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WBB • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 11
अनुमानित समय: 55 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

अस्थिर पृथ्वी

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 भूगोल पाठ्यक्रम "हमारा पृथ्वी" (Our Earth) के द्वितीय अध्याय "अस्थिर पृथ्वी" (Unstable Earth / अध्याय २: अस्थिर पृथ्वी) के संपूर्ण, प्रामाणिक एवं विस्तृत अध्ययन मार्गदर्शिका में आपका स्वागत है। हमारे पैरों के नीचे स्थिर प्रतीत होने वाली यह पृथ्वी भूगर्भिक शक्तियों के प्रभाव से निरंतर गतिशील एवं परिवर्तनशील है। पृथ्वी की ठोस बाह्य परत—स्थलमंडल (Lithosphere)—विशाल एवं सूक्ष्म विवर्तनिक प्लेटों (Tectonic Plates) में विभक्त है। ये प्लेटें भूगर्भ में १०० से २५० किमी की गहराई पर स्थित अर्ध-पिघले, लचीले एवं प्लास्टिक जैसे एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere) के ऊपर रेडियोधर्मी ऊष्मा से उत्पन्न संवहन धाराओं (Convection Currents) के सहारे प्रति वर्ष २ से १० सेमी की गति से खिसक रही हैं। अल्फ्रेड वेगेनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift) से विकसित आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार ये प्लेटें तीन प्रमुख सीमाओं पर परस्पर अंतःक्रिया करती हैं: अभिसारी सीमाएँ (जहाँ दो प्लेटों के टकराने से महासागरीय गर्त, ज्वालामुखीय द्वीप चाप तथा हिमालय जैसे नवीन वलित पर्वत बनते हैं), अपसारी सीमाएँ (जहाँ प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं और मध्य-अटलांटिक कटक जैसे नवीन समुद्री नितल का निर्माण होता है), तथा रूपांतर सीमाएँ (जहाँ प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर क्षैतिज रूप से फिसलती हैं, जैसे सैन एंड्रियास भ्रंश)। जब भूगर्भिक चट्टानों में संचित तनाव अचानक टूटता है, तो प्रत्यास्थ ऊर्जा भूकंपीय तरंगों (P, S एवं L तरंगें) के रूप में केंद्र (Focus) से सतह के अधिकेंद्र (Epicenter) की ओर प्रसारित होती है। प्रशांत महासागर के चारों ओर फैली सबडक्शन मेखला—प्रशांत अग्नि वलय (Ring of Fire)—विश्व के ७५% सक्रिय ज्वालामुखियों तथा ९०% भूकंपों का केंद्र है, जबकि समुद्रतल में उठने वाले तीव्र भूकंप विनाशकारी सुनामी (Tsunami) को जन्म देते हैं। यह अध्याय २५ गहन उपखंडों वाले ५ मॉड्यूल्स, ९२०x५२० रिस्पॉन्सिव वेक्टर SVG संप्रत्यय मानचित्र, ८ वैज्ञानिक सूत्रों, ८ हल किए गए प्रामाणिक उदाहरणों, ७ परीक्षार्थी ट्रैप चेतावनियों, ८ मुख्य सारांश बिंदुओं, ८ महत्वपूर्ण निष्कर्षों, ५ विस्तृत स्व-मूल्यांकन प्रश्नों एवं ५ आधुनिक CBT बहुविकल्पीय प्रश्नों (MCQ) से सुसज्जित है।

🌍 चंचल एवं चलायमान पृथ्वी: खिसकते महाद्वीप, धधकते ज्वालामुखी और प्रलयंकारी सुनामी!

क्या आप जानते हैं कि दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट (८,८४८.८६ मीटर) के शिखर पर प्राचीन समुद्री जीवों और सीपियों के जीवाश्म पाए जाते हैं?

करोड़ों वर्ष पूर्व हमारे सभी महाद्वीप एक ही विशालकाय आदिम महाद्वीप पैंजिया (Pangaea) के रूप में जुड़े हुए थे, जिसके चारों ओर अथाह महासागर पैंथालासा (Panthalassa) फैला हुआ था। पृथ्वी के गर्भ में खौलते मैग्मा की संवहन धाराओं के दबाव से यह महाद्वीप टूटकर टुकड़ों में बंट गया और तैरने लगा। जब ये भीमकाय प्लेटें आमने-सामने टकराती हैं, तो समुद्र की तलहटी मुड़कर गगनचुंबी पर्वतों में बदल जाती है, जमीन कांप उठती है और ज्वालामुखी आग उगलने लगते हैं!

आइए जानें कि अल्फ्रेड वेगेनर ने महाद्वीपों के खिसकने का रहस्य कैसे सुलझाया, सीस्मोग्राफ कैसे भूकंप की अदृश्य तरंगों को दर्ज करता है, और समुद्र में उठने वाली सुनामी से खुद को कैसे सुरक्षित रखा जाए—हमारी सदा अशांत अस्थिर पृथ्वी की इस रोमांचक यात्रा में!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 भूगोल पाठ्यक्रम "हमारा पृथ्वी" (Our Earth) के द्वितीय अध्याय "अस्थिर पृथ्वी" (Unstable Earth / अध्याय २: अस्थिर पृथ्वी) के संपूर्ण, प्रामाणिक एवं विस्तृत अध्ययन मार्गदर्शिका में आपका स्वागत है। हमारे पैरों के नीचे स्थिर प्रतीत होने वाली यह पृथ्वी भूगर्भिक शक्तियों के प्रभाव से निरंतर गतिशील एवं परिवर्तनशील है। पृथ्वी की ठोस बाह्य परत—स्थलमंडल (Lithosphere)—विशाल एवं सूक्ष्म विवर्तनिक प्लेटों (Tectonic Plates) में विभक्त है। ये प्लेटें भूगर्भ में १०० से २५० किमी की गहराई पर स्थित अर्ध-पिघले, लचीले एवं प्लास्टिक जैसे एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere) के ऊपर रेडियोधर्मी ऊष्मा से उत्पन्न संवहन धाराओं (Convection Currents) के सहारे प्रति वर्ष २ से १० सेमी की गति से खिसक रही हैं। अल्फ्रेड वेगेनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift) से विकसित आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार ये प्लेटें तीन प्रमुख सीमाओं पर परस्पर अंतःक्रिया करती हैं: अभिसारी सीमाएँ (जहाँ दो प्लेटों के टकराने से महासागरीय गर्त, ज्वालामुखीय द्वीप चाप तथा हिमालय जैसे नवीन वलित पर्वत बनते हैं), अपसारी सीमाएँ (जहाँ प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं और मध्य-अटलांटिक कटक जैसे नवीन समुद्री नितल का निर्माण होता है), तथा रूपांतर सीमाएँ (जहाँ प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर क्षैतिज रूप से फिसलती हैं, जैसे सैन एंड्रियास भ्रंश)। जब भूगर्भिक चट्टानों में संचित तनाव अचानक टूटता है, तो प्रत्यास्थ ऊर्जा भूकंपीय तरंगों (P, S एवं L तरंगें) के रूप में केंद्र (Focus) से सतह के अधिकेंद्र (Epicenter) की ओर प्रसारित होती है। प्रशांत महासागर के चारों ओर फैली सबडक्शन मेखला—प्रशांत अग्नि वलय (Ring of Fire)—विश्व के ७५% सक्रिय ज्वालामुखियों तथा ९०% भूकंपों का केंद्र है, जबकि समुद्रतल में उठने वाले तीव्र भूकंप विनाशकारी सुनामी (Tsunami) को जन्म देते हैं। यह अध्याय २५ गहन उपखंडों वाले ५ मॉड्यूल्स, ९२०x५२० रिस्पॉन्सिव वेक्टर SVG संप्रत्यय मानचित्र, ८ वैज्ञानिक सूत्रों, ८ हल किए गए प्रामाणिक उदाहरणों, ७ परीक्षार्थी ट्रैप चेतावनियों, ८ मुख्य सारांश बिंदुओं, ८ महत्वपूर्ण निष्कर्षों, ५ विस्तृत स्व-मूल्यांकन प्रश्नों एवं ५ आधुनिक CBT बहुविकल्पीय प्रश्नों (MCQ) से सुसज्जित है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पृथ्वी की आंतरिक संरचना: भूपर्पटी (सियाल व सिमा), मेंटल (एस्थेनोस्फीयर) एवं क्रोड का आधारभूत ज्ञान।
  • ऊष्मा संचरण के विभिन्न प्रकार: संवहन (Convection) तरंगों की क्रियाविधि एवं तरल माध्यम में प्रवाह।
  • बल के प्रकार: संपीडन (दबाव), तनाव (खिंचाव) तथा अपरूपण (कतरनी) बल।
  • तरंग गति के मूल सिद्धांत: अनुदैर्ध्य तरंगें (P-तरंगें) बनाम अनुप्रस्थ तरंगें (S-तरंगें)।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • अल्फ्रेड वेगेनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (पैंजिया, पैंथालासा, जिग-सॉ फिट एवं जीवाश्म प्रमाण) की व्याख्या करना।
  • आर्थर होम्स की संवहन धारा परिकल्पना एवं एस्थेनोस्फीयर की संवहन गतिशीलता को समझना।
  • ७ प्रमुख एवं महत्वपूर्ण लघु विवर्तनिक प्लेटों की पहचान करना तथा अभिसारी, अपसारी व रूपांतर प्लेट सीमाओं में अंतर स्पष्ट करना।
  • भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव से प्राचीन टेथिस सागर से हिमालय के उत्थान की भूगर्भिक प्रक्रिया का विश्लेषण करना।
  • महादेशजनक एवं पर्वतजनक संचलन में भेद करना तथा वलित, भ्रंशोत्थ (ब्लॉक) एवं अवशिष्ट पर्वतों के निर्माण को स्पष्ट करना।
  • ज्वालामुखी की संरचना, अम्लीय बनाम क्षारीय लावा की श्यानता तथा सक्रिय, प्रसुप्त व शांत ज्वालामुखियों का वर्गीकरण करना।
  • भूकंप उत्पत्ति (रीड का प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप सिद्धांत), अवकेंद्र बनाम अधिकेंद्र तथा P, S व L तरंगों की भौतिकी को समझना।
  • रिक्टर परिमाण पैमाने एवं मर्काली तीव्रता पैमाने में अंतर करना, सुनामी गतिविज्ञान ($v = \sqrt{gh}$) समझना एवं भूकंप सुरक्षा नियमों को लागू करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 १. महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना, ए...
2 २. भू-संचलन, पर्वत निर्माण एवं वलित...
3 ३. ज्वालामुखी उद्गार, लावा के प्रका...
4 ४. भूकंप विज्ञान, भूकंपीय तरंगें एव...
5 ५. प्रशांत महासागरीय अग्नि वलय, सुन...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

१. महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना, एस्थेनोस्फीयर एवं प्लेट विवर्तनिकी

१.१ अल्फ्रेड वेगेनर की महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना (Continental Drift, 1912)

१९१२ ईस्वी में जर्मन मौसमविद् एवं भूभौतिकीविद् अल्फ्रेड वेगेनर (Alfred Wegener) ने अपनी युगांतरकारी महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना प्रस्तुत की। वेगेनर के अनुसार, लगभग २५ से ३० करोड़ वर्ष पूर्व (कार्बोनिफेरस युग में) पृथ्वी के समस्त महाद्वीप परस्पर जुड़कर एक विशालकाय अविभाज्य आदिम महाद्वीप के रूप में स्थित थे, जिसे पैंजिया (Pangaea) (ग्रीक भाषा में 'समग्र पृथ्वी') कहा गया। इस पैंजिया को चारों ओर से घेरने वाले अथाह वैश्विक महासागर को पैंथालासा (Panthalassa) ('समग्र जल') नाम दिया गया।

मेसोज़ोइक युग में आंतरिक तनावों के कारण पैंजिया दो विशाल भूखंडों में टूट गया:

  • लॉरेशिया या अंगारालैंड (Laurasia / Angaraland): उत्तरी भूखंड, जिसमें आधुनिक उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलैंड, यूरोप तथा एशिया (भारतीय उपमहाद्वीप को छोड़कर) शामिल थे।
  • गोंडवानालैंड (Gondwanaland): दक्षिणी भूखंड, जिसमें आधुनिक दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, मेडागास्कर, भारत, ऑस्ट्रेलिया एवं अंटार्कटिका सम्मिलित थे।
  • टेथिस सागर (Tethys Sea): लॉरेशिया और गोंडवानालैंड के मध्य स्थित एक संकरा, उथला पूर्व-पश्चिम विस्तृत भूसन्नति सागर था।

१.२ महाद्वीपीय विस्थापन के पक्ष में प्रत्यक्ष वैज्ञानिक प्रमाण

प्रमाण का वर्ग सुस्पष्ट वैज्ञानिक प्रेक्षण एवं तथ्य भूगर्भिक निष्कर्ष
तटरेखाओं की साम्यता (Jigsaw Fit) दक्षिण अमेरिका के पूर्वी अटलांटिक तट का उभार (ब्राजील) अफ्रीका के पश्चिमी गिनी तट के खांच में जिग-सॉ पहेली की भांति सटीक बैठ जाता है। यह सिद्ध करता है कि दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका कभी एक ही अविभाज्य भूभाग थे जो बाद में टूटकर अलग हुए।
जीवाश्मों में समरूपता मीठे पानी के छोटे सरीसृप मेसोसॉरस (Mesosaurus) के जीवाश्म केवल पूर्वी दक्षिण अमेरिका और दक्षिणी अफ्रीका में मिलते हैं (जो खारे समुद्र को तैरकर पार नहीं कर सकते थे)। इसके अतिरिक्त ग्लॉसोप्टेरिस (Glossopteris) नामक फर्न के जीवाश्म भारत, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका और अंटार्कटिका में पाए गए हैं। ये जीव उस समय एक ही भूभाग पर निवास करते थे जब महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे।
हिमानी अवक्षेप एवं टिलाइट (Tillites) लगभग ३० करोड़ वर्ष पुराने हिमानी घर्षण के निशान एवं टिलाइट चट्टानें उष्णकटिबंधीय भारत (तालचेर), मध्य अफ्रीका, ब्राजील और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में समान आयु के स्तरों में विद्यमान हैं। ये सभी भूखंड उस समय दक्षिणी ध्रुव के निकट बर्फ से आच्छादित होकर एक साथ स्थित थे।
भूगर्भिक संरचना की निरंतरता उत्तरी अमेरिका की प्राचीन अप्लेशियन पर्वत श्रृंखला चट्टानों की आयु, संरचना एवं दिशा में ग्रेट ब्रिटेन की कैलेडोनियन तथा स्कैंडिनेविया की पर्वत श्रेणियों से हूबहू मेल खाती है। अटलांटिक महासागर के खुलने से पहले यह एक अविच्छिन्न पर्वत मेखला थी।

१.३ आर्थर होम्स की संवहन धाराएँ एवं एस्थेनोस्फीयर

वेगेनर के सिद्धांत की सबसे बड़ी कमी यह थी कि वे महाद्वीपों को खिसकाने वाले वास्तविक बल की सटीक व्याख्या नहीं कर सके। १९२८-१९३० ईस्वी में ब्रिटिश भूवैज्ञानिक आर्थर होम्स (Arthur Holmes) ने पृथ्वी के आंतरिक भाग में तापीय संवहन धाराओं (Thermal Convection Currents) की संकल्पना देकर इस पहेली को सुलझाया।

  • एस्थेनोस्फीयर (दुर्बलता मंडल / Asthenosphere): भूपर्पटी के नीचे ऊपरी मेंटल में १०० से २५० किमी की गहराई पर स्थित एक विशेष परत। अत्यधिक भूगर्भिक ताप (१०००°–१४००°C) और दाब के कारण यहाँ की पेरिडोटाइट चट्टानें अर्ध-पिघली, लचीली, श्यान एवं प्लास्टिक जैसी अवस्था में होती हैं।
  • संवहन धाराओं की उत्पत्ति: पृथ्वी के गहरे आंतरिक भाग में यूरेनियम, थोरियम और पोटैशियम के रेडियोधर्मी क्षय से असीम ऊष्मा उत्पन्न होती है। गर्म मैग्मा हल्का होकर ऊपर उठता है, भूपर्पटी के नीचे क्षैतिज रूप से फैलता है, ठंडा होकर भारी होकर पुनः नीचे बैठता है। इससे चक्रीय संवहन धाराएं बनती हैं।
  • कन्वेयर बेल्ट प्रभाव: एस्थेनोस्फीयर के ऊपर तैरने वाले दृढ़ स्थलमंडलीय प्लेट इन संवहन धाराओं के घर्षण द्वारा कन्वेयर बेल्ट की भांति कुछ सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से क्षैतिज रूप से खिसकते रहते हैं।

१.४ आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory)

१९६० के दशक में डैन मैकेंजी, रॉबर्ट पार्कर, डब्ल्यू. जेसन मॉर्गन तथा जेवियर ले पिचोन (Le Pichon) के संयुक्त अनुसंधानों से आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत स्थापित हुआ। इसके अनुसार पृथ्वी का स्थलमंडल अनेक दृढ़, स्वतंत्र रूप से गतिशील विवर्तनिक प्लेटों (Tectonic Plates) में बंटा हुआ है।

पृथ्वी का धरातल ७ प्रमुख प्लेटों एवं अनेक लघु प्लेटों से मिलकर बना है:

  1. प्रशांत महासागरीय प्लेट (Pacific Plate): विश्व की सबसे बड़ी प्लेट, जो पूर्णतः महासागरीय भूपर्पटी से बनी है।
  2. उत्तरी अमेरिकी प्लेट (North American Plate): उत्तरी अमेरिका महाद्वीप एवं पश्चिमी उत्तरी अटलांटिक महासागर का तल।
  3. दक्षिणी अमेरिकी प्लेट (South American Plate): दक्षिण अमेरिका एवं पश्चिमी दक्षिणी अटलांटिक का तल।
  4. यूरेशियन प्लेट (Eurasian Plate): यूरोप तथा अधिकांश एशिया (भारतीय उपमहाद्वीप व अरब को छोड़कर)।
  5. अफ्रीकी प्लेट (African Plate): अफ्रीका महाद्वीप एवं संलग्न अटलांटिक व हिंद महासागर का तल।
  6. इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट (Indo-Australian Plate): भारतीय उपमहाद्वीप, ऑस्ट्रेलिया एवं हिंद महासागर की द्रोणी।
  7. अंटार्कटिक प्लेट (Antarctic Plate): अंटार्कटिका महाद्वीप एवं उसे घेरने वाला दक्षिणी महासागर।

प्रमुख लघु प्लेटें: नाज़का प्लेट (Nazca), कोकोस प्लेट (Cocos), अरबियन प्लेट (Arabian), फिलीपीन प्लेट, कैरेबियन प्लेट, जुआन डी फूका प्लेट एवं स्कॉटिया प्लेट।

