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WBB • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 7
अनुमानित समय: 50 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श और विकास

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) द्वारा स्वीकृत कक्षा 8 की इतिहास पाठ्यपुस्तक 'अतीत ও ঐতিহ্য' (Past and Heritage) के सातवें अध्याय 'भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श एवं विकास' (Ideals and Evolution of India's National Movement) के संपूर्ण मास्टर अध्ययन मॉड्यूल में आपका स्वागत है। यह अध्याय बीसवीं सदी के उस गौरवशाली दौर का प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज है, जब भारतीय स्वाधीनता संग्राम केवल शिक्षित मध्यमवर्ग की याचिकाओं और संवैधानिक बहसों से निकलकर करोड़ों किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं और क्रांतिकारियों के एक अजेय राष्ट्रव्यापी जन-विद्रोह में परिवर्तित हो गया।9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका के सफल सत्याग्रह के बाद मोहनदास करमचंद गांधी का स्वदेश आगमन भारतीय राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात करता है। अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के परामर्श पर भारत भ्रमण के पश्चात गांधीजी ने 'सत्याग्रह'—सत्य और अहिंसा पर आधारित नैतिक आत्मबल—का दर्शन प्रस्तुत किया। बिहार के चंपारण का नील सत्याग्रह (1917), अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) और गुजरात के खेड़ा किसान आंदोलन (1918) ने यह सिद्ध कर दिया कि बिना कोई हथियार उठाए भी संगठित जनता निरंकुश औपनिवेशिक सत्ता को झुकने पर विवश कर सकती है।प्रथम विश्वयुद्ध के तुरंत बाद ब्रिटिश हुकूमत का दमनकारी रौलट कानून (1919)—'ना दलील, ना वकील, ना अपील'—और 13 अप्रैल को अमृतसर का नृशंस जलियांवाला बाग हत्याकांड साम्राज्यवाद के क्रूरतम चेहरे को उजागर कर गया। इसके नैतिक विरोध में विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ब्रिटिश 'नाइटहुड' उपाधि का परित्याग किया। इसके पश्चात महात्मा गांधी के नेतृत्व में प्रथम सर्वभारतीय असहयोग एवं खिलाफत आंदोलन (1920–1922) की शुरुआत हुई। विदेशी वस्त्रों, न्यायालयों व विद्यालयों का बहिष्कार और खादी-चरखे के प्रसार से देश जाग उठा। किंतु 4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरीचौरा में भीड़ द्वारा थाना जलाए जाने की हिंसक घटना से व्यथित होकर गांधीजी ने आंदोलन स्थगित कर दिया। इसके उपरांत देशबंधु चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी (1923) बनाई और बंगाल में ऐतिहासिक बंगाल पैक्ट (1923) की नींव रखी।इसी कालखंड में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की दूसरी महान लहर उठी। उत्तर भारत में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुखदेव के नेतृत्व में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) ने काकोरी कांड (1925), सांडर्स वध (1928) और केंद्रीय असेंबली में बम धमाके (1929) के जरिए समाजवाद और क्रांति का उद्घोष किया। 63 दिन के भूख हड़ताल के बाद जतिन दास शहीद हुए। बंगाल में मास्टरदा सूर्य सेन के नेतृत्व में 18 अप्रैल 1930 को ऐतिहासिक चटगांव शस्त्रागार छापा मारा गया और जालालाबाद की पहाड़ियों में ब्रिटिश सेना को करारी टक्कर दी गई, जिसमें प्रीतिलता वद्देदार और कल्पना दत्त जैसी वीरांगनाओं ने हथियार उठाकर मोर्चा संभाला।1929 के ऐतिहासिक लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 'पूर्ण स्वराज' का संकल्प लिया गया। 12 मार्च 1930 को गांधीजी की 240 मील लंबी ऐतिहासिक दांडी यात्रा के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–1934) का शंखनाद हुआ। सीमांत गांधी के 'खुदाई खिदमतगार' से लेकर मेदिनीपुर के तटीय नमक सत्याग्रह तक पूरे देश ने कानूनों की अवज्ञा की।दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अगस्त 1942 में गांधीजी के 'करो या मरो' (Do or Die) के आह्वान पर भारत छोड़ो आंदोलन स्वतःस्फूर्त जनक्रांति बन गया। पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में स्वतंत्र ताम्रलिप्त जातीय सरकार बनी और 73 वर्षीया मातंगिनी हाजरा ('गांधीबुड़ी') ने तिरंगा थामे पुलिस की गोलियों के आगे प्राण न्योछावर कर दिए। अंततः, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) के 'दिल्ली चलो' सैन्य अभियान, लाल किला मुकदमे के विरुद्ध जनविद्रोह और 1946 के शाही नौसेना विद्रोह (RIN Mutiny) ने ब्रिटिश साम्राज्य की सैन्य रीढ़ तोड़ दी और 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

क्या आपने कभी सोचा है?

कैसे निहत्थे करोड़ों भारतीय किसानों, बुनकरों, छात्रों और साधारण महिलाओं ने मिलकर दुनिया की सबसे ताकतवर ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं? दांडी के समुद्रतट पर गांधीजी द्वारा एक मुट्ठी नमक कानून तोड़ने से लेकर मास्टरदा सूर्य सेन का चटगांव शस्त्रागार कब्जा, मेदिनीपुर में तीन गोलियां खाकर भी तिरंगा ऊंचा रखने वाली मातंगिनी हाजरा का बलिदान, और नेताजी की आजाद हिंद फौज का 'दिल्ली चलो' रणघोष—जानें भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उस अमर इतिहास को।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) द्वारा स्वीकृत कक्षा 8 की इतिहास पाठ्यपुस्तक 'अतीत ও ঐতিহ্য' (Past and Heritage) के सातवें अध्याय 'भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श एवं विकास' (Ideals and Evolution of India's National Movement) के संपूर्ण मास्टर अध्ययन मॉड्यूल में आपका स्वागत है। यह अध्याय बीसवीं सदी के उस गौरवशाली दौर का प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज है, जब भारतीय स्वाधीनता संग्राम केवल शिक्षित मध्यमवर्ग की याचिकाओं और संवैधानिक बहसों से निकलकर करोड़ों किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं और क्रांतिकारियों के एक अजेय राष्ट्रव्यापी जन-विद्रोह में परिवर्तित हो गया।

9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका के सफल सत्याग्रह के बाद मोहनदास करमचंद गांधी का स्वदेश आगमन भारतीय राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात करता है। अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के परामर्श पर भारत भ्रमण के पश्चात गांधीजी ने 'सत्याग्रह'—सत्य और अहिंसा पर आधारित नैतिक आत्मबल—का दर्शन प्रस्तुत किया। बिहार के चंपारण का नील सत्याग्रह (1917), अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) और गुजरात के खेड़ा किसान आंदोलन (1918) ने यह सिद्ध कर दिया कि बिना कोई हथियार उठाए भी संगठित जनता निरंकुश औपनिवेशिक सत्ता को झुकने पर विवश कर सकती है।

प्रथम विश्वयुद्ध के तुरंत बाद ब्रिटिश हुकूमत का दमनकारी रौलट कानून (1919)—'ना दलील, ना वकील, ना अपील'—और 13 अप्रैल को अमृतसर का नृशंस जलियांवाला बाग हत्याकांड साम्राज्यवाद के क्रूरतम चेहरे को उजागर कर गया। इसके नैतिक विरोध में विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ब्रिटिश 'नाइटहुड' उपाधि का परित्याग किया। इसके पश्चात महात्मा गांधी के नेतृत्व में प्रथम सर्वभारतीय असहयोग एवं खिलाफत आंदोलन (1920–1922) की शुरुआत हुई। विदेशी वस्त्रों, न्यायालयों व विद्यालयों का बहिष्कार और खादी-चरखे के प्रसार से देश जाग उठा। किंतु 4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरीचौरा में भीड़ द्वारा थाना जलाए जाने की हिंसक घटना से व्यथित होकर गांधीजी ने आंदोलन स्थगित कर दिया। इसके उपरांत देशबंधु चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी (1923) बनाई और बंगाल में ऐतिहासिक बंगाल पैक्ट (1923) की नींव रखी।

इसी कालखंड में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की दूसरी महान लहर उठी। उत्तर भारत में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुखदेव के नेतृत्व में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) ने काकोरी कांड (1925), सांडर्स वध (1928) और केंद्रीय असेंबली में बम धमाके (1929) के जरिए समाजवाद और क्रांति का उद्घोष किया। 63 दिन के भूख हड़ताल के बाद जतिन दास शहीद हुए। बंगाल में मास्टरदा सूर्य सेन के नेतृत्व में 18 अप्रैल 1930 को ऐतिहासिक चटगांव शस्त्रागार छापा मारा गया और जालालाबाद की पहाड़ियों में ब्रिटिश सेना को करारी टक्कर दी गई, जिसमें प्रीतिलता वद्देदार और कल्पना दत्त जैसी वीरांगनाओं ने हथियार उठाकर मोर्चा संभाला।

1929 के ऐतिहासिक लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 'पूर्ण स्वराज' का संकल्प लिया गया। 12 मार्च 1930 को गांधीजी की 240 मील लंबी ऐतिहासिक दांडी यात्रा के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–1934) का शंखनाद हुआ। सीमांत गांधी के 'खुदाई खिदमतगार' से लेकर मेदिनीपुर के तटीय नमक सत्याग्रह तक पूरे देश ने कानूनों की अवज्ञा की।

