जैसे विशाल विविधता वाले देश में संसाधन नियोजन (Resource Planning) अपरिहार्य है जहाँ कुछ राज्य (जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा) खनिजों में धनी हैं तो कुछ (जैसे अरुणाचल प्रदेश) में जल प्रचुर है परंतु अवसंरचना का अभाव है। इस अध्याय में हम भू-संसाधन, भारत के भू-उपयोग प्रारूप, 1952 की राष्ट्रीय वन नीति, भूमि निम्नीकरण के कारणों व निवारण उपायों, तथा भारत की प्रमुख मृदाओं (जलोढ़, काली/रेगुर, लाल-पीली, लैटेराइट, मरुस्थली, पर्वतीय) के वितरण, रासायनिक विशेषताओं, और मृदा अपरदन (अवनलिका व चादर अपरदन) तथा मृदा संरक्षण की वैज्ञानिक तकनीकों (समोच्च जुताई, सोपानी कृषि, पट्टी कृषि, रक्षक मेखला) का गहन, प्रामाणिक और बोर्ड-उन्मुख भौगोलिक अध्ययन करेंगे।

गांधीजी ने क्यों कहा था: 'प्रकृति के पास हमारी जरूरत के लिए सब कुछ है, लेकिन हमारे लालच के लिए नहीं'?

जरा सोचिए: यदि आज रात दुनिया का सारा कच्चा तेल या पीने योग्य मीठा पानी खत्म हो जाए, तो कल सुबह आपकी जिंदगी कैसी होगी? न गाड़ियां चलेंगी, न बिजली बनेगी, न खेत सींचे जा सकेंगे! मानव जाति ने प्रकृति के मुफ्त उपहार समझकर संसाधनों को इतनी बेरहमी से लूटा है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती वीरान हो सकती है। 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो में 100 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष इसीलिए इकट्ठा हुए थे ताकि धरती को बचाया जा सके। आइए समझें कि हम अपनी धरती और इसकी अनमोल मिट्टी को कैसे बचा सकते हैं!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE और CBSE कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'संसाधन एवं विकास' भूगोल खंड का सर्वाधिक आधारभूत और उच्च अंक-भार वाला अध्याय है। संसाधनों का वर्गीकरण (संभावी बनाम संचित कोष), सतत पोषणीय विकास और एजेंडा 21, भारत में संसाधन नियोजन के तीन सोपान, भूमि निम्नीकरण के राज्यवार कारण (पंजाब में जलाक्रांतता बनाम झारखंड में खनन), जलोढ़ और काली मिट्टी की तुलना (बांगर बनाम खादर), तथा मृदा अपरदन रोकने के उपायों पर 3 से 5 अंकों के वर्णनात्मक प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। साथ ही, भारत के मानचित्र (Map Work) पर प्रमुख मृदा प्रकारों की पहचान हर साल परीक्षा में आती है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • प्राकृतिक पर्यावरण और जैव-अजैव घटकों की बुनियादी संकल्पनाएँ।
  • भारत के भौतिक स्वरूप (पर्वत, पठार, मैदान, तटीय क्षेत्र) का सामान्य ज्ञान।
  • चट्टानों के अपक्षय (Weathering) और मृदा निर्माण की प्राथमिक प्रक्रिया से परिचय।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • संसाधनों की वैज्ञानिक परिभाषा, अंतर्संबंधों के त्रिकोण (प्रकृति-प्रौद्योगिकी-संस्थाएं) और बहुआयामी वर्गीकरण का विश्लेषण करना।
  • सतत पोषणीय विकास की संकल्पना, रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन (1992) और एजेंडा 21 के ऐतिहासिक महत्व को समझना।
  • भारत में संसाधन नियोजन की त्रि-स्तरीय प्रक्रिया और गांधीजी के संसाधन संरक्षण दर्शन का मूल्यांकन करना।
  • भारत में भूमि निम्नीकरण के विविध कारकों (खनन, अति-पशुचारण, अत्यधिक सिंचाई) और संरक्षण रणनीतियों की व्याख्या करना।
  • भारत की छह प्रमुख मृदाओं (जलोढ़, काली, लाल-पीली, लैटेराइट, मरुस्थली, वन) के गुणों, फसलों, मानचित्र वितरण और मृदा संरक्षण विधियों का तुलनात्मक परीक्षण करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. संसाधनों की संकल्पना, अंतर्संबंध...
2 2. सतत पोषणीय विकास, रियो पृथ्वी सम...
3 3. भू-संसाधन, भू-उपयोग प्रारूप एवं...
4 4. मृदा संसाधन एवं भारत की प्रमुख म...
5 5. मृदा अपरदन: प्रकार, कारण और वैज्...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. संसाधनों की संकल्पना, अंतर्संबंध और विस्तृत वर्गीकरण

1.1 संसाधन क्या है? (मानव-प्रौद्योगिकी-संस्थाओं का अंतर्संबंध)

हमारे पर्यावरण में उपलब्ध हर वह वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त होती है, जिसे बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से संभाव्य (Economically feasible) और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य (Culturally acceptable) है, संसाधन (Resource) कहलाती है।

  • मानव स्वयं संसाधनों का एक महत्वपूर्ण घटक है। वह प्रकृति के साथ प्रौद्योगिकी के माध्यम से क्रिया करता है और अपने आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए संस्थाओं (Institutions) का निर्माण करता है।
  • संसाधन प्रकृति के 'मुफ्त उपहार' नहीं हैं, बल्कि वे मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं। मानव पर्यावरण में उपस्थित पदार्थों को संसाधनों में रूपांतरित करता है।

1.2 संसाधनों का वर्गीकरण (Classification of Resources)

संसाधनों को निम्नलिखित चार मुख्य आधारों पर वर्गीकृत किया गया है:

