Follow Us
झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 7 • Hindi (भाषा मंजरी-7) • अध्याय 17
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

वरदान का फेर

प्रस्तुत मनोरंजक, शिक्षाप्रद एवं नीतिपरक लोककथा “वरदान का फेर” मनुष्य के असीमित लोभ, लालच के दुष्परिणामों और संतोष के महत्व को बड़े ही रोचक और मनोवैज्ञानिक ढंग से उद्घाटित करती है। कथा दर्शाती है कि जब किसी विवेकहीन और लालची व्यक्ति को कोई दैवीय शक्ति या वरदान मिल जाता है, तो वह उसका सदुपयोग लोक-कल्याण या आत्मिक उन्नति में करने के बजाय अपनी अनियंत्रित तृष्णा की पूर्ति में करता है। परिणामतः वही वरदान उसके लिए सबसे बड़ा अभिशाप और विनाश का कारण बन जाता है। कहानी का मुख्य पात्र अपनी मूर्खता और अहंकार के कारण मिले हुए वरदानों का ऐसा चक्रव्यूह रचता है कि अंत में वह पहले से भी अधिक दयनीय और हास्यास्पद स्थिति में पहुँच जाता है। यह लोककथा नीति वाक्य “संतोष ही परम सुख है” (सन्तोषं परमं सुखम्) को चरितार्थ करती है।

यदि आपको ईश्वर से कोई तीन वरदान माँगने का अवसर मिले, तो क्या आप सचमुच वही माँगेंगे जो आपके लिए सही हो?

प्राचीन कथाओं में जब भी किसी को तीन वरदान मिले, तो अधिकांश लोग लालच में आकर ऐसी चीजें माँग बैठे जिससे उनकी जान पर ही बन आई! इस कहानी में भी एक ऐसे ही किसान को वरदान मिला कि वह जो माँगेगा, वह तुरंत पूरा होगा। उसने सोचा कि अब वह दुनिया का सबसे सुखी और अमीर आदमी बन जाएगा, परंतु अपनी पत्नी की जिद और अपने अविवेक के कारण उसने ऐसे वरदान माँगे कि अंत में अपनी जान बचाने के लिए अंतिम वरदान में सब कुछ पहले जैसा करने की भीख माँगनी पड़ी! आइए इस हास्य और सीख से भरी कथा का आनंद लें।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह पाठ विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों, संतोष की भावना, दूरदर्शिता और लोभ से बचने की विवेकपूर्ण सोच विकसित करता है। यह सिखाता है कि बिना विचार किए माँगा गया सुख या अर्जित किया गया धन कभी स्थायी शांति नहीं दे सकता। साथ ही, यह लोक-साहित्य के हास्य-व्यंग्य और कथा-रस से छात्रों को जोड़ता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • लोककथा विधा और तीन वरदानों वाली पारंपरिक कहानियों से सामान्य परिचय।
  • लोभ, लालच और संतोष जैसे नैतिक संप्रत्ययों का बुनियादी बोध।
  • कथा में हास्य-व्यंग्य और नाटकीय परिस्थितियों को समझने की क्षमता।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • विद्यार्थी लोककथा के माध्यम से लालच के विनाशकारी परिणामों का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • ‘संतोष ही परम धन है’ की नैतिक सीख को अपने दैनिक आचरण में उतारने का संकल्प लेंगे।
  • कथा के हास्यपूर्ण प्रसंगों और पात्रों की मनोदशा का साहित्यिक आस्वादन कर सकेंगे।
  • कथा में प्रयुक्त देशज, तद्भव शब्दों और लोकोक्तियों का अर्थ एवं वाक्य प्रयोग सीखेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. कथा-सार: तीन वरदानों का हास्यास्...
2 2. शब्दार्थ, लोक-शब्दावली एवं भाव-व...
3 3. नैतिक मीमांसा: लोभ का अंत और संत...
4 4. भाषा की बात: विलोम शब्द, मुहावरे...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. कथा-सार: तीन वरदानों का हास्यास्पद और विनाशकारी फेर

कथा का प्रवाह अत्यंत रोचक, त्वरित और नाटकीय मोड़ों से परिपूर्ण है:

क. देवता का प्रसन्न होना और तीन वरदानों की प्राप्ति

एक गरीब और परिश्रमी किसान जंगल में लकड़ी काट रहा था। उसकी ईमानदारी और निष्ठा से प्रसन्न होकर एक यक्ष/देवता उसके सम्मुख प्रकट हुए। देवता ने कहा—“वत्स! मैं तुम्हारी निष्कपट सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम अपनी इच्छा से कोई तीन वरदान माँग लो, वे तुरंत पूरे होंगे।” किसान फूला न समाया। उसने देवता को प्रणाम किया और सोचा कि घर जाकर अपनी पत्नी से सलाह करके ही सोच-समझकर वरदान माँगेगा।

