कवि युवाओं को संबोधित करते हुए कहते हैं कि पुरानी परिपाटियों को छोड़कर नूतन युग का निर्माण करो:
क. पुरानी जंजीरों को तोड़ना: मानसिक दासता से मुक्ति
कवि कहते हैं—“तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो! / धरी हुई जंजीर जो समाज की उतार दो / पुरानी रीतियों को छोड़ दो, सुधार दो।” सदियों से हमारा समाज जाति-पाँति, छुआछूत और दकियानूसी परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। कवि युवाओं को झकझोरते हुए कहते हैं कि समाज के गले में पड़ी इन सड़ चुकी जंजीरों को उतार फेंको। जब तक पुरानी रूढ़ियाँ नहीं टूटेंगी, तब तक नवजीवन का सूर्योदय नहीं हो सकता।
ख. नए समाज और नए राष्ट्र का भव्य स्वप्न
कवि आह्वान करते हैं कि एक ऐसे समाज की कल्पना करो जहाँ ज्ञान, न्याय और समता का राज्य हो। जहाँ कोई अकिंचन या दीन-हीन न हो। अपने हाथों के पौरुष से बंजर धरती को उपजाऊ बनाओ, कारखानों और खेतों में श्रम की नई इबारत लिखो। कल्पना केवल खयाली पुलाव पकाना नहीं है, बल्कि वह नए भविष्य का खाका तैयार करना है जिसे भुजाओं के बल से साकार करना है।
ग. काल के प्रवाह को मोड़ देने की युवा शक्ति
कविता के अंतिम चरणों में कवि युवाओं को याद दिलाते हैं कि इतिहास का रुख हमेशा युवाओं के संकल्प ने मोड़ा है। यदि युवा पीढ़ी जाग्रत हो जाए, तो वह समय की धारा को भी बदल सकती है। अतः हे देश के तरुणो! निराशा और आलस्य को त्यागो और एक स्वर्णिम युग की रचना के लिए अपनी कल्पनाओं को पंख दो।