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अगस्त 1942 में गांधीजी के 'करो या मरो' (Do or Die) के आह्वान पर भारत छोड़ो आंदोलन स्वतःस्फूर्त जनक्रांति बन गया। पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में स्वतंत्र ताम्रलिप्त जातीय सरकार बनी और 73 वर्षीया मातंगिनी हाजरा ('गांधीबुड़ी') ने तिरंगा थामे पुलिस की गोलियों के आगे प्राण न्योछावर कर दिए। अंततः, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) के 'दिल्ली चलो' सैन्य अभियान, लाल किला मुकदमे के विरुद्ध जनविद्रोह और 1946 के शाही नौसेना विद्रोह (RIN Mutiny) ने ब्रिटिश साम्राज्य की सैन्य रीढ़ तोड़ दी और 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कक्षा 8 इतिहास अध्याय 6: 'राष्ट्रवाद का प्रारंभिक विकास' (1885 में राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना, नरमपंथी बनाम गरमपंथी, लाल-बाल-पाल तथा 1905 का बंग-भंग व स्वदेशी आंदोलन)।
  • ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के आर्थिक दुष्प्रभाव: धन की निकासी (Drain of Wealth), नील की खेती और रेलवे व्यवस्था का बुनियादी ज्ञान।
  • प्रमुख ऐतिहासिक अवधारणाएं: सत्याग्रह, अहिंसा, स्वराज, बहिष्कार, खिलाफत और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • गांधीवादी सत्याग्रह के नैतिक दर्शन को समझना और चंपारण, अहमदाबाद तथा खेड़ा के आरंभिक सत्याग्रहों के ऐतिहासिक प्रभाव का मूल्यांकन करना।
  • रौलट कानून और जलियांवाला बाग नरसंहार के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा 'नाइटहुड' उपाधि त्यागने के नैतिक और राष्ट्रीय महत्व की व्याख्या करना।
  • असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन के कारणों, रणनीतियों, रचनात्मक कार्यक्रमों और परिणामों की तुलनात्मक विवेचना करना।
  • क्रांतिकारी आंदोलन में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मास्टरदा सूर्य सेन तथा प्रीतिलता वद्देदार व कल्पना दत्त जैसी महिला क्रांतिकारियों के योगदान को रेखांकित करना।
  • स्वराज पार्टी और देशबंधु सी.आर. दास के बंगाल पैक्ट (1923) तथा मेदिनीपुर की ताम्रलिप्त जातीय सरकार और मातंगिनी हाजरा के बलिदान का विश्लेषण करना।
  • नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) के सैन्य अभियान, लाल किला मुकदमा और 1946 के नौसेना विद्रोह द्वारा स्वतंत्रता की राह प्रशस्त करने की प्रक्रिया को समझना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: गांधीवादी विचारधारा, सत्...
2 मॉड्यूल 2: असहयोग एवं खिलाफत आंदोलन...
3 मॉड्यूल 3: क्रांतिकारी राष्ट्रवाद ए...
4 मॉड्यूल 4: सविनय अवज्ञा आंदोलन, दां...
5 मॉड्यूल 5: अंतिम प्रहार: भारत छोड़ो...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: गांधीवादी विचारधारा, सत्याग्रह एवं आरंभिक क्षेत्रीय आंदोलन (1915–1919)

1.1 सत्याग्रह का दर्शन: सत्य, अहिंसा और आत्मिक बल का संघर्ष

9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका में दो दशकों के रंगभेद-विरोधी सफल संघर्ष के पश्चात मोहनदास करमचंद गांधी भारत लौटे (इस दिन को प्रतिवर्ष प्रवासी भारतीय दिवस के रूप में मनाया जाता है)।

भारत में उन्होंने जिस नए राजनीतिक दर्शन का सूत्रपात किया, उसका नाम था 'सत्याग्रह' (सत्य के प्रति अटूट आग्रह)। गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह कोई निष्क्रिय प्रतिरोध या दुर्बलों का हथियार नहीं था, बल्कि यह परम 'आत्मिक बल' (Soul-Force) था। इसके तीन आधारभूत सिद्धांत थे:

  • परम अहिंसा (Ahimsa): अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं, बल्कि किसी भी परिस्थिति में शत्रु के प्रति घृणा या हिंसा का भाव रखे बिना अन्याय का डटकर मुकाबला करने का असीम साहस है।
  • आत्म-कष्ट द्वारा सत्य की स्थापना (Truth through Self-Suffering): विरोधी को चोट पहुंचाए बिना स्वयं कष्ट सहकर प्रतिपक्षी के अंतःकरण और विवेक को जगाना।
  • अन्याय के साथ असहयोग: अन्यायी कानूनों को मानने से इनकार करना, क्योंकि औपनिवेशिक शासन जनता के सहयोग के बल पर ही टिका होता है।

राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के परामर्श पर उन्होंने प्रथम वर्ष तीसरे दर्जे के रेल डिब्बे में बैठकर पूरे भारत का भ्रमण किया और ग्रामीण किसानों व मजदूरों की वास्तविक समस्याओं को समझा।

1.2 चंपारण नील सत्याग्रह (1917): भारतीय धरती पर गांधीजी की पहली विजय

1917 में बिहार के चंपारण जिले के एक स्थानीय किसान राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर गांधीजी चंपारण पहुंचे।

वहां यूरोपीय नीलहे जमींदारों ने किसानों पर कुख्यात तीनकठिया प्रथा (Tinkathia System) थोप रखी थी। इसके तहत प्रत्येक बीघे (20 कट्ठा) के सर्वोत्तम 3 कट्ठे में अनिवार्य रूप से नील की खेती करनी पड़ती थी। 19वीं सदी के अंत में जर्मनी में कृत्रिम रंग (Synthetic Dye) बनने से नील का बाजार गिर गया, तो नीलहों ने किसानों को समझौते से मुक्त करने के बदले भारी अवैध कर (तावान व शराहबेशी) वसूलना शुरू कर दिया।

जब गांधीजी चंपारण पहुंचे, तो जिलाधिकारी ने उन्हें तुरंत जिला छोड़ने का सरकारी आदेश दिया। गांधीजी ने निर्भीकता से आदेश मानने से मना कर दिया और कहा कि वे अंतरात्मा की उच्चतर पुकार सुन रहे हैं। यह भारतीय धरती पर पहला खुला सविनय अवज्ञा था।

किसानों के भारी समर्थन को देखकर सरकार को झुकना पड़ा और गांधीजी को सदस्य बनाकर जांच आयोग गठित किया गया। तीनकठिया प्रथा समाप्त कर दी गई और अवैध वसूली का 25% किसानों को लौटाया गया। चंपारण ने गांधीजी को जन-जन का नेता बना दिया।

1.3 अहमदाबाद मिल हड़ताल एवं खेड़ा किसान सत्याग्रह (1918)

1918 के आरंभ में गांधीजी ने गुजरात में दो अन्य सफल स्थानीय आंदोलनों का नेतृत्व किया:

अहमदाबाद मिल हड़ताल (मार्च 1918)

मुद्दा: प्लेग महामारी समाप्त होने पर सूती मिल मालिकों ने 'प्लेग बोनस' बंद करना चाहा, जबकि प्रथम विश्वयुद्ध की महंगाई से त्रस्त मजदूर 50% वेतन वृद्धि मांग रहे थे। मालिक केवल 20% देना चाहते थे।

गांधीजी का हस्तक्षेप: गांधीजी ने मजदूरों को 35% वेतन वृद्धि की मांग पर अडिग रहने और अहिंसक हड़ताल करने की सलाह दी। मजदूरों का मनोबल बनाए रखने के लिए उन्होंने भारत में अपना पहला अनशन किया। तीसरे दिन मिल मालिकों ने 35% वृद्धि स्वीकार कर ली।

खेड़ा सत्याग्रह (मार्च–जून 1918)

मुद्दा: भीषण सूखे से खेड़ा में फसल उत्पादन सामान्य के 25% से नीचे आ गया। राजस्व नियमों के अनुसार लगान माफ होना चाहिए था, किंतु सरकार किसानों की जमीन व मवेशी कुर्क कर जबरन लगान वसूल रही थी।

परिणाम: युवा वकील वल्लभभाई पटेल के साथ मिलकर गांधीजी ने किसानों को लगान न देने को कहा। सरकार ने गुप्त आदेश जारी कर केवल समर्थ किसानों से ही लगान लेने की नीति अपनाई, जिससे किसानों की जीत हुई।

इन आंदोलनों के माध्यम से राजेंद्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी, महादेव देसाई और वल्लभभाई पटेल जैसे युवा नेता गांधीजी के निकटतम सहयोगी बने।

1.4 रौलट एक्ट (1919): औपनिवेशिक काला कानून और देशव्यापी हड़ताल

प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार का इस उम्मीद में भरपूर सहयोग किया था कि युद्ध के बाद स्वशासन मिलेगा। किंतु ब्रिटिश संसद ने सर सिडनी रौलट की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों पर दमनकारी रौलट कानून (मार्च 1919) पारित कर दिया।

इस कानून के मुख्य प्रावधान अत्यंत निरंकुश थे:

  • संदेह के आधार पर किसी भी नागरिक को बिना वारंट गिरफ्तार किया जा सकता था।
  • बिना मुकदमा चलाए 2 वर्ष तक जेल में बंद रखा जा सकता था।
  • विशेष गुप्त अदालतों में सुनवाई होगी और फैसले के खिलाफ अपील का कोई अधिकार नहीं होगा। जनसाधारण में यह कानून इस रूप में कुख्यात हुआ: 'ना दलील, ना वकील, ना अपील'।

गांधीजी ने इसे 'काला कानून' कहा और सत्याग्रह सभा गठित कर 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। यह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध भारत की पहली संगठित राष्ट्रीय हड़ताल थी।

1.5 जलियांवाला बाग नरसंहार (13 अप्रैल 1919) एवं टैगोर द्वारा नाइटहुड त्याग

पंजाब के अमृतसर में रौलट विरोधी आंदोलन के दो लोकप्रिय नेताओं—डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल—को 10 अप्रैल को गिरफ्तार कर निर्वासित कर दिया गया।

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पावन पर्व पर लगभग 10,000 निहत्थे नागरिक अमृतसर के जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्र हुए। यह मैदान चारों तरफ से ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था और बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था।

सैन्य कमांडर ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर 90 ब्रिटिश व गोरखा सैनिकों के साथ मैदान में घुसा और एकमात्र निकास मार्ग को रोक दिया। बिना किसी चेतावनी के उसने निहत्थी, असहाय भीड़ पर सीधे गोलियां चलाने का हुक्म दिया। 10 मिनट तक लगातार 1,650 राउंड गोलियां बरसाई गईं।

नरसंहार की भयावहता

ब्रिटिश सरकार के हंटर आयोग ने मृतकों की संख्या केवल 379 बताई, किंतु कांग्रेस की स्वतंत्र जांच समिति के अनुसार 1,000 से अधिक निर्दोष लोग मारे गए और 1,500 से अधिक घायल हुए। जान बचाने के लिए सैकड़ों लोग बाग के कुएं में कूद गए।

इस अमानवीय बर्बरता के विरोध में विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने 31 मई 1919 को वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड को एक ऐतिहासिक पत्र लिखकर अपनी ब्रिटिश 'नाइटहुड' (Knighthood) उपाधि का परित्याग कर दिया:

"The time has come when badges of honour make our shame glaring in their incongruous context of humiliation, and I for my part wish to stand, shorn of all special distinctions, by the side of those of my countrymen who, for their so-called insignificance, are liable to suffer degradation not fit for human beings."