वर्गीकरण का आधारसंसाधन के प्रकारपरिभाषा एवं उदाहरण
1. उत्पत्ति के आधार परजैव संसाधन (Biotic)जीवमंडल से प्राप्त संसाधन जिनमें जीवन होता है। उदाहरण: मनुष्य, वनस्पतिजात, प्राणिजात, मत्स्य जीवन, पशुधन।
अजैव संसाधन (Abiotic)निर्जीव वस्तुओं से बने सभी संसाधन। उदाहरण: चट्टानें, धातुएं, खनिज, मृदा।
2. समाप्यता के आधार परनवीकरण योग्य (Renewable)वे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा नवीकृत या पुनः उत्पन्न किया जा सकता है। उदाहरण: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, वन व वन्यजीव।
अनवीकरण योग्य (Non-Renewable)इनका निर्माण एक लंबे भूवैज्ञानिक अंतराल में होता है; इनके बनने में लाखों वर्ष लगते हैं। कुछ चक्रीय होते हैं (जैसे धातुएं) और कुछ अचक्रीय होते हैं जो एक बार प्रयोग से समाप्त हो जाते हैं (जैसे कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस)।
3. स्वामित्व के आधार परव्यक्तिगत संसाधनव्यक्तियों के निजी स्वामित्व वाले संसाधन। उदाहरण: किसानों की निजी भूमि, बाग, चारागाह, तालाब, कुएं, निजी मकान।
सामुदायिक संसाधनसमुदाय के सभी सदस्यों के लिए सुलभ संसाधन। उदाहरण: गांव की शामिलात भूमि (चारण भूमि, श्मशान), तालाब, नगरीय पार्क, खेल के मैदान।
राष्ट्रीय संसाधनतकनीकी रूप से देश में मौजूद सभी संसाधन राष्ट्रीय हैं। देश की राजनीतिक सीमाओं के भीतर की सारी भूमि, खनिज, वन, जल तथा 12 समुद्री मील (22.2 किमी) तक का सागरीय क्षेत्र (प्रादेशिक जल) व उसमें मौजूद संपदा राष्ट्र की है।
अंतरराष्ट्रीय संसाधनतटरेखा से 200 समुद्री मील की दूरी से परे खुले महासागरीय संसाधनों (अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र - EEZ से परे) पर किसी अकेले देश का अधिकार नहीं होता; इनका उपयोग अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति से ही किया जा सकता है। (भारत को हिंद महासागर के तल से मैंगनीज ग्रंथियों के खनन का अधिकार मिला है)।
4. विकास के स्तर के आधार परसंभावी संसाधन (Potential)वे संसाधन जो किसी प्रदेश में विद्यमान हैं परंतु उनका उपयोग नहीं किया गया है। उदाहरण: राजस्थान और गुजरात में सौर व पवन ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं लेकिन उनका सही विकास नहीं हुआ है।
विकसित संसाधन (Developed)वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है।
भंडार (Stock)पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानव आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं परंतु उपयुक्त प्रौद्योगिकी के अभाव में उसकी पहुंच से बाहर हैं। उदाहरण: जल दो ज्वलनशील गैसों—हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का यौगिक है; हाइड्रोजन ऊर्जा का बड़ा स्रोत बन सकता है परंतु इसके उच्च-स्तरीय तकनीकी ज्ञान का अभाव है।
संचित कोष (Reserves)यह भंडार का ही हिस्सा है जिसे उपलब्ध तकनीकी ज्ञान की सहायता से प्रयोग में लाया जा सकता है परंतु इनका उपयोग अभी शुरू नहीं किया गया है; इनका उपयोग भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जा सकता है। उदाहरण: बांधों में जल, वन आदि।

2. सतत पोषणीय विकास, रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992) एवं संसाधन नियोजन

2.1 सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development)

संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से समाज दो वर्गों—संसाधन संपन्न (अमीर) और संसाधनहीन (गरीब)—में बंट गया और भूमंडलीय पारिस्थितिक संकट पैदा हो गए।

परिभाषा: सतत पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि 'विकास पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना हो, और वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं की अवहेलना न करे।'

2.2 रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन (1992) और एजेंडा 21

  • जून 1992 (ब्राजील): 100 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष ब्राजील के शहर रियो डी जेनेरो में प्रथम 'अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन' (First International Earth Summit) में एकत्र हुए। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास की समस्याओं का वैश्विक हल ढूंढना था।
  • एजेंडा 21 (Agenda 21): यह संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) के तत्वावधान में स्वीकृत एक व्यापक कार्ययोजना है। इसका उद्देश्य 21वीं सदी में वैश्विक सतत पोषणीय विकास हासिल करना है।
  • एजेंडा 21 का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि प्रत्येक स्थानीय निकाय (Local Government) अपना स्थानीय एजेंडा 21 तैयार करे ताकि गरीबी, भुखमरी और बीमारियों से पारस्परिक सहयोग से लड़ा जा सके।

2.3 भारत में संसाधन नियोजन (Resource Planning in India)

भारत में संसाधनों का वितरण अत्यधिक असमान है। उदाहरणार्थ:

  • झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश: खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार हैं परंतु औद्योगिक अवसंरचना कम है।
  • अरुणाचल प्रदेश: जल संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं परंतु बुनियादी ढांचे का अभाव है।
  • राजस्थान: सौर व पवन ऊर्जा प्रचुर है परंतु जल संसाधनों की भारी कमी है।
  • लद्दाख का शीत मरुस्थल: देश के बाकी हिस्से से अलग-थलग है; यहाँ सांस्कृतिक विरासत समृद्ध है परंतु जल, बुनियादी ढांचे और महत्वपूर्ण खनिजों की कमी है।
संसाधन नियोजन के तीन जटिल सोपान (Three Stages of Resource Planning):
1. पहचान व तालिका बनाना: देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कर उनकी सूची बनाना; इसके अंतर्गत सर्वेक्षण, मानचित्रण और संसाधनों का गुणात्मक व मात्रात्मक अनुमान लगाना शामिल है।
2. नियोजन ढांचा तैयार करना: संसाधन विकास योजनाओं को लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढांचा तैयार करना।
3. राष्ट्रीय समन्वय: संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजनाओं के बीच समन्वय स्थापित करना।

