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WBB • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 6
अनुमानित समय: 65 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 इतिहास (अतीत और विरासत) पाठ्यक्रम के अध्याय 6: 'भारत में राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास' के संपूर्ण अध्ययन गाइड में आपका स्वागत है। इस अध्याय में कांग्रेस-पूर्व सभा-समितियों (बंगभाषा प्रकाशिका सभा, जमींदारी सभा, हिंदू मेला, भारत सभा) से लेकर लॉर्ड लिटन की दमनकारी नीतियों, 1883 के इल्बर्ट बिल विवाद, 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना, उदारवादियों की 3-P नीति व धन निष्कासन सिद्धांत तथा 1905 के ऐतिहासिक स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन का गहन व प्रामाणिक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

क्षेत्रीय जमींदारों के निवेदनों और सभा-समितियों के सीमित दायरे से निकलकर भारतीय राष्ट्रीय चेतना कैसे एक शक्तिशाली अखिल भारतीय जनआंदोलन में बदली, जिसने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जन्म दिया और 1905 के ऐतिहासिक स्वदेशी आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की कक्षा 8 के इतिहास पाठ्यक्रम में 'राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास' अध्याय का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय दर्शाता है कि किस प्रकार क्षेत्रीय संस्थाओं, संवैधानिक याचिकाओं, धन निष्कासन सिद्धांत और स्वदेशी बहिष्कार आंदोलन ने मिलकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अविचल नींव रखी।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • प्लासी (1757) और बक्सर (1764) के युद्धों के बाद भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की स्थापना
  • 1857 के महाविद्रोह का प्रभाव और महारानी विक्टोरिया के घोषणापत्र (1858) द्वारा कंपनी शासन का अंत तथा ब्रिटिश ताज का प्रत्यक्ष शासन
  • 19वीं सदी में पश्चिमी अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार और शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय

इस अध्याय के लक्ष्य

  • कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक सभा-समितियों (1836–1884) की उत्पत्ति, स्वरूप और सीमाओं का विश्लेषण करना।
  • लॉर्ड लिटन की प्रतिक्रियावादी दमनकारी नीतियों और इल्बर्ट बिल विवाद (1883) के ऐतिहासिक महत्व तथा अखिल भारतीय राजनीतिक एकता की आवश्यकता को समझना।
  • 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना, इसके प्रथम बंबई अधिवेशन तथा 'सुरक्षा कपाट' (सेफ्टी वाल्व) बनाम 'तड़ित चालक' (लाइटनिंग कंडक्टर) सिद्धांतों का तुलनात्मक मूल्यांकन करना।
  • उदारवादियों की '3-P' नीति (प्रार्थना, याचिका व विरोध) और दादाभाई नौरोजी तथा रमेश चंद्र दत्त के 'धन निष्कासन सिद्धांत' (Drain of Wealth) की व्याख्या करना।
  • उग्रवादी धारा का उदय (लाल-बाल-पाल), लॉर्ड कर्जन द्वारा 1905 के बंगाल विभाजन का वास्तविक साम्राज्यवादी उद्देश्य, स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन, रक्षा बंधन तथा 1911 में विभाजन रद्द होने का मूल्यांकन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक...
2 मॉड्यूल 2: लॉर्ड लिटन की दमनकारी नी...
3 मॉड्यूल 3: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रे...
4 मॉड्यूल 4: उदारवादी दौर और आर्थिक र...
5 मॉड्यूल 5: उग्र राष्ट्रवाद का उदय औ...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक सभा-समितियां और राष्ट्रीय चेतना की जागृति (1836–1884)

1.1 संस्थागत राजनीति का प्रारंभ और बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836)

19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध भारतीयों के प्रतिरोध मुख्य रूप से स्थानीय, जनजातीय अथवा कृषक विद्रोहों तक सीमित थे। किंतु अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के साथ 19वीं सदी के चौथे दशक से आधुनिक संस्थागत राजनीति और सभा-समितियों के युग का सूत्रपात हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार अनिल शील ने 19वीं सदी के उत्तरार्ध को 'सभा-समितियों का युग' कहा है।

भारत की प्रथम राजनीतिक संस्था के रूप में मान्य बंगभाषा प्रकाशिका सभा की स्थापना दिसंबर 1836 में कलकत्ता में राजा राममोहन राय के सहयोगियों (गौरीशंकर तर्कवागीश, कालीनाथ रायचौधुरी, प्रसन्न कुमार ठाकुर तथा द्वारकानाथ ठाकुर) द्वारा की गई थी। सरकारी नीतियों और कानूनों पर विचार-विमर्श करने वाली यह भारत की पहली संस्था थी, जिसने निष्कर या धर्मार्थ देवोत्तर भूमियों पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा कर लगाने के आदेश के विरुद्ध संवैधानिक विरोध दर्ज कराया था। प्रख्यात इतिहासकार डॉ. योगेश चंद्र बागल ने इसे "बंगाल तथा भारत की प्रथम राजनीतिक संस्था" स्वीकार किया है।

1.2 जमींदारी सभा (1838) और बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843)

1838 में राजा राधाकांत देव और द्वारकानाथ ठाकुर के नेतृत्व में जमींदारी सभा (Landholders' Society) की स्थापना हुई। इसका मुख्य उद्देश्य लॉर्ड कॉर्नवालिस के स्थायी बंदोबस्त (1793) के अंतर्गत जमींदारों के विशेषाधिकारों की रक्षा करना था। यद्यपि यह उच्चवर्गीय भूस्वामियों का संगठन था, फिर भी संवैधानिक तरीकों से याचिकाएं भेजने और लंदन में जॉन क्रॉफर्ड को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर ब्रिटिश संसद तक अपनी बात पहुंचाने की परंपरा की शुरुआत इसी संस्था ने की।

जमींदारों के संकीर्ण हितों से अलग आम जनता की कठिनाइयों तथा ग्रामीण किसानों की समस्याओं को उठाने के उद्देश्य से यंग बंगाल समूह के प्यारीचंद मित्र, रामगोपाल घोष तथा ब्रिटिश समाजसुधारक जॉर्ज थॉम्पसन के प्रयासों से 1843 में बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी का गठन हुआ।

आगे चलकर इन दोनों संस्थाओं की सीमाओं को दूर करते हुए 29 अक्टूबर 1851 को ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की स्थापना की गई। राजा राधाकांत देव इसके अध्यक्ष तथा देवेंद्रनाथ ठाकुर सचिव बने। 1853 के चार्टर एक्ट से पूर्व इस संस्था ने ब्रिटिश संसद को एक व्यापक ज्ञापन भेजकर व्यवस्थापिका सभा में भारतीयों के प्रतिनिधित्व, कार्यपालिका व न्यायपालिका के पृथक्करण तथा नमक कर में कमी की मांग की थी।

1.3 हिंदू मेला (1867) और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उदय

राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक अधिकारों की मांग तक सीमित नहीं था; इसकी एक गहरी सांस्कृतिक, आर्थिक और शारीरिक आत्मनिर्भरता की नींव तैयार करना भी आवश्यक था। इसी उद्देश्य से 1867 में चैत्र संक्रांति के दिन कलकत्ता में हिंदू मेला (मूल नाम चैत्र मेला) का शुभारंभ हुआ।

राजनारायण बसु की प्रेरणा से नवगोपाल मित्र (जिन्हें जनता प्यार से 'नेशनल मित्र' कहती थी) और ठाकुर परिवार के गणेंद्रनाथ व द्विजेंद्रनाथ ठाकुर के सहयोग से यह वार्षिक मेला आयोजित होता था। इसके तीन प्रमुख उद्देश्य थे:

  • आत्मशक्ति और स्वदेशी उद्योग: मेले में देश में बने हथकरघा वस्त्रों, हस्तशिल्प, धातुशिल्प तथा कृषि उत्पादों की प्रदर्शनी लगाई जाती थी, जिसने आगे चलकर स्वदेशी आंदोलन की आधारशिला रखी।
  • शारीरिक सौष्ठव व वीरता का विकास: कुश्ती, लाठी-डंडा, तलवारबाजी और व्यायाम का प्रदर्शन कर अंग्रेजों के इस मिथक को तोड़ा गया कि भारतीय या बंगाली एक 'कायर और आलसी जाति' हैं।
  • देशभक्तिपूर्ण सांस्कृतिक जागरण: मेले में देशभक्ति कविताओं का पाठ और राष्ट्रीय गीतों का गायन होता था। सत्येंद्रनाथ ठाकुर का अमर गीत "मिले सबे भारत संतान, एकतान मनप्राण, गाओ भारतेर जय" इसी मंच से पूरे देश में गूंजा।
1.4 भारत सभा / इंडियन एसोसिएशन (1876): मध्यम वर्ग की अखिल भारतीय आवाज

ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन मुख्य रूप से जमींदारों का पक्षधर था, इसलिए नवोदित अंग्रेजी-शिक्षित मध्यम वर्ग (वकील, शिक्षक, डॉक्टर, पत्रकार) को अपने राजनीतिक मंच की कमी खल रही थी। इस ऐतिहासिक आवश्यकता की पूर्ति हेतु 26 जुलाई 1876 को कलकत्ता के अल्बर्ट हॉल में सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंदमोहन बोस के नेतृत्व में इंडियन एसोसिएशन (भारत सभा) की स्थापना हुई। शिवनाथ शास्त्री और द्वारकानाथ गांगुली भी इसके प्रमुख स्तंभ थे।

सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने भारत सभा के चार बुनियादी उद्देश्य घोषित किए:

  1. संपूर्ण भारत में एक शक्तिशाली व संगठित जनमत का निर्माण करना।
  2. साझे राजनीतिक हितों के आधार पर भारत के सभी वर्गों व जातियों को एकजुट करना।
  3. हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच अटूट भाईचारा व सद्भाव स्थापित करना।
  4. जनसाधारण को देश के राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय रूप से शामिल करना।

भारत सभा ने 1877–78 के सिविल सेवा आंदोलन, असम के चाय बागान मजदूरों पर अत्याचार विरोधी अभियान तथा 1883 के इल्बर्ट बिल आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाकर अखिल भारतीय स्तर पर राष्ट्रीय चेतना का नेतृत्व किया।

1.5 बंबई व मद्रास की संस्थाएं और राष्ट्रीय सम्मेलन (1883 व 1885)

बंगाल के समान ही देश के अन्य प्रांतों में भी महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्थाएं अस्तित्व में आईं:

  • पूना सार्वजनिक सभा (1870): महाराष्ट्र में महादेव गोविंद रानाडे और जी. वी. जोशी के नेतृत्व में बनी, जो सरकार और अकाल पीड़ित किसानों के बीच सेतु का कार्य करती थी।
  • मद्रास महाजन सभा (1884): एम. वीरराघवाचारियर और पी. आनंद चारलू के प्रयासों से दक्षिण भारत में राजनीतिक जनमत तैयार करने के लिए गठित हुई।
  • बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1885): फिरोजशाह मेहता, के. टी. तेलंग तथा बदरुद्दीन तैयबजी (जिन्हें 'बंबई की त्रयी' कहा जाता था) के नेतृत्व में स्थापित हुई।

इन तमाम प्रांतीय संस्थाओं को एक राष्ट्रीय सूत्र में पिरोने के लिए भारत सभा ने दिसंबर 1883 में कलकत्ता में प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन (National Conference) बुलाया। इसमें देश भर से 100 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए। इसके पश्चात 25–27 दिसंबर 1885 को कलकत्ता में दूसरा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। यह सम्मेलन वस्तुतः बंबई में स्थापित होने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रत्यक्ष पूर्वपीठिका और प्रेरणा साबित हुआ।

मॉड्यूल 2: लॉर्ड लिटन की दमनकारी नीतियां, सिविल सेवा आंदोलन और इल्बर्ट बिल विवाद (1877–1884)

2.1 भीषण अकाल के बीच 1877 का दिल्ली दरबार: साम्राज्यवादी फिजूलखर्ची

भारत के वायसराय लॉर्ड लिटन (1876–1880) का शासनकाल औपनिवेशिक अहंकार और घोर दमनकारी नीतियों का प्रतीक था। 1876 से 1878 के दौरान एक भयावह सूखे के कारण दक्षिण और मध्य भारत में भीषण अकाल पड़ा, जिसमें मद्रास, मैसूर, हैदराबाद और बंबई प्रेसीडेंसी के लगभग 60 से 80 लाख लोग भूख और महामारी से काल-कवलित हो गए।

जब चारों ओर लाशों के ढेर लगे थे, तब लॉर्ड लिटन ने महारानी विक्टोरिया को 'कैसर-ए-हिंद' (भारत की साम्राज्ञी) की उपाधि से विभूषित करने के लिए 1 जनवरी 1877 को दिल्ली में एक अत्यंत खर्चीला राजसी दरबार आयोजित किया। लाखों पाउंड की भारतीय राजस्व राशि को शामियानों, भोजों और सैन्य परेडों पर उड़ा दिया गया। कलकत्ता के अमृत बाजार पत्रिका ने इस पर तीखी टिप्पणी करते हुए लिखा: "जब रोम जल रहा था तो नीरो बांसुरी बजा रहा था; और जब भारत अकाल से तड़प रहा था, तब लिटन दिल्ली में दावतों में मस्त था।"

2.2 देशीय समाचार पत्र कानून / वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878)

अकाल से निपटने में सरकार की विफलता और द्वितीय अफगान युद्ध की बर्बादी पर भारतीय भाषाई समाचार पत्रों की निर्भीक आलोचना से बौखलाकर लॉर्ड लिटन ने मार्च 1878 में कुख्यात वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (जिसे 'गैगिंग एक्ट' या मुंह बंद करने वाला कानून कहा गया) पारित किया:

  • जिला मजिस्ट्रेटों को अधिकार दिया गया कि वे भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों के मुद्रकों से जमानत बांड भरवाएं कि वे सरकार विरोधी कोई सामग्री नहीं छापेंगे।
  • उल्लंघन की स्थिति में बिना किसी अदालती सुनवाई के सीधे छापाखाना और प्रेस जब्त करने का निरंकुश अधिकार दिया गया।
  • मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध किसी सामान्य अदालत में अपील करने का कोई अधिकार भारतीयों को नहीं था।
  • नस्लीय दोहरा मापदंड: यह कानून केवल देशीय (भारतीय) भाषाओं के पत्रों पर लागू होता था; अंग्रेजों द्वारा संचालित अंग्रेजी भाषा के अखबारों को इससे पूरी छूट दी गई थी।

इस दमनकारी कानून को निष्प्रभावी बनाने के लिए शिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष द्वारा संपादित प्रसिद्ध समाचार पत्र अमृत बाजार पत्रिका ने एक अभूतपूर्व युक्ति अपनाई। 21 मार्च 1878 को यह अखबार रातोंरात द्विभाषी (बांग्ला-अंग्रेजी) स्वरूप को बदलकर पूर्णतः अंग्रेजी भाषा के समाचार पत्र में तब्दील हो गया! फलस्वरूप यह कानून उस पर लागू नहीं हो सका और सरकार हक्की-बक्की रह गई।

2.3 भारतीय शस्त्र कानून (1878) और सिविल सेवा आयु विवाद (1877)

प्रेस की स्वतंत्रता छीनने के साथ-साथ लिटन ने 1878 का भारतीय शस्त्र कानून (Arms Act) पारित किया। इसके तहत बिना लाइसेंस के किसी भी भारतीय द्वारा हथियार रखना दंडनीय अपराध बना दिया गया। किंतु अंग्रेजों, यूरोपीय नागरिकों और एंग्लो-इंडियन को इस कानून से पूरी तरह मुक्त रखा गया, जिससे कानूनी रूप से भारतीयों को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया।

उसी दौरान 1877 में ब्रिटिश सरकार ने इंडियन सिविल सर्विस (ICS) परीक्षा में बैठने की अधिकतम आयु सीमा को 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दिया। यह परीक्षा केवल लंदन में होती थी और इसमें लैटिन, ग्रीक और अंग्रेजी का प्रभुत्व था। 19 वर्ष की अल्पायु में समुद्र पार जाकर ब्रिटिश छात्रों से मुकाबला करना भारतीय युवाओं के लिए लगभग असंभव था। ब्रिटिश हुकूमत की मंशा भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों से बाहर रखने की थी।

भारत सभा ने इसके विरोध में राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ दिया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने उत्तरी और पश्चिमी भारत (लाहौर, अमृतसर, दिल्ली, आगरा, पूना, बंबई) का तूफानी दौरा किया और विशाल जनसभाएं कर भारतीयों को एकजुट किया। यह आधुनिक भारतीय इतिहास का पहला अखिल भारतीय राजनीतिक जनसंपर्क अभियान था।

2.4 इल्बर्ट बिल विवाद (1883): श्वेतों का उग्र नस्लभेदी विद्रोह

लॉर्ड लिटन के बाद एक उदारवादी वायसराय लॉर्ड रिपन (1880–1884) भारत आए। उन्होंने न्याय व्यवस्था में मौजूद नस्लभेदी भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया। उस समय नियम यह था कि ग्रामीण या जिला स्तर पर कोई भी भारतीय न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट किसी यूरोपीय अपराधी पर मुकदमा नहीं चला सकता था; चाहे वह भारतीय जज कितना भी वरिष्ठ क्यों न हो।

लॉर्ड रिपन की परिषद के विधि सदस्य सर कोर्टनी पेरीग्रिन इल्बर्ट ने फरवरी 1883 में इस भेदभाव को समाप्त करने के लिए एक ऐतिहासिक विधेयक पेश किया, जिसे इल्बर्ट बिल कहा जाता है। इसमें भारतीय जिला न्यायाधीशों को यूरोपीय अपराधियों के मुकदमे सुनने का समान अधिकार देने का प्रस्ताव था।

इस बिल के आते ही कलकत्ता और असम के अंग्रेज चाय बागान मालिकों, व्यापारियों और नौकरशाहों ने अत्यंत उग्र नस्लवादी आंदोलन छेड़ दिया:

  • अंग्रेजों ने डेढ़ लाख रुपये से अधिक का चंदा एकत्र कर यूरोपियन एंड एंग्लो-इंडियन डिफेंस एसोसिएशन बनाई।
  • अंग्रेजी समाचार पत्र इंग्लिशमैन में भारतीय जजों और शिक्षित समाज के विरुद्ध अत्यंत अपमानजनक व नस्लभेदी लेख छापे गए।
  • वायसराय लॉर्ड रिपन का घेराव करने, उनका अपमान करने तथा उन्हें जबरन जहाज में बैठाकर इंग्लैंड भेज देने के गुप्त षड्यंत्र रचे गए।
2.5 समझौतावादी संशोधन और भारतीयों की ऐतिहासिक सीख