जलियांवाला बाग ने ब्रिटिश शासन के कथित 'न्यायप्रियता' के भ्रम को सदा के लिए तोड़ दिया और देश को असहयोग के विराट आंदोलन की ओर अग्रसर किया।

मॉड्यूल 2: असहयोग एवं खिलाफत आंदोलन से स्वराज पार्टी (1920–1926)

2.1 खिलाफत का मुद्दा एवं ऐतिहासिक हिंदू-मुस्लिम एकता

प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की की पराजय के बाद अंग्रेजों ने तुर्क साम्राज्य का बंटवारा कर दिया और तुर्की के सुल्तान, जिन्हें दुनिया भर के मुसलमान अपना धार्मिक प्रमुख या खलीफा मानते थे, उनके अधिकारों को छीन लिया।

इसके विरोध में भारतीय मुसलमानों ने अली बंधुओं (मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली), मौलाना अबुल कलाम आजाद और डॉ. अंसारी के नेतृत्व में खिलाफत आंदोलन शुरू किया। गांधीजी ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता का अभूतपूर्व ऐतिहासिक अवसर माना:

"हिंदू और मुसलमानों को एक सूत्र में बांधने का ऐसा अवसर सौ वर्षों में भी दोबारा नहीं आएगा।"

सितंबर 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में और दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने खिलाफत और पंजाब के अन्यायों के प्रतिकार तथा एक वर्ष में 'स्वराज' प्राप्त करने के लिए असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया।

2.2 असहयोग के कार्यक्रम: बहिष्कार एवं रचनात्मक स्वदेशी

असहयोग आंदोलन (1920–1922) दो समानांतर धाराओं में संचालित हुआ—नकारात्मक बहिष्कार और सकारात्मक स्वदेशी निर्माण:

बहिष्कार कार्यक्रम (बहिष्कार)

  • सरकारी उपाधियों व अवैतनिक पदों का त्याग (गांधीजी ने 'कैसर-ए-हिंद' पदक लौटाया)।
  • चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू जैसे वकीलों द्वारा अदालतों का बहिष्कार।
  • हजारों छात्रों द्वारा सरकारी स्कूल-कॉलेजों का त्याग।
  • विदेशी वस्त्रों की होली जलाना और विदेशी शराब व माल की दुकानों पर पिकेटिंग।
  • विधान परिषदों के चुनावों का बहिष्कार।

रचनात्मक स्वदेशी कार्यक्रम

  • राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना: काशी विद्यापीठ, जामिया मिलिया इस्लामिया, गुजरात विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ।
  • विवादों के निपटारे के लिए पंचायती अदालतों की स्थापना।
  • घर-घर में चरखे द्वारा सूत कातना और खादी का व्यापक प्रचार-प्रसार।
  • 'तिलक स्वराज फंड' के लिए 1 करोड़ रुपये से अधिक का संग्रह।
  • अस्पृश्यता का निवारण और हिंदू-मुस्लिम सद्भाव की रक्षा।

1920-21 में जहां 102 करोड़ रुपये के विदेशी कपड़े आयात होते थे, वहीं 1921-22 में यह घटकर 57 करोड़ रुपये रह गया।

2.3 जन-विस्तार: किसान एवं मजदूर आंदोलनों का उभार

असहयोग आंदोलन शहरों से निकलकर देश के सुदूर गांवों तक फैल गया और ग्रामीण शोषित वर्गों का आंदोलन बन गया:

  • संयुक्त प्रांत (UP): बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में अवध के किसानों ने जमींदारों की बेदखली और बेगार प्रथा के विरुद्ध संघर्ष किया। मदारी पासी के नेतृत्व में एका आंदोलन चला।
  • बंगाल: मेदिनीपुर में वीरेंद्रनाथ शासमल के नेतृत्व में किसानों ने ब्रिटिश यूनियन बोर्ड का कर देने से मना कर दिया और सरकार को यूनियन बोर्ड भंग करने पर विवश किया। असम के चाय बागान मजदूरों के समर्थन में चांदपुर में स्टीमर हड़ताल और असम-बंगाल रेलवे हड़ताल हुई।
  • अन्य क्षेत्र: आंध्र के गुंटूर में वन सत्याग्रह हुआ जहां ग्रामीणों ने आरक्षित वनों में पशु चराए। राजस्थान में मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में भील आदिवासियों ने आंदोलन किया।

1921 के अंत तक 30,000 से अधिक सत्याग्रही जेलों में ठूंस दिए गए और प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत दौरे का पूर्ण बहिष्कार कर काले झंडे दिखाए गए।

2.4 चौरीचौरा की घटना (4 फरवरी 1922) एवं आंदोलन की वापसी

जब आंदोलन अपने चरम पर था और गांधीजी बारदोली से सामूहिक कर-बंदी सविनय अवज्ञा की तैयारी कर रहे थे, तभी एक दुखद घटना घटित हुई।

4 फरवरी 1922 को संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले के चौरीचौरा गांव में मद्यपान और महंगाई के विरुद्ध शांतिपूर्ण जुलूस निकाल रहे ग्रामीणों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं। आक्रोशित भीड़ ने पुलिस पर धावा बोला और सिपाहियों के थाने में छिप जाने पर थाने को आग के हवाले कर दिया। इसमें 22 पुलिसकर्मी जीवित जलकर मर गए।

इस हिंसा से गांधीजी को गहरा आघात पहुंचा। उनका दृढ़ विश्वास था कि अहिंसा के बिना आजादी का कोई नैतिक अर्थ नहीं है और हिंसा होने पर सरकार को क्रूर दमन का बहाना मिल जाएगा। उन्होंने 12 फरवरी 1922 को बारदोली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर असहयोग आंदोलन तत्काल वापस ले लिया।

इस निर्णय से युवा नेताओं में भारी निराशा फैली। सुभाष चंद्र बोस ने इसे 'राष्ट्रीय आपदा' कहा। 10 मार्च 1922 को ब्रिटिश हुकूमत ने गांधीजी को गिरफ्तार कर 6 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई।

2.5 स्वराज पार्टी (1923), देशबंधु चित्तरंजन दास एवं बंगाल पैक्ट

आंदोलन स्थगित होने के बाद कांग्रेस में आगे की रणनीति को लेकर दो गुट बन गए:

  • नो-चेंजर्स (अपरिवर्तनवादी): राजगोपालाचारी, वल्लभभाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद, जो परिषदों के बहिष्कार और ग्रामीण रचनात्मक कार्य पर बल देते थे।
  • प्रो-चेंजर्स (परिवर्तनवादी): देशबंधु चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू, जिनका तर्क था कि परिषदों में प्रवेश कर सरकार के बजट और कानूनों को गिराकर शासन को भीतर से ठप करना चाहिए।

जनवरी 1923 में स्थापित हुई स्वराज पार्टी। 1923 के चुनावों में स्वराजियों ने केंद्रीय विधानसभा और बंगाल में बड़ी जीत हासिल की और औपनिवेशिक बजटों को बार-बार खारिज कर द्वैध शासन को पंगु बना दिया।

बंगाल में देशबंधु चित्तरंजन दास ने ऐतिहासिक बंगाल पैक्ट (1923) पर हस्ताक्षर कर मुसलमानों को आबादी के अनुपात में 55% सरकारी नौकरियों और 60% स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व का आश्वासन देकर साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल कायम की।

मॉड्यूल 3: क्रांतिकारी राष्ट्रवाद एवं वामपंथी जनआंदोलन (1920–1930 का दशक)

3.1 क्रांतिकारी आंदोलन का पुनर्जन्म: HRA से HSRA

असहयोग आंदोलन की अचानक वापसी से युवाओं का अहिंसक संवैधानिक मार्गों से भरोसा उठ गया और वे सशस्त्र क्रांति की ओर मुड़े।

अक्टूबर 1924 में कानपुर में रामप्रसाद बिस्मिल, शचींद्रनाथ सान्याल और योगेश चंद्र चटर्जी ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना की। उनका लक्ष्य सशस्त्र क्रांति से स्वतंत्र भारतीय गणराज्य बनाना था।

हथियारों के लिए धन जुटाने हेतु 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी ट्रेन डकैती की गई। काकोरी षड़यंत्र में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी दी गई।

सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोज शाह कोटला में भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने इसका नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) कर दिया और वैज्ञानिक समाजवाद व मेहनतकशों के राज को अपना ध्येय बनाया।

3.2 भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और असेंबली में बम

अक्टूबर 1928 में साइमन कमीशन विरोध के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए HSRA ने कदम उठाया।

17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने लाहौर में पुलिस अधिकारी जे. पी. सांडर्स को गोली मारकर लालाजी के बलिदान का प्रतिशोध लिया।

8 अप्रैल 1929 को मजदूर-विरोधी 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' और 'पब्लिक सेफ्टी बिल' के विरोध में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय असेंबली की खाली जगह पर दो धुआं वाले बम फेंके और पर्चे उछाले:

"बहरों को सुनाने के लिए जोरदार धमाके की जरूरत होती है।" — इंकलाब जिंदाबाद! साम्राज्यवाद का नाश हो!

