अमीर खुसरो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे:
क. जन्म एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अमीर खुसरो का जन्म सन् 1253 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के एटा जिले के पटियाली नामक कस्बे में हुआ था। उनके पिता अमीर सैफुद्दीन महमूद तुर्क थे और माता भारतीय राजपूत मूल की थीं। उनके बचपन का नाम ‘अबुल हसन’ था। खुसरो ने गुलाम वंश से लेकर तुगलक वंश तक दिल्ली सल्तनत के ग्यारह से अधिक सुल्तानों का शासनकाल देखा, किंतु वे राजदरबार की विलासिता से दूर रहकर सूफी परंपरा में रमे रहे।
ख. हजरत निजामुद्दीन औलिया के प्रति अनन्य भक्ति
खुसरो दिल्ली के महान सूफी संत हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के सबसे प्रिय शिष्य (मुरीद) थे। दोनों के बीच गुरु-शिष्य का संबंध आध्यात्मिक प्रेम की पराकाष्ठा था। जब 1325 ई. में हजरत निजामुद्दीन औलिया का देहावसान हुआ, उस समय खुसरो दिल्ली से बाहर थे। समाचार पाकर वे दौड़े आए और अपने पीर के मजार पर अपना सिर पटकते हुए यह अमर दोहा पढ़ा—
“गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस। चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस॥”
इसके छह माह के भीतर ही विरह की आग में जलते हुए खुसरो ने भी अपने प्राण त्याग दिए।
ग. तूती-ए-हिन्द (भारत का तोता) और देश-प्रेम
खुसरो को ‘तूती-ए-हिन्द’ (हिन्द का तोता) कहा जाता था। उन्होंने स्वयं गर्व से कहा था—“चू मन तूतिये हिन्दम अर रास्त पुरसी, ज़े मन हिन्दवी पुर्स ता नग्ज़ गोयम।” (यदि तुम मुझसे सच पूछना चाहते हो तो मैं हिन्द का तोता हूँ; मुझसे हिन्दवी में बात करो ताकि मैं मीठी-मीठी बातें कह सकूँ)। उन्होंने अपनी मसनवी ‘नुह सिपिहर’ में भारत की जलवायु, जीव-जंतुओं, ज्ञान-विज्ञान और भाषाओं की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है।