Follow Us
माध्यम चुनें / Select Medium:
Eng (English) Beng (বাংলা) Hindi (हिन्दी)
WBB • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 2
अनुमानित समय: 65 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

Rise of Regional Powers

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान (इतिहास - अतीत और विरासत) के अध्याय 2: 'क्षेत्रीय शक्तियों का उदय' (Rise of Regional Powers) के प्रामाणिक मास्टर अध्ययन गाइड में आपका स्वागत है। यह अध्याय 1707 ईस्वी में मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद अठारहवीं शताब्दी के भारतीय उपमहाद्वीप में हुए अभूतपूर्व राजनीतिक परिवर्तनों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। विद्यार्थी समझेंगे कि कैसे केंद्रीय मुग़ल सत्ता का ढांचागत संकट, जागीरदारी व मनसबदारी संकट, कृषक असंतोष और नादिर शाह (1739) व अहमद शाह अब्दाली (1761) के भीषण आक्रमणों से मुग़ल सत्ता धराशायी हो गई। तत्पश्चात अध्याय तीन प्रमुख स्वायत्त उत्तराधिकारी राज्यों—मुर्शिद कुली खाँ व अलीवर्दी खाँ के अधीन बंगाल, निज़ाम-उल-मुल्क आसफ़ जाह के अधीन हैदराबाद और सआदत खाँ बुरहान-उल-मुल्क के अधीन अवध के अभ्युदय की पड़ताल करता है। इसके साथ ही पेशवाओं के अधीन मराठा साम्राज्य का प्रसार, सांगोला संधि व मराठा परिसंघ तथा 1761 के तीसरे पानीपत युद्ध के विनाशकारी प्रभावों को उजागर किया गया है। अंत में मैसूर में हैदर अली व टीपू सुल्तान के आधुनिक सैन्य प्रतिरोध व रॉकेट प्रौद्योगिकी और पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 12 सिख मिसलों के एकीकरण व अमृतसर की संधि (1809) का गहन परीक्षण किया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

1707 ईस्वी में मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद कैसे शक्तिशाली मुग़ल साम्राज्य का केंद्रीय नियंत्रण बिखर गया और बंगाल, अवध व हैदराबाद में स्वायत्त उत्तराधिकारी राज्य, मराठा परिसंघ और मैसूर व सिख साम्राज्य जैसी सशक्त क्षेत्रीय शक्तियों का उदय हुआ?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

अठारहवीं शताब्दी में क्षेत्रीय शक्तियों के उदय को समझना आधुनिक भारत के इतिहास और ब्रिटिश औपनिवेशिक विजय की पृष्ठभूमि को जानने के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह अध्याय इस भ्रांति को दूर करता है कि अठारहवीं सदी केवल अंधकार और अराजकता का युग थी, बल्कि यह साबित करता है कि यह गतिशील क्षेत्रीय राज्य-निर्माण, सैन्य आधुनिकीकरण और प्रशासनिक अनुकूलन का काल था। मराठा, मैसूर, बंगाल और सिख जैसी दुर्जेय शक्तियों के होते हुए भी वे विदेशी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध एक संयुक्त भारतीय मोर्चा क्यों नहीं बना सके और कैसे उनके आपसी अविश्वास व कूटनीतिक अलगाव ने एक विदेशी व्यापारिक कंपनी को भारत पर राज करने का अवसर दिया, इसका विश्लेषण विद्यार्थियों की ऐतिहासिक समझ को परिपक्व बनाता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • अकबर, शाहजहाँ और औरंगज़ेब के अधीन मुग़ल साम्राज्य की केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था व क्षेत्रीय विस्तार की बुनियादी समझ
  • मुग़ल शासन तंत्र के आधार स्तंभों, विशेषकर मनसबदारी और जागीरदारी व्यवस्था के मूल सिद्धांत
  • सत्रहवीं शताब्दी में भारतीय तटों पर यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों (पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी व ब्रिटिश) का आगमन और व्यापारिक कोठियों की स्थापना

इस अध्याय के लक्ष्य

  • 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य के पतन के सामाजिक-आर्थिक कारणों (जागीरदारी व मनसबदारी संकट, कृषक विद्रोह) और नादिर शाह (1739) व अहमद शाह अब्दाली (1761) के बाह्य आक्रमणों के विध्वंसक प्रभाव का विश्लेषण करना।
  • मुर्शिद कुली खाँ के नेतृत्व में बंगाल के स्वायत्त सूबे के रूप में पुनर्गठन (राजधानी स्थानांतरण, माल-ज़ामिनी व्यवस्था) और अलीवर्दी खाँ के काल में मराठा बरगी छापों के समाधान व यूरोपीय कंपनियों पर नियंत्रण का परीक्षण करना।
  • हैदराबाद में निज़ाम-उल-मुल्क आसफ़ जाह के नेतृत्व में स्वायत्तता की स्थापना (1724 शकरखेड़ा युद्ध) और अवध में सआदत खाँ बुरहान-उल-मुल्क व नवाब वज़ीरों के शासन का मूल्यांकन करना।
  • पेशवाओं के अधीन मराठा शक्ति के विस्तार (बालाजी विश्वनाथ, बाजीराव प्रथम की 'हिंदू पद पादशाही', बालाजी बाजीराव), मराठा परिसंघ के स्वरूप और 1761 के तीसरे पानीपत युद्ध के कारणों व युगांतरकारी ऐतिहासिक परिणामों की व्याख्या करना।
  • मैसूर में हैदर अली व टीपू सुल्तान के आधुनिक सैन्य सुधारों (रॉकेट तकनीक, फ्रांसीसी मित्रता) व चार आंग्ल-मैसूर युद्धों तथा पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 12 मिसलों के एकीकरण व फ़ौज-ए-ख़ास के गठन का परीक्षण करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 अध्याय 1: मुग़ल साम्राज्य का पतन: आ...
2 अध्याय 2: स्वायत्त बंगाल: मुर्शिद क...
3 अध्याय 3: हैदराबाद और अवध का उत्कर्...
4 अध्याय 4: मराठा परिसंघ व तीसरा पानी...
5 अध्याय 5: स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्तिय...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

अध्याय 1: मुग़ल साम्राज्य का पतन: आंतरिक संकट व बाह्य आक्रमण

1.1 औरंगज़ेब की मृत्यु (1707) और परवर्ती मुग़ल राजनीति

3 मार्च 1707 को अहमदनगर में छठे महान मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब आलमगीर की मृत्यु के साथ ही विशाल मुग़ल साम्राज्य के तीव्र विघटन की शुरुआत हुई। लगभग डेढ़ शताब्दी तक मुग़लों ने जिस राजनीतिक एकता, प्रशासनिक केंद्रीकरण और सैन्य अनुशासन की नींव रखी थी, वह बिखरने लगी। दक्खन में औरंगज़ेब का लगातार पच्चीस वर्षों तक चला सैन्य अभियान (1681–1707)—जिसे इतिहासकारों ने 'दक्खन का नासूर' (Deccan Ulcer) कहा है—शाही खजाने को पूरी तरह खाली कर गया, सेना का मनोबल तोड़ दिया और उत्तर भारत का प्रशासनिक ढांचा पंगु बना दिया।

औरंगज़ेब के बाद दिल्ली के तख्त पर अयोग्य व कमजोर शासकों की कतार बैठ गई, जिन्हें इतिहास में 'परवर्ती मुग़ल' (Later Mughals) कहा जाता है (बहादुर शाह प्रथम, जहांदार शाह, फर्रुखसियर, मुहम्मद शाह)। इनके शासनकाल में मुग़ल दरबार तीन प्रमुख गुटों के षड्यंत्रों का अखाड़ा बन गया:

  • तूरानी गुट: मध्य एशिया से आए अभिजात, जिनका नेतृत्व चिन किलिच खाँ (निज़ाम-उल-मुल्क) कर रहे थे।
  • ईरानी गुट: फारस से आए शिया अमीर, जिनमें अवध के सआदत खाँ प्रमुख थे।
  • हिंदुस्तानी गुट: भारतीय मूल के मुस्लिम अमीर, जिनका नेतृत्व कुख्यात सैयद बंधु (हुसैन अली और अब्दुल्ला खाँ) कर रहे थे। 1713 से 1720 के बीच इन्होंने कई सम्राटों को बनाया और अपदस्थ किया, इसलिए इन्हें 'नृप-निर्माता' या 'किंगमेकर' (Kingmakers) कहा गया।
1.2 आंतरिक संकट: जागीरदारी, मनसबदारी संकट व कृषक विद्रोह

आधुनिक इतिहासकार सतीश चंद्र और इरफ़ान हबीब ने स्पष्ट किया है कि मुग़ल साम्राज्य का पतन केवल शासकों की व्यक्तिगत दुर्बलता से नहीं, बल्कि गहरी आर्थिक व प्रशासनिक संरचना के चरमराने से हुआ:

मुग़ल साम्राज्य के पतन के ढांचागत कारण:
  • जागीरदारी व मनसबदारी संकट: मुग़ल प्रशासन का आधार मनसबदारी व्यवस्था थी। मनसबदारों को वेतन के रूप में राजस्व वसूलने हेतु भूमि दी जाती थी, जिसे जागीर कहते थे। 18वीं सदी के आरंभ में मनसबदारों की संख्या में भारी वृद्धि हुई, किंतु आबंटन के लिए आरक्षित खालसा भूमि (पाइबाकी / Paibaqi) समाप्त हो गई। इस भूमि संकट या 'बे-जागीरी' (Be-jagiri) ने अमीरों के बीच खूनी संघर्ष को जन्म दिया।
  • अत्यधिक राजस्व शोषण: अल्पकालिक आबंटन के भय से जागीरदारों ने किसानों से उपज का 50% से 60% तक कर के रूप में निचोड़ना शुरू कर दिया। इस बर्बर शोषण से तंग आकर कृषक खेती छोड़कर भागने लगे।
  • सशस्त्र कृषक विद्रोह: शोषित किसानों ने जातीय व धार्मिक झंडे तले मुग़ल सत्ता को खुली चुनौती दी। आगरा-मथुरा के जाट (गोकुला, राजाराम, चूड़ामन), नारनौल के सतनामी, बुंदेलखंड के बुंदेला (छत्रसाल) और पंजाब के सिखों ने निरंतर विद्रोह कर मुग़ल व्यापार मार्गों और राजस्व वसूली को पंगु बना दिया।
1.3 नादिर शाह का आक्रमण व दिल्ली का कत्लेआम (1739)

