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WBB • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 3
अनुमानित समय: 65 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

Establishment of Colonial Authority

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान (इतिहास - अतीत ও ঐতিহ্য) के अध्याय 3 'औपनिवेशिक सत्ता की स्थापना' (Establishment of Colonial Authority) का संपूर्ण और प्रामाणिक अध्ययन मार्गदर्शक। यह अध्याय स्पष्ट करता है कि कैसे एक विदेशी व्यापारिक निगम ने भारत में अपनी संप्रभु सत्ता स्थापित की। इसमें कर्नाटक के तीन युद्धों में फ्रांसीसियों की पराजय, नवाब सिराजुद्दौला का राज्यारोहण, अंग्रेजों से विवाद के तीन मुख्य कारण, ब्लैक होल घटना का औपनिवेशिक मिथक तथा अलीनगर की संधि का सांगोपांग विवरण शामिल है। इसके बाद प्लासी के युद्ध (1757) के विश्वासघाती षड्यंत्र, कठपुतली नवाब मीर जाफर के शासन और 'प्लासी की लूट' का गहन विश्लेषण किया गया है। मीर कासिम के मुंगेर सुधार, बक्सर का निर्णायक युद्ध (1764), 1765 में शाह आलम द्वितीय से दीवानी का अधिकार और क्लाइव के विनाशकारी द्वैध शासन की पड़ताल की गई है। अंत में औपनिवेशिक शासन के चार प्रशासनिक आधार स्तंभों—सिविल सेवा, सेना, पुलिस और न्यायपालिका—के साथ-साथ लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि, लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति और 1856 में कुशासन के बहाने अवध के विलय का प्रभाव स्पष्ट किया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

लंदन के व्यापारियों की एक संयुक्त पूँजी वाली व्यापारिक कंपनी, जो कभी मुग़ल बादशाह के दरबार में व्यापारिक फरमान के लिए हाथ जोड़कर खड़ी होती थी, उसने कुछ ही दशकों में बंगाल के नवाब को अपदस्थ कर, उत्तर भारत की संयुक्त सेनाओं को पराजित कर और तीस करोड़ भारतीयों पर एक कठोर नौकरशाही, सैन्य और कानूनी शासन कैसे स्थापित कर लिया?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

आधुनिक भारत के इतिहास को गहराई से समझने के लिए औपनिवेशिक सत्ता की स्थापना का अध्ययन आधारभूत है। यह अध्याय उजागर करता है कि किस प्रकार आंतरिक फूट, दरबारी षड्यंत्रों और व्यापारिक रियायतों का दुरुपयोग करके एक विदेशी कंपनी ने मुग़ल भारत के सबसे समृद्ध प्रांत बंगाल पर कब्जा किया और फिर उसे संपूर्ण भारत को जीतने का आधार बनाया। कॉर्नवालिस, वेलेजली और डलहौजी द्वारा निर्मित दमनकारी और नस्लभेदी प्रशासनिक ढांचे को समझकर विद्यार्थी यह जान पाते हैं कि कैसे विदेशी हुकूमत ने भारतीय संस्थाओं को पंगु बनाकर 1857 के महाविद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद मुग़ल साम्राज्य का पतन और मुर्शिद कुली खाँ तथा अलीवर्दी खाँ के नेतृत्व में बंगाल के स्वायत्त क्षेत्रीय राज्य का उदय
  • भारत में पुर्तगाली, डच, अंग्रेज और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियों की व्यापारिक कोठियों की स्थापना और उनके बीच व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता
  • 1717 ई. में मुग़ल बादशाह फर्रुखसियर द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को 3,000 रुपये वार्षिक के बदले बिना चुंगी के व्यापार करने का फरमान (दस्तक) प्राप्त होना

इस अध्याय के लक्ष्य

  • कर्नाटक के तीन युद्धों (1746–1763), डुप्ले व क्लाइव की प्रतिस्पर्धा और वांडीवाश के युद्ध द्वारा भारत में फ्रांसीसी प्रभाव के खात्मे का विश्लेषण करना।
  • नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच विवाद के कारणों (दस्तक का दुरुपयोग, फोर्ट विलियम की किलेबंदी, कृष्णदास को शरण), ब्लैक होल त्रासदी के मिथक और अलीनगर की संधि का मूल्यांकन करना।
  • प्लासी के युद्ध (23 जून 1757) के षड्यंत्र, मीर जाफर के विश्वासघात और 'प्लासी की लूट' (Plassey Plunder) द्वारा बंगाल के खजाने की निकासी को समझना।
  • मीर कासिम के संप्रभु सुधार, बक्सर के युद्ध (1764) का अखिल भारतीय ऐतिहासिक महत्व, दीवानी का अधिकार (1765) और रॉबर्ट क्लाइव के द्वैध शासन (1765–1772) की विफलता का परीक्षण करना।
  • ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के चार प्रमुख स्तंभों—सिविल सेवा (ICS), सेना, पुलिस और न्यायपालिका—तथा 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट और 1793 के कॉर्नवालिस कोड का विस्तृत अध्ययन करना।
  • साम्राज्य विस्तार की आक्रामक नीतियां: लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि (1798), लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति / व्यपगत का सिद्धांत (1848) और 1856 में कुशासन के बहाने अवध के विलय के कारणों व प्रभावों का विश्लेषण करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: आंग्ल-फ्रांसीसी कर्नाटक...
2 मॉड्यूल 2: प्लासी का युद्ध (1757) व...
3 मॉड्यूल 3: मीर कासिम, बक्सर का युद्...
4 मॉड्यूल 4: औपनिवेशिक शासन के चार प्...
5 मॉड्यूल 5: साम्राज्य विस्तार की आक्...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: आंग्ल-फ्रांसीसी कर्नाटक युद्ध व बंगाल की संप्रभुता का ह्रास (1746–1757)

1.1 आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिस्पर्धा व कर्नाटक के युद्ध (1746–1763)

अठारहवीं सदी के मध्य में यूरोप में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच चल रहा संघर्ष भारतीय धरती पर भी कर्नाटक के तीन युद्धों (1746–1763) के रूप में सामने आया। कोरोमंडल तट का यह क्षेत्र अर्काट के नवाब के अधीन था, जो नाममात्र के लिए हैदराबाद के निजाम का सूबा था:

  • प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746–1748): यूरोप में ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध की ज्वाला भारत पहुँची। फ्रांसीसी गवर्नर जोसेफ फ्रांसुआ डुप्ले ने अंग्रेजों से मद्रास छीन लिया। इस युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी सेंट थोमे का युद्ध (अड्यार, 1746), जिसमें आधुनिक तोपों और बंदूकों से लैस मात्र कुछ सौ फ्रांसीसी सैनिकों ने नवाब अनवरुद्दीन की 10,000 की विशाल सेना को पराजित कर दिया। इससे सिद्ध हो गया कि सुप्रशिक्षित यूरोपीय पैदल सेना भारतीय मध्ययुगीन सेनाओं पर भारी पड़ती है। 1748 में एक्स-ला-शापेल की संधि से युद्ध समाप्त हुआ और मद्रास अंग्रेजों को लौटा दिया गया।
  • द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749–1754): हैदराबाद और कर्नाटक में उत्तराधिकार का विवाद छिड़ने पर डुप्ले ने 'राजा बनाने' (Kingmaker) की नीति अपनाई। उसने मुजफ्फर जंग और चंदा साहिब का समर्थन किया। लेकिन रॉबर्ट क्लाइव ने केवल 500 सैनिकों के साथ अर्काट (1751) पर कब्जा कर 53 दिनों तक उसका सफल बचाव किया। 1754 में फ्रांसीसी सरकार ने डुप्ले को वापस बुला लिया, जिससे फ्रांसीसी शक्ति बिखर गई।
  • तृतीय कर्नाटक युद्ध (1756–1763): यूरोप के सप्तवर्षीय युद्ध के कारण यह युद्ध छिड़ा। 1760 के ऐतिहासिक वांडीवाश के युद्ध (Battle of Wandiwash) में ब्रिटिश जनरल सर आयर कूट ने फ्रांसीसी सेनापति काउंट डी लाली को निर्णायक रूप से पराजित किया। 1763 की पेरिस की संधि के अनुसार फ्रांसीसियों को केवल निहत्थी व्यापारिक कोठियां रखने की अनुमति दी गई। इसके साथ ही भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य का सपना हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
1.2 सिराजुद्दौला का राज्यारोहण (1756) व दरबारी षड्यंत्र

अप्रैल 1756 में बंगाल के नवाब अलीवर्दी खाँ की मृत्यु हो गई। उनका कोई पुत्र न होने के कारण उन्होंने अपने प्रिय दौहित्र तेईस वर्षीय सिराजुद्दौला को मुर्शिदाबाद का नवाब बनाया। नवाब बनते ही सिराज को पारिवारिक विरोधियों और षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा:

  1. घसीटी बेगम (मेहरुन्निसा): सिराज की बड़ी मौसी, जो मोतीझील महल से दीवान राजवल्लभ की सहायता से सिराज के खिलाफ साजिशें रच रही थीं।
  2. शौकत जंग: सिराज का मौसेरा भाई और पूर्णिया का नवाब, जो बंगाल की गद्दी पर अपना दावा कर रहा था।
  3. मीर जाफर अली खाँ: नवाब की सेना का प्रधान सेनापति (बख्शी), जो स्वयं नवाब बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए था।

सिराज ने तत्परता दिखाई: उन्होंने मोतीझील पर अधिकार कर घसीटी बेगम को नजरबंद किया और अक्टूबर 1756 में मनिहारी के युद्ध में शौकत जंग को पराजित कर मार डाला। परंतु सबसे बड़ा संकट अंग्रेजों की ओर से आ रहा था।