अंग्रेजों के इस हिंसक 'श्वेत विद्रोह' (White Mutiny) के आगे लॉर्ड रिपन को झुकना पड़ा। जनवरी 1884 में बिल में संशोधन कर एक समझौता किया गया: भारतीय जज यूरोपीय आरोपी का मुकदमा सुन सकते थे, परंतु आरोपी को यह अधिकार दिया गया कि वह कम से कम आधी (50%) श्वेत जूरी की मांग कर सकता था।

इल्बर्ट बिल की इस असफलता ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक ऐतिहासिक मोड़ दिया:

  1. अंग्रेजी न्याय के ढोंग का पर्दाफाश: भारतीयों को यह भलीभांति स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश शासन के 'कानून के समक्ष समानता' के दावे केवल दिखावा हैं; वास्तव में नस्लीय श्रेष्ठता ही औपनिवेशिक शासन की नींव है।
  2. संगठन की शक्ति का अहसास: मुट्ठी भर अंग्रेजों ने किस तरह संगठित होकर सरकार को अपनी बात मानने पर विवश कर दिया, यह देखकर भारतीयों ने संगठन का महत्व सीखा।
  3. अखिल भारतीय एकता की अनिवार्यता: सुरेंद्रनाथ बनर्जी और अन्य नेताओं ने अनुभव किया कि बिखरी हुई प्रांतीय सभाओं से साम्राज्यवादी सत्ता का मुकाबला नहीं हो सकता। अधिकारों की रक्षा के लिए एक स्थायी, संगठित और शक्तिशाली अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन का होना अनिवार्य है।

मॉड्यूल 3: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885): पृष्ठभूमि, सिद्धांत व महत्व

3.1 एलन ऑक्टेवियन ह्यूम और 1883 का ऐतिहासिक पत्र

इल्बर्ट बिल के राष्ट्रव्यापी असंतोष के बीच ब्रिटिश सरकार के एक अवकाशप्राप्त उच्चाधिकारी (पूर्व गृह सचिव) एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A.O. Hume) ने भारतीयों को एक अखिल भारतीय संस्था में संगठित करने का बीड़ा उठाया। 1 मार्च 1883 को ह्यूम ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों के नाम एक प्रेरक खुला पत्र लिखा:

"चाहे व्यक्ति हो या राष्ट्र, सारी वास्तविक उन्नति भीतर से ही आनी चाहिए... यदि पचास निष्ठावान और त्यागी व्यक्ति मिल जाएं, तो संस्था की स्थापना हो सकती है और आगे का कार्य आसान हो जाएगा... यदि आप देश के लिए त्याग नहीं कर सकते, तो आपको राजनीतिक रूप से पराधीन रहने पर शिकायत करने का कोई हक नहीं है।"

ह्यूम ने बंबई, मद्रास और कलकत्ता के नेताओं से भेंट की और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन से मिलकर उन्हें आश्वस्त किया कि यह संस्था संवैधानिक दायरे में ही कार्य करेगी।

3.2 बंबई में कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन (दिसंबर 1885)

राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन पहले पूना में आयोजित होना तय हुआ था। किंतु वहां अचानक हैजा (कॉलरा) फैल जाने के कारण अंतिम समय में स्थान बदलकर बंबई कर दिया गया।

28 दिसंबर 1885 को दोपहर 12 बजे बंबई के गोवालिया टैंक स्थित ऐतिहासिक गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज के भवन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन आरंभ हुआ। इसमें देश के सभी प्रांतों से आए 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया:

  • प्रांतीय प्रतिनिधित्व: बंबई व सिंध से 38, मद्रास से 21, बंगाल से 3 (उमेश चंद्र बनर्जी, मनमोहन घोष व नरेंद्रनाथ सेन), उत्तर प्रांत व अवध से 7 तथा पंजाब से 3 प्रतिनिधि उपस्थित थे।
  • उपस्थित प्रमुख नेता: दादाभाई नौरोजी, दिनशा वाचा, फिरोजशाह मेहता, काशीनाथ त्र्यंबक तेलंग, बदरुद्दीन तैयबजी, जी. सुब्रमण्यम अय्यर तथा पी. आनंद चारलू। उल्लेखनीय है कि सुरेंद्रनाथ बनर्जी इसी समय कलकत्ता में दूसरे राष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे, इसलिए वे बंबई अधिवेशन में उपस्थित नहीं हो सके थे।
  • प्रथम अध्यक्ष: कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रसिद्ध बैरिस्टर उमेश चंद्र बनर्जी (W.C. Bonnerjee) को सर्वसम्मति से प्रथम अध्यक्ष चुना गया और ए. ओ. ह्यूम को महासचिव बनाया गया।
3.3 कांग्रेस के मूल उद्देश्य और प्रारंभिक 9 प्रस्ताव

अध्यक्ष उमेश चंद्र बनर्जी ने अपने उद्घाटन भाषण में कांग्रेस के चार प्राथमिक उद्देश्यों की रूपरेखा रखी:

  1. देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रसेवा में लगे कार्यकर्ताओं के बीच व्यक्तिगत घनिष्ठता व मित्रता को बढ़ावा देना।
  2. जाति, धर्म और प्रांतीय संकीर्णताओं को मिटाकर राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करना।
  3. तत्कालीन महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों पर देश के शिक्षित वर्ग के परिपक्व विचारों को लिपिबद्ध करना।
  4. आगामी वर्ष के लिए भारतीय जननेताओं के जनहितैषी कार्यों और आंदोलनों की दिशा तय करना।

इस ऐतिहासिक अधिवेशन में 9 प्रस्ताव पारित किए गए—जिनमें प्रमुख थे: भारतीय प्रशासन की जांच हेतु रॉयल कमीशन की नियुक्ति, लंदन स्थित भारत सचिव की काउंसिल को समाप्त करना, केंद्रीय व प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार और उनमें निर्वाचित भारतीयों को स्थान देना, आई.सी.एस. परीक्षा भारत और इंग्लैंड में एक साथ आयोजित करना तथा सेना पर होने वाले भारी खर्च में कटौती करना।

3.4 'सुरक्षा कपाट' (Safety Valve) बनाम 'तड़ित चालक' (Lightning Conductor) सिद्धांत

कांग्रेस की स्थापना के कारणों और ह्यूम की भूमिका को लेकर इतिहासकारों में दो प्रमुख दृष्टिकोण रहे हैं:

  • सुरक्षा कपाट (सेफ्टी वाल्व) सिद्धांत: 1916 में उग्रवादी नेता लाला लाजपत राय ने अपनी पुस्तक 'Young India' में इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसे बाद में मार्क्सवादी इतिहासकार रजनी पाम दत्त ने 'India Today' में विस्तार दिया। इस मत के अनुसार, ह्यूम ने शिमला में पुलिस की 7 खंडों की गुप्त रिपोर्टें देखी थीं, जिनसे पता चलता था कि दरिद्रता और अकाल से पीड़ित भारतीय किसानों में भयंकर असंतोष था और 1857 जैसा एक और सशस्त्र विद्रोह भड़क सकता था। ब्रिटिश साम्राज्य को इस संभावित महाविस्फोट से बचाने के लिए ह्यूम ने लॉर्ड डफरिन की सलाह पर पढ़े-लिखे भारतीयों के असंतोष को केवल संवैधानिक बहसों के जरिए बाहर निकालने के लिए कांग्रेस को एक 'सेफ्टी वाल्व' के रूप में स्थापित किया।
  • तड़ित चालक (लाइटनिंग कंडक्टर) सिद्धांत: 1913 में उदारवादी नेता गोपाल कृष्ण गोखले ने इस धारणा का सशक्त उत्तर दिया। उन्होंने कहा: "यदि किसी भारतीय ने ऐसा अखिल भारतीय संगठन बनाने का बीड़ा उठाया होता, तो सरकार शुरू में ही उसका क्रूरतापूर्वक दमन कर देती... ह्यूम एक प्रसिद्ध अंग्रेज और पूर्व उच्च अधिकारी थे, इसी कारण सरकार कांग्रेस को शैशवावस्था में ही कुचल नहीं सकी।" भारतीय नेताओं ने ह्यूम को एक 'तड़ित चालक' (आकाशीय बिजली से बचाने वाले यंत्र) के रूप में इस्तेमाल किया ताकि नवजात कांग्रेस पर सरकार का कहर न टूट पड़े।

आधुनिक शोध दर्शाते हैं कि कांग्रेस किसी अंग्रेज की निजी दया का परिणाम नहीं थी, बल्कि 1836 से चले आ रहे सभा-समितियों के क्रमिक राजनीतिक विकास और सुरेंद्रनाथ के राष्ट्रीय सम्मेलनों का स्वाभाविक परिणाम थी।

3.5 सामाजिक आधार और ब्रिटिश रुख में तेजी से बदलाव

शुरुआती वर्षों में कांग्रेस का सामाजिक आधार मुख्य रूप से उच्च एवं मध्यम वर्ग के अंग्रेजी-शिक्षित लोगों—वकीलों, डॉक्टरों, पत्रकारों, शिक्षकों और व्यापारियों तक सीमित था। किसान, मजदूर और आम ग्रामीण जनता इसमें सीधे तौर पर शामिल नहीं थे। फिर भी इसके नेता व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि समग्र राष्ट्र के हितों के लिए संघर्ष कर रहे थे।

