कवि अरुण कमल ने कविता को अत्यंत साधारण बोलचाल की भाषा में लिखा है, किंतु इसके भीतर छिपा सामाजिक यथार्थ अत्यंत गहरा और झकझोर देने वाला है:
क. गंदे नालों और कूड़े के ढेरों के बीच का परिवेश
कविता की शुरुआत ही उस नारकीय वातावरण के चित्रण से होती है जहाँ अगरबत्ती बनाने वाले कारीगर रहते हैं—“कई गलियों के बीच / कई नालों के पार / कूड़े-करकट के ढेरों के बाद / बदबू से फटते जाते इस टोले के अंदर / खुशबू रचते हैं हाथ।” कवि बताते हैं कि शहर के जिस हिस्से में कचरे के पहाड़ लगे हैं और गंदे नालों की सड़ांध से सिर फटा जा रहा है, उसी घृणित और बदबूदार टोले में यह अनूठा चमत्कार घटित होता है कि वहाँ दुनिया की सबसे मनमोहक खुशबू गढ़ी जाती है।
ख. हाथों की विभिन्नता: उम्र और शोषण का सजीव बिंब
कवि ने अगरबत्ती निर्माण में लगे मजदूरों के हाथों का सूक्ष्म और कारुणिक अवलोकन किया है:
- उभरी नसों वाले हाथ: यह वृद्ध और कमजोर मजदूरों के हाथ हैं, जिनकी उम्र भर की मेहनत ने उनकी नसों को चमड़ी से बाहर उभार दिया है।
- घिसे नाखूनों वाले हाथ: यह उन अभागे बच्चों और किशोरों के हाथ हैं जो लगातार तीलियों पर मसाला लपेटते-लपेटते अपने नाखूनों को घिस चुके हैं।
- पीपल के पत्ते से नए-नए हाथ: यह अत्यंत छोटे, मासूम और कोमल बच्चों के हाथ हैं, जिन्हें खेलने-पढ़ने की उम्र में रोटी के लिए भट्टी जैसी जिंदगी में झोंक दिया गया है।
- जूही की डाल से खुशबूदार हाथ: यह युवतियों और महिलाओं के हाथ हैं जो स्वयं सुंदर और सुगंधित होकर भी अंधकारमय भविष्य ढो रही हैं।
- जख्म से फटे हुए हाथ: रासायनिक मसालों और बाँस की खपच्चियों से छलनी हुए घायल हाथ, जो पीड़ा सहकर भी दूसरों के लिए सुगंध बनाते हैं।
ग. सामाजिक विडंबना और अनुत्तरित प्रश्न
कविता के अंतिम अंश में कवि एक कड़वा प्रश्न छोड़ते हैं—“यहीं इस गली में बनती हैं / मुल्क की मशहूर अगरबत्तियाँ / गंदे मुहल्लों के गंदे लोग / बनाते हैं केवड़ा, गुलाब, खस और रातरानी अगरबत्तियाँ!” समाज जिन्हें “गंदे लोग” कहकर दुत्कारता है और अलग-थलग बस्तियों में छोड़ देता है, वही लोग पूरे मुल्क को रातरानी और केवड़े की महक से सराबोर करते हैं। यह कविता का केंद्रीय व्यंग्य है।