१.५ प्लेट सीमाओं के तीन प्रकार एवं बेनियोफ मंडल

प्लेट सीमा का प्रकार संचलन की दिशा एवं स्वरूप भूगर्भिक परिणाम एवं निर्मित स्थलाकृतियाँ विश्वप्रसिद्ध उदाहरण
अभिसारी प्लेट सीमा (Convergent / Destructive Boundary) दो प्लेटें आमने-सामने टकराती हैं (संपीडन बल)। भारी महासागरीय प्लेट हल्की महाद्वीपीय प्लेट के नीचे एस्थेनोस्फीयर में धंस जाती है। विनाशकारी किनारा: धंसी हुई प्लेट पिघलकर नष्ट हो जाती है। गहरे महासागरीय गर्त (Trench), ज्वालामुखीय चाप तथा विशाल वलित पर्वत बनते हैं। ४५° कोण पर झुके हुए अत्यधिक भूकंप-प्रवण क्षेत्र को वाडाती-बेनियोफ मंडल (Benioff Zone) कहते हैं। • नाज़का व दक्षिण अमेरिकी प्लेट $\to$ एंडीज पर्वतमाला एवं पेरू-चिली गर्त।
• भारतीय व यूरेशियन प्लेट $\to$ हिमालय पर्वतमाला।
• प्रशांत व मारियाना प्लेट $\to$ मारियाना गर्त (११,०३४ मीटर)।
अपसारी प्लेट सीमा (Divergent / Constructive Boundary) दो प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में दूर हटती हैं (तनाव बल)। दरार से भूगर्भिक मैग्मा बाहर आता है। रचनात्मक किनारा: नया बेसाल्टिक महासागरीय क्रस्ट बनता है (समुद्री नितल प्रसार)। भ्रंश घाटियाँ एवं मध्य-महासागरीय कटक बनते हैं। • मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge) (अमेरिकन एवं यूरेशियन-अफ्रीकी प्लेटों का अलगाव)।
• पूर्वी अफ्रीका की महान भ्रंश घाटी।
रूपांतर प्लेट सीमा (Transform / Conservative Boundary) दो प्लेटें ऊर्ध्वाधर रूप से एक-दूसरे के समानांतर क्षैतिज दिशा में फिसलती हैं। संरक्षी किनारा: न तो नई भूपर्पटी बनती है और न ही पुरानी नष्ट होती है। अत्यधिक घर्षण के कारण भीषण उथले भूकंप उत्पन्न होते हैं। • कैलिफोर्निया (USA) का प्रसिद्ध सैन एंड्रियास भ्रंश (San Andreas Fault)।

२. भू-संचलन, पर्वत निर्माण एवं वलित पर्वतों की उत्पत्ति

२.१ भू-संचलनों का वर्गीकरण: अंतर्जात बनाम बहिर्जात बल

धरातल के स्वरूप का निर्धारण दो विरोधी प्राकृतिक बलों के संघर्ष द्वारा होता है:

  • बहिर्जात बल (Exogenetic Forces): सूर्य की ऊर्जा से संचालित बाह्य बल (नदियाँ, पवन, हिमानी, समुद्री तरंगें एवं अपक्षय), जो ऊँचे भूभागों को काटकर समतल बनाने का सतत प्रयास करते हैं।
  • अंतर्जात बल (Endogenetic Forces): पृथ्वी के भीतर तापीय ऊर्जा, रेडियोधर्मिता एवं संवहन धाराओं से उत्पन्न आंतरिक बल। ये दो प्रकार के होते हैं:
    1. आकस्मिक भू-संचलन (Catastrophic Movements): अत्यंत तीव्र एवं विनाशकारी हलचलें, जैसे भूकंप एवं ज्वालामुखी उद्गार, जो कुछ ही पलों में दृश्यभूमि को बदल डालते हैं।
    2. पटल विरूपणी संचलन (Diastrophic Movements): लाखों वर्षों में अत्यंत धीमी गति से कार्य करने वाले दीर्घकालिक संचलन, जिन्हें महादेशजनक एवं पर्वतजनक संचलनों में बांटा जाता है।

२.२ महादेशजनक बनाम पर्वतजनक संचलन

तुलना का आधार महादेशजनक संचलन (Epeirogenic Movement) पर्वतजनक संचलन (Orogenic Movement)
शाब्दिक अर्थ ग्रीक Epeiros = महाद्वीप, एवं Genesis = उत्पत्ति। ग्रीक Oros = पर्वत, एवं Genesis = उत्पत्ति।
बल की दिशा पृथ्वी के केंद्र से त्रिज्या के अनुदिश ऊर्ध्वाधर (लंबवत) कार्य करता है (ऊपर उठना या नीचे धंसना)। धरातल के स्पर्शक के अनुदिश क्षैतिज रूप से कार्य करता है (पार्श्वीय संपीडन या तनाव)।
प्रभावित क्षेत्र विशाल महाद्वीपीय भूभाग तथा विस्तृत पठारी क्षेत्र प्रभावित होते हैं। भूपर्पटी की संकीर्ण एवं लंबी पट्टियों में केंद्रित रहता है।
निर्मित स्थलाकृतियाँ उठे हुए तटीय मैदान, समुद्री चबूतरे एवं विस्तृत पठार बनते हैं। चट्टानों में तीव्र मोड़ नहीं पड़ते। चट्टानों में अत्यधिक संपीडन से लहरदार मोड़ पड़ते हैं और वलित पर्वत (Fold Mountains) बनते हैं।

२.३ वलित पर्वतों की उत्पत्ति: भारतीय व यूरेशियन प्लेट का टकराव एवं हिमालय

जब दो विपरीत दिशाओं से आने वाले क्षैतिज संपीडन बलों के कारण तलछटी चट्टानों में लहरदार मोड़ पड़ते हैं, तो वलित पर्वत (Fold Mountains) का निर्माण होता है। उठे हुए भाग को अपनति (Anticline) और धंसे हुए भाग को अभिनति (Syncline) कहते हैं।

हिमालय निर्माण का भूगर्भिक इतिहास:

  • लगभग ७ करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट भूमध्य रेखा के दक्षिण में एक स्वतंत्र द्वीप के रूप में स्थित थी और प्रति वर्ष १५-२० सेमी की तेज गति से उत्तर में यूरेशिया की ओर बढ़ रही थी।
  • भारतीय भूखंड एवं यूरेशियन भूखंड के मध्य टेथिस सागर (Tethys Sea) नामक एक अत्यंत विशाल भूसन्नति (Geosyncline) विद्यमान थी, जिसमें दोनों ओर की नदियों द्वारा करोड़ों वर्षों तक भारी मात्रा में अवसाद जमा किया गया।
  • लगभग ४.५ से ५ करोड़ वर्ष पूर्व टेथिस सागर का महासागरीय नितल मेंटल में विलीन हो गया और दोनों महाद्वीपीय प्लेटें—भारतीय प्लेट एवं यूरेशियन प्लेट—सीधे आमने-सामने टकराईं।
  • चूंकि दोनों ही प्लेटें हल्की महाद्वीपीय सियल ग्रेनाइट चट्टानों से बनी थीं ($\rho \approx २.७\text{ ग्राम/सेमी}^३$), अतः कोई भी प्लेट मेंटल में गहराई तक नहीं धंस सकी। परिणामस्वरूप टेथिस सागर के अवसाद भीषण संपीडन से मुड़कर आसमान की ओर उठ गए और हिमालय पर्वतमाला तथा तिब्बत के पठार का निर्माण हुआ।
  • प्रत्यक्ष साक्ष्य: माउंट एवरेस्ट के शिखर पर ८,००० मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित चूना पत्थर में प्राचीन समुद्री जीवों, सीपियों तथा अमोनियाई जीवाश्मों (शालिग्राम) की उपस्थिति प्रमाणित करती है कि आज का हिमालय कभी समुद्र का तल था!

२.४ भ्रंशोत्थ पर्वत एवं भ्रंश घाटी (Block Mountains & Rift Valleys)

जब धरातल पर विपरीत दिशाओं में कार्य करने वाले क्षैतिज तनाव बल (Tensional Force) का प्रभाव पड़ता है, तो कठोर चट्टानों में दरारें या भ्रंश (Faults) उत्पन्न होते हैं:

  • भ्रंशोत्थ पर्वत या हॉर्स्ट (Block Mountain / Horst): जब दो समानांतर भ्रंशों के दोनों ओर का भाग नीचे धंस जाता है और बीच का भाग यथावत खड़ा रहता है, या बीच का भाग ऊपर उठ जाता है, तो चपटे शिखर एवं खड़े ढाल वाले पर्वत का निर्माण होता है। उदाहरण: जर्मनी का ब्लैक फॉरेस्ट (Black Forest), फ्रांस का वॉसजेस (Vosges), तथा भारत का सतपुड़ा एवं विंध्याचल पर्वत।
  • भ्रंश घाटी या ग्रैबेन (Rift Valley / Graben): जब दो समानांतर सामान्य भ्रंशों के बीच का भूभाग नीचे धंस जाता है, तो एक खड़ी दीवारों वाली लंबी द्रोणी बनती है। उदाहरण: यूरोप की राइन भ्रंश घाटी, अफ्रीका की महान भ्रंश घाटी (Great Rift Valley), तथा भारत में नर्मदा और दामोदर नदी घाटी।

२.५ अवशिष्ट पर्वत (Residual / Relict Mountains)

करोड़ों वर्षों तक बाह्य अपरदनकारी शक्तियों (धूप, वर्षा, नदी एवं वायु) के निरंतर प्रहार से जब प्राचीन वलित अथवा ब्लॉक पर्वतों की कोमल चट्टानें कटकर बह जाती हैं और केवल कठोर चट्टानी भाग ऊंचे-नीचे टीलों के रूप में शेष रह जाते हैं, तो उन्हें अवशिष्ट पर्वत कहते हैं। उदाहरण: भारत की अरावली पर्वतमाला (विश्व के सबसे प्राचीन वलित पर्वतों में से एक, जो आज घिसकर अवशिष्ट पर्वत बन चुकी है), संयुक्त राज्य अमेरिका का अप्लेशियन पर्वत, तथा दक्षिण भारत की नीलगिरि पहाड़ियाँ।

३. ज्वालामुखी उद्गार, लावा के प्रकार एवं ज्वालामुखीय स्थलाकृतियाँ

३.१ ज्वालामुखी की संरचना (Anatomy of a Volcano)

भूपर्पटी के किसी कमजोर छिद्र अथवा दरार से जब भूगर्भ का अत्यधिक गर्म गलित मैग्मा, गैसें, जलवाष्प, राख एवं चट्टानी टुकड़े तीव्र वेग से बाहर निकलकर शंकु या गुंबदनुमा पहाड़ी का रूप धारण करते हैं, तो उसे ज्वालामुखी (Volcano) कहते हैं।