प्रारंभ में ब्रिटिश सरकार का रवैया सहानुभूतिपूर्ण था। 1886 के दूसरे कलकत्ता अधिवेशन में आए प्रतिनिधियों को वायसराय लॉर्ड डफरिन ने राजभवन में स्वागत समारोह दिया। किंतु जैसे ही कांग्रेस ने विधान परिषदों में सुधार, प्रशासनिक व्यय में कटौती और आर्थिक लूट का विरोध तेज किया, अंग्रेजों का रुख पूरी तरह शत्रुतापूर्ण हो गया। 1888 में लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस का उपहास उड़ाते हुए इसे भारत की "अत्यंत सूक्ष्म अल्पसंख्यक जमात" (Microscopic Minority) कहकर खारिज करने का प्रयास किया और सरकारी कर्मचारियों के इसमें भाग लेने पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया।

मॉड्यूल 4: उदारवादी दौर और आर्थिक राष्ट्रवाद (1885–1905)

4.1 उदारवादी नेतृत्व और 3-P नीति: प्रार्थना, याचिका और विरोध

1885 से 1905 के कालखंड में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संचालन जिन नेताओं के हाथों में रहा, उन्हें इतिहास में उदारवादी (Moderates) कहा जाता है। इस धारा के प्रमुख अगुआ थे: दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, दिनशा वाचा, गोपाल कृष्ण गोखले, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, आनंदमोहन बोस और रमेश चंद्र दत्त।

उदारवादियों की वैचारिक मान्यताएं निम्नलिखित थीं:

  • ब्रिटिश न्यायप्रियता में अटूट विश्वास: वे मानते थे कि ब्रिटिश जनता और संसद स्वभाव से न्यायप्रिय व लोकतांत्रिक हैं। भारत में जो शोषण हो रहा है, वह अंग्रेजों के राष्ट्रीय चरित्र की खराबी नहीं, बल्कि भारत में तैनात स्वार्थी ब्रिटिश नौकरशाहों की देन है।
  • 3-P पद्धति (Prayer, Petition, Protest): उदारवादियों ने किसी प्रकार के कानून-भंग या उग्र आंदोलन का सहारा नहीं लिया। उनकी कार्यपद्धति प्रार्थना (Prayer), याचिका (Petition) और संवैधानिक विरोध (Protest) पर आधारित थी। वे तथ्यपूर्ण ज्ञापन तैयार करते, वार्षिक अधिवेशनों में प्रस्ताव पारित करते और ब्रिटिश जनमत को प्रभावित करने के लिए लंदन में प्रतिनिधिमंडल भेजते थे।
  • क्रमिक सुधार व औपनिवेशिक स्वराज्य: उन्होंने ब्रिटिश शासन से पूर्ण अलगाव की मांग नहीं की; ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर कनाडा या ऑस्ट्रेलिया की भांति स्वशासन (Dominion Status) प्राप्त करना ही उनका प्रमुख लक्ष्य था।
4.2 संवैधानिक मांगें और 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम

उदारवादियों का सबसे प्रमुख राजनीतिक नारा था: "प्रतिनिधित्व के बिना कोई कर नहीं!" (No taxation without representation)।

उनके अनवरत दबाव के फलस्वरूप ब्रिटिश संसद ने 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Councils Act of 1892) पारित किया। यद्यपि यह अत्यंत सीमित और अपूर्ण था, फिर भी इसने विधान परिषदों में गैर-सरकारी भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई और नगरपालिकाओं, विश्वविद्यालयों व व्यापारिक संस्थाओं के माध्यम से परोक्ष निर्वाचन के सिद्धांत को मान्यता दी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि भारतीय सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने और प्रश्न पूछने का अधिकार प्राप्त हुआ—जिसका फिरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले ने ब्रिटिश नीतियों की विसंगतियों को उजागर करने में शानदार उपयोग किया।

अन्य प्रमुख मांगों में: भारत और ब्रिटेन में एक साथ आई.सी.एस. परीक्षा कराना (जो 1893 में ब्रिटिश संसद में सिद्धांततः पारित हुआ), सैन्य खर्च में कमी, नमक कर की समाप्ति तथा न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना शामिल था।

4.3 दादाभाई नौरोजी और धन निष्कासन सिद्धांत (Drain of Wealth)

उदारवादी राष्ट्रवादियों का सबसे अमर और युगांतरकारी योगदान था ब्रिटिश उपनिवेशवाद के आर्थिक शोषण का प्रामाणिक आंकड़ों के साथ पर्दाफाश करना। इस आर्थिक राष्ट्रवाद के शिखर पुरुष थे दादाभाई नौरोजी, जिन्हें देशवासी आदर से "भारत के वयोवृद्ध पुरुष" (The Grand Old Man of India) कहते थे।

1901 में प्रकाशित अपनी ऐतिहासिक पुस्तक "Poverty and Un-British Rule in India" में दादाभाई नौरोजी ने धन निष्कासन सिद्धांत (Drain of Wealth) का प्रतिपादन किया। उन्होंने सिद्ध किया कि प्रतिवर्ष भारत की राष्ट्रीय आय का एक विशाल हिस्सा (करोड़ों पाउंड) बिना किसी व्यापारिक, आर्थिक या भौतिक प्रतिफल के एकतरफा ब्रिटेन भेजा जा रहा है।

धन निष्कासन के मुख्य माध्यम थे:

  1. गृह प्रभार या गृह व्यय (Home Charges): ब्रिटेन में रहने वाले ब्रिटिश सैन्य व असैन्य अधिकारियों के भारी वेतन, पेंशन, छुट्टियां तथा लंदन स्थित भारत सचिव के कार्यालय का संपूर्ण खर्च भारतीय राजस्व से दिया जाता था।
  2. रेलवे पर 5% निश्चित मुनाफा: भारत में रेल बिछाने वाली ब्रिटिश निजी कंपनियों को 5 प्रतिशत लाभ की सरकारी गारंटी दी गई थी, जिसकी भरपाई भारतीय किसानों के करों से की जाती थी।
  3. विदेशी पूंजीपतियों का मुनाफा: भारत में कार्यरत विदेशी बैंकों, जहाजरानी कंपनियों, जूट मिलों तथा चाय-नील बागानों का समूचा लाभ सीधे इंग्लैंड भेज दिया जाता था।
  4. एकतरफा निर्यात अधिशेष: भारत से भारी मात्रा में कच्चा माल (कपास, जूट, अनाज) बाहर जाता था, परंतु उसके बदले में कोई धन या पूंजी देश में नहीं आती थी; उस पैसे से ब्रिटेन में गृह प्रभार चुकाया जाता था।
4.4 रमेश चंद्र दत्त व एम. जी. रानाडे का आर्थिक विश्लेषण

दादाभाई नौरोजी के साथ पूर्व आई.सी.एस. अधिकारी और 1899 के लखनऊ कांग्रेस के अध्यक्ष रमेश चंद्र दत्त (आर. सी. दत्त) ने अपनी युगांतरकारी दो-खंडीय पुस्तक "The Economic History of India" में सिद्ध किया कि ब्रिटिश सरकार की अत्यधिक भू-राजस्व मांग ने भारतीय किसानों को तबाह कर निरंतर अकालों को जन्म दिया। उन्होंने गणना करके बताया कि भारत के कुल सरकारी राजस्व का लगभग आधा हिस्सा प्रतिवर्ष सीधे ब्रिटेन भेज दिया जाता था।

इसी प्रकार महादेव गोविंद रानाडे ने भारत के वि-औद्योगीकरण (De-industrialization) की प्रक्रिया को उजागर किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार ब्रिटिश भेदभावपूर्ण नीतियों ने भारत के सदियों पुराने हथकरघा और हस्तशिल्प उद्योग को तहस-नहस कर दिया और भारत को केवल ब्रिटेन की फैक्टरियों के लिए कच्चे माल का निर्यातक और उनके तैयार माल का खरीदार बनाकर छोड़ दिया।

4.5 उदारवादियों का मूल्यांकन और सीमाएं

उदारवादियों के महान योगदान के बावजूद उनकी कुछ स्वाभाविक सीमाएं थीं:

  • संकीर्ण सामाजिक आधार: उनका आंदोलन केवल शहरों के अंग्रेजी पढ़े-लिखे भद्रलोक तक सीमित रहा; वे करोड़ों ग्रामीण किसानों और मजदूरों को आंदोलन से नहीं जोड़ सके।
  • भिक्षावृत्ति की राजनीति (Political Mendicancy): उनकी अत्यधिक नम्रता और याचिकाओं की नीति को उग्रवादी नेताओं ने "राजनीतिक भिक्षावृत्ति" कहकर खारिज किया।
  • नगण्य उपलब्धियां: ब्रिटिश हुकूमत से वे कुछ मामूली संवैधानिक रियायतों के अलावा कोई ठोस अधिकार प्राप्त नहीं कर सके।

फिर भी उनका ऐतिहासिक महत्व निर्विवाद है: उदारवादियों ने ही पहली बार संपूर्ण भारत को एक साझी राष्ट्रीय चेतना में बांधा, भारतीयों को उनके नागरिक अधिकारों के प्रति सजग किया और ब्रिटिश हुकूमत के नैतिक दावों की धज्जियां उड़ाकर स्वतंत्रता आंदोलन का बौद्धिक आधार तैयार किया।

मॉड्यूल 5: उग्र राष्ट्रवाद का उदय और बंग-भंग विरोधी स्वदेशी आंदोलन (1905–1911)

5.1 उग्रवादी धारा का विकास और लाल-बाल-पाल

20वीं सदी के आरंभ में उदारवादियों की विफलता तथा अंतरराष्ट्रीय घटनाओं (जैसे 1896 में इथियोपिया द्वारा इटली की पराजय और 1905 में छोटे से एशियाई देश जापान द्वारा विशाल रूस की हार) ने भारतीय युवाओं में नया आत्मविश्वास भर दिया। इसके फलस्वरूप कांग्रेस में उग्र राष्ट्रवाद (Extremism) की एक सशक्त धारा उभरी। इसके प्रमुख कर्णधार थे प्रसिद्ध लाल-बाल-पाल—पंजाब के लाला लाजपत राय, महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक और बंगाल के विपिन चंद्र पाल; साथ ही ऋषि अरविंद घोष इसके प्रखर दार्शनिक थे।

उग्रवादियों ने ब्रिटिश दया की नीति को पूरी तरह नकार दिया। उन्होंने कहा कि अधिकार भीख मांगकर नहीं मिलते, उन्हें संघर्ष और आत्म-बलिदान से छीनना पड़ता है। बाल गंगाधर तिलक ने अपने मराठी पत्र 'केसरी' के माध्यम से जनजागरण किया और गणपति उत्सव (1893) व शिवाजी उत्सव (1895) प्रारंभ कर राष्ट्रीय आंदोलन को आम जनता तक पहुंचाया। तिलक का अमर उद्घोष था: "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूंगा!"

