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WBB • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 15
अनुमानित समय: 50 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

जलवायु प्रदेश

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) द्वारा कक्षा 8 भूगोल की आधिकारिक पाठ्यपुस्तक "हमारी पृथ्वी" (আমাদের পৃথিবী) के अध्याय 6 "जलवायु प्रदेश" (Climatic Regions / জলবায়ু অঞ্চল) के प्रामाणिक अध्ययन मार्गदर्शक में आपका स्वागत है। भौतिक भूगोल में "जलवायु प्रदेश" से तात्पर्य पृथ्वी के धरातल पर स्थित उस विशाल भूभाग से है, जहाँ वायुमंडलीय दशाओं—विशेषकर तापमान, वर्षा के वितरण, वायुदाब पेटियों एवं प्रचलित पवनों की दीर्घकालिक प्रकृति में व्यापक समरूपता पाई जाती है। यह जलवायुगत समानता वहाँ की प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जंतुओं के अनुकूलन तथा मानव समाज के कृषि व आर्थिक जीवन को प्रत्यक्ष रूप से निर्धारित करती है। मौसम किसी स्थान की अल्पकालिक वायुमंडलीय अवस्था को दर्शाता है, जबकि किसी विस्तृत क्षेत्र के कम से कम 30 से 35 वर्षों के मौसम की औसत एवं समग्र दशा को "जलवायु" कहा जाता है। वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कारकों में अक्षांश, सूर्य की किरणों का आपतन कोण, समुद्र तल से ऊँचाई (सामान्य ताप ह्रास दर), समुद्र से दूरी (महाद्वीपीयता), वायुदाब पेटियाँ, समुद्र धाराएँ एवं पर्वत शृंखलाएँ शामिल हैं। इस अध्याय में 5 सुव्यवस्थित शैक्षणिक मॉड्यूल के माध्यम से विश्व के 4 प्रमुख जलवायु प्रदेशों का गहन विश्लेषण किया गया है: (1) जलवायु प्रदेश की संकल्पना एवं वैश्विक जलवायु नियंत्रक; (2) विषुवतीय जलवायु प्रदेश: सदाबहार ग्रीष्मकाल एवं सेल्वा वर्षावन; (3) मानसूनी जलवायु प्रदेश: मौसमी पवन प्रत्यावर्तन एवं चावल सभ्यता; (4) भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश: शुष्क ग्रीष्म, शीतकालीन वर्षा एवं विश्व का फलोद्यान; तथा (5) टुंड्रा जलवायु प्रदेश, ध्रुवीय चरम मौसम एवं जलवायु परिवर्तन। इसमें 25 शिक्षण अनुभाग, उत्तरदायी वेक्टर SVG संकल्पना मानचित्र, 8 वैज्ञानिक भौगोलिक सूत्र एवं सूचकांक, 8 विश्लेषणात्मक हल किए गए उदाहरण, 7 परीक्षक जाल व सामान्य भ्रांतियाँ, 8 मुख्य सारांश बिंदु, 8 टेकअवे, 5 स्व-मूल्यांकन प्रश्न तथा 5 CBT बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) सम्मिलित हैं।

☀️ वर्षावनों से बर्फीले टुंड्रा तक: पृथ्वी के महान जलवायु प्रदेशों की यात्रा!

क्या आप जानते हैं कि जब भारत में किसान जून-जुलाई की भीषण गर्मी के बाद मानसूनी बादलों से खेतों में धान रोपने का उत्सव मनाते हैं, तब भूमध्य सागर के तट पर यूरोप के किसान पूरी तरह सूखे और धूपदार ग्रीष्मकाल का आनंद ले रहे होते हैं और उनकी लगभग सारी वर्षा कड़ाके की सर्दियों में होती है?

या यह कि अमेज़न के घने वर्षावनों में रोज़ सुबह की तेज़ धूप के बाद घड़ी की सुइयों की तरह शाम 4 बजे अचानक आसमान में काले कपासी-वर्षी बादल छा जाते हैं और भयंकर गर्जन के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है, जिसे दुनिया भर में "4 बजे की वर्षा" (4 O'Clock Rain) कहा जाता है?

अमेज़न के अंधकारमय सेल्वा वनों से लेकर सुमेरु के उस बर्फीले छोर तक जहाँ मध्यरात्रि का सूर्य महीनों तक कभी नहीं डूबता—आइए, शुरू करते हैं पृथ्वी के अद्भुत जलवायु प्रदेशों की एक रोमांचक भौगोलिक यात्रा!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) द्वारा कक्षा 8 भूगोल की आधिकारिक पाठ्यपुस्तक "हमारी पृथ्वी" (আমাদের পৃথিবী) के अध्याय 6 "जलवायु प्रदेश" (Climatic Regions / জলবায়ু অঞ্চল) के प्रामाणिक अध्ययन मार्गदर्शक में आपका स्वागत है। भौतिक भूगोल में "जलवायु प्रदेश" से तात्पर्य पृथ्वी के धरातल पर स्थित उस विशाल भूभाग से है, जहाँ वायुमंडलीय दशाओं—विशेषकर तापमान, वर्षा के वितरण, वायुदाब पेटियों एवं प्रचलित पवनों की दीर्घकालिक प्रकृति में व्यापक समरूपता पाई जाती है। यह जलवायुगत समानता वहाँ की प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जंतुओं के अनुकूलन तथा मानव समाज के कृषि व आर्थिक जीवन को प्रत्यक्ष रूप से निर्धारित करती है। मौसम किसी स्थान की अल्पकालिक वायुमंडलीय अवस्था को दर्शाता है, जबकि किसी विस्तृत क्षेत्र के कम से कम 30 से 35 वर्षों के मौसम की औसत एवं समग्र दशा को "जलवायु" कहा जाता है। वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कारकों में अक्षांश, सूर्य की किरणों का आपतन कोण, समुद्र तल से ऊँचाई (सामान्य ताप ह्रास दर), समुद्र से दूरी (महाद्वीपीयता), वायुदाब पेटियाँ, समुद्र धाराएँ एवं पर्वत शृंखलाएँ शामिल हैं। इस अध्याय में 5 सुव्यवस्थित शैक्षणिक मॉड्यूल के माध्यम से विश्व के 4 प्रमुख जलवायु प्रदेशों का गहन विश्लेषण किया गया है: (1) जलवायु प्रदेश की संकल्पना एवं वैश्विक जलवायु नियंत्रक; (2) विषुवतीय जलवायु प्रदेश: सदाबहार ग्रीष्मकाल एवं सेल्वा वर्षावन; (3) मानसूनी जलवायु प्रदेश: मौसमी पवन प्रत्यावर्तन एवं चावल सभ्यता; (4) भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश: शुष्क ग्रीष्म, शीतकालीन वर्षा एवं विश्व का फलोद्यान; तथा (5) टुंड्रा जलवायु प्रदेश, ध्रुवीय चरम मौसम एवं जलवायु परिवर्तन। इसमें 25 शिक्षण अनुभाग, उत्तरदायी वेक्टर SVG संकल्पना मानचित्र, 8 वैज्ञानिक भौगोलिक सूत्र एवं सूचकांक, 8 विश्लेषणात्मक हल किए गए उदाहरण, 7 परीक्षक जाल व सामान्य भ्रांतियाँ, 8 मुख्य सारांश बिंदु, 8 टेकअवे, 5 स्व-मूल्यांकन प्रश्न तथा 5 CBT बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) सम्मिलित हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • मौसम (अल्पकालिक अवस्था) तथा जलवायु (30-35 वर्षों की औसत दशा) के बीच का मूलभूत अंतर।
  • पृथ्वी की घूर्णन एवं परिक्रमण गति, अक्षीय झुकाव (66.5°) तथा ऋतु परिवर्तन की बुनियादी समझ।
  • पृथ्वी के प्रमुख ताप कटिबंध: उष्ण कटिबंध (0°–23.5°), शीतोष्ण कटिबंध (23.5°–66.5°) एवं शीत कटिबंध (66.5°–90°)।
  • प्रचलित पवनों (व्यापारिक, पछुआ, ध्रुवीय) तथा वायुदाब पेटियों की आधारभूत जानकारी।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • जलवायु प्रदेश की सटीक भौगोलिक परिभाषा तथा जलवायु के प्रमुख नियंत्रकों (अक्षांश, ऊँचाई, महाद्वीपीयता, पवन, धाराएँ) के वैज्ञानिक कारणों को समझना।
  • विषुवतीय जलवायु प्रदेश की स्थिति, संवहनीय वर्षा ("4 बजे की वर्षा"), बहुस्तरीय सेल्वा वर्षावन तथा जनजातीय जीवन का विश्लेषण करना।
  • मानसूनी पवनों की उत्पत्ति (स्थल-जल का असमान तापन), चार प्रमुख ऋतुओं, पर्णपाती वन तथा "चावल सभ्यता" पर मानसून के प्रभाव का मूल्यांकन करना।
  • भूमध्यसागरीय जलवायु के अद्वितीय विरोधाभास (शुष्क ग्रीष्मकाल व शीतकालीन वर्षा), कठोरपर्णी वनस्पति तथा "विश्व के फलोद्यान" के आर्थिक महत्त्व को स्पष्ट करना।
  • टुंड्रा प्रदेश की स्थिति, भीषण शीतकाल, पर्माफ्रॉस्ट, मध्यरात्रि के सूर्य, इनुइट/एस्किमो के पारंपरिक जीवन व आधुनिक बदलावों का वर्णन करना।
  • सामान्य ताप ह्रास दर (6.5°C/किमी), सूर्य के आपतन कोण तथा महाद्वीपीयता से संबंधित भौगोलिक गणनाओं को हल करना।
  • भूमंडलीय तापन, सुमेरु के पर्माफ्रॉस्ट पिघलने तथा जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न पारिस्थितिक संकट की समीक्षा करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. जलवायु प्रदेश की संकल्पना एवं वै...
2 2. विषुवतीय जलवायु प्रदेश: सदाबहार...
3 3. मानसूनी जलवायु प्रदेश: मौसमी पवन...
4 4. भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश: शुष्...
5 5. टुंड्रा जलवायु प्रदेश, ध्रुवीय च...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. जलवायु प्रदेश की संकल्पना एवं वैश्विक जलवायु नियंत्रक

