प्रस्तुत कहानी बच्चों के मन में छुट्टी के दिन के प्रति उमड़ने वाले उत्साह का क्रमिक विवरण प्रस्तुत करती है:
क. शनिवार की शाम: मुक्ति का प्रथम एहसास
कहानी का प्रारंभ शनिवार की अंतिम घंटी से होता है। टन-टन बजती स्कूल की घंटी बच्चों के कानों में अमृत घोल देती है। गृहकार्य का बोझ होने के बावजूद यह विचार ही मन को प्रफुल्लित कर देता है कि कल सुबह 6 बजे अलार्म की कर्कश ध्वनि नहीं सुननी पड़ेगी। घर लौटते समय बच्चों के कदमों में एक अनोखी स्फूर्ति होती है। बस्ता मेज पर फेंककर वे सीधे खेल के मैदान की ओर दौड़ पड़ते हैं।
ख. रविवार का प्रभात: योजनाओं का विशाल ताना-बाना
रविवार की सुबह देर से जागने का सुख अद्वितीय है। माँ की स्नेहभरी डाँट, गरमा-गरम नाश्ता और फिर दोस्तों की टोली का एकत्र होना। बच्चे दिनभर की विशाल योजनाएँ बनाते हैं—नदी किनारे जाना, पेड़ों पर चढ़ना, क्रिकेट मैच खेलना और टूटे हुए खिलौनों से नए आविष्कार करना। बच्चों के लिए समय मानो पंख लगाकर उड़ने लगता है। दोपहर कब बीती और शाम कब ढली, इसका पता ही नहीं चलता।
ग. रविवार की शाम: उदासी और नए सप्ताह का संकल्प
जैसे ही सूरज डूबता है, बच्चों के चेहरे पर हल्की-सी उदासी की छाया घिर आती है। फिर से बस्ता याद आता है, अधूरा गृहकार्य सामने होता है और सोमवार की सुबह की तैयारी करनी पड़ती है। किंतु इस छुट्टी ने उनके भीतर नई ऊर्जा और ताज़गी भर दी होती है, जिससे वे पूरे सप्ताह की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो जाते हैं।