गांधीजी के विचार: गांधीजी ने संसाधनों के अंधाधुंध उपभोग के प्रति सचेत करते हुए कहा था: 'हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी के लालच की संतुष्टि के लिए नहीं; हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत है, लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।' वे अत्यधिक जन-उत्पादन (Mass production) के स्थान पर जन-समुदाय द्वारा उत्पादन (Production by the masses) के पक्षधर थे।

3. भू-संसाधन, भू-उपयोग प्रारूप एवं भूमि निम्नीकरण

3.1 भारत में भू-संसाधनों का वितरण एवं भू-उपयोग प्रारूप

भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर (3.28 मिलियन वर्ग किमी) है। इसमें से 93% भाग के ही भू-उपयोग आंकड़े उपलब्ध हैं (पूर्वोत्तर राज्यों व पाक-अधिकृत कश्मीर के कुछ भागों का सर्वेक्षण नहीं हुआ है)।

  • भू-आकृतिक वितरण:
    • मैदान (Plains): 43% क्षेत्र—कृषि और उद्योग के विकास के लिए सर्वाधिक अनुकूल।
    • पर्वत (Mountains): 30% क्षेत्र—बारहमासी नदियों के प्रवाह, पर्यटन और पारिस्थितिकी हेतु महत्वपूर्ण।
    • पठार (Plateau): 27% क्षेत्र—खनिजों, जीवाश्म ईंधनों और वनों के विशाल भंडार संजोए हुए।
  • राष्ट्रीय वन नीति (1952): इस नीति के अनुसार देश के भौगोलिक क्षेत्र का 33% भाग वनाच्छादित होना चाहिए ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे। भारत में वर्तमान वन क्षेत्र इस वांछित सीमा से काफी कम (लगभग 24%) है।
  • शुद्ध बोया गया क्षेत्र (Net Sown Area): पंजाब और हरियाणा में 80% भूमि पर खेती होती है, जबकि अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और अंडमान-निकोबार में यह 10% से भी कम है।

3.2 भूमि निम्नीकरण के कारण (Land Degradation Factors)

वर्तमान में भारत में लगभग 13 करोड़ (130 मिलियन) हेक्टेयर भूमि निम्नीकृत है। भूमि निम्नीकरण के राज्यवार प्रमुख कारण निम्न हैं:

प्रमुख कारकप्रभावित राज्यनिम्नीकरण की कार्यप्रणाली
खनन (Mining)झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशाखनन के उपरांत खदानों वाली गहरी खाइयों को खुला छोड़ दिया जाता है, जिससे वनों का विनाश होता है और भूमि बंजर बन जाती है।
अति-पशुचारण (Overgrazing)गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्रपशुओं द्वारा वनस्पति की जड़ों तक चरने से मिट्टी की ऊपरी परत उखड़ जाती है और मृदा अपरदन तीव्र हो जाता है।
अत्यधिक सिंचाई / जलाक्रांतता (Waterlogging)पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेशअत्यधिक सिंचाई से जल भराव (जलाक्रांतता) हो जाता है, जिससे मिट्टी में लवणता (Salinity) और क्षारीयता (Alkalinity) बढ़ जाती है और भूमि की उर्वरता नष्ट हो जाती है।
खनिज प्रसंस्करण व औद्योगिक अपशिष्टऔद्योगिक पट्टी वाले क्षेत्रसीमेंट उद्योग में चूना पत्थर को पीसना और चीनी मिट्टी के बर्तनों के उद्योग में सेलखड़ी पीसने से वायुमंडल में भारी धूल फैलती है जो जमीन पर बैठ जाती है और भूमि की जल सोखने की क्षमता रोक देती है।

3.3 भूमि संरक्षण के प्रभावी उपाय

  1. वनीकरण (Afforestation): बंजर और ढलानदार भूमि पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना।
  2. चरागाहों का उचित प्रबंधन: पशुचारण को नियंत्रित करना और चराई चक्र लागू करना।
  3. कांटेदार झाड़ियां लगाना: रेतीले टीलों को स्थिर करने के लिए कांटेदार झाड़ियां लगाना (मरुस्थली क्षेत्रों में)।
  4. रक्षक मेखला (Shelter Belts): खेतों के किनारों पर कतार में पेड़ लगाना ताकि हवा की गति कम हो और मिट्टी का उड़ना रुके।
  5. औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार: उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक जल और कचरे का परिष्करण (Treatment) करके ही उसे विसर्जित करना।

4. मृदा संसाधन एवं भारत की प्रमुख मृदाओं का वर्गीकरण

4.1 मृदा निर्माण के कारक (Factors of Soil Formation)

मृदा सबसे महत्वपूर्ण नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है। कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं। इसके निर्माण में उच्चावच (Relief), जनक शैल (Parent rock), जलवायु, वनस्पति, समय और सूक्ष्मजीव मुख्य भूमिका निभाते हैं।