जब मुग़ल साम्राज्य आंतरिक संकटों से जूझ रहा था, तभी फारस के दुर्जेय शासक नादिर शाह अफ़शार ने भारत पर आक्रमण कर दिया। दिल्ली की राजनीतिक नपुंसकता और अपार धन की चाह में वह 1739 के आरंभ में पंजाब की सीमाओं को लांघ आया।

  • करनाल का युद्ध (24 फरवरी 1739): हरियाणा के करनाल में मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह 'रंगीला' की भारी-भरकम और अव्यवस्थित सेना नादिर शाह की सुप्रशिक्षित बंदूकधारी घुड़सवार सेना से टकराई। मात्र तीन घंटे में मुग़ल सेना परास्त हो गई। मीर बख्शी खान-ए-दौरान मारे गए और निज़ाम-उल-मुल्क ने मध्यस्थता कर संधि कराई।
  • दिल्ली का कत्लेआम (क़त्ल-ए-आम): नादिर शाह मुहम्मद शाह के साथ दिल्ली पहुंचा। दिल्ली में नादिर शाह की हत्या की झूठी अफवाह फैलने पर कुछ नागरिकों ने उसके सैनिकों पर हमला कर दिया। क्रोधित होकर नादिर शाह ने चांदनी चौक की सुनहरी मस्जिद से अपनी तलवार खींचकर आम जनता के कत्लेआम (क़त्ल-ए-आम / Qatl-e-Aam) का आदेश दिया। 22 मार्च 1739 को एक ही दिन में 30,000 निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया गया।
  • अपार खजाने की लूट: नादिर शाह ने दिल्ली के शाही खजाने से 70 करोड़ रुपये की नकद राशि, सोना व हीरे-जवाहरात लूटे। इनमें विश्वप्रसिद्ध कोहिनूर हीरा (Koh-i-Noor) और सम्राट शाहजहाँ का रत्नजड़ित मयूर सिंहासन (तख़्त-ए-ताऊस / Peacock Throne) शामिल था। लूट की संपत्ति इतनी अधिक थी कि नादिर शाह ने फारस लौटकर तीन वर्षों के लिए अपनी जनता का सारा कर माफ कर दिया।
1.4 अहमद शाह अब्दाली के धावे (1748–1767)

1747 में नादिर शाह की हत्या के बाद उसके अफ़गान सेनापति अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) ने आधुनिक अफ़गानिस्तान की स्थापना की। 1748 से 1767 के बीच अब्दाली ने भारत पर आठ बार भीषण हमले किए:

  • उसने पंजाब, दिल्ली, मथुरा और आगरा को बार-बार लूटा तथा पंजाब, कश्मीर और मुल्तान को अपने अफ़गान साम्राज्य में मिला लिया।
  • मुग़ल सम्राट केवल कठपुतली बनकर रह गए और अब्दाली के चहेते रुहेला सरदार नजीब-उद-दौला को दिल्ली का 'मीर बख्शी' (प्रधान सेनापति) नियुक्त करने को विवश हुए।
  • अब्दाली के इन निरंतर छापों ने उत्तर भारत में मुग़ल सत्ता के अंतिम अवशेषों को मिटा दिया और 1761 में मराठों के साथ तीसरे पानीपत युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तैयार की।

अध्याय 2: स्वायत्त बंगाल: मुर्शिद कुली खाँ व अलीवर्दी खाँ

2.1 'उत्तराधिकारी राज्य' (Successor State) की अवधारणा

अठारहवीं सदी में केंद्रीय मुग़ल सत्ता के ह्रास के उपरांत भारत में तीन प्रकार की क्षेत्रीय शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ:

  1. उत्तराधिकारी राज्य (Successor States): वे समृद्ध मुग़ल सूबे जहाँ के सूबेदारों ने स्वायत्तता हासिल कर वंशानुगत शासन कायम किया, परंतु दिल्ली के मुग़ल सम्राट के प्रति प्रतीकात्मक निष्ठा बनाए रखी (बंगाल, अवध, हैदराबाद)।
  2. स्वतंत्र राज्य (Independent Kingdoms): वे राज्य जो प्रत्यक्ष मुग़ल नियंत्रण से बाहर रहे और पूर्ण संप्रभुता बनाए रखी (मैसूर, त्रावणकोर/केरल, राजपूत राज्य)।
  3. विद्रोही राज्य (Rebel States): जिन्होंने मुग़ल सत्ता के विरुद्ध दीर्घकालिक सशस्त्र संघर्ष कर अपना स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित किया (मराठा, सिख, जाट)।
2.2 मुर्शिद कुली खाँ और बंगाल का पुनर्गठन (1700–1727)

मुग़ल साम्राज्य का सर्वाधिक धन-धान्य संपन्न सूबा सूबा बंगाल था (जिसमें वर्तमान पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार और ओडिशा शामिल थे)। 1700 ईस्वी में सम्राट औरंगज़ेब ने मुर्शिद कुली खाँ को बंगाल का दीवान नियुक्त किया। 1717 में सम्राट फर्रुखसियर ने उन्हें एक साथ बंगाल का सूबेदार (नाजिम) और दीवान बना दिया, जिससे बंगाल में स्वायत्त नवाबी शासन की शुरुआत हुई।

  • राजधानी स्थानांतरण (1704): ढाका में मुग़ल शहज़ादे अज़ीम-उस-शान के हस्तक्षेप से बचने के लिए मुर्शिद कुली खाँ ने राजधानी ढाका से भागीरथी नदी के तट पर स्थित मकसूदाबाद स्थानांतरित की और उसका नाम बदलकर मुर्शिदाबाद (Murshidabad) रखा।
  • माल-ज़ामिनी भू-राजस्व व्यवस्था (Mal-zamini System): मुर्शिद कुली खाँ ने बंगाल की भूमि की पैमाइश कराई और पुराने भ्रष्ट जमींदारों को हटाकर ठेके पर इज़ारेदार नियुक्त किए। इज़ारेदारों से नियमित लगान वसूली के लिए लिखित ज़मानत (ज़ामिन) ली जाती थी, जिसे माल-ज़ामिनी व्यवस्था कहा गया। लगान न देने वाले जमींदारों को मल-मूत्र से भरे कुंड में डालकर अमानवीय यातनाएं (जिसे 'वैकुंठवास' कहा जाता था) दी जाती थीं।
  • नए वफादार जमींदारों का उदय: मुर्शिद कुली खाँ के काल में कई बड़े व धनी हिंदू जमींदारों का अभ्युदय हुआ, जिनमें नाटोर (राजा रामजीवन), बर्दवान, नादिया और दिनाजपुर के जमींदार प्रमुख थे।
  • जगत सेठ घराने की भूमिका: मुर्शिद कुली खाँ के सबसे बड़े वित्तीय सहयोगी फतेह चंद का मारवाड़ी बैंकिंग घराना था। 1723 में सम्राट मुहम्मद शाह ने उन्हें 'जगत सेठ' (जगत का सेठ / Banker of the World) की उपाधि दी। जगत सेठ का घराना सरकारी टकसाल चलाता था, जमींदारों को लगान चुकाने हेतु ऋण देता था और हुंडी (Hundi) के जरिए दिल्ली दरबार को बंगाल का वार्षिक नजराना भेजता था।
2.3 अलीवर्दी खाँ (1740–1756) और मराठा बरगी धावे

मुर्शिद कुली खाँ (1727) और उनके दामाद शुजाउद्दीन के बाद उनके पौत्र सरफ़राज़ खाँ शासक बने। 1740 में बिहार के नायब नाजिम अलीवर्दी खाँ ने विद्रोह कर दिया और गिरिया के युद्ध (1740) में सरफ़राज़ खाँ को मारकर बंगाल के तख्त पर कब्जा कर लिया।

बरगी आक्रमणों का संकट (1742–1751):

अलीवर्दी खाँ के शासनकाल की सबसे बड़ी विपत्ति नागपुर के मराठा शासक रघूजी भोंसले के सेनापति भास्कर पंडित के नेतृत्व में मराठा घुड़सवारों के लगातार हमले थे, जिन्हें बंगाल में 'बरगी' (Bargi) कहा जाता था।

  • 1742 से 1751 तक दस वर्षों तक पश्चिमी बंगाल के राढ़ क्षेत्र (मिदनापुर, बर्दवान, बीरभूम, हुगली, मुर्शिदाबाद) में बरगियों ने भीषण लूटपाट, कत्लेआम और अग्निकांड मचाया। समकालीन बंगाली कवि गंगाराम ने अपने ग्रंथ 'महाराष्ट्र पुराण' में बरगियों के बर्बर अत्याचारों का मार्मिक वर्णन किया है।
  • कलकत्ता को बरगियों के धावों से बचाने के लिए 1742 में ब्रिटिश कंपनी और स्थानीय नागरिकों ने नगर के चारों ओर 3 मील लंबी एक सुरक्षात्मक खाई खोदी, जिसे 'मराठा डिच' (Maratha Ditch / मराठा खाई) कहा गया (वर्तमान सर्कुलर रोड)।
  • 1744 में अलीवर्दी खाँ ने मनकरा में संधि वार्ता के बहाने बुलाकर भास्कर पंडित और उसके 22 सरदारों की तंबू में धोखे से हत्या करवा दी, फिर भी धावे पूरी तरह नहीं थमे।
  • 1751 की शांति संधि: लगातार युद्धों से त्रस्त होकर मई 1751 में अलीवर्दी खाँ ने मराठों के साथ संधि कर ली:
    1. रघूजी भोंसले को ओडिशा के कटक क्षेत्र का प्रशासनिक नियंत्रण व राजस्व सौंप दिया।
    2. बंगाल व बिहार की सुरक्षा के बदले मराठों को प्रतिवर्ष 12 लाख रुपये 'चौथ' देना स्वीकार किया।
2.4 यूरोपीय व्यापारियों के प्रति अलीवर्दी की नीति: मधुमक्खी का दृष्टांत

अलीवर्दी खाँ ने बंगाल में सक्रिय यूरोपीय कंपनियों—कलकत्ता में ब्रिटिश, चंदननगर में फ्रांसीसी और चिनसुराह में डच—पर कड़ी निगरानी रखी। उन्होंने उन्हें निर्बाध व्यापार की अनुमति दी, किंतु अपनी कोठियों की किलेबंदी करने या सैन्य जमावड़ा करने की कतई छूट नहीं दी।