1.1 जलवायु प्रदेश की संकल्पना एवं परिभाषा

भौगोलिक दृष्टिकोण से जलवायु प्रदेश (Climatic Region) पृथ्वी के धरातल का वह विस्तृत क्षेत्र है जहाँ वायुमंडल के मुख्य घटक—विशेषकर तापमान, वर्षा का वार्षिक वितरण, वायुदाब तथा पवन संचार प्रणाली व्यापक रूप से एकसमान और समरूप होते हैं। यह अंतर्निहित समरूपता उस प्रदेश की मृदा निर्माण, प्राकृतिक वनस्पति, वन्यजीवों तथा मानवीय आर्थिक क्रियाकलापों को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।

जलवायु के अध्ययन में मौसम एवं जलवायु के अंतर को स्पष्ट रूप से समझना अनिवार्य है:

  • मौसम (Weather): किसी निश्चित स्थान एवं निश्चित समय पर वायुमंडल की अल्पकालिक अथवा क्षणिक दशा (जैसे—तापमान, आर्द्रता, बादल, वर्षा एवं पवन की गति)। मौसम दिन-प्रतिदिन अथवा घंटे-घंटे में बदल सकता है।
  • जलवायु (Climate): किसी विस्तृत भूभाग के कम से कम 30 से 35 वर्षों के मौसम के आँकड़ों का सांख्यिकीय औसत एवं समग्र प्रतिरूप उस क्षेत्र की "जलवायु" कहलाता है।

1.2 अक्षांश एवं सूर्य की किरणों का आपतन कोण

पृथ्वी का आकार भुआभ (Geoid) होने तथा इसका अक्ष अपनी कक्षा से $66.5^\circ$ के कोण पर झुके होने के कारण विभिन्न अक्षांशों पर सूर्य की किरणें अलग-अलग कोण पर पड़ती हैं। यह पृथ्वी पर ताप वितरण का सबसे प्रधान नियंत्रक है:

  • लंबवत किरणें (विषुवतीय क्षेत्र): भूमध्य रेखा ($0^\circ$) के निकट सूर्य की किरणें वर्ष भर लगभग लंबवत पड़ती हैं। लंबवत किरणें कम क्षेत्रफल पर केंद्रित होती हैं तथा वायुमंडल की कम दूरी तय करती हैं, जिससे ताप का अवशोषण व प्रकीर्णन न्यूनतम होता है और अत्यधिक गर्मी रहती है।
  • तिरछी किरणें (ध्रुवीय क्षेत्र): ध्रुवों की ओर किरणों का आपतन कोण अत्यंत कम (तिरछा) हो जाता है। तिरछी किरणों को वायुमंडल की एक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है तथा उनका प्रकाश बहुत बड़े भूभाग पर फैल जाता है, जिससे वहाँ भीषण शीत ऋतु पाई जाती है।
ताप कटिबंध (Thermal Zone) अक्षांशीय विस्तार सूर्य की किरणों का कोण जलवायु की विशेषताएँ
उष्ण कटिबंध (Torrid Zone) $23.5^\circ$ उत्तर (कर्क रेखा) से $23.5^\circ$ दक्षिण (मकर रेखा) वर्ष भर लगभग लंबवत या अति उच्च कोण वर्ष भर तीव्र गर्मी; वास्तविक शीत ऋतु का अभाव।
शीतोष्ण कटिबंध (Temperate Zone) $23.5^\circ$ से $66.5^\circ$ उत्तर एवं दक्षिण मध्यम तिरछी किरणें; ऋतुओं के अनुसार अत्यधिक परिवर्तन ग्रीष्म में सुखद गर्मी, शीत में मध्यम ठंड; स्पष्ट चार ऋतुएँ।
शीत कटिबंध (Frigid Zone) $66.5^\circ$ से $90^\circ$ उत्तर एवं दक्षिण (ध्रुव) अत्यंत तिरछी या कई महीनों तक सूर्य क्षितिज से नीचे स्थायी हिमाच्छादन, भीषण शीतकाल तथा लंबी ध्रुवीय रातें।

1.3 ऊँचाई एवं सामान्य ताप ह्रास दर

जैसे-जैसे हम समुद्र तल से वायुमंडल में ऊपर चढ़ते हैं, तापमान में निरंतर गिरावट आती है। इसे सामान्य ताप ह्रास दर (Normal Environmental Lapse Rate) कहा जाता है:

सामान्य ताप ह्रास दर: क्षोभमंडल (Troposphere) में प्रति 1,000 मीटर (या 1 किमी) की ऊँचाई पर तापमान में लगभग $6.5^\circ\text{C}$ की कमी आती है (अर्थात् प्रति 165 मीटर पर $1^\circ\text{C}$)।

इसका भौतिक कारण यह है कि वायुमंडल आने वाली सौर लघुतरंगों से सीधे गर्म नहीं होता, बल्कि धरातल द्वारा अवशोषित ऊष्मा जब दीर्घतरंग पार्थिव विकिरण के रूप में विकरित होती है, तब वायुमंडल नीचे से ऊपर की ओर गर्म होता है। साथ ही, अधिक ऊँचाई पर वायु अत्यंत विरल (कम सघन) होती है, जिसमें जलवाष्प और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम होने से ऊष्मा को रोक रखने की क्षमता घट जाती है। इसी कारण भूमध्य रेखा पर स्थित होने के बावजूद तंज़ानिया की माउंट किलिमंजारो (5,895 मी) चोटी वर्ष भर हिमाच्छादित रहती है।

1.4 समुद्र से दूरी: समकारी बनाम विषम (महाद्वीपीय) जलवायु

जल की विशिष्ट ऊष्माधारिता थल की तुलना में लगभग 2.5 से 3 गुना अधिक होती है। अतः जल धीरे-धीरे गर्म होता है और धीरे-धीरे ठंडा होता है, जबकि थल बहुत तेजी से गर्म और ठंडा होता है। इसके फलस्वरूप दो प्रकार की जलवायु बनती है:

  • समकारी अथवा समुद्री जलवायु (Equable Maritime Climate): समुद्र तटीय क्षेत्रों (जैसे—मुंबई, कोलकाता, चेन्नई) पर सागरीय समीर व स्थलीय समीर का निरंतर प्रभाव रहता है। यहाँ ग्रीष्मकाल बहुत गर्म नहीं होता और शीतकाल में कड़ाके की ठंड नहीं पड़ती; वार्षिक तापांतर न्यूनतम रहता है।
  • विषम अथवा महाद्वीपीय जलवायु (Continental Extreme Climate): समुद्र से दूर महाद्वीपों के आंतरिक भागों (जैसे—दिल्ली, नागपुर, मध्य एशिया, साइबेरिया) में गर्मी में भयंकर लू व तापमान $45^\circ\text{C}$ पार कर जाता है, जबकि शीतकाल में तापमान जमाव बिंदु के करीब पहुँच जाता है। यहाँ दैनिक व वार्षिक तापांतर अत्यधिक उच्च होता है।

1.5 वायुदाब पेटियाँ, समुद्री धाराएँ एवं पर्वतीय ढाल

  • वायुदाब पेटियों का खिसकाव: सूर्य के उत्तरायण व दक्षिणायन के साथ वैश्विक वायुदाब पेटियाँ $5^\circ-10^\circ$ उत्तर व दक्षिण खिसकती हैं, जो भूमध्यसागरीय एवं मानसूनी जलवायु में वर्षा का प्रमुख कारण बनती हैं।
  • समुद्री धाराएँ: गर्म जलधाराएँ (जैसे—गल्फ स्ट्रीम) तटीय भागों का तापमान बढ़ाकर भारी वर्षा लाती हैं, जबकि ठंडी धाराएँ (जैसे—कैलिफोर्निया, बेंगूएला, पेरू धारा) तटीय वायु को शुष्क कर मरुस्थलों के निर्माण में सहायक होती हैं।
  • पर्वतों की स्थिति (पवनमुखी व पवनविमुखी ढाल): जब जलवाष्पयुक्त पवन किसी ऊँचे पर्वत से टकराकर ऊपर उठती है, तो वह ठंडी होकर पवनमुखी ढाल (Windward Slope) पर मूसलाधार पर्वतीय वर्षा करती है (जैसे—मौसिनराम)। पर्वत के दूसरी ओर उतरते समय पवन शुष्क व गर्म हो जाती है, जिससे पवनविमुखी ढाल (Leeward Slope) पर वर्षा नहीं होती और वह वृष्टि छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) बन जाता है (जैसे—शिलांग व पश्चिमी घाट का पूर्वी ढाल)।