4.2 भारत की प्रमुख मृदाओं का तुलनात्मक अध्ययन

मृदा का प्रकारवितरण क्षेत्र / राज्यमुख्य विशेषताएँ एवं पोषक तत्वउपयुक्त प्रमुख फसलें
1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)
भारत के 45% क्षेत्रफल पर विस्तृत सर्वाधिक उपजाऊ मृदा
उत्तरी भारत का विशाल मैदान, सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन, पूर्वी तटीय डेल्टा (महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी)।पोटाश, फॉस्फोरिक अम्ल और चूने से समृद्ध; नाइट्रोजन व ह्यूमस की कमी। दो प्रकार:
• बांगर (पुरानी जलोढ़): कंकर ग्रंथियों की अधिकता, कम उपजाऊ।
• खादर (नई जलोढ़): बारीक कण, अत्यधिक उपजाऊ, नदी बाढ़ मैदानों में नवीकृत।
गन्ना, धान (चावल), गेहूं, दलहन और तिलहन।
2. काली मृदा / रेगुर (Black / Regur Soil)दक्कन ट्रैप (बेसाल्ट) क्षेत्र—महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार।लावा चट्टानों के अपक्षय से निर्मित। अत्यधिक महीन (मृत्तिका) कणों से बनी, नमी धारण करने की असाधारण क्षमता। गर्म मौसम में गहरी दरारें पड़ जाती हैं जिससे वायु-मिश्रण होता है। कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश व चूने से समृद्ध; फास्फोरस की कमी।कपास (Cotton) की खेती हेतु सर्वश्रेष्ठ (इसे 'काली कपास मृदा' भी कहते हैं); तंबाकू, गन्ना, ज्वार।
3. लाल और पीली मृदा (Red & Yellow Soil)दक्कन पठार के पूर्वी व दक्षिणी भाग, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी हिस्से और पश्चिमी घाट का गिरिपाद।कम वर्षा वाले क्षेत्रों में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर विकसित। क्रिस्टलीय और रूपांतरित चट्टानों में लौह धातु के प्रसार (Diffusion of Iron) के कारण इसका रंग लाल होता है; और जब यह जलयोजित (Hydrated) होती है तो इसका रंग पीला दिखता है।बाजरा, मूंगफली, दलहन, आलू, चावल (सिंचाई द्वारा)।
4. लैटेराइट मृदा (Laterite Soil)
ग्रीक शब्द 'Later' (ईंट) से उत्पत्ति
कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, ओडिशा तथा असम के पहाड़ी क्षेत्र।उच्च तापमान और भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित। तीव्र निक्षालन (Leaching) का परिणाम। ह्यूमस की मात्रा बहुत कम होती है क्योंकि अत्यधिक तापमान के कारण सूक्ष्मजीव (बैक्टीरिया) नष्ट हो जाते हैं। अम्लीय प्रकृति (pH < 6.0)। खाद व उर्वरक देकर खेती की जाती है।चाय, कॉफी, काजू (Cashewnut - तमिलनाडु, केरल, आ.प्र. में विशेष रूप से), सिनकोना।
5. मरुस्थली मृदा (Arid Soil)पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, दक्षिणी पंजाब।रंग लाल से भूरा; बलुई (रेतीली) संरचना और लवणीय प्रकृति। उच्च तापमान और तीव्र वाष्पीकरण के कारण नमी और ह्यूमस का सर्वथा अभाव। निचली परतों में कंकर की परतें पाई जाती हैं जो जल के नीचे रिसने को रोकती हैं। सही सिंचाई द्वारा कृषि योग्य।ज्वार, बाजरा, जौ, चना, सरसों (इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में गेहूं व कपास)।
6. वन / पर्वतीय मृदा (Forest Soil)हिमालयी पर्वतीय क्षेत्र—जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश।नदी घाटियों में यह दोमट और सिल्टदार होती है, परंतु ऊपरी ढलानों पर इसका गठन मोटे कणों का होता है। हिमालय के हिमाच्छादित क्षेत्रों में यह अम्लीय तथा ह्यूमस रहित होती है।सेब, नाशपाती, आड़ू, चाय, मसाले और पहाड़ी चावल।

5. मृदा अपरदन: प्रकार, कारण और वैज्ञानिक संरक्षण विधियाँ

5.1 मृदा अपरदन के प्रकार (Types of Soil Erosion)

मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन (Soil Erosion) कहा जाता है। इसके प्रमुख प्रकार निम्न हैं:

  • अवनलिका अपरदन (Gully Erosion): बहता हुआ जल चिकनी मिट्टी वाली भूमि पर गहरी नालियां (Gullies) काट देता है। इससे पूरी भूमि जोतने योग्य नहीं रह जाती; ऐसी अनुपजाऊ भूमि को 'उत्खात भूमि' (Badland) कहा जाता है। चंबल बेसिन में ऐसी भूमि को 'बीहड़' (Ravines) कहा जाता है।
  • चादर अपरदन (Sheet Erosion): कई बार जल विस्तृत क्षेत्र पर ढाल के साथ नीचे की ओर बहता है। ऐसे मामलों में उस क्षेत्र की ऊपरी मिट्टी की पूरी परत (Sheet) घुलकर जल के साथ बह जाती है। इसे चादर अपरदन कहते हैं।
  • पवन अपरदन (Wind Erosion): पवन द्वारा मैदान या ढालू क्षेत्र से महीन मिट्टी को उड़ा ले जाने की प्रक्रिया।
  • दोषपूर्ण कृषि पद्धतियां: ढाल की दिशा में ऊपर से नीचे की ओर गलत तरीके से हल चलाने से नालियां बन जाती हैं और पानी के तेज बहाव से मिट्टी कट जाती है।

5.2 मृदा संरक्षण की प्रमुख विधियाँ (Soil Conservation Methods)

1. समोच्च जुताई (Contour Ploughing)

ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं (समान ऊंचाई वाले बिंदुओं को जोड़ने वाली रेखाओं) के समानांतर हल चलाने से ढाल के साथ जल बहाव की गति कम हो जाती है। यह पर्वतीय क्षेत्रों में अपरदन रोकने का अत्यंत प्रभावी उपाय है।

2. सोपानी / सीढ़ीदार कृषि (Terrace Farming)