5.2 लॉर्ड कर्जन का बंगाल विभाजन (1905): साम्राज्यवादी कुचक्र

राष्ट्रीय आंदोलन के इस ज्वार को कुचलने के लिए साम्राज्यवादी वायसराय लॉर्ड कर्जन (1899–1905) ने बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) का षड्यंत्र रचा।

19 जुलाई 1905 को ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन की औपचारिक घोषणा की और 16 अक्टूबर 1905 को इसे कानूनन लागू कर दिया। बंगाल को दो भागों में बांट दिया गया:

  • पूर्वी बंगाल और असम: ढाका, चटगांव, राजशाही और असम को मिलाकर बना, जिसकी राजधानी ढाका रखी गई। कुल 3 करोड़ 10 लाख की आबादी में मुस्लिम बहुसंख्यक (लगभग 1 करोड़ 80 लाख) थे।
  • पश्चिमी बंगाल, बिहार और उड़ीसा: पश्चिमी बंगाल, बिहार और उड़ीसा को मिलाकर बना, जिसकी राजधानी कलकत्ता रही। 5 करोड़ 40 लाख की आबादी में बंगाली (1 करोड़ 70 लाख) अपनी ही मातृभूमि में हिंदी व उड़िया भाषियों की तुलना में अल्पसंख्यक बन गए।

कर्जन ने आधिकारिक रूप से यह बहाना बनाया कि 7 करोड़ 80 लाख की आबादी वाले विशाल प्रांत का शासन एक लेफ्टिनेंट गवर्नर के लिए संभालना कठिन है, अतः विभाजन प्रशासनिक सुविधा के लिए किया गया है। किंतु ब्रिटिश गृह सचिव एच. एच. रिस्ले ने अपने गोपनीय सरकारी पत्र में असली साम्राज्यवादी इरादे को उजागर करते हुए लिखा था:

"संयुक्त बंगाल एक शक्ति है; विभाजित बंगाल विभिन्न दिशाओं में खिंचेगा... हमारा मुख्य उद्देश्य हमारे शासन के विरुद्ध खड़ी एक सुदृढ़ विरोधी शक्ति को तोड़ना और कमजोर करना है।"

कर्जन का वास्तविक उद्देश्य राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र बंगाली बुद्धिजीवियों की शक्ति को तोड़ना और हिंदुओं व मुसलमानों के बीच स्थायी सांप्रदायिक फूट डालना था।

5.3 स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन: जनप्रतिरोध के दो अचूक अस्त्र

बंगाल विभाजन के विरोध में संपूर्ण बंगाल में जनआक्रोश का समुद्र उमड़ पड़ा। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के ऐतिहासिक टाउन हॉल में एक विशाल आमसभा में औपचारिक रूप से स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ। कृष्ण कुमार मित्र ने अपने पत्र 'संजीवनी' में सर्वप्रथम विदेशी माल के बहिष्कार का आह्वान किया था।

इस आंदोलन के दो पूरक आधारस्तंभ थे:

  1. बहिष्कार (Boycott): यह ब्रिटिश आर्थिक हितों पर सीधा आघात करने वाला नकारात्मक अस्त्र था। मैनचेस्टर के विदेशी कपड़े, लिवरपूल के नमक, चीनी और विलासिता की वस्तुओं का पूर्ण बहिष्कार किया गया। छात्रों ने विदेशी दुकानों के सामने पिकेटिंग की; धोबियों ने विदेशी कपड़े धोने से मना कर दिया; पंडितों ने विदेशी सामान वाली शादियों में पूजा कराने से इनकार कर दिया। कलकत्ता और जिला मुख्यालयों में विदेशी वस्त्रों की विशाल होलियां जलाई गईं।
  2. स्वदेशी (Swadeshi): यह आंदोलन का सकारात्मक और रचनात्मक रूप था—जिसका मूल आधार 'आत्मशक्ति' और स्वावलंबन था। देश में स्वदेशी उद्योगों की बाढ़ आ गई:
    • आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने विख्यात बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स की स्थापना की।
    • स्वदेशी वस्त्रों की आपूर्ति के लिए बंग लक्ष्मी कॉटन मिल्स स्थापित की गई।
    • स्वदेशी साबुन, माचिस, चीनी मिट्टी के कारखाने तथा भारतीयों द्वारा संचालित बैंक और बीमा कंपनियां अस्तित्व में आईं।
5.4 रक्षा बंधन, अरंधन और राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन

स्वदेशी आंदोलन केवल राजनीतिक और आर्थिक विरोध नहीं था, उसने बंगाली संस्कृति को एक अभूतपूर्व ऊंचाई प्रदान की:

  • रक्षा बंधन उत्सव (16 अक्टूबर 1905): जिस दिन बंगाल विभाजन प्रभावी हुआ, उस दिन संपूर्ण बंगाल में शोक दिवस और आम हड़ताल रखी गई। रवींद्रनाथ ठाकुर ने इस दिन रक्षा बंधन उत्सव का आह्वान किया। सुबह गंगा स्नान के बाद हजारों हिंदुओं और मुसलमानों ने नंगे पांव सड़कों पर देशभक्ति गीत गाते हुए एक-दूसरे की कलाइयों पर राखियां बांधीं और यह संकल्प लिया कि अंग्रेजी हुकूमत बंगाल की आत्मिक एकता को कभी खंडित नहीं कर सकती।
  • अरंधन (चूल्हा न जलाना): विद्वान रामेंद्रसुंदर त्रिवेदी के आह्वान पर बंगाल के प्रत्येक घर में चूल्हा न जलाकर 'अरंधन' मनाया गया, जो शोक और प्रतिरोध का प्रतीक था।
  • देशभक्तिपूर्ण संगीत: रवींद्रनाथ ने अमर गीतों की रचना की—जैसे "बांगलार माटी, बांगलार जल" तथा "आमार शोनार बाsecretংলা" (जो आगे चलकर बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना)। द्विजेंद्रलाल राय ने "धनधान्य पुष्पभरा हमारे इस वसुंधरा" रचा और मुकुंद दास ने गांवों में स्वदेशी गीतों से जनचेतना जगाई।
  • राष्ट्रीय शिक्षा परिषद: आंदोलन में छात्रों की भागीदारी को रोकने के लिए सरकार ने दमनकारी कार्लाइल सर्कुलर जारी किया, जिसके तहत सरकारी स्कूलों से छात्रों को निष्कासित करने की धमकी दी गई। इसके उत्तर में सतीश चंद्र मुखर्जी की डॉन सोसाइटी (1902) के नेतृत्व में राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन शुरू हुआ। 15 अगस्त 1906 को राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (National Council of Education) का गठन हुआ और बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई, जिसके प्रथम प्रधानाचार्य श्री अरविंद घोष बने।
5.5 1907 की सूरत फूट और 1911 में बंगाल विभाजन का रद्द होना

आंदोलन के राष्ट्रव्यापी विस्तार के साथ ही कांग्रेस के भीतर उदारवादियों और उग्रवादियों के मतभेद गहरे हो गए। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने स्वराज्य, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के चार प्रस्ताव पास करवाकर एकता बनाए रखी। परंतु 1907 के सूरत अधिवेशन में ताप्ती नदी के तट पर अध्यक्ष पद तथा बहिष्कार के अखिल भारतीय प्रसार को लेकर दोनों पक्षों में भारी मारपीट और हाथापाई हुई, जिसके फलस्वरूप कांग्रेस दो टुकड़ों में बंट गई (जिसे सूरत विभाजन कहते हैं)।

ब्रिटिश सरकार ने इस फूट का लाभ उठाकर दमन का चक्र चलाया। बाल गंगाधर तिलक को गिरफ्तार कर 6 वर्ष के लिए बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया; लाला लाजपत राय और अजीत सिंह को निर्वासित कर दिया गया। किंतु जनआंदोलन की ज्वाला ठंडी नहीं हुई; दूसरी ओर अरविंद घोष, बाघा जतिन और खुदीराम बोस के नेतृत्व में क्रांतिकारी आंदोलन भड़क उठा।

