कवि दिनकर ने कविता की शुरुआत एक ललकार भरी चुनौती से की है:
क. कलम की महिमा: विचारों का महाविस्फोट
कवि कहते हैं—“दो में से क्या तुम्हें चाहिए, कलम या कि तलवार? / मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय की अपार?” कलम ज्ञान का दीपक जलाती है। वह अंधेरी कोठरी में बैठकर भी ऐसी विचार-क्रांति छेड़ सकती है जिससे सदियों की सोई हुई जनता जाग उठती है। कलम मानव-मन में आत्मसम्मान, त्याग, बलिदान और अन्याय के विरुद्ध आक्रोश की चिनगारी भरती है। एक विचारशील मस्तिष्क लाखों तलवारों को दिशा देने में समर्थ होता है।
ख. तलवार की अनिवार्यता: बाह्य संकटों का संहार
किंतु कवि केवल कलम की प्रशंसा करके नहीं रुकते। वे यथार्थ की कठोर भूमि पर आते हैं—जब हिंसक शत्रु सीमा पार करके घर में घुस आए, नरसंहार करने लगे, तब केवल मधुर कविताएँ या उपदेश काम नहीं आते! उस समय उस बर्बर हिंसक का सामना करने के लिए हाथ में धारदार ‘तलवार’ का होना अनिवार्य है। तलवार दुष्टों का दमन करती है, न्याय की रक्षा करती है और देश की सीमाओं को अभेद्य बनाती है।
ग. दोनों का अद्भुत समन्वय: आदर्श राष्ट्र की संकल्पना
कविता का अंतिम निष्कर्ष यह है कि कलम और तलवार एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। जिस देश में कलम निर्भीक होकर सत्य लिखती है और सैनिक की भुजा में तलवार चमकती है, वह राष्ट्र संसार में अजेय रहता है। कलम अंदर की चेतना जगाती है और तलवार बाहर से रक्षा करती है।