ढालों पर सीढ़ियां बनाकर खेती की जाती है जिससे पानी के बहाव को नियंत्रित किया जा सके। पश्चिमी और मध्य हिमालय में सोपानी अथवा सीढ़ीदार खेती काफी विकसित है।

3. पट्टी कृषि (Strip Cropping)

बड़े खेतों को पट्टियों में बांट दिया जाता है। फसलों के बीच-बीच में घास की पट्टियां उगाई जाती हैं। यह हवा द्वारा जनित बल को कमजोर करती हैं और मिट्टी को उड़ने से बचाती हैं।

4. रक्षक मेखला (Shelter Belts)

पेड़ों को कतारों में लगाकर रक्षक आवरण तैयार करना। इन रक्षक पट्टियों ने रेतीले टीलों के स्थायीकरण और पश्चिमी भारत में मरुस्थल के प्रसार को रोकने में बहुत बड़ा योगदान दिया है।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

32.8 लाख वर्ग किमी
भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल (3.28 मिलियन वर्ग किमी); 93% के उपयोग आंकड़े उपलब्ध।
43% - 30% - 27%
भारत का भू-आकृतिक वितरण: 43% मैदान, 30% पर्वत, 27% पठार।
12 समुद्री मील (22.2 किमी)
तटरेखा से राष्ट्रीय सागरीय सीमा (प्रादेशिक जल) जहाँ तक के सभी संसाधन राष्ट्रीय हैं।
200 समुद्री मील (EEZ)
अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र; इसके परे खुले महासागरीय संसाधन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अधीन।
33% वन लक्ष्य
राष्ट्रीय वन नीति (1952) के तहत पारिस्थितिक संतुलन हेतु निर्धारित न्यूनतम वांछित वन क्षेत्र।
जून 1992 (रियो सम्मेलन)
ब्राजील में पहला अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन; एजेंडा 21 को स्वीकृति।
बांगर बनाम खादर
बांगर: पुरानी जलोढ़ (कंकर युक्त, कम उपजाऊ); खादर: नई जलोढ़ (बारीक कण, अत्यधिक उपजाऊ)।
काली मिट्टी (रेगुर)
दक्कन बेसाल्ट लावा से निर्मित; कपास हेतु सर्वोत्तम; नमी संचयन व शुष्क मौसम में दरारें।
लैटेराइट मृदा
तीव्र निक्षालन (Leaching) से निर्मित अम्लीय मृदा; काजू, चाय व कॉफी के लिए उपयुक्त।
उत्खात भूमि (Badland)
अवनलिका अपरदन द्वारा कटी-फटी अनुपजाऊ भूमि (चंबल बेसिन के बीहड़)।
समोच्च जुताई
पहाड़ी ढलानों पर समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाकर जल बहाव की गति को धीमा करना।
रक्षक मेखला (Shelter Belts)
पवन अपरदन रोकने हेतु खेतों के किनारों पर पेड़ों की कतार लगाना।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से उत्पन्न प्रमुख वैश्विक समस्याओं का उल्लेख कीजिए। 'सतत पोषणीय विकास' की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से उत्पन्न वैश्विक समस्याएँ:
1. संसाधनों का ह्रास: कुछ लालची व्यक्तियों की स्वार्थपूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का तीव्र गति से खात्मा हो रहा है।
2. समाज का विभाजन: संसाधन समाज के कुछ ही लोगों के हाथों में सिमट गए हैं, जिससे समाज दो वर्गों—संसाधन संपन्न (अमीर) और संसाधनविहीन (गरीब)—में विभाजित हो गया है।
3. वैश्विक पारिस्थितिक संकट: अनियंत्रित दोहन से भूमंडलीय तापन (Global Warming), ओजोन परत का क्षरण, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण जैसी भयंकर वैश्विक आपदाएं उत्पन्न हो गई हैं。

सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development):
सतत पोषणीय विकास का अर्थ है ऐसा आर्थिक विकास जो वर्तमान पर्यावरण को बिना कोई क्षति पहुंचाए किया जाए, और साथ ही वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं की अनदेखी न करे। इसका मूल मंत्र है: 'संसाधनों का न्यायसंगत उपयोग और भावी पीढ़ी के लिए संरक्षण'।
उदाहरण 2
भारत जैसे देश में 'संसाधन नियोजन' (Resource Planning) क्यों अनिवार्य है? इसके तीन प्रमुख सोपानों की व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भारत में संसाधन नियोजन की अनिवार्यता:
भारत में संसाधनों का वितरण अत्यधिक विविधतापूर्ण और असंतुलित है:
1. झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य खनिजों और कोयले के विपुल भंडार रखते हैं, लेकिन वहाँ बुनियादी औद्योगिक विकास पिछड़ा हुआ है।
2. अरुणाचल प्रदेश में जल संपदा प्रचुर है लेकिन परिवहन और संचार का घोर अभाव है।
3. राजस्थान में सौर और पवन ऊर्जा की अपार क्षमता है लेकिन पीने और सिंचाई के पानी की भारी कमी है।
4. लद्दाख सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध है लेकिन वह बाकी देश से कटा हुआ है और वहाँ खनिजों व जल का अभाव है।
अतः राष्ट्रीय, राज्य, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर संतुलित विकास के लिए संसाधन नियोजन अत्यंत आवश्यक है。