वे भागे नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण किया ताकि अदालत को क्रांति के प्रचार का मंच बनाया जा सके। लाहौर जेल में राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए अनशन करते हुए 25 वर्षीय बंगाली क्रांतिकारी जतिन दास 63 दिन के अनशन के बाद 13 सितंबर 1929 को शहीद हुए।

27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद ने अंतिम गोली से स्वयं को बलिदान किया। और 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।

3.3 मास्टरदा सूर्य सेन एवं चटगांव शस्त्रागार छापा (18 अप्रैल 1930)

बंगाल में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के सिरमौर थे चटगांव के शिक्षक सूर्य सेन, जिन्हें साथी आदर से 'मাস্টারदा' (Masterda) कहते थे।

उन्होंने इण्डियन रिपब्लिकन आर्मी (चटगांव शाखा) बनाई। 18 अप्रैल 1930 की रात 65 क्रांतिकारी युवाओं ने एक साथ चार रणनीतिक केंद्रों पर धावा बोला:

  • दामपाड़ा पुलिस शस्त्रागार और ऑक्जीलरी फोर्स का शस्त्रागार कब्जा किया।
  • टेलीफोन-टेलीग्राफ के तार काटे और रेल की पटरियां उखाड़कर चटगांव का संपर्क शेष भारत से पूरी तरह काट दिया।
  • शस्त्रागार परिसर में राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर मास्टरदा की अध्यक्षता में स्वतंत्र अंतरिम क्रांतिकारी सरकार की घोषणा की।

22 अप्रैल 1930 को जालालाबाद की पहाड़ियों में ब्रिटिश सेना के साथ भयंकर युद्ध हुआ। मशीनगनों की बौछार के सामने 12 वीर क्रांतिकारी शहीद हुए, किंतु ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पड़ा।

3.4 क्रांतिकारी आंदोलन में वीरांगनाएं: प्रीतिलता, कल्पना व बीना दास

बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन का सबसे गौरवशाली पहलू था महिलाओं का हथियार उठाकर प्रत्यक्ष रणक्षेत्र में उतरना:

प्रीतिलता वद्देदार

बेथ्यून कॉलेज की मेधावी स्नातक प्रीतिलता ने मास्टरदा के आदेश पर 24 सितंबर 1932 को नस्लभेदी 'पहाड़तली यूरोपियन क्लब' पर सफल सशस्त्र हमला किया (जहां लिखा रहता था: 'कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित है')। घायल होने पर दुश्मन के हाथ जीवित न पड़ने के लिए उन्होंने पोटैशियम साइनाइड खाकर भारत की पहली महिला क्रांतिकारी शहीद बनने का गौरव प्राप्त किया।

कल्पना दत्त

बम बनाने और हथियार ढोने में दक्ष थीं। पुरुषों के वेश में मास्टरदा के साथ छापामार अभियानों में भाग लिया और आजीवन कारावास की सजा काटी।

बीना दास, शांति घोष व सुनीति चौधरी

1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में युवा छात्रा बीना दास ने बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर मंच से सीधी पांच गोलियां चलाईं। इससे पूर्व दिसंबर 1931 में कोमिल्ला की दो स्कूली छात्राओं शांति घोष और सुनीति चौधरी ने क्रूर जिला मजिस्ट्रेट स्टीवंस को गोली मारकर मौत के घाट उतारा था।

विश्वासघात के कारण मास्टरदा सूर्य सेन पकड़े गए और अमानवीय यातनाओं के बाद 12 जनवरी 1934 को उन्हें फांसी दे दी गई।

3.5 वामपंथी विचारधारा एवं किसान-मजदूर आंदोलन

1917 की रूसी क्रांति से प्रेरित होकर भारत में वामपंथी और कम्युनिस्ट विचारों का तीव्र प्रसार हुआ:

  • भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI): अक्टूबर 1920 में ताशकंद में एम. एन. रॉय के प्रयासों से और दिसंबर 1925 में कानपुर सम्मेलन में औपचारिक रूप से भारत में गठित हुई।
  • ट्रेड यूनियन आंदोलन: 1920 में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) बनी, जिसके प्रथम अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे।
  • मेरठ षड्यंत्र केस (1929): कम्युनिस्ट प्रभाव से घबराकर सरकार ने 31 मजदूर नेताओं (मुजफ्फर अहमद, एस.ए. डांगे आदि) पर 4 साल मुकदमा चलाया।
  • अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS): 1936 में लखनऊ में स्वामी सहजानंद सरस्वती की अध्यक्षता में गठित हुई, जिसने जमींदारी प्रथा उन्मूलन और किसानों की ऋणमुक्ति की आवाज उठाई।

नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस में समाजवादी विचारों को प्रतिष्ठित किया, जिससे आजादी की लड़ाई मेहनतकश जनता के आर्थिक शोषण से मुक्ति का आंदोलन बनी।

मॉड्यूल 4: सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी यात्रा एवं संवैधानिक राजनीति (1927–1939)

4.1 साइमन कमीशन बहिष्कार (1927) एवं नेहरू रिपोर्ट (1928)

1919 के सुधारों की समीक्षा हेतु ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1927 में सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में साइमन कमीशन नियुक्त किया।

कमीशन के सभी सातों सदस्य श्वेत अंग्रेज थे और एक भी भारतीय नहीं था। इसे भारतीय आत्मसम्मान का अपमान मानकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने बहिष्कार किया। 3 फरवरी 1928 को बंबई पहुंचने पर 'साइमन गो बैक' (साइमन वापस जाओ) के नारे गूंज उठे।

भारत सचिव लॉर्ड बर्कनहेड की चुनौती स्वीकार कर पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में 1928 में नेहरू रिपोर्ट तैयार की गई, जो भारतीयों द्वारा लिखित पहला संविधान मसौदा था।

इसमें औपनिवेशिक स्वराज्य (Dominion Status), मौलिक अधिकार और संयुक्त निर्वाचन का प्रस्ताव था। किंतु सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू ने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करते हुए 'इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग' बनाई।

4.2 1929 का लाहौर अधिवेशन एवं 'पूर्ण स्वराज' का ऐतिहासिक उद्घोष

दिसंबर 1929 में पंजाब के लाहौर में रावी नदी के तट पर 40 वर्षीय जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ।

ब्रिटिश सरकार द्वारा औपनिवेशिक स्वराज्य न देने पर लाहौर अधिवेशन ने 'पूर्ण स्वराज' (Complete Independence) को कांग्रेस का एकमात्र लक्ष्य घोषित किया।

31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि को रावी तट पर स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराया गया और इंकलाब के नारे गूंजे।

कांग्रेस कार्यसमिति ने 26 जनवरी 1930 को देश भर में पहला 'स्वाधीनता दिवस' मनाने का निर्देश दिया। (इसी दिन की स्मृति में ठीक 20 वर्ष बाद 26 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत का संविधान लागू किया गया)।

4.3 दांडी नमक सत्याग्रह (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930)

पूर्ण स्वराज की प्राप्ति हेतु गांधीजी ने एक अत्यंत साधारण किंतु चमत्कारी प्रतीक चुना: नमक।

नमक अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम सभी की प्राथमिक आवश्यकता था। अंग्रेजों ने इस पर भारी कर लगा रखा था और समुद्रतट पर प्राकृतिक नमक बनाने पर रोक थी। यह कर औपनिवेशिक लूट का सबसे घिनौना रूप था।

12 मार्च 1930 को 78 सत्याग्रहियों के साथ 61 वर्षीय गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी के लिए 240 मील लंबी ऐतिहासिक पदयात्रा शुरू की। 24 दिनों तक वे जनता को जगाते रहे।

6 अप्रैल 1930 को प्रातः समुद्र स्नान के बाद गांधीजी ने नमक उठाकर औपचारिक रूप से नमक कानून तोड़ा और कहा:

"इसके साथ ही मैं ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला रहा हूं।"

इसके साथ ही देशव्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ हो गया। लाखों लोगों ने नमक बनाया, विदेशी माल का बहिष्कार किया और कर देने से मना कर दिया।

4.4 आंदोलन का अखिल भारतीय विस्तार: पेशावर, धरसाना व मेदिनीपुर

सविनय अवज्ञा आंदोलन ने देश के कोने-कोने में अभूतपूर्व अलख जगाई:

  • उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत: खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) ने 'खुदाई खिदमतगार' (लाल कुर्ती दल) के साथ अहिंसक आंदोलन छेड़ा। पेशावर में निहत्थे पठानों पर गोली चलाने का आदेश मिलने पर गढ़वाल राइफल्स के हिंदू सैनिकों ने मुस्लिम भाइयों पर गोली चलाने से साफ मना कर दिया।
  • धरसाना नमक डिपो (गुजरात): 21 मई 1930 को सरोजिनी नायडू और इमाम साहब के नेतृत्व में 2,500 सत्याग्रहियों ने शांतिपूर्ण मार्च किया। पुलिस के नृशंस लाठीचार्ज के बावजूद किसी ने हाथ तक नहीं उठाया, जिसकी रिपोर्ट ने वैश्विक अंतरात्मा को झकझोर दिया।
  • बंगाल: मेदिनीपुर (कांथी, तमलुक) में महिलाओं और किसानों ने बड़े पैमाने पर नमक बनाया और चौकीदारी कर बंद किया।
  • नगालैंड: मात्र 13 वर्ष की नगा वीरांगना रानी गाइदिनल्यू ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया।

गांधी, नेहरू सहित 90,000 से अधिक सत्याग्रहियों को जेल में डाल दिया गया।

4.5 गोलमेज सम्मेलन, पूना पैक्ट (1932) एवं 1935 का अधिनियम

गतिरोध समाप्त करने हेतु 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता हुआ और कांग्रेस दूसरे गोलमेज सम्मेलन (1931) में शामिल हुई। किंतु अंग्रेजों की फूट डालो नीति के कारण वार्ता विफल रही।