2. विषुवतीय जलवायु प्रदेश: सदाबहार ग्रीष्मकाल एवं सेल्वा वर्षावन

2.1 भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार

भूमध्य रेखा के दोनों ओर $0^\circ$ से $10^\circ$ उत्तर एवं दक्षिण अक्षांशों के बीच फैले कटिबंध को विषुवतीय अथवा भूमध्यरेखीय जलवायु प्रदेश (Equatorial Climatic Region) कहते हैं। इसके प्रमुख क्षेत्र हैं:

  • दक्षिण अमेरिका: विशाल अमेज़न नदी बेसिन (ब्राज़ील, पेरू, कोलंबिया), जिसे अमेज़ोनिया अथवा सेल्वा कहा जाता है।
  • अफ्रीका: कांगो (ज़ायरे) नदी बेसिन तथा गिनी की खाड़ी के तटीय देश (गैबॉन, कैमरून, नाइजीरिया)।
  • दक्षिण-पूर्व एशिया: इंडोनेशिया (सुमात्रा, जावा, बोर्नियो), मलेशिया, दक्षिणी फिलीपींस तथा पापुआ न्यू गिनी के द्वीप समूह।

2.2 जलवायु की विशेषताएँ: बारहमासी ग्रीष्मकाल व न्यूनतम तापांतर

  • निरंतर उच्च तापमान: सूर्य की किरणें वर्ष भर लंबवत पड़ने से औसत वार्षिक तापमान सदैव $25^\circ\text{C}$ से $30^\circ\text{C}$ बना रहता है। यहाँ वास्तविक शीत ऋतु का पूर्ण अभाव होता है।
  • न्यूनतम वार्षिक तापांतर: सबसे गर्म महीने और सबसे ठंडे महीने के तापमान में मात्र $1^\circ\text{C} - 3^\circ\text{C}$ का अंतर होता है, जो पूरी पृथ्वी पर सबसे कम है।
  • "उष्णकटिबंध में रात ही शीतकाल है": दिन और रात के तापमान का अंतर ($5^\circ-8^\circ\text{C}$) विभिन्न महीनों के मौसमी अंतर से अधिक होता है, जिसके कारण भूगोलवेत्ता कहते हैं—"Night is the winter of the tropics"।
  • अत्यधिक आर्द्रता: हवा में सापेक्षिक आर्द्रता सदैव $80\% - 90\%$ से ऊपर रहती है, जिससे वातावरण अत्यधिक उमस भरा व चिपचिपा रहता है।

2.3 संवहनीय वर्षा एवं "4 बजे की वर्षा" (4 O'Clock Rain)

विषुवतीय क्षेत्र में वार्षिक वर्षा का औसत 200 से 300 सेंटीमीटर होता है, जो वर्ष के बारहों महीने नियमित रूप से होती है। यहाँ प्रतिदिन मौसम का एक निश्चित चक्र चलता है:

संवहनीय वर्षा की दैनिक प्रक्रिया:
1. प्रातःकाल: साफ आसमान और तेज़ धूप। भूमि व सघन वनस्पति से तीव्र गति से वाष्पीकरण व वाष्पोत्सर्जन होता है।
2. दोपहर: गर्म व आर्द्र वायु हल्की होकर सीधे ऊर्ध्वाधर संवहन धाराओं (Convection Currents) के रूप में आकाश में ऊपर उठने लगती है।
3. मेघ निर्माण: ऊपर उठकर वायु रुद्धोष्म रूप से फैलती व ठंडी होती है, जिससे दोपहर 1 से 2 बजे तक विशाल कपासी-वर्षी बादल (Cumulonimbus Clouds) आकाश में छा जाते हैं।
4. अपराह्न वर्षा ("4 बजे की वर्षा"): शाम 3:30 से 4:30 के बीच अचानक मूसलाधार बारिश, भयंकर बिजली की कड़क और बादलों की गर्जना शुरू हो जाती है। इसे स्थानीय भाषा में 4 बजे की वर्षा (4 O'Clock Rain) कहते हैं।
5. रात्रि: वर्षा के बाद बादल छँट जाते हैं और रात शांत, शीतल व तारों भरी होती है।

2.4 उष्णकटिबंधीय सदाबहार सेल्वा वर्षावन

अत्यधिक गर्मी और दैनिक वर्षा के संयोग से यहाँ पृथ्वी का सबसे सघन, विशाल और जैव-विविधता संपन्न वनस्पति तंत्र विकसित हुआ है, जिसे अमेज़न में सेल्वा (Selva) कहते हैं। इसकी मुख्य विशेषताएँ:

  • बहुस्तरीय छत्र (Multi-Tiered Canopy): वृक्ष अलग-अलग ऊँचाइयों पर परतों में बँटे होते हैं। 30 से 50 मीटर ऊँचे पेड़ों की सघन शाखाएँ व चौड़ी पत्तियाँ मिलकर आकाश में एक छतरी जैसा वितान (Canopy) बना लेती हैं, जिससे सूर्य का प्रकाश धरातल तक नहीं पहुँच पाता और वन का तल सदैव अंधकारमय व दलदली रहता है।
  • सदाबहार कठोर लकड़ी के वृक्ष: सभी पेड़ों की पत्तियाँ एक साथ नहीं गिरतीं, अतः वन वर्ष भर हरा-भरा रहता है। प्रमुख वृक्षों में महोगनी (Mahogany), आबनूस (Ebony), रोजवुड (Rosewood), रबर तथा आयरनवुड शामिल हैं।
  • लियाना व अधिपादप (Lianas & Epiphytes): प्रकाश की खोज में मोटी-मोटी लकड़ी की लताएँ (Lianas) पेड़ों के तनों पर लिपटकर वितान तक पहुँचती हैं। पेड़ों की डालियों पर बिना मिट्टी के ऑर्किड और फ़र्न उगते हैं।
  • बट्रेस जड़ें (Buttress Roots): दलदली मिट्टी में विशालकाय वृक्षों को सहारा देने के लिए तने के आधार से त्रिकोणीय तख्तों जैसी मोटी जड़ें धरातल पर कई मीटर तक फैली रहती हैं।

2.5 वन्यजीव, जनजातियाँ एवं आधुनिक संकट

वन्यजीव: घने अंधकारमय तल के कारण धरातल पर चरने वाले बड़े चौपाए दुर्लभ हैं; अधिकांश जीव वृक्षवासी (Arboreal) हैं जिनकी पूँछ व पंजे पकड़ बनाने योग्य होते हैं—जैसे मकड़ी बंदर, स्लॉथ, टूकेन पक्षी, चमगादड़ और जगुआर। अमेज़न नदी में विशाल एनाकोंडा साँप और इलेक्ट्रिक ईल पाई जाती है, जबकि अफ्रीका में हानिकारक त्से-त्से मक्खी (Tsetse Fly) पाई जाती है जिससे निद्रा रोग (Sleeping Sickness) होता है।

जनजीवन: कांगो बेसिन के छोटे कद के पिग्मी (Pygmy) तथा अमेज़न के यानोमामी व अमेरिंडियन आखेट, मछली पकड़ने तथा कंद-मूल संग्रह पर जीवन यापन करते हैं।

पर्यावरण संकट: अमेज़न वर्षावनों को विश्व का "पृथ्वी का फेफड़ा" (Lungs of the Earth) कहा जाता है क्योंकि यह भारी मात्रा में ऑक्सीजन उत्पन्न कर कार्बन डाइऑक्साइड को सोखता है। किंतु सोयाबीन की खेती, मवेशियों के चरागाह तथा राजमार्ग निर्माण के लिए वनों की कटाई से वैश्विक जलवायु संतुलन संकट में पड़ गया है।

3. मानसूनी जलवायु प्रदेश: मौसमी पवन प्रत्यावर्तन एवं चावल सभ्यता

3.1 भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार

दोनों गोलार्धों में $10^\circ$ से $30^\circ$ उत्तर एवं दक्षिण अक्षांशों के बीच महाद्वीपों के दक्षिणी व पूर्वी किनारों पर मानसूनी जलवायु प्रदेश (Monsoon Climatic Region) पाया जाता है। इसका सबसे आदर्श स्वरूप दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में है:

  • दक्षिण एशिया: भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान तथा श्रीलंका।
  • दक्षिण-पूर्व एशिया: म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम तथा दक्षिणी चीन।
  • अन्य क्षेत्र: उत्तरी ऑस्ट्रेलिया (डार्विन), पूर्वी अफ्रीका का तटीय भाग तथा मध्य अमेरिका।

3.2 मानसूनी पवनों की उत्पत्ति एवं कार्यप्रणाली

मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के शब्द "मौसम" (Mawsim) से हुई है, जिसका अर्थ ऋतु होता है। ऋतु परिवर्तन के साथ जो पवनें 180° के कोण पर अपनी दिशा पूर्णतः उलट लेती हैं, उन्हें मानसूनी पवनें कहते हैं:

मानसून की उत्पत्ति के प्रमुख कारक:
1. स्थल एवं जल का असमान तापन: ग्रीष्मकाल (मई-जून) में तिब्बत का पठार तथा थार मरुस्थल अत्यधिक गर्म होकर एक प्रचंड तापजन्य निम्न वायुदाब (Thermal Low) केंद्र बनाते हैं। इसके विपरीत दक्षिण में हिंद महासागर तुलनात्मक रूप से ठंडा होने से उच्च वायुदाब बना रहता है।
2. दक्षिण-पश्चिम मानसून: सागर के उच्चदाब से जलवाष्प से भरी पवनें थल के निम्नदाब की ओर आकर्षित होती हैं। भूमध्य रेखा पार करने के बाद फेरेल के नियमानुसार दाहिनी ओर मुड़कर ये दक्षिण-पश्चिम मानसून के रूप में भारत में प्रवेश करती हैं और मूसलाधार वर्षा करती हैं।
3. शीतकालीन प्रत्यावर्तन: शीतकाल (दिसंबर-जनवरी) में स्थल भाग तेजी से ठंडा होकर उच्च वायुदाब का केंद्र बन जाता है, जबकि हिंद महासागर गर्म रहता है। अतः शुष्क व ठंडी पवनें थल से जल की ओर उत्तर-पूर्व मानसून के रूप में बहने लगती हैं।

3.3 चार स्पष्ट ऋतु चक्र

मानसूनी प्रदेश अपनी विशिष्ट चार ऋतुओं के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध है:

  1. उष्ण व शुष्क ग्रीष्म ऋतु (मार्च से मई):
    • सूर्य के उत्तरायण होने से उत्तरी भारत के मैदानों में तापमान $40^\circ\text{C}-48^\circ\text{C}$ तक पहुँच जाता है।
    • उत्तर-पश्चिम भारत में चलने वाली अत्यंत गर्म व शुष्क धूल भरी पवनों को लू (Loo) कहा जाता है।
    • अपराह्न में स्थानीय गरज-चमक के साथ भीषण तूफान आते हैं, जिन्हें बंगाल में कालवैशाखी (Nor'wester), असम में बारदोईछिला तथा दक्षिण भारत में आम्रवृष्टि (Mango Showers) कहते हैं।
  2. आर्द्र वर्षा ऋतु (जून से सितंबर):
    • जून के प्रथम सप्ताह में दक्षिण-पश्चिम मानसून के अचानक आगमन को मानसून का प्रस्फोट (Burst of Monsoon) कहते हैं।
    • यह पवन दो शाखाओं में बँट जाती है—अरब सागर शाखा (जो पश्चिमी घाट पर भारी पर्वतीय वर्षा करती है) तथा बंगाल की खाड़ी शाखा (जो मौसिनराम में विश्व की सर्वाधिक वर्षा करती हुई गंगा मैदान में आगे बढ़ती है)।
    • साल की कुल वर्षा का $75\% - 85\%$ इसी वर्षा ऋतु में प्राप्त होता है।
  3. शरद ऋतु अथवा मानसून प्रत्यावर्तन काल (अक्टूबर से नवंबर):
    • सूर्य के दक्षिणायन होने से उत्तरी भारत का निम्नदाब कमजोर पड़ जाता है और मानसूनी हवाएँ लौटने लगती हैं।
    • साफ आकाश और गीली मिट्टी के कारण दिन में उमस भरी असहनीय गर्मी महसूस होती है, जिसे "अक्टूबर की गर्मी" (October Heat) कहते हैं।
    • बंगाल की खाड़ी में उठने वाले विनाशकारी चक्रवातों से तटीय ओडिशा, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर भारी वर्षा होती है।
  4. शीतल व शुष्क शीत ऋतु (दिसंबर से फरवरी):
    • उत्तर-पूर्व मानसूनी पवनों के कारण सुहावना व शुष्क मौसम रहता है। तापमान $10^\circ-18^\circ\text{C}$ के बीच रहता है।
    • भूमध्य सागर से आने वाले शीतोष्ण चक्रवातों के कारण उत्तर-पश्चिम भारत में हल्की वर्षा होती है, जिसे पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) कहते हैं। यह रबी की फसल (गेहूँ) के लिए वरदान साबित होती है।

3.4 उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (Monsoon Deciduous Forest)

शुष्क मौसम में वाष्पोत्सर्जन को रोकने और जल संरक्षित करने के लिए यहाँ के वृक्ष शीतकाल के अंत में (फरवरी-मार्च) अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। अतः इन्हें पर्णपाती अथवा मानसूनी वन कहते हैं:

  • मूल्यवान इमारती लकड़ी: प्रमुख वृक्षों में साल (Sal), सागौन (Teak), महुआ, शीशम, चंदन, पलाश तथा बाँस प्रमुख हैं। सागौन की लकड़ी दीमक-रोधी व जल-प्रतिरोधी होने के कारण फर्नीचर और जहाज निर्माण के लिए विश्वविख्यात है।
  • ये वन सेल्वा की भाँति अत्यंत दुर्गम नहीं होते, अतः प्रकाश धरातल तक पहुँचने से यहाँ घास व झाड़ियाँ उगती हैं, जो वन्यजीवों (बाघ, हाथी, हिरण) के लिए आदर्श आवास हैं।

3.5 कृषि एवं "चावल सभ्यता"

मानसूनी प्रदेश की अर्थव्यवस्था मूलतः कृषि प्रधान है। पर्याप्त वर्षा और उपजाऊ जलोढ़ मैदानों के कारण यहाँ सघन धान, पटसन, गन्ना और चाय की खेती होती है। चावल मुख्य आहार होने के कारण इसे "चावल सभ्यता" (Rice Civilisation) कहा जाता है। भारतीय कृषि को "मानसून का जुआ" (Gamble on Monsoons) कहा जाता है—क्योंकि समय पर अच्छी वर्षा से समृद्धि आती है, जबकि अनियमितता से भीषण सूखा अथवा प्रलयंकारी बाढ़ का सामना करना पड़ता है।

4. भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश: शुष्क ग्रीष्म, शीतकालीन वर्षा एवं विश्व का फलोद्यान

4.1 भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार

दोनों गोलार्धों में $30^\circ$ से $45^\circ$ उत्तर एवं दक्षिण अक्षांशों के बीच महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर यह अद्वितीय जलवायु प्रदेश विकसित हुआ है। विश्व में इसके पाँच प्रमुख क्षेत्र हैं:

  • भूमध्यसागरीय बेसिन: दक्षिणी यूरोप (इटली, स्पेन, पुर्तगाल, यूनान, दक्षिणी फ्रांस), उत्तरी अफ्रीका (मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया) तथा पश्चिमी एशिया (तुर्की, लेबनान, इज़राइल)। यह इस जलवायु का सबसे बड़ा क्षेत्र है।
  • उत्तरी अमेरिका: संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया का तटीय व मध्य भाग (लॉस एंजिल्स, सैन फ्रांसिस्को)।
  • दक्षिण अमेरिका: मध्य चिली की घाटी (सैंटियागो)।
  • दक्षिण अफ्रीका: महाद्वीप का दक्षिण-पश्चिमी कोना (केप टाउन)।
  • ऑस्ट्रेलिया: दक्षिणी एवं दक्षिण-पश्चिमी भाग (पर्थ एवं एडिलेड)।

4.2 अनोखा विरोधाभास: शुष्क ग्रीष्मकाल एवं शीतकालीन वर्षा

सामान्यतः विश्व के अधिकांश भागों में ग्रीष्मकाल में वर्षा होती है, परंतु भूमध्यसागरीय जलवायु का सबसे अनोखा लक्षण है—ग्रीष्मकाल पूरी तरह सूखा व वर्षाविहीन रहता है और लगभग सारी वर्षा शीतकाल में होती है। इसका मूल कारण वायुदाब पेटियों का मौसमी खिसकाव है:

ऋतु वायुदाब पेटी की स्थिति प्रचलित पवनें मौसम एवं वर्षा का स्वरूप
ग्रीष्म ऋतु (Summer) उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी ध्रुवों की ओर ($30^\circ-40^\circ\text{ अक्षांश}$) खिसक जाती है स्थल से समुद्र की ओर बहने वाली शुष्क व्यापारिक पवनें पूर्णतः शुष्क व चमकदार धूप: नीचे उतरती शुष्क हवा बादल नहीं बनने देती; आकाश पूर्णतः नीला, साफ व वर्षाविहीन रहता है ($21^\circ-27^\circ\text{C}$)।
शीत ऋतु (Winter) वायुदाब पेटियाँ भूमध्य रेखा की ओर दक्षिण में खिसक आती हैं समुद्र से स्थल की ओर बहने वाली आर्द्र पछुआ पवनें (Westerlies) मृदु ठंड एवं वर्षा: सागर से आने वाली नमी युक्त पछुआ पवनें तथा शीतोष्ण चक्रवात मध्यम से भारी वर्षा (40–80 सेमी) करते हैं; तापमान $5^\circ-10^\circ\text{C}$ रहता है।

4.3 कठोरपर्णी वनस्पति अनुकूलन (मैक्विस एवं गैरिग)

ग्रीष्म ऋतु के लंबे सूखे और तीव्र वाष्पीकरण से बचने के लिए यहाँ की वनस्पतियों ने विशेष मरुद्भिद अनुकूलन विकसित किए हैं। इन्हें कठोरपर्णी अथवा दृढ़पर्णी वनस्पति (Sclerophyllous Vegetation) कहते हैं:

  • मोमी व मोटी पत्तियाँ: पत्तियाँ छोटी, चमड़े जैसी मोटी और चमकदार मोम की परत से ढकी होती हैं, जो सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर नमी के क्षय को रोकती हैं।
  • मोटी कॉर्क छाल: तनों पर स्पंज जैसी मोटी छाल होती है (जैसे स्पेन व पुर्तगाल का कॉर्क ओक / Cork Oak, जिससे बोतलों के ढक्कन बनते हैं), जो तने को सूखने से बचाती है।
  • गहरी जड़ें: भूमिगत जल प्राप्त करने के लिए जड़ें बहुत गहराई तक जाती हैं।
  • मैक्विस एवं गैरिग (Maquis & Garrigue): वनों के कटने से उत्पन्न सदाबहार सुगंधित झाड़ियाँ; प्रमुख पौधों में जैतून (Olive), लॉरेल, मर्टल, यूकेलिप्टस, साइप्रस, रोज़मेरी व लैवेंडर शामिल हैं।

4.4 "विश्व का फलोद्यान" एवं अंगूर की खेती (Viticulture)

ग्रीष्मकाल की लंबी चमकदार धूप तथा शीतकाल की मृदु वर्षा रसदार फलों के लिए सर्वोत्तम है। इसलिए इस क्षेत्र को "विश्व का फलोद्यान" (Orchard of the World) कहा जाता है:

  • खट्टे व रसदार फल: संतरा, नींबू, मौसमी, जैतून, अंजीर, बादाम, खुबानी व आड़ू का बड़े पैमाने पर व्यापारिक उत्पादन होता है।
  • जैतून का तेल: विश्व के कुल जैतून के तेल (Olive Oil) का 85% भूमध्यसागरीय बेसिन में उत्पादित होता है।
  • अंगूर की खेती व मदिरा उद्योग: धूप की प्रचुरता से अंगूर मीठे और उत्तम बनते हैं। इसके आधार पर यहाँ विश्व का सबसे विकसित शराब उद्योग स्थापित हुआ है (फ्रांस की बोर्डो व शैम्पेन, इटली की चियान्टी तथा कैलिफ़ोर्निया की नापा वैली)।

4.5 पर्यटन एवं हॉलीवुड सिनेमा उद्योग

साल भर खिली धूप, सुखद तापमान और सुंदर रेतीले तटों के कारण यह विश्व का सबसे बड़ा पर्यटन केंद्र बन चुका है (फ्रांस व इटली का रिवेरा तट)। लॉस एंजिल्स के हॉलीवुड में विश्व प्रसिद्ध फिल्म उद्योग के विकसित होने का मुख्य भौगोलिक कारण यहाँ की भूमध्यसागरीय जलवायु थी—जहाँ वर्ष भर खुले नीले आकाश के नीचे बिना किसी वर्षा बाधा के आउटडोर शूटिंग संभव थी।

5. टुंड्रा जलवायु प्रदेश, ध्रुवीय चरम मौसम एवं जलवायु परिवर्तन

5.1 भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार

आर्कटिक वृत्त के उत्तर में $60^\circ$ से $75^\circ$ उत्तर अक्षांशों के बीच आर्कटिक महासागर के तटवर्ती वृक्षविहीन बर्फीले प्रदेश को टुंड्रा जलवायु प्रदेश (Tundra Climatic Region) कहा जाता है:

  • उत्तरी यूरेशिया: नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड का उत्तरी भाग (लैपलैंड) तथा रूस के विशाल साइबेरिया का उत्तरी तटीय भूभाग।
  • उत्तरी अमेरिका: उत्तरी अलास्का (अमेरिका), कनाडा के उत्तरी क्षेत्र (यूकॉन, नुनावुत) तथा डेनमार्क के ग्रीनलैंड का तटीय भाग।
  • दक्षिणी गोलार्ध में अभाव: दक्षिणी गोलार्ध में इस अक्षांश पर कोई विस्तृत स्थलखंड न होने के कारण टुंड्रा का विकास नहीं हुआ है; वहाँ केवल अंटार्कटिका की स्थायी बर्फ की चादर है।

5.2 भीषण शीतकाल, मध्यरात्रि का सूर्य व पुरगा

  • दीर्घ एवं प्रचंड शीत ऋतु: शीतकाल लगभग 8 से 9 महीने तक रहता है। तापमान शून्य से नीचे $-30^\circ\text{C}$ से $-45^\circ\text{C}$ तक गिर जाता है। साइबेरिया के वेरखोयान्स्क में $-68^\circ\text{C}$ तक तापमान दर्ज किया गया है।
  • पुरगा एवं बर्फीले तूफान: शीतकाल में 80-100 किमी/घंटा की गति से बर्फ के कणों वाले बर्फीले अंधड़ चलते हैं, जिन्हें साइबेरिया में पुरगा (Purga) और उत्तरी अमेरिका में ब्लिज़ार्ड (Blizzard) कहते हैं।
  • संक्षिप्त व शीतल ग्रीष्म ऋतु: ग्रीष्मकाल मात्र 2 से 3 महीने (जून-अगस्त) रहता है। सबसे गर्म महीने का औसत तापमान भी $10^\circ\text{C}$ से अधिक नहीं हो पाता।
  • न्यूनतम वर्षा व ध्रुवीय मरुस्थल: अत्यधिक ठंडी हवा में नमी न होने से वार्षिक वर्षा केवल 15 से 30 सेंटीमीटर होती है, जो महीन हिमपात के रूप में गिरती है। अतः इसे शीत ध्रुवीय मरुस्थल कहते हैं।
  • मध्यरात्रि का सूर्य (Midnight Sun): पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के कारण ग्रीष्मकाल में सुमेरु वृत्त के उत्तर में कई हफ्तों तक सूर्य कभी अस्त नहीं होता। नॉर्वे के हैमरफ़ेस्ट (Hammerfest) बंदरगाह को "मध्यरात्रि के सूर्य का देश" कहा जाता है।
  • ध्रुवीय ज्योति (Aurora Borealis): शीतकाल की लंबी अंधेरी रातों में ऊपरी वायुमंडल में आयनों के घर्षण से हरे, बैंगनी व लाल रंगों की नाचती हुई जादुई रोशनी दिखाई देती है, जिसे सुमेरु ज्योति कहते हैं।

5.3 पर्माफ्रॉस्ट एवं वृक्षविहीन टुंड्रा पारिस्थितिकी

टुंड्रा मृदा की प्रधान विशेषता पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost / स्थायी हिमाच्छादित भूमि) है:

पर्माफ्रॉस्ट का स्वरूप: भूमि की निचली परत लगातार दो या अधिक वर्षों तक शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे स्थायी रूप से जमी रहती है। ग्रीष्मकाल में केवल ऊपरी 30 से 60 सेमी बर्फ पिघलती है (सक्रिय परत)। निचली कठोर बर्फ के कारण पानी नीचे नहीं रिस पाता, जिससे धरातल दलदल व उथली झीलों में बदल जाता है।

वृक्षों का अभाव: कड़ाके की ठंड और पर्माफ्रॉस्ट के कारण पेड़ों की जड़ें गहराई में नहीं जा पातीं, अतः टुंड्रा में कोई बड़ा पेड़ नहीं उगता। यहाँ केवल उगते हैं:

  • काई एवं लाइकेन: धरातल पर कालीन की तरह बिछी काई और रेनडियर मॉस (Reindeer Moss / Cladonia rangiferina), जो कैरीबाउ और रेनडियर का मुख्य भोजन है।
  • बौनी झाड़ियाँ: बर्फीली हवाओं से बचने के लिए धरातल से सटी बौनी विलो (Dwarf Willow) व बौनी बर्च, जिनकी ऊँचाई मात्र कुछ सेंटीमीटर होती है।

जीव-जंतु: भीषण ठंड से बचने के लिए जलीय जीवों की त्वचा के नीचे चर्बी की मोटी परत होती है, जिसे ब्लबर (Blubber) कहते हैं (सील, वालरस, व्हेल)। स्थलीय जीवों के शरीर पर सघन बाल होते हैं—जैसे ध्रुवीय भालू, मस्क बैल, कस्तूरी बैल और आर्कटिक लोमड़ी। शीतकाल में इनका रंग बर्फ जैसा सफेद हो जाता है।

5.4 जनजातीय जीवन: इनुइट समाज एवं आधुनिक परिवर्तन

  • इनुइट अथवा एस्किमो (Inuit / Eskimo): उत्तरी अमेरिका व ग्रीनलैंड के मूल निवासी:
    • इग्लू (Igloo): शीतकाल में जमी हुई सख्त बर्फ के टुकड़ों से बना गुंबदाकार अस्थायी घर। अंदर सील की खाल मढ़ी होती है और सील की चर्बी वाले दीपक (कुडलिक) से गर्मी रखी जाती है।
    • टुपिक (Tupiq): ग्रीष्मकाल में सील व कैरीबाउ की खाल से बना तंबू।
    • परिवहन व शिकार: पहिया-रहित स्लेज गाड़ी जिसे हस्की कुत्ते या रेनडियर खींचते हैं। शिकार के लिए सील की खाल से बनी संकरी नाव कयाक (Kayak) तथा व्हेल के शिकार के लिए बड़ी नाव उमियाक। शिकार का प्रमुख हथियार व्हेल की हड्डी से बना हारपून (Harpoon) था।
  • यूरेशिया की जनजातियाँ: स्कैंडिनेविया के रेनडियर पालक लैप (Lapps) तथा साइबेरिया के समोयेद, चुकची व याकूत।
  • आधुनिक परिवर्तन: आज पारंपरिक जीवन बदल चुका है। इनुइट आधुनिक पूर्व-निर्मित गर्म मकानों में रहते हैं, स्लेज के स्थान पर मोटरचालित स्नोमोबाइल (Snowmobile) चलाते हैं, राइफलों से शिकार करते हैं तथा अलास्का के तेल क्षेत्रों (Prudhoe Bay) व साइबेरिया की खदानों में कार्य करते हैं।