1.3 नवाब सिराजुद्दौला व ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच विवाद के मुख्य कारण

नवाब सिराजुद्दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच टकराव के तीन मुख्य बिंदु थे, जिन्होंने नवाब की संप्रभुता को खुली चुनौती दी:

टकराव के तीन मुख्य कारण:
  • दस्तक का घोर दुरुपयोग (Misuse of Dastak): 1717 में बादशाह फर्रुखसियर ने कंपनी को चुंगी-मुक्त व्यापार का फरमान (दस्तक) दिया था। कंपनी के अंग्रेज कर्मचारी इस दस्तक का दुरुपयोग अपने निजी आंतरिक व्यापार में करने लगे और भारतीय व्यापारियों को अवैध रूप से बेचने लगे। इससे नवाब के राजकोष को भारी राजस्व घाटा हुआ और भारतीय व्यापारी तबाह हो गए।
  • फोर्ट विलियम की अवैध किलेबंदी: संभावित युद्ध के बहाने अंग्रेजों ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम के चारों ओर खाइयां और तोपें लगानी शुरू कर दीं। सिराज ने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों दोनों को किलेबंदी रोकने का आदेश दिया। फ्रांसीसियों ने आदेश माना, लेकिन अंग्रेज गवर्नर रोजर ड्रेक ने नवाब की संप्रभुता की अवहेलना करते हुए निर्माण जारी रखा।
  • राजद्रोही कृष्णदास को शरण देना: ढाका के पूर्व दीवान राजवल्लभ के पुत्र कृष्णदास सरकारी खजाने का भारी धन गबन करके कलकत्ता भाग गए। अंग्रेजों ने कृष्णदास को फोर्ट विलियम में राजनीतिक शरण दी और नवाब के विशेष दूत नारायण दास को जासूस कहकर अपमानित करके भगा दिया।
1.4 कलकत्ता पर अधिकार व कालकोठरी की त्रासदी (Black Hole Tragedy) का मिथक

अंग्रेजों की धृष्टता से क्रुद्ध होकर सिराजुद्दौला ने जून 1756 में कासिमबाजार कोठी पर कब्जा कर कलकत्ता को घेर लिया। गवर्नर ड्रेक और वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी जहाजों में बैठकर हुगली नदी के रास्ते फलता भाग गए। 20 जून 1756 को फोर्ट विलियम ने आत्मसमर्पण कर दिया। नवाब ने कलकत्ता का दायित्व अपने सेनापति माणिकचंद को सौंपा और अपने नाना के नाम पर इसका नाम अलीनगर (Alinagar) रखा।

फोर्ट विलियम के पतन के बाद एक अंग्रेज अधिकारी जॉन जेफानिया हॉलवेल (J.Z. Holwell) ने एक सनसनीखेज मनगढ़ंत कहानी फैलाई, जिसे कालकोठरी की त्रासदी / ब्लैक होल घटना (Black Hole Tragedy) कहा जाता है। हॉलवेल ने दावा किया कि 146 अंग्रेज युद्धबंदियों को मात्र 18 फीट लंबी और 14 फीट 10 इंच चौड़ी एक हवाहीन कोठरी में रात भर बंद रखा गया, जिससे दम घुटने से 123 कैदियों की मृत्यु हो गई।

ऐतिहासिक तथ्यों द्वारा ब्लैक होल का खंडन:

आधुनिक इतिहासकारों जैसे भोलानाथ चंद्र और सर जदुनाथ सरकार ने गणितीय गणना से साबित किया कि 267 वर्ग फीट के एक छोटे कमरे में 146 वयस्कों को ठूँसना शारीरिक रूप से असंभव है (प्रति व्यक्ति 1.8 वर्ग फीट से भी कम जगह)। समकालीन फारसी ग्रंथ सियार-उल-मुताखखिरीन में इस घटना का कोई उल्लेख नहीं है। वास्तव में, हॉलवेल ने ब्रिटेन और मद्रास में युद्धोन्माद भड़काने और सिराज को एक क्रूर तानाशाह दिखाकर ब्रिटिश सैन्य हमले को उचित ठहराने के लिए इस झूठे प्रचार का सहारा लिया था।

1.5 कलकत्ता की पुनर्विजय व अलीनगर की संधि (9 फरवरी 1757)

कलकत्ता के पतन की खबर मिलने पर मद्रास से रॉबर्ट क्लाइव और नौसेना प्रमुख चार्ल्स वॉटसन के नेतृत्व में सेना भेजी गई। जनवरी 1757 में क्लाइव ने माणिकचंद को घूस देकर बिना लड़े कलकत्ता पर दोबारा कब्जा कर लिया और हुगली को लूटा।

उत्तर-पश्चिम से अहमद शाह अब्दाली के संभावित आक्रमण के भय से नवाब सिराजुद्दौला ने 9 फरवरी 1757 को अलीनगर की संधि पर हस्ताक्षर कर दिए:

  • 1717 के फरमान द्वारा कंपनी को दिए गए सभी व्यापारिक विशेषाधिकार पुनः बहाल कर दिए गए।
  • कंपनी को फोर्ट विलियम की किलेबंदी करने की खुली छूट मिल गई।
  • कंपनी को कलकत्ता में अपने नाम के सिक्के (सिक्का) ढालने का संप्रभु अधिकार मिला।
  • अंग्रेजों के नुकसान की भरपाई के लिए नवाब भारी हर्जाना देने को सहमत हुए।

यह संधि नवाब के लिए आत्मघाती सिद्ध हुई। इसके तुरंत बाद मार्च 1757 में क्लाइव ने फ्रांसीसी बस्ती चंदननगर पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया, जिससे नवाब फ्रांसीसियों की सैन्य सहायता से भी वंचित हो गए।

मॉड्यूल 2: प्लासी का युद्ध (1757) व 'प्लासी की लूट'

2.1 प्लासी का षड्यंत्र (The Grand Conspiracy)

सिराजुद्दौला को हटाकर एक कठपुतली को गद्दी पर बैठाने के लिए रॉबर्ट क्लाइव ने मुर्शिदाबाद के असंतुष्ट अमीरों और साहूकारों के साथ मिलकर एक गुप्त षड्यंत्र रचा:

  1. मीर जाफर: नवाब का प्रधान सेनापति (बख्शी), जिसे नवाब बनाने का लालच देकर गद्दारी के लिए तैयार किया गया।
  2. जगत सेठ बंधु (महताब राय व स्वरूप चंद): भारत के सबसे बड़े बैंकर, जो नवाब के व्यवहार और आर्थिक मांगों से असंतुष्ट थे।
  3. राय दुर्लभ: नवाब के मुख्य कोषाध्यक्ष और सेनानायक।
  4. यार लतीफ खाँ: नवाब की एक बड़ी सैन्य टुकड़ी का कमांडर।
  5. अमीचंद (Omichund): एक सिख धनी व्यापारी, जो क्लाइव और षड्यंत्रकारियों के बीच मध्यस्थ था। जब अमीचंद ने साजिश का भेद खोलने की धमकी देकर 30 लाख रुपये और खजाने की 5% लूट मांगी, तो क्लाइव ने दो समझौते तैयार किए: सफेद कागज पर असली समझौता और लाल कागज पर वॉटसन के फर्जी हस्ताक्षर वाला नकली समझौता, जिससे अमीचंद को धोखा दिया गया।
2.2 प्लासी का युद्ध (23 जून 1757 / Battle of Plassey)

मुर्शिदाबाद से लगभग 40 किमी दक्षिण में भागीरथी नदी के किनारे पलाशी (प्लासी) के आम्रकुंज (लक्षबाग) में 23 जून 1757 को यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ:

  • सैन्य असमानता: नवाब सिराजुद्दौला के पास लगभग 50,000 सैनिक (35,000 पैदल, 15,000 घुड़सवार) और फ्रांसीसी तोपची सिनफ्रे के अधीन 53 भारी तोपें थीं। दूसरी ओर, क्लाइव के पास मात्र 3,000 सैनिक थे (लगभग 950 यूरोपीय, 100 तोपची और 2,100 भारतीय सिपाही)।
  • देशभक्तों का पराक्रम: युद्ध के आरंभ में देशभक्त सेनापति मीर मदान और मोहन लाल ने भीषण तोपखाने से अंग्रेजों को आम के पेड़ों की खाइयों के पीछे छिपने पर विवश कर दिया।
  • बारिश और विश्वासघात: दोपहर में अचानक मूसलाधार बारिश हुई। अंग्रेजों ने अपने बारूद को तिरपाल से ढककर सुरक्षित रखा, जबकि नवाब के सिपाहियों की लापरवाही से उनका बारूद भीग गया। यह सोचकर कि अंग्रेजों का बारूद भी भीग चुका होगा, मीर मदान आगे बढ़े, लेकिन अंग्रेजी तोप के गोले से वीरगति को प्राप्त हुए।
  • मीर जाफर का धोखा: मीर मदान की मृत्यु से भयभीत सिराज ने मीर जाफर को बुलाया और अपनी पगड़ी उसके कदमों में रखकर राज्य की रक्षा की गुहार लगाई। मीर जाफर ने कुरान की कसम खाकर युद्ध रोकने और मोहन लाल को वापस बुलाने की धोखेबाजी भरी सलाह दी। मोहन लाल के विरोध के बावजूद नवाब ने युद्ध विराम का आदेश दिया। जैसे ही सेना पीछे हटी, क्लाइव ने हमला बोल दिया। मीर जाफर, राय दुर्लभ और यार लतीफ की सेनाएं तमाशबीन बनी खड़ी रहीं।
  • सिराज का पलायन व हत्या: नवाब की सेना में भगदड़ मच गई। सिराज मुर्शिदाबाद से पटना की ओर भागे, लेकिन राजमहल के निकट पकड़े गए। 2 जुलाई 1757 की रात को मीर जाफर के पुत्र मीरन के आदेश पर मोहम्मदी बेग ने सिराजुद्दौला की बेरहमी से हत्या कर दी।
2.3 प्लासी का ऐतिहासिक महत्व