अगस्त 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री मैक्डोनाल्ड ने 'साम्प्रदायिक पंचाट' (Communal Award) घोषित कर दलितों को पृथक निर्वाचन देकर हिंदू समाज को बांटने की चाल चली। यरवदा जेल में गांधीजी ने इसके विरुद्ध आमरण अनशन शुरू किया।

अंततः 24 सितंबर 1932 को गांधीजी और डॉ. बी. आर. आंबेडकर के बीच ऐतिहासिक पूना पैक्ट हुआ। पृथक निर्वाचन रद्द कर संयुक्त निर्वाचन के तहत प्रांतीय विधानसभाओं में दलितों की आरक्षित सीटें 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गईं। बाद में 1935 के भारत शासन अधिनियम के तहत 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने 7 प्रांतों में सरकार बनाई।

मॉड्यूल 5: अंतिम प्रहार: भारत छोड़ो आंदोलन, ताम्रलिप्त जातीय सरकार, नेताजी व आजाद हिंद फौज (1942–1946)

5.1 द्वितीय विश्वयुद्ध एवं वैचारिक मतभेद: सुभाष चंद्र बोस व फॉरवर्ड ब्लॉक

सितंबर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ते ही बिना भारतीय नेताओं की सहमति के भारत को युद्ध में झोंक दिया गया। विरोध में कांग्रेस के सभी प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया।

कांग्रेस के भीतर गंभीर मतभेद उभरे। सुभाष चंद्र बोस हरिपुरा (1938) और त्रिपुरी (1939) में गांधीजी के उम्मीदवार को हराकर अध्यक्ष बने थे। वे युद्ध का लाभ उठाकर अंग्रेजों को आजादी का अल्टीमेटम देना चाहते थे।

गांधीजी के समर्थकों के असहयोग के कारण उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और 3 मई 1939 को कांग्रेस के भीतर ही साम्राज्यवाद-विरोधी फॉरवर्ड ब्लॉक (Forward Bloc) का गठन किया।

मार्च 1942 में जापानी खतरे के बीच युद्ध में भारतीयों का सहयोग पाने हेतु क्रिप्स मिशन आया। युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस के खोखले वादे पर गांधीजी ने इसे 'दिवालिया बैंक पर भविष्य की तारीख का चेक' कहकर खारिज कर दिया।

5.2 भारत छोड़ो आंदोलन (अगस्त 1942): 'करो या मरो' का महामंत्र

क्रिप्स की विफलता के बाद 8 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान में कांग्रेस ने ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित किया।

महात्मा गांधी ने देश को अपने जीवन का सबसे ओजस्वी मंत्र दिया:

"मैं आपको एक छोटा सा मंत्र देता हूं, जिसे अपने हृदय में अंकित कर लें। वह मंत्र है: 'करो या मरो' (Do or Die)। हम या तो भारत को आजाद कराएंगे या इस प्रयास में अपने प्राण दे देंगे।"

9 अगस्त 1942 की सुबह अंग्रेजों ने 'ऑपरेशन जीरो ऑवर' चलाकर गांधी, नेहरू, पटेल सहित सभी बड़े नेताओं को बंदी बना लिया।

शीर्ष नेताओं के न रहने पर यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त नेतृत्वहीन जनक्रांति में बदल गया। अरुणा आसफ अली, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और उषा मेहता ने गुप्त रेडियो व भूमिगत रहकर नेतृत्व किया। रेल पटरियां उखाड़ दी गईं और सरकारी भवन फूंक दिए गए।

5.3 मेदिनीपुर की ताम्रलिप्त जातीय सरकार एवं मातंगिनी हाजरा का बलिदान

भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे स्वर्णिम अध्याय पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर (तमलुक) में लिखा गया, जहां 17 दिसंबर 1942 को समानांतर ताम्रलिप्त जातीय सरकार की स्थापना हुई।

सतीश चंद्र सामंत के नेतृत्व में इस सरकार ने अपनी रक्षा सेना 'विद्युत वाहिनी' और महिला दस्ता 'भगिनी सेना' बनाई। जनअदालतें स्थापित हुईं और 1943 के अकाल में जमाखोरों का अनाज गरीबों में बांटा गया। यह स्वतंत्र शासन सितंबर 1944 तक लगभग दो वर्ष चला।

इस आंदोलन की अमर वीरांगना थीं 73 वर्षीया विधवा वृद्धा मातंगिनी हाजरा, जिन्हें लोग 'गांधीबुड़ी' कहते थे। 29 सितंबर 1942 को तमलुक थाने की ओर बढ़ रहे 6,000 ग्रामीणों के जुलूस पर पुलिस ने गोलियां चलाईं।

दोनों हाथों में गोलियां लगने पर भी उन्होंने तिरंगे झंडे को गिरने नहीं दिया। माथे पर तीसरी गोली लगने से गिरने के अंतिम क्षण तक वे 'वंदे मातरम्' का उद्घोष करती रहीं। महाराष्ट्र के सतारा में नाना पाटिल की 'प्रति सरकार' और बलिया में चित्तू पांडेय की समानांतर सरकार बनी।

5.4 नेताजी सुभाष चंद्र बोस एवं आजाद हिंद फौज (INA): 'दिल्ली चलो'

कलकत्ता के एल्गिन रोड स्थित आवास में नजरबंद नेताजी 16-17 जनवरी 1941 की रात वेश बदलकर ऐतिहासिक 'महानिष्क्रमण' कर पेशावर, काबुल, मॉस्को होते हुए बर्लिन पहुंचे।

90 दिनों की जोखिम भरी पनडुब्बी यात्रा कर जुलाई 1943 में सिंगापुर पहुंचकर उन्होंने रासबिहारी बोस से आजाद हिंद फौज (INA) की कमान संभाली।

21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में 'आरजी हुकूमत-ए-आजाद हिंद' (स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार) का गठन किया। उन्होंने देश को 'जय हिंद' का अभिवादन और 'दिल्ली चलो' का नारा दिया तथा बर्मा में हुंकार भरी:

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा!"

आजाद हिंद फौज की ऐतिहासिक उपलब्धियां

  • एशिया की प्रथम महिला लड़ाकू सैन्य टुकड़ी: कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में 'झांसी की रानी रेजिमेंट'।
  • अंडमान और निकोबार द्वीपों को जापानी कब्जे से मुक्त कर उनका नाम 'शहीद' और 'स्वराज' द्वीप रखा।
  • 1944 में मणिपुर के मोइरांग में आजाद भारत की धरती पर पहली बार तिरंगा फहराया।

मौसम की मार और रसद कटने से कोहिमा-इंफाल मोर्चे से लौटना पड़ा, किंतु INA ने भारतीय सैनिकों और जनता के भीतर से ब्रिटिश राज का खौफ हमेशा के लिए मिटा दिया।

5.5 लाल किला मुकदमा, नौसेना विद्रोह (1946) एवं अंतिम स्वाधीनता

युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1945 के अंत में दिल्ली के लाल किले में आजाद हिंद फौज के अधिकारियों पर मुकदमा चलाया: कर्नल प्रेम सहगल (हिंदू), कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों (सिख) और मेजर जनरल शाहनवाज खान (मुस्लिम)।

तीनों धर्मों के अफसरों के संयुक्त मुकदमे ने पूरे देश में एकता की ज्वाला भड़का दी। भूलाभाई देसाई, तेज बहादुर सप्रू और जवाहरलाल नेहरू ने अदालत में पैरवी की। 12 फरवरी 1946 को कोलकाता में 'रशीद अली दिवस' पर हिंदू-मुस्लिम छात्रों ने साझा बलिदान दिया।

साम्राज्यवाद के ताबूत में अंतिम कील ठोकी 18 फरवरी 1946 को बंबई के नौसेना जहाज 'HMIS तलवार' पर भड़के शाही नौसेना विद्रोह ने। 20,000 नौसैनिकों ने 78 जहाजों पर तिरंगा, चांद-तारा और लाल झंडा एक साथ फहरा दिया।