  • मैग्मा बनाम लावा (Magma vs. Lava): धरातल के नीचे अत्यधिक ताप एवं दाब पर उपस्थित पिघली हुई चट्टानों के मिश्रण को मैग्मा कहते हैं; जब यही मैग्मा भूपर्पटी को चीरकर सतह पर बहने लगता है, तो उसे लावा कहा जाता है।
  • मैग्मा प्रकोष्ठ (Magma Chamber): भूगर्भ का वह विशाल कक्ष जहाँ मैग्मा जमा रहता है।
  • ज्वालामुखी नली (Conduit / Vent): वह निकास नली जिसके माध्यम से मैग्मा धरातल पर पहुंचता है।
  • क्रेटर (Crater / क्रेटर): ज्वालामुखी के शिखर पर स्थित कीपाकार या प्यालेनुमा मुख जिससे लावा बाहर आता है।
  • काल्डेरा (Caldera): भयंकर विस्फोटक उद्गार के पश्चात जब मैग्मा प्रकोष्ठ खाली हो जाता है और ज्वालामुखी का पूरा शिखर धंसकर एक विशाल गड्ढे में तब्दील हो जाता है (जैसे सुमात्रा की तोबा झील, अमेरिका की क्रेटर लेक)।
  • पायरोक्लास्टिक मलबा: विस्फोट के समय हवा में उछाले गए ठोस टुकड़े, जिनमें सूक्ष्म ज्वालामुखीय राख, मटर के दाने जितने लैपिली (Lapilli) तथा विशाल ज्वालामुखीय बम शामिल होते हैं।

३.२ अम्लीय लावा बनाम क्षारीय लावा: श्यानता एवं उद्गार स्वरूप

गुण एवं विशेषता अम्लीय लावा (Acidic / Felsic Lava) क्षारीय लावा (Basic / Mafic Lava)
सिलिका की मात्रा ($\text{SiO}_2$) सिलिका अत्यधिक: ६५% से ७५% से अधिक। सिलिका कम: ४५% से ५५% से कम।
श्यानता एवं गाढ़ापन (Viscosity) अत्यधिक श्यान, गाढ़ा, चिपचिपा व लसलसा; बहुत धीमे बहता है। बहुत कम श्यान; अत्यंत पतला, पानी की भांति तेजी से दूर तक बहता है।
उद्गार के समय तापमान अपेक्षाकृत कम: लगभग ७००° – ९००°C। अत्यधिक गर्म: लगभग १०००° – १२५०°C।
उद्गार की प्रकृति अत्यंत भयंकर एवं विस्फोटक: गाढ़ा लावा निकास नली को बंद कर देता है, जिससे अंदर बनी वाष्प व गैसें भयंकर धमाके के साथ फटती हैं। शांत एवं दरारी उद्गार: गैसें आसानी से निकल जाती हैं; लावा बिना किसी धमाके के दरारों से शांत भाव से बहकर फैलता है।
निर्मित स्थलाकृतियाँ खड़े ढाल वाले ऊंचे गुंबद एवं मिश्रित शंकु पर्वत (जैसे जापान का माउंट फूजी, माउंट पेली)। विस्तृत मंद ढाल वाले शील्ड ज्वालामुखी तथा विशाल सपाट लावा पठार (जैसे भारत का दक्कन ट्रैप, हवाई का मौना लोआ)।

३.३ सक्रियता के आधार पर ज्वालामुखियों का वर्गीकरण

श्रेणी परिभाषा एवं लक्षण विश्वप्रसिद्ध एवं भारतीय उदाहरण
सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcano) वे ज्वालामुखी जिनसे वर्तमान समय में नियमित या बार-बार लावा, गैस व राख निकलती रहती है। यह दो प्रकार का होता है: निरंतर (लगातार सक्रिय) एवं सविराम (रुक-रुक कर सक्रिय)। • बैरन द्वीप (Barren Island): अंडमान सागर में स्थित भारत तथा संपूर्ण दक्षिण एशिया का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी।
• माउंट स्ट्रोम्बोली (Stromboli): इटली, निरंतर प्रज्वलित रहने के कारण इसे "भूमध्य सागर का प्रकाशस्तंभ" कहते हैं।
• माउंट एटना (सिसिली), मौना लोआ (हवाई)।
प्रसुप्त ज्वालामुखी (Dormant Volcano) वे ज्वालामुखी जो ऐतिहासिक काल से शांत पड़े हैं और कोई उद्गार नहीं हुआ है, किंतु उनके भीतर मैग्मा उपस्थित है और कभी भी बिना किसी चेतावनी के अचानक भयंकर विस्फोट हो सकता है। • माउंट फूजी (Fujiyama): जापान (१७०७ से शांत)।
• माउंट विसुवियस (Vesuvius): इटली (७९ ईस्वी में पॉम्पेई शहर को राख में दफना दिया था)।
• क्राकाटोआ (Krakatoa): इंडोनेशिया (१८८३ का प्रलयंकारी विस्फोट)।
शांत या मृत ज्वालामुखी (Extinct Volcano) वे ज्वालामुखी जिनका उद्गार सुदूर अतीत में सदा के लिए समाप्त हो चुका है तथा नली कठोर चट्टान से पूरी तरह बंद हो चुकी है। क्रेटर में पानी भरने से क्रेटर झील बन जाती है। • माउंट पोपा (Mount Popa): म्यांमार।
• नारकोंडम द्वीप (Narcondam): अंडमान सागर, भारत।
• माउंट किलिमंजारो: तंजानिया (अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी)।

३.४ अंतर्वेधी (Plutonic) एवं बहिर्वेधी स्थलाकृतियाँ

मैग्मा जब ऊपर उठता है, तो वह या तो सतह पर लावा बनकर बहता है अथवा भूगर्भ में ही जमकर ठोस हो जाता है:

  • अंतर्वेधी स्थलाकृतियाँ (Intrusive Landforms): भूगर्भ के भीतर निर्मित:
    • बैथोलिथ (Batholith): सैकड़ों वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ भूगर्भ का सबसे विशाल गुंबदाकार आग्नेय पिंड, जो पर्वतों की जड़ें बनाता है।
    • लैकोलिथ (Laccolith): छतरी या कुकुरमुत्ते (Mushroom) के आकार का मैग्मा पिंड, जिसका ऊपरी भाग उत्तल और निचला भाग सपाट होता है।
    • फैकोलिथ (Phacolith): मुड़ी हुई चट्टानों की अपनति के शिखर तथा अभिनति के गर्त में जमा लेंस के आकार का मैग्मा।
    • लोपोलिथ (Lopolith): बीच में तश्तरी (Saucer) की भांति अवतल आकार में जमा मैग्मा।
    • सिल (Sill): अवसादी चट्टानों के संस्तर तलों के समानांतर क्षैतिज रूप से जमी मैग्मा की चादर।
    • डाइक (Dyke): चट्टानों के संस्तर तलों को लंबवत रूप से काटकर दीवार की भांति खड़ा मैग्मा स्तंभ।
  • बहिर्वेधी स्थलाकृतियाँ (Extrusive Landforms): सतह पर निर्मित शंकु, मिश्रित ज्वालामुखी एवं विशाल लावा पठार (जैसे भारत का ५ लाख वर्ग किमी में फैला दक्कन का पठार / डेक्कन ट्रैप)।
  • गीज़र एवं उष्ण जलस्रोत (Geysers & Hot Springs): भूगर्भिक जल जब गर्म चट्टानों के संपर्क में आता है, तो वह उबलने लगता है। यदि यह शांत भाव से निरंतर धरातल पर बहता रहे, तो उसे उष्ण जलस्रोत कहते हैं (जैसे पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले का बकरेश्वर तथा हिमाचल का मणिकर्ण)। यदि अत्यधिक दबाव के कारण उबलता जल एवं वाष्प निश्चित अंतराल पर गगनचुंबी फव्वारे के रूप में धमाके के साथ बाहर निकले, तो उसे गीज़र कहते हैं (जैसे अमेरिका के येलोस्टोन नेशनल पार्क का ओल्ड फेथफुल)।

४. भूकंप विज्ञान, भूकंपीय तरंगें एवं मापन पैमाने

४.१ भूकंप की उत्पत्ति: हैरी रीड का प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप सिद्धांत (Elastic Rebound Theory)

भूगर्भ में अचानक संचित ऊर्जा के मुक्त होने से धरातल में उत्पन्न होने वाले क्षणिक कंपन या दोलन को भूकंप (Earthquake) कहते हैं।

१९०६ ईस्वी के सैन फ्रांसिस्को भूकंप के बाद भूभौतिकीविद् हैरी फील्डिंग रीड (Harry Fielding Reid) ने भूकंप की उत्पत्ति की वैज्ञानिक व्याख्या हेतु प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप सिद्धांत प्रतिपादित किया:

  • विवर्तनिक प्लेटों के निरंतर संचलन के कारण भ्रंश रेखा के आर-पार की चट्टानों में प्रचंड अपरूपण प्रतिबल (Shear Stress) उत्पन्न होता है।
  • चट्टानों में प्रत्यास्थता (Elasticity) का गुण होता है। इसलिए वे तुरंत नहीं टूटतीं, बल्कि खिंचे हुए धनुष की भांति मुड़कर अपने भीतर अपार प्रत्यास्थ ऊर्जा संचित करती जाती हैं।
  • जब तनाव चट्टान की प्रत्यास्थ सहनशीलता से अधिक हो जाता है, तो चट्टान अचानक भ्रंश तल के सहारे टूट जाती है और मुड़े हुए दोनों भाग झटके से अपनी मूल सीधी अवस्था में वापस आते हैं (Rebound)।
  • इस आकस्मिक झटके से संचित स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में बदलकर चारों दिशाओं में प्रघाती तरंगों—भूकंपीय तरंगों (Seismic Waves)—के रूप में फैल जाती है।

४.२ भूकंप केंद्र / अवकेंद्र (Focus) बनाम अधिकेंद्र (Epicenter)