सैन्य दृष्टि से प्लासी कोई महान युद्ध नहीं था; यह विश्वासघात और घूसखोरी से तय हुआ एक छोटा सा संघर्ष था, जिसमें अंग्रेजों के मात्र 22 सैनिक मारे गए थे। लेकिन इसका राजनीतिक परिणाम युगांतरकारी रहा। ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारी से बंगाल की 'राजा बनाने वाली' (Kingmaker) शक्ति बन गई। इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार के शब्दों में, "23 जून 1757 को भारत में मध्यकाल का अंत हुआ और आधुनिक काल का आरंभ हुआ।"

2.4 'प्लासी की लूट' (Plassey Plunder) व आर्थिक विनाश

29 जून 1757 को क्लाइव ने मीर जाफर को मुर्शिदाबाद की गद्दी पर बैठाया। बदले में मीर जाफर ने बंगाल का खजाना अंग्रेजों के लिए खोल दिया, जिसे इतिहास में प्लासी की लूट (Plassey Plunder) कहा जाता है:

निकासी की श्रेणी प्राप्तकर्ता धनराशि ऐतिहासिक प्रभाव
युद्ध हर्जाना ईस्ट इंडिया कंपनी 1 करोड़ 77 लाख रुपये (£2.2 मिलियन) चांदी के सिक्कों में भुगतान; बंगाल का शाही खजाना खाली हो गया।
निजी उपहार व रिश्वत रॉबर्ट क्लाइव व सिलेक्ट कमेटी क्लाइव: 23.4 लाख रुपये व जागीर; काउंसिल: 58 लाख रुपये क्लाइव ब्रिटेन लौटकर यूरोप के सबसे धनी व्यक्तियों में शुमार हुआ।
भू-राजस्व अधिकार कंपनी 24 परगना की जमींदारी (24 Parganas) कंपनी को सेना के रख-रखाव के लिए स्थायी राजस्व स्रोत मिला।
निजी चुंगी-मुक्त व्यापार कंपनी के अंग्रेज कर्मचारी नमक, सुपारी और तंबाकू पर एकाधिकार बंगाल के बुनकरों व भारतीय व्यापारियों का पूर्ण आर्थिक विनाश।

अमेरिकी इतिहासकार ब्रुक्स एडम्स (Brooks Adams) ने अपनी पुस्तक The Law of Civilization and Decay में लिखा है कि प्लासी के बाद बंगाल से लूटी गई अथाह दौलत ने ही ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के लिए आवश्यक पूंजी उपलब्ध कराई थी। समृद्ध बंगाल पूरी तरह कंगाल हो गया।

मॉड्यूल 3: मीर कासिम, बक्सर का युद्ध (1764) व दीवानी की प्राप्ति (1765)

3.1 मीर जाफर की विवशता व मीर कासिम का नवाब बनना (1760)

मीर जाफर जल्द ही अंग्रेजों की कभी न खत्म होने वाली धन-लिप्सा को पूरा करने में असमर्थ हो गया। अंग्रेजों के कर्ज चुकाने के लिए उसे राजमहल के बर्तन और आभूषण तक बेचने पड़े। जब उसने गुप्त रूप से डचों से संपर्क किया, तो अंग्रेजों ने 1759 के बेदारा के युद्ध में डचों को पराजित कर दिया।

1760 में गवर्नर हेनरी वेन्सिटार्ट ने मीर जाफर को हटाकर उसके योग्य दामाद मीर कासिम (Mir Qasim) को नवाब बनाया। इसके बदले में मीर कासिम ने बर्दवान, मिदनापुर और चटगांव जिलों का राजस्व कंपनी को सौंप दिया।

3.2 मीर कासिम के संप्रभु प्रशासनिक सुधार

मीर कासिम एक स्वाभिमानी और कुशल प्रशासक था। उसने बंगाल की संप्रभुता को पुनः स्थापित करने के लिए दृढ़ कदम उठाए:

  1. राजधानी परिवर्तन (मुंगेर): कलकत्ता काउंसिल की जासूसी और षड्यंत्रों से दूर रहने के लिए उसने 1762 में राजधानी मुर्शिदाबाद से बिहार के मुंगेर (Munger) स्थानांतरित कर दी।
  2. सेना का आधुनिकीकरण: उसने यूरोपीय पद्धति पर सेना का पुनर्गठन किया। उसने जर्मन सैन्य अधिकारी वाल्टर रेनहार्ड (समरू) और आर्मेनियाई सेनापति गुर्गीन खाँ (मार्कर) को सेना के प्रशिक्षण का जिम्मा सौंपा। मुंगेर में तोपों और उत्कृष्ट फ्लिंटलॉक बंदूकों के कारखाने स्थापित किए।
  3. राजस्व अनुशासन: भ्रष्ट अधिकारियों से बकाया राशि वसूल की और संपन्न जमींदारों पर कुछ नए कर (अबवाब) लगाकर खजाने को फिर से भरा।
3.3 दस्तक विवाद व आंतरिक चुंगी की पूर्ण समाप्ति (1762–1763)

कंपनी के कर्मचारियों द्वारा दस्तक के अवैध उपयोग के कारण भारतीय व्यापारियों का व्यापार नष्ट हो रहा था। अंग्रेज कोई कर नहीं देते थे, जबकि भारतीय व्यापारियों को 40% तक चुंगी देनी पड़ती थी।

जब कलकत्ता काउंसिल ने वेन्सिटार्ट के साथ हुए समझौते को मानने से इनकार कर दिया, तो मीर कासिम ने मार्च 1763 में एक क्रांतिकारी कदम उठाया: उसने दो वर्ष के लिए बंगाल और बिहार में सभी प्रकार की आंतरिक व्यापार चुंगी पूरी तरह समाप्त कर दी (Abolition of all transit duties)। अब भारतीय व्यापारी भी अंग्रेजों के समान बिना कर के व्यापार कर सकते थे।

अपने विशेषाधिकार छिन जाने से बौखलाकर कलकत्ता काउंसिल ने जुलाई 1763 में मीर कासिम के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और पुनः वृद्ध मीर जाफर को नवाब बना दिया। कटवा, गिरिया और उदयनाला (1763) में लगातार हारने के बाद मीर कासिम मुंगेर छोड़कर अवध भाग गया।

3.4 बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर 1764 / Battle of Buxar)

अवध पहुँचकर मीर कासिम ने अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए एक त्रिगुट गठबंधन (Triple Alliance) का निर्माण किया:

  • मीर कासिम: बंगाल का अपदस्थ नवाब।
  • शुजाउद्दौला: अवध का शक्तिशाली नवाब वजीर।
  • शाह आलम द्वितीय: मुग़ल बादशाह।

इस संयुक्त सेना के लगभग 40,000 सैनिकों का सामना ब्रिटिश सेनापति मेजर हेक्टर मुनरो के नेतृत्व वाली 7,072 अनुशासित सैनिकों (857 यूरोपीय और 6,215 सिपाही) की सेना से हुआ। 22 अक्टूबर 1764 को बिहार में गंगा नदी के तट पर बक्सर (Buxar) के मैदान में भीषण युद्ध हुआ। भारतीय शासकों के आपसी अविश्वास और कमजोर समन्वय के कारण हेक्टर मुनरो के तोपखाने ने त्रिगुट सेना को बुरी तरह रौंद दिया।

प्लासी की तुलना में बक्सर का ऐतिहासिक महत्व:

प्लासी का युद्ध विश्वासघात से जीता गया एक छलावा था, जबकि बक्सर का युद्ध खुले मैदान में लड़ी गई वास्तविक सैन्य विजय थी। इस युद्ध में अंग्रेजों ने केवल एक सूबेदार को नहीं, बल्कि समस्त भारत के मुग़ल बादशाह और उत्तर भारत की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति अवध के नवाब को पराजित किया था। बक्सर की विजय ने बंगाल से लेकर इलाहाबाद तक कंपनी को निर्विवाद सत्ता बना दिया।

3.5 इलाहाबाद की संधि व दीवानी का ऐतिहासिक अधिकार (12 अगस्त 1765)

मई 1765 में रॉबर्ट क्लाइव पुनः गवर्नर बनकर बंगाल आया। 12 अगस्त 1765 को उसने मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय और अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ ऐतिहासिक इलाहाबाद की संधि (Treaty of Allahabad) की:

  1. शुजाउद्दौला के साथ संधि: अवध को 50 लाख रुपये हर्जाने के बदले नवाब को वापस कर दिया गया। अवध से कड़ा और इलाहाबाद के जिले छीनकर मुग़ल बादशाह को दे दिए गए और अवध में अंग्रेजी सेना तैनात कर दी गई।
  2. शाह आलम द्वितीय के साथ संधि: बादशाह को कड़ा व इलाहाबाद जिले दिए गए और बंगाल के राजस्व से 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर इलाहाबाद के किले में अंग्रेजों के संरक्षण में रखा गया।
  3. दीवानी का अधिकार (Grant of Diwani): इसके बदले में 12 अगस्त 1765 को मुग़ल बादशाह ने एक शाही फरमान जारी कर बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (भू-राजस्व वसूलने और दीवानी न्याय का वैधानिक अधिकार) सदा के लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दी।
3.6 रॉबर्ट क्लाइव का द्वैध शासन (Dual Government, 1765–1772)

