Follow Us
माध्यम चुनें / Select Medium:
Eng (English) Beng (বাংলা) Hindi (हिन्दी)
WBB • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 16
अनुमानित समय: 50 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 भूगोल एवं पर्यावरण पाठ्यक्रम "हमारी पृथ्वी" (Our Earth) के सातवें अध्याय "मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन" (Human Activities and Environmental Degradation) की संपूर्ण एवं प्रामाणिक अध्ययन सामग्री। हमारी पृथ्वी चार प्रमुख अंतर्संबंधित मंडलों से मिलकर बनी है: स्थलमंडल (Lithosphere), जलमंडल (Hydrosphere), वायुमंडल (Atmosphere) एवं जैवमंडल (Biosphere)। सुदूर अतीत में प्रारंभिक मानव समाज प्रकृति के साथ पूर्ण संतुलन बनाकर रहता था। किंतु 18वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति, तीव्र जनसंख्या विस्फोट, अनियोजित नगरीकरण और जीवाश्म ईंधनों के अंधाधुंध दोहन ने इस नाजुक प्राकृतिक संतुलन को छिन्न-भिन्न कर दिया है। पर्यावरणीय अवनयन (Environmental Degradation) पर्यावरण के घटकों की गुणवत्ता और मात्रा में होने वाली वह समग्र गिरावट है जिससे पारिस्थितिकी तंत्र की प्राकृतिक उत्पादन क्षमता, स्व-नियंत्रण और वहन क्षमता निरंतर घटती जाती है। अम्ल वर्षा और मार्बल कैंसर, जलाशयों का यूट्रोफिकेशन व उच्च बीओडी (BOD), पश्चिम बंगाल का गंभीर भूजल आर्सेनिक संकट व ब्लैकफुट रोग, मृदा मरुस्थलीकरण, ग्लोबल वार्मिंग, हिमनदों का पिघलना, ओजोन परत का क्षरण तथा सुंदरबन का मैंग्रोव संकट—इस अध्याय में विस्तार से प्रस्तुत हैं। यह अध्याय 5 उच्च-स्तरीय मॉड्यूल, 25 क्लासरूम उपखंड, उत्तरदायी वेक्टर एसवीजी (SVG) संकल्पना मानचित्र, 8 वैज्ञानिक/पर्यावरण सूत्र, 8 हल किए गए मानक प्रश्न, 7 परीक्षक जाल व भ्रांतियां, 8 मुख्य सारांश बिंदु, 8 निष्कर्ष, 5 स्व-मूल्यांकन प्रश्न और 5 सीबीटी डायग्नोस्टिक बहुविकल्पीय प्रश्नों से सुसज्जित है।

🌍 मानव सभ्यता और प्रकृति का द्वंद्व: हमारी वसुंधरा को बचाने की पुकार!

क्या आप जानते हैं कि 1950 के बाद से दुनिया में जितना भी प्लास्टिक बना है, उसका एक भी टुकड़ा आज तक पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ—बल्कि वह करोड़ों सूक्ष्म कणों (माइक्रोप्लास्टिक्स) में टूटकर समुद्र के जीवों और हमारे भोजन तक में पहुंच चुका है?

या क्या आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल के कई जिलों में लाखों लोग हाथ-पैरों में काले धब्बों और घावों वाले एक भयानक "ब्लैकफुट रोग" के शिकार सिर्फ इसलिए हो गए क्योंकि गर्मियों के बोरो धान के लिए नलकूपों से अंधाधुंध भूजल निकाला गया?

धुआं उगलती चिमनियों और अम्ल वर्षा से लेकर हिमालयी हिमनदों के पिघलने, सुंदरबन के कटाव और चिपको आंदोलन के पेड़ से लिपट जाने वाले अभूतपूर्व साहस तक आइए शुरू करते हैं एक अत्यंत ज्ञानवर्धक भौगोलिक सफर—मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन में!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 भूगोल एवं पर्यावरण पाठ्यक्रम "हमारी पृथ्वी" (Our Earth) के सातवें अध्याय "मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन" (Human Activities and Environmental Degradation) की संपूर्ण एवं प्रामाणिक अध्ययन सामग्री। हमारी पृथ्वी चार प्रमुख अंतर्संबंधित मंडलों से मिलकर बनी है: स्थलमंडल (Lithosphere), जलमंडल (Hydrosphere), वायुमंडल (Atmosphere) एवं जैवमंडल (Biosphere)। सुदूर अतीत में प्रारंभिक मानव समाज प्रकृति के साथ पूर्ण संतुलन बनाकर रहता था। किंतु 18वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति, तीव्र जनसंख्या विस्फोट, अनियोजित नगरीकरण और जीवाश्म ईंधनों के अंधाधुंध दोहन ने इस नाजुक प्राकृतिक संतुलन को छिन्न-भिन्न कर दिया है। पर्यावरणीय अवनयन (Environmental Degradation) पर्यावरण के घटकों की गुणवत्ता और मात्रा में होने वाली वह समग्र गिरावट है जिससे पारिस्थितिकी तंत्र की प्राकृतिक उत्पादन क्षमता, स्व-नियंत्रण और वहन क्षमता निरंतर घटती जाती है। अम्ल वर्षा और मार्बल कैंसर, जलाशयों का यूट्रोफिकेशन व उच्च बीओडी (BOD), पश्चिम बंगाल का गंभीर भूजल आर्सेनिक संकट व ब्लैकफुट रोग, मृदा मरुस्थलीकरण, ग्लोबल वार्मिंग, हिमनदों का पिघलना, ओजोन परत का क्षरण तथा सुंदरबन का मैंग्रोव संकट—इस अध्याय में विस्तार से प्रस्तुत हैं। यह अध्याय 5 उच्च-स्तरीय मॉड्यूल, 25 क्लासरूम उपखंड, उत्तरदायी वेक्टर एसवीजी (SVG) संकल्पना मानचित्र, 8 वैज्ञानिक/पर्यावरण सूत्र, 8 हल किए गए मानक प्रश्न, 7 परीक्षक जाल व भ्रांतियां, 8 मुख्य सारांश बिंदु, 8 निष्कर्ष, 5 स्व-मूल्यांकन प्रश्न और 5 सीबीटी डायग्नोस्टिक बहुविकल्पीय प्रश्नों से सुसज्जित है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पृथ्वी के चार प्रमुख मंडल: स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल और जैवमंडल की बुनियादी समझ।
  • पारिस्थितिकी तंत्र, खाद्य श्रृंखला और प्राकृतिक संतुलन के बुनियादी नियम।
  • सामान्य प्रदूषक: धुआं, कार्बन डाइऑक्साइड, प्लास्टिक कचरा और रासायनिक कीटनाशक।
  • ग्लोबल वार्मिंग, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की सामान्य जानकारी।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • पर्यावरण प्रदूषण (Pollution) और पर्यावरणीय अवनयन (Degradation) के बीच स्पष्ट अंतर स्पष्ट कर सकेंगे।
  • मानव-प्रकृति संबंधों के ऐतिहासिक विकास (आखेटक-संग्राहक से कृषि क्रांति और औद्योगिक युग) का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • वायु प्रदूषण, अम्ल वर्षा (मार्बल कैंसर), जलाशयों के यूट्रोफिकेशन और बीओडी (BOD) के वैज्ञानिक कारणों की व्याख्या कर सकेंगे।
  • पश्चिम बंगाल के भूजल आर्सेनिक संकट के कारणों, भू-रासायनिक प्रक्रियाओं और ब्लैकफुट रोग जैसे स्वास्थ्य प्रभावों की समीक्षा कर सकेंगे।
  • ग्रीनहाउस प्रभाव, ग्लोबल वार्मिंग, हिमनदों के पिघलने, समुद्र स्तर वृद्धि और ओजोन क्षरण के कारणों का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • गंगा और दामोदर नदी प्रदूषण, सुंदरबन के मैंग्रोव संकट और रानीगंज कोयला खदानों के धंसने के स्थानीय केस स्टडी समझ सकेंगे।
  • ब्रंटलैंड आयोग के अनुसार सतत विकास (Sustainable Development) और संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की व्याख्या कर सकेंगे।
  • कचरा प्रबंधन के 4R सिद्धांतों (Refuse, Reduce, Reuse, Recycle) और चिपको, नर्मदा बचाओ व साइलेंट वैली आंदोलनों की भूमिका को रेखांकित कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. पर्यावरण के घटक, पारिस्थितिकी सं...
2 2. प्रमुख प्रदूषण एवं पारिस्थितिकी...
3 3. वैश्विक पर्यावरणीय संकट एवं जलवा...
4 4. भारत एवं पश्चिम बंगाल में पर्याव...
5 5. पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास एवं...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. पर्यावरण के घटक, पारिस्थितिकी संतुलन एवं अवनयन के प्रेरक कारक