यूरोपीय कंपनियों के स्वभाव की व्याख्या करते हुए अलीवर्दी खाँ ने उन्हें मधुमक्खियों के छत्ते की उपमा दी: "यूरोपीय व्यापारी मधुमक्खियों की तरह हैं; यदि इन्हें न छेड़ा जाए तो ये मीठा शहद देती हैं, किंतु यदि इनके छत्ते को छेड़ा जाए तो ये डंक मार-मार कर मार डालेंगी।" 9 अप्रैल 1756 को अलीवर्दी खाँ के निधन के बाद उनके तरुण दौहित्र सिराज-उद-दौला नवाब बने, जिसके साथ ही प्लासी के ऐतिहासिक टकराव की नींव पड़ी।

अध्याय 3: हैदराबाद और अवध का उत्कर्ष

3.1 हैदराबाद: निज़ाम-उल-मुलक आसफ़ जाह प्रथम (1724)

दक्खन में हैदराबाद राज्य की स्थापना तूरानी गुट के दिग्गज सेनापति व कूटनीतिज्ञ मीर क़मर-उद-दीन खाँ सिद्दीकी ने की, जिन्हें इतिहास में चिन किलिच खाँ, निज़ाम-उल-मुलक और आसफ़ जाह प्रथम के नाम से जाना जाता है। 1722 में सम्राट मुहम्मद शाह ने उन्हें दिल्ली का वज़ीर (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया था। किंतु मुग़ल दरबार के पतनशील वातावरण से तंग आकर वे 1723 के अंत में दक्खन चले गए।

  • शकरखेड़ा का युद्ध (11 अक्टूबर 1724): मुग़ल सम्राट ने दक्खन के सूबेदार मुबारिज़ खाँ को निज़ाम को कुचलने के लिए भेजा। बेरार के शकरखेड़ा में दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। निज़ाम की उत्कृष्ट युद्ध रणनीति के आगे मुबारिज़ खाँ मारा गया।
  • आसफ़ जाही वंश की स्थापना: विवश होकर सम्राट मुहम्मद शाह ने निज़ाम को क्षमा कर दिया और उन्हें 'आसफ़ जाह' (Asaf Jah) की उपाधि देकर दक्खन का वायसराय मान लिया। इस प्रकार हैदराबाद में आसफ़ जाही राजवंश की नींव पड़ी, जो 1948 तक चला।
  • शासन का स्वरूप: निज़ाम ने पूर्ण स्वतंत्र संप्रभु शासक की भांति कार्य किया: उन्होंने जागीरें दीं, स्वतंत्र सेना रखी और मराठों से संधियां कीं। फिर भी उन्होंने मुग़ल सम्राट के नाम से सिक्के जारी रखे और खुतबा पढ़वाया।
  • बाहरी चुनौतियां: पेशवा बाजीराव प्रथम ने 1728 में पालखेड़ के युद्ध में निज़ाम को घेरकर परास्त किया और चौथ का अधिकार मनवाया। 1748 में निज़ाम की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार संघर्ष में ब्रिटिश और फ्रांसीसी कंपनियों ने हस्तक्षेप किया (द्वितीय कर्नाटक युद्ध)।
3.2 अवध: सआदत खाँ बुरहान-उल-मुलक (1722–1739)

गंगा के उर्वर मैदान में स्थित अवध (Awadh / Oudh) दिल्ली और बंगाल के मध्य सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। 1722 में सम्राट मुहम्मद शाह ने फारसी शिया अमीर सआदत खाँ को अवध का सूबेदार बनाया और बुरहान-उल-मुलक का खिताब दिया।

  • विद्रोही जमींदारों का दमन: अवध के विद्रोही राजपूत व अफ़गान जमींदार मिट्टी के किलों में बैठकर शाही कर देने से इनकार करते थे। सआदत खाँ ने कठोर सैन्य अभियान चलाकर इन किलों को ध्वस्त किया और कानून का शासन स्थापित किया।
  • राजस्व सुधार: 1723 में नया राजस्व बंदोबस्त कर कृषकों को जागीरदारों के शोषण से बचाया और लगान की सीधी वसूली सुनिश्चित की।
  • त्रासद अंत: 1739 में नादिर शाह के आक्रमण के समय करनाल के युद्ध में सआदत खाँ बंदी बना लिए गए। जब नादिर शाह ने उनकी डींगों के आधार पर 20 करोड़ रुपये की मांग की, तो वह राशि चुकाने में असमर्थ होकर अपमान के भय से सआदत खाँ ने विष खाकर आत्महत्या कर ली।
3.3 सफ़दरजंग और शुजा-उद-दौला: अवध के 'नवाब वज़ीर'

सआदत खाँ के बाद उनके भतीजे और दामाद मुहम्मद मुकीम तख्त पर बैठे, जो सफ़दरजंग (Safdarjung, 1739–1754) के नाम से विख्यात हुए।

  • 1748 में मुग़ल सम्राट अहमद शाह ने सफ़दरजंग को साम्राज्य का 'वज़ीर' (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया। इसके बाद से अवध के शासकों को वंशानुगत रूप से 'नवाब वज़ीर' (Nawab Wazir) कहा जाने लगा।
  • सफ़दरजंग ने अवध में हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया और महाराजा नवाब राय जैसे योग्य हिंदुओं को उच्च सैन्य व प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया।
3.4 शुजा-उद-दौला व औपनिवेशिक पराधीनता

सफ़दरजंग के पुत्र शुजा-उद-दौला (Shuja-ud-Daula, 1754–1775) के समय अवध की सैन्य शक्ति चरम पर थी। किंतु वे तीन ऐतिहासिक मोड़ों पर ब्रिटिश जाल में उलझ गए:

  1. तीसरा पानीपत युद्ध (1761): मराठों के भय से उन्होंने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया और अफ़गानों को रसद व सेना उपलब्ध कराई।
  2. बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर 1764): मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय और बंगाल के अपदस्थ नवाब मीर क़ासिम के साथ मिलकर शुजा-उद-दौला ने अंग्रेजों को भगाने के लिए संयुक्त मोर्चा बनाया। किंतु बक्सर के मैदान में मेजर हेक्टर मुनरो की अंग्रेजी सेना ने इस त्रिगुट को परास्त कर दिया।
  3. इलाहाबाद की संधि (16 अगस्त 1765): पराजित होकर शुजा-उद-दौला को रॉबर्ट क्लाइव के साथ इलाहाबाद की संधि करनी पड़ी:
    • अवध के समृद्ध कड़ा और इलाहाबाद जिले छीनकर मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय को दिए गए।
    • कंपनी को 50 लाख रुपये युद्ध का हर्जाना देना पड़ा।
    • अवध को ब्रिटिश बंगाल की सुरक्षा के लिए एक 'बफर स्टेट' (मध्यवर्ती राज्य) बना दिया गया और लखनऊ में ब्रिटिश रेजीडेंट तैनात किया गया।
उत्तराधिकारी राज्य संस्थापक व स्थापना वर्ष राजधानी मुख्य संस्थागत सुधार औपनिवेशिक पराधीनता का मोड़
बंगाल मुर्शिद कुली खाँ (1717) ढाका → मुर्शिदाबाद (1704) माल-ज़ामिनी व्यवस्था; नए जमींदार व जगत सेठ का उत्कर्ष प्लासी का युद्ध (1757) व दीवानी अधिकार (1765)
हैदराबाद निज़ाम आसफ़ जाह प्रथम (1724) हैदराबाद शकरखेड़ा में मुबारिज़ खाँ को हराया; आसफ़ जाही वंश वेलेस्ली की सहायक संधि स्वीकार करने वाला प्रथम राज्य (1798)
अवध सआदत खाँ बुरहान-उल-मुलक (1722) फैजाबाद → लखनऊ विद्रोही राजपूत जमींदारों का दमन; 'नवाब वज़ीर' पदवी बक्सर का युद्ध (1764) व इलाहाबाद की संधि (1765)

अध्याय 4: मराठा परिसंघ व तीसरा पानीपत युद्ध (1761)

4.1 पेशवाओं का उत्कर्ष: प्रधानमंत्री के हाथों में वास्तविक सत्ता

1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़लों ने शिवाजी के पौत्र शाहू को रिहा कर दिया। शाहू के महाराष्ट्र लौटने पर उनकी चाची ताराबाई (जो कोल्हापुर से शिवाजी द्वितीय के नाम पर शासन कर रही थीं) के साथ गृहयुद्ध छिड़ गया। इस गृहयुद्ध में शाहू को विजय दिलाने में एक प्रतिभावान चितपावन ब्राह्मण राजस्व अधिकारी बालाजी विश्वनाथ (Balaji Vishwanath) ने केंद्रीय भूमिका निभाई।

  • 1713 में प्रसन्न होकर शाहू ने बालाजी विश्वनाथ को पेशवा (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया और इस पद को वंशानुगत बना दिया।
  • 1719 की दिल्ली संधि: बालाजी विश्वनाथ ने सैयद बंधुओं के साथ संधि कर मराठा सेना को दिल्ली में प्रवेश कराया। मुग़ल सम्राट ने शिवाजी के 'स्वराज्य' को मान्यता दी और दक्खन के छह मुग़ल सूबों से चौथ (Chauth - 1/4 भाग) और सरदेशमुखी (Sardeshmukhi - अतिरिक्त 1/10 भाग) वसूलने का शाही फरमान जारी किया।
4.2 बाजीराव प्रथम (1720–1740): 'हिंदू पद पादशाही' व आक्रामक विस्तार

बालाजी विश्वनाथ के निधन के उपरांत उनके बीस वर्षीय पुत्र बाजीराव प्रथम (Baji Rao I) पेशवा बने। वे 18वीं सदी के भारत के सबसे महान घुड़सवार सेनानायक और रणनीतिकार थे।

  • हिंदू पद पादशाही (Hindu Pad Padshahi): बाजीराव ने शिवाजी के हिंदू साम्राज्य के विचार को पुनर्जीवित करते हुए छत्रपति शाहू से कहा: "आइए, हम इस सूखते हुए मुग़ल वृक्ष के तने पर प्रहार करें, शाखाएं तो स्वयं ही गिर पड़ेंगी! इस प्रकार हमारा मराठा ध्वज कृष्णा नदी से अटक (सिंधु नदी) तक लहराएगा!"
  • प्रमुख सैन्य विजयें:
    1. पालखेड़ का युद्ध (1728): बिजली जैसी तीव्र चालों से निज़ाम-उल-मुलक को घेरकर आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया।
    2. मालवा व गुजरात विजय: मुग़ल सूबेदारों को खदेड़कर मध्य व पश्चिमी भारत के व्यापारिक मार्गों पर आधिपत्य जमाया।
    3. बुंदेलखंड की सहायता (1729): अफ़गान सेनापति मुहम्मद खाँ बंगश से वृद्ध राजा छत्रसाल को बचाया; कृतज्ञ छत्रसाल ने बाजीराव को राज्य का एक-तिहाई भाग (झांसी, सागर) और मस्तानी भेंट की।
    4. दिल्ली पर अचानक धावा (1737): मात्र 10 दिनों में 500 मील की दूरी तय कर अचानक दिल्ली के फाटकों पर सेना लेकर प्रकट हुए, जिससे सम्राट मुहम्मद शाह हतप्रभ रह गया।
    5. भोपाल का युद्ध (1738): मुग़ल व निज़ाम की संयुक्त सेना को भोपाल में घेरकर नर्मदा और चंबल के मध्य के समस्त भूभाग पर मराठा नियंत्रण स्थापित कराया।
4.3 बालाजी बाजीराव (नाना साहेब) व मराठा परिसंघ (कॉन्फेडरेसी)