संसाधन नियोजन के तीन सोपान:
1. संसाधनों की पहचान और तालिका बनाना: संपूर्ण देश के विभिन्न क्षेत्रों में सर्वेक्षण करना, मानचित्र तैयार करना और संसाधनों के गुणात्मक व मात्रात्मक गुणों का मापन करना।
2. संसाधन विकास ढांचा तैयार करना: उपलब्ध संसाधनों के दोहन हेतु उपयुक्त आधुनिक प्रौद्योगिकी, कुशल मानव श्रम और संस्थागत ढांचा विकसित करना।
3. राष्ट्रीय योजनाओं से समन्वय: संसाधन विकास की क्षेत्रीय योजनाओं का देश की पंचवर्षीय या राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ उचित तालमेल बिठाना।
उदाहरण 3
भूमि निम्नीकरण (Land Degradation) से क्या तात्पर्य है? भारत के विभिन्न राज्यों में इसके लिए उत्तरदायी मानवीय कारकों का विश्लेषण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भूमि निम्नीकरण का अर्थ:
मानवीय या प्राकृतिक कारणों से भूमि के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में ऐसा ह्रास होना जिससे उसकी प्राकृतिक उत्पादकता और गुणवत्ता घट जाए, भूमि निम्नीकरण कहलाता है। वर्तमान में भारत में लगभग 13 करोड़ हेक्टेयर भूमि निम्नीकृत है。

विभिन्न राज्यों में उत्तरदायी मानवीय कारक:
1. खनन (Mining): झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में खनिजों को निकालने के बाद खदानों को मलबे और गहरी खाइयों के साथ खुला छोड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया में वनों का भारी विनाश होता है और भूमि पूरी तरह बंजर हो जाती है।
2. अति-पशुचारण (Overgrazing): गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में पशुओं की अत्यधिक चराई से वनस्पतियों का आवरण नष्ट हो जाता है, जिससे मिट्टी की ऊपरी परत उखड़ जाती है और हवा तथा पानी से अपरदन बढ़ जाता है।
3. अत्यधिक सिंचाई / जलाक्रांतता (Waterlogging): पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित क्रांति के बाद अत्यधिक नहरी व नलकूप सिंचाई की गई। इससे खेतों में जलभराव हो गया, जिससे भूमि में लवणता (Salinity) और क्षारीयता बढ़ गई और उपजाऊ खेत बंजर हो गए।
4. खनिज प्रसंस्करण उद्योग: सीमेंट उद्योग में चूना पत्थर को पीसने और सिरेमिक उद्योग में सेलखड़ी पीसने से भारी मात्रा में धूल उड़कर भूमि पर जम जाती है, जिससे मिट्टी की जल अवशोषण क्षमता समाप्त हो जाती है।
उदाहरण 4
जलोढ़ मृदा और काली मृदा के बीच प्रमुख अंतरों की तुलना कीजिए। (भौगोलिक वितरण, रासायनिक विशेषताएं और उपयुक्त फसलें)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
जलोढ़ मृदा और काली मृदा भारत की दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृषि मृदाएं हैं। इनके मुख्य अंतर निम्न हैं:

तुलना का बिंदुजलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)काली मृदा (Black / Regur Soil)
निर्माण प्रक्रियाहिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियों (सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी) द्वारा लाए गए गाद/अवसादों के निक्षेपण से।दक्कन ट्रैप की ज्वालामुखी बेसाल्ट चट्टानों के अपक्षय और लावा प्रवाह से।
भौगोलिक वितरणउत्तरी भारत का विशाल मैदान, राजस्थान व गुजरात के संकरे गलियारे और पूर्वी तटीय डेल्टा।महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक के पठारी भाग।
भौतिक गुणरेत, सिल्ट और मृतिका के विभिन्न अनुपातों से युक्त। इसके दो उप-प्रकार हैं: बांगर (पुरानी, कंकड़ युक्त) और खादर (नई, बारीक, अधिक उपजाऊ)।अत्यधिक महीन (मृतिका) कणों से निर्मित। इसमें नमी धारण करने की असाधारण क्षमता होती है। शुष्क मौसम में गहरी दरारें पड़ जाती हैं जिससे स्वतः जुताई होती है।
रासायनिक पोषक तत्वपोटाश, फास्फोरिक अम्ल और चूने से भरपूर; नाइट्रोजन और जैविक तत्व कम।कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूने से समृद्ध; फास्फोरस की कमी।
प्रमुख फसलेंगन्ना, चावल, गेहूं, मक्का, दलहन और तिलहन।कपास (Cotton) की खेती हेतु सर्वश्रेष्ठ; इसके अलावा मूंगफली, सोयाबीन, तंबाकू और ज्वार।
उदाहरण 5
मृदा अपरदन (Soil Erosion) क्या है? इसके विभिन्न प्रकारों और इसे नियंत्रित करने वाली प्रमुख वैज्ञानिक विधियों का वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
मृदा अपरदन का अर्थ:
प्राकृतिक कारकों (जल, पवन, हिमानी) अथवा मानवीय गतिविधियों (वनों की कटाई, दोषपूर्ण कृषि, अति-चराई) द्वारा मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत के कटकर बह जाने अथवा उड़ जाने की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहते हैं。

मृदा अपरदन के मुख्य प्रकार:
1. अवनलिका अपरदन (Gully Erosion): तेज बहता हुआ पानी चिकनी मिट्टी में गहरी नालियां (Gullies) काट देता है, जिससे खेत खंड-खंड हो जाते हैं और कृषि योग्य नहीं रहते। इसे 'उत्खात भूमि' या चंबल में 'बीहड़' कहते हैं।
2. चादर अपरदन (Sheet Erosion): जब ढालू जमीन पर पानी एक चादर की तरह फैलता हुआ बहता है, तो मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत पूरी की पूरी बह जाती है।
3. पवन अपरदन (Wind Erosion): शुष्क व मरुस्थली क्षेत्रों में तेज आंधियों द्वारा मिट्टी की ऊपरी परत का उड़ जाना。