तुलनात्मक बिंदु भूकंप केंद्र या अवकेंद्र (Focus / Hypocenter) भूकंप अधिकेंद्र (Epicenter)
स्थानिक स्थिति भूगर्भ के भीतर का वह निश्चित बिंदु जहाँ चट्टान का विभंजन आरंभ होता है और भूकंपीय ऊर्जा पहली बार विमुक्त होती है। भूकंप केंद्र के ठीक लंबवत ऊपर (९०° कोण पर) स्थित धरातल का बिंदु।
गहराई एवं स्थिति गहराई के आधार पर वर्गीकृत: उथला केंद्र (०-७० किमी), मध्यम (७०-३०० किमी), अथवा गहरा केंद्र (३००-७०० किमी)। धरातलीय मानचित्र पर अक्षांश एवं देशांतर के निर्देशांकों द्वारा दर्शाया जाता है।
तरंग आगमन एवं विनाश P तथा S काय-तरंगों का वास्तविक उद्गम स्थल; प्रत्यक्ष रूप से मानव द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता। भूकंपीय तरंगें धरातल पर सबसे पहले यहीं पहुंचती हैं; सर्वाधिक कंपन एवं जान-माल का विनाश यहीं होता है।

४.३ भूकंपीय तरंगों की भौतिकी: P, S एवं L तरंगों की तुलना

तरंग का प्रकार कणों की गति एवं संचरण की प्रकृति गतिवेग एवं संचरण का माध्यम भूगर्भिक महत्व
P-तरंगें (Primary / प्राथमिक / संपीडन तरंगें) अनुदैर्ध्य तरंगें: माध्यम के कण तरंग संचरण की दिशा के समानांतर आगे-पीछे कंपन करते हैं (ध्वनि तरंगों की भांति संपीडन व विरलन)। सर्वाधिक तीव्र (६ – ८ किमी/सेकंड): सीस्मोग्राफ पर सबसे पहले दर्ज होती हैं। ठोस, द्रव एवं गैस—तीनों माध्यमों में संचरित हो सकती हैं। घनत्व बढ़ने पर गति बढ़ती है। बाह्य क्रोड की सीमा पर मुड़ जाती हैं लेकिन रुकती नहीं हैं।
S-तरंगें (Secondary / द्वितीयक / अपरूपण तरंगें) अनुप्रस्थ तरंगें: माध्यम के कण तरंग संचरण की दिशा के लंबवत (९०°) ऊपर-नीचे या दाएं-बाएं कंपन करते हैं (प्रकाश तरंगों की भांति)। मध्यम गति (३.५ – ५ किमी/सेकंड): सीस्मोग्राफ पर दूसरे स्थान पर दर्ज होती हैं। केवल ठोस माध्यम में ही संचरित हो सकती हैं; द्रवों व गैसों में नहीं चल सकतीं (तरल की अपरूपण दृढ़ता $\mu = ०$)। पृथ्वी के तरल बाह्य क्रोड द्वारा पूरी तरह रोक दी जाती हैं, जिससे १०५° से १८०° तक S-तरंग छाया क्षेत्र बनता है, जो प्रमाणित करता है कि बाह्य क्रोड तरल है!
L-तरंगें (Surface / धरातलीय / दीर्घ तरंगें) सतही तरंगें: रेले (Rayleigh) एवं लव (Love) तरंगों का समूह, जो धरातल की ऊपरी त्वचा पर जल की लहरों की भांति चक्राकार घूमती हुई चलती हैं। न्यूनतम गति (३ – ४ किमी/सेकंड): सीस्मोग्राफ पर सबसे अंत में पहुंचती हैं। केवल पृथ्वी की ऊपरी सतह तक ही सीमित रहती हैं। सर्वाधिक विनाशकारी: इनका आयाम (Amplitude) सबसे अधिक होने के कारण भवनों का ढहना, जमीन में दरारें पड़ना तथा ९०% से अधिक जान-माल की क्षति इन्हीं से होती है।

४.४ मापन पैमाने: रिक्टर पैमाना बनाम मर्काली पैमाना

तुलना का बिंदु रिक्टर पैमाना (Richter Magnitude Scale) मर्काली पैमाना (Modified Mercalli Intensity Scale)
आविष्कारक एवं वर्ष अमेरिकी भूकंपविद् चार्ल्स रिक्टर (१९३५)। इतालवी ज्वालामुखीविद् ग्यूसेप मर्काली (१९०२)।
मापन का आधार भूकंप का परिमाण (Magnitude): केंद्र से विमुक्त वास्तविक ऊर्जा की मात्रा का वैज्ञानिक मापन। भूकंप की तीव्रता (Intensity): किसी विशिष्ट स्थान पर प्रेक्षित प्रत्यक्ष क्षति, विनाश एवं मानवीय अनुभव।
पैमाने की संरचना लघुगणकीय (Logarithmic) पैमाना; ० से कोई निश्चित ऊपरी सीमा नहीं (व्यवहार में ० से १०+)। रोमन अंकों में I से XII (१ से १२) तक १२ निश्चित चरणों का विवरणात्मक पैमाना।
दूरी के साथ परिवर्तन स्थिर एवं अद्वितीय: एक भूकंप का रिक्टर परिमाण संपूर्ण विश्व में सदैव एक ही रहता है। स्थान के अनुसार परिवर्तनशील: अधिकेंद्र पर सर्वाधिक (XII) तथा दूरी बढ़ने के साथ घटती जाती है।
ऊर्जा वृद्धि का नियम प्रत्येक +१ अंक वृद्धि पर तरंग आयाम १० गुना तथा विमुक्त ऊर्जा लगभग ३१.६२ गुना बढ़ जाती है ($१०^{१.५} \approx ३१.६२$)। प्रत्यक्षदर्शियों की रिपोर्ट तथा भवनों की दरारों व मलबे के दृश्य सर्वेक्षण पर आधारित होता है।

५. प्रशांत महासागरीय अग्नि वलय, सुनामी एवं आपदा प्रबंधन

५.१ प्रशांत महासागरीय अग्नि वलय (Pacific Ring of Fire)

विश्व का सबसे भयावह ज्वालामुखी एवं भूकंप प्रवण क्षेत्र प्रशांत महासागर के चारों ओर घोड़े की नाल के आकार में लगभग ४०,००० किमी लंबा एक संकीर्ण वृत्तखंड है, जिसे प्रशांत महासागरीय अग्नि वलय (Circum-Pacific Belt) कहा जाता है।

  • भौगोलिक विस्तार: दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वत से उत्तर की ओर रॉकी, अलास्का की अल्यूशियन द्वीपमाला, कामचटका, जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया से होते हुए न्यूजीलैंड तक फैला हुआ है।
  • प्लेट विवर्तनिक कारण: यहाँ भारी महासागरीय प्रशांत प्लेट, नाज़का प्लेट तथा कोकोस प्लेट चारों ओर स्थित हल्की अमेरिकी, यूरेशियन व ऑस्ट्रेलियन महाद्वीपीय प्लेटों के नीचे लगातार धंस रही हैं (Subduction)। गहराई में पिघला हुआ मैग्मा ऊपर उठकर ज्वालामुखी विस्फोट करता है।
  • भयावह तथ्य:
    • विश्व के ७५% से अधिक सक्रिय एवं प्रसुप्त ज्वालामुखी (४५० से अधिक) इसी मेखला में स्थित हैं (जैसे माउंट फूजी, क्राकाटोआ, पिनातुबो, सेंट हेलेन्स)।
    • पृथ्वी पर आने वाले कुल भूकंपों का ९०% तथा सर्वाधिक विनाशकारी मेगा-थ्रस्ट भूकंपों का ८०% इसी क्षेत्र में घटित होता है।

५.२ भारत के भूकंपीय क्षेत्र (Seismic Zonation of India)

भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने भूकंपीय खतरे के आधार पर भारत को चार प्रमुख भूकंपीय जोनों में विभाजित किया है:

भूकंपीय ज़ोन खतरे का स्तर तीव्रता (MSK) सम्मिलित भारतीय क्षेत्र एवं पश्चिम बंगाल
ज़ोन V (Zone V) अत्यधिक गंभीर जोखिम (महाविनाशकारी) IX या अधिक संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड, गुजरात का कच्छ, उत्तरी बिहार, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा पश्चिम बंगाल का उत्तरी पर्वतीय भाग (दार्जिलिंग, कालिम्पोंग)।
ज़ोन IV (Zone IV) गंभीर जोखिम (High Risk) VIII दिल्ली-एनसीआर, गंगा का मैदान, जम्मू, बिहार का शेष भाग, सिक्किम तथा पश्चिम बंगाल का तराई-डुआर्स (जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, कूचबिहार)।
ज़ोन III (Zone III) मध्यम जोखिम (Moderate Risk) VII कोलकाता, दक्षिण बंगाल, मुंबई, चेन्नई, केरल, गोवा तथा महाराष्ट्र के कुछ भाग।
ज़ोन II (Zone II) न्यूनतम जोखिम (Low Risk) VI या कम दक्कन का प्राचीन कठोर प्रायद्वीपीय पठार, राजस्थान, ओडिशा एवं मध्य भारत के स्थिर क्षेत्र।

५.३ सुनामी: उत्पत्ति एवं तटीय प्रभाव (Tsunami Mechanics)

सुनामी (Tsunami) एक जापानी शब्द है; जहाँ 'त्सु' (Tsu) का अर्थ बंदरगाह तथा 'नामी' (Nami) का अर्थ विनाशकारी लहर है। यानी सुनामी का अर्थ है बंदरगाह को तबाह करने वाली समुद्री लहरें।

  • उत्पत्ति का मुख्य कारण: समुद्र के भीतर आने वाले भीषण मेगा-थ्रस्ट भूकंप (रिक्टर परिमाण $> ७.५$), समुद्रतल में ज्वालामुखी के काल्डेरा का अचानक धंसना अथवा महाविशाल अंतःसागरीय भूस्खलन से जब अरबों टन जलस्तंभ लंबवत रूप से विस्थापित होता है।
  • खुले गहरे समुद्र में स्वरूप: गहरे समुद्र में (४००० मीटर गहराई) सुनामी की गति जेट विमान के समान ($v = \sqrt{gh} \approx ७०० - ८००\text{ किमी/घंटा}$) होती है। किंतु १०० से २०० किमी लंबी तरंगदैर्ध्य के कारण खुले समुद्र में लहर की ऊंचाई मात्र १ मीटर से भी कम होती है, जिससे जहाजों को इसका पता तक नहीं चलता!
  • तटीय स्फीति प्रभाव (Shoaling Effect): जब यह लहर उथले तटीय क्षेत्रों (२० मीटर से कम गहराई) में पहुंचती है, तो समुद्रतल के घर्षण से इसकी गति घटकर ३०-५० किमी/घंटा रह जाती है। ऊर्जा संरक्षण नियम (ग्रीन के नियम) के अनुसार पीछे का विशाल जल आगे के जल को ऊपर धकेलता है, जिससे तरंगदैर्ध्य सिकुड़कर १० से ३० मीटर ऊंची खड़ी जल-दीवार बन जाती है और तटों पर प्रलय मचा देती है।
  • २६ दिसंबर २००४ की हिंद महासागरीय त्रासदी: इंडोनेशिया के सुमात्रा के निकट ९.१-९.३ परिमाण के भूकंप से उत्पन्न सुनामी ने भारत (तमिलनाडु, अंडमान), श्रीलंका, थाईलैंड सहित १४ देशों में २ लाख ३० हजार से अधिक लोगों की जान ली थी।

