कहानी में तोते की शिक्षा के बहाने व्यवस्था के पाखंड का क्रमिक उद्घाटन होता है:
क. राजा की सनक और तोते की अशिक्षा की चिंता
एक दिन राजा को विचार आया कि राजमहल के बगीचे में उड़ने वाला तोता बिल्कुल बेवकूफ है। वह फल खाता है, चहकता है और आसमान में उड़ता है, किंतु उसे नीति-शास्त्र का कोई ज्ञान नहीं है। राजा ने अपने भांजों को बुलाकर आदेश दिया कि इस तोते को सुशिक्षित और सभ्य बनाया जाए। भांजों ने तुरंत पंडितों की एक बड़ी सभा बुलाई।
ख. सोने का पिंजरा, पोथियों की नकल और लूट का तांडव
पंडितों ने परामर्श दिया कि तोते की अशिक्षा का कारण उसका खुले जंगल में रहना है। अतः सबसे पहले सुनारों को बुलाकर एक भव्य सोने का पिंजरा बनवाया गया। पिंजरे की चमक देखकर संसार स्तब्ध रह गया। इसके बाद पोथियाँ लिखने वाले लिपिकों (नकलनवीसों) को बुलाया गया। उन्होंने तालपत्रों और कागजों पर पोथियों की नकल के इतने भारी ढेर लगा दिए कि उनके पहाड़ बन गए। इसके बाद पहरेदारों, झाड़ू देने वालों और रखवालों की फौज तैनात की गई। सबने राजा के खजाने से लाखों रुपये बटोरे और खूब दावतें उड़ाईं। तोते को केवल पोथियों के सूखे पन्ने कलम की नोक से ठूँस-ठूँसकर खिलाए जाने लगे। तोते की स्वाभाविक चहचहाहट बंद हो गई।
ग. राजा का निरीक्षण और शिक्षा का त्रासद अंत
जब राजा तोते की शिक्षा की प्रगति देखने आए, तो ढोल-नगाड़े बजे, पंडितों ने श्लोक पढ़े और भांजों ने पिंजरे की नक्काशी दिखाई। राजा पिंजरे की सजावट और व्यवस्था से अत्यंत प्रसन्न हुए। किसी ने तोते को नहीं देखा। एक दिन तोते के पेट में सूखे कागजों के सिवा अन्न का एक दाना भी न होने से वह पिंजरे के कोने में बेजान होकर गिर पड़ा। जब राजा ने पूछा कि “तोते की आवाज क्यों नहीं आ रही?”, तो भांजों ने तोते को हिलाकर देखा—तोते के सूखे पेट में केवल सूखे कागजों की खड़खड़ाहट हो रही थी! शिक्षा पूरी हो चुकी थी, किंतु तोता हमेशा के लिए मर चुका था!