भारतीय सेना और नौसेना की बगावत ने अंग्रेजों को समझा दिया कि अब भारत पर राज करना असंभव है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने कैबिनेट मिशन भेजा और अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत ने अपनी अमर स्वाधीनता प्राप्त की।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक समयरेखा एवं प्रमुख पड़ाव (1915–1947)
$$1915 गांधी आगमन ⇒ 1929 पूर्ण स्वराज ⇒ 1942 करो या मरो ⇒ 1947 आजादी$$
वर्षऐतिहासिक घटनासंवैधानिक व राजनीतिक महत्व
1915गांधीजी का भारत आगमनसत्याग्रह दर्शन का आगमन; गोखले के परामर्श पर देशव्यापी भ्रमण।
1917चंपारण नील सत्याग्रहभारत में पहली सविनय अवज्ञा की विजय; तीनकठिया प्रथा का उन्मूलन।
1918अहमदाबाद व खेड़ा आंदोलनपहला अनशन (35% मजदूरी वृद्धि) और खेड़ा में किसानों की लगान-मुक्ति।
1919रौलट एक्ट व जलियांवाला बाग1,000+ निहत्थों का नरसंहार; रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा 'नाइटहुड' त्याग।
1920–22असहयोग व खिलाफत आंदोलनपहला सर्वभारतीय जनआंदोलन; विदेशी वस्त्र, स्कूल व अदालतों का बहिष्कार।
1922चौरीचौरा कांड व स्थगनथाना दहन में 22 पुलिसकर्मी मृत; अहिंसा के सिद्धांत पर आंदोलन वापस।
1923स्वराज पार्टी व बंगाल पैक्टसी.आर. दास व मोतीलाल नेहरू द्वारा परिषदों में गतिरोध; हिंदू-मुस्लिम एकता।
1925काकोरी ट्रेन कार्रवाईHRA द्वारा सरकारी खजाने की डकैती; बिस्मिल व अशफाकउल्ला का बलिदान।
1928साइमन कमीशन व नेहरू रिपोर्टलाला लाजपत राय का बलिदान; मोतीलाल नेहरू द्वारा प्रथम संविधान मसौदा।
1929असेंबली बम व लाहौर कांग्रेसभगत सिंह व दत्त द्वारा बम विस्फोट; लाहौर में 'पूर्ण स्वराज' का संकल्प।
1930दांडी यात्रा व चटगांव शस्त्रागारनमक कानून तोड़ा; मास्टरदा सूर्य सेन द्वारा अंतरिम क्रांतिकारी सरकार।
1931गांधी-इरविन पैक्ट व शहादत23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी; दूसरा गोलमेज सम्मेलन।
1932पूना पैक्टगांधीजी व आंबेडकर के बीच संयुक्त निर्वाचन में दलितों को 148 आरक्षित सीटें।
1939फॉरवर्ड ब्लॉक का गठनकांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़कर सुभाष चंद्र बोस द्वारा वामपंथी मोर्चे का निर्माण।
1942भारत छोड़ो व ताम्रलिप्त सरकार'करो या मरो' आह्वान; मातंगिनी हाजरा का बलिदान व मेदिनीपुर में समानांतर सरकार।
1943–45आजाद हिंद फौज (INA)नेताजी का 'दिल्ली चलो' सैन्य अभियान; झांसी रानी वाहिनी व सीमांत युद्ध।
1945–46लाल किला मुकदमा व नौसेना विद्रोहINA मुकदमे पर देशव्यापी उबाल; तलवार जहाज पर 20,000 नौसैनिकों का विद्रोह।
1947भारत की स्वतंत्रता15 अगस्त को 200 वर्षों के ब्रिटिश औपनिवेशिक राज का सदा के लिए अंत।
गांधीवादी सत्याग्रह का त्रिपक्षीय मूल सिद्धांत
$$नैतिक आत्मबल (Moral Soul-Force) साम्राज्यवादी सैन्य पाशविक बल (Brute Force)$$
अहिंसा दुर्बलता नहीं बल्कि सर्वोच्च नैतिक पराक्रम है जो बड़े से बड़े साम्राज्य को झुका सकता है।
तीन प्रमुख गांधीवादी जनआंदोलनों की तुलनात्मक तालिका
$$व्यवस्था बहिष्कार ⇒ कानूनों का उल्लंघन ⇒ संपूर्ण मुक्ति ('करो या मरो')$$
मापदंडअसहयोग आंदोलन (1920–22)सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34)भारत छोड़ो आंदोलन (1942–44)
मूल लक्ष्य1 वर्ष में स्वराज व पंजाब-खिलाफत निवारणपूर्ण स्वराज (संपूर्ण स्वाधीनता)ब्रिटिश शासन की तत्काल विदाई ('भारत छोड़ो')
मुख्य विधिविदेशी वस्त्र, स्कूल, अदालतों का बहिष्कारविशिष्ट औपनिवेशिक कानूनों (नमक, वन, टैक्स) की अवज्ञासामूहिक हड़ताल, समानांतर सरकारें, स्वतःस्फूर्त क्रांति
नेतृत्व का स्वरूपपूरी तरह गांधीजी केंद्रित व अनुशासितगांधीजी केंद्रित किंतु क्षेत्रीय पहल मजबूतशीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बाद स्वतःस्फूर्त जनक्रांति
महिलाओं की भूमिकाचरखा कातना, पिकेटिंग व खादी प्रचारविशाल प्रदर्शन, नमक बनाना, धरसाना सत्याग्रहसशस्त्र संघर्ष, गुप्त रेडियो, मातंगिनी हाजरा का बलिदान
ब्रिटिश प्रतिक्रियासामूहिक गिरफ्तारियां (~30,000 बंदी)लाठीचार्ज, अध्यादेश (~90,000 बंदी)मशीनगन व हवाई जहाजों से गोलीबारी, सामूहिक जुर्माने
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की दो प्रमुख धाराओं का तुलनात्मक प्रारूप
$$भगत सिंह व चंद्रशेखर आजाद ⇔ मास्टरदा सूर्य सेन व प्रीतिलता$$
उत्तर भारत ने वैचारिक समाजवाद और असेंबली में प्रचार पर बल दिया, जबकि बंगाल ने चटगांव में प्रत्यक्ष सैन्य छापामार युद्ध छेड़ा।
स्वराज पार्टी की विधायी अवरोध रणनीति (1923–1926)
$$देशबंधु सी.आर. दास + मोतीलाल नेहरू ⇒ विधानसभा में ब्रिटिश हुकूमत पंगु$$
बंगाल पैक्ट (1923) ने दिखाया कि हिंदू-मुस्लिम एकता ही राष्ट्रीय मुक्ति का सच्चा आधार है।
ताम्रलिप्त जातीय सरकार का समानांतर प्रशासनिक ढांचा (1942–1944)
$$तमलुक महाकुमा, मेदिनीपुर ⇒ 21 महीने तक स्वतंत्र राष्ट्रीय शासन$$
73 वर्षीया मातंगिनी हाजरा का गोलियां खाकर भी तिरंगा ऊंचा रखने का बलिदान इसका अमर प्रतीक बना।
आजाद हिंद फौज (INA) का सैन्य एवं कूटनीतिक व्यूह (1943–1945)
$$'दिल्ली चलो' + 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' ⇒ 'जय हिंद'$$
लाल किले के मुकदमे ने ब्रिटिश सेना में विद्रोह की चिंगारी सुलगाकर 1946 के नौसेना विद्रोह को जन्म दिया।
संवैधानिक मांगों का क्रमिक विकास (1885–1947)
$$याचिकाएं ⇒ बहिष्कार व खादी ⇒ सविनय अवज्ञा ⇒ संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य (1947)$$
1929 के लाहौर अधिवेशन का 'पूर्ण स्वराज' संकल्प ही स्वतंत्र भारत के संविधान का मूल प्रेरणास्रोत बना।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
1917 के चंपारण सत्याग्रह को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में गांधीजी की पहली सफल परीक्षा क्यों माना जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

कृषि पृष्ठभूमि: चंपारण के किसानों को तीनकठिया प्रथा के तहत जमीन के 3/20 भाग पर नील की खेती करनी पड़ती थी और कृत्रिम नील आने पर नीलहे भारी अवैध कर वसूल रहे थे।

सविनय अवज्ञा: मजिस्ट्रेट के जिला छोड़ने के आदेश को नकारते हुए गांधीजी ने अंतरात्मा के उच्चतर कानून का पालन करने की बात कही, जो भारत में पहली सविनय अवज्ञा थी।

किसानों का भयमुक्त होना: हजारों गरीब किसानों ने गांधीजी के समर्थन में एकत्र होकर गोरे नीलहों के विरुद्ध निर्भीकता से गवाही दी और उनका दशकों पुराना खौफ समाप्त हो गया।

ठोस परिणाम: सरकारी जांच आयोग द्वारा तीनकठिया प्रथा को कानूनन समाप्त किया गया और अवैध वसूली का 25% किसानों को वापस मिला।

उदाहरण 2
जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा वायसराय को लिखे पत्र और नाइटहुड उपाधि त्यागने का क्या महत्व था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

बर्बरता का संदर्भ: 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने 1,000 से अधिक निहत्थे नागरिकों को गोलियों से भून दिया।

प्रतिरोध का स्वर: 31 मई 1919 को टैगोर ने वायसराय को पत्र लिखकर कहा कि अपमान के इस दौर में सम्मान के तमगे हमारी लज्जा को और उजागर करते हैं।

जनता के साथ एकात्मता: उन्होंने सारे राजकीय सम्मान त्यागकर अपने पीड़ित व शोषित देशवासियों के साथ निहत्थे खड़े होने का चुनाव किया।

वैश्विक प्रभाव: एशिया के पहले नोबेल विजेता के इस ऐतिहासिक कदम ने ब्रिटिश हुकूमत के 'सभ्य शासन' के पाखंड को दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया।

उदाहरण 3
1922 में चौरीचौरा कांड के बाद देशव्यापी असंतोष के बावजूद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस क्यों लिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

हिंसक घटना: 4 फरवरी 1922 को चौरीचौरा में आक्रोशित भीड़ ने थाने में आग लगाकर 22 पुलिसकर्मियों को जिंदा जला दिया।

सत्याग्रह का मूल सिद्धांत: गांधीजी के लिए अहिंसा कोई राजनीतिक हथकंडा नहीं बल्कि अटूट आध्यात्मिक व्रत था। हिंसा से मिली आजादी सच्चे स्वराज का आधार नहीं हो सकती।

सरकारी दमन की आशंका: गांधीजी ने भांप लिया था कि आंदोलन के हिंसक होते ही सरकार को सेना उतारकर निहत्थी जनता का बेरहमी से कत्लेआम करने का बहाना मिल जाएगा।

बारदोली का निर्णय: अपनी लोकप्रियता दांव पर लगाकर 12 फरवरी को आंदोलन वापस लेकर उन्होंने आंदोलन की नैतिक पवित्रता और दीर्घकालिक संगठन को बचाया।

उदाहरण 4
देशबंधु चित्तरंजन दास का 1923 का बंगाल पैक्ट औपनिवेशिक भारत में साम्प्रदायिक सद्भाव का अनुपम मॉडल कैसे बना?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

आंदोलन-उपरांत संकट: असहयोग स्थगन और खिलाफत समाप्ति के बाद कई प्रांतों में हिंदू-मुस्लिम तनाव उभरने लगा था।

चित्तरंजन दास की दूरदर्शिता: देशबंधु ने स्पष्ट समझा कि बंगाल की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी के विश्वास और साझीदारी के बिना आजादी की लड़ाई अधूरी रहेगी।

पैक्ट की मुख्य शर्तें: स्वराज मिलने पर मुसलमानों को आबादी के अनुपात में 55% सरकारी नौकरियां और 60% स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व देने का वादा किया गया।

ऐतिहासिक महत्व: यद्यपि अखिल भारतीय कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया, किंतु जब तक देशबंधु जीवित रहे (1925), बंगाल में अभूतपूर्व साम्प्रदायिक एकता बनी रही।

उदाहरण 5
मास्टरदा सूर्य सेन के नेतृत्व में चटगांव शस्त्रागार छापा भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का सबसे संगठित अभियान क्यों माना जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