बालाजी बाजीराव (नाना साहेब, 1740–1761) के काल में मराठा साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार तो चरम पर पहुंचा, किंतु उसका स्वरूप बदल गया:

  • सांगोला समझौता (1750): 1749 में छत्रपति शाहू की मृत्यु के बाद सांगोला समझौते द्वारा नाममात्र के छत्रपति को सतारा के राजप्रासाद में सीमित कर दिया गया और पेशवा ही मराठा साम्राज्य का वास्तविक सर्वोच्च शासक बन गया। राजधानी पुणे (Pune) स्थानांतरित हो गई।
  • मराठा परिसंघ (Maratha Confederacy): साम्राज्य के विशाल भूभाग को संभालने के लिए सैन्य अधिकार विभिन्न शक्तिशाली सरदारों में बांट दिए गए:
    • सिंधिया (Scindia): ग्वालियर व उज्जैन (रानोजी सिंधिया, बाद में महादजी सिंधिया)।
    • होल्कर (Holkar): इंदौर व मालवा (मल्हार राव होल्कर)।
    • गायकवाड़ (Gaekwad): बड़ौदा व गुजरात (दामाजी गायकवाड़)।
    • भोंसले (Bhonsle): नागपुर, बेरार व ओडिशा (रघूजी भोंसले)।
    • पेशवा (Peshwa): पुणे से पूरे परिसंघ के अध्यक्ष के रूप में समन्वय करते थे।
  • पंजाब विजय व अटक पर अधिकार (1758): पेशवा के भाई रघुनाथ राव ने 1758 में पंजाब पर चढ़ाई कर अब्दाली के पुत्र तैमूर शाह को लाहौर से खदेड़ दिया और सिंधु नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध अटक दुर्ग (Fort Attock) पर भगवा मराठा ध्वज फहरा दिया। इसी दुस्साहस ने अहमद शाह अब्दाली को निर्णायक युद्ध के लिए प्रेरित किया।
4.4 तीसरा पानीपत युद्ध (14 जनवरी 1761)

हरियाणा के ऐतिहासिक पानीपत के मैदान में मराठों और अहमद शाह अब्दाली के अफ़गान गठबंधन के मध्य लड़ा गया यह युद्ध भारतीय इतिहास का सबसे भीषण और निर्णायक संग्राम था।

तीसरा पानीपत: कारण, सामरिक भूलें व भारी नरसंहार:
  • मराठा कमान: सेनापति पेशवा के चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ (Sadashivrao Bhau) थे और नाममात्र के अध्यक्ष पेशवा के 17 वर्षीय पुत्र विश्वासराव थे। फ्रांसीसी सैन्य पद्धति से प्रशिक्षित इब्राहिम खाँ गार्दी की तोपखाना व पैदल टुकड़ी मराठों की मुख्य ताकत थी।
  • अफ़गान गठबंधन: अब्दाली ने चतुराई से अवध के शुजा-उद-दौला और रुहेला सरदार नजीब-उद-दौला को इस्लामी एकजुटता के नाम पर अपने साथ मिला लिया।
  • मराठों की पराजय के प्रमुख कारण:
    1. कूटनीतिक अलगाव: चौथ और सरदेशमुखी की कठोर वसूली से उत्तर भारत के राजा मराठों से नाराज थे। राजपूतों ने सहायता नहीं की; भाऊ के दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर भरतपुर के जाट राजा सूरजमल सेना हटाकर चले गए; और सिख तटस्थ रहे।
    2. भारी गैर-सैनिक भीड़ का बोझ: मराठा सेना के साथ लगभग 1 लाख तीर्थयात्री, महिलाएं व सेवक थे, जो उत्तर के तीर्थों के दर्शन हेतु आए थे। इनके भोजन और सुरक्षा ने सेना की गतिशीलता छीन ली।
    3. रसद का संकट व भुखमरी: अब्दाली ने मराठों की दिल्ली से रसद आपूर्ति पूरी तरह काट दी। पानीपत के शिविर में तीन महीने तक सेना और घोड़े भूख से मरते रहे। 14 जनवरी को मराठा भूखे पेट मरो या मारो की भावना से लड़े।
    4. हथियारों का अंतर: इब्राहिम गार्दी की भारी तोपें एक जगह स्थिर थीं; जबकि अब्दाली के पास ऊंटों पर रखी हल्की, गतिशील व घातक तोपें (ज़म्बूरक / Zamburak) थीं, जिन्होंने मराठा मोर्चे को उड़ा दिया।
  • त्रासद अंत व सांकेतिक संदेश: भीषण युद्ध में विश्वासराव के सिर में गोली लगी और वे वीरगति को प्राप्त हुए। भतीजे के शव को देखकर भाऊ घोड़े से कूदकर तलवार लेकर शत्रुओं में घुस गए और लड़ते हुए शहीद हो गए। लगभग 70,000 मराठा सैनिक और 30,000 तीर्थयात्री मार डाले गए।

    पुणे में पेशवा नाना साहेब को एक व्यापारी द्वारा भेजा गया प्रसिद्ध सांकेतिक पत्र मिला: "दो मोती विलीन हो गए [भाऊ और विश्वासराव], सत्ताईस स्वर्ण मुद्राएं खो गईं [प्रमुख सरदार], और चांदी व तांबे के सिक्कों की तो कोई गिनती ही नहीं की जा सकी [साधारण सैनिक]।" इस आघात को नाना साहेब सहन न कर सके और 23 जून 1761 को उनका देहांत हो गया।
4.5 तीसरे पानीपत युद्ध का युगांतरकारी महत्व

प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार सिडनी ओवेन ने यथार्थ ही लिखा है: "तीसरे पानीपत के युद्ध ने यह फैसला नहीं किया कि भारत पर कौन राज करेगा, बल्कि यह तय कर दिया कि कौन राज नहीं करेगा।"

  • इसने अखिल भारतीय हिंदू साम्राज्य स्थापित करने के मराठों के स्वप्न को चकनाचूर कर दिया।
  • अब्दाली अपनी सेना के विद्रोह के कारण काबुल लौट गया, जिससे उत्तर भारत में कोई स्थायी अफ़गान शासन नहीं बना।
  • इसके फलस्वरूप उत्तर व पूर्वी भारत में एक विशाल राजनीतिक शून्यता (Power Vacuum) उत्पन्न हुई, जिसका पूरा लाभ उठाकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपनी औपनिवेशिक सत्ता का विस्तार किया।

अध्याय 5: स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्तियां: मैसूर व पंजाब

5.1 हैदर अली के अधीन मैसूर राज्य का उत्कर्ष (1761–1782)

दक्षिण भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवादी मंसूबों का सबसे दृढ़ और साहसी प्रतिरोध मैसूर राज्य (Kingdom of Mysore) ने किया। प्राचीन वोडेयार हिंदू राजाओं के अधीन राज्य की वास्तविक सत्ता नंजराज और देवराज नामक दो भ्रष्ट मंत्रियों के हाथों में थी। इस राजनीतिक संकट के दौर में एक साधारण सैनिक के रूप में हैदर अली (Haidar Ali) का उत्कर्ष हुआ।

  • 1721 में जन्मे हैदर अली अपनी वीरता के बल पर 1755 में डिंडीगुल के फौजदार बने। वहां फ्रांसीसी इंजीनियरों की सहायता से उन्होंने एक आधुनिक शस्त्रागार (Ordnance Factory) स्थापित किया और सैनिकों को यूरोपीय बंदूक प्रशिक्षण दिया।
  • 1761 में उन्होंने नंजराज को अपदस्थ कर मैसूर की सत्ता संभाली।
  • प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767–1769): हैदर अली ने कूटनीति से मराठों और निज़ाम को अंग्रेजों से अलग कर दिया और अपनी घुड़सवार सेना लेकर मद्रास के निकट पहुंच गए। भयभीत होकर अंग्रेजों को 1769 में हैदर की शर्तों पर मद्रास की संधि (Treaty of Madras) करनी पड़ी।
  • द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780–1784): अंग्रेजों द्वारा संधि की शर्तों का उल्लंघन करने और मैसूर के अधीन फ्रांसीसी बंदरगाह माहे पर कब्जा करने से नाराज होकर हैदर ने युद्ध छेड़ दिया। 1780 में पोल्लिलूर के युद्ध में हैदर और टीपू ने कर्नल बेली की अंग्रेजी सेना को ध्वस्त कर दिया। युद्ध के दौरान ही 7 दिसंबर 1782 को कैंसर से हैदर अली का निधन हो गया।
5.2 टीपू सुल्तान: 'मैसूर का शेर' (1782–1799)

हैदर अली के बाद उनके असाधारण व देशभक्त पुत्र टीपू सुल्तान (Tipu Sultan) शासक बने, जिन्हें 'मैसूर का शेर' (Tiger of Mysore) कहा गया। टीपू समझ चुके थे कि आधुनिक विज्ञान, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बिना अंग्रेजों को परास्त नहीं किया जा सकता।

