पंडित नेहरू ने इस पत्र में बच्चों के साथ अपने गहरे दिली रिश्ते को अत्यंत सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है:
क. बड़ों के उपदेशों से दूरी और मित्रता का प्रस्ताव
नेहरू जी पत्र के प्रारंभ में ही स्पष्ट करते हैं कि वे बड़े लोगों की तरह यह नहीं कहेंगे कि “तुम यह करो, वह न करो” या उपदेशों की झड़ी लगा दें। वे कहते हैं कि मुझे तो बच्चों के साथ बैठकर बातें करना, उनके साथ खेलना और हँसना सबसे अधिक प्रिय है। वे बच्चों को अपना सच्चा साथी और मित्र मानते हैं।
ख. प्रकृति की जादुई पुस्तक को पढ़ने का आह्वान
नेहरू जी लिखते हैं कि हमारी यह सुंदर पृथ्वी आश्चर्यों और सौंदर्य का विशाल भंडार है। यदि हम अपनी आँखें और कान खुले रखें, तो प्रकृति हमसे बातें करती है। कलकल करती नदियाँ, ऊँचे बर्फानी पहाड़, घने जंगल, रंग-बिरंगे फूल और आसमान में उड़ते पक्षी—ये सब प्रकृति की उस विशाल पुस्तक के पन्ने हैं जिसे पढ़कर हमें असीम आनंद और ज्ञान मिल सकता है। जो लोग केवल कमरों में बंद रहते हैं, वे इस जादुई दुनिया के सुख से वंचित रह जाते हैं।
ग. विश्व-बंधुत्व और पूर्वाग्रहों से मुक्ति
नेहरू जी बच्चों को बताते हैं कि जब वे विभिन्न देशों (जापान, चीन, अमेरिका, रूस, यूरोप) की यात्रा पर जाते हैं, तो वहाँ के बच्चे भी ठीक हमारे देश के बच्चों की तरह हँसते-खेलते हैं। वे कहते हैं कि बड़े लोग आपस में दीवारें खींच लेते हैं—धर्म की, जाति की, देश की और भाषा की। परंतु बच्चों के लिए ऐसी कोई दीवार नहीं होती। यदि हम किसी के पास प्रेम और मुस्कान लेकर जाएँ, तो सामने वाला भी हमारा मित्र बन जाता है।