5.5 भूमंडलीय तापन एवं पर्माफ्रॉस्ट पिघलने का संकट

जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक औसत से तीन से चार गुना अधिक तेजी से गर्म हो रहा है (Arctic Amplification):

  • मीथेन उत्सर्जन का खतरा: सहस्राब्दियों से जमी पर्माफ्रॉस्ट पिघलने से प्राचीन कार्बनिक पदार्थ सड़ रहे हैं, जिससे वातावरण में अरबों टन खतरनाक ग्रीनहाउस गैस मीथेन ($\text{CH}_4$) मुक्त हो रही है, जो ग्लोबल वॉर्मिंग को और तेज कर रही है।
  • आधारभूत संरचनाओं का धँसना: ठोस ज़मीन के कीचड़ में बदलने से साइबेरिया और अलास्का में सड़कें टूट रही हैं, रेलवे लाइनें मुड़ रही हैं और बहुमंजिला इमारतें व तेल पाइपलाइनें तिरछी होकर धँस रही हैं (थर्मोकार्स्ट विरूपण)।
  • ध्रुवीय भालुओं का संकट: समुद्री बर्फ पिघलने से ध्रुवीय भालुओं के शिकार क्षेत्र नष्ट हो रहे हैं।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

सामान्य ताप ह्रास दर (Normal Environmental Lapse Rate)
T = -6.5^ प्रति 1,000 मीटर ऊँचाई पर
व्याख्या करता है कि भूमध्य रेखा पर स्थित होने पर भी 5,895 मीटर ऊँचे किलिमंजारो पर्वत पर बर्फ क्यों जमी रहती है।
सौर आपतन कोण एवं सौर ऊर्जा घनत्व (Solar Insolation Flux)
I (सूर्य का आपतन कोण )
विषुवत वृत्त पर किरणें लंबवत (90°) पड़ने से तीव्र ताप और ध्रुवों पर तिरछी पड़ने से भीषण शीत की व्याख्या करता है।
दैनिक एवं वार्षिक तापांतर (Range of Temperature)
R_{वार्षिक(विषुवतीय)} ≈ 1^-3^ R_{वार्षिक(टुंड्रा)} ≈ 35^-45^
विषुवतीय प्रदेश में वार्षिक तापांतर पूरी दुनिया में सबसे कम तथा महाद्वीपीय आंतरिक भागों में सबसे अधिक होता है।
डि मार्टोन का शुष्कता सूचकांक (De Martonne Aridity Index)
I > 30 (आर्द्र/विषुवतीय), I < 20 (शुष्क/अर्ध-शुष्क)
भूमध्यसागरीय प्रदेश के ग्रीष्मकालीन सूखे तथा विषुवतीय प्रदेश की बारहमासी आर्द्रता का तुलनात्मक अध्ययन करता है।
उत्थान संघनन तल अथवा मेघ आधार ऊँचाई (Lifting Condensation Level)
h_{LCL} ≈ 800 - 1500 मीटर
विषुवतीय क्षेत्रों में दोपहर बाद कपासी-वर्षी बादलों के निर्माण तथा "4 बजे की वर्षा" का वैज्ञानिक कारण स्पष्ट करता है।
गोर्किन्स्की का महाद्वीपीयता सूचकांक (Gorczynski Continentality Index)
K → 0 (शुद्ध सागरीय), K > 50 (चरम महाद्वीपीय)
तटीय मुंबई की समकारी जलवायु बनाम आंतरिक दिल्ली की विषम जलवायु के अंतर को गणितीय रूप से सिद्ध करता है।
कोपेन जलवायु वर्गीकरण संकेत (Köppen Classification Codes)
A = उष्णकटिबंधीय, C = उष्ण शीतोष्ण, E = ध्रुवीय शीत
Af: बिना शुष्क ऋतु वाला वर्षावन; Cs: शुष्क ग्रीष्म ऋतु वाला उपोष्ण; ET: सबसे गर्म महीने का औसत तापमान 0°-10°C।
बोवेन अनुपात (Bowen Ratio of Surface Energy)
B 1 (विषुवतीय सेल्वा वर्षावन) बनाम B 1 (उष्ण मरुस्थल)
स्पष्ट करता है कि प्रखर धूप के बावजूद सेल्वा वनों का तापमान मरुस्थल की भाँति 50°C तक क्यों नहीं पहुँचता।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
समुद्र तल पर स्थित एक विषुवतीय तटीय शहर का वायुमंडलीय तापमान 30°C है। सामान्य ताप ह्रास दर (ELR = प्रति 1,000 मीटर पर 6.5°C) का प्रयोग करते हुए पास स्थित 4,000 मीटर ऊँची पर्वत चोटी का अनुमानित तापमान ज्ञात कीजिए। भूमध्य रेखा पर स्थित होने पर भी माउंट किलिमंजारो पर बर्फ क्यों जमी रहती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. ऊँचाई में अंतर: $\Delta z = 4,000\text{ मीटर} - 0\text{ मीटर} = 4\text{ किमी}$।
  2. तापमान में कुल गिरावट: $\Delta T = 4\text{ किमी} \times 6.5^\circ\text{C/किमी} = 26.0^\circ\text{C}$।
  3. चोटी का तापमान: $T_{\text{चोटी}} = T_{\text{धरातल}} - \Delta T = 30.0^\circ\text{C} - 26.0^\circ\text{C} = 4.0^\circ\text{C}$।
  4. किलिमंजारो पर्वत का विश्लेषण: अफ्रीका की माउंट किलिमंजारो की ऊँचाई 5,895 मीटर है। अतः शीर्ष पर कुल ताप ह्रास लगभग $5.895 \times 6.5 \approx 38.3^\circ\text{C}$ होता है। धरातल पर 30°C होने पर भी शिखर का तापमान $30^\circ - 38.3^\circ = -8.3^\circ\text{C}$ (शून्य से नीचे) पहुँच जाता है। अतः अत्यधिक ऊँचाई के कारण यह चोटी वर्ष भर स्थायी बर्फ से ढकी रहती है।
उदाहरण 2
भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश में ग्रीष्मकाल में वर्षा न होकर शीतकाल में अधिकांश वर्षा क्यों होती है? वायुदाब पेटियों के खिसकाव तथा पवन प्रणाली के संदर्भ में समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. ग्रीष्मकालीन वायु संचार: ग्रीष्मकाल में सूर्य के उत्तरायण होने से उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी उत्तर की ओर खिसककर भूमध्यसागरीय अक्षांशों (30°-45° उ०) पर आ जाती है। इसके प्रभाव से स्थल से समुद्र की ओर शुष्क व्यापारिक पवनें बहने लगती हैं। नीचे उतरती शुष्क हवा बादलों को बनने नहीं देती, जिससे ग्रीष्मकाल पूरी तरह धूपदार, साफ व वर्षाविहीन रहता है।
  2. शीतकालीन वायु संचार: शीतकाल में सूर्य के दक्षिणायन होने से वायुदाब पेटियाँ दक्षिण में विषुवत रेखा की ओर खिसक जाती हैं। इसके फलस्वरूप भूमध्यसागरीय प्रदेश आर्द्र पछुआ पवनों (Westerlies) के प्रभाव क्षेत्र में आ जाता है। सागर से आने वाली नमी से भरी पछुआ पवनें और शीतोष्ण चक्रवात शीतकाल में व्यापक वर्षा (40–80 सेमी) करते हैं। निष्कर्ष: ऋतुओं के अनुसार वायुदाब पेटियों के खिसकाव के कारण ही भूमध्यसागरीय प्रदेश में ग्रीष्मकाल शुष्क और शीतकाल वर्षा से भरपूर होता है।
उदाहरण 3
तटीय मुंबई और आंतरिक दिल्ली के वार्षिक तापांतर की तुलना कीजिए तथा इस अंतर के लिए उत्तरदायी भौतिक भौगोलिक सिद्धांत स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. मुंबई (समकारी समुद्री जलवायु): अरब सागर के तट पर स्थित होने से सबसे गर्म महीने का औसत तापमान लगभग 30°C और सबसे ठंडे महीने का तापमान लगभग 24°C रहता है। इसका वार्षिक तापांतर अत्यंत कम ($30^\circ - 24^\circ = 6^\circ\text{C}$) होता है।
  2. दिल्ली (विषम महाद्वीपीय जलवायु): समुद्र से 1,000 किमी दूर स्थित होने से जून में तापमान 34°C (दैनिक अधिकतम 44°C) और जनवरी में औसत तापमान 14°C (रात में 5°C) तक गिर जाता है। इसका वार्षिक तापांतर बहुत अधिक ($34^\circ - 14^\circ = 20^\circ\text{C}$) होता है।
  3. भौतिक सिद्धांत (महाद्वीपीयता): जल की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होने से समुद्र देर से गर्म व देर से ठंडा होता है। सागरीय समीर मुंबई को वर्ष भर समकारी बनाए रखती है। इसके विपरीत दिल्ली की सूखी मिट्टी तेजी से गर्म व तेजी से ठंडी होती है, जिससे अत्यधिक विषम जलवायु उत्पन्न होती है।
उदाहरण 4
विषुवतीय जलवायु प्रदेश में प्रतिदिन दोपहर बाद होने वाली "4 बजे की वर्षा" (4 O'Clock Rain) की भौतिक प्रक्रिया स्पष्ट कीजिए। यह प्रतिदिन नियमित रूप से क्यों होती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. प्रातःकालीन तीव्र सौर विकिरण: भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लंबवत पड़ने से प्रातः 8 से 12 बजे के बीच धरातल और सघन वनस्पति अत्यधिक गर्म हो जाते हैं, जिससे भारी मात्रा में जलवाष्प बनती है।
  2. संवहन धाराओं का उत्थान: गर्म आर्द्र वायु हल्की होकर तीव्र गति से ऊर्ध्वाधर संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती है।