५.४ भूकंप एवं सुनामी आपदा प्रबंधन तथा सुरक्षा तकनीकें

भूकंप का सटीक पूर्वानुमान संभव नहीं है; इसलिए तात्कालिक सही कदम ही जीवन की रक्षा कर सकते हैं:

  • भवन के भीतर होने पर भूकंप सुरक्षा:
    • "DROP, COVER, AND HOLD ON" (झुको, ढंको और पकड़े रहो): तुरंत घुटनों के बल नीचे बैठें, किसी मजबूत मेज या पलंग के नीचे जाकर सिर और गर्दन को ढंकें, और कंपन रुकने तक मेज के पायों को कसकर पकड़े रहें।
    • कांच की खिड़कियों, भारी अलमारियों, पंखों और लटकती वस्तुओं से दूर रहें।
    • लिफ्ट का प्रयोग कदापि न करें; सीढ़ियों का प्रयोग केवल कंपन पूरी तरह थमने के बाद करें।
  • खुले में होने पर: ऊंची इमारतों, बिजली के खंभों, तारों, होर्डिंग्स और फ्लाईओवर से दूर किसी खुले मैदान में चले जाएं।
  • सुनामी की चेतावनी पर सतर्कता: तटीय क्षेत्र में यदि तेज भूकंप महसूस हो या समुद्र का पानी अचानक असामान्य रूप से सैकड़ों मीटर पीछे हट जाए, तो कौतूहलवश समुद्र की ओर कभी न जाएं। तुरंत समुद्र तट छोड़कर कम से कम ३० मीटर ऊंचे स्थान अथवा बहुमंजिला पक्के भवन की छत पर शरण लें। हैदराबाद स्थित भारतीय सुनामी पूर्व चेतावनी केंद्र (ITEWC) डीप-ओशन DART सेंसरों द्वारा १० मिनट में चेतावनी जारी करता है।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

रिक्टर ऊर्जा पैमाना सूत्र (Richter Energy Scaling)
$$10^{1.5} \approx 31.62277$$
७ परिमाण के भूकंप की तुलना में ८ परिमाण का भूकंप लगभग ३१.६ गुना अधिक ऊर्जा उत्सर्जित करता है।
P-तरंग गतिवेग सूत्र (Primary Wave Velocity)
$$v_p ≈ ६.० - ८.० किमी/सेकंड (ऊपरी क्रस्ट में)$$
तरल माध्यम में $\mu = ०$ होने से वेग घटकर $v_p = \sqrt{K/ ho}$ रह जाता है, जिससे P-तरंगें तरल बाह्य क्रोड से भी होकर गुजर जाती हैं।
S-तरंग गतिवेग सूत्र (Secondary Wave Velocity)
$$v_s ≈ ৩.৫ - ৪.৫ किमी/सेकंड; तरल में v_s = ०$$
इसी सूत्र से भूवैज्ञानिक आर. डी. ओल्डहैम ने सिद्ध किया था कि पृथ्वी का बाह्य क्रोड पिघला हुआ तरल है।
अधिकेंद्र दूरी त्रिकोणीय सूत्र (Epicentral Distance)
$$d \propto (t_s - t_p)$$
तीन स्वतंत्र सीस्मोग्राफ स्टेशनों की दूरियों के वृत्तों का प्रतिच्छेदन बिंदु ही अधिकेंद्र (Epicenter) कहलाता है।
सुनामी गतिवेग सूत्र (Lagrange Tsunami Velocity)
$$v ≈ ७०० - ৮০০ किमी/घंटा (४००० मी गहराई पर)$$
तट की ओर गहराई ($h$) घटने पर सुनामी की गति घटती है और ऊंचाई भयानक रूप से बढ़ती है।
सुनामी तटीय प्रवर्धन सूत्र (Green's Law of Shoaling)
$$ऊंचाई A h^{-1/4}$$
इसी कारण गहरे समुद्र की ०.८ मीटर की लहर तट पर १० से ३० मीटर ऊंची दीवार बन जाती है।
समुद्री नितल प्रसार दर समीकरण
$$v ≈ ২ - ১০ सेमी/वर्ष$$
अटलांटिक महासागर प्रति वर्ष लगभग २.५ से ५ सेमी की दर से चौड़ा हो रहा है।
बुलार्ड महाद्वीपीय साम्यता सूचकांक (Bullard Fit, 1965)
$$आरएमएस त्रुटि < ১^$$
इसने अल्फ्रेड वेगेनर की परिकल्पना को गणितीय रूप से अकाट्य सिद्ध किया।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
एक भूकंपविद् रिक्टर पैमाने पर ८.० परिमाण के महाभूकंप की तुलना ६.० परिमाण के मध्यम भूकंप से कर रहे हैं। गणना कीजिए: (क) धरातलीय कंपन के आयाम (Wave Amplitude) में कितने गुना की वृद्धि होगी? तथा (ख) विमुक्त कुल भूकंपीय ऊर्जा कितने गुना अधिक होगी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मान लीजिए, प्रथम भूकंप का परिमाण $M_१ = ६.०$ तथा द्वितीय भूकंप का परिमाण $M_२ = ৮.०$ है। दोनों के परिमाण में अंतर $\Delta M = M_२ - M_१ = ৮.० - ৬.० = २.०$ है।

१. तरंग के आयाम (Amplitude) की तुलना: रिक्टर पैमाना सीस्मोग्राम तरंग आयाम का १० के आधार पर लघुगणकीय पैमाना है:

$$\text{आयाम अनुपात} = ১০^{\Delta M} = ১০^{২.०} = ১০০\text{ गुना}$$

अतः ८.० परिमाण के भूकंप में तरंग का कंपन ६.० परिमाण की तुलना में १०० गुना अधिक होगा।

२. विमुक्त भूकंपीय ऊर्जा (Energy) की तुलना: गुटेनबर्ग-रिक्टर ऊर्जा रूपांतरण सूत्र के अनुसार:

$$\frac{E_२}{E_१} = ১০^{১.৫ \times \Delta M}$$

मान प्रतिस्थापित करने पर:

$$\frac{E_२}{E_१} = ১০^{১.৫ \times ২.०} = ১০^{৩.०} = ১০০০\text{ गुना}$$

निष्कर्ष: (क) धरातलीय तरंग का आयाम १०० गुना बढ़ जाता है। (ख) उत्सर्जित कुल ऊर्जा ठीक १,००० गुना अधिक होती है!

उदाहरण 2
एक क्षेत्रीय सीस्मोलॉजिकल स्टेशन पर भूकंप की प्राथमिक तरंग (P-तरंग) सुबह ०८:१५:०० बजे तथा द्वितीयक तरंग (S-तरंग) सुबह ०८:१५:४० बजे दर्ज की जाती है। यदि P-तरंग की गति $v_p = ৮.০ ext{ किमी/सेकंड}$ तथा S-तरंग की गति $v_s = ৪.৮ ext{ किमी/सेकंड}$ हो, तो स्टेशन से भूकंप के अधिकेंद्र की दूरी ज्ञात कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. दिए गए मान:

  • P-तरंग का आगमन समय $t_p = ০৮:১৫:০০\text{ AM}$
  • S-तरंग का आगमन समय $t_s = ০৮:১৫:৪০\text{ AM}$
  • समय अंतराल $\Delta t = t_s - t_p = ৪০\text{ सेकंड}$
  • P-तरंग का वेग $v_p = ৮.০\text{ किमी/सेकंड}$
  • S-तरंग का वेग $v_s = ৪.৮\text{ किमी/सेकंड}$

२. अधिकेंद्र दूरी सूत्र का प्रयोग:

$$d = \Delta t \times \left( \frac{v_p \cdot v_s}{v_p - v_s} \right)$$

३. गणना:

$$v_p - v_s = ৮.০ - ৪.৮ = ৩.২\text{ किमी/सेकंड}$$

$$v_p \cdot v_s = ৮.০ \times ৪.৮ = ৩৮.৪\text{ किमी}^২/\text{से}^২$$

$$\frac{v_p \cdot v_s}{v_p - v_s} = \frac{৩৮.৪}{৩.২} = ১২\text{ किमी/सेकंड}$$

४. दूरी $d$ का मान:

$$d = ৪০\text{ सेकंड} \times ১২\text{ किमी/सेकंड} = ৪৮০\text{ किमी}$$

उत्तर: स्टेशन से भूकंप अधिकेंद्र की दूरी ठीक ४८० किलोमीटर है।

उदाहरण 3
हिंद महासागर में ४,००० मीटर गहरे समुद्री नितल पर एक भीषण भूकंप आया। गुरुत्वीय त्वरण $g = ৯.৮ ext{ मी/से}^২$ मानते हुए: (क) खुले समुद्र में उत्पन्न सुनामी का वेग किमी/घंटे में ज्ञात कीजिए, तथा (ख) १,५६८ किमी दूर स्थित तट तक पहुंचने में लहर को कितना समय लगेगा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. गहरे समुद्र में सुनामी का वेग: लैग्रेंज सूत्र के अनुसार:

$$v = \sqrt{g \cdot h}$$

मान रखने पर:

$$v = \sqrt{৯.৮\text{ मी/से}^২ \times ৪০০০\text{ मी}} = \sqrt{৩৯,২০০\text{ मी}^২/\text{से}^২} \approx ১৯৭.৯৯\text{ मी/सेकंड}$$

२. वेग को किमी/घंटे में बदलना:

$$v = ১৯৭.৯৯\text{ मी/से} \times ৩.৬ \approx ৭১২.৭৬\text{ किमी/घंटा}$$

(लगभग ७१३ किमी/घंटा, जो एक बोइंग जेट विमान की गति के बराबर है!)

