कवि ने बीज की जीवन-यात्रा को चार प्रमुख चरणों में रूपायित किया है:
क. अंधकार में सुप्त बीज: मौन साधना
प्रारंभ में बीज मिट्टी की गहरी गोद में सोया हुआ है। बाहर से देखने पर वह निष्प्राण और जड़ लगता है। किंतु वह मृत नहीं है, वह मौन साधना में लीन है। वह मिट्टी के दबाव और अंधकार से भयभीत नहीं होता, बल्कि प्रकृति के आह्वान की प्रतीक्षा करता है।
ख. वर्षा का स्पर्श और अंकुरण का महाविस्फोट
जब मेघ बरसते हैं और अमृतमयी जल-बूँदें मिट्टी को भेदकर बीज तक पहुँचती हैं, तो बीज का हृदय स्पंदित हो उठता है। वह अपने कठोर आवरण को तोड़ता है। उसकी एक नन्हीं जड़ नीचे रसातल की ओर मिट्टी को पकड़ने जाती है और कोमल हरी अखुआ (अंकुर) ऊपर धूप की तलाश में कठोर मिट्टी को चीरकर बाहर झाँकती है। यह जीवन की विजय का पहला प्रमाण है।
ग. पौधे से विशाल वृक्ष: परोपकार का शिखर
अंकुर धीरे-धीरे पौधा और पौधा वर्षों के संघर्ष के बाद एक विशाल वृक्ष बन जाता है। अब वह किसी पर निर्भर नहीं है, बल्कि सैकड़ों पंछियों को बसेरा देता है, राहगीरों को शीतल छाया प्रदान करता है और मीठे फल लुटाता है। बीज का त्याग ही वृक्ष की महानता बनकर खिलता है।