टीपू सुल्तान के युगांतरकारी व आधुनिक सुधार:
  • युद्ध में लोहे के रॉकेटों का आविष्कार (Mysorean Rockets): टीपू ने बांस की नलियों के स्थान पर लोहे के बेलनाकार आवरण में बारूद भरकर दुनिया के पहले घातक सैन्य रॉकेट विकसित किए। 2 किलोमीटर की मारक क्षमता वाले इन रॉकेटों ने पोल्लिलूर के युद्ध में अंग्रेजों में तबाही मचा दी थी। इसी तकनीक के आधार पर अंग्रेजों ने 'कांग्रेव रॉकेट' बनाए।
  • अंतरराष्ट्रीय कूटनीति व जैकोबिन क्लब: फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित होकर टीपू ने श्रीरंगपट्टनम में फ्रांसीसी सैनिकों द्वारा स्थापित जैकोबिन क्लब की सदस्यता ली और स्वयं को गर्व से 'नागरिक टीपू' (Citizen Tipu) घोषित किया। उन्होंने महल के सामने स्वतंत्रता का वृक्ष (Tree of Liberty) लगाया। अंग्रेजों के विरुद्ध गठबंधन बनाने के लिए फ्रांस (नेपोलियन व लुई सोलहवें), तुर्की (उस्मानी सुल्तान) और अफ़गानिस्तान में अपने राजदूत भेजे।
  • व्यापारिक व औद्योगिक पहल: टीपू ने एक राजकीय व्यापार निगम बनाया, फारस की खाड़ी (मस्कट, जेद्दा) में 30 व्यापारिक कोठियां स्थापित कीं, मैसूर में रेशम उद्योग (Sericulture) प्रारंभ किया और कागज, चीनी व तोप ढलाई के आधुनिक कारखाने खोले।
  • प्रशासनिक सुधार: नया सौर कैलेंडर (मौलूदी), आधुनिक नाप-तौल प्रणाली और हिंदू देवी-देवताओं (शिव-पार्वती) व अरबी सुलेख से युक्त कलात्मक सिक्के जारी किए।
5.3 तृतीय व चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध: श्रीरंगपट्टनम का पतन

अंग्रेज टीपू सुल्तान को भारत में अपना सबसे खतरनाक शत्रु मानते थे:

  • तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790–1792): गवर्नर-जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस ने मराठों व निज़ाम के साथ त्रिगुट बनाकर मैसूर पर हमला किया। राजधानी श्रीरंगपट्टनम (Seringapatam) के घिर जाने पर टीपू को 1792 में अपमानजनक संधि करनी पड़ी:
    1. मैसूर का आधा राज्य छीनकर अंग्रेजों, मराठों और निज़ाम ने आपस में बांट लिया।
    2. युद्ध हर्जाने के रूप में 3 करोड़ 30 लाख रुपये मांगे गए।
    3. राशि चुकाए जाने तक कॉर्नवालिस ने टीपू के दो नाबालिग बेटों (अब्दुल खालिक व मुइज़ुद्दीन) को बंधक बनाकर कलकत्ता भेज दिया।
  • चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799): साम्राज्यवादी गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेस्ली ने भारत आकर टीपू को सहायक संधि (Subsidiary Alliance) स्वीकार करने का फरमान भेजा। स्वाभिमानी टीपू ने इसे ठुकराते हुए कहा: "गीदड़ की तरह सौ साल जीने से शेर की तरह एक दिन जीना कहीं बेहतर है।" 4 मई 1799 को अंग्रेजों ने श्रीरंगपट्टनम पर धावा बोल दिया। प्रधानमंत्री मीर सादिक के गद्दार षड्यंत्र के बावजूद टीपू सुल्तान हाथ में नंगी तलवार लेकर अंतिम सांस तक लड़े और दुर्ग के द्वार पर वीरगति को प्राप्त हुए। अंग्रेजों ने वोडेयार वंश के एक बालक को गद्दी पर बिठाकर सहायक संधि थोप दी।
5.4 पंजाब में सिख शक्ति का उदय व 12 मिसलें

दसवें सिख गुरु गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में आनंदपुर साहिब में खालसा (Khalsa) पंथ की स्थापना कर सिख समुदाय को एक अदम्य सैन्य शक्ति में परिवर्तित किया। 1708 में गुरुजी की मृत्यु के बाद उनके शिष्य बंदा सिंह बहादुर (Banda Singh Bahadur) ने मुग़ल सत्ता के विरुद्ध कृषक विद्रोह छेड़कर पहली बार स्वतंत्र सिख सत्ता स्थापित की, सिक्के चलाए और जमींदारी प्रथा का अंत किया (1716 में दिल्ली में उन्हें शहीद कर दिया गया)।

नादिर शाह और अब्दाली के हमलों से फैली अराजकता के बीच सिख दल खालसा (Dal Khalsa) के झंडे तले संगठित हुए और पंजाब में 12 स्वायत्त लोकतांत्रिक मिसलें (Misl - परिसंघ) अस्तित्व में आईं:

  • भंगी, अहलुवालिया, कन्हैया, रामगढ़िया और शुकरचकिया मिसल (Sukerchakia Misl) प्रमुख थीं।
  • अमृतसर में बैसाखी और दीवाली पर अकाल तख्त के सामने एकत्र होकर मिसलदार सर्वसम्मत निर्णय लेते थे, जिसे 'गुरमत्ता' (Gurmata) कहा जाता था।
5.5 महाराजा रणजीत सिंह: 'शेर-ए-पंजाब' (1792–1839)

पंजाब की परस्पर विरोधी मिसलों को एक सूत्र में पिरोकर एक शक्तिशाली सिख साम्राज्य की स्थापना शुकरचकिया मिसल के महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) ने की, जिन्हें 'शेर-ए-पंजाब' कहा जाता है।

  • साम्राज्य विस्तार:
    1. 1799 में मात्र 19 वर्ष की आयु में उन्होंने भंगी मिसल से लाहौर छीनकर अपनी राजनीतिक राजधानी बनाया।
    2. 1801 की बैसाखी पर उन्होंने स्वयं को महाराजा घोषित किया।
    3. 1805 में उन्होंने सिखों की धार्मिक नगरी अमृतसर को जीतकर राजनीतिक व धार्मिक सत्ता का संगम किया।
    4. इसके बाद मुल्तान (1818), कश्मीर (1819) और पेशावर (1834) जीतकर अफ़गान आक्रमणों का मार्ग हमेशा के लिए बंद कर दिया। अफ़गान अमीर शाह शुजा से उन्होंने प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा प्राप्त किया।
  • अमृतसर की संधि (1809): सतलुज पार के सिख राज्यों पर अधिकार के प्रश्न पर ब्रिटिश दूत चार्ल्स मेटकाफ़ के साथ 1809 में अमृतसर की संधि की गई। इसके अनुसार सतलुज नदी (River Sutlej) को सिख साम्राज्य और ब्रिटिश भारत की सीमा मान लिया गया।
  • फ़ौज-ए-ख़ास व यूरोपीय सैन्य सुधार: रणजीत सिंह ने एशिया की दूसरी सबसे ताकतवर आधुनिक सेना खड़ी की। उन्होंने नेपोलियन की सेना के अनुभवी यूरोपीय जनरलों को नियुक्त कर अपनी विशेष सेना 'फ़ौज-ए-ख़ास' (Fauj-i-Khas) बनाई:
    • जीन-फ्रांस्वा एलार्ड (फ्रांसीसी): घुड़सवार सेना को यूरोपीय ड्रिल सिखाई।
    • जीन-बैप्टिस्ट वेंचुरा (इतालवी): पैदल सेना को बंदूक युद्ध में निपुण किया।
    • क्लाउड कोर्ट व पाओलो एविटेबाइल: तोपखाने को आधुनिक बनाया और लाहौर में आधुनिक तोप ढलाई कारखाने लगाए।
  • धर्मनिरपेक्ष व समतावादी शासन: उनका प्रशासन सर्वधर्म समभाव का प्रतीक था। उनके प्रधानमंत्री डोगरा राजपूत ध्यान सिंह, विदेश मंत्री मुस्लिम विद्वान फकीर अज़ीज़ुद्दीन, और प्रमुख सेनापति हरि सिंह नलवा व दीवान मोहकम चंद थे। उन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर सोने की चादर चढ़वाई और मंदिरों-मस्जिदों को समान रूप से दान दिया।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

क्षेत्रीय शक्तियों के उत्थान व पतन की महा-समयरेखा (1707–1809)
1707–1809 क्षेत्रीय शक्तियों का विकासक्रम
1707 से 1809 तक 102 वर्षों का निर्णायक कालखंड।
18वीं सदी के क्षेत्रीय राज्यों का वर्गीकरण मैट्रिक्स
राज्य का स्वरूप व संप्रभुता
उत्तराधिकारी राज्य प्रतीकात्मक मुग़ल निष्ठा रखते हुए भी आंतरिक रूप से पूर्ण स्वायत्त थे।
तीन प्रमुख उत्तराधिकारी राज्यों का तुलनात्मक मैट्रिक्स
प्रशासनिक सुधार व औपनिवेशिक पराधीनता
बंगाल ने सबसे पहले वित्तीय संप्रभुता गंवाई; हैदराबाद ने सबसे पहले सहायक संधि स्वीकारी।
मराठा पेशवाओं के उत्कर्ष व विस्तार का मैट्रिक्स
पेशवा प्रभुत्व का चरमोत्कर्ष
1750 की सांगोला संधि से पेशवा मराठा साम्राज्य के वास्तविक सर्वोच्च अधिशासी बने।
मराठा परिसंघ (कॉन्फेडरेसी) के 5 घरानों का मैट्रिक्स
विकेंद्रीकृत मराठा शक्ति
इस विकेंद्रीकरण ने त्वरित प्रसार तो किया परंतु केंद्रीय अनुशासन को नष्ट कर दिया।
तीसरा पानीपत युद्ध (1761): पक्ष व परिणाम मैट्रिक्स
14 जनवरी 1761 निर्णायक टकराव
सांकेतिक पत्र: 'दो मोती विलीन हुए, सत्ताईस मुहरें खो गईं, चांदी-तांबे की कोई गिनती नहीं।'
चार आंग्ल-मैसूर युद्धों का कालानुक्रमिक मैट्रिक्स
मैसूर का ब्रिटिश प्रतिरोध व पतन
4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम में लड़ते हुए टीपू सुल्तान शहीद हुए।
पंजाब में सिख शक्ति का विकास: बंदा बहादुर से रणजीत सिंह
सिख सैन्य व राज्य रूपांतरण
रणजीत सिंह ने पश्चिमी सैन्य विज्ञान और धर्मनिरपेक्ष प्रशासन का उत्कृष्ट समन्वय किया।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
1707 ईस्वी में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य के पतन के मुख्य ढांचागत कारण क्या थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मुग़ल साम्राज्य के पतन के पीछे चार मुख्य ढांचागत और आर्थिक संकट थे:

  1. जागीरदारी व मनसबदारी संकट: मुग़ल शासन तंत्र मनसबदारी व्यवस्था पर टिका था, जहाँ वेतन के बदले लगान वसूली की भूमि (जागीर) दी जाती थी। 18वीं सदी के आरंभ में मनसबदारों की संख्या बहुत बढ़ गई, किंतु आबंटन के लिए आरक्षित भूमि (पाइबाकी) खत्म हो गई। इस 'बे-जागीरी' संकट ने अमीरों के बीच खूनी गुटीय संघर्ष को जन्म दिया।
  2. औरंगज़ेब की दक्खन नीति (1681–1707): दक्खन में 25 वर्षों के निरंतर युद्ध ने शाही खजाना खाली कर दिया और मुग़ल सेना की कमर तोड़ दी। उत्तर भारत का प्रशासन पूरी तरह उपेक्षित व पंगु हो गया।
  3. अत्यधिक राजस्व शोषण व कृषक विद्रोह: जागीरदारों ने किसानों से उपज का 50-60% तक कर वसूलना शुरू किया। इस दमन के विरुद्ध जाट, सतनामी, बुंदेला और सिख किसानों ने हथियार उठा लिए, जिससे साम्राज्य की आर्थिक रीढ़ टूट गई।
  4. कमजोर शासक व दरबारी गुटबाजी: औरंगज़ेब के उत्तराधिकारी कमजोर थे। दरबार तूरानी, ईरानी और हिंदुस्तानी (सैयद बंधु) गुटों के षड्यंत्रों का केंद्र बन गया, जिससे केंद्रीय नियंत्रण पूरी तरह बिखर गया।
उदाहरण 2
मुर्शिद कुली खाँ ने बंगाल को एक स्वायत्त और समृद्ध उत्तराधिकारी राज्य के रूप में कैसे संगठित किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मुर्शिद कुली खाँ ने चार युगांतरकारी कदमों से बंगाल को एक सुदृढ़ स्वायत्त राज्य बनाया:

  1. राजधानी स्थानांतरण (1704): ढाका में मुग़ल शहज़ादे अज़ीम-उस-शान के हस्तक्षेप से बचने हेतु उन्होंने राजधानी ढाका से मकसूदाबाद स्थानांतरित कर उसका नाम मुर्शिदाबाद रखा।
  2. माल-ज़ामिनी भू-राजस्व व्यवस्था: उन्होंने बंगाल की भूमि की पैमाइश कराई और पुराने भ्रष्ट जमींदारों को हटाकर ठेके पर इज़ारेदार नियुक्त किए। इज़ारेदारों से लगान की लिखित ज़मानत (ज़ामिन) ली जाती थी, जिसे माल-ज़ामिनी व्यवस्था कहा गया। इससे शाही खजाने में नियमित लगान की आवक सुनिश्चित हुई।
  3. नए वफादार जमींदारों का उत्थान: उन्होंने नाटोर के राजा रामजीवन, बर्दवान, नादिया और दिनाजपुर जैसे बड़े और वफादार हिंदू जमींदारों को संरक्षण दिया, जो नवाबी शासन के मजबूत स्तंभ बने।
  4. जगत सेठ घराने से गठबंधन: फतेह चंद के मारवाड़ी बैंकिंग घराने (जिन्हें सम्राट ने 'जगत सेठ' की उपाधि दी) ने नवाब के खजाने को संभाला। वे टकसाल चलाते थे, जमींदारों को कर्ज देते थे और हुंडी के जरिए दिल्ली के सम्राट को बंगाल का वार्षिक नजराना भेजते थे। इस प्रकार बंगाल ने आंतरिक स्वायत्तता हासिल की।
उदाहरण 3
मराठा बरगी आक्रमण क्या थे और नवाब अलीवर्दी खाँ ने इस संकट का समाधान कैसे किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

बरगी आक्रमण (1742–1751): नागपुर के मराठा शासक रघूजी भोंसले के सेनापति भास्कर पंडित के नेतृत्व में मराठा घुड़सवारों (जिन्हें बंगाल में 'बरगी' कहा जाता था) ने दस वर्षों तक बंगाल पर भीषण छापे मारे:

  1. जनजीवन पर विध्वंस: पश्चिमी बंगाल के राढ़ क्षेत्र (मिदनापुर, बर्दवान, बीरभूम, हुगली, मुर्शिदाबाद) में बरगियों ने गांवों को जला दिया, नागरिकों की हत्याएं कीं और धन लूटा। कवि गंगाराम के 'महाराष्ट्र पुराण' में इस बर्बरता का हृदयविदारक वर्णन मिलता है।
  2. मराठा खाई (1742): कलकत्ता को बरगियों से बचाने के लिए अंग्रेजों व स्थानीय लोगों ने 3 मील लंबी सुरक्षात्मक खाई (मराठा डिच) खोदी।
  3. अलीवर्दी का संघर्ष: अलीवर्दी खाँ ने वीरता से बरगियों को कई बार खदेड़ा और 1744 में मनकरा में भास्कर पंडित को धोखे से मार डाला, किंतु छापे नहीं रुके।
  4. 1751 की शांति संधि: 1751 में अलीवर्दी खाँ ने मराठों से संधि कर ली:
    • ओडिशा के कटक क्षेत्र का राजस्व व नियंत्रण रघूजी भोंसले को सौंप दिया।
    • बंगाल व बिहार पर आक्रमण न करने के बदले प्रतिवर्ष 12 लाख रुपये 'चौथ' देना स्वीकार किया।
उदाहरण 4
हैदराबाद में निज़ाम-उल-मुलक और अवध में सआदत खाँ द्वारा स्वायत्तता स्थापना की तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

हैदराबाद और अवध 18वीं सदी के प्रमुख मुग़ल उत्तराधिकारी राज्य थे, जिनकी स्थापना दिल्ली दरबार के असंतुष्ट अमीरों ने की थी:

  1. संस्थापक व पृष्ठभूमि:
    • हैदराबाद: तूरानी अमीर निज़ाम-उल-मुलक आसफ़ जाह प्रथम दिल्ली की भ्रष्ट राजनीति से तंग आकर वज़ीर का पद छोड़कर 1723 में दक्खन चले गए।
    • अवध: फारसी शिया अमीर सआदत खाँ बुरहान-उल-मुलक को 1722 में सम्राट मुहम्मद शाह ने अवध का सूबेदार बनाकर भेजा था।
  2. स्वायत्तता का मार्ग:
    • हैदराबाद: निज़ाम ने सैन्य विजय से सत्ता पाई। 1724 में शकरखेड़ा के युद्ध में उन्होंने सम्राट के भेजे सूबेदार मुबारिज़ खाँ को परास्त कर मार डाला, जिससे सम्राट उन्हें 'आसफ़ जाह' मानने पर विवश हुआ।
    • अवध: सआदत खाँ ने दिल्ली से युद्ध नहीं किया, बल्कि अवध के स्थानीय विद्रोही राजपूत व अफ़गान जमींदारों के मिट्टी के किले तोड़कर शांति व कानून व्यवस्था बनाई।
  3. संप्रभुता का स्वरूप:
    • दोनों शासक आंतरिक रूप से पूर्ण स्वतंत्र थे (सेना, कर, नियुक्तियां), किंतु दोनों ने मुग़ल सम्राट के नाम के सिक्के और खुतबा जारी रखा।
    • अवध के बाद के शासक सफ़दरजंग मुग़ल साम्राज्य के वज़ीर बने, जिससे वे 'नवाब वज़ीर' कहलाए, जबकि हैदराबाद के निज़ाम दक्खन में मराठों से संघर्ष में उलझे रहे।
उदाहरण 5
बाजीराव प्रथम की 'हिंदू पद पादशाही' नीति क्या थी और इसने मराठा सैन्य रणनीति को कैसे बदला?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पेशवा बाजीराव प्रथम (1720–1740) ने मराठा राज्य को एक अखिल भारतीय साम्राज्य बनाने का संकल्प लिया:

  1. हिंदू पद पादशाही नीति: बाजीराव ने छत्रपति शाहू से कहा: 'आइए, हम इस सूखते मुग़ल वृक्ष के तने पर प्रहार करें, शाखाएं तो स्वयं ही गिर पड़ेंगी! इस प्रकार हमारा मराठा ध्वज कृष्णा नदी से अटक (सिंधु नदी) तक लहराएगा!' वे उत्तर भारत के हिंदू राजाओं (बुंदेला, राजपूत) को एकजुट कर मुग़ल सत्ता का अंत करना चाहते थे।
  2. गतिशील घुड़सवार गुरिल्ला युद्ध (गनिमी कावा): बाजीराव ने भारी तोपों व सुस्त पैदल सेना के स्थान पर अत्यंत तेज गति वाली हल्की घुड़सवार सेना को मुख्य हथियार बनाया। उनकी सेना प्रतिदिन 40-50 मील चलती थी, स्थानीय रसद पर निर्भर रहती थी और दुश्मन को अचानक घेर लेती थी।
  3. प्रमुख विजयें:
    • पालखेड़ का युद्ध (1728): बिना किसी भारी तोपखाने के केवल गति और पानी की आपूर्ति काटकर निज़ाम-उल-मुलक को आत्मसमर्पण कराया।
    • मालवा व गुजरात विजय: मुग़ल सूबेदारों को भगाकर व्यापारिक मार्ग जीते।
    • बुंदेलखंड की रक्षा (1729): राजा छत्रसाल को अफ़गानों से बचाकर झांसी व सागर प्राप्त किए।
    • दिल्ली पर धावा (1737): अचानक दिल्ली के द्वार पर पहुंचकर मुग़ल सम्राट में खलबली मचा दी।
उदाहरण 6
1761 ईस्वी के तीसरे पानीपत युद्ध में मराठों की पराजय के मुख्य कारणों का विश्लेषण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

14 जनवरी 1761 को अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध मराठों की भीषण पराजय के चार प्रमुख कारण थे:

  1. कूटनीतिक अलगाव: मराठों द्वारा अत्यधिक चौथ व सरदेशमुखी वसूलने से उत्तर भारत के सभी शासक उनसे क्षुब्ध थे। भाऊ के अक्खड़ व्यवहार से नाराज होकर जाट राजा सूरजमल सेना हटाकर चले गए; राजपूत तटस्थ रहे और सिखों ने कोई सहायता नहीं की। दूसरी ओर अब्दाली ने अवध के शुजा-उद-दौला और नजीब-उद-दौला को इस्लामी एकता के नाम पर साथ मिला लिया।
  2. भारी गैर-सैनिकों का बोझ: मराठा सेना (45,000) के साथ लगभग 1 लाख तीर्थयात्री, महिलाएं और सेवक थे, जो उत्तर के तीर्थों के दर्शन हेतु आए थे। इनके भोजन और सुरक्षा ने सेना की गतिशीलता को नष्ट कर दिया।
  3. रसद संकट व भुखमरी: अब्दाली ने मराठों की दिल्ली से रसद आपूर्ति पूरी तरह काट दी। पानीपत के शिविर में तीन माह तक सैनिक और घोड़े भूख से तड़प-तड़प कर मरे। 14 जनवरी को सैनिक विजय की आशा से नहीं, बल्कि भूख से मरने के बजाय रणभूमि में वीरगति पाने के लिए लड़े।
  4. हथियारों व रणनीति का अंतर: इब्राहिम गार्दी की भारी तोपें स्थिर थीं। दूसरी ओर अब्दाली के पास ऊंटों पर रखी हल्की, गतिशील व संहारक तोपें (ज़म्बूरक) थीं, जिन्होंने मराठा पंक्तियों को छिन्न-भिन्न कर दिया।
उदाहरण 7
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी मैसूर के टीपू सुल्तान को भारत में अपना सबसे खतरनाक शत्रु क्यों मानती थी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