३. तट तक पहुंचने का समय: दूरी $D = ১,৫৬৮\text{ किमी}$।

$$\text{समय } t = \frac{D}{v} = \frac{১৫৬৮\text{ किमी}}{৭১২.৭৬\text{ किमी/घंटा}} \approx ২.২০\text{ घंटे}$$

मिनट में बदलने पर:

$$০.২০\text{ घंटा} \times ৬০\text{ मिनट} = ১২\text{ मिनट}$$

उत्तर: (क) खुले समुद्र में सुनामी की चाल लगभग ७१२.८ किमी/घंटा है। (ख) तट तक पहुंचने में २ घंटे १२ मिनट लगेंगे। तटीय आबादी को सुरक्षित निकालने के लिए यह समय जीवनरक्षक सिद्ध होता है!

उदाहरण 4
गहरे समुद्र में ($h_১ = ৪,০০০ ext{ मीटर}$) सुनामी लहर का आयाम $A_১ = ০.৮ ext{ मीटर}$ था। ग्रीन के नियम ($A_२ = A_১ (h_১/h_२)^{১/४}$) का प्रयोग करते हुए गणना कीजिए कि १० मीटर उथले तटीय जल ($h_२ = ১০ ext{ मीटर}$) में पहुंचने पर लहर की ऊंचाई कितनी हो जाएगी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. दिए गए मान:

  • गहरे समुद्र की गहराई $h_১ = ৪০০০\text{ मी}$
  • प्रारंभिक आयाम $A_১ = ০.৮\text{ मी}$
  • तटीय जल की गहराई $h_२ = ১০\text{ मी}$

२. गहराई अनुपात:

$$\frac{h_১}{h_२} = \frac{৪০০০}{১০} = ৪০০$$

३. चतुर्थ मूल ज्ञात करना:

$$(৪০০)^{০.২৫} = \sqrt{\sqrt{৪০০}} = \sqrt{২০} \approx ৪.৪৭২$$

४. तटीय तरंग आयाम $A_२$ की गणना:

$$A_२ = ০.৮\text{ मी} \times ৪.৪৭২ \approx ৩.৫৮\text{ मीटर}$$

(संकीर्ण खाड़ियों या बंदरगाहों में यह ऊंचाई बढ़कर १० से २० मीटर तक पहुंच सकती है!)

उत्तर: खुले समुद्र की शांत ०.८ मीटर की लहर तट पर ३.৫৮ मीटर ऊंची प्रलयंकारी दीवार बन जाएगी।

उदाहरण 5
मध्य-अटलांटिक कटक के अक्ष से १२० किमी दूर स्थित समुद्री बेसाल्ट चट्टान की रेडियोधर्मी आयु ४८ लाख (४.८ मिलियन) वर्ष पाई गई। गणना कीजिए: (क) प्लेट का अर्ध-प्रसार वेग, तथा (ख) संपूर्ण अटलांटिक महासागर के नितल का पूर्ण विस्तार वेग (सेमी/वर्ष में)।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. दिए गए मान:

  • कटक से दूरी $D = ১২০\text{ किमी} = ১,২০,০০,০০০\text{ सेमी}$
  • समय अंतराल $\Delta t = ৪৮,০০,০০০\text{ वर्ष}$

२. एकल प्लेट का प्रसार वेग ($v_{\text{half}}$):

$$v_{\text{half}} = \frac{D}{\Delta t} = \frac{১,২০,০০,০০০\text{ सेमी}}{৪৮,০০,০০০\text{ वर्ष}} = \frac{১২০}{৪৮} = ২.৫\text{ सेमी/वर्ष}$$

३. महासागरीय नितल का कुल प्रसार वेग ($v_{\text{full}}$): चूंकि कटक के दोनों ओर समान रूप से विस्तार होता है:

$$v_{\text{full}} = ২ \times ২.৫\text{ सेमी/वर्ष} = ৫.০\text{ सेमी/वर्ष}$$

उत्तर: (क) एकल प्लेट का वेग २.५ सेमी/वर्ष है। (ख) संपूर्ण अटलांटिक महासागरीय नितल ५.० सेमी प्रति वर्ष की दर से चौड़ा हो रहा है।

उदाहरण 6
इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट प्रति वर्ष ५ सेमी की औसत गति से उत्तर में यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है। गणना कीजिए: (क) विगत १ करोड़ (१० मिलियन) वर्षों में भारतीय प्लेट कुल कितने किलोमीटर खिसक चुकी है? तथा (ख) हिमालय की ऊंचाई आज भी निरंतर क्यों बढ़ रही है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. उत्तर दिशा में विस्थापन की गणना:

  • वेग $v = ৫\text{ सेमी/वर्ष} = ০.০৫\text{ मीटर/वर्ष}$
  • समय $\Delta t = ১\text{ करोड़ वर्ष} = ১০^৭\text{ वर्ष}$
  • कुल दूरी मीटर में:

$$D = ০.০৫\text{ मी/वर्ष} \times ১০^৭\text{ वर्ष} = ৫,০০,০০০\text{ मीटर}$$

  • किलोमीटर में बदलने पर:

$$D = \frac{৫,০০,০০০}{১০০০} = ৫০০\text{ किलोमीटर}$$

२. हिमालय के निरंतर उत्थान का कारण: भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट—दोनों हल्की महाद्वीपीय सियल चट्टानों से बनी होने के कारण कोई भी मेंटल में नीचे नहीं धंस सकती। अतः उत्तर दिशा में लगातार जारी धक्के से संपीडन जारी है, जिसके कारण हिमालय की चोटियां आज भी प्रति वर्ष लगभग ५ मिमी की दर से ऊपर उठ रही हैं।

उत्तर: भारतीय प्लेट १ करोड़ वर्षों में ५०० किमी खिसक चुकी है और निरंतर टकराव के कारण हिमालय आज भी जीवित व बढ़ता हुआ वलित पर्वत है।

उदाहरण 7
अम्लीय लावा (Acidic Lava) एवं क्षारीय लावा (Basic Lava) के मध्य रासायनिक संगठन, तापमान, श्यानता, उद्गार की प्रकृति तथा निर्मित स्थलाकृतियों की विस्तृत तुलनात्मक तालिका प्रस्तुत कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पाठ्यपुस्तकीय प्रामाणिक तुलनात्मक विश्लेषण:

१. रासायनिक संगठन व सिलिका:

  • अम्लीय लावा: सिलिका की मात्रा अत्यधिक (६५% – ७५% से अधिक); क्वार्ट्ज व फेल्डस्पार से युक्त (फेल्सिक); लोहा व मैग्नीशियम कम; हल्के रंग का।
  • क्षारीय लावा: सिलिका की मात्रा कम (४५% – ५५% से कम); लोहा, चूना व मैग्नीशियम से भरपूर (मैफिक); गहरे भूरे या काले रंग का।

२. तापमान एवं श्यानता (Viscosity):

  • अम्लीय लावा: तापमान कम (७००° – ९००°C); अत्यधिक गाढ़ा, श्यान, चिपचिपा तथा बहुत धीमी गति से बहने वाला।
  • क्षारीय लावा: तापमान बहुत अधिक (१०००° – १२५०°C); अत्यंत पतला, कम श्यानता तथा पानी की तरह तेजी से दूर तक बहने वाला।

३. उद्गार की प्रकृति:

  • अम्लीय लावा: अत्यंत भयंकर एवं विस्फोटक उद्गार; गाढ़ा लावा नली में जमकर गैसों को रोक लेता है, जो बाद में भारी धमाके से फटती हैं।
  • क्षारीय लावा: शांत एवं दरारी उद्गार; गैसें आसानी से निकल जाती हैं और कोई भयंकर विस्फोट नहीं होता।

४. निर्मित स्थलाकृतियाँ:

  • अम्लीय लावा: खड़े ढाल वाले ऊंचे गुंबद एवं मिश्रित शंकु पर्वत बनते हैं (जैसे जापान का माउंट फूजी)।
  • क्षारीय लावा: मंद ढाल वाले विस्तृत शील्ड ज्वालामुखी तथा सपाट दक्कन ट्रैप जैसे विशाल लावा पठार बनते हैं।
उदाहरण 8
भूकंप केंद्र से कोणीय दूरी १०५° से १८०° के मध्य S-तरंग छाया क्षेत्र (Shadow Zone) बनने का भौतिक कारण स्पष्ट कीजिए। इस खोज से पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में क्या युगांतरकारी प्रमाण मिला?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. S-तरंग छाया क्षेत्र की परिघटना: जब पृथ्वी पर कहीं भी भूकंप आता है, तो अधिकेंद्र से १०५° कोणीय दूरी तक सभी सीस्मोग्राफ स्टेशनों पर प्राथमिक (P) एवं द्वितीयक (S) दोनों तरंगें दर्ज होती हैं। किंतु १०५° से १८०° के मध्य पृथ्वी पर कहीं भी कोई प्रत्यक्ष S-तरंग दर्ज नहीं होती। इस विशाल अंध-क्षेत्र को S-तरंग छाया क्षेत्र (S-Wave Shadow Zone) कहते हैं।

२. भौतिक विज्ञान का कारण:

  • द्वितीयक (S) तरंगें अनुप्रस्थ अपरूपण तरंगें (Shear Waves) हैं। इनका वेग सूत्र $v_s = \sqrt{\mu/\rho}$ है, जहाँ $\mu$ अपरूपण दृढ़ता है।
  • अनुप्रस्थ तरंगों के संचरण हेतु माध्यम में आकारगत दृढ़ता होना अनिवार्य है। द्रवों एवं गैसों में अपरूपण प्रतिरोध शून्य होता है ($\mu = ०$)। अतः तरल माध्यम में S-तरंगें संचरित नहीं हो सकतीं।
  • भूगर्भ में २,९०० किमी की गहराई पर गुटेनबर्ग असांतत्य को पार करते समय पृथ्वी का तरल बाह्य क्रोड सभी S-तरंगों को पूरी तरह अवशोषित या अवरुद्ध कर देता है।

३. वैज्ञानिक उपलब्धि: १९०६ ईस्वी में ब्रिटिश भूकंपविद् आर. डी. ओल्डहैम (R. D. Oldham) ने सिद्ध किया कि पृथ्वी का बाह्य क्रोड (Outer Core) ठोस नहीं, बल्कि पिघला हुआ तरल लोहा व निकल है!