  3. रुद्धोष्म शीतलन व मेघ निर्माण: ऊपर वायुदाब कम होने से हवा फैलती है और रुद्धोष्म रूप से ठंडी होकर ओसांक तक पहुँच जाती है। दोपहर 1 से 2 बजे के बीच विशाल कपासी-वर्षी (Cumulonimbus) मेघ बन जाते हैं।
  4. 4 बजे मूसलाधार वर्षा: दोपहर बाद 3:30 से 4:30 बजे तक संघनन की सीमा पार हो जाती है और भयंकर गर्जन-तड़ित के साथ एक से डेढ़ घंटे मूसलाधार वर्षा होती है।
  5. रात्रि में शांत मौसम: वर्षा से मेघों की ऊष्मा निकल जाती है और धरातल ठंडा हो जाता है, जिससे संवहन बंद होकर रात में आकाश पूरी तरह साफ हो जाता है।
उदाहरण 5
टुंड्रा प्रदेश का "पर्माफ्रॉस्ट" (Permafrost) क्या है? यह वहाँ की वनस्पति और आधुनिक मानव बस्तियों के निर्माण को किस प्रकार प्रभावित करता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. पर्माफ्रॉस्ट की परिभाषा: टुंड्रा प्रदेश की मृदा की वह अधोभूमि (Subsoil) जो लगातार दो या अधिक वर्षों तक शून्य डिग्री सेल्सियस या उससे कम तापमान पर स्थायी रूप से जमी रहती है, पर्माफ्रॉस्ट कहलाती है।
  2. वनस्पति पर प्रभाव:
    • स्थायी जमी कठोर बर्फ को भेदकर पेड़ों की जड़ें गहराई में नहीं जा सकतीं, इसलिए टुंड्रा में बड़े पेड़ नहीं उग पाते।
    • ग्रीष्मकाल में केवल ऊपरी 30-60 सेमी बर्फ पिघलती है, किंतु नीचे अप्रवेश्य पर्माफ्रॉस्ट होने से पानी नीचे नहीं जा पाता। अतः पूरी ज़मीन दलदल बन जाती है जहाँ केवल काई, लाइकेन और छोटी झाड़ियाँ ही उग पाती हैं।
  3. निर्माण कार्यों पर प्रभाव:
    • मकानों की गर्मी या वाहनों के चलने से नीचे का पर्माफ्रॉस्ट पिघल जाता है। ठोस ज़मीन कीचड़ में बदल जाती है, जिससे इमारतें तिरछी हो जाती हैं, सड़कें टूट जाती हैं और तेल पाइपलाइनें धँस जाती हैं।
    • इससे बचने के लिए इंजीनियर इमारतों और पाइपलाइनों को ज़मीन पर न बनाकर खंभों (Stilts) के सहारे हवा में उठाकर बनाते हैं।
उदाहरण 6
भूमध्यसागरीय प्रदेश को विश्व भर में "विश्व का फलोद्यान" (Orchard of the World) क्यों कहा जाता है? यहाँ के प्रमुख फलों और संबंधित कृषि आधारित उद्योगों के नाम लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. फलोद्यान कहे जाने के कारण: भूमध्यसागरीय प्रदेश का ग्रीष्मकाल वर्षाविहीन और भरपूर धूपदार होता है, जो फलों में मिठास, शर्करा और स्वाद बढ़ाने के लिए आदर्श है। साथ ही शीतकाल मृदु होने से पाला नहीं पड़ता। इसलिए यहाँ संतरा, नींबू, जैतून, अंगूर, अंजीर, बादाम और आड़ू की बड़े पैमाने पर खेती होती है।
  2. प्रमुख कृषि आधारित उद्योग:
    • मदिरा उद्योग (Wine Industry): उत्तम अंगूरों से विश्व की सर्वोत्तम शराब बनाई जाती है (फ्रांस की शैम्पेन व बोर्डो, इटली की चियान्टी)।
    • जैतून तेल उद्योग (Olive Oil Industry): दुनिया का लगभग 85% जैतून तेल इसी क्षेत्र में उत्पादित होता है, जो खाद्य व सौंदर्य प्रसाधन में प्रयुक्त होता है।
    • फल प्रसंस्करण उद्योग: किशमिश, डिब्बाबंद जूस और सूखे फलों का निर्यात करके भारी विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है।
उदाहरण 7
दक्षिण-पश्चिम ग्रीष्मकालीन मानसून और उत्तर-पूर्व शीतकालीन मानसून के बीच उत्पत्ति, पवन की दिशा, आर्द्रता और वर्षा के संदर्भ में तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. दक्षिण-पश्चिम ग्रीष्म मानसून:
    • उत्पत्ति: दक्षिणी हिंद महासागर से उत्पन्न होकर भूमध्य रेखा पार कर भारत में आता है।
    • दिशा: समुद्र से स्थल की ओर (दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व)।
    • आर्द्रता: हज़ारों किलोमीटर गर्म महासागर के ऊपर से आने के कारण जलवाष्प से लबालब भरा होता है।
    • वर्षा: जून से सितंबर तक भारत की कुल वार्षिक वर्षा का 75%-85% भाग पर्वतीय व संवहनीय रूप में प्रदान करता है।
  2. उत्तर-पूर्व शीत मानसून:
    • उत्पत्ति: मध्य एशिया व साइबेरिया के आंतरिक उच्च वायुदाब से उत्पन्न होता है।
    • दिशा: स्थल से समुद्र की ओर (उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम)।
    • आर्द्रता: सूखे और ठंडे महाद्वीपीय भाग से चलने के कारण पूरी तरह शुष्क होता है।
    • वर्षा: अधिकांश भारत में सूखा रहता है; केवल बंगाल की खाड़ी से नमी सोखकर तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर शीतकालीन वर्षा करता है।
उदाहरण 8
अमेज़न बेसिन के सदाबहार सेल्वा वन को "पृथ्वी का फेफड़ा" (Lungs of the Earth) क्यों कहा जाता है? इस वन के विनाश से उत्पन्न होने वाले गंभीर वैश्विक संकटों की विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. "पृथ्वी का फेफड़ा" कहे जाने का कारण: अमेज़न वर्षावन लगभग 55 लाख वर्ग किमी में फैला है। इसका विशाल बहुस्तरीय हरा वितान प्रकाश-संश्लेषण द्वारा वायुमंडल से अरबों टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करता है और पृथ्वी की कुल उत्पादित ऑक्सीजन का लगभग 20% भाग प्रदान करता है। यह पृथ्वी का सबसे बड़ा स्थलीय कार्बन सिंक है।
  2. वन विनाश के वैश्विक परिणाम:
    • ग्लोबल वॉर्मिंग में तीव्र वृद्धि: वनों को काटने और जलाने से संचित कार्बन वातावरण में मुक्त हो रहा है, जिससे वैश्विक तापमान खतरनाक गति से बढ़ रहा है।
    • वर्षा चक्र का विनाश: सेल्वा वनों के वाष्पोत्सर्जन से बनने वाली वायुमंडलीय नदियाँ ("Flying Rivers") बाधित होने से पूरे दक्षिण अमेरिका में भीषण सूखे का संकट उत्पन्न होगा।
    • अपूरणीय जैव-विविधता का लोप: लाखों दुर्लभ जीव-जंतु और औषधीय पौधे सदैव के लिए विलुप्त हो जाएँगे।
    • मरुस्थलीकरण: वर्षावनों की उपजाऊ मिट्टी नष्ट होकर बंजर लैटेराइट में बदल जाएगी।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मौसम और जलवायु शब्दों में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कल का तापमान और तूफान अल्पकालिक "मौसम" था; कोलकाता की गर्म व आर्द्र गर्मी तथा सुखद शीतकाल 30-35 वर्षों की औसत "जलवायु" है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि भूमध्य रेखा पर पृथ्वी का सर्वाधिक तापमान दर्ज किया जाता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

विश्व का उच्चतम तापमान भूमध्य रेखा पर नहीं, बल्कि उपोष्णकटिबंधीय गर्म मरुस्थलों (जैसे सहारा, डेथ वैली, लूत मरुस्थल) में दर्ज किया जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि भूमध्यसागरीय प्रदेश में ग्रीष्मकाल में वर्षा होती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भूमध्यसागरीय प्रदेश में ग्रीष्मकाल पूरी तरह सूखा व वर्षाविहीन रहता है; यहाँ लगभग सारी वर्षा शीतकाल में पछुआ पवनों द्वारा होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

टुंड्रा प्रदेश को वर्ष भर पूर्ण अंधकारमय समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

टुंड्रा में केवल शीतकाल में ध्रुवीय रात होती है; ग्रीष्मकाल में कई महीनों तक सूर्य कभी नहीं डूबता और मध्यरात्रि में भी धूप रहती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मानसूनी पर्णपाती वन और शीतोष्ण पतझड़ वन के पत्ता गिराने के समय में भ्रम।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मानसूनी पर्णपाती वृक्ष शीतकाल के अंत अथवा वसंत (फरवरी-अप्रैल) में पत्ते गिराते हैं, ताकि आने वाली गर्म शुष्क ऋतु में जल बच सके।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