अंग्रेज टीपू सुल्तान ('मैसूर का शेर') को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते थे क्योंकि वे आधुनिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से लैस थे:

  1. उन्नत सैन्य व रॉकेट तकनीक: टीपू ने लोहे के बेलनों में बारूद भरकर दुनिया के पहले सैन्य मैसूरी रॉकेट विकसित किए, जिनकी मारक क्षमता 2 किमी थी। पोल्लिलूर के युद्ध में इन रॉकेटों ने ब्रिटिश सेना में खलबली मचा दी थी। यूरोपीय शैली में प्रशिक्षित उनकी सेना व तोपखाना अत्यंत शक्तिशाली था।
  2. ब्रिटिश-विरोधी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन: टीपू समझ चुके थे कि अंग्रेजों को केवल वैश्विक गठबंधन से हराया जा सकता है। वे फ्रांसीसी जैकोबिन क्लब के सदस्य बने, 'नागरिक टीपू' कहलाए और स्वतंत्रता का वृक्ष लगाया। उन्होंने फ्रांस (नेपोलियन), तुर्की के उस्मानी सुल्तान और अफ़गानिस्तान के राजा के पास राजदूत भेजे।
  3. आर्थिक आत्मनिर्भरता: उन्होंने राजकीय व्यापार निगम बनाया, विदेशों में 30 व्यापारिक कोठियां खोलीं, मैसूर में रेशम उद्योग शुरू किया और जहाज, कागज व चीनी के आधुनिक कारखाने लगाकर मैसूर को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया।
  4. सहायक संधि का दृढ़ विरोध: उन्होंने लॉर्ड वेलेस्ली की सहायक संधि को सिरे से ठुकरा दिया और कहा: 'गीदड़ की तरह सौ साल जीने से शेर की तरह एक दिन जीना बेहतर है।' 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम में लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए।
उदाहरण 8
महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब की मिसलों को कैसे एकजुट किया और उनकी 'फ़ौज-ए-ख़ास' की क्या विशेषताएं थीं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

महाराजा रणजीत सिंह ('शेर-ए-पंजाब') ने बिखरी हुई मिसलों को जोड़कर एक दुर्जेय साम्राज्य की स्थापना की:

  1. राजनीतिक व भौगोलिक एकीकरण: शुकरचकिया मिसल के नेता के रूप में उन्होंने 1799 में भंगी मिसल से लाहौर (राजनीतिक राजधानी) और 1805 में अमृतसर (धार्मिक राजधानी) जीता। मुल्तान (1818), कश्मीर (1819) और पेशावर (1834) जीतकर सदियों पुराने अफ़गान आक्रमणों का मार्ग सदा के लिए बंद कर दिया।
  2. अमृतसर की संधि (1809): ब्रिटिश दूत चार्ल्स मेटकाफ़ के साथ संधि कर उन्होंने सतलुज नदी को सीमा मान लिया, जिससे अंग्रेजों से तत्काल टकराव टल गया और पश्चिम की ओर विस्तार की छूट मिल गई।
  3. यूरोपीय आधुनिक सेना: फ़ौज-ए-ख़ास (Fauj-i-Khas): उन्होंने नेपोलियन की सेना के अनुभवी फ्रांसीसी व इतालवी जनरलों को नियुक्त कर आधुनिक ब्रिगेड बनाई:
    • जीन-फ्रांस्वा एलार्ड (फ्रांसीसी): घुड़सवार सेना को आधुनिक लांस व ड्रिल सिखाई।
    • जीन-बैप्टिस्ट वेंचुरा (इतालवी): पैदल सेना को यूरोपीय बंदूक युद्ध में दक्ष किया।
    • क्लाउड कोर्ट व पाओलो एविटेबाइल: लाहौर में आधुनिक कारखाने लगाकर कांस्य व पीतल की बेहतरीन तोपें ढालीं।
  4. धर्मनिरपेक्ष व समतावादी प्रशासन: उनके दरबार में सभी धर्मों को सम्मान था। प्रधानमंत्री ध्यान सिंह (डोगरा राजपूत), विदेश मंत्री फकीर अज़ीज़ुद्दीन (मुस्लिम) और सेनापति हरि सिंह नलवा व दीवान मोहकम चंद थे। उन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर सोने की चादर चढ़वाई और मंदिरों व मस्जिदों को समान दान दिया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

1739 के करनाल युद्ध और 1761 के तीसरे पानीपत युद्ध में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

1739 का आक्रमण फारस के नादिर शाह ने किया था, जिसने मुहम्मद शाह को करनाल में हराकर मयूर सिंहासन व कोहिनूर हीरा लूटा। 1761 का तीसरा पानीपत युद्ध अफ़गानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली और मराठों के बीच हुआ था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि उत्तराधिकारी राज्यों ने दिल्ली से सभी संबंध तोड़कर पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उत्तराधिकारी राज्य (बंगाल, अवध, हैदराबाद) वास्तविक रूप से स्वतंत्र थे, किंतु वैधानिक रूप से उन्होंने कभी मुग़ल सम्राट से संबंध नहीं तोड़े। वे सम्राट के नाम से सिक्के चलाते थे और जुमे की नमाज़ में सम्राट के नाम का खुतबा पढ़वाते थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

चौथ और सरदेशमुखी के अंतर को गलत समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चौथ पड़ोसी गैर-मराठा क्षेत्रों के राजस्व का 1/4 भाग (25%) था, जो मराठा हमलों से सुरक्षा के बदले लिया जाता था। सरदेशमुखी अतिरिक्त 1/10 भाग (10%) था, जिसे मराठा राजा महाराष्ट्र के वंशानुगत प्रधान (सरदेशमुख) होने के नाते मांगते थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि बाजीराव प्रथम ने तीसरे पानीपत युद्ध का नेतृत्व किया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

बाजीराव प्रथम की मृत्यु 1740 में ही हो गई थी। 1761 का पानीपत युद्ध उनके पुत्र बालाजी बाजीराव (नाना साहेब) के काल में हुआ और सेना का नेतृत्व सदाशिवराव भाऊ ने किया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

हैदर अली व टीपू सुल्तान को मैसूर का वंशानुगत नवाब समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

हैदर अली एक साधारण सैनिक से अपनी योग्यता के बल पर डिंडीगुल के फौजदार बने और 1761 में भ्रष्ट मंत्री नंजराज को हटाकर सत्ता पर कब्जा किया। प्राचीन हिंदू वोडेयार राजवंश तब नाममात्र का कठपुतली बना रहा।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

1809 की अमृतसर संधि को 1846 की अमृतसर संधि से मिला देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

1809 की अमृतसर संधि महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों (चार्ल्स मेटकाफ़) के बीच हुई थी, जिसमें सतलुज नदी को सीमा माना गया। कश्मीर बेचने की संधि 1846 में प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के बाद हुई थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि कलकत्ता की 'मराठा खाई' मराठों ने आक्रमण के लिए खोदी थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मराठा खाई (Maratha Ditch) कोई आक्रामक खाई नहीं थी; 1742 में मराठा बरगियों के छापों से फोर्ट विलियम और कलकत्ता को बचाने हेतु ब्रिटिश कंपनी और नागरिकों ने यह 3 मील लंबी सुरक्षात्मक खाई खोदी थी।

क्षेत्रीय शक्तियों का उदय: संरचनात्मक कॉन्सेप्ट मैप (WBBSE कक्षा 8 इतिहास अध्याय 2)