दीवानी प्राप्त करने के बाद क्लाइव ने बंगाल में एक विचित्र और शोषक प्रशासनिक व्यवस्था लागू की, जिसे द्वैध शासन (Dual Government) कहा जाता है:

  • दीवानी (कंपनी के पास): कंपनी के पास बिना जिम्मेदारी की असीमित शक्ति और सारा राजस्व था। कंपनी ने मुहम्मद रजा खाँ (बंगाल) और शिताब राय (बिहार) को नायब दीवान बनाकर अंधाधुंध लगान वसूला, लेकिन जनता की सुरक्षा या कल्याण की कोई जिम्मेदारी नहीं ली।
  • निजामत (नवाब के पास): कठपुतली नवाब नजमुद्दौला के पास बिना शक्ति और बिना धन की पूरी प्रशासनिक जिम्मेदारी थी। कानून-व्यवस्था, पुलिस और न्याय का भार नवाब पर था, लेकिन इसे चलाने के लिए उसके पास एक भी पैसा या सेना नहीं थी।

इस 'जिम्मेदारी-रहित अधिकार और अधिकार-रहित जिम्मेदारी' ने बंगाल के जनजीवन को तबाह कर दिया। इसका सबसे भयावह परिणाम था 1770 का भयंकर बंगाल अकाल (छियत्तर का मन्वंतर / 1176 बंगाब्द), जिसमें बंगाल की एक-तिहाई आबादी (लगभग 1 करोड़ लोग) भूख और महामारी से काल-कवलित हो गई। 1772 में नए गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन को समाप्त कर कंपनी के हाथों में प्रत्यक्ष शासन की बागडोर ली।

मॉड्यूल 4: औपनिवेशिक शासन के चार प्रशासनिक स्तंभ (विधि, शासन व चार स्तंभ)

4.1 संवैधानिक ढांचा: रेगुलेटिंग एक्ट (1773) व पिट्स इंडिया एक्ट (1784)

कंपनी के भ्रष्टाचार को रोकने और भारतीय साम्राज्य पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने के लिए ब्रिटिश संसद ने दो प्रमुख अधिनियम पारित किए:

  • रेगुलेटिंग एक्ट (1773): लॉर्ड नॉर्थ के समय पारित इस कानून द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'गवर्नर जनरल' का पद दिया गया (वारेन हेस्टिंग्स पहले गवर्नर जनरल बने)। उनकी सहायता के लिए 4 सदस्यीय परिषद बनाई गई। मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसियों को बंगाल के अधीन किया गया। इसी कानून के तहत 1774 में कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of Calcutta) की स्थापना हुई और सर एलिजा इम्पे पहले मुख्य न्यायाधीश बने।
  • पिट्स इंडिया एक्ट (1784): ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विलियम पिट कनिष्ठ द्वारा प्रस्तुत इस कानून ने दोहरे नियंत्रण की प्रणाली (Dual Control) स्थापित की: राजनीतिक व सैन्य मामलों के लिए ब्रिटिश क्राउन का 6 सदस्यीय बोर्ड ऑफ कंट्रोल (Board of Control) बनाया गया और व्यापारिक मामलों के लिए कंपनी का कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (Court of Directors) बना रहा।
4.2 प्रथम स्तंभ: सिविल सेवा या नौकरशाही (Civil Service)

लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786–1793) को भारत में 'सिविल सेवा का जनक' (Father of Indian Civil Service) माना जाता है:

  1. व्यापार और प्रशासन का पृथक्करण: उसने कंपनी के व्यापारिक कार्यों को प्रशासनिक और राजस्व कार्यों से पूरी तरह अलग कर दिया।
  2. निजी व्यापार पर रोक व उच्च वेतन: कर्मचारियों के निजी व्यापार, रिश्वत और उपहार (नजर) लेने पर कड़ा प्रतिबंध लगाया गया। इसके बदले उन्हें आकर्षक वेतन दिया गया (जिला कलेक्टर को 1,500 रुपये मासिक वेतन और राजस्व का 1% कमीशन मिलता था)।
  3. नस्लीय भेदभाव व भारतीयों का निष्कासन: कॉर्नवालिस का मानना था कि "हिंदुस्तान का हर निवासी भ्रष्ट है।" उसने भारतीयों को 500 पाउंड से अधिक वेतन वाले किसी भी उच्च पद से पूरी तरह वंचित कर दिया। भारतीयों के लिए केवल क्लर्क, अमीन या दरोगा जैसे छोटे पद ही खुले थे।
  4. फोर्ट विलियम कॉलेज (1800): लॉर्ड वेलेजली ने युवा ब्रिटिश अधिकारियों को भारतीय भाषाओं (बंगाली, उर्दू, फारसी, संस्कृत), कानून और रीति-रिवाजों का प्रशिक्षण देने के लिए कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। बाद में 1806 में यह प्रशिक्षण इंग्लैंड के हेलीबरी कॉलेज (Haileybury College) में स्थानांतरित कर दिया गया।
4.3 द्वितीय स्तंभ: औपनिवेशिक सेना (The Colonial Army)

सैन्य बल ही भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना और सुरक्षा का प्रमुख औजार था:

  • सिपाही सेना: सेना में 85% से अधिक भारतीय सिपाही थे, जिन्हें मुख्य रूप से अवध, बिहार और उत्तर प्रदेश के उच्च जातियों (भोजपुरी, राजपूत, ब्राह्मण) के किसान परिवारों से भर्ती किया जाता था। 1857 से पूर्व कंपनी की सेना में 3 लाख से अधिक सैनिक थे।
  • अश्वेत भेदभाव: सेना में कड़ा नस्लीय भेदभाव था। किसी भी भारतीय को अफसर (Commissioned Officer) नहीं बनाया जाता था। एक भारतीय अधिक से अधिक सूबेदार (पैदल सेना) या रिसालदार (घुड़सवार सेना) बन सकता था, जिसका वेतन एक साधारण अंग्रेज सैनिक से भी कम था।
  • राजस्व का भारी अपव्यय: भारत के कुल राजस्व का लगभग 40% से 50% इस विशाल सेना पर खर्च किया जाता था, जिसका उपयोग भारतीय विद्रोहों को दबाने और विदेशों (बर्मा, अफगानिस्तान, चीन) में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए होता था।
4.4 तृतीय स्तंभ: पुलिस प्रणाली (The Police System)

पहले ग्रामीण क्षेत्रों में शांति-व्यवस्था की जिम्मेदारी स्थानीय जमींदारों और उनके पाइक (सशस्त्र लठैतों) की होती थी। लॉर्ड कॉर्नवालिस ने 1793 के विनियम द्वारा एक नियमित पुलिस तंत्र की नींव रखी:

  • जमींदारों की पुलिस शक्ति की समाप्ति: जमींदारों से पुलिस अधिकार छीन लिए गए और उनके पाइकों को भंग कर दिया गया।
  • थाना व दरोगा व्यवस्था: जिलों को लगभग 20 वर्ग मील के थानों (Thanas) में बांटा गया और प्रत्येक थाने का प्रमुख एक भारतीय अधिकारी दरोगा (Daroga) बनाया गया।
  • पुलिस अधीक्षक (SP): 1808 में संभागीय स्तर पर यूरोपीय पुलिस अधीक्षक (SP) का पद बनाया गया।
  • दमनकारी चरित्र: कम वेतन और असीमित अधिकारों के कारण दरोगा भ्रष्टाचार, उगाही और जुल्म का पर्याय बन गए। वे जमींदारों और साहूकारों के साथ मिलकर गरीब किसानों का उत्पीड़न करते थे।
4.5 चतुर्थ स्तंभ: न्यायपालिका व कानून संहिता (Judiciary & Law Codes)

ब्रिटिश शासकों ने भारत की पारंपरिक पंचायत व्यवस्था को हटाकर एक स्तरबद्ध पश्चिमी कानूनी ढांचा स्थापित किया:

  1. वारेन हेस्टिंग्स की न्यायिक योजना (1772): हेस्टिंग्स ने प्रत्येक जिले में दो अदालतें बनाईं:
    • जिला दीवानी अदालत: संपत्ति व नागरिक मामलों के लिए, जिसके न्यायाधीश यूरोपीय कलेक्टर होते थे (पंडितों और मौलवियों की सहायता से)।
    • जिला फौजदारी अदालत: आपराधिक मुकदमों के लिए, जहाँ काजी और मुफ्ती शरिया कानून के अनुसार फैसला करते थे और कलेक्टर निगरानी करता था।
    • कलकत्ता में सर्वोच्च अपील अदालत के रूप में सदर दीवानी अदालत और सदर निजामत अदालत स्थापित की गईं।
  2. भारतीय कानूनों का संहिताबद्धीकरण: 1776 में नेथानिएल ब्रासी हालहेड ने हिंदू कानूनों का अंग्रेजी अनुवाद A Code of Gentoo Laws नाम से प्रकाशित किया। 1784 में सर विलियम जोन्स ने एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की और 1794 में मनुस्मृति का अनुवाद किया।
  3. कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट (1774): इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे। 1775 में वारेन हेस्टिंग्स पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले महाराजा नंदकुमार को एक फर्जी जालसाजी के मुकदमे में फांसी दी गई, जिसे इतिहास में 'न्यायिक हत्या' (Judicial Murder) कहा जाता है।
  4. कॉर्नवालिस कोड (1793) व शक्तियों का पृथक्करण: कॉर्नवालिस ने अपने 48 नियमों के प्रसिद्ध कोड में राजस्व और न्यायपालिका की शक्तियों को पूरी तरह अलग कर दिया। कलेक्टर से सभी न्यायिक अधिकार छीन लिए गए और वे केवल कर वसूलने तक सीमित रहे, जबकि न्यायिक अधिकार नवनिर्मित यूरोपीय जिला जज (District Judge) को सौंपे गए।