निष्कर्ष: १०५° से १८०° में S-तरंगों की पूर्ण अनुपस्थिति बाह्य क्रोड के तरल होने का अकाट्य प्रमाण है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भूकंप के अवकेंद्र (Focus) और अधिकेंद्र (Epicenter) में भ्रम।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अवकेंद्र (Focus / Hypocenter) भूगर्भ के भीतर का वह बिंदु है जहाँ ऊर्जा उत्पन्न होती है। अधिकेंद्र (Epicenter) उसके ठीक लंबवत ऊपर सतह पर स्थित बिंदु है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

रिक्टर परिमाण (Magnitude) और मर्काली तीव्रता (Intensity) को एक समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

रिक्टर पैमाना परिमाण (विमुक्त कुल ऊर्जा) मापता है, जो पूरे विश्व में एक ही रहता है। मर्काली पैमाना तीव्रता (प्रत्यक्ष क्षति) मापता है, जो दूरी बढ़ने पर घटती जाती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

S-तरंगों के तरल में न चल पाने का गलत कारण लिखना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

S-तरंगें अनुप्रस्थ अपरूपण तरंगें हैं। द्रवों में अपरूपण दृढ़ता शून्य होने के कारण ($\mu = ०$) भौतिकी के नियमानुसार अपरूपण तरंगें तरल में नहीं चल सकतीं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सुनामी को चंद्रमा द्वारा उत्पन्न ज्वारीय तरंग (Tidal Wave) समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सुनामी का ज्वार-भाटे से कोई संबंध नहीं है। यह समुद्रतल में भूकंप, ज्वालामुखी या भूस्खलन से जल के अचानक लंबवत विस्थापन से पैदा होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अभिसारी और अपसारी प्लेट सीमाओं की स्थलाकृतियों में भ्रम।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अभिसारी सीमा (टकराव) पर वलित पर्वत व गर्त बनते हैं। अपसारी सीमा (दूर हटना) पर मध्य-अटलांटिक कटक व भ्रंश घाटी बनती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अल्फ्रेड वेगेनर को प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का जनक मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वेगेनर ने १९१२ में महाद्वीपीय विस्थापन (Continental Drift) दिया था। आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) १९६० के दशक में मैकेंजी, मॉर्गन व ले पिचोन ने प्रतिपादित किया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

प्रशांत "अग्नि वलय" को सचमुच की गोल आग की अंगूठी समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह कोई गोल छल्ला नहीं है; यह प्रशांत महासागर के किनारों पर स्थित ४०,००० किमी लंबी घोड़े की नाल के आकार की सबडक्शन मेखला है जहाँ ७५% ज्वालामुखी स्थित हैं।

प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखी उद्गार एवं भूकंपीय क्रियाविधि

प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखी उद्गार एवं भूकंपीय क्रियाविधि (WBBSE कक्षा 8) विवर्तनिक प्लेट सीमाएँ एवं अधोगमन क्षेत्र (SUBDUCTION DYNAMICS) एस्थेनोस्फीयर की संवहन तरंगों द्वारा संचालित अभिसारी एवं अपसारी प्लेट सीमाएँ एस्थेनोस्फीयर (अर्ध-तरल दुर्बलता मंडल: 100 – 250 किमी गहराई) संवहन धारा संवहन धारा महासागरीय प्लेट (सिमा) भारी बेसाल्ट (3.0 ग्राम/सेमी³) महासागरीय गर्त (Trench) वलित पर्वत एवं ज्वालामुखीय चाप (एंडीज पर्वतमाला / वलित श्रेणी) अधोगमन व आंशिक गलन (बेनियोफ मंडल / Benioff Zone) नीचे धंसती प्लेट मध्य-महासागरीय कटक (समुद्री नितल प्रसार / Spreading) भ्रंश घाटी अभिसारी सीमा (CONVERGENT) विनाशकारी किनारा (क्रस्ट का क्षय) अपसारी सीमा (DIVERGENT) रचनात्मक किनारा (नवीन क्रस्ट सृजन) भूकंप का स्वरूप एवं भूकंपीय तरंगें धरातल की सतह (Surface) ★ भूकंप केंद्र / अवकेंद्र (FOCUS) भूगर्भिक भ्रंश उद्गम स्थल भूकंप अधिकेंद्र (EPICENTER) P-तरंगें (प्राथमिक): अनुदैर्ध्य | 6–8 किमी/से | ठोस, द्रव व गैस तीनों में गमन S-तरंगें (द्वितीयक): अनुप्रस्थ अपरूपण | 3.5–5 किमी/से | केवल ठोस में गमन L-तरंगें (धरातलीय): सतही तरंगें | 3–4 किमी/से | सर्वाधिक विनाशकारी व घातक प्रशांत अग्नि वलय एवं मापन पैमाने परि-प्रशांत अधोगमन मेखला: >75% सक्रिय ज्वालामुखी एवं 90% विनाशकारी भूकंप रिक्टर पैमाना (RICHTER) परिमाण (Magnitude) मापन तरंग आयाम का लॉगरिदमिक पैमाना प्रत्येक +1 = 10x तरंग आयाम प्रत्येक +1 = ~31.62x ऊर्जा! मर्काली पैमाना (MERCALLI) तीव्रता (Intensity) मापन प्रेक्षित विनाश के आधार पर (I – XII) संरचनात्मक क्षति पर आधारित अधिकेंद्र से दूरी बढ़ने पर घटती है सुनामी भौतिकी (TSUNAMI): अंतःसागरीय भूकंप $M_w > 7.5$ | महासागरीय वेग $v = \sqrt{gh} \approx 700–800\text{ किमी/घं}$ तट पर: 10–30 मीटर ऊँची दीवार

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
अल्फ्रेड वेगेनर (१९१२) ने महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना दी: कार्बोनिफेरस युग में पैंजिया व पैंथालासा के रूप में सभी महाद्वीप जुड़े थे, जिसके प्रमाण जिग-सॉ फिट, मेसोसॉरस व ग्लॉसोप्टेरिस जीवाश्म एवं हिमानी टिलाइट हैं।
मुख्य बिंदु 2
आर्थर होम्स ने एस्थेनोस्फीयर (१००-२५० किमी) में रेडियोधर्मी संवहन धाराओं की खोज कर प्लेट संचलन की वास्तविक चालक शक्ति की व्याख्या की।
मुख्य बिंदु 3
आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी में ७ प्रमुख प्लेटें हैं; प्लेट सीमाएं तीन प्रकार की होती हैं: अभिसारी (विनाशकारी), अपसारी (रचनात्मक) एवं रूपांतर (संरक्षी)।
मुख्य बिंदु 4
भारतीय प्लेट व यूरेशियन प्लेट के टकराव से प्राचीन टेथिस सागर के अवसाद मुड़कर हिमालय पर्वतमाला बने और भारत आज भी ५ सेमी/वर्ष की दर से उत्तर में खिसक रहा है।
मुख्य बिंदु 5
ज्वालामुखी वर्गीकरण: सक्रिय (बैरन द्वीप, स्ट्रोम्बोली), प्रसुप्त (माउंट फूजी, विसुवियस) एवं शांत (पोपा); अम्लीय लावा गाढ़ा व विस्फोटक होता है, जबकि क्षारीय लावा पतला व शांत होता है।
मुख्य बिंदु 6
भूकंप केंद्र (Focus) भूगर्भ में तथा अधिकेंद्र (Epicenter) सतह पर होता है; P-तरंगें सबसे तेज व सभी माध्यमों में चलती हैं, S-तरंगें केवल ठोस में चलती हैं (१०५°-१८०° छाया क्षेत्र द्वारा तरल बाह्य क्रोड प्रमाणित), तथा L-तरंगें धरातल पर सर्वाधिक विनाश करती हैं।
मुख्य बिंदु 7
रिक्टर पैमाना लघुगणकीय परिमाण मापता है (+१ पर तरंग १० गुना व ऊर्जा ३१.६२ गुना बढ़ती है); प्रशांत अग्नि वलय में ७५% ज्वालामुखी व ९०% भूकंप आते हैं।
मुख्य बिंदु 8
समुद्रतल के भूकंपों से सुनामी उत्पन्न होती है ($v = \sqrt{gh}$), जो तट पर आकर १०-३० मीटर ऊंची विनाशकारी दीवार बन जाती है; भूकंप के समय "Drop, Cover, Hold On" जीवनरक्षक तकनीक है।
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कक्षा 8 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: Concept of History अध्याय 2: Rise of Regional Powers अध्याय 3: Establishment of Colonial Authority अध्याय 4: औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप अध्याय 5: औपनिवेशिक शासन के प्रति प्रतिक्रिया: सहयोग और विद्रोह अध्याय 6: राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास अध्याय 7: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श और विकास अध्याय 8: सांप्रदायिकता से विभाजन अध्याय 9: भारतीय संविधान: लोकतांत्रिक ढांचा और नागरिकों के अधिकार अध्याय 10: पृथ्वी की आंतरिक संरचना अध्याय 11: अस्थिर पृथ्वी अध्याय 12: शैल (चट्टानें) अध्याय 13: वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार अध्याय 14: बादल और वर्षा अध्याय 15: जलवायु प्रदेश अध्याय 16: मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन अध्याय 17: भारत के कुछ पड़ोसी देश और उनके साथ संबंध अध्याय 18: उत्तर अमेरिका महाद्वीप अध्याय 19: दक्षिण अमेरिका महाद्वीप अध्याय 20: ओशिनिया महाद्वीप

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