कहानी का ताना-बाना तीन प्रमुख चरणों में विभाजित है, जिसमें मुख्य पात्र भिन्न-भिन्न रूपों में उसी नगर में प्रवेश करता है:
प्रथम चरण: खिलौनेवाला बनकर आगमन
कहानी के प्रारंभ में वह एक खिलौनेवाले के रूप में आता है। उसका कंठ अत्यंत मधुर और गान स्नेह से सिक्त है—“बच्चों को बहलानेवाला, खिलौनेवाला!” उसकी मादक पुकार सुनते ही घरों में हलचल मच जाती है। छोटे-छोटे बच्चे अपने खेल-कूद छोड़कर दौड़ पड़ते हैं। वह अपनी पेटी खोलता है और सुंदर, सजीव खिलौने बच्चों को दिखाता है। चुन्नू और मुन्नू अपने पिता विजय बाबू से पैसे लेकर दो-दो पैसे में सुंदर मिट्टी के खिलौने (घोड़ा और गाड़ी) खरीद लाते हैं। विजय बाबू सोचते हैं कि खिलौनेवाला ठगने आया होगा, किंतु बच्चों की खुशी देखकर शांत हो जाते हैं। कुछ ही महीनों बाद वह चला जाता है।
द्वितीय चरण: आठ मास बाद मुरलीवाला बनकर लौटना
लगभग आठ महीने बाद नगर में एक मुरलीवाले की चर्चा फैलती है। वह अत्यंत कुशल मुरलीवादक है, जो ऐसी मीठी तान छेड़ता है कि सुनने वाले मुग्ध हो जाते हैं। वह रंग-बिरंगी बाँसुरियाँ मात्र दो-दो पैसे में बेच रहा है। जब विजय बाबू उससे मोल-भाव करते हुए ताना मारते हैं कि “तुम फेरीवालों की आदत होती है सबको दो-दो पैसे में देना और मुझ पर अहसान लादना”, तब मुरलीवाला अत्यंत शालीनता से कहता है कि ग्राहकों का तो दस्तूर ही होता है कि दुकानदार चाहे हानि उठाकर ही चीज क्यों न बेचे, वे यही समझते हैं कि उन्हें लूटा जा रहा है। रोहिणी चिक (बांस के पर्दे) के पीछे से उसकी बातें सुनकर उसके मधुर स्वभाव और विनम्रता का अनुभव करती है।
तृतीय चरण: शीतकाल में मिठाईवाला बनकर चरम परिणति
सर्दियों के दिनों में वही परिचित, स्नेहासिक्त स्वर फिर गूँजता है—“बच्चों को बहलानेवाला, मिठाईवाला!” रोहिणी तुरंत उस स्वर को पहचान लेती है। वह अपनी वृद्धा दादी से कहकर मिठाईवाले को घर के आँगन में बुलवाती है। रोहिणी पर्दे की ओट से दादी के माध्यम से उससे उसके जीवन के विषय में पूछती है कि वह इतने सस्ते में सामान क्यों बेचता है और अलग-अलग रूपों में इतने लंबे अंतराल के बाद ही क्यों आता है? यहाँ कहानी अपनी चरम भावुकता और रहस्योद्घाटन पर पहुँचती है।