विषुवतीय सेल्वा वन को शंकुधारी टैगा वन समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सेल्वा भूमध्यरेखीय चौड़ी पत्ती वाले कठोर लकड़ी के सदाबहार वर्षावन हैं, जबकि टैगा उच्च अक्षांशों के शंकुधारी वन हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि मानसूनी पवनें वर्ष भर दक्षिण-पश्चिम से ही चलती हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

दक्षिण-पश्चिम पवनें केवल ग्रीष्मकाल (जून-सितंबर) में चलती हैं; शीतकाल (दिसंबर-फरवरी) में दिशा उलटकर उत्तर-पूर्व हो जाती है।

विश्व के प्रमुख जलवायु प्रदेश — संकल्पनात्मक तुलनात्मक रूपरेखा

पश्चिम बंगाल बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 भूगोल — विश्व के प्रमुख जलवायु प्रदेश (अध्याय 6) 1. विषुवतीय जलवायु प्रदेश (0° – 10° उ० एवं द०) — सदाबहार ग्रीष्मकाल भौगोलिक विस्तार: अमेज़न बेसिन (सेल्वा), कांगो बेसिन, इंडोनेशिया, मलेशिया जलवायु विशेषताएँ: औसत तापमान 25°–30°C; प्रतिदिन अपराह्न "4 बजे की वर्षा" (200–300 सेमी) प्राकृतिक वनस्पति: बहुस्तरीय सदाबहार वर्षावन (महोगनी, आबनूस, रोजवुड, रबर, लियाना) जनजीवन व संकट: पिग्मी (कांगो), यानोमामी जनजातियाँ; वनों की कटाई से कार्बन सिंक को क्षति Af (उष्णकटिबंधीय आर्द्र) तापांतर: 2°–3°C 2. मानसूनी जलवायु प्रदेश (10° – 30° उ० एवं द०) — मौसमी पवन प्रत्यावर्तन भौगोलिक विस्तार: दक्षिण एशिया (भारत, बांग्लादेश), म्यांमार, द०-पू० एशिया, उ० ऑस्ट्रेलिया पवन प्रणाली: आर्द्र द०-प० ग्रीष्मकालीन मानसून बनाम शुष्क उ०-पू० शीतकालीन मानसून प्राकृतिक वनस्पति: उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (साल, सागौन, महुआ, शीशम, बाँस) अर्थव्यवस्था: गहन धान कृषि ("चावल सभ्यता"), पटसन; मानसून पर निर्भर जुआ Am / Aw (मानसूनी) 4 स्पष्ट ऋतुएँ 3. भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश (30° – 45° उ० एवं द०) — शीतकालीन वर्षा भौगोलिक विस्तार: भूमध्य सागर तटवर्ती देश, कैलिफोर्निया, चिली, केप टाउन, पर्थ जलवायु विरोधाभास: शुष्क वर्षाविहीन ग्रीष्मकाल (व्यापारिक पवनें); आर्द्र शीतकालीन वर्षा (पछुआ पवनें) पादप अनुकूलन: कठोर मोमी पत्तियों वाले मैक्विस झाड़ियाँ, जैतून, कॉर्क ओक, मर्टल कृषि अर्थव्यवस्था: "संसार का फलोद्यान": खट्टे फल, अंगूर की खेती (उत्कृष्ट शराब) व जैतून तेल Cs (शुष्क ग्रीष्मकाल) फलोद्यान व मदिरा उद्योग 4. टुंड्रा जलवायु प्रदेश (60° – 75° उ०) — ध्रुवीय तुषार व पर्माफ्रॉस्ट भौगोलिक विस्तार: आर्कटिक तट: उत्तरी यूरेशिया (साइबेरिया, लैपलैंड), कनाडा, ग्रीनलैंड चरम मौसम: 9 माह का कठोर शीतकाल (-30° से -40°C), पुरगा बर्फ़ीले तूफ़ान; संक्षिप्त ग्रीष्म पारिस्थितिकी: पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी जमी भूमि); वृक्षविहीन काई, लाइकेन (रेनडियर मॉस) मानव जीवन: इनुइट/एस्किमो (इग्लू, कयाक), लैप, समोयेद; ब्लबर व सघन बालों का अनुकूलन ET (ध्रुवीय टुंड्रा) मध्यरात्रि का सूर्य व ध्रुवीय ज्योति प्रमुख जलवायु नियंत्रक एवं जलवायु परिवर्तन: अक्षांश व सूर्य का आपतन कोण • सामान्य ताप ह्रास दर (-6.5°C/किमी) • महाद्वीपीयता सूचकांक • वायुदाब पेटियाँ • भूमंडलीय तापन व पर्माफ्रॉस्ट पिघलना

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
जलवायु प्रदेश भूपृष्ठ का वह विस्तृत क्षेत्र है जहाँ दीर्घकालिक वायुमंडलीय घटक (तापमान, वर्षा, वायुदाब व पवनें) समरूप होते हैं, जो 30-35 वर्षों के मौसम के औसत पर आधारित होता है।
मुख्य बिंदु 2
जलवायु के प्रमुख नियंत्रक अक्षांश (सूर्य का आपतन कोण), ऊँचाई (सामान्य ताप ह्रास दर 6.5°C/किमी), समुद्र से दूरी (समकारी बनाम विषम महाद्वीपीयता), वायुदाब पेटियाँ, समुद्र धाराएँ एवं पर्वतीय ढाल हैं।
मुख्य बिंदु 3
विषुवतीय जलवायु प्रदेश (0°–10° उ० एवं द०, अमेज़न, कांगो, इंडोनेशिया) वर्ष भर लंबवत किरणों के कारण सदाबहार ग्रीष्मकाल, न्यूनतम वार्षिक तापांतर (1°–3°C) तथा दैनिक "4 बजे की संवहनीय वर्षा" (200–300 सेमी) प्रदर्शित करता है।
मुख्य बिंदु 4
अमेज़न का सदाबहार सेल्वा वर्षावन विश्व का सबसे बड़ा कार्बन सिंक ("पृथ्वी का फेफड़ा") है, जो बहुस्तरीय छत्र, कठोर लकड़ी (महोगनी, आबनूस) तथा पिग्मी व यानोमामी जनजातियों का प्राकृतिक आवास है।
मुख्य बिंदु 5
मानसूनी जलवायु प्रदेश (10°–30° उ० एवं द०, दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया) मौसमी पवन प्रत्यावर्तन पर आधारित है—आर्द्र दक्षिण-पश्चिम ग्रीष्म मानसून बनाम शुष्क उत्तर-पूर्व शीत मानसून, जो चार स्पष्ट ऋतुएँ बनाता है।
मुख्य बिंदु 6
मानसूनी प्रदेश में उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (साल, सागौन) पाए जाते हैं और यहाँ की सघन धान कृषि ("चावल सभ्यता") मानसूनी अनिश्चितता के कारण अक्सर बाढ़ व सूखे से प्रभावित होती है ("मानसून का जुआ")।
मुख्य बिंदु 7
भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश (30°–45° उ० एवं द० पश्चिमी तट) एक अनोखी जलवायु है, जहाँ ग्रीष्मकाल शुष्क व वर्षाविहीन (व्यापारिक पवनें) तथा शीतकाल आर्द्र व वर्षा से भरपूर (पछुआ पवनें) होता है।
मुख्य बिंदु 8
कठोरपर्णी मैक्विस वनस्पति से संपन्न भूमध्यसागरीय क्षेत्र खट्टे फलों, अंगूर की खेती (मदिरा उद्योग) व जैतून के तेल के कारण "विश्व का फलोद्यान" कहलाता है और पर्यटन व हॉलीवुड सिनेमा का केंद्र है।
मुख्य बिंदु 9
टुंड्रा प्रदेश (60°–75° उ०) 8-9 माह के भीषण शीतकाल, पुरगा अंधड़, पर्माफ्रॉस्ट व मध्यरात्रि के सूर्य का प्रदेश है, जहाँ वृक्षविहीन काई-लाइकेन बायोम में इनुइट/एस्किमो रहते हैं, जो वर्तमान में भूमंडलीय तापन से संकटापन्न है।
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कक्षा 8 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: Concept of History अध्याय 2: Rise of Regional Powers अध्याय 3: Establishment of Colonial Authority अध्याय 4: औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप अध्याय 5: औपनिवेशिक शासन के प्रति प्रतिक्रिया: सहयोग और विद्रोह अध्याय 6: राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास अध्याय 7: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श और विकास अध्याय 8: सांप्रदायिकता से विभाजन अध्याय 9: भारतीय संविधान: लोकतांत्रिक ढांचा और नागरिकों के अधिकार अध्याय 10: पृथ्वी की आंतरिक संरचना अध्याय 11: अस्थिर पृथ्वी अध्याय 12: शैल (चट्टानें) अध्याय 13: वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार अध्याय 14: बादल और वर्षा अध्याय 15: जलवायु प्रदेश अध्याय 16: मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन अध्याय 17: भारत के कुछ पड़ोसी देश और उनके साथ संबंध अध्याय 18: उत्तर अमेरिका महाद्वीप अध्याय 19: दक्षिण अमेरिका महाद्वीप अध्याय 20: ओशिनिया महाद्वीप

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