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WBB • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 10
अनुमानित समय: 50 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पृथ्वी की आंतरिक संरचना

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 भूगोल पाठ्यक्रम "हमारा पृथ्वी" (Our Earth) के प्रथम अध्याय "पृथ्वी की आंतरिक संरचना" (Interior of the Earth / অধ্যায় ১: পৃথিবীর অন্দরমহল / अध्याय १: पृथ्वी का अंतरतम) के संपूर्ण, प्रामाणिक एवं विस्तृत अध्ययन मार्गदर्शिका में आपका स्वागत है। हमारी पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग ४.६ अरब (४६० करोड़) वर्ष पूर्व सौर निहारिका (Solar Nebula) के गुरुत्वीय संकुचन एवं धूल-कणों के संचयन से हुई थी। अपनी प्रारंभिक पिघली हुई तप्त अवस्था में गुरुत्वीय विभेदीकरण (Gravitational Differentiation) की प्रक्रिया द्वारा भारी धात्विक तत्व (जैसे लोहा और निकल) केंद्र की ओर डूब गए और केंद्रीय क्रोड का निर्माण किया, जबकि हल्के सिलिकेट खनिज तैरकर सतह पर आ गए और ठंडे होकर पतली भूपर्पटी (Crust) के रूप में जम गए। पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग ६,३७१ किमी (भूमध्यरेखीय त्रिज्या ६,३७८ किमी, ध्रुवीय त्रिज्या ६,३५७ किमी) है। इस विशाल गहराई की तुलना में मानव का प्रत्यक्ष भूगर्भिक अन्वेषण आश्चर्यजनक रूप से सतही रहा है: दक्षिण अफ्रीका की म्पोनेन्ग सोने की खान बमुश्किल ३.९ से ४.० किमी गहरी है (जहाँ चट्टानों का तापमान ६६°C तक पहुँच जाता है), और रूस के कोला प्रायद्वीप में खोदा गया विश्व का सबसे गहरा वैज्ञानिक बोरहोल (SG-3) १२,२६२ मीटर (लगभग १२.३ किमी) तक ही पहुँच सका, जहाँ तापमान १८०°C तक पहुँचने के कारण ड्रिलिंग रोकनी पड़ी। इसका अर्थ है कि मानव प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी की त्रिज्या के ०.१९% भाग तक ही पहुँच सका है! अतः पृथ्वी के गहरे अंतरतम का अध्ययन परोक्ष भूभौतिकीय प्रमाणों पर निर्भर है: ज्वालामुखीय मैग्मा और ज़ेनोनिथ, भू-तापीय प्रवणता (प्रति ३२-३३ मीटर गहराई पर १°C तापमान वृद्धि), पृथ्वी का औसत घनत्व (५.५१७ ग्राम/सेमी³), भू-चुंबकत्व, उल्कापिंडों का संघटन और सबसे प्रमुख भूकंपीय तरंगों (P एवं S तरंगें) का परावर्तन व अपवर्तन। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को तीन संकेंद्री परतों में विभाजित किया गया है: (१) भूपर्पटी (Crust, ०-३५ किमी), जो कॉनराड असंबद्धता द्वारा ग्रेनाइटिक सियाल (SIAL) और बेसाल्टिक सिमा (SIMA) में विभाजित है; (२) मेंटल या मैंटल (गुरुमण्डल, ३५-२,९०० किमी), जो मोहोरोविसिक (मोहो) असंबद्धता द्वारा भूपर्पटी से अलग होता है, जिसमें दुर्बलतामंडल (एस्थेनोस्फीयर, १००-२५० किमी), ऊपरी मेंटल क्रोफेसिमा (CROFESIMA, ३५-७०० किमी), रेपिटी असंबद्धता (७०० किमी) और निचला मेंटल निफेसिमा (NIFESIMA, ७००-२,९०० किमी) शामिल हैं; तथा (३) क्रोड या केन्द्रमण्डल (Core / Barysphere, २,९००-६,३७१ किमी), जो गुटेनबर्ग असंबद्धता द्वारा मेंटल से अलग होता है, जिसमें पिघला हुआ बाह्