मृदा संरक्षण की प्रमुख वैज्ञानिक विधियाँ:
1. समोच्च जुताई (Contour Ploughing): पहाड़ी ढलानों पर समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाने से पानी के बहाव की गति मंद पड़ जाती है।
2. सोपानी / सीढ़ीदार कृषि (Terrace Farming): तीव्र ढलानों पर सीढ़ियां बनाकर खेती की जाती है, जिससे पानी सीधे नीचे नहीं बहता और मिट्टी नहीं कटती (पश्चिमी हिमालय में प्रचलित)।
3. पट्टी कृषि (Strip Cropping): फसलों के बीच-बीच में घास की चौड़ी पट्टियां उगाई जाती हैं जो हवा की गति को तोड़कर पवन अपरदन रोकती हैं।
4. रक्षक मेखला (Shelter Belts): खेतों और मरुस्थल की सीमाओं पर कतारों में पेड़ लगाना; इससे आंधियों का वेग थमता है और रेतीले टीलों का फैलाव रुकता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

संभावी संसाधन (Potential) और संचित कोष (Reserves) को एक ही समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

संभावी संसाधन वे हैं जो विद्यमान हैं लेकिन तकनीक या पूंजी के अभाव में अभी विकसित नहीं हुए (जैसे राजस्थान में सौर ऊर्जा); जबकि संचित कोष वह भंडार है जिसके उपयोग की तकनीक ज्ञात है परंतु भविष्य की जरूरतों के लिए सुरक्षित रखा गया है (जैसे बांधों का जल)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

बांगर और खादर में भ्रमित होना (बांगर को नई मिट्टी मान लेना)।

सही वैज्ञानिक तथ्य

बांगर 'पुरानी जलोढ़' मृदा है जो नदी के बाढ़ मैदान से दूर होती है और कंकड़ ग्रंथियों से भरी होती है। खादर 'नई जलोढ़' मृदा है जो प्रतिवर्ष बाढ़ से नवीकृत होती है और अत्यधिक उपजाऊ होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पंजाब और हरियाणा में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण 'खनन' या 'वनों की कटाई' लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पंजाब और हरियाणा में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण 'अत्यधिक सिंचाई' (Over-irrigation) से उत्पन्न जलाक्रांतता (Waterlogging) है जिससे भूमि में लवणीयता बढ़ती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

लैटेराइट मिट्टी को उपजाऊ मानकर बिना खाद के खेती योग्य समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लैटेराइट मिट्टी अत्यधिक निक्षालन (Leaching) और उच्च तापमान के कारण ह्यूमस-रहित और अम्लीय होती है; इसमें बिना पर्याप्त खाद और उर्वरक के खेती संभव नहीं है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

काली मिट्टी में लौह तत्व के कारण उसका रंग काला मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

काली मिट्टी का रंग ज्वालामुखी लावा चट्टानों (बेसाल्ट) के अपक्षय और उसमें टाइटेनियम-युक्त मैग्नेटाइट यौगिकों की उपस्थिति के कारण होता है। लाल मिट्टी का रंग लौह धातु के प्रसार के कारण लाल होता है।

