कहानी दो पक्षियों के परस्पर विरोधी जीवन-मूल्यों और संवादों पर आधारित है:
क. पिंजरे के पक्षी का वैभव और दासता
एक धनी सेठ के महल में सोने का एक अत्यंत सुंदर पिंजरा था, जिसमें एक तोता रहता था। तोते को सोने की कटोरी में मीठे फल, दूध-भात और मेवे दिए जाते थे। उसे बिल्ली या चील का कोई डर नहीं था। वह मालिक द्वारा सिखाए गए बोल बोलता और लोगों का मनोरंजन करता। किंतु इस भौतिक सुख के बदले उसने अपनी सबसे बड़ी दौलत खो दी थी—उसके उड़ने की शक्ति समाप्त हो चुकी थी और वह तीलियों के भीतर फड़फड़ाने के सिवा कुछ नहीं कर सकता था।
ख. वन-पक्षी का आगमन और मुक्ति का संवाद
एक दिन खिड़की के पास जंगल का एक स्वतंत्र पक्षी आकर बैठता है। पिंजरे का पक्षी उसे अपने वैभव की दावत देता है—“आओ भाई! मेरे पिंजरे में आ जाओ। यहाँ रोज स्वादिष्ट भोजन मिलता है, धूप-पानी से रक्षा होती है।” वन-पक्षी उसकी बात सुनकर हँस पड़ता है और कहता है—“अरे मूर्ख! तेरा यह पिंजरा चाहे सोने का हो, पर है तो कैदखाना ही! मुझे तेरी सोने की कटोरी का भोजन नहीं चाहिए। मुझे तो नीम की कड़वी निबौरी, बहता शीतल झरना और क्षितिज तक उड़ने की आजादी प्यारी है।”
ग. आत्मा की जागृति और मुक्ति की छटपटाहट
वन-पक्षी की बातें सुनकर पिंजरे के पक्षी के अंतर्मन में बिजली-सी कौंध जाती है। उसे अचानक याद आता है कि वह तो गगन का पंछी था, पिंजरे का गुलाम नहीं! जब अगली सुबह मालिक पिंजरे की सफाई के लिए दरवाजा खोलता है, तो पिंजरे का पक्षी सारी सुख-सुविधाओं को ठोकर मारकर पूरे वेग से खुले गगन की ओर उड़ जाता है। वह भूखा रहने को तैयार है, परंतु गुलाम रहने को नहीं।