अंततः भारतीयों के अटूट जनसंघर्ष के आगे घुटने टेकते हुए ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम ने दिसंबर 1911 के दिल्ली दरबार में बंगाल विभाजन को रद्द करने की ऐतिहासिक घोषणा की। बंगाल पुनः एक हो गया। किंतु बंगाली राष्ट्रवाद से भयभीत होकर अंग्रेजों ने इसी अवसर पर अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दी। स्वदेशी आंदोलन ने सिद्ध कर दिया कि संगठित जनशक्ति के बल पर ब्रिटिश साम्राज्य को भी पीछे हटने पर बाध्य किया जा सकता है।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

प्रारंभिक राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक समयरेखा (1836–1911)
1836–1911 ऐतिहासिक प्रगति
पश्चिम बंगाल बोर्ड कक्षा 8 इतिहास की परीक्षा हेतु अति महत्वपूर्ण समयरेखा।
कांग्रेस-पूर्व प्रमुख संस्थाओं का तुलनात्मक विवरण
संस्थागत वर्गीकरण
अल्बर्ट हॉल में 1876 में स्थापित भारत सभा शिक्षित मध्यम वर्ग का पहला सशक्त मंच थी।
उदारवादी बनाम उग्रवादी विचारधारा का तुलनात्मक मैट्रिक्स
उदारवादी व उग्रवादी स्पेक्ट्रम
1907 के सूरत विभाजन का मूल कारण इसी वैचारिक दृष्टिकोण का टकराव था।
दादाभाई नौरोजी का धन निष्कासन समीकरण (Drain of Wealth)
औपनिवेशिक लूट का समीकरण
दादाभाई नौरोजी की 1901 की विख्यात पुस्तक 'Poverty and Un-British Rule in India' पर आधारित।
लॉर्ड लिटन के दमनकारी कानूनों का मैट्रिक्स (1876–1880)
लिटन के तीन दमनकारी स्तंभ
अमृत बाजार पत्रिका ने रातोंरात अंग्रेजी में बदलकर प्रेस कानून को मात दी।
सेफ्टी वाल्व बनाम तड़ित चालक सिद्धांत की तुलना
स्थापना विवाद मॉडल
लाला लाजपत राय (1916) ने सेफ्टी वाल्व और गोपाल कृष्ण गोखले (1913) ने तड़ित चालक सिद्धांत दिया।
स्वदेशी अर्थव्यवस्था और शिक्षण संस्थाओं का मैट्रिक्स
स्वदेशी स्वावलंबन त्रयी
डॉन सोसाइटी (1902, सतीश चंद्र मुखर्जी) राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन की अग्रदूत थी।
1905 का बंगाल विभाजन बनाम 1911 का विभाजन रद्द मैट्रिक्स
विभाजन बनाम रद्दीकरण
रिस्ले ने स्पष्ट स्वीकार किया था कि बंगाली राष्ट्रवाद की एकता को तोड़ना ही मुख्य लक्ष्य था।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
भारतीय राजनीतिक संस्थाओं के इतिहास में 1836 को एक युगांतरकारी वर्ष क्यों माना जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1836 को भारतीय राजनीतिक इतिहास का एक ऐतिहासिक मोड़ माना जाता है क्योंकि इसी वर्ष कलकत्ता में बंगभाषा प्रकाशिका सभा की स्थापना हुई थी:

  1. प्रथम राजनीतिक संस्था: राजा राममोहन राय के सहयोगियों (कालीनाथ रायचौधुरी, प्रसन्न कुमार ठाकुर आदि) द्वारा स्थापित यह भारत की पहली ऐसी संस्था थी जिसने सरकारी नीतियों, कर व्यवस्था तथा प्रशासनिक कानूनों पर संगठित राजनीतिक चर्चा प्रारंभ की।
  2. नागरिक अधिकारों की रक्षा: कंपनी सरकार द्वारा धार्मिक व शैक्षणिक निष्कर भूमियों (देवोत्तर जमीन) पर अनुचित कर लगाने के आदेश के विरुद्ध इस संस्था ने पहला जोरदार संवैधानिक विरोध दर्ज कराया।
  3. भविष्य का मार्गदर्शन: प्रख्यात इतिहासकार डॉ. योगेश चंद्र बागल ने इसे 'बंगाल तथा भारत की प्रथम राजनीतिक संस्था' कहा है, क्योंकि इसी संस्था ने आगे चलकर जमींदारी सभा तथा भारत सभा जैसी संस्थाओं का मार्ग प्रशस्त किया।
उदाहरण 2
1878 का देशीय समाचार पत्र कानून (Vernacular Press Act) क्यों पारित हुआ था और अमृत बाजार पत्रिका ने इसे कैसे मात दी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

लॉर्ड लिटन का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878) औपनिवेशिक दमन और नस्लवाद का खुला उदाहरण था:

  1. पारित करने का कारण: 1876–78 के भीषण अकाल में सरकारी विफलता और अफगान युद्ध की बर्बादी पर भारतीय भाषाई समाचार पत्रों की तीखी आलोचना को दबाने के लिए सरकार ने यह मुंह बंद करने वाला कानून बनाया।
  2. कानून का नस्लीय चरित्र: यह कानून केवल भारतीय (देशी) भाषाओं के अखबारों पर लागू होता था; मजिस्ट्रेट को बिना सुनवाई प्रेस जब्त करने का अधिकार था और कोई अदालत में अपील नहीं हो सकती थी। अंग्रेजी अखबार पूरी तरह मुक्त थे।
  3. अमृत बाजार पत्रिका की रणनीति: शिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष द्वारा संपादित इस अखबार को निशाना बनाना सरकार का मुख्य उद्देश्य था। लेकिन संपादकों ने कानून के लागू होने से ठीक पहले 21 मार्च 1878 को रातोंरात बंगाली से पूर्णतः अंग्रेजी भाषा के अखबार में बदलकर कानून को मात दे दी! सरकार हाथ मलती रह गई।
उदाहरण 3
1883 के इल्बर्ट बिल विवाद का मूल मुद्दा क्या था और इससे भारतीयों ने क्या शिक्षा प्राप्त की?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

इल्बर्ट बिल (1883) ने ब्रिटिश न्याय व्यवस्था के नस्लीय पाखंड को पूरी तरह उजागर कर दिया:

  1. विवाद का मूल कारण: तत्कालीन कानून के अनुसार जिला स्तर पर कोई भी भारतीय जज किसी यूरोपीय (श्वेत) अपराधी का मुकदमा नहीं सुन सकता था। लॉर्ड रिपन के विधि सदस्य सर सी. पी. इल्बर्ट ने भारतीय जजों को यूरोपीय अपराधियों के मुकदमे सुनने का समान अधिकार देने वाला बिल पेश किया।
  2. श्वेतों का उग्र विरोध: अंग्रेज बागान मालिकों और अफसरों ने 'यूरोपियन डिफेंस एसोसिएशन' बनाकर हिंसक आंदोलन छेड़ा, रिपन का घेराव किया। विवश होकर रिपन ने संशोधन किया कि यूरोपीय अभियुक्त कम से कम 50% श्वेत जूरी की मांग कर सकता था।
  3. भारतीयों की सीख:
    • अंग्रेजों का 'कानून के समक्ष समानता' का दावा झूठा है; नस्लभेद ही उनके शासन का आधार है।
    • मुट्ठी भर अंग्रेजों ने एकजुट होकर अपनी बात मनवा ली, अतः भारतीयों ने समझ लिया कि अधिकारों की प्राप्ति के लिए एक स्थायी अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन का होना अनिवार्य है।
उदाहरण 4
कांग्रेस की स्थापना के संदर्भ में 'सुरक्षा कपाट सिद्धांत' (Safety Valve Theory) की संक्षेप में समीक्षा कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

'सुरक्षा कपाट सिद्धांत' के अनुसार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए एक पूर्व-नियोजित रणनीति थी:

  1. सिद्धांत का दावा: 1916 में लाला लाजपत राय ने प्रतिपादित किया कि ए. ओ. ह्यूम ने शिमला में गुप्त सरकारी रिपोर्टें देखी थीं, जिनसे पता चला कि अकाल और दरिद्रता के कारण किसानों में भयंकर रोष था और 1857 जैसा सशस्त्र विद्रोह भड़क सकता था।
  2. भाप निकालने की व्यवस्था: इस संभावित जनविस्फोट को टालने के लिए ह्यूम ने लॉर्ड डफरिन की सहमति से कांग्रेस बनाई ताकि शिक्षित भारतीयों का असंतोष संवैधानिक बहसों के जरिए 'सेफ्टी वाल्व' की तरह शांतिपूर्वक बाहर निकल जाए।
  3. आधुनिक मूल्यांकन: आधुनिक इतिहासकार इसे अतिशयोक्ति मानते हैं। सुरेंद्रनाथ के राष्ट्रीय सम्मेलनों से स्पष्ट है कि भारतीय स्वयं अखिल भारतीय संगठन बना रहे थे; और गोखले के अनुसार ह्यूम एक 'तड़ित चालक' (Lightning Conductor) थे, जिन्हें भारतीयों ने सरकारी दमन से बचने के लिए ढाल बनाया था।
उदाहरण 5
दादाभाई नौरोजी ने अपने 'धन निष्कासन सिद्धांत' (Drain of Wealth) में औपनिवेशिक लूट को कैसे उजागर किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1901 में प्रकाशित 'Poverty and Un-British Rule in India' में दादाभाई नौरोजी ने सिद्ध किया कि भारत की गरीबी का मुख्य कारण धन का एकतरफा निष्कासन था:

  1. निष्कासन की परिभाषा: देश की कुल राष्ट्रीय आय का एक विशाल हिस्सा बिना किसी व्यापारिक अथवा आर्थिक प्रतिफल के सीधे ब्रिटेन भेजा जाना।
  2. प्रमुख स्रोत:
    • गृह व्यय (Home Charges): लंदन में भारत सचिव के कार्यालय का खर्च, ब्रिटिश अधिकारियों की मोटी पेंशनें और भत्ते।
    • रेलवे पर 5% निश्चित मुनाफा: भारतीय करदाताओं के पैसे से ब्रिटिश कंपनियों को निश्चित लाभ का भुगतान।
    • एकतरफा निर्यात: भारत से कच्चे माल का निर्यात होता था, लेकिन बदले में सोना या पूंजी नहीं आती थी; उस पैसे से ब्रिटेन में भारत सरकार के ऋण चुकाए जाते थे।
  3. परिणाम: इस धन निष्कासन ने भारत के पूंजी संचय को नष्ट कर दिया, जिससे उद्योग नष्ट हो गए और बार-बार अकाल पड़ने लगे।
उदाहरण 6
1905 के बंगाल विभाजन के पीछे लॉर्ड कर्जन का असली साम्राज्यवादी उद्देश्य क्या था और सरकारी बहाना क्या था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

लॉर्ड कर्जन का 1905 का बंगाल विभाजन राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने का एक कुटिल साम्राज्यवादी षड्यंत्र था:

  1. सरकारी बहाना (प्रशासनिक सुविधा): ब्रिटिश सरकार ने प्रचारित किया कि लगभग 8 करोड़ की आबादी वाले विशाल प्रांत का प्रशासन एक छोटे लाट (लेफ्टिनेंट गवर्नर) के लिए संभालना असंभव है, अतः विभाजन प्रशासनिक सुधार के लिए किया गया है।
  2. असली साम्राज्यवादी उद्देश्य (फूट डालो और राज करो):
    • राष्ट्रवाद के गढ़ को तोड़ना: बंगाल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख केंद्र था। बंगाली बुद्धिजीवियों की शक्ति को तोड़ना ही मुख्य लक्ष्य था। गृह सचिव रिस्ले ने साफ लिखा था: "संयुक्त बंगाल एक शक्ति है; विभाजित बंगाल अलग-अलग दिशाओं में खिंचेगा।"
    • बंगालियों को अल्पसंख्यक बनाना: पश्चिम बंगाल में हिंदी और उड़िया भाषियों के बीच बंगालियों को अल्पसंख्यक बना दिया गया।
    • सांप्रदायिक विभाजन: पूर्वी बंगाल में मुस्लिम बहुसंख्यक प्रांत बनाकर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच स्थायी वैमनस्य पैदा करना।
उदाहरण 7
16 अक्टूबर 1905 को रवींद्रनाथ ठाकुर ने रक्षा बंधन उत्सव को राजनीतिक व सांप्रदायिक प्रतिरोध का प्रतीक कैसे बनाया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

16 अक्टूबर 1905 को जिस दिन बंगाल विभाजन कानून लागू हुआ, रवींद्रनाथ ठाकुर ने पारंपरिक रक्षा बंधन उत्सव को साम्राज्यवाद विरोधी एकता के प्रतीक में बदल दिया:

  1. एकता का संकल्प: रवींद्रनाथ के आह्वान पर जाति-धर्म के भेदभाव को भुलाकर हजारों लोगों ने गंगा स्नान किया और एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधी। यह इस बात की प्रतिज्ञा थी कि ब्रिटिश कानून बंगाल की आत्मिक एकता को कभी तोड़ नहीं सकते।
  2. सांप्रदायिक सद्भाव: हिंदुओं और मुसलमानों ने एक-दूसरे को राखी बांधकर कर्जन की सांप्रदायिक फूट की नीति को सीधे चुनौती दी।
  3. प्रेरक राष्ट्रीय गान: रवींद्रनाथ के नेतृत्व में नंगे पांव चल रहे विशाल जुलूस में उनका नया रचित गीत गूंज उठा: "बांगलार माटी, बांगलार जल, बांगलार वायु, बांगलार फल—पुण्य হউক, पुण्य হউক, पुण्य হউক हे भगवान।" इसने आंदोलन को अद्वितीय भावनात्मक शक्ति प्रदान की।
उदाहरण 8
1907 के सूरत विभाजन के प्रमुख कारण और ऐतिहासिक परिणाम क्या थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1907 में राष्ट्रीय कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच गहरा मतभेद फूट पड़ा:

  1. प्रमुख कारण:
    • बहिष्कार का दायरा: उग्रवादी बहिष्कार को पूरे देश में और सरकारी स्कूलों, अदालतों व परिषदों तक बढ़ाना चाहते थे; जबकि उदारवादी इसे केवल बंगाल और विदेशी माल तक सीमित रखना चाहते थे।
    • स्वराज्य की परिभाषा: उदारवादी साम्राज्य के अधीन स्वशासन (Dominion Status) चाहते थे, जबकि उग्रवादी पूर्ण स्वराज्य चाहते थे।
    • अध्यक्ष पद का विवाद: उदारवादियों ने डॉ. रासबिहारी घोष को और उग्रवादियों ने लाला लाजपत राय को अध्यक्ष बनाना चाहा, जिससे भारी विवाद और मारपीट हुई।
  2. परिणाम: कांग्रेस से उग्रवादियों को निष्कासित कर दिया गया। कांग्रेस कमजोर पड़ गई और ब्रिटिश सरकार को तिलक (6 वर्ष जेल), लाजपत राय आदि उग्रवादी नेताओं पर क्रूर दमन करने का खुला मौका मिल गया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836) और जमींदारी सभा (1838) में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

बंगभाषा प्रकाशिका सभा 1836 में स्थापित हुई और यह सरकारी नीतियों पर चर्चा करने वाली पहली संस्था थी। जमींदारी सभा 1838 में विशेष रूप से भूस्वामियों के हितों की रक्षा के लिए बनी थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट सभी अखबारों पर लागू हुआ था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह कानून केवल भारतीय भाषाई (देशी) समाचार पत्रों पर लागू था। अंग्रेजी अखबार पूरी तरह मुक्त थे, इसी कारण अमृत बाजार पत्रिका ने रातोंरात अंग्रेजी बनकर स्वयं को बचाया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

कलकत्ता के राष्ट्रीय सम्मेलन और बंबई के राष्ट्रीय कांग्रेस को एक समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सुरेंद्रनाथ बनर्जी कलकत्ता में 1883 और 1885 के राष्ट्रीय सम्मेलनों के आयोजक थे। दिसंबर 1885 में कलकत्ता में दूसरा राष्ट्रीय सम्मेलन चलने के कारण वे बंबई अधिवेशन में उपस्थित नहीं हो सके थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ए. ओ. ह्यूम को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अध्यक्ष मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

एलन ऑक्टेवियन ह्यूम कांग्रेस के संस्थापक और महासचिव थे, अध्यक्ष नहीं। प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष कलकत्ता के प्रसिद्ध बैरिस्टर उमेश चंद्र बनर्जी (W.C. Bonnerjee) थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'सेफ्टी वाल्व' और 'तड़ित चालक' सिद्धांतों के प्रतिपादकों के नाम में भ्रम।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सेफ्टी वाल्व सिद्धांत के प्रतिपादक लाला लाजपत राय (1916) थे। जबकि तड़ित चालक (Lightning Conductor) सिद्धांत उदारवादी नेता गोपाल कृष्ण गोखले (1913) ने प्रस्तुत किया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

स्वदेशी और बहिष्कार को पूर्णतः समानार्थी समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

बहिष्कार आंदोलन का नकारात्मक पक्ष था—विदेशी वस्त्रों व नमक को नकारना। स्वदेशी इसका सकारात्मक व रचनात्मक पक्ष था—घरेलू उद्योगों, वस्त्र मिलों, साबुन और राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना करना।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि लॉर्ड कर्जन ने 1911 में बंगाल विभाजन रद्द किया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल का विभाजन किया था। 1911 में विभाजन को रद्द तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के समय ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम ने दिल्ली दरबार में किया था।

भारत में राष्ट्रीयता के प्रारंभिक विकास का मानचित्र (1836–1911)