भारत की प्रमुख मृदाओं का भौगोलिक वितरण एवं लक्षण प्रोफ़ाइल

संसाधन एवं विकास: भारत की प्रमुख मृदाएँ एवं संरक्षण रणनीतियाँ1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil) - 45% क्षेत्रफल• क्षेत्र: उत्तरी मैदान, सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र व पूर्वी तटीय डेल्टा• घटक: पोटाश, चूना व फॉस्फोरिक अम्ल; बांगर (पुरानी) व खादर (नई)• प्रमुख फसलें: गन्ना, चावल, गेहूं, दलहन, मक्कासर्वाधिक उपजाऊ एवं सघन कृषि वाली मृदा2. काली मृदा / रेगुर (Black / Regur Soil)• क्षेत्र: दक्कन ट्रैप (महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, म.प्र., छत्तीसगढ़)• लक्षण: बेसाल्ट लावा जनित; असाधारण नमी धारण क्षमता; शुष्क में दरारें• प्रमुख फसलें: कपास (कपास हेतु सर्वश्रेष्ठ), तंबाकू, ज्वारकैल्शियम कार्बोनेट व मैग्नीशियम समृद्ध; फास्फोरस न्यून3. लाल और पीली मृदा (Red & Yellow Soil)• क्षेत्र: ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान व पश्चिमी घाट गिरिपाद• लक्षण: रवेदार आग्नेय शैल; लौह धातु प्रसार से लाल, जलयोजन से पीली• प्रमुख फसलें: बाजरा, मूंगफली, आलू, दलहनकम वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित; उर्वरकों से अच्छी उपज4. लैटेराइट मृदा (Laterite Soil) - ईंट सदृश• क्षेत्र: कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश व असम की पहाड़ियाँ• लक्षण: उच्च ताप व भारी वर्षा; तीव्र निक्षालन (Leaching); अम्लीय (pH<6)• प्रमुख फसलें: काजू (Cashewnut), चाय, कॉफीह्यूमस न्यून क्योंकि तेज गर्मी से बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैंमृदा अपरदन के प्रकार एवं वैज्ञानिक संरक्षण रणनीतियाँअवनलिका अपरदन:चिकनी मिट्टी में नालियाँ काटना; उत्खात भूमि (Badland / चंबल बीहड़)।समोच्च जुताई (Contour):पहाड़ी ढलानों पर समोच्च रेखाओं के समानांतर जुताई कर जल प्रवाह रोकना।सोपानी कृषि व रक्षक मेखला:सीढ़ीदार खेत (हिमालय) एवं हवा रोकने हेतु पेड़ों की कतारें (मरुस्थल)।एजेंडा 21 व रियो (1992):सतत पोषणीय विकास हासिल करने हेतु स्थानीय निकायों द्वारा कार्ययोजना।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
संसाधन वे सभी वस्तुएं हैं जो मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करती हैं, तकनीकी रूप से सुलभ, आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य हैं।
मुख्य बिंदु 2
संसाधनों को उत्पत्ति (जैव/अजैव), समाप्यता (नवीकरण/अनवीकरण), स्वामित्व (व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय) और विकास स्तर (संभावी, विकसित, भंडार, संचित कोष) पर बांटा जाता है।
मुख्य बिंदु 3
सतत पोषणीय विकास का उद्देश्य पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना वर्तमान और भावी पीढ़ियों के कल्याण में समन्वय साधना है।
मुख्य बिंदु 4
जून 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो में प्रथम अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन हुआ जिसमें 'एजेंडा 21' को स्वीकृत किया गया।
मुख्य बिंदु 5
भारत में संसाधनों के भारी असंतुलन (जैसे झारखंड में खनिज प्रचुर परंतु राजस्थान में जल की कमी) के कारण त्रि-स्तरीय संसाधन नियोजन अनिवार्य है।
मुख्य बिंदु 6
महात्मा गांधी ने चेतावनी दी थी: 'हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी के लालच की संतुष्टि के लिए नहीं।'
मुख्य बिंदु 7
भारत के कुल 32.8 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में 43% मैदान, 30% पर्वत और 27% पठार हैं; राष्ट्रीय वन नीति 1952 के अनुसार 33% वन क्षेत्र आवश्यक है।
मुख्य बिंदु 8
भूमि निम्नीकरण के राज्यवार कारण: झारखंड-ओडिशा में खनन, गुजरात-राजस्थान में अति-पशुचारण, तथा पंजाब-हरियाणा में अत्यधिक सिंचाई जनित जलाक्रांतता।
मुख्य बिंदु 9
भारत की प्रमुख मृदाएं: जलोढ़ (बांगर व खादर, सर्वाधिक उपजाऊ), काली/रेगुर (कपास हेतु सर्वश्रेष्ठ, नमी संचयन), लाल-पीली (लौह प्रसार), लैटेराइट (निक्षालन से अम्लीय, काजू व चाय), मरुस्थली और पर्वतीय।
मुख्य बिंदु 10
मृदा अपरदन (अवनलिका व चादर) की रोकथाम समोच्च जुताई, सोपानी कृषि, पट्टी कृषि और रक्षक मेखला (Shelter Belts) जैसी वैज्ञानिक तकनीकों से संभव है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
संसाधनों के विकास के स्तर के आधार पर 'भंडार' (Stock) और 'संचित कोष' (Reserves) में क्या अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भंडार पर्यावरण में मौजूद वे पदार्थ हैं जो मानवीय आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं परंतु उपयुक्त तकनीक के अभाव में हम उनका उपयोग नहीं कर पाते (जैसे जल से हाइड्रोजन ऊर्जा अलग करना)। संचित कोष भंडार का ही वह हिस्सा है जिसे उपलब्ध तकनीक से इस्तेमाल किया जा सकता है परंतु उसे भविष्य की जरूरतों के लिए बचाकर रखा गया है (जैसे बांधों में पानी)।
2
जलोढ़ मृदा के दो प्रमुख प्रकारों—बांगर और खादर—में दो प्रमुख अंतर बताइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. बांगर पुरानी जलोढ़ मृदा है जो कंकड़ ग्रंथियों से युक्त और कम उपजाऊ होती है। 2. खादर नई जलोढ़ मृदा है जो नदी के बाढ़ मैदानों में प्रतिवर्ष नवीकृत होती है, इसके कण बारीक होते हैं और यह अत्यधिक उपजाऊ होती है।

3
पंजाब और हरियाणा में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण क्या है और इससे मिट्टी पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मुख्य कारण अत्यधिक सिंचाई (Over-irrigation) है। अत्यधिक सिंचाई से खेतों में जलाक्रांतता (Waterlogging) उत्पन्न होती है, जिससे मिट्टी में लवणता और क्षारीयता बढ़ जाती है और भूमि की प्राकृतिक उर्वरता नष्ट हो जाती है।
4
काली मृदा को 'रेगुर' अथवा 'काली कपास मृदा' क्यों कहा जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: काली मृदा स्थानीय भाषा में 'रेगुर' कहलाती है। इसमें नमी धारण करने की असाधारण क्षमता होती है और यह कपास (Cotton) की खेती के लिए देश में सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है, इसलिए इसे काली कपास मृदा भी कहते हैं।
5
समोच्च जुताई (Contour Ploughing) और रक्षक मेखला (Shelter Belts) किस प्रकार मृदा अपरदन को रोकते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: समोच्च जुताई पहाड़ी ढलानों पर समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाकर की जाती है, जिससे पानी के ढाल के साथ तेज बहाव की गति मंद पड़ जाती है। रक्षक मेखला में खेतों के किनारों पर पेड़ों को कतारों में लगाया जाता है जो तेज हवाओं की गति को तोड़कर पवन अपरदन को रोकते हैं।
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कक्षा 10 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय अध्याय 2: भारत में राष्ट्रवाद अध्याय 3: भूमंडलीकृत विश्व का बनना अध्याय 4: औद्योगिकीकरण का युग अध्याय 5: मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया अध्याय 6: संसाधन एवं विकास अध्याय 7: वन एवं वन्यजीव संसाधन अध्याय 8: जल संसाधन अध्याय 9: कृषि अध्याय 10: खनिज तथा ऊर्जा संसाधन अध्याय 11: विनिर्माण उद्योग अध्याय 12: राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ अध्याय 13: सत्ता की साझेदारी (Power-sharing) अध्याय 14: संघवाद (Federalism) अध्याय 15: लिंग, धर्म और जाति अध्याय 16: राजनीतिक दल (Political Parties) अध्याय 17: लोकतंत्र के परिणाम अध्याय 18: विकास (Development) अध्याय 19: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक अध्याय 20: मुद्रा और साख अध्याय 21: वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था अध्याय 22: उपभोक्ता अधिकार

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