मॉड्यूल 5: साम्राज्य विस्तार की आक्रामक नीतियां: सहायक संधि व हड़प नीति

5.1 लॉर्ड वेलेजली व सहायक संधि (Subsidiary Alliance, 1798)

1798 में जब लॉर्ड वेलेजली भारत आया, तब यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट का दबदबा था। नेपोलियन द्वारा टीपू सुल्तान जैसे ब्रिटिश-विरोधी भारतीय शासकों से गठबंधन करने के भय से वेलेजली ने अहस्तक्षेप की नीति छोड़ दी और सहायक संधि (Subsidiary Alliance) का आक्रामक कूटनीतिक अस्त्र आजमाया।

सहायक संधि की मुख्य शर्तें:
  • विदेश नीति का समर्पण: संधि स्वीकार करने वाला राजा कंपनी की अनुमति के बिना किसी अन्य राज्य से युद्ध, संधि या राजनयिक संबंध नहीं रख सकता था।
  • यूरोपीय अधिकारियों का निष्कासन: अंग्रेजों के अतिरिक्त अन्य सभी विदेशियों (विशेषकर फ्रांसीसियों) को सेवा से निकालना अनिवार्य था।
  • ब्रिटिश सेना की तैनाती: भारतीय राजा को अपनी सेना भंग करनी पड़ती थी और राज्य में 'सुरक्षा' के नाम पर एक स्थायी ब्रिटिश सेना रखनी पड़ती थी।
  • भारी सैन्य खर्च या भूभाग का समर्पण: सेना का भारी खर्च राजा को नकद देना पड़ता था। किस्त न चुका पाने पर राज्य का उपजाऊ भूभाग हमेशा के लिए कंपनी को सौंपना पड़ता था।
  • ब्रिटिश रेजिडेंट (Resident): राजधानी में एक अंग्रेज रेजिडेंट तैनात होता था, जो आंतरिक मामलों में दखल न देने के वादे के बावजूद राज्य के शासन में पूरी तरह मनमानी करता था।
5.2 सहायक संधि स्वीकार करने वाले प्रमुख राज्य
  • हैदराबाद का निजाम (1798 व 1800): इस संधि को स्वीकार करने वाला पहला भारतीय शासक। 1800 में सेना का खर्च न चुका पाने के कारण उसने बेल्लारी और कुडप्पा जिले कंपनी को सौंप दिए।
  • मैसूर (1799): चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध में वीर टीपू सुल्तान के 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम में वीरगति पाने के बाद वाडियार वंश के बालक को गद्दी पर बैठाकर यह संधि थोपी गई।
  • अवध (1801): नवाब सआदत अली खाँ से सेना के खर्च के बदले राज्य का आधा उपजाऊ भाग (रुहेलखंड व निचला दोआब) छीन लिया गया।
  • मराठा पेशवा (1802): यशवंतराव होलकर से डरकर कायर पेशवा बाजीराव द्वितीय ने 31 दिसंबर 1802 को अंग्रेजों से बेसिन की संधि (Treaty of Bassein) करके मराठों की आजादी बेच दी। इसके बाद भोंसले और सिंधिया को भी सहायक संधि माननी पड़ी।
5.3 लॉर्ड डलहौजी व हड़प नीति / व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse, 1848)

1848 में लॉर्ड डलहौजी (1848–1856) गवर्नर जनरल बना। वह एक घोर साम्राज्यवादी था, जिसका मानना था कि भारतीय राजाओं का शासन निकम्मा है और पूरे भारत पर प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन होना चाहिए। इसके लिए उसने कानूनी छल का सहारा लिया, जिसे व्यपगत का सिद्धांत / हड़प नीति (Doctrine of Lapse) कहा जाता है।

प्राचीन हिंदू विधि के अनुसार निसंतान राजा को दत्तक पुत्र लेने का पूर्ण अधिकार था और वह पुत्र निजी संपत्ति तथा राजसिंहासन दोनों का उत्तराधिकारी होता था। डलहौजी ने राज्यों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया:

  1. स्वतंत्र राज्य: जो कभी अंग्रेजों के अधीन नहीं रहे; उनका दत्तक अधिकार सुरक्षित रखा गया।
  2. अधीनस्थ संरक्षित राज्य: जो पहले मुग़ल या पेशवा के अधीन थे; उन्हें दत्तक लेने से पूर्व अनुमति लेनी पड़ती थी।
  3. कंपनी द्वारा निर्मित या पुनर्जीवित राज्य: ऐसे राज्यों में निसंतान राजा की मृत्यु पर दत्तक पुत्र केवल निजी संपत्ति का वारिस हो सकता था, राजसिंहासन का नहीं। राज्य स्वतः ब्रिटिश साम्राज्य में विलीन (Lapse) हो जाता था।
5.4 हड़प नीति द्वारा छीने गए प्रमुख राज्य
हड़पा गया राज्य वर्ष शासक / दत्तक पुत्र विलय की परिस्थिति व परिणाम
सतारा (Satara) 1848 राजा अप्पा साहिब (दत्तक वेंकोजी) हड़प नीति का पहला शिकार; दत्तक पुत्र का अधिकार खारिज कर विलय।
जैतपुर व संबलपुर 1849 राजा नारायण सिंह (संबलपुर) निसंतान मृत्यु; संबलपुर में वीर सुरेंद्र साय ने अंग्रेजों के विरुद्ध भीषण विद्रोह किया।
बघाट व उदयपुर 1850 व 1852 पहाड़ी राज्य विलय किया गया, किंतु 1860 में लॉर्ड कैनिंग ने इन्हें पुनः लौटा दिया।
झांसी (Jhansi) 1853 गंगाधर राव / रानी लक्ष्मीबाई दत्तक पुत्र दामोदर राव का उत्तराधिकार अस्वीकार; क्रुद्ध रानी लक्ष्मीबाई ने 1857 में तलवार उठाई।
नागपुर (Nagpur) 1854 रघूजी भोंसले तृतीय (दत्तक यशवंत राव) कपास उत्पादक विशाल राज्य हड़पा गया; राजमहल के आभूषण व हाथी कलकत्ता में नीलाम किए गए।
5.5 कुशासन के बहाने अवध का विलय (फरवरी 1856)

डलहौजी का सबसे अन्यायपूर्ण और विस्फोटक कदम था फरवरी 1856 में अवध का विलय। अवध के नवाब वाजिद अली शाह के कई पुत्र थे, इसलिए वहां हड़प नीति लागू नहीं हो सकती थी। इसके अलावा 1765 से अवध अंग्रेजों का सबसे वफादार मित्र राज्य था।

डलहौजी ने ब्रिटिश रेजिडेंट जेम्स आउट्रम की एक पक्षपाती रिपोर्ट को आधार बनाकर नवाब पर 'गंभीर कुशासन' (Chronic Misgovernance) का आरोप लगाया और अवध को हड़पकर नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता के मटियाबुर्ज में निर्वासित कर दिया।

इसके भयानक परिणाम हुए:

  1. तालुकदारों की बर्बादी: 1856 के संक्षिप्त भू-राजस्व बंदोबस्त में अवध के लगभग 21,000 तालुकदारों की जागीरें छीन ली गईं।
  2. सिपाहियों का आक्रोश: ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल सेना के 75,000 से अधिक सिपाही अवध के किसान परिवारों से आते थे (अवध को "बंगाल सेना की पौधशाला" कहा जाता था)। अपने नवाब का अपमान और परिजनों पर भारी लगान देखकर वे गुस्से से भर उठे।
  3. 1857 के महाविद्रोह का विस्फोट: राजाओं, तालुकदारों और सिपाहियों के इसी संचित असंतोष ने बारूद का काम किया, जो 1857 में महाविद्रोह (Great Revolt of 1857) के रूप में फट पड़ा।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

औपनिवेशिक सत्ता की स्थापना की मुख्य समयरेखा (1746–1856)
1746–1856 संप्रभु विस्तार का 110 वर्षीय घटनाक्रम
प्लासी से राजनीतिक दस्तक, बक्सर व दीवानी से आर्थिक संप्रभुता तथा डलहौजी के समय भौगोलिक पूर्णता मिली।
कर्नाटक के तीन युद्धों का तुलनात्मक विश्लेषण
फ्रांसीसी सत्ता का अंत व ब्रिटिश सर्वोच्चता
1760 के वांडीवाश युद्ध में सर आयर कूट ने फ्रांसीसी शक्ति को सदा के लिए समाप्त कर दिया।
प्लासी का युद्ध (1757) बनाम बक्सर का युद्ध (1764) तुलनात्मक ढांचा
षड्यंत्र बनाम वास्तविक युद्ध का अंतर
प्लासी में केवल एक सूबेदार हारा था; बक्सर में भारत के मुग़ल बादशाह पराजित हुए थे।
रॉबर्ट क्लाइव के द्वैध शासन का संरचनात्मक मॉडल (1765–1772)
उत्तरदायित्वहीन अधिकार बनाम अधिकारहीन उत्तरदायित्व
1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने इसे समाप्त कर प्रत्यक्ष शासन संभाला।
औपनिवेशिक प्रशासन के चार मुख्य आधार स्तंभ
औपनिवेशिक दमनकारी इस्पाती ढांचा (Steel Frame)
सभी उच्च पद केवल अंग्रेजों के लिए आरक्षित थे; भारतीयों को केवल अधीनस्थ पद मिलते थे।
सहायक संधि बनाम हड़प नीति तुलनात्मक चार्ट
अप्रत्यक्ष पंगुता बनाम प्रत्यक्ष राज्य-हड़प
वेलेजली ने राज्यों को आंतरिक रूप से पंगु बनाया; डलहौजी ने उनका अस्तित्व ही मिटा दिया।
प्रमुख ब्रिटिश गवर्नर जनरल व उनकी नीतियां
प्रशासनिक वास्तुकारों का कालानुक्रम
बोर्ड परीक्षा के 'स्तंभ मिलान' और वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के लिए अत्यंत उपयोगी।
इलाहाबाद की संधि (1765) व दीवानी अधिकार संरचना
भारत में ब्रिटिश वैधानिक प्रभुत्व का जन्म
रॉबर्ट क्लाइव ने मुग़ल बादशाह से यह फरमान प्राप्त किया था।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच 1756 में विवाद के तीन मुख्य कारण क्या थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

