"मन समर्पित, तन समर्पित, और यह जीवन समर्पित;
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।"
व्याख्या: कवि कहते हैं कि हे मेरी मातृभूमि! मैं अपना मन, अपना शरीर और अपना संपूर्ण जीवन तेरे चरणों में सादर भेंट करता हूँ। इसके बावजूद मुझे लगता है कि मेरा यह त्याग बहुत छोटा है, इसलिए मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि मैं अपने देश की मिट्टी को इससे भी बढ़कर कुछ और अनुपम उपहार दूँ।
"माँ तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन—
थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी,
कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण!"
व्याख्या: कवि विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं कि हे भारत माँ! आपका मुझ पर इतना बड़ा उपकार और ऋण है कि मैं अत्यंत निर्धन (अकिंचन) और साधनहीन होने के कारण उसे चुका नहीं सकता। फिर भी मेरी एकमात्र प्रार्थना है कि जब भी रणभूमि में मैं अपने कटे हुए सिर (भाल / मस्तक) को थाल में सजाकर लाऊँ, तो आप कृपा करके मेरे इस सर्वोच्च बलिदान को स्वीकार कर लेना।
"तोड़ता हूँ मोह का बंधन क्षमा दो,
गाँव मेरे, द्वार मेरे, आँगन क्षमा दो!
आज सीधे हाथ में तलवार दे दो,
और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो।"
व्याख्या: देश की रक्षा के लिए युद्धभूमि में जाते समय कवि अपने पारिवारिक सुखों, घर-आँगन और गाँव के मोह-ममता के बंधनों से क्षमा माँगते हैं। वे कहते हैं कि आज देश की रक्षा का समय है, अतः मेरे दाहिने हाथ में चमचमाती तलवार और बाएँ हाथ में तिरंगा ध्वज थमा दो ताकि मैं विजय पताका फहरा सकूँ।