ख. पहला और दूसरा वरदान: क्रोध और लालच का तमाशा

घर पहुँचकर जब किसान ने अपनी पत्नी को यह बात बताई, तो दोनों तुरंत सोने-चाँदी, महलों और राजा बनने के सपने देखने लगे। चर्चा करते-करते भूख लगी, तो पत्नी ने कहा कि काश गरमा-गरम स्वादिष्ट पूड़ियाँ और खीर की थाली आ जाए! किसान ने अनायास कह दिया—“हाँ, ऐसी स्वादिष्ट खीर-पूरी की थाली सामने आ जाए!”—यह पहला वरदान था, और तुरंत मेज पर थाली प्रकट हो गई! किसान अपनी इस नासमझी पर झल्ला गया कि उसने एक अनमोल वरदान केवल भोजन की थाली पर बर्बाद कर दिया। क्रोध में आकर वह पत्नी पर चिल्लाया—“तूने मेरा वरदान बर्बाद कराया, जा यह थाली तेरी नाक पर चिपक जाए!”—यह दूसरा वरदान था, और थाली तुरंत पत्नी की नाक पर चिपक गई! अब पत्नी चीखने-चिल्लाने लगी और थाली किसी भी तरह छूटने का नाम नहीं ले रही थी।

ग. तीसरा वरदान: पश्चाताप और पूर्ववत स्थिति की प्रार्थना

अब किसान के पास केवल एक ही तीसरा वरदान शेष बचा था। वह चाहता तो धन-दौलत, सोने का महल या राजा का पद माँग सकता था, किंतु यदि पत्नी की नाक पर ही थाली चिपकी रहती तो उस दौलत का क्या उपयोग था? पत्नी रो-रोकर अपनी जान की भीख माँग रही थी। अंततः किसान ने हाथ जोड़कर तीसरे वरदान में कहा—“हे प्रभु! कृपा करके यह थाली मेरी पत्नी की नाक से अलग होकर जमीन पर आ जाए और हम पहले जैसे ही सामान्य बन जाएँ!” थाली तुरंत अलग हो गई। तीनों वरदान समाप्त हो गए और किसान समझ गया कि लोभ और अविवेक मनुष्य को विनाश के सिवा कुछ नहीं देता।

2. शब्दार्थ, लोक-शब्दावली एवं भाव-विश्लेषण

कथा में प्रयुक्त महत्वपूर्ण शब्दों के सटीक अर्थ:

कठिन शब्द व्याकरणिक स्वरूप सटीक अर्थ कथा संदर्भ
फेर संज्ञा (तद्भव/चक्र) चक्कर, उलझन, विपरीत परिणाम, भटकाव वरदान का फेर (वरदान का उलटा असर)।
अविवेक संज्ञा (तत्सम) बिना सोचे-समझे कार्य करना, मूर्खता अविवेक के कारण सारे वरदान नष्ट हो गए।
तृष्णा संज्ञा (तत्सम) तीव्र लालच, कभी न बुझने वाली सांसारिक प्यास मनुष्य की तृष्णा कभी शांत नहीं होती।
पश्चाताप संज्ञा (तत्सम) गलती पर होने वाला हार्दिक दुख, पछतावा किसान को अपने क्रोध पर भारी पश्चाताप हुआ।
हास्यास्पद विशेषण (तत्सम) हँसी के योग्य, उपहासास्पद, अजीबोगरीब नाक पर थाली चिपकने से स्थिति हास्यास्पद बन गई।

3. नैतिक मीमांसा: लोभ का अंत और संतोष का महत्व

कहानी का तात्विक विश्लेषण हमें गहरे जीवन-सत्यों से परिचित कराता है:

लोभ और क्रोध का दुष्परिणाम

• अनियंत्रित इच्छाएँ बुद्धि को भ्रष्ट कर देती हैं।
• क्रोध में विवेक शून्य हो जाता है, जिससे विनाशकारी शब्द निकलते हैं।
• अवसर का सदुपयोग करने की बजाय व्यक्ति स्वयं संकट में फँस जाता है।
• बिना परिश्रम के मिला वरदान भी अभिशाप बन जाता है।

संतोष और विवेक की महत्ता

• जो अपने श्रम और वर्तमान से संतुष्ट है, वही वास्तविक सुखी है।
• कठिन परिस्थितियों में धैर्य और शांत चित्त से निर्णय लेना चाहिए।
• परिवार की सुख-शांति किसी भी काल्पनिक वैभव से बड़ी है।
• संतोष ही परम धन (गो-धन, गज-धन) माना गया है।

4. भाषा की बात: विलोम शब्द, मुहावरे एवं संधि

कथा से संबंधित महत्वपूर्ण व्याकरणिक नियम:

क. महत्वपूर्ण विलोम शब्द
  • वरदान ↔ अभिशाप (शाप)
  • विवेक ↔ अविवेक
  • संतोष ↔ असंतोष/लोभ
  • प्रसन्न ↔ अप्रसन्न/खिन्न
ख. उपयोगी लोकोक्तियाँ व मुहावरे
  • माया मिली न राम: दोनों ओर से नुकसान होना (वरदान भी गए और धन भी नहीं मिला)।
  • फूला न समाना: अत्यधिक प्रसन्न होना।
  • हाथ मलते रह जाना: अवसर चूक जाने पर पछताना।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

संतोष का अमर महामंत्र
संतोषं परमं सुखम् (संतोष ही सबसे बड़ा सुख है)
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान (कबीरदास)।
वरदानों का विनाशकारी चक्र
वरदान 1 (खीर-पूरी) → वरदान 2 (नाक पर थाली) → वरदान 3 (पूर्ववत स्थिति)
अविवेक और क्रोध के कारण शून्य परिणाम (शून्य लाभ) प्राप्त हुआ।
विलोम युग्म सूत्र
वरदान (आशीर्वाद) ↔ अभिशाप (श्राप)
यदि बुद्धि न हो तो वरदान भी अभिशाप में बदल जाता है।
क्रोध का मनोविज्ञान
क्रोध → सम्मोह (भ्रम) → स्मृति-नाश → बुद्धि-नाश → सर्वनाश
गीता का यह अमर श्लोक किसान के आचरण में शत-प्रतिशत घटित हुआ।
लोकोक्ति संदर्भ
दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम!
लोभ और जल्दबाजी में इंसान जो है उसे भी खो बैठता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
किसान को तीन वरदान किसने और क्यों दिए थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: किसान को तीन वरदान एक वन-देवता (यक्ष) ने दिए थे। किसान जंगल में बड़ी ईमानदारी, निष्ठा और कठिन परिश्रम से अपनी आजीविका कमाता था। उसकी निष्कपटता और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर देवता ने उसे मनचाहे तीन वरदान माँगने का अवसर दिया था।
उदाहरण 2
किसान ने पहले और दूसरे वरदान का उपयोग किस प्रकार व्यर्थ कर दिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: किसान और उसकी पत्नी जब वरदानों के बारे में सोच रहे थे, तभी भूख लगने पर पत्नी ने खीर-पूरी की इच्छा जताई और किसान के मुँह से अनायास निकल गया कि सामने खीर-पूरी की थाली आ जाए; इससे पहला वरदान व्यर्थ हो गया। पहले वरदान के व्यर्थ होने पर किसान को अपनी पत्नी पर भीषण क्रोध आ गया और उसने गुस्से में कह दिया कि जा यह थाली तेरी नाक पर चिपक जाए; इससे दूसरा वरदान भी पत्नी की नाक पर थाली चिपकाने में नष्ट हो गया।
उदाहरण 3
किसान को तीसरे वरदान में क्या माँगना पड़ा और क्यों?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: किसान को तीसरे वरदान में यह माँगना पड़ा कि थाली उसकी पत्नी की नाक से छूटकर नीचे गिर जाए और वे दोनों पहले की तरह सामान्य बन जाएँ। यद्यपि वह धन-दौलत या राजपद माँग सकता था, किंतु उसकी पत्नी नाक पर थाली चिपकने के कारण असहनीय पीड़ा में चीख रही थी और उसकी जान संकट में थी। अतः पत्नी की रक्षा के लिए उसे अपनी सारी लालसाओं को त्यागकर तीसरा वरदान भी गँवाना पड़ा।
उदाहरण 4
‘वरदान का फेर’ लोककथा से हमें क्या नैतिक और व्यावहारिक सीख मिलती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: यह लोककथा हमें सिखाती है कि मनुष्य को कभी भी अत्यधिक लोभ, लालच और क्रोध के वशीभूत नहीं होना चाहिए। क्रोध में मनुष्य की सोचने-समझने की बुद्धि नष्ट हो जाती है। जीवन में जो कुछ अपने परिश्रम से प्राप्त होता है, उसी में सच्चा संतोष और शांति है। बिना सोचे-विचारे लिए गए निर्णय वरदान को भी अभिशाप बना देते हैं।
उदाहरण 5
‘वरदान’ और ‘विवेक’ शब्दों के विलोम शब्द लिखकर वाक्य प्रयोग कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
• वरदान का विलोम: अभिशाप। वाक्य: प्रदूषण आज समूची मानव जाति के लिए एक भयानक अभिशाप बन चुका है।
• विवेक का विलोम: अविवेक। वाक्य: अविवेक से लिया गया निर्णय मनुष्य को संकट में डाल देता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

कहानी को केवल एक बच्चों का चुटकुला समझ लेना!