1.1 पर्यावरण की संकल्पना एवं प्रमुख भू-मंडलीय परिमंडल

वे सभी बाह्य भौतिक, रासायनिक, जैविक और सामाजिक परिस्थितियां जो किसी जीव को चारों ओर से घेरे रहती हैं और उसके जीवन व विकास को प्रभावित करती हैं, उन्हें सम्मिलित रूप से पर्यावरण (Environment) कहा जाता है। पृथ्वी का पर्यावरण चार प्रमुख मंडलों की अंतर्क्रिया पर आधारित है:

  • स्थलमंडल (Lithosphere): पृथ्वी की सबसे बाहरी ठोस चट्टानी परत व मृदा, जो कृषि, वनस्पति, आवास और खनिजों का आधार है।
  • जलमंडल (Hydrosphere): महासागर, समुद्र, नदियां, झीलें, हिमनद और भूमिगत जल का समग्र जल क्षेत्र (पृथ्वी का लगभग 71% भाग)।
  • वायुमंडल (Atmosphere): पृथ्वी को घेरे हुए अदृश्य गैसीय आवरण, जो हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोकता है और मौसम व जलवायु को संचालित करता है।
  • जैवमंडल (Biosphere): स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल का वह संकरा मिलन क्षेत्र जहाँ जीवन संभव है और जहाँ समस्त वनस्पति, प्राणी व सूक्ष्मजीव निवास करते हैं।

1.2 पर्यावरण प्रदूषण बनाम पर्यावरणीय अवनयन

विद्यार्थी प्रायः "प्रदूषण" और "अवनयन" को एक ही मान लेते हैं, किंतु इनमें स्पष्ट भौगोलिक व वैज्ञानिक अंतर है:

तुलना का आधार पर्यावरण प्रदूषण (Environmental Pollution) पर्यावरणीय अवनयन (Environmental Degradation)
परिभाषा वायु, जल या मृदा में अवांछित हानिकारक पदार्थों का मिलना, जिससे उनकी स्वाभाविक गुणवत्ता और भौतिक-रासायनिक गुण दूषित हो जाते हैं। पर्यावरण के घटकों की गुणवत्ता और मात्रा में होने वाला वह समग्र ह्रास, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र की प्राकृतिक उत्पादकता, स्व-पुनर्प्राप्ति और वहन क्षमता घट जाती है।
विस्तार एवं दायरा अपेक्षाकृत संकीर्ण प्रक्रिया। विशिष्ट प्रदूषक तत्वों (धुआं, सीवेज, प्लास्टिक, रसायन) के उत्सर्जन से होता है। व्यापक और समग्र संकल्पना। प्रदूषण के साथ-साथ वनों की कटाई, मिट्टी के कटाव, अत्यधिक भूजल दोहन और जैव विविधता के विनाश से होता है।
पारस्परिक संबंध प्रत्येक प्रकार का प्रदूषण अंततः पर्यावरणीय अवनयन को जन्म देता है। बिना किसी रासायनिक प्रदूषण के भी केवल वनों को काटकर या अधिक चराई कराकर अवनयन हो सकता है।
पुनर्प्राप्ति प्रदूषण का स्रोत बंद करने या शुद्धिकरण से पर्यावरण जल्दी सामान्य हो सकता है। अवनयन दीर्घकालिक और अक्सर अपरिवर्तनीय होता है (जैसे मिट्टी की ऊपरी परत का विनाश या किसी प्रजाति का विलुप्त होना)।

1.3 मानव-प्रकृति संबंध का ऐतिहासिक विकास

सभ्यता के विकास क्रम में मानव और प्रकृति के संबंधों के तीन प्रमुख ऐतिहासिक चरण रहे हैं:

  1. आखेटक एवं खाद्य-संग्राहक युग: आदिमानव पूरी तरह प्रकृति का एक अभिन्न अंग था। उसकी ऊर्जा आवश्यकताएं केवल भोजन तक सीमित थीं और वह प्राकृतिक संतुलन में हस्तक्षेप नहीं करता था।
  2. कृषि क्रांति (~10,000 वर्ष पूर्व): मानव ने पौधों को उगाना और पशुओं को पालना शुरू किया। खेतों के लिए वनों की कटाई और सिंचाई के लिए नदियों को मोड़ने से प्रकृति पर मनुष्य का पहला सीधा प्रभाव पड़ा।
  3. औद्योगिक क्रांति एवं आधुनिक प्रौद्योगिकी युग: 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भाप के इंजन के आविष्कार के बाद कोयला और पेट्रोलियम का व्यापक दोहन शुरू हुआ। विशाल कारखानों, रासायनिक खादों, कीटनाशकों, तीव्र नगरीकरण और जीवाश्म ईंधन के जलने से मनुष्य प्रकृति का शोषणकर्ता बन गया, जो वर्तमान वैश्विक पर्यावरणीय संकट का मूल कारण है।

1.4 पर्यावरणीय अवनयन के प्रमुख प्रेरक कारक एवं IPAT सूत्र

पर्यावरणीय अवनयन के पीछे मुख्यतः पांच मानव-निर्मित कारक सक्रिय हैं:

  • जनसंख्या विस्फोट (Population Explosion): वर्ष 1800 में विश्व की जनसंख्या मात्र 100 करोड़ थी, जो 1950 में 250 करोड़ और 2022 में 800 करोड़ पार कर गई। इस विशाल आबादी के भोजन, आवास और जल की मांग ने जंगलों और नदियों पर भारी दबाव डाला है।
  • अनियोजित नगरीकरण (Unplanned Urbanization): खेतों और प्राकृतिक आर्द्रभूमियों (Wetlands) को पाटकर कंक्रीट के शहर बसाने से जल निकासी अवरुद्ध हुई है और "शहरी ताप द्वीप" (Urban Heat Islands) बने हैं।
  • औद्योगिक अपशिष्ट एवं जीवाश्म ईंधन: कारखानों का जहरीला रासायनिक पानी नदियों में और विषैली गैसें वायुमंडल में छोड़ी जा रही हैं।
  • आधुनिक कृषि में रसायनों का अति-उपयोग: यूरिया जैसे रासायनिक खादों और कीटनाशकों से मिट्टी के सूक्ष्मजीव नष्ट हो रहे हैं और भूजल दूषित हो रहा है।
  • IPAT समीकरण: वैज्ञानिक पॉल एहरलिच ने पर्यावरण पर मानव प्रभाव को मापने का सूत्र दिया: $$\text{पर्यावरणीय प्रभाव } (I) = \text{जनसंख्या } (P) \times \text{प्रति व्यक्ति उपभोग } (A) \times \text{प्रौद्योगिकी पदचिह्न } (T)$$

1.5 प्राकृतिक बनाम मानव-जनित अवनयन

प्राकृतिक कारक (Natural Causes)

पृथ्वी की आंतरिक हलचलों या चरम मौसमी घटनाओं से होने वाला अवनयन:

  • ज्वालामुखी विस्फोट (लाखों टन राख और सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन)।
  • भूकंप और पर्वतीय क्षेत्रों में भीषण भूस्खलन।
  • सुनामी, समुद्री तूफान और प्राकृतिक वनाग्नि।
  • विशेषता: यह अस्थायी होता है और प्रकृति समय के साथ स्वयं संतुलन स्थापित कर लेती है।
मानव-जनित कारक (Anthropogenic Causes)

मनुष्य की स्वार्थी और अनियंत्रित गतिविधियों से उत्पन्न अवनयन:

  • ओपन-कास्ट खनन (Open-cast mining) द्वारा वनों और पहाड़ों का विनाश।
  • बिजली घरों और गाड़ियों से ग्रीनहाउस गैसों का भारी उत्सर्जन।
  • अमेजन वर्षावनों को काटकर खेतों में बदलना।
  • विशेषता: यह निरंतर, संचयी और प्रकृति की सहनशीलता सीमा से परे होता है।

2. प्रमुख प्रदूषण एवं पारिस्थितिकी तंत्र का संकट (वायु, जल, मृदा, ध्वनि व ठोस अपशिष्ट)

2.1 वायु प्रदूषण एवं अम्ल वर्षा (Acid Rain) की रासायनिक प्रक्रिया

हवा में हानिकारक गैसों, धूलकणों और धुएं का ऐसा जमाव जो जीवों और भवनों को हानि पहुँचाए, वायु प्रदूषण कहलाता है:

