प्रस्तुत लोककथा एक ऐसे ग्रामीण परिवेश की है जहाँ निरक्षरता और अज्ञानता का साम्राज्य था:
क. पोथी का आगमन और ग्रामीणों का अंधविश्वास
गाँव में एक समय बाहर से एक पोथी (धार्मिक पांडुलिपि) आई। अधिकांश ग्रामीण निरक्षर थे, इसलिए उन्होंने समझा कि यह कोई चमत्कारी दैवीय वस्तु है। उन्होंने पोथी को रेशमी लाल कपड़े में लपेटा, उस पर चंदन का तिलक लगाया और धूप-दीप दिखाकर गाँव के चबूतरे पर स्थापित कर दिया। जब भी गाँव में कोई बीमार पड़ता या सूखा पड़ता, लोग पोथी के आगे हाथ जोड़कर खड़े हो जाते और मन्नतें माँगते। वे समझते थे कि पोथी के पास होने मात्र से सारे कष्ट स्वतः दूर हो जाएँगे।
ख. संकट की घड़ी और पोथी का मौन
एक बार गाँव पर भारी विपत्ति आई। महामारी फैलने लगी और फसलें नष्ट होने लगीं। ग्रामीणों ने पोथी की और अधिक पूजा-अर्चना की, बकरे की बलि देने की बात सोची, किंतु संकट टलने का नाम नहीं ले रहा था। लोग निराश होकर कहने लगे कि शायद पोथी का चमत्कार समाप्त हो गया है या पोथी उनसे रुष्ट हो गई है। अज्ञानतावश वे भ्रम और भय के जाल में और अधिक उलझते चले गए।
ग. विवेकशील गुरु का आगमन एवं सत्य का उद्घाटन
तभी गाँव में एक विद्वान एवं विवेकशील व्यक्ति का पदार्पण हुआ। उसने जब ग्रामीणों को पोथी के सामने सिर पटकते और अंधविश्वास में डूबा देखा, तो उसने सबको शांत कराया। उसने पोथी का लाल कपड़ा खोला, पन्ने पलटे और उसमें लिखे श्लोकों व वचनों को सस्वर पढ़कर उनका सरल लोकभाषा में अर्थ समझाया। पोथी में स्वच्छता के नियम, जड़ी-बूटियों से रोगों के उपचार, जल-संरक्षण और कृषि के उन्नत उपाय लिखे थे! जब ग्रामीणों ने उन उपायों पर अमल किया, तो गाँव की महामारी दूर हो गई और संकट समाप्त हो गया। तब लोगों की आँखें खुलीं कि पोथी पूजने की नहीं, बल्कि पढ़ने और जीवन में अपनाने की वस्तु है।