पश्चिम बंगाल बोर्ड कक्षा 8 इतिहास • अध्याय 2 कॉन्सेप्ट मैप क्षेत्रीय शक्तियों का उदय (मुग़ल साम्राज्य का पतन व उत्तराधिकारी राज्य) अतीत और विरासत अध्याय 2 स्तंभ 1 मुग़ल साम्राज्य का पतन संकट व आक्रमण (1707-61) आंतरिक ढांचागत संकट • औरंगज़ेब की मृत्यु (1707) • जागीरदारी व मनसबदारी संकट • कृषक व धार्मिक विद्रोह (जाट, सिख) नादिर शाह का हमला (1739) • करनाल का युद्ध (1739) • दिल्ली का कत्लेआम व लूटपाट • कोहिनूर व मयूर सिंहासन लूटा अहमद शाह अब्दाली के धावे • बार-बार अफ़गान हमले • केंद्रीय मुग़ल सत्ता का ह्रास • क्षेत्रीय शक्तियों के उदय का मार्ग मुख्य ऐतिहासिक प्रभाव मुग़ल सत्ता के क्षरण से प्रांतीय सूबेदारों व सरदारों ने स्वतंत्र उत्तराधिकारी राज्यों की स्थापना की। स्तंभ 2 उत्तराधिकारी राज्य बंगाल, अवध व हैदराबाद बंगाल: मुर्शिद कुली खाँ • 1717 में सूबेदार व दीवान • राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद • माल-ज़ामिनी राजस्व व्यवस्था अलीवर्दी व बरगी धावे • अलीवर्दी खाँ (1740-1756) • मराठा बरगी हमले (1742-51) • 1751 संधि: चौथ व ओडिशा दिया अवध व हैदराबाद • सआदत खाँ (1722, अवध) • निज़ाम आसफ़ जाह (1724) • शकरखेड़ा युद्ध व स्वायत्तता राजनीतिक वास्तविकता मुग़ल बादशाह के प्रति औपचारिक निष्ठा रखते हुए भी आंतरिक शासन, सेना व कर संग्रह में पूर्ण स्वायत्तता का उपभोग किया। स्तंभ 3 मराठा परिसंघ पेशवा व पानीपत (1761) पेशवाओं का उत्कर्ष • बालाजी विश्वनाथ (1713) • बाजीराव 1: हिंदू पद पादशाही • बालाजी बाजीराव व सांगोला संधि मराठा परिसंघ (कॉन्फेडरेसी) • सिंधिया (ग्वालियर), होल्कर (इंदौर) • गायकवाड़ (बड़ौदा), भोंसले (नागपुर) • 1758 में अटक पर भगवा ध्वज तीसरा पानीपत युद्ध (1761) • 14 जनवरी 1761: अब्दाली-भाऊ • कूटनीतिक अलगाव व रसद संकट • "दो मोती विलीन हुए" भारी क्षति निर्णायक ऐतिहासिक मोड़ अखिल भारतीय मराठा साम्राज्य का सपना टूटा, जिससे भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सर्वोच्चता का मार्ग प्रशस्त हुआ। स्तंभ 4 मैसूर और पंजाब प्रतिरोध व आधुनिकीकरण मैसूर: हैदर अली व टीपू • डिंडीगुल में आधुनिक शस्त्रागार • टीपू के लोहे के रॉकेट व फ्रांसीसी मेल • 4 आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-99) पंजाब: रणजीत सिंह • 12 सिख मिसलें (शुकरचकिया) • 1799 में लाहौर पर विजय • फ़ौज-ए-ख़ास व यूरोपीय सेनापति कूटनीति व संघर्ष • 1799: श्रीरंगपट्टनम में टीपू का बलिदान • 1809: अमृतसर की संधि (मेटकाफ़) • सतलुज नदी को सीमा माना गया वीरतापूर्ण प्रतिरोध यूरोपीय आधुनिक सैन्य तकनीक से ब्रिटिश विस्तार को कड़ी चुनौती दी, पर कूटनीतिक अलगाव व आपसी फूट से पतन हुआ।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. मुग़ल साम्राज्य का पतन व दरबारी गुटबाजी: 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद दक्खन के लंबे युद्ध, गंभीर जागीरदारी व मनसबदारी संकट (पाइबाकी भूमि का अभाव), कृषक विद्रोह (जाट, सतनामी, सिख) और तूरानी, ईरानी व सैयद बंधुओं के षड्यंत्रों से केंद्रीय मुग़ल सत्ता पूरी तरह बिखर गई।
मुख्य बिंदु 2
  1. विनाशकारी विदेशी आक्रमण: 1739 में फारस के नादिर शाह के आक्रमण (करनाल का युद्ध, दिल्ली का कत्लेआम, मयूर सिंहासन व कोहिनूर हीरे की लूट) और बाद में अहमद शाह अब्दाली के छापों ने मुग़ल सम्राट की बची-खुची प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला दिया।
मुख्य बिंदु 3
  1. स्वायत्त बंगाल सूबा: मुर्शिद कुली खाँ ने राजधानी मुर्शिदाबाद स्थानांतरित की (1704), कठोर माल-ज़ामिनी भू-राजस्व व्यवस्था लागू की और जगत सेठ घराने से मूक वित्तीय साझेदारी की। बाद में नवाब अलीवर्दी खाँ (1740-1756) ने 10 वर्षों के बरगी छापों को झेलकर 1751 में कटक व 12 लाख रुपये चौथ देकर संधि की और यूरोपीय कंपनियों को मधुमक्खियों की तरह नियंत्रण में रखा।
मुख्य बिंदु 4
  1. हैदराबाद व अवध का अभ्युदय: 1724 में शकरखेड़ा के युद्ध में मुबारिज़ खाँ को हराकर निज़ाम-उल-मुलक आसफ़ जाह प्रथम ने हैदराबाद में आसफ़ जाही वंश की स्थापना की; 1722 में सआदत खाँ बुरहान-उल-मुलक ने अवध में स्वायत्तता कायम की, जो सफ़दरजंग और शुजा-उद-दौला के अधीन विकसित होकर 1765 की इलाहाबाद संधि से ब्रिटिश बफर स्टेट बन गया।
मुख्य बिंदु 5
  1. मराठा पेशवाओं का प्रभुत्व: बालाजी विश्वनाथ (1719 दिल्ली संधि), बाजीराव प्रथम की 'हिंदू पद पादशाही' नीति व द्रुतगामी घुड़सवार युद्ध (पालखेड़, मालवा, गुजरात) और बालाजी बाजीराव के काल में 1750 के सांगोला समझौते से पुणे मराठा साम्राज्य का सर्वोच्च केंद्र बना और अटक दुर्ग तक सीमाएं फैलीं।
मुख्य बिंदु 6
  1. तीसरे पानीपत युद्ध की त्रासदी (1761): 14 जनवरी 1761 को पानीपत के मैदान में कूटनीतिक अलगाव, भुखमरी और अब्दाली की गतिशील ज़म्बूरक तोपों के आगे मराठा सेना ध्वस्त हो गई, जिससे भाऊ व विश्वासराव मारे गए और अखिल भारतीय हिंदू साम्राज्य का सपना टूटकर अंग्रेजों की विजय का मार्ग प्रशस्त हुआ।
मुख्य बिंदु 7
  1. मैसूर का आधुनिकीकरण व प्रतिरोध: हैदर अली और टीपू सुल्तान ने आधुनिक यूरोपीय सैन्य विज्ञान, लोहे के घातक रॉकेटों, जैकोबिन क्लब व फ्रांसीसी मित्रता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी, जो चार युद्धों के बाद 1799 में श्रीरंगपट्टनम में टीपू की शहादत के साथ समाप्त हुआ।
मुख्य बिंदु 8
  1. महाराजा रणजीत सिंह का पंजाब: रणजीत सिंह ने 12 सिख मिसलों को एकजुट कर लाहौर और अमृतसर जीता, 1809 में अमृतसर की संधि से सतलुज को सीमा माना और नेपोलियन के जनरलों की सहायता से 'फ़ौज-ए-ख़ास' बनाकर एक धर्मनिरपेक्ष व शक्तिशाली संप्रभु साम्राज्य की नींव रखी।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1739 ईस्वी में नादिर शाह के भारत आक्रमण के प्रमुख कारण व परिणाम संक्षेप में बताइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मुग़ल साम्राज्य की कमजोरी और दिल्ली की अपार दौलत के लालच में फारस के नादिर शाह ने आक्रमण किया। करनाल के युद्ध में मुग़ल सेना को हराकर उसने दिल्ली में 30,000 नागरिकों का कत्लेआम (क़त्ल-ए-आम) कराया और मयूर सिंहासन व कोहिनूर हीरे सहित 70 करोड़ रुपये की संपत्ति लूट ली, जिससे मुग़ल सत्ता पंगु हो गई।
करनाल का युद्ध, चांदनी चौक का कत्लेआम और लूटे गए दो विश्वप्रसिद्ध शाही प्रतीकों को याद करें।
2
मुर्शिद कुली खाँ की 'माल-ज़ामिनी व्यवस्था' और जगत सेठों की भूमिका क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: माल-ज़ामिनी व्यवस्था में इज़ारेदारों से नियमित निश्चित लगान जमा करने की लिखित ज़मानत (ज़ामिन) ली जाती थी। जगत सेठ घराना सरकारी टकसाल चलाता था, जमींदारों को लगान हेतु कर्ज देता था और हुंडी द्वारा दिल्ली को बंगाल का नजराना भेजकर नवाब की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करता था।
लिखित ज़मानत, इज़ारेदारों की सख्ती और मारवाड़ी बैंकरों की हुंडी व्यवस्था पर ध्यान दें।
3
1724 के शकरखेड़ा के युद्ध ने किस प्रकार हैदराबाद राज्य की नींव रखी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: दिल्ली दरबार के षड्यंत्रों से तंग आकर निज़ाम-उल-मुलक दक्खन चले आए। सम्राट द्वारा उन्हें कुचलने भेजे गए सूबेदार मुबारिज़ खाँ को निज़ाम ने 1724 में शकरखेड़ा में हराकर मार डाला। विवश होकर सम्राट ने उन्हें 'आसफ़ जाह' की उपाधि दी और दक्खन का वायसराय माना, जिससे हैदराबाद राज्य की स्थापना हुई।
निज़ाम का दिल्ली छोड़ना, मुबारिज़ खाँ की पराजय और आसफ़ जाह की पदवी को याद रखें।
4
तीसरे पानीपत युद्ध (1761) के बारे में क्यों कहा गया कि इसने तय किया 'भारत पर कौन राज नहीं करेगा'?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: इस युद्ध में पराजय से मराठों का संपूर्ण भारत पर हिंदू साम्राज्य स्थापित करने का सपना टूट गया, जबकि विजेता अब्दाली भी सेना के विद्रोह से काबुल लौट गया। इस आपसी विनाश से बनी राजनीतिक शून्यता का लाभ उठाकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत पर अपना औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित किया।
मराठा प्रभुत्व का अंत, अब्दाली का लौटना और अंग्रेजों को मिला खुला मैदान।
5
ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष में टीपू सुल्तान ने क्या सैन्य व आर्थिक सुधार किए?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: टीपू सुल्तान ने लोहे के आवरण वाले घातक मैसूरी रॉकेट व आधुनिक तोपखाने बनाए; क्रांतिकारी फ्रांस से संबंध जोड़कर जैकोबिन क्लब की सदस्यता ली; विदेशों में 30 व्यापारिक कोठियां व रेशम उद्योग स्थापित किया और वेलेस्ली की सहायक संधि ठुकराकर युद्धभूमि में वीरगति पाई।
मैसूरी रॉकेट, जैकोबिन क्लब, रेशम उद्योग और सहायक संधि का विरोध।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

कक्षा 8 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: Concept of History अध्याय 2: Rise of Regional Powers अध्याय 3: Establishment of Colonial Authority अध्याय 4: औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप अध्याय 5: औपनिवेशिक शासन के प्रति प्रतिक्रिया: सहयोग और विद्रोह अध्याय 6: राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास अध्याय 7: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श और विकास अध्याय 8: सांप्रदायिकता से विभाजन अध्याय 9: भारतीय संविधान: लोकतांत्रिक ढांचा और नागरिकों के अधिकार अध्याय 10: पृथ्वी की आंतरिक संरचना अध्याय 11: अस्थिर पृथ्वी अध्याय 12: शैल (चट्टानें) अध्याय 13: वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार अध्याय 14: बादल और वर्षा अध्याय 15: जलवायु प्रदेश अध्याय 16: मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन अध्याय 17: भारत के कुछ पड़ोसी देश और उनके साथ संबंध अध्याय 18: उत्तर अमेरिका महाद्वीप अध्याय 19: दक्षिण अमेरिका महाद्वीप अध्याय 20: ओशिनिया महाद्वीप

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

Rise of Regional Powers में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।