  • प्राथमिक प्रदूषक: जो सीधे स्रोतों से हवा में मिलते हैं—कार्बन मोनोक्साइड ($CO$), सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$), नाइट्रोजन के ऑक्साइड ($NO_x$) और धूलकण ($PM_{2.5}$ व $PM_{10}$)।
  • द्वितीयक प्रदूषक: जो प्राथमिक प्रदूषकों की रासायनिक क्रिया से बनते हैं—जैसे प्रकाश-रासायनिक स्मॉग (Photochemical Smog) और धरातलीय ओजोन।
  • अम्ल वर्षा (Acid Rain): ताप बिजली घरों से निकलने वाली $SO_2$ और गाड़ियों के धुएं की $NO_2$ वायुमंडलीय नमी व ऑक्सीजन से क्रिया करके क्रमशः सल्फ्यूरिक अम्ल ($H_2SO_4$) और नाइट्रिक अम्ल ($HNO_3$) बनाती हैं: $$2SO_2 + O_2 + 2H_2O \rightarrow 2H_2SO_4$$ $$4NO_2 + O_2 + 2H_2O \rightarrow 4HNO_3$$ जिस वर्षा जल का $pH < 5.6$ होता है, उसे अम्ल वर्षा कहते हैं। इसके कारण वनों के वृक्ष सूख जाते हैं, झीलों की मछलियां मर जाती हैं और संगमरमर के ऐतिहासिक स्मारक गलने लगते हैं, जिसे मार्बल कैंसर या स्टोन लेप्रोसी (Marble Cancer / Stone Leprosy) कहते हैं: $$CaCO_3 \text{ (संगमरमर)} + H_2SO_4 \rightarrow CaSO_4 \text{ (जिप्सम)} + H_2O + CO_2$$ (जैसे मथुरा रिफाइनरी के धुएं के कारण आगरा के ताजमहल के सफेद संगमरमर का पीला व खुरदरा होना)।

2.2 जल प्रदूषण, यूट्रोफिकेशन (Eutrophication) एवं बीओडी (BOD)

घरेलू गंदा पानी, औद्योगिक अपशिष्ट और खेतों से बहकर आने वाले रासायनिक उर्वरक (नाइट्रेट व फॉस्फेट) जब जलस्रोतों में मिलते हैं, तो भारी जल प्रदूषण होता है:

यूट्रोफिकेशन की चरणबद्ध प्रक्रिया:
  1. पोषक तत्वों की अधिकता: खेतों का अतिरिक्त खाद बहकर तालाब या झील में नाइट्रोजन और फास्फोरस की सांद्रता बढ़ा देता है।
  2. शैवाल प्रस्फुटन (Algal Bloom): पोषक तत्व पाकर जल की सतह पर हरी-नीली काई और जलकुंभी का अनियंत्रित विस्फोट होता है, जिससे पानी पर मोटी हरी चादर बिछ जाती है।
  3. सूर्य के प्रकाश में रुकावट: हरी चादर के कारण सूर्य का प्रकाश गहराई तक नहीं पहुँच पाता, जिससे जलमग्न पौधे प्रकाश संश्लेषण न कर पाने से मर जाते हैं।
  4. जीवाणुओं का विस्फोट व ऑक्सीजन का ह्रास: मृत शैवालों को सड़ाने के लिए एरोबिक बैक्टीरिया की संख्या तेजी से बढ़ती है। ये सड़ांध की प्रक्रिया में जल में घुली ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen - DO) को तेजी से सोख लेते हैं।
  5. बीओडी में वृद्धि व मछलियों की मृत्यु: जल की बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) बहुत बढ़ जाती है और घुली ऑक्सीजन शून्य होने से मछलियां और जलीय जीव तड़प-तड़प कर मर जाते हैं। यह तालाब एक बदबूदार मृत क्षेत्र (Dead Zone) बन जाता है।

2.3 मृदा क्षरण, लवणीकरण एवं मरुस्थलीकरण (Desertification)

उपजाऊ मिट्टी की केवल 1 सेमी परत बनने में प्रकृति को 200 से 400 वर्ष लगते हैं। किंतु मानवीय भूलों से इसका तेजी से विनाश हो रहा है:

  • मृदा अपरदन (Soil Erosion): पेड़ कटने से बारिश का पानी और तेज हवाएं मिट्टी की उपजाऊ ऊपरी परत को बहा ले जाती हैं।
  • मृदा लवणीकरण (Salinization): शुष्क भागों में अत्यधिक नहरी सिंचाई से केशिकीय क्रिया (Capillary action) द्वारा भूजल का लवण ऊपर आकर जमा हो जाता है और जमीन पर सफेद लवण की परत जम जाती है (जैसे पंजाब व हरियाणा में रेह या कल्लार)।
  • मरुस्थलीकरण (Desertification): अत्यधिक वनों की कटाई, अनियंत्रित चराई और जलवायु परिवर्तन के कारण उपजाऊ भूमि का धीरे-धीरे बंजर रेतीले मरुस्थल में बदलना।

2.4 ध्वनि प्रदूषण एवं विकिरण संकट

  • ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution): ध्वनि की तीव्रता डेसीबल (dB) में मापी जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार आवासीय क्षेत्रों में दिन में 55 dB और रात में 45 dB सुरक्षित सीमा है। 65 dB से अधिक का तेज शोर (लाउडस्पीकर, हॉर्न, मशीनें) बहरापन, उच्च रक्तचाप, अनिद्रा और मानसिक तनाव पैदा करता है।
  • रेडियोधर्मी प्रदूषण (Radioactive Pollution): परमाणु संयंत्रों की दुर्घटनाएं (1986 की चेरनोबिल त्रासदी और 2011 की फुकुशिमा आपदा) से उत्सर्जित अल्फा, बीटा व गामा किरणें मानव शरीर में ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर) और आने वाली पीढ़ियों में आनुवंशिक विकलांगता लाती हैं।

2.5 प्लास्टिक, माइक्रोप्लास्टिक्स एवं ई-कचरा (E-Waste)

प्लास्टिक व माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण:

पेट्रोलियम से बना प्लास्टिक अविघटनकारी है जो प्रकृति में नष्ट होने में 400 से 1,000 वर्ष लेता है। धूप और घर्षण से टूटकर यह 5 मिमी से छोटे माइक्रोप्लास्टिक्स में बदल जाता है, जिसे मछलियां भोजन समझकर निगलती हैं और यह हमारे भोजन में पहुंच रहा है।

ई-कचरा या इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट:

खराब मोबाइल, कंप्यूटर, बैटरी आदि में सीसा (Lead), कैडमियम और पारा जैसे अति-विषाक्त भारी तत्व होते हैं। इन्हें खुले में जलाने या फेंकने से भूजल और वायु में जानलेवा जहर घुल जाता है।

3. वैश्विक पर्यावरणीय संकट एवं जलवायु परिवर्तन (ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण व आपदाएं)

3.1 अतिरिक्त ग्रीनहाउस प्रभाव एवं ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming)

प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) पृथ्वी पर जीवन का रक्षक है। वायुमंडल की कुछ गैसें पृथ्वी द्वारा छोड़ी गई दीर्घ-तरंग अवरक्त किरणों (Infrared Radiation) को रोककर औसत वैश्विक तापमान +15°C बनाए रखती हैं (यदि यह न हो तो पृथ्वी का तापमान -18°C बर्फ की तरह ठंडा हो जाए)।

किंतु मानव द्वारा ग्रीनहाउस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन से यह तंत्र अतिरिक्त ग्रीनहाउस प्रभाव में बदल गया है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग (विश्व तापमान वृद्धि) हो रही है:

ग्रीनहाउस गैस (GHG) वायुमंडलीय जीवनकाल ग्लोबल वार्मिंग क्षमता (GWP) मानव-जनित उत्सर्जन स्रोत
कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) 100–300 वर्ष 1 (मानक आधार) कोयला, तेल, गैस का जलना; सीमेंट उद्योग; वनों की कटाई। सांद्रता औद्योगिक काल के 280 ppm से बढ़कर आज 420 ppm पार हो गई है।
मीथेन ($CH_4$) लगभग 12 वर्ष 28–36 गुना धान के जलमग्न खेत, जुगाली करने वाले मवेशी, कचरे के ढेर और गैस पाइपलाइन रिसाव।
नाइट्रस ऑक्साइड ($N_2O$) लगभग 114 वर्ष 265–298 गुना अत्यधिक रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरक और नायलॉन विनिर्माण।
क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) 50–100 वर्ष 1,000–12,000 गुना रेफ्रिजरेटर, एसी शीतलक और फोम उद्योग।

3.2 हिमनदों का तीव्र पिघलना एवं समुद्र स्तर में वृद्धि

ग्लोबल वार्मिंग से पृथ्वी का हिमाच्छादित क्रायोस्फीयर तेजी से पिघल रहा है:

  • ध्रुवीय बर्फ का क्षय: उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक) की समुद्री बर्फ और ग्रीनलैंड व अंटार्कटिका की विशाल बर्फ चादरें तेजी से टूटकर समुद्र में बह रही हैं।
  • हिमालयी हिमनदों का पीछे हटना: गंगोत्री और यमुनोत्री ग्लेशियर प्रति वर्ष 15 से 25 मीटर पीछे खिसक रहे हैं, जिससे भविष्य में गंगा व सिंधु जैसी सदानीरा नदियों में जल संकट गहराएगा।
  • समुद्र स्तर वृद्धि व सुंदरबन का संकट: पिछली एक सदी में समुद्र का जलस्तर लगभग 20 सेमी बढ़ चुका है। इसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल के सुंदरबन का लोहाचरा द्वीप समुद्र में पूरी तरह समा चुका है और घोड़ामारा द्वीप तथा सागर द्वीप का बड़ा हिस्सा भयंकर कटाव का शिकार है। मालदीव जैसे निचले द्वीपीय देश डूबने की कगार पर हैं।