सुव्यवस्थित योजना: 18 अप्रैल 1930 की रात 65 क्रांतिकारियों ने पुलिस लाइन और ऑक्सिलियरी फोर्स के दो मुख्य शस्त्रागारों पर एक साथ धावा बोला।

संचार व संपर्क विच्छेद: क्रांतिकारियों ने टेलीफोन-टेलीग्राफ के तार काटे और रेल पटरी उखाड़कर चटगांव को पूरे भारत से कई दिनों तक पूरी तरह काट दिया।

क्रांतिकारी सरकार की घोषणा: शस्त्रागार परिसर में राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर मास्टरदा ने स्वतंत्र अंतरिम क्रांतिकारी सरकार की घोषणा की।

जालालाबाद का युद्ध: 22 अप्रैल को जालालाबाद पहाड़ी पर मशीनगनों से लैस ब्रिटिश फौज के सामने 12 क्रांतिकारियों ने बहादुरी से लड़ते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।

उदाहरण 6
1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत के लिए महात्मा गांधी ने नमक कर को ही मुख्य आधार क्यों बनाया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

सर्वव्यापी आवश्यकता: नमक अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम, हर जाति व वर्ग के भोजन का दैनिक और अनिवार्य घटक है।

औपनिवेशिक क्रूरता का प्रतीक: प्रकृति द्वारा मुफ्त दिए गए समुद्रजल से नमक बनाने पर रोक और उस पर भारी कर ब्रिटिश शासन के अमानवीय लालच का नंगा प्रमाण था।

प्रतीकात्मक शक्ति: साबरमती से दांडी तक 240 मील की पदयात्रा ने वैश्विक मीडिया में प्रतिदिन आंदोलन को प्रचारित कर महाकाव्य का रूप दे दिया।

सहज जन-भागीदारी: नमक बनाने के लिए किसी हथियार की जरूरत नहीं थी; साधारण गृहिणी और किसान भी बर्तन में समुद्रजल उबालकर सत्याग्रही बन सकते थे।

उदाहरण 7
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में मेदिनीपुर की मातंगिनी हाजरा का बलिदान जनक्रांति का सर्वोच्च प्रतीक कैसे बना?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मेदिनीपुर की पृष्ठभूमि: 1942 के आंदोलन में मेदिनीपुर की जनता ने अपनी स्वतंत्र ताम्रलिप्त जातीय सरकार और विद्युत वाहिनी बनाई।

जुलूस का नेतृत्व: 29 सितंबर 1942 को तमलुक थाने की ओर बढ़ रहे 6,000 ग्रामीणों के निहत्थे जुलूस का नेतृत्व 73 वर्षीया विधवा मातंगिनी हाजरा ने किया।

अडिग देशभक्ति: पुलिस की पहली गोली बाएं हाथ और दूसरी गोली दाएं हाथ में लगी, फिर भी उन्होंने तिरंगे को झुकने या गिरने नहीं दिया।

अमर शहादत: माथे पर तीसरी गोली लगने से गिरने के अंतिम क्षण तक वे 'वंदे मातरम्' पुकारती रहीं, जिससे वे इतिहास में 'गांधीबुड़ी' के नाम से अमर हो गईं।

उदाहरण 8
नेताजी की आजाद हिंद फौज और 1946 के नौसेना विद्रोह ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर कैसे विवश किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

औपनिवेशिक शासन की सैन्य नींव: अंग्रेज लगभग 200 वर्षों से भारतीय सैनिकों की बंदूकों और वफादारी के दम पर ही भारत पर शासन कर रहे थे।

INA का मनोवैज्ञानिक आघात: नेताजी की फौज ने साबित कर दिया कि भारतीय सैनिक देश की मुक्ति के लिए ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध हथियार उठा सकते हैं।

लाल किला मुकदमे का असर: सहगल, ढिल्लों और शाहनवाज के मुकदमे ने पूरे देश और भारतीय सेना को देशभक्ति की भावना से भर दिया।

नौसेना विद्रोह का अंतिम वार: 18 फरवरी 1946 को बंबई में तलवार जहाज पर 20,000 नौसैनिकों के विद्रोह ने साफ कर दिया कि सेना अब अंग्रेजों के हाथ में नहीं है, जिससे अंग्रेजों का जाना तय हो गया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

असहयोग आंदोलन (1920) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) के उद्देश्यों में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

असहयोग आंदोलन (1920–22) में ब्रिटिश संस्थानों (स्कूल, अदालत, चुनाव, विदेशी वस्त्र) का बहिष्कार था। सविनय अवज्ञा (1930–34) में जानबूझकर ब्रिटिश के अन्यायी कानूनों (नमक कानून, वन कानून, टैक्स) को तोड़ा गया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

चौरीचौरा (1922) और चंपारण (1917) के स्थान व घटनाओं को एक समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चंपारण बिहार में है, जहां 1917 में नील की तीनकठिया प्रथा के विरुद्ध गांधीजी ने सत्याग्रह किया। चौरीचौरा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में है, जहां 1922 में थाने में आग लगने से 22 सिपाही मरे और आंदोलन रुका।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

1920 के 'स्वराज' और 1929 के 'पूर्ण स्वराज' के अंतर को न समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

1920 में स्वराज का अर्थ ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन (डोमिनियन स्टेटस) था। 1929 के लाहौर अधिवेशन में पहली बार औपनिवेशिक संबंध तोड़कर 'पूर्ण स्वराज' (संपूर्ण आजादी) को कांग्रेस का ध्येय बनाया गया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

स्वराज पार्टी (1923) और फॉरवर्ड ब्लॉक (1939) के संस्थापकों में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

स्वराज पार्टी की स्थापना 1923 में देशबंधु चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने की थी। फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना 1939 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद वामपंथी एकता हेतु की थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि पूना पैक्ट (1932) से दलितों को पृथक निर्वाचन मिला था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मैक्डोनाल्ड के साम्प्रदायिक पंचाट ने पृथक निर्वाचन दिया था, जिसके विरोध में गांधीजी ने अनशन किया। गांधी और आंबेडकर के बीच हुए पूना पैक्ट से पृथक निर्वाचन रद्द हुआ और संयुक्त निर्वाचन में सीटें 71 से बढ़ाकर 148 की गईं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

क्रांतिकारी देशभक्तों को औपनिवेशिक भाषा में 'आतंकवादी' लिखना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पश्चिम बंगाल बोर्ड औपनिवेशिक शब्द 'आतंकवाद' को पूरी तरह नकारता है। उन्हें आदरपूर्वक 'क्रांतिकारी राष्ट्रवादी' या 'क्रांतिकारी देशभक्त' लिखना अनिवार्य है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ही आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आजाद हिंद फौज की प्रारंभिक स्थापना 1942 में कैप्टन मोहन सिंह और रासबिहारी बोस ने की थी। नेताजी ने जुलाई 1943 में सिंगापुर पहुंचकर इसकी कमान संभाली और इसे अद्वितीय सैन्य शक्ति में ढाला।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श एवं विकास (1915–1947) – अवधारणात्मक समयरेखा

पश्चिम बंगाल बोर्ड • कक्षा 8 इतिहास • अध्याय 7 संकल्पना मानचित्र भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श एवं विकास (1915–1947) অতীত ও ঐতিহ্য प्रथम चरण (1915–19) गांधीवादी अभ्युदय सत्याग्रह एवं आरंभिक जागृति सत्याग्रह के आदर्श • सत्य एवं अहिंसा की आत्मिक शक्ति • अन्याय का निर्भीक नैतिक प्रतिरोध आरंभिक सत्याग्रह • 1917: चंपारण तीनकठिया प्रथा • 1918: अहमदाबाद मिल हड़ताल • 1918: खेड़ा किसान कर-मुक्ति औपनिवेशिक दमन • 1919: रौलट काला कानून • 'ना दलील, ना वकील, ना अपील' • 6 अप्रैल अखिल भारतीय हड़ताल जलियांवाला बाग (1919) 13 अप्रैल अमृतसर में जनरल डायर द्वारा भीषण क्रूर नरसंहार; विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने 'नाइटहुड' उपाधि का त्याग किया। द्वितीय चरण (1920–29) जनआंदोलन की लहर असहयोग से पूर्ण स्वराज असहयोग आंदोलन • खिलाफत व कांग्रेस का साझा मंच • विदेशी वस्त्र व अदालतों का त्याग चौरीचौरा व स्थगन • 4 फरवरी 1922: पुलिस थाना दहन • गांधीजी द्वारा आंदोलन की वापसी • कांग्रेस के भीतर भारी बहस स्वराज पार्टी व बंगाल • 1923: देशबंधु चित्तरंजन दास • विधान परिषदों में आंतरिक विरोध • ऐतिहासिक बंगाल पैक्ट (1923) 1929: पूर्ण स्वराज संकल्प साइमन कमीशन का बहिष्कार; लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता का लक्ष्य एवं 26 जनवरी 1930 को प्रथम स्वतंत्रता दिवस घोषित। तृतीय चरण (1930–39) प्रतिरोध एवं बलिदान नमक सत्याग्रह व क्रांतिकारी ज्वाला दांडी नमक सत्याग्रह • 12 मार्च–6 अप्रैल 1930 दांडी यात्रा • अन्यायी नमक कानून का उल्लंघन क्रांतिकारी राष्ट्रवाद • मास्टरदा सूर्य सेन (चटगांव) • प्रीतिलता वदेदार व कल्पना दत्त • भगत सिंह व HSRA का सर्वोच्च त्याग गोलमेज व पूना पैक्ट • 1931: गांधी-इरविन समझौता • 1932: साम्प्रदायिक पंचाट • गांधी-आंबेडकर पूना पैक्ट 1935 कानून व वामपंथ 1937 चुनाव व कांग्रेस सरकारें; किसान सभाएं व मजदूर आंदोलन; सुभाष चंद्र बोस का अध्यक्ष चुनाव व 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक गठन। चतुर्थ चरण (1942–47) अंतिम प्रहार भारत छोड़ो एवं सशस्त्र मुक्ति भारत छोड़ो आंदोलन • 8 अगस्त 1942: 'करो या मरो' • स्वतःस्फूर्त देशव्यापी जनक्रांति ताम्रलिप्त जातीय सरकार • मेदिनीपुर में समानांतर सरकार • 73 वर्षीया मातंगिनी हाजरा का बलिदान • सतीश सामंत व विद्युत वाहिनी नेताजी व आजाद हिंद फौज • सिंगापुर 1943: 'दिल्ली चलो' • इंफाल-कोहिमा सैन्य मोर्चा • लाल किला मुकदमा व जनउभार 1946: नौसेना विद्रोह व आजादी कोलकाता में रशीद अली दिवस; तलवार जहाज पर नौसेना विद्रोह; ब्रिटिश राज का पतन एवं 1947 में भारत की अंतिम स्वाधीनता। 1915–19: सत्याग्रह 1920–29: जनआंदोलन 1930–39: सविनय अवज्ञा व क्रांति 1942–47: भारत छोड़ो व आजाद हिंद