पश्चिम बंगाल बोर्ड कक्षा 8 इतिहास • अध्याय 6 संकल्पना मानचित्र भारत में राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास (1836–1911) अतीत और विरासत अध्याय 6 चरण 1 (1836–84) कांग्रेस-पूर्व युग सभा-समितियों का दौर व चेतना प्रारंभिक राजनीतिक सभाएँ • बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836) • जमींदारी सभा (1838) सांस्कृतिक व प्रांतीय संस्थाएँ • हिंदू मेला (1867, नवगोपाल मित्र) • स्वदेशी कला व व्यायाम चेतना • पूना सार्वजनिक सभा (1870) भारत सभा (1876) • सुरेंद्रनाथ बनर्जी व आनंदमोहन बोस • अल्बर्ट हॉल में स्थापना • सिविल सेवा आयु-घटाव का विरोध ऐतिहासिक मील का पत्थर कलकत्ता में आयोजित 1883 और 1885 के राष्ट्रीय सम्मेलनों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हेतु प्रत्यक्ष मंच तैयार किया। उत्प्रेरक (1877–84) औपनिवेशिक दमन लिटन के कानून व इल्बर्ट विवाद साम्राज्यवादी नीतियां • अकाल में 1877 का दिल्ली दरबार • ICS आयु सीमा 21 से घटाकर 19 दमनकारी कानून • देशीय समाचार पत्र कानून (1878) • अमृत बाजार पत्रिका रातोंरात अंग्रेजी • भेदभावपूर्ण शस्त्र कानून (1878) इल्बर्ट बिल विवाद (1883) • भारतीय जजों को यूरोपीय मुकदमों का हक • अंग्रेजों का उग्र नस्लीय विरोध • लॉर्ड रिपन का समझौतावादी कदम ऐतिहासिक सीख इल्बर्ट बिल विवाद ने भारतीयों को स्पष्ट रूप से सिखा दिया कि अधिकार प्राप्त करने के लिए एक अखिल भारतीय मंच का गठन नितांत आवश्यक है। चरण 2 (1885–05) कांग्रेस की स्थापना उदारवादी 3-P व धन निष्कासन बंबई अधिवेशन (1885) • गोकुलदास तेजपाल कॉलेज • डब्ल्यू. सी. बनर्जी • 72 प्रतिनिधि स्थापना के प्रमुख सिद्धांत • ए. ओ. ह्यूम: प्रथम महासचिव • सेफ्टी वाल्व सिद्धांत (लाजपत राय) • तड़ित चालक सिद्धांत (गोखले) आर्थिक राष्ट्रवाद • दादाभाई नौरोजी: धन निष्कासन • आर. सी. दत्त: Economic History • प्रार्थना-याचिका नीति (3Ps) उदारवादी विरासत संवैधानिक सुधारों की मांग, ब्रिटिश आर्थिक लूट का पर्दाफाश, तथा धर्मनिरपेक्ष अखिल भारतीय राजनीतिक चेतना का निर्माण। चरण 3 (1905–11) स्वदेशी आंदोलन बंगाल विभाजन व उग्रवादी धारा कर्जन का बंगाल विभाजन • हिंदू-मुस्लिम एकता पर चोट • प्रभावी: 16 अक्टूबर 1905 स्वदेशी एवं बहिष्कार • विदेशी वस्त्र व नमक का बहिष्कार • बंगाल केमिकल्स (पी. सी. राय) • बंग लक्ष्मी कॉटन मिल संस्कृति व राष्ट्रीय शिक्षा • रक्षा बंधन (रवींद्रनाथ ठाकुर) • राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (1906) • लाल-बाल-पाल व सूरत फूट (1907) अंतिम विजय (1911) राष्ट्रव्यापी जनसंघर्ष के दबाव में ब्रिटिश सरकार ने 1911 में बंगाल विभाजन रद्द किया व राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित की।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. कांग्रेस-पूर्व संस्थागत जागृति: 1836 में बंगभाषा प्रकाशिका सभा और 1838 में जमींदारी सभा के साथ आधुनिक राजनीति का आरंभ हुआ और 1876 में सुरेंद्रनाथ बनर्जी की भारत सभा ने इसे मध्यम वर्ग के अखिल भारतीय मंच में परिवर्तित किया।
मुख्य बिंदु 2
  1. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: नवगोपाल मित्र और राजनारायण बसु के हिंदू मेला (1867) ने स्वदेशी वस्तुओं, शारीरिक सौष्ठव, व्यायाम और देशभक्ति गीतों के जरिए राष्ट्रीय चेतना को जनमानस में गहराई से रोपा।
मुख्य बिंदु 3
  1. लॉर्ड लिटन की दमनकारी नीतियां: अकाल के बीच 1877 का दिल्ली दरबार, 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट व शस्त्र कानून और आई.सी.एस. में आयु घटाने (21 से 19) ने भारतीयों में गहरा रोष और एकता की भावना जगाई।
मुख्य बिंदु 4
  1. इल्बर्ट बिल विवाद (1883): भारतीय न्यायाधीशों को समानता देने के विरोध में अंग्रेजों के हिंसक आंदोलन ने भारतीयों को सिखाया कि अधिकारों की रक्षा के लिए एक स्थायी अखिल भारतीय संगठन अनिवार्य है।
मुख्य बिंदु 5
  1. राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885): ए. ओ. ह्यूम की पहल पर बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में 72 प्रतिनिधियों के साथ अध्यक्ष उमेश चंद्र बनर्जी के नेतृत्व में कांग्रेस की स्थापना हुई, जिसे गोखले ने 'तड़ित चालक' कहा।
मुख्य बिंदु 6
  1. उदारवादी दौर व आर्थिक राष्ट्रवाद: 1885–1905 के दौर में उदारवादियों ने 3-P नीति से आंदोलन किया और दादाभाई नौरोजी व आर. सी. दत्त ने 'धन निष्कासन सिद्धांत' (Drain of Wealth) प्रस्तुत कर ब्रिटिश लूट को बेनकाब किया।
मुख्य बिंदु 7
  1. बंगाल विभाजन व स्वदेशी आंदोलन (1905): लॉर्ड कर्जन के कुटिल विभाजन के विरोध में ऐतिहासिक स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें रवींद्रनाथ का रक्षा बंधन और राष्ट्रीय शिक्षा परिषद प्रमुख रहे।
मुख्य बिंदु 8
  1. उग्रवाद का प्रसार व विभाजन रद्द होना (1911): लाल-बाल-पाल और तिलक के 'स्वराज्य' आह्वान ने आंदोलन को जनव्यापी बनाया, सूरत फूट के बावजूद भारी जनाक्रोश के दबाव में ब्रिटिश सरकार ने 1911 में बंगाल विभाजन रद्द किया व राजधानी दिल्ली ले गई।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1876 में स्थापित भारत सभा (इंडियन एसोसिएशन) के प्रमुख उद्देश्य क्या थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंदमोहन बोस के नेतृत्व में कलकत्ता के अल्बर्ट हॉल में स्थापित भारत सभा के चार प्रमुख लक्ष्य थे: (1) संपूर्ण भारत में सशक्त जनमत तैयार करना, (2) साझे राजनीतिक कार्यक्रम पर सभी भारतीयों को एकजुट करना, (3) हिंदू-मुस्लिम भाईचारा स्थापित करना, और (4) जनसाधारण को राजनीतिक आंदोलन में शामिल करना।
सुरेंद्रनाथ बनर्जी द्वारा घोषित चार ऐतिहासिक उद्देश्यों का स्मरण करें।
2
1877 में आई.सी.एस. परीक्षा की अधिकतम आयु सीमा घटाने से भारतीय युवाओं को क्या नुकसान हुआ?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अधिकतम आयु सीमा 21 से घटाकर 19 वर्ष कर दी गई। परीक्षा केवल लंदन में होती थी और पाठ्यक्रम लैटिन व ग्रीक पर आधारित था। मात्र 19 वर्ष की आयु में समुद्र पार जाकर ब्रिटिश छात्रों से मुकाबला करना भारतीय युवाओं के लिए लगभग असंभव था, जिसके विरुद्ध भारत सभा ने देशव्यापी आंदोलन चलाया।
आयु सीमा, परीक्षा केंद्र और परीक्षा के भाषा माध्यम पर विचार करें।
3
कांग्रेस स्थापना के संबंध में 'सेफ्टी वाल्व' और 'तड़ित चालक' सिद्धांतों में क्या बुनियादी अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 'सेफ्टी वाल्व सिद्धांत' (लाला लाजपत राय) का मानना है कि अंग्रेजों ने किसान विद्रोह रोकने और अपनी रक्षा के लिए ह्यूम के जरिए कांग्रेस बनाई। जबकि 'तड़ित चालक सिद्धांत' (गोपाल कृष्ण गोखले) का कहना है कि भारतीय नेताओं ने सरकारी दमन से कांग्रेस को बचाने के लिए ह्यूम के अंग्रेज होने का इस्तेमाल रक्षा कवच के रूप में किया।
एक सिद्धांत में ब्रिटिश स्वार्थ मुख्य है, दूसरे में भारतीय नेताओं की दूरदर्शिता।
4
धन निष्कासन में 'गृह प्रभार' (Home Charges) से दादाभाई नौरोजी का क्या आशय था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: गृह प्रभार से आशय उन सभी अनिवार्य भुगतानों से था जो भारत सरकार द्वारा ब्रिटेन भेजे जाते थे, जिनमें शामिल थे: (1) लंदन स्थित भारत सचिव के कार्यालय का खर्च, (2) सेवानिवृत्त ब्रिटिश अफसरों की पेंशन और भत्ते, तथा (3) भारत के सार्वजनिक ऋणों और रेलवे पर ब्रिटिश निवेशकों को दिया जाने वाला निश्चित ब्याज।
लंदन स्थित ब्रिटिश गृह सरकार के संचालन हेतु भारत से भेजे जाने वाले धन पर विचार करें।
5
1911 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली क्यों स्थानांतरित की?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कलकत्ता और बंगाल भारतीय उग्र राष्ट्रवाद, स्वदेशी बहिष्कार और क्रांतिकारी गतिविधियों का मुख्य केंद्र बन चुका था। बंगाली बुद्धिजीवियों के राजनीतिक प्रभाव और दबाव से ब्रिटिश प्रशासन को सुरक्षित दूरी पर रखने तथा ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण दिल्ली में सत्ता को सुरक्षित करने के उद्देश्य से राजधानी बदली गई थी।
कलकत्ता के उग्र राजनीतिक वातावरण से बचाव और दिल्ली का ऐतिहासिक महत्व।
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