3.3 ओजोन परत का क्षरण (Ozone Layer Depletion) एवं मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल

समताप मंडल (Stratosphere) में 15 से 35 किमी की ऊंचाई पर स्थित ओजोन परत सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों ($UV\text{-}B$) को सोखकर पृथ्वी का रक्षा कवच बनती है, इसलिए इसे 'प्राकृतिक ओजोन छतरी' कहा जाता है।

क्लोरीन द्वारा ओजोन विनाश की रासायनिक श्रृंखला: एसी व फ्रिज से निकलने वाली क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैसें समताप मंडल में पहुँचती हैं। वहाँ तीव्र पराबैंगनी किरणों के प्रभाव से CFC टूटकर अत्यधिक सक्रिय मुक्त क्लोरीन परमाणु ($Cl$) छोड़ती हैं: $$CF_2Cl_2 + UV \rightarrow CF_2Cl + Cl$$ यह मुक्त क्लोरीन ओजोन ($O_3$) अणु पर हमला करती है: $$\text{चरण 1: } Cl + O_3 \rightarrow ClO + O_2$$ $$\text{चरण 2: } ClO + O \rightarrow Cl + O_2$$ $$\text{कुल प्रभाव: } O_3 + O \rightarrow 2O_2$$ चूँकि क्लोरीन परमाणु क्रिया के अंत में पुनः मुक्त हो जाता है, यह एक निरंतर उत्प्रेरक बन जाता है। एक अकेला क्लोरीन परमाणु नष्ट होने से पहले 1 लाख से अधिक ओजोन अणुओं को तोड़ देता है! 1985 में अंटार्कटिका के ऊपर विशाल ओजोन छिद्र (Ozone Hole) खोजा गया। इसके समाधान हेतु 1987 में ऐतिहासिक मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol) हुआ, जिसके तहत सीएफसी के उत्पादन पर विश्वव्यापी प्रतिबंध लगा दिया गया।

3.4 चरम मौसमी आपदाएं एवं छठा महा-विलोपन

जलवायु परिवर्तन के कारण बंगाल की खाड़ी में लगातार विनाशकारी सुपर चक्रवात (अम्फान, यास, रेमल) आ रहे हैं। भीषण सूखा, बादल फटना और भयानक वनाग्नि की घटनाएं बढ़ गई हैं। इसके साथ ही जंगलों के कटने से पृथ्वी से वन्यजीव इतनी तेजी से लुप्त हो रहे हैं कि इसे वैज्ञानिक 'छठा महा-विलोपन' (Sixth Mass Extinction) कह रहे हैं। समुद्र का तापमान बढ़ने से मूंगे की चट्टानें अपनी रंगीन काई खोकर सफेद पड़कर मर रही हैं, जिसे कोरल ब्लीचिंग (Coral Bleaching) कहते हैं।

4. भारत एवं पश्चिम बंगाल में पर्यावरणीय अवनयन के वास्तविक अध्ययन

4.1 गंगा एवं दामोदर नदी का प्रदूषण संकट

भारत की जीवनदायिनी नदियां भारी औद्योगिक और सीवेज प्रदूषण की चपेट में हैं:

  • गंगा नदी का संकट: कानपुर के चमड़ा कारखानों का जहरीला क्रोमियमयुक्त पानी और वाराणसी, प्रयागराज व कोलकाता का अशोधित सीवेज सीधे गंगा में गिरता है। इससे पानी में ऑक्सीजन कम हो गई है और दुर्लभ गंगा डॉल्फिन (सुंस) का अस्तित्व खतरे में है। भारत सरकार गंगा की सफाई हेतु नमामि गंगे (Namami Gange) मिशन चला रही है।
  • दामोदर नदी — कभी 'बंगाल का शोक', आज 'प्रदूषित नाला': रानीगंज-आसनसोल कोयला खदानों का कोयला धुलाई का पानी, डीवीसी के ताप बिजली घरों की राख (Fly Ash) और दुर्गापुर व बोकारो इस्पात कारखानों के रसायनों ने दामोदर के जल को काला जहरीला कीचड़ बना दिया है।

4.2 पश्चिम बंगाल का भूजल आर्सेनिक संकट एवं ब्लैकफुट रोग

पश्चिम बंगाल का ग्रामीण क्षेत्र दुनिया की सबसे बड़ी भूजल आर्सेनिक त्रासदी झेल रहा है:

आर्सेनिक आपदा के कारण और गंभीर परिणाम:
  • भू-वैज्ञानिक कारण: गंगा डेल्टा की गहरी तलछट चट्टानों में आयरन पाइराइट ($FeS_2$) खनिज के साथ प्राकृतिक रूप से आर्सेनिक बंधा हुआ था।
  • मानव की भूल: हरित क्रांति के बाद ग्रीष्मकालीन उच्च उपज वाले बोरो धान (Boro Paddy) की सिंचाई के लिए नलकूपों से अंधाधुंध भूजल निकाला गया। जलस्तर बहुत नीचे गिर जाने से खाली चट्टानों में हवा की ऑक्सीजन घुस गई। ऑक्सीजन के संपर्क में आते ही आयरन पाइराइट का ऑक्सीकरण हो गया और जहरीला अकार्बनिक आर्सेनिक घुलकर पीने के पानी के कुओं में फैल गया।
  • सुरक्षित सीमा: WHO के अनुसार पीने के पानी में आर्सेनिक की सुरक्षित सीमा 0.01 मिग्रा/लीटर (10 ppb) है, जबकि बंगाल के नलकूपों में यह 0.05 से 0.50 मिग्रा से भी अधिक पाई गई!
  • प्रभावित जिले: मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, बर्धमान और हावड़ा।
  • स्वास्थ्य प्रभाव (आर्सेनिकोसिस): त्वचा पर काले धब्बे (मेलानोसिस), हथेलियों व तलवों की त्वचा का मोटा व खुरदरा होना (केराटोसिस), हाथ-पैरों की रक्त नलिकाओं का सड़ जाना यानी ब्लैकफुट रोग (Blackfoot Disease) और फेफड़ों, त्वचा व मूत्राशय का कैंसर।

4.3 सुंदरबन के मैंग्रोव का पारिस्थितिकी संकट

यूनेस्को विश्व धरोहर सुंदरबन आज जलवायु परिवर्तन और मानवीय दबाव से संकटग्रस्त है:

  • मीठे पानी की कमी: ऊपर से गंगा के मीठे पानी का बहाव घटने से ज्वार के खारे पानी की सांद्रता बढ़ गई है। इसके कारण सुंदरबन का पहचान वृक्ष सुंदरी (Heritiera fomes) सूख रहा है और उसकी जगह झाड़ीनुमा खारा-सहनशील गोरान उग रहा है।
  • तटीय कटाव व चक्रवाती लहरें: समुद्र स्तर बढ़ने और लगातार चक्रवातों से तटबंध टूट रहे हैं और खारा पानी खेतों में भर रहा है। लोहाचरा द्वीप डूब चुका है और घोड़ामारा द्वीप का अस्तित्व मिटने की कगार पर है।
  • मैंग्रोव कटाई व रॉयल बंगाल टाइगर: झींगा मछली के बीज (मीन) पकड़ने के लिए बारीक जालों से अन्य मछलियों के लाखों बच्चे नष्ट हो रहे हैं। जंगल कटने से बाघ और मानव का टकराव बढ़ रहा है।

4.4 कोलकाता व महानगरों में शीतकालीन स्मॉग (तापमान व्युत्क्रमण)

सर्दियों के महीनों में कोलकाता और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में तापमान का व्युत्क्रमण (Temperature Inversion) होता है। सामान्यतः ऊंचाई के साथ तापमान घटता है, किंतु सर्दियों में जमीन के पास ठंडी भारी हवा के ऊपर गर्म हवा की चादर बन जाती है। इस ढक्कन में गाड़ियों का धुआं और धूल फंसकर जहरीला स्मॉग (धुआंसा) बनाती है, जिससे सांस के रोगियों और बच्चों में दमा व ब्रोंकाइटिस बढ़ जाता है।

4.5 रानीगंज-आसनसोल कोयलांचल में भूमि धंसना

पश्चिम बर्धमान के रानीगंज-आसनसोल में अवैज्ञानिक तरीके से जमीन के नीचे से कोयला निकालने के बाद खदानों को बालू से न भरने के कारण भारी भूमि धंसने (Land Subsidence) की घटनाएं हो रही हैं। जमीन के भीतर कोयले की आग दशकों से सुलग रही है और बीरभूम-पुरुलिया के प्राचीन साल के जंगल खनन की भेंट चढ़ गए हैं।

5. पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास एवं नागरिक दायित्व

5.1 सतत विकास (Sustainable Development) एवं संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्य

वर्ष 1987 में संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण व विकास आयोग (ब्रंटलैंड आयोग) की रिपोर्ट "हमारा साझा भविष्य" (Our Common Future) में सतत विकास या धारणीय विकास (Sustainable Development) की परिभाषा दी गई:

"सतत विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को इस प्रकार पूरा करता है कि भविष्य की पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से कोई समझौता न हो।"

इसके तीन मुख्य स्तंभ हैं: आर्थिक संवृद्धि, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2030 तक प्राप्त करने हेतु 17 सतत विकास लक्ष्य (SDGs 2015–2030) तय किए हैं, जिनमें स्वच्छ जल (SDG 6), स्वच्छ ऊर्जा (SDG 7), जलवायु कार्रवाई (SDG 13) और भूमि पर जीवन की सुरक्षा (SDG 15) प्रमुख हैं।

5.2 हरित ऊर्जा संक्रांति एवं पर्यावरण-अनुकूल तकनीक

प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधनों को त्यागकर नवीकरणीय हरित ऊर्जा की ओर बढ़ना अनिवार्य है:

  • सौर ऊर्जा (Solar Energy): फोटो-वोल्टाइक सेलों द्वारा सूर्य की धूप को सीधे बिजली में बदलना (छतों पर सोलर रूफटॉप और सौर पार्क)।
  • पवन ऊर्जा (Wind Energy): पवन चक्कियों द्वारा टरबाइन चलाकर प्रदूषण-मुक्त बिजली बनाना (तमिलनाडु व गुजरात तट)।
  • लघु जलविद्युत व बायो-गैस: विशाल बांध बनाए बिना पहाड़ी नदियों के प्राकृतिक प्रवाह से बिजली बनाना और गोबर व कृषि अपशिष्ट से बायो-गैस बनाना।
  • इलेक्ट्रिक वाहन (EVs): पेट्रोल-डीजल की जगह बैटरी चालित बसें और गाड़ियां चलाकर शहरों का धुआं मिटाना।

5.3 कचरा प्रबंधन के 4R (Four R's) सिद्धांत

ठोस कचरे को घटाने और चक्रीय अर्थव्यवस्था बनाने हेतु 4R सिद्धांत अपनाना आवश्यक है:

वरीयता 4R सिद्धांत अर्थ एवं विद्यार्थियों का व्यावहारिक आचरण
पहला (सर्वोच्च) Refuse (मना करना) एकल-उपयोग प्लास्टिक की थैलियों, स्ट्रॉ और फालतू पैकेजिंग को सीधे "ना" कहना। कपड़े का थैला साथ रखना।
दूसरा Reduce (कम करना) वस्तुओं का अनावश्यक उपभोग घटाना; कमरे से निकलते समय पंखे-बत्ती बंद करना; पानी की बर्बादी रोकना।
तीसरा Reuse (पुनः उपयोग) चीजों को एक बार इस्तेमाल करके फेंकने के बजाय बार-बार उपयोग करना; पुरानी किताबें छोटों को देना।
चौथा (अंतिम) Recycle (पुनर्चक्रण) सूखे कचरे (कागज, गत्ता, प्लास्टिक, धातु) को अलग करके कारखानों में भेजना ताकि नया सामान बन सके।

5.4 भारत के ऐतिहासिक पर्यावरण आंदोलन

भारत के लोगों ने अपने वनों और नदियों की रक्षा हेतु दुनिया को अहिंसक पर्यावरण रक्षा का मार्ग दिखाया है:

  • चिपको आंदोलन (Chipko Movement, 1973): वर्तमान उत्तराखंड के चमोली जिले के मंडल गांव में शुरू हुआ। इसके प्रमुख नेता सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और ग्रामीण महिला गौरा देवी थीं। जब लकड़ी ठेकेदार जंगल काटने आए, तो महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर ("चिपको") मानव ढाल बना ली। सरकार को झुकना पड़ा और हिमालय में 1,000 मीटर से ऊपर हरे पेड़ों की कटाई पर 15 वर्षों का पूर्ण प्रतिबंध लगा।
  • नर्मदा बचाओ आंदोलन: नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर विशाल बांध से लाखों आदिवासियों के विस्थापन और वनों के डूबने के विरुद्ध मेधा पाटकर और बाबा आमटे के नेतृत्व में चला दीर्घकालिक जन-आंदोलन।
  • साइलेंट वैली आंदोलन (1978): केरल के पलक्कड़ में कुंतीपूजा नदी पर जलविद्युत बांध बनाकर प्राचीन सदाबहार वर्षावन और लुप्तप्राय सिंह-पूंछ वाले बंदर (Lion-tailed Macaque) को बचाने हेतु केरल शास्त्र साहित्य परिषद (KSSP) द्वारा संचालित सफल आंदोलन।
  • अप्पिको आंदोलन (1983): कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ में पश्चिमी घाट के जंगलों को बचाने हेतु चिपको की तर्ज पर पेड़ों से लिपटकर चलाया गया दक्षिण भारतीय आंदोलन।

5.5 पर्यावरण कानून एवं प्रत्येक विद्यार्थी का कर्तव्य

संसद ने 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के बाद पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया। किंतु कानून के साथ-साथ जन-भागीदारी आवश्यक है:

  • स्कूल और घर के आसपास फलदार छायादार पौधे लगाना (सामाजिक वानिकी)।
  • घरों में वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) करना और सिंगल-यूज प्लास्टिक का त्याग करना।
  • महात्मा गांधी का यह अमर संदेश याद रखना: "प्रकृति के पास हर इंसान की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त साधन हैं, लेकिन किसी एक के भी लालच को पूरा करने के लिए नहीं।"

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

पर्यावरणीय प्रभाव का IPAT समीकरण
पर्यावरणीय प्रभाव (I) = जनसंख्या (P) × प्रति व्यक्ति उपभोग/समृद्धि (A) × प्रौद्योगिकी पदचिह्न (T)
वैज्ञानिक एहरलिच व होल्ड्रेन द्वारा प्रतिपादित; जनसंख्या और विलासितापूर्ण उपभोग मिलकर पर्यावरण पर दबाव को कई गुना बढ़ा देते हैं।
वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index - AQI) गणना सिद्धांत
श्रेणी: 0–50 (अच्छा), 51–100 (संतोषजनक), 101–200 (मध्यम), 201–300 (खराब), 301–400 (बहुत खराब), 401–500 (गंभीर)
PM2.5, PM10, SO2, NO2, CO और ओजोन की सांद्रता के आधार पर समग्र AQI तय होता है।
बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) समीकरण
स्वच्छ नदी जल: BOD < 2 mg/L; अत्यधिक प्रदूषित सीवेज जल: BOD > 100–300 mg/L
DO_0 = प्रारंभिक घुलित ऑक्सीजन; DO_5 = 20°C पर 5 दिन अंधेरे में रखने के बाद बची ऑक्सीजन।
सार्वभौमिक मृदा अपरदन समीकरण (USLE)
A = वार्षिक मृदा हानि (टन/हेक्टेयर); R = वर्षा की अपरदन क्षमता; K = मृदा संवेदनशीलता; LS = ढाल लंबाई व तीखापन; C = वनस्पति आवरण; P = संरक्षण उपाय
वनस्पति आवरण हटाने से मिट्टी का कटाव 500 गुना से भी अधिक बढ़ जाता है।
कार्बन डाइऑक्साइड का विकिरणकारी बल (Radiative Forcing)
C = वर्तमान CO2 सांद्रता (~420 ppm); C_0 = पूर्व-औद्योगिक स्तर (~280 ppm); वर्तमान ΔF > 2.2 W/m²
धनात्मक विकिरणकारी बल यह दर्शाता है कि पृथ्वी अंतरिक्ष में गर्मी छोड़ने की तुलना में अधिक ऊष्मा सोख रही है।
समताप मंडलीय ओजोन विनाश की उत्प्रेरक अभिक्रिया
कुल परिणाम: O_3 + O → 2 O_2 (1 मुक्त क्लोरीन परमाणु 1 लाख से अधिक ओजोन अणुओं को नष्ट करता है)
सीएफसी से पराबैंगनी किरणों द्वारा मुक्त क्लोरीन स्वयं नष्ट हुए बिना लगातार ओजोन को ऑक्सीजन में बदलती है।
पारिस्थितिकी वहन क्षमता सिद्धांत (Carrying Capacity Principle)
N = जनसंख्या; r = प्राकृतिक वृद्धि दर; K = पर्यावरण की अधिकतम वहन क्षमता (Carrying Capacity)
जब मानव की संसाधन मांग K की सीमा को पार कर जाती है, तो पारिस्थितिकी तंत्र का पतन शुरू होता है।
अपशिष्ट पुनर्चक्रण एवं पृथक्करण दक्षता दर
वर्तमान वैश्विक औसत ~20%; शून्य-अपशिष्ट नगरों का लक्ष्य > 75%
गीले और सूखे कचरे का स्रोत पर पृथक्करण पुनर्चक्रण की दक्षता को अधिकतम बनाता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: पर्यावरण प्रदूषण एवं पर्यावरणीय अवनयन में क्या अंतर है? उपयुक्त भौगोलिक उदाहरणों द्वारा स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. पर्यावरण प्रदूषण (Environmental Pollution):
  • परिभाषा: वायु, जल या मृदा में बाह्य अवांछित या हानिकारक तत्वों का मिलना, जिससे उनके स्वाभाविक भौतिक, रासायनिक या जैविक गुण विकृत हो जाएं।
  • स्वरूप: यह एक संकीर्ण और विशिष्ट प्रक्रिया है जो किसी प्रदूषक के सीधे विसर्जन से होती है।
  • उदाहरण: थर्मल पावर प्लांट से सल्फर डाइऑक्साइड गैस का निकलना या दामोदर नदी में औद्योगिक रसायनों का बहाया जाना।
  1. पर्यावरणीय अवनयन (Environmental Degradation):
  • परिभाषा: पर्यावरण के विभिन्न घटकों की गुणवत्ता, प्राकृतिक उत्पादकता, आत्म-पुनर्प्राप्ति और जीवन-वहन क्षमता में होने वाली वह व्यापक गिरावट जिससे पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ जाता है।
  • स्वरूप: यह एक व्यापक परिणाम है। प्रदूषण के कारण अवनयन होता ही है, किंतु बिना किसी सीधे रासायनिक प्रदूषण के भी केवल वनों की अंधाधुंध कटाई या अति-चराई से अवनयन हो सकता है।
  • उदाहरण: पश्चिम बंगाल में गर्मियों के धान की सिंचाई हेतु अत्यधिक भूजल खींचने से जलस्तर का नीचे गिरना; जंगलों के कटने से पहाड़ों की ऊपरी उपजाऊ मिट्टी का बह जाना; या किसी जीव प्रजाति का हमेशा के लिए विलुप्त हो जाना।