नवाब सिराजुद्दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच टकराव के तीन मुख्य संप्रभुता संबंधी कारण थे:

  1. दस्तक का घोर दुरुपयोग: 1717 के शाही फरमान से कंपनी को बिना चुंगी के व्यापार की छूट (दस्तक) मिली थी। कंपनी के अंग्रेज कर्मचारी इसका दुरुपयोग अपने निजी व्यापार में करने लगे और भारतीय व्यापारियों को बेचकर मुनाफा कमाने लगे। इससे नवाब का खजाना खाली होने लगा और भारतीय व्यापारी बर्बाद हो गए।
  2. कलकत्ता में अवैध किलेबंदी: अंग्रेजों ने नवाब की अनुमति के बिना फोर्ट विलियम के चारों ओर खाइयां खोदनी और तोपें लगानी शुरू कर दीं। सिराज के आदेश देने पर फ्रांसीसियों ने काम रोक दिया, लेकिन अंग्रेजों ने नवाब के आदेश की अवहेलना की।
  3. राजद्रोही कृष्णदास को शरण देना: ढाका के भ्रष्ट दीवान राजवल्लभ के पुत्र कृष्णदास सरकारी खजाना लेकर कलकत्ता भाग गए। अंग्रेजों ने उन्हें फोर्ट विलियम में शरण दी और नवाब के दूत नारायण दास को अपमानित करके निकाल दिया।
  4. दरबारी षड्यंत्रों में दखल: अंग्रेज नवाब के विरोधियों—घसीटी बेगम और शौकत जंग—से गुप्त संबंध बनाकर नवाब को हटाने की साजिश कर रहे थे।
उदाहरण 2
'कालकोठरी की त्रासदी' (Black Hole Tragedy) विवाद की समीक्षा कीजिए। आधुनिक इतिहासकार इसे एक औपनिवेशिक मिथक क्यों मानते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

20 जून 1756 को कलकत्ता पर नवाब के अधिकार के बाद अंग्रेज अधिकारी जे. जेड. हॉलवेल ने कालकोठरी की त्रासदी (Black Hole Tragedy) का प्रचार किया:

  1. हॉलवेल का दावा: उसने आरोप लगाया कि नवाब के सैनिकों ने 146 अंग्रेज बंदियों को 18 फीट लंबी और 14 फीट 10 इंच चौड़ी कोठरी में बंद कर दिया, जिससे दम घुटकर 123 कैदी मर गए।
  2. गणितीय असंभवता: आधुनिक इतिहासकार भोलानाथ चंद्र और सर जदुनाथ सरकार ने मापकर साबित किया कि 267 वर्ग फीट के कमरे में 146 वयस्क इंसानों का समाना भौतिक रूप से असंभव है (प्रति व्यक्ति 1.8 वर्ग फीट से भी कम जगह)।
  3. समकालीन साक्ष्यों का अभाव: गुलाम हुसैन की सियार-उल-मुताखखिरीन या किसी भी भारतीय दस्तावेज में इस घटना का कोई जिक्र नहीं है।
  4. साम्राज्यवादी दुष्प्रचार: अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला को एक क्रूर हत्यारे के रूप में प्रचारित करने, ब्रिटेन में युद्धोन्माद फैलाने और कलकत्ता पर पुनः कब्जे व बंगाल की लूट को नैतिक जामा पहनाने के लिए यह मनगढ़ंत कहानी गढ़ी थी।
उदाहरण 3
प्लासी के युद्ध (1757) के महत्व का वर्णन कीजिए तथा 'प्लासी की लूट' (Plassey Plunder) से क्या अभिप्राय है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

23 जून 1757 को लड़ा गया प्लासी का युद्ध वास्तविक युद्ध नहीं, बल्कि मीर जाफर, जगत सेठ और क्लाइव के षड्यंत्र का परिणाम था:

  1. राजनीतिक महत्व: केवल 22 अंग्रेज सैनिकों की हानि पर अंग्रेजों ने बंगाल के नवाब को अपदस्थ कर मीर जाफर को कठपुतली बना दिया। कंपनी व्यापारी से 'नवाब बनाने वाली' राजनीतिक शक्ति बन गई। जदुनाथ सरकार के अनुसार, इससे भारत में मध्यकाल का अंत और आधुनिक काल का आरंभ हुआ।
  2. प्लासी की लूट (Plassey Plunder): युद्ध के बाद मीर जाफर से की गई अंधाधुंध धन उगाही को ब्रुक्स एडम्स ने 'प्लासी की लूट' कहा:
    • हर्जाना: कंपनी को नकद 1 करोड़ 77 लाख रुपये चांदी के सिक्कों में मिले।
    • व्यक्तिगत रिश्वत: क्लाइव को 23.4 लाख रुपये नकद व जागीर मिली; सिलेक्ट कमेटी के सदस्यों को 58 लाख रुपये मिले।
    • 24 परगना: कंपनी को कलकत्ता के दक्षिण में 24 परगना की जमींदारी मिली।
    • व्यापारिक एकाधिकार: अंग्रेज कर्मचारियों ने आंतरिक व्यापार पर कब्जा कर भारतीय बुनकरों और व्यापारियों को बर्बाद कर दिया। यह लूटा गया धन इंग्लैंड गया, जिसने ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया।
उदाहरण 4
बक्सर का युद्ध (1764) प्लासी के युद्ध (1757) की तुलना में सैन्य और राजनीतिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण क्यों था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

इतिहासकारों का मत है कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना में प्लासी की तुलना में बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर 1764) कहीं अधिक निर्णायक था:

  1. वास्तविक सैन्य विजय: प्लासी का युद्ध विश्वासघात और भीगे बारूद के कारण जीता गया एक तमाशा था। लेकिन बक्सर का युद्ध खुले मैदान में मेजर हेक्टर मुनरो के तोपखाने और सैन्य अनुशासन से जीता गया वास्तविक युद्ध था।
  2. अखिल भारतीय शक्तियों की पराजय: प्लासी में अंग्रेजों ने केवल बंगाल के एक प्रांतीय नवाब को हराया था। बक्सर में अंग्रेजों ने एक साथ उत्तर भारत की तीन सर्वोच्च शक्तियों को धूल चटाई:
    • मीर कासिम (बंगाल का अपदस्थ नवाब),
    • शुजाउद्दौला (अवध का नवाब वजीर), और
    • शाह आलम द्वितीय (समस्त भारत का मुग़ल बादशाह)।
  3. मुग़ल संप्रभुता का भ्रम टूटा: बादशाह की पराजय और आत्मसमर्पण से स्पष्ट हो गया कि भारत में मुग़ल शक्ति निष्प्राण हो चुकी है और ब्रिटिश सेना अजेय है।
  4. दीवानी की प्राप्ति: बक्सर की जीत के परिणामस्वरूप 1765 में इलाहाबाद की संधि हुई, जिसने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी का वैधानिक अधिकार दिया।
उदाहरण 5
रॉबर्ट क्लाइव का 'द्वैध शासन' (Dual Government, 1765–1772) क्या था और यह किस प्रकार पूरी तरह विफल रहा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1765 में दीवानी मिलने के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल में जो व्यवस्था लागू की, उसे द्वैध शासन (Dual Government) कहा जाता है:

  1. शक्तियों का विभाजन:
    • दीवानी (कंपनी के पास): भू-राजस्व वसूली और वित्तीय नियंत्रण कंपनी के हाथ में रहा। यानी कंपनी को मिला जिम्मेदारी-मुक्त असीमित अधिकार।
    • निजामत (नवाब के पास): शासन, कानून-व्यवस्था और आपराधिक न्याय का भार नवाब नजमुद्दौला पर रहा। यानी नवाब को मिला अधिकार-शून्य भारी उत्तरदायित्व।
  2. विफलता व विनाशकारी प्रभाव:
    • नवाब के पास सेना और धन न होने से प्रशासन ठप हो गया।
    • कंपनी के नायब दीवानों (रजा खाँ व शिताब राय) ने किसानों से बेरहमी से लगान वसूला।
    • 1770 का अकाल (छियत्तर का मन्वंतर): 1769 के सूखे के बाद नवाब राहत देने में असमर्थ था और कंपनी ने लगान में कोई छूट नहीं दी, बल्कि जबरन वसूली जारी रखी। परिणामस्वरूप 1 करोड़ लोग (आबादी का एक-तिहाई) भूख से तड़पकर मर गए।
  3. समाप्ति: 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन का अंत कर कंपनी द्वारा प्रत्यक्ष शासन अपने हाथ में ले लिया।
उदाहरण 6
लॉर्ड कॉर्नवालिस ने सिविल सेवा और पुलिस व्यवस्था को औपनिवेशिक शासन के दो मजबूत स्तंभों के रूप में कैसे संगठित किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786–1793) ने औपनिवेशिक नियंत्रण को स्थायी बनाने के लिए दो प्रशासनिक स्तंभ खड़े किए:

  1. सिविल सेवा (प्रथम स्तंभ):
    • व्यावसायिकता: व्यापारिक शाखा को प्रशासनिक व राजस्व शाखा से अलग किया। अधिकारियों के निजी व्यापार, रिश्वत व उपहार लेने पर पूर्ण रोक लगाई।
    • आकर्षक वेतन: भ्रष्टाचार रोकने के लिए कलेक्टर को 1,500 रुपये मासिक वेतन और राजस्व पर 1% कमीशन दिया।
    • नस्लीय बहिष्कार: कॉर्नवालिस की धारणा थी कि "हिंदुस्तान का हर निवासी भ्रष्ट है।" उसने भारतीयों को 500 पाउंड से अधिक वेतन वाले सभी उच्च पदों से कानूनन बाहर कर दिया।
    • प्रशिक्षण: आगे चलकर वेलेजली ने युवा सिविलियनों को भारतीय भाषाओं व कानूनों की शिक्षा देने के लिए 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज स्थापित किया।
  2. पुलिस व्यवस्था (तृतीय स्तंभ):
    • जमींदारों से मुक्ति: 1793 के विनियम द्वारा जमींदारों से पुलिस अधिकार छीन लिए गए और उनके पाइक भंग कर दिए गए।
    • थाना व दरोगा: प्रत्येक जिले को 20 वर्ग मील के थानों में बांटा गया और प्रत्येक थाने का प्रमुख एक भारतीय दरोगा बनाया गया।
    • पुलिस अधीक्षक (SP): 1808 में संभागीय स्तर पर यूरोपीय एसपी का पद बनाया गया।
    • जनविरोधी चरित्र: पुलिस तंत्र जनता की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि लगान वसूली और जनता के विद्रोहों को कुचलने के लिए बनाया गया था।
उदाहरण 7
लॉर्ड वेलेजली की 'सहायक संधि' (Subsidiary Alliance) की मुख्य शर्तें क्या थीं और इसने भारतीय राजाओं को कैसे पंगु बना दिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1798 में लॉर्ड वेलेजली ने नेपोलियन के भय और ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए सहायक संधि की शुरुआत की:

  1. मुख्य शर्तें:
    • विदेश नीति का समर्पण: राजा कंपनी की अनुमति के बिना किसी अन्य शक्ति से युद्ध, शांति या संधि नहीं कर सकता था।
    • यूरोपियों का निष्कासन: अंग्रेजों के अलावा अन्य सभी विदेशियों (विशेषकर फ्रांसीसियों) को राज्य से निकालना अनिवार्य था।
    • ब्रिटिश सेना की तैनाती: राजा को अपनी सेना भंग कर राज्य में एक स्थायी ब्रिटिश सेना रखनी पड़ती थी।
    • भारी आर्थिक बोझ: सेना का भारी खर्च राजा को नकद देना होता था; न दे पाने पर उपजाऊ क्षेत्र कंपनी को सौंपना पड़ता था।
    • ब्रिटिश रेजिडेंट: राजदरबार में एक अंग्रेज रेजिडेंट तैनात होता था, जो आंतरिक प्रशासन में लगातार हस्तक्षेप करता था।
  2. राजाओं की पंगुता: हैदराबाद (1798), मैसूर (1799), अवध (1801) और पेशवा (1802) ने अपनी स्वतंत्रता खो दी। सेना भंग होने से लाखों भारतीय सैनिक बेरोजगार होकर डाकू (पिंडारी) बन गए और राजा सुरक्षा की झूठी गारंटी पाकर भोग-विलास में डूब गए।
उदाहरण 8
लॉर्ड डलहौजी की 'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) का परीक्षण कीजिए। 1856 में अवध का विलय 1857 के विद्रोह का कारण कैसे बना?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

लॉर्ड डलहौजी (1848–1856) ने साम्राज्य विस्तार के लिए कानूनी कुतर्कों का सहारा लेकर हड़प नीति / व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse) लागू किया:

  1. हड़प नीति का नियम: प्राचीन हिंदू प्रथा के विपरीत, डलहौजी ने तय किया कि कंपनी के अधीन आश्रित राज्यों का राजा यदि निसंतान मरेगा, तो उसका दत्तक पुत्र केवल निजी संपत्ति का वारिस होगा, राजसिंहासन का नहीं। वह राज्य सीधे ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाएगा।
  2. हड़पे गए राज्य: सतारा (1848, पहला राज्य), जैतपुर व संबलपुर (1849), बघाट (1850), उदयपुर (1852), झांसी (1853 - रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव को अस्वीकार किया) और नागपुर (1854)।
  3. 1856 में अवध का विलय: नवाब वाजिद अली शाह के कई पुत्र होने के कारण वहां हड़प नीति नहीं लग सकती थी। इसलिए जेम्स आउट्रम की झूठी रिपोर्ट पर डलहौजी ने 'कुशासन' (Misgovernance) का बहाना बनाकर फरवरी 1856 में अवध को हड़प लिया और नवाब को कलकत्ता निर्वासित कर दिया।
  4. 1857 के विद्रोह का विस्फोट:
    • अवध के 21,000 तालुकदारों की जागीरें जब्त कर ली गईं।
    • बंगाल सेना के 75,000 सिपाही अवध के किसान परिवारों से थे; अपने नवाब के अपमान और परिवार की बदहाली से वे भड़क उठे।
    • इस कदम ने राजाओं, तालुकदारों और सिपाहियों को एकजुट कर दिया, जिसने 1857 के महाविद्रोह की चिंगारी सुलगा दी।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

प्लासी के युद्ध (1757) और बक्सर के युद्ध (1764) के सैन्य स्वरूप में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तव में प्लासी विश्वासघात और भीगे बारूद का नतीजा था (एक छोटी सी झड़प); जबकि बक्सर खुले मैदान में मुग़ल सम्राट और अवध के नवाब के खिलाफ लड़ा गया अंग्रेजों का वास्तविक, रक्तपातपूर्ण सैन्य युद्ध था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि क्लाइव को दीवानी का अधिकार प्लासी के युद्ध के तुरंत बाद मिल गया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

दीवानी 1757 में नहीं, बल्कि बक्सर के युद्ध के बाद 12 अगस्त 1765 को इलाहाबाद की संधि के तहत मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय से प्राप्त हुई थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'कालकोठरी की त्रासदी' (ब्लैक होल) को निर्विवाद ऐतिहासिक सत्य मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आधुनिक शोधों (भोलानाथ चंद्र, जदुनाथ सरकार) ने साबित किया है कि 267 वर्ग फीट के कमरे में 146 लोग समा ही नहीं सकते थे; हॉलवेल ने आक्रमण को जायज ठहराने के लिए झूठी कहानी गढ़ी थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि मीर कासिम ने केवल अंग्रेजों को नुकसान पहुँचाने के लिए चुंगी समाप्त की थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मीर कासिम ने 1763 में भारतीय और यूरोपीय सभी व्यापारियों के लिए आंतरिक चुंगी समाप्त की थी, ताकि भारतीय व्यापारी भी अंग्रेजों के बराबर बिना कर के व्यापार कर सकें।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सहायक संधि और हड़प नीति के प्रणेताओं के नाम आपस में मिला देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सहायक संधि (Subsidiary Alliance) लॉर्ड वेलेजली (1798) ने शुरू की थी; हड़प नीति (Doctrine of Lapse) लॉर्ड डलहौजी (1848) ने शुरू की थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि 1856 में अवध को हड़प नीति के तहत मिलाया गया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

नवाब वाजिद अली शाह के कई पुत्र थे, इसलिए वहां हड़प नीति लागू नहीं हो सकती थी। अवध को 'कुशासन' (Misgovernance) के झूठे बहाने पर हड़पा गया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि औपनिवेशिक काल में भारतीय उच्च प्रशासनिक पदों पर पहुँच सकते थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कॉर्नवालिस के घोर नस्लभेदी नियमों के तहत भारतीयों को 500 पाउंड से अधिक वेतन वाले किसी भी पद से बाहर रखा गया था। भारतीय सेना में अधिकतम सूबेदार और प्रशासन में दरोगा या अमीन ही बन सकते थे।

औपनिवेशिक सत्ता की स्थापना का संकल्पनात्मक मानचित्र (WBBSE Class 8 Chapter 3 Concept Map)

WBBSE कक्षा 8 इतिहास • अध्याय 3 कॉन्सेप्ट मैप औपनिवेशिक सत्ता की स्थापना (प्लासी, बक्सर, चार प्रशासनिक स्तंभ व साम्राज्य विस्तार) अतीत ও ঐতিহ্য Ch 3 स्तंभ 1 कर्नाटक व बंगाल आंग्ल-फ्रांसीसी व सिराज संघर्ष कर्नाटक युद्ध (1746–63) • डुप्ले बनाम क्लाइव प्रतिस्पर्धा • वांडीवाश का युद्ध (1760) • फ्रांसीसी शक्ति का पतन सिराजुद्दौला का विवाद (1756) • दस्तक का घोर दुरुपयोग • फोर्ट विलियम की किलेबंदी • कृष्णदास को शरण देना ब्लैक होल व अलीनगर • हॉलवेल का ब्लैक होल मिथक • क्लाइव द्वारा कलकत्ता पुनर्विजय • अलीनगर की संधि (फरवरी 1757) ऐतिहासिक मोड़ व्यापारिक कंपनी कूटनीतिक षड्यंत्र व सैन्य शक्ति से लैस होकर बंगाल की संप्रभुता को चुनौती देने के लिए तैयार हुई। स्तंभ 2 प्लासी से दीवानी विश्वासघात, बक्सर व द्वैध शासन प्लासी का युद्ध (1757) • क्लाइव-मीर जाफर गुप्त षड्यंत्र • जगत सेठ व अमीचंद का समझौता • 23 जून 1757 को विश्वासघात प्लासी की लूट व मीर कासिम • बंगाल के खजाने की लूट • मुंगेर राजधानी व सैन्य सुधार • आंतरिक व्यापार चुंगी की समाप्ति बक्सर व दीवानी (1764-65) • त्रिगुट सेना की निर्णायक पराजय • दीवानी का अधिकार (12 अगस्त 1765) • क्लाइव का द्वैध शासन (1765–72) वित्तीय संप्रभुता दीवानी अधिकार पाकर कंपनी बिना प्रशासनिक उत्तरदायित्व के बंगाल के राजस्व का दोहन करने लगी, जिससे 1770 का अकाल पड़ा। स्तंभ 3 चार प्रशासनिक स्तंभ नौकरशाही, सेना, पुलिस व कानून सिविल सेवा (ICS) • कॉर्नवालिस: सिविल सेवा का जनक • फोर्ट विलियम कॉलेज (1800) • भारतीयों का पूर्ण निष्कासन सेना व पुलिस प्रणाली • सिपाही सेना व श्वेत अफसर • कॉर्नवालिस थाना व्यवस्था (1793) • दरोगा व जिला पुलिस अधीक्षक न्यायपालिका व कानून संहिता • कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट (1774) • सदर दीवानी व निजामत अदालत • कॉर्नवालिस कोड 1793 दमनकारी ढांचा राजस्व वसूली सुनिश्चित करने और जनविद्रोहों को कुचलने के लिए एक सुदृढ़ व नस्लभेदी शासन तंत्र स्थापित किया गया। स्तंभ 4 साम्राज्य विस्तार सहायक संधि व हड़प नीति सहायक संधि (1798) • लॉर्ड वेलेजली की नीति • ब्रिटिश सेना व रेजिडेंट की तैनाती • हैदराबाद, मैसूर, अवध, पेशवा हड़प नीति / व्यपगत (1848) • लॉर्ड डलहौजी की विस्तार नीति • दत्तक पुत्र का अधिकार अमान्य • सतारा, संबलपुर, झांसी, नागपुर अवध का विलय (1856) • 'कुशासन' के बहाने हड़पा गया • नवाब वाजिद अली शाह निष्कासित • 1857 के विद्रोह का मुख्य कारण अखिल भारतीय प्रभुत्व देशी रियासतों को पराधीन बनाकर अथवा सीधे साम्राज्य में मिलाकर अंग्रेजों ने 1856 तक संपूर्ण भारत पर प्रभुत्व स्थापित किया।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. यूरोपीय प्रतिद्वंद्विता का अंत: कर्नाटक के तीन युद्धों (1746–1763) में ब्रिटिश कंपनी ने फ्रांसीसी महत्वाकांक्षाओं को धूल चटा दी; 1760 के वांडीवाश युद्ध ने भारत में अंग्रेजों को एकमात्र प्रमुख यूरोपीय शक्ति बना दिया।
मुख्य बिंदु 2
  1. सिराजुद्दौला व 1756 का संघर्ष: दस्तक के घोर दुरुपयोग, फोर्ट विलियम की अवैध किलेबंदी और राजद्रोही कृष्णदास को अंग्रेजों द्वारा शरण देने के कारण नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर अधिकार कर लिया।
मुख्य बिंदु 3
  1. ब्लैक होल का मिथक व अलीनगर की संधि: हॉलवेल द्वारा प्रचारित ब्लैक होल त्रासदी का बहाना बनाकर क्लाइव ने कलकत्ता पुनः जीता और फरवरी 1757 में सिराज को अपमानजनक अलीनगर की संधि पर विवश किया।
मुख्य बिंदु 4
  1. प्लासी का युद्ध (23 जून 1757) व प्लासी की लूट: क्लाइव ने मीर जाफर, जगत सेठ और अमीचंद के साथ मिलकर सिराज को हराया। मीर जाफर को कठपुतली बनाकर बंगाल के खजाने की 'प्लासी की लूट' शुरू हुई, जिसने ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति को सींचा।
मुख्य बिंदु 5
  1. मीर कासिम, बक्सर का युद्ध व दीवानी प्राप्ति: मीर कासिम ने मुंगेर में सेना सुधार किया और चुंगी-मुक्त व्यापार लागू किया। 1764 के बक्सर युद्ध में अंग्रेजों ने त्रिगुट (शाह आलम द्वितीय, शुजाउद्दौला, मीर कासिम) को हराया और 12 अगस्त 1765 को दीवानी अधिकार प्राप्त किया।
मुख्य बिंदु 6
  1. क्लाइव का द्वैध शासन (1765–1772): कंपनी के पास बिना जिम्मेदारी का सारा राजस्व और नवाब के पास बिना पैसे का शासन रहा। इस व्यवस्था ने 1770 के भयंकर अकाल (छियत्तर का मन्वंतर) को जन्म दिया, जिसमें 1 करोड़ लोग मारे गए। 1772 में हेस्टिंग्स ने इसे समाप्त किया।
मुख्य बिंदु 7
  1. चार प्रशासनिक आधार स्तंभ: कॉर्नवालिस व हेस्टिंग्स ने सिविल सेवा (कॉर्नवालिस जनक, नस्लीय बहिष्कार), सेना (भारतीय सिपाही व श्वेत अफसर), पुलिस (1793 थाना व दरोगा) और न्यायपालिका (1793 कॉर्नवालिस कोड शक्तियों का पृथक्करण, 1774 सुप्रीम कोर्ट) का दमनकारी ढांचा बनाया।
मुख्य बिंदु 8
  1. साम्राज्य विस्तार की नीतियां: वेलेजली की सहायक संधि (1798 - हैदराबाद, मैसूर, अवध, पेशवा) और डलहौजी की हड़प नीति (1848 - सतारा, संबलपुर, झांसी, नागपुर) तथा 1856 के अवध विलय ने पूरे भारत को पराधीन किया और 1857 के महाविद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1756 में नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच विवाद के तीन मुख्य कारण क्या थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तीन प्रमुख कारण थे: (1) कंपनी कर्मचारियों द्वारा निजी व्यापार में दस्तक का अवैध उपयोग; (2) नवाब की अनुमति के बिना कलकत्ता में फोर्ट विलियम की अवैध सैन्य किलेबंदी; और (3) गबन के आरोपी कृष्णदास को अंग्रेजों द्वारा राजनीतिक शरण देना।
व्यापारिक छूट, कलकत्ता में किलेबंदी और ढाका के भगोड़े दीवान-पुत्र को याद करें।
2
बक्सर के युद्ध (1764) को प्लासी के युद्ध (1757) से अधिक निर्णायक क्यों माना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्लासी विश्वासघात से तय हुआ एक छोटा षड्यंत्र था जिसमें केवल एक नवाब हारा था; जबकि बक्सर खुले मैदान में लड़ा गया वास्तविक युद्ध था जिसमें अंग्रेजों ने मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब और मीर कासिम के त्रिगुट को पराजित किया।
षड्यंत्र बनाम वास्तविक युद्ध और पराजित मुग़ल सम्राट के पद पर विचार करें।
3
रॉबर्ट क्लाइव के 'द्वैध शासन' (1765–1772) की मूल संरचनात्मक खामी क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मूल खामी अधिकार और उत्तरदायित्व का पूर्ण अलगाव था: कंपनी के पास दीवानी के तहत बिना किसी जिम्मेदारी का सारा राजस्व और सैन्य शक्ति थी; जबकि नवाब के पास निजामत के तहत बिना धन और शक्ति की पूरी प्रशासनिक जिम्मेदारी थी।
कंपनी का 'अधिकार बिना उत्तरदायित्व' और नवाब का 'उत्तरदायित्व बिना अधिकार'।
4
1793 के कॉर्नवालिस कोड द्वारा जिला प्रशासन में क्या क्रांतिकारी परिवर्तन किया गया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कॉर्नवालिस कोड ने राजस्व और न्यायपालिका की शक्तियों को अलग कर दिया: जिला कलेक्टर से सभी न्यायिक अधिकार छीनकर उसे केवल राजस्व तक सीमित किया गया, और न्यायिक अधिकार नवनिर्मित जिला जज (District Judge) को सौंपे गए।
कलेक्टर और जिला जज के बीच कार्य विभाजन को याद करें।
5
हड़प नीति (Doctrine of Lapse) क्या थी और 1848 में इसका पहला शिकार कौन सा राज्य बना?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: लॉर्ड डलहौजी द्वारा लागू इस नीति के अनुसार यदि आश्रित देशी राज्य का राजा निसंतान मरता, तो उसका दत्तक पुत्र गद्दी का वारिस नहीं हो सकता था और राज्य सीधे ब्रिटिश साम्राज्य में विलीन हो जाता था। 1848 में सतारा इसका पहला शिकार बना।
दत्तक पुत्र के सिंहासन के अधिकार का निषेध और 1848 का मराठा राज्य।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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