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह केवल हास्य-कथा नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान, क्रोध के दुष्परिणाम और संतोष की अनिवार्यता को उद्घाटित करने वाली एक गंभीर नीतिपरक लोककथा है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

‘वरदान का फेर’ का अर्थ वरदान वापस ले लेना समझना!

सही वैज्ञानिक तथ्य

यहाँ ‘फेर’ का अर्थ विपरीत चक्र या उलटा परिणाम है, जहाँ वरदान ही आफत बन गया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

‘वरदान’ का विलोम ‘दान’ समझ लेना!

सही वैज्ञानिक तथ्य

वरदान का सही विलोम अभिशाप या शाप होता है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

पाठ 17: वरदान का फेर — लोभ का चक्रव्यूह एवं संतोष का अमर सत्य 1 प्रथम वरदान (असावधानी) • भूख में खीर-पूरी की चाह • अनायास मुँह से निकलना • अनमोल वरदान भोजन में व्यर्थ [अवसर का पहला अपव्यय] 2 द्वितीय वरदान (क्रोध) • पत्नी पर अत्यधिक गुस्सा • नाक पर थाली चिपकने का शाप • पत्नी का करुण विलाप व चीख [क्रोध में बुद्धि-विनाश] 3 तृतीय वरदान (संतोष) • जान बचाने की विवशता • थाली हटने व पूर्ववत होने की मांग • शून्य लाभ किंतु जीवन रक्षा [संतोष ही परम सुख]

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
‘वरदान का फेर’ एक अत्यंत रोचक, हास्यपूर्ण एवं शिक्षाप्रद लोककथा है।
मुख्य बिंदु 2
कथा में एक गरीब और परिश्रमी किसान को वन-देवता से तीन मनचाहे वरदान प्राप्त होते हैं।
मुख्य बिंदु 3
किसान सोच-समझकर वरदान माँगने के उद्देश्य से घर लौटकर अपनी पत्नी से चर्चा करता है।
मुख्य बिंदु 4
भूख के कारण पत्नी की बात पर किसान अनायास खीर-पूरी माँग लेता है, जिससे पहला वरदान व्यर्थ हो जाता है।
मुख्य बिंदु 5
वरदान गँवाने के क्रोध में किसान पत्नी को कोसते हुए थाली उसकी नाक पर चिपकने का दूसरा वरदान दे बैठता है।
मुख्य बिंदु 6
थाली नाक पर चिपकते ही पत्नी तड़पने लगती है और स्थिति अत्यंत विकट व हास्यास्पद बन जाती है।
मुख्य बिंदु 7
धन-दौलत माँगने के बजाय किसान को पत्नी की रक्षा के लिए तीसरे वरदान में सब कुछ पहले जैसा माँगना पड़ता है।
मुख्य बिंदु 8
तीनों वरदान समाप्त होने के बाद किसान को समझ आता है कि अविवेक और क्रोध से वरदान भी विपत्ति बन जाता है।
मुख्य बिंदु 9
कहानी सिद्ध करती है कि ‘संतोषं परमं सुखम्’—परिश्रम और संतोष ही जीवन का सच्चा धन है।
मुख्य बिंदु 10
यह कथा छात्रों को किसी भी स्थिति में धैर्य, विवेक और शांति बनाए रखने की अमूल्य सीख देती है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
किसान को तीन वरदान किस प्रकार प्राप्त हुए थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जंगल में लकड़ी काटते समय उसकी ईमानदारी और निष्ठा से प्रसन्न होकर वन-देवता ने दिए थे।
देवता उसकी मेहनत से संतुष्ट होकर उसकी परीक्षा ले रहे थे।
2
किसान का पहला वरदान किस वस्तु में नष्ट हो गया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: खीर-पूरी की थाली माँगने में।
भूख के कारण बिना विचारे बोलने से पहला वरदान व्यर्थ चला गया।
3
क्रोध में आकर किसान ने दूसरे वरदान में क्या कह दिया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कि यह थाली उसकी पत्नी की नाक पर चिपक जाए।
क्रोध ने किसान की बुद्धि हर ली और उसने अपनी पत्नी को ही संकट में डाल दिया।
4
तीसरे वरदान में किसान ने दौलत क्यों नहीं माँगी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि पत्नी की जान खतरे में थी और थाली अलग करना सबसे पहली प्राथमिकता थी।
परिवार की रक्षा और शांति किसी भी धन-दौलत से बड़ी होती है।
5
इस लोककथा का मुख्य नैतिक संदेश क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्रोध और लोभ मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं; विवेक और संतोष ही सच्चे सुख के आधार हैं।
बिना सोचे-समझे कार्य करने से वरदान भी अभिशाप में बदल जाता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

वरदान का फेर में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।