संबंध: सभी प्रदूषण पर्यावरणीय अवनयन लाते हैं, किंतु अवनयन केवल प्रदूषण तक सीमित नहीं है; यह संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के संरचनात्मक विनाश को समेटे हुए है।

उदाहरण 2
प्रश्न 2: अम्ल वर्षा (Acid Rain) क्या है? इसके बनने की रासायनिक अभिक्रियाएँ लिखिए तथा "मार्बल कैंसर" किसे कहते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. अम्ल वर्षा की परिभाषा एवं रासायनिक समीकरण: जिस वर्षा जल का pH मान 5.6 से कम (अम्लीय) होता है, उसे अम्ल वर्षा (Acid Rain) कहते हैं।
  • ताप बिजली घरों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) और वाहनों के धुएं की नाइट्रोजन डाइऑक्साइड ($NO_2$) वायुमंडल की नमी व ऑक्सीजन से क्रिया करके सल्फ्यूरिक अम्ल ($H_2SO_4$) और नाइट्रिक अम्ल ($HNO_3$) बनाती हैं:

$$2SO_2 + O_2 + 2H_2O \rightarrow 2H_2SO_4$$

$$4NO_2 + O_2 + 2H_2O \rightarrow 4HNO_3$$

  1. मार्बल कैंसर या स्टोन लेप्रोसी (Marble Cancer):
  • जब यह अम्ल वर्षा संगमरमर (कैल्शियम कार्बोनेट, $CaCO_3$) से बने ऐतिहासिक भवनों व स्मारकों पर गिरती है, तो तीखी रासायनिक अभिक्रिया होती है:

$$CaCO_3 \text{ (संगमरमर)} + H_2SO_4 \rightarrow CaSO_4 \text{ (जिप्सम)} + H_2O + CO_2$$

  • बनने वाला जिप्सम जल में घुलनशील और कमजोर होता है। इसके कारण चिकना संगमरमर खुरदरा हो जाता है, उसमें गड्ढे बन जाते हैं और पत्थर का चमकता सफेद रंग पीला व मटमैला होकर झड़ने लगता है। इसे पत्थरों का कुष्ठरोग या "मार्बल कैंसर" कहा जाता है।
  • प्रसिद्ध उदाहरण: आगरा की मथुरा तेल रिफाइनरी के धुएं के कारण विश्व धरोहर ताजमहल का संगमरमर मार्बल कैंसर से गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था।
उदाहरण 3
प्रश्न 3: तालाबों में यूट्रोफिकेशन (Eutrophication) की प्रक्रिया कैसे होती है? इससे जलीय जीवों की मृत्यु क्यों हो जाती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. यूट्रोफिकेशन होने की प्रक्रिया: (क) खेतों में डाले गए रासायनिक उर्वरकों (नाइट्रेट व फॉस्फेट) के अवशेष और बस्तियों का सीवेज वर्षा के जल में घुलकर तालाब या झील में पहुंच जाते हैं। (ख) प्रचुर पोषक तत्व पाकर जल की सतह पर काई और जलकुंभी का अत्यधिक तीव्र विस्फोट होता है, जिसे "शैवाल प्रस्फुटन" (Algal Bloom) कहते हैं। (ग) सतह पर काई की घनी चादर बिछ जाने से सूर्य का प्रकाश नीचे तक नहीं पहुँच पाता, जिससे जलमग्न पौधे प्रकाश संश्लेषण न कर पाने के कारण मर जाते हैं।

  2. जलीय जीवों की मृत्यु एवं बीओडी (BOD) वृद्धि: (क) जब भारी मात्रा में काई और जलीय पौधे मरते हैं, तो उन्हें सड़ाने के लिए एरोबिक बैक्टीरिया की संख्या करोड़ों में बढ़ जाती है। (ख) ये बैक्टीरिया सड़ांध की क्रिया में जल में घुली ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) को तेजी से समाप्त कर देते हैं। इससे जल की बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) बहुत बढ़ जाती है। (ग) पानी में ऑक्सीजन का स्तर लगभग शून्य हो जाने से मछलियां और अन्य जलीय जीव दम घुटने से तड़प-तड़प कर सामूहिक रूप से मर जाते हैं और तालाब एक बदबूदार मृत क्षेत्र (Dead Zone) बन जाता है।

उदाहरण 4
प्रश्न 4: पश्चिम बंगाल में भूजल में आर्सेनिक प्रदूषण के क्या कारण हैं? मानव शरीर पर इसके क्या दुष्परिणाम होते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. आर्सेनिक प्रदूषण के कारण:
  • भू-वैज्ञानिक उत्पत्ति: गंगा डेल्टा की गहरी भूगर्भीय परतों में आयरन पाइराइट ($FeS_2$) चट्टानों के साथ आर्सेनिक प्राकृतिक रूप से जमा था।
  • मानव की भूल: हरित क्रांति के बाद ग्रीष्मकालीन बोरो धान की अत्यधिक सिंचाई हेतु नलकूपों से करोड़ों लीटर भूजल निकाला गया।
  • ऑक्सीकरण क्रिया: भूजल स्तर के बहुत नीचे गिर जाने से खाली हुई चट्टानों में हवा की ऑक्सीजन घुस गई। ऑक्सीजन के संपर्क में आते ही आयरन पाइराइट का ऑक्सीकरण हो गया और जहरीला अकार्बनिक आर्सेनिक घुलकर पीने के नलकूपों के पानी में मिल गया।
  1. प्रभावित जिले: मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, बर्धमान और हावड़ा।

  2. मानव शरीर पर दुष्परिणाम (आर्सेनिकोसिस):

  • मेलानोसिस: छाती और पीठ की त्वचा पर बारिश की बूंदों जैसे काले-काले धब्बे पड़ जाते हैं।
  • केराटोसिस: हथेलियों और पैरों के तलवों की त्वचा खुरदरी, सख्त व फटने लगती है।
  • ब्लैकफुट रोग (Blackfoot Disease): हाथ-पैरों की बारीक रक्त नलिकाएं नष्ट हो जाती हैं, जिससे उंगलियों और पंजों में गैंग्रीन (सड़ांध) हो जाती है और अंग सड़कर काले पड़ जाते हैं।
  • कैंसर: लगातार आर्सेनिकयुक्त जल पीने से फेफड़ों, त्वचा, यकृत और मूत्राशय का जानलेवा कैंसर हो जाता है।
उदाहरण 5
प्रश्न 5: क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) समताप मंडल की ओजोन परत को कैसे नष्ट करती है? ओजोन संरक्षण हेतु कौन सा अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. ओजोन विनाश की रासायनिक प्रक्रिया:
  • फ्रिज, एसी और स्प्रे से निकलने वाली क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैसें समताप मंडल में ओजोन परत तक पहुँच जाती हैं।
  • वहाँ सूर्य की तीव्र पराबैंगनी किरणों से CFC टूटकर अत्यधिक सक्रिय मुक्त क्लोरीन परमाणु ($Cl$) छोड़ती है:

$$CF_2Cl_2 + UV \rightarrow CF_2Cl + Cl$$

  • यह मुक्त क्लोरीन ओजोन ($O_3$) अणु से टकराकर क्लोरीन मोनोक्साइड और ऑक्सीजन बनाती है:

$$Cl + O_3 \rightarrow ClO + O_2$$

  • इसके बाद $ClO$ मुक्त ऑक्सीजन परमाणु से क्रिया कर पुनः क्लोरीन परमाणु को आजाद कर देता है:

$$ClO + O \rightarrow Cl + O_2$$

  • चूँकि क्लोरीन परमाणु अंत में पुनः वैसा ही मुक्त हो जाता है, यह एक अंतहीन विनाशकारी चक्र चलाता है। एक अकेला क्लोरीन परमाणु नष्ट होने से पहले लगभग 1 लाख ओजोन अणुओं को तोड़ देता है।
  1. अंतरराष्ट्रीय समझौता:
  • 1985 में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र खोजे जाने के बाद विश्व के देशों ने 1987 में कनाडा के मॉन्ट्रियल में ऐतिहासिक मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol) पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत ओजोन को नुकसान पहुँचाने वाले सीएफसी और अन्य रसायनों के उत्पादन पर दुनिया भर में पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।
उदाहरण 6
प्रश्न 6: सतत विकास (Sustainable Development) से क्या तात्पर्य है? इसके तीन मुख्य स्तंभ कौन से हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. सतत विकास की परिभाषा: वर्ष 1987 में संयुक्त राष्ट्र के ब्रंटलैंड आयोग की रिपोर्ट "हमारा साझा भविष्य" (Our Common Future) में सतत विकास की सबसे प्रामाणिक परिभाषा दी गई: "सतत विकास (Sustainable Development) वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को इस प्रकार पूरा करता है कि भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से कोई समझौता न हो।"

