एक दिन सवेरे जब महादेवी वर्मा बरामदे में आईं, तो उन्होंने देखा कि दो कौवे एक गमले के चारों ओर चोंचों से छुआ-छुऔअल जैसा खेल खेल रहे थे। वहाँ गमले और दीवार की संधि में एक नन्हा-सा गिलहरी का बच्चा गिरा पड़ा था जिसे कौवों ने अपनी चोंचों से मारकर लहूलुहान कर दिया था। सबने कहा कि यह नहीं बचेगा, किंतु लेखिका ने उसे उठाकर अपने कमरे में लाया। घावों को पोंछकर पेनिसिलिन का मरहम लगाया और कई घंटों के प्रयास के बाद रुई की पतली बत्ती से दूध की बूँद उसके नन्हे मुँह में टपकाई। तीसरे दिन वह इतना स्वस्थ हो गया कि अपनी चमकीली आँखों से सबको देखने लगा।
लेखिका ने उसका नाम ‘गिल्लू‘ रखा। उसके रहने के लिए एक हल्की डलिया में रुई बिछाकर उसे खिड़की पर लटका दिया गया, जो दो वर्षों तक उसका प्यारा झूला रहा। गिल्लू लेखिका का ध्यान आकर्षित करने के लिए पर्दे पर तेजी से चढ़ता और उतरता। वह लेखिका की थाली में से एक-एक चावल बड़े करीने से उठाकर खाता था। उसका सबसे प्रिय खाद्य काजू था।
जब लेखिका एक मोटर दुर्घटना में घायल होकर अस्पताल में थीं, तो गिल्लू ने अपने प्रिय काजू खाना बंद कर दिया था। जब लेखिका घर लौटीं, तो वह उनके सिरहाने तकिए पर बैठकर अपने नन्हे पंजों से उनके बालों को हौले-हौले सहलाता रहता था, मानो कोई कुशल परिचारिका (नर्स) सेवा कर रही हो।
गिलहरियों के जीवन की अवधि प्रायः दो वर्ष से अधिक नहीं होती। गिल्लू की जीवन-यात्रा का अंत भी आ गया। अंतिम दिन उसने कुछ नहीं खाया, न बाहर गया। रात में असह्य यातना के बीच भी वह झूले से उतरकर लेखिका के बिस्तर पर आया और अपने ठंडे पंजों से वही उँगली पकड़ ली जिसे उसने अपने बचपन के पहले दिन पकड़ा था। सुबह की पहली किरण के साथ ही उसने प्राण त्याग दिए। लेखिका ने उसे सोनजुही की लता के नीचे समाधि दी, क्योंकि वह लता उसे सबसे प्रिय थी और लेखिका को विश्वास था कि किसी बसंत में वह सोनजुही की पीली कली बनकर अवश्य खिलेगा।