कथा का प्रवाह अत्यंत रोचक, त्वरित और नाटकीय मोड़ों से परिपूर्ण है:
क. देवता का प्रसन्न होना और तीन वरदानों की प्राप्ति
एक गरीब और परिश्रमी किसान जंगल में लकड़ी काट रहा था। उसकी ईमानदारी और निष्ठा से प्रसन्न होकर एक यक्ष/देवता उसके सम्मुख प्रकट हुए। देवता ने कहा—“वत्स! मैं तुम्हारी निष्कपट सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम अपनी इच्छा से कोई तीन वरदान माँग लो, वे तुरंत पूरे होंगे।” किसान फूला न समाया। उसने देवता को प्रणाम किया और सोचा कि घर जाकर अपनी पत्नी से सलाह करके ही सोच-समझकर वरदान माँगेगा।
ख. पहला और दूसरा वरदान: क्रोध और लालच का तमाशा
घर पहुँचकर जब किसान ने अपनी पत्नी को यह बात बताई, तो दोनों तुरंत सोने-चाँदी, महलों और राजा बनने के सपने देखने लगे। चर्चा करते-करते भूख लगी, तो पत्नी ने कहा कि काश गरमा-गरम स्वादिष्ट पूड़ियाँ और खीर की थाली आ जाए! किसान ने अनायास कह दिया—“हाँ, ऐसी स्वादिष्ट खीर-पूरी की थाली सामने आ जाए!”—यह पहला वरदान था, और तुरंत मेज पर थाली प्रकट हो गई! किसान अपनी इस नासमझी पर झल्ला गया कि उसने एक अनमोल वरदान केवल भोजन की थाली पर बर्बाद कर दिया। क्रोध में आकर वह पत्नी पर चिल्लाया—“तूने मेरा वरदान बर्बाद कराया, जा यह थाली तेरी नाक पर चिपक जाए!”—यह दूसरा वरदान था, और थाली तुरंत पत्नी की नाक पर चिपक गई! अब पत्नी चीखने-चिल्लाने लगी और थाली किसी भी तरह छूटने का नाम नहीं ले रही थी।
ग. तीसरा वरदान: पश्चाताप और पूर्ववत स्थिति की प्रार्थना
अब किसान के पास केवल एक ही तीसरा वरदान शेष बचा था। वह चाहता तो धन-दौलत, सोने का महल या राजा का पद माँग सकता था, किंतु यदि पत्नी की नाक पर ही थाली चिपकी रहती तो उस दौलत का क्या उपयोग था? पत्नी रो-रोकर अपनी जान की भीख माँग रही थी। अंततः किसान ने हाथ जोड़कर तीसरे वरदान में कहा—“हे प्रभु! कृपा करके यह थाली मेरी पत्नी की नाक से अलग होकर जमीन पर आ जाए और हम पहले जैसे ही सामान्य बन जाएँ!” थाली तुरंत अलग हो गई। तीनों वरदान समाप्त हो गए और किसान समझ गया कि लोभ और अविवेक मनुष्य को विनाश के सिवा कुछ नहीं देता।