  2. सतत विकास के तीन मुख्य स्तंभ: (क) पर्यावरण संरक्षण (Environmental Protection): प्राकृतिक संसाधनों की बचत, प्रदूषण पर रोक, जैव विविधता की रक्षा और सौर व पवन जैसी स्वच्छ नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग ताकि प्रकृति की वहन क्षमता बनी रहे। (ख) आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth): ऐसी आर्थिक प्रगति जो गरीबी मिटाए और रोजगार दे, किंतु प्राकृतिक पूंजी को नष्ट न करे। (ग) सामाजिक न्याय (Social Equity): समाज के सभी वर्गों को स्वच्छ पानी, भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानपूर्ण जीवन का समान अधिकार मिले।

इन तीनों स्तंभों के संतुलन से ही मानव सभ्यता का सुरक्षित भविष्य संभव है।

उदाहरण 7
प्रश्न 7: चिपको आंदोलन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। इसके प्रमुख नेता कौन थे और इसका क्या ऐतिहासिक महत्व था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. शुरुआत एवं नेतृत्व: चिपको आंदोलन अप्रैल 1973 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश (वर्तमान उत्तराखंड) के चमोली जिले के गोपेश्वर व मंडल गांव में शुरू हुआ।
  • प्रमुख नेता: प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और ग्रामीण महिलाओं की साहसी नेत्री गौरा देवी।
  1. आंदोलन का अहिंसक तरीका: जब खेल का सामान बनाने वाली कंपनी के ठेकेदार जंगल के प्राचीन अंगू और बांज के पेड़ों को काटने आए, तो गौरा देवी के नेतृत्व में गांव की महिलाओं ने पेड़ों के तनों को अपनी बाहों में भर लिया ("चिपको" का अर्थ है चिपकना या आलिंगन करना)। उन्होंने कुल्हाड़ी लिए मजदूरों से निर्भीकता से कहा: "पेड़ों को काटने से पहले तुम्हें हमारी देह पर कुल्हाड़ी चलानी होगी।"

  2. ऐतिहासिक महत्व:

  • ग्रामीण महिलाओं की शक्ति: इसने साबित किया कि जंगलों पर आश्रित गांव की अनपढ़ महिलाएं पर्यावरण का मूल्य व्यापारिक मुनाफाखोरों से कहीं बेहतर समझती हैं।
  • सरकार का झुकना: आंदोलन के दबाव में सरकार ने हिमालय के 1,000 मीटर से ऊंचे जंगलों में हरे पेड़ों की कटाई पर 15 साल का पूर्ण प्रतिबंध लगाया।
  • प्रेरणा स्रोत: इसने दक्षिण भारत के अप्पिको आंदोलन और नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे कई अहिंसक आंदोलनों को जन्म दिया।
उदाहरण 8
प्रश्न 8: कचरा प्रबंधन के 4R (Four R's) सिद्धांत क्या हैं? एक विद्यार्थी दैनिक जीवन में इनका पालन कैसे कर सकता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: कचरा कम करने और पर्यावरण रक्षा हेतु 4R सिद्धांत एक वैज्ञानिक क्रमबद्ध व्यवस्था है:

  1. Refuse (मना करना - पहली प्राथमिकता):
  • जो चीजें पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती हैं, उन्हें लेने से सीधे "ना" कहना।
  • विद्यार्थी का आचरण: दुकानदार से प्लास्टिक की थैली या स्ट्रॉ लेने से मना करना; हमेशा कपड़े का थैला साथ रखना।
  1. Reduce (कम करना):
  • संसाधनों का अनावश्यक उपभोग घटाकर कचरा बनने ही न देना।
  • विद्यार्थी का आचरण: कक्षा से बाहर जाते समय बत्ती-पंखे बंद करना; ब्रश करते समय नल बंद रखना; भोजन की बर्बादी न करना; कॉपी के दोनों तरफ लिखना।
  1. Reuse (पुनः उपयोग करना):
  • किसी वस्तु को एक बार इस्तेमाल करके फेंकने की जगह बार-बार उपयोग में लाना।
  • विद्यार्थी का आचरण: स्टील की मजबूत पानी की बोतल व टिफिन बॉक्स इस्तेमाल करना; पुरानी किताबें छोटों को देना; कांच की खाली शीशियों को पेन-स्टैंड बनाना।
  1. Recycle (पुनर्चक्रण करना - अंतिम उपाय):
  • कचरे को छांटकर कारखानों में भेजना ताकि उससे नई वस्तुएं बनाई जा सकें।
  • विद्यार्थी का आचरण: घर व स्कूल में गीला जैविक कचरा (सब्जी-फलों के छिलके) और सूखा अकार्बनिक कचरा (कागज, प्लास्टिक, धातु) अलग-अलग डिब्बों में रखना और रद्दी वाले को देना।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गलत धारणा: "पर्यावरण प्रदूषण" और "पर्यावरणीय अवनयन" दोनों बिल्कुल एक ही अर्थ वाले शब्द हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सही तथ्य: प्रदूषण हानिकारक तत्वों का मिलना है; जबकि अवनयन पारिस्थितिकी तंत्र की समग्र वहन क्षमता और उत्पादकता में गिरावट है। बिना किसी रसायन के भी केवल पेड़ काटने से अवनयन हो जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गलत धारणा: ग्रीनहाउस प्रभाव पृथ्वी के लिए केवल एक हानिकारक अभिशाप है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सही तथ्य: प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव पृथ्वी पर जीवन के लिए अनिवार्य है (+15°C तापमान बनाए रखता है)। मानव द्वारा उत्सर्जित "अतिरिक्त ग्रीनहाउस प्रभाव" ग्लोबल वार्मिंग लाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गलत धारणा: ओजोन छिद्र ही ग्लोबल वार्मिंग और हिमनद पिघलने का मुख्य कारण है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सही तथ्य: ओजोन क्षरण समताप मंडल में CFC से होता है जिससे हानिकारक पराबैंगनी किरणें आती हैं। ग्लोबल वार्मिंग क्षोभमंडल में CO2 से अवरक्त ऊष्मा रुकने से होती है। दोनों अलग घटनाएं हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गलत धारणा: पश्चिम बंगाल में भूजल का आर्सेनिक किसी रासायनिक कारखाने द्वारा जमीन में डाला गया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सही तथ्य: आर्सेनिक भूगर्भीय पाइराइट चट्टानों में प्राकृतिक रूप से था। बोरो धान की अधिक सिंचाई से जलस्तर गिरने और हवा घुसने से यह घुलकर पानी में आ गया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गलत धारणा: यूट्रोफिकेशन होने से जल में काई बढ़ती है इसलिए ऑक्सीजन भी बढ़ जाती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सही तथ्य: काई जीवित रहते समय ऑक्सीजन दे सकती है, किंतु जब वह मरती है तो अरबों बैक्टीरिया उसे सड़ाने में सारी ऑक्सीजन सोख लेते हैं, जिससे मछलियां मर जाती हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गलत धारणा: चिपको आंदोलन केरल में सदाबहार वनों को बचाने के लिए हुआ था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सही तथ्य: चिपको आंदोलन (1973, सुंदरलाल बहुगुणा) उत्तराखंड के हिमालय में हुआ था। केरल में साइलेंट वैली आंदोलन (1978) हुआ था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गलत धारणा: कचरा प्रबंधन में 4R सिद्धांतों में रीसायकल (Recycle) सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण उपाय है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सही तथ्य: "रिफ्यूज" (मना करना) और "रिड्यूस" (कम करना) सबसे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे कचरा बनने ही नहीं देते। रीसायकल अंतिम उपाय है क्योंकि इसमें भी ऊर्जा और साधन लगते हैं।

मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन — समग्र भौगोलिक संरचना

मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन — समग्र भौगोलिक संरचना 1. पर्यावरण के मंडल एवं अवनयन के प्रेरक कारक पर्यावरणीय मंडल: स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल एवं जैवमंडल प्रदूषण बनाम अवनयन: हानिकारक पदार्थों का मिलना बनाम धारणीय क्षमता में गिरावट मानव-प्रकृति विकास: आखेटक-संग्राहक समाज → कृषि क्रांति → औद्योगिक क्रांति प्रमुख कारण: जनसंख्या विस्फोट, अनियंत्रित नगरीकरण, अंधाधुंध वनों की कटाई IPAT समीकरण: पर्यावरणीय प्रभाव (I) = जनसंख्या (P) × समृद्धि (A) × तकनीक (T) 2. प्रमुख प्रदूषण एवं पारिस्थितिकी संकट वायु व अम्ल वर्षा: SO2, NOx → H2SO4, HNO3 (स्टोन कैंसर, स्मॉग, PM2.5) जल व यूट्रोफिकेशन: नाइट्रेट/फॉस्फेट, शैवाल प्रस्फुटन, ऑक्सीजन की कमी (उच्च BOD) मृदा व मरुस्थलीकरण: ऊपरी मिट्टी का अपरदन, लवणीकरण एवं ह्यूमस का विनाश विषाक्त तत्व: बंगाल का भूजल आर्सेनिक संकट (ब्लैकफुट रोग), फ्लोराइड, सीसा ठोस व ई-कचरा: अविघटनकारी प्लास्टिक, माइक्रोप्लास्टिक्स और इलेक्ट्रॉनिक विषैला कचरा 3. वैश्विक पर्यावरणीय संकट एवं जलवायु परिवर्तन ग्रीनहाउस व ग्लोबल वार्मिंग: CO2, CH4, N2O, CFCs से वैश्विक तापमान वृद्धि हिमनद पिघलन व समुद्र वृद्धि: ध्रुवीय बर्फ का क्षय, सुंदरबन व मालदीव के द्वीपों का संकट ओजोन परत का क्षरण: क्लोरीन द्वारा O3 का विनाश; 1987 मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल चरम प्राकृतिक आपदाएं: लगातार सुपर चक्रवात (अम्फान, रेमल), सूखा व वनाग्नि जैव विविधता का ह्रास: छठा महा-विलोपन, उष्णकटिबंधीय वर्षावन विनाश व कोरल ब्लीचिंग 4. पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास एवं नागरिक दायित्व सतत विकास: ब्रंटलैंड रिपोर्ट (1987), रियो शिखर सम्मेलन (1992) व यूएन SDGs कचरा प्रबंधन के 4R: रिफ्यूज, रिड्यूस, रीयूज एवं रीसायकल (स्रोत पृथक्करण) हरित ऊर्जा संक्रांति: सौर, पवन ऊर्जा, वर्षा जल संचयन और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) ऐतिहासिक आंदोलन: चिपको (1973, सुंदरलाल बहुगुणा), नर्मदा बचाओ व साइलेंट वैली नागरिक कर्तव्य: सामाजिक वानिकी, ऊर्जा ऑडिट, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पृथ्वी का पर्यावरण स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल और जैवमंडल के संतुलन पर टिका है, जो समस्त जीवों का आधार है।
मुख्य बिंदु 2
हानिकारक तत्वों का मिलना प्रदूषण है, जबकि पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता, वहन क्षमता और उत्पादकता में समग्र गिरावट अवनयन है।
मुख्य बिंदु 3
आखेटक युग और कृषि क्रांति के बाद 18वीं सदी की औद्योगिक क्रांति व जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपभोग ने प्रकृति के संतुलन को तोड़ दिया है।
मुख्य बिंदु 4
वायु प्रदूषण से अम्ल वर्षा व मार्बल कैंसर होता है; जलाशयों में खाद बहने से यूट्रोफिकेशन व ऑक्सीजन संकट होता है और बंगाल में अत्यधिक नलकूप दोहन से आर्सेनिक बीमारी फैली है।
मुख्य बिंदु 5
कार्बन डाइऑक्साइड व मीथेन की वृद्धि से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है, जिससे ध्रुवों व हिमालय की बर्फ पिघल रही है और सुंदरबन के द्वीप डूब रहे हैं।
मुख्य बिंदु 6
समताप मंडल में सीएफसी से मुक्त क्लोरीन ओजोन परत को नष्ट करती है, जिसके समाधान हेतु 1987 का ऐतिहासिक मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल हुआ।
मुख्य बिंदु 7
1987 के ब्रंटलैंड आयोग ने सतत विकास की नींव रखी जो वर्तमान और भविष्य दोनों पीढ़ियों के कल्याण पर जोर देता है और संयुक्त राष्ट्र के 17 SDGs तय किए गए।
मुख्य बिंदु 8
हरित ऊर्जा संक्रांति, 4R कचरा नियम (रिफ्यूज, रिड्यूस, रीयूज, रीसायकल), चिपको जैसे जन-आंदोलन और 1986 का पर्यावरण संरक्षण कानून ही हमारी पृथ्वी की रक्षा के मार्ग हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1. पर्यावरण प्रदूषण और पर्यावरणीय अवनयन में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
उत्तर देखें

पर्यावरण प्रदूषण हानिकारक तत्वों के सीधे मिलने से हवा, पानी या मिट्टी की शुद्धता का बिगड़ना है। जबकि पर्यावरणीय अवनयन पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता, वहन क्षमता और उत्पादकता में होने वाली समग्र गिरावट है। बिना किसी रसायन के केवल वनों की कटाई या मिट्टी के कटाव से भी अवनयन हो सकता है।


2
2. अम्ल वर्षा ताजमहल जैसी संगमरमर की इमारतों पर मार्बल कैंसर कैसे पैदा करती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
उत्तर देखें

अम्ल वर्षा में मौजूद सल्फ्यूरिक अम्ल ($H_2SO_4$) संगमरमर के कैल्शियम कार्बोनेट ($CaCO_3$) से क्रिया करके कमजोर जिप्सम ($CaSO_4$) बनाता है: $$CaCO_3 + H_2SO_4 \rightarrow CaSO_4 + H_2O + CO_2$$। इससे संगमरमर खुरदरा हो जाता है, उसमें गड्ढे बन जाते हैं और वह पीला पड़कर झड़ने लगता है, जिसे मार्बल कैंसर (Marble Cancer) कहते हैं।


3
3. पश्चिम बंगाल के नलकूपों में आर्सेनिक जहर घुलने के पीछे मुख्य मानवीय कारण क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
उत्तर देखें

आर्सेनिक भूगर्भीय पाइराइट चट्टानों में प्राकृतिक रूप से था। किंतु शुष्क मौसम में बोरो धान की खेती के लिए नलकूपों से अंधाधुंध भूजल खींचने से जलस्तर बहुत नीचे गिर गया। खाली चट्टानों में हवा की ऑक्सीजन घुसने से पाइराइट का ऑक्सीकरण हुआ और जहरीला आर्सेनिक पीने के पानी के कुओं में घुल गया।


4
4. अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र बनने का मुख्य कारण क्या था और इसका समाधान किस समझौते से हुआ?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
उत्तर देखें

फ्रिज और एसी से निकलने वाली क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैसों से मुक्त क्लोरीन परमाणु ओजोन परत को नष्ट करते हैं। 1985 में खोजे गए इस संकट को दूर करने हेतु 1987 में ऐतिहासिक मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol) हुआ जिसके द्वारा दुनिया भर में सीएफसी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया।


5
5. ब्रंटलैंड आयोग (1987) के अनुसार सतत विकास (Sustainable Development) की परिभाषा दीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
उत्तर देखें

ब्रंटलैंड आयोग (Our Common Future) के अनुसार: "सतत विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को इस प्रकार पूरा करता है कि भविष्य की पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से कोई समझौता न हो।"


अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

कक्षा 8 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: Concept of History अध्याय 2: Rise of Regional Powers अध्याय 3: Establishment of Colonial Authority अध्याय 4: औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप अध्याय 5: औपनिवेशिक शासन के प्रति प्रतिक्रिया: सहयोग और विद्रोह अध्याय 6: राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास अध्याय 7: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श और विकास अध्याय 8: सांप्रदायिकता से विभाजन अध्याय 9: भारतीय संविधान: लोकतांत्रिक ढांचा और नागरिकों के अधिकार अध्याय 10: पृथ्वी की आंतरिक संरचना अध्याय 11: अस्थिर पृथ्वी अध्याय 12: शैल (चट्टानें) अध्याय 13: वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार अध्याय 14: बादल और वर्षा अध्याय 15: जलवायु प्रदेश अध्याय 16: मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन अध्याय 17: भारत के कुछ पड़ोसी देश और उनके साथ संबंध अध्याय 18: उत्तर अमेरिका महाद्वीप अध्याय 19: दक्षिण अमेरिका महाद्वीप अध्याय 20: ओशिनिया महाद्वीप

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।