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. दक्षिण अफ्रीका से लौटकर महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के नैतिक आत्मबल 'सत्याग्रह' के जरिए चंपारण (1917), अहमदाबाद व खेड़ा (1918) में प्रारंभिक संघर्ष जीते।
मुख्य बिंदु 2
  1. दमनकारी रौलट कानून (1919) और 13 अप्रैल के जलियांवाला बाग नरसंहार के विरोध में विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी 'नाइटहुड' उपाधि का त्याग किया।
मुख्य बिंदु 3
  1. पहला सर्वभारतीय जनआंदोलन असहयोग व खिलाफत (1920–22) था; चौरीचौरा हिंसा के बाद आंदोलन रुकने पर स्वराज पार्टी बनी और बंगाल पैक्ट हुआ।
मुख्य बिंदु 4
  1. क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के दूसरे दौर में भगत सिंह-चंद्रशेखर आजाद (HSRA) और मास्टरदा सूर्य सेन के चटगांव शस्त्रागार छापे तथा प्रीतिलता के बलिदान ने नई चेतना फूंकी।
मुख्य बिंदु 5
  1. 1929 के लाहौर कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 'पूर्ण स्वराज' घोषित हुआ और 1930 की दांडी यात्रा से सविनय अवज्ञा आंदोलन चला जो पूना पैक्ट (1932) में बदला।
मुख्य बिंदु 6
  1. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1939 में सुभाष चंद्र बोस ने फॉरवर्ड ब्लॉक बनाया और 1942 में गांधीजी के 'करो या मरो' मंत्र पर भारत छोड़ो आंदोलन स्वतःस्फूर्त जनक्रांति बना।
मुख्य बिंदु 7
  1. मेदिनीपुर के तमलुक में स्वतंत्र समानांतर ताम्रलिप्त जातीय सरकार बनी और तिरंगा ऊंचा रखते हुए 73 वर्षीया वीरांगना मातंगिनी हाजरा शहीद हुईं।
मुख्य बिंदु 8
  1. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) के सैन्य अभियान, लाल किला मुकदमा और 1946 के नौसेना विद्रोह ने ब्रिटिश साम्राज्य का अंत कर 15 अगस्त 1947 को आजादी दिलाई।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
सविनय अवज्ञा आंदोलन के आरंभ हेतु महात्मा गांधी ने नमक कर को ही मुख्य आधार क्यों बनाया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

गांधीजी द्वारा नमक को चुनना एक अनुपम रणनीतिक व मनोवैज्ञानिक कदम था:

  1. सार्वभौमिक अनिवार्यता: नमक अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम, हर जाति व वर्ग के भोजन का अनिवार्य घटक है, जो सभी को एक सूत्र में जोड़ता था।
  2. औपनिवेशिक शोषण का प्रतीक: प्रकृति द्वारा प्रदत्त मुफ्त समुद्रजल से नमक बनाने पर रोक और उस पर कर लगाना ब्रिटिश हुकूमत के क्रूर लालच का स्पष्ट प्रमाण था।
  3. सहज जन-भागीदारी: नमक बनाने के लिए किसी महंगे साधन या प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं थी; साधारण गृहिणी और किसान भी बर्तन में पानी उबालकर सीधे कानून तोड़ सकते थे।

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड कक्षा 8 इतिहास पाठ्यपुस्तक (अध्याय 7) का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न।
2
1929 के ऐतिहासिक लाहौर कांग्रेस अधिवेशन का क्या महत्व था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ 1929 का लाहौर अधिवेशन तीन कारणों से युगांतरकारी था:

  • पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव: डोमिनियन स्टेटस के पुराने समझौते को रद्द कर पहली बार 'पूर्ण स्वराज' (संपूर्ण आजादी) को कांग्रेस का एकमात्र लक्ष्य बनाया गया।
  • तिरंगा फहराना: 31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि को रावी नदी के तट पर स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया।
  • 26 जनवरी स्वाधीनता दिवस: 26 जनवरी 1930 को प्रथम स्वाधीनता दिवस घोषित किया गया, जिसकी स्मृति में 1950 में इसी दिन भारत का संविधान लागू हुआ।

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड कक्षा 8 इतिहास पाठ्यपुस्तक (अध्याय 7) का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न।
3
चटगांव शस्त्रागार छापे एवं क्रांतिकारी आंदोलन में बंगाल की महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका बताएं।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं ने हथियार उठाकर अभूतपूर्व पराक्रम दिखाया:

  • प्रीतिलता वद्देदार: 1932 में पहाड़तली यूरोपियन क्लब पर सशस्त्र आक्रमण का नेतृत्व किया। घायल होने पर अंग्रेजों के हाथ न आने के लिए साइनाइड खाकर पहली महिला क्रांतिकारी शहीद बनीं।
  • कल्पना दत्त: बम बनाने व हथियार लाने का कार्य किया, पुरुष वेश में मास्टरदा के साथ लड़ीं और आजीवन कारावास भोगा।
  • बीना दास: 1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में गवर्नर जैक्सन पर मंच से सीधी गोलियां चलाईं।
  • शांति घोष व सुनीति चौधरी: कोमिल्ला की दो किशोरियों ने 1931 में क्रूर मजिस्ट्रेट स्टीवंस को गोली मारकर मार गिराया।

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड कक्षा 8 इतिहास पाठ्यपुस्तक (अध्याय 7) का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न।
4
भारत छोड़ो आंदोलन में मेदिनीपुर की ताम्रलिप्त जातीय सरकार की उपलब्धियां एवं मातंगिनी हाजरा का बलिदान बताएं।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

17 दिसंबर 1942 को मेदिनीपुर के तमलुक में सतीश चंद्र सामंत के नेतृत्व में गठित ताम्रलिप्त जातीय सरकार स्वतंत्र समानांतर शासन थी:

  1. स्वतंत्र प्रशासन: ब्रिटिश शासन को बेदखल कर 21 महीने तक तमलुक में कानून-व्यवस्था व जनसुविधाएं स्वतंत्र रूप से संचालित कीं।
  2. विद्युत वाहिनी व भगिनी सेना: युवाओं की रक्षा सेना 'विद्युत वाहिनी' और महिलाओं की 'भगिनी सेना' गठित की गई।
  3. अकाल में राहत: 1943 के अकाल में जमाखोरों का अनाज जब्त कर भुखमरी के शिकार लोगों में मुफ्त बांटा।
  4. मातंगिनी हाजरा की शहादत: 29 सितंबर 1942 को तमलुक थाने के घेराव में 73 वर्षीया मातंगिनी हाजरा गोलियां खाकर भी तिरंगा थामे 'वंदे मातरम्' बोलते हुए शहीद हुईं।

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड कक्षा 8 इतिहास पाठ्यपुस्तक (अध्याय 7) का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न।
5
1946 के नौसेना विद्रोह ने अंग्रेजों के भारत छोड़ने के निर्णय को कैसे तीव्र किया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

18 फरवरी 1946 को बंबई में HMIS तलवार जहाज पर भड़के शाही नौसेना विद्रोह ने ब्रिटिश हुकूमत को हिला दिया:

  • सैन्य निष्ठा का टूटना: अंग्रेज भारतीय सैनिकों की बंदूक के बल पर राज करते थे। 20,000 नौसैनिकों द्वारा 78 युद्धपोत कब्जे में लेने से साफ हो गया कि भारतीय सेना अब हुकूमत के हुक्म पर देशवासियों पर गोली नहीं चलाएगी।
  • साम्प्रदायिक एकता: नौसैनिकों ने जहाजों पर तिरंगा, चांद-तारा और लाल झंडा एक साथ फहराकर औपनिवेशिक फूटनीति को ध्वस्त कर दिया।
  • तत्काल ब्रिटिश वापसी: विद्रोह के अगले ही दिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने सत्ता सौंपने हेतु कैबिनेट मिशन भेजने की घोषणा कर दी।

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड कक्षा 8 इतिहास पाठ्यपुस्तक (अध्याय 7) का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न।
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कक्षा 8 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: Concept of History अध्याय 2: Rise of Regional Powers अध्याय 3: Establishment of Colonial Authority अध्याय 4: औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप अध्याय 5: औपनिवेशिक शासन के प्रति प्रतिक्रिया: सहयोग और विद्रोह अध्याय 6: राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास अध्याय 7: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श और विकास अध्याय 8: सांप्रदायिकता से विभाजन अध्याय 9: भारतीय संविधान: लोकतांत्रिक ढांचा और नागरिकों के अधिकार अध्याय 10: पृथ्वी की आंतरिक संरचना अध्याय 11: अस्थिर पृथ्वी अध्याय 12: शैल (चट्टानें) अध्याय 13: वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार अध्याय 14: बादल और वर्षा अध्याय 15: जलवायु प्रदेश अध्याय 16: मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन अध्याय 17: भारत के कुछ पड़ोसी देश और उनके साथ संबंध अध्याय 18: उत्तर अमेरिका महाद्वीप अध्याय 19: दक्षिण अमेरिका महाद्वीप अध्याय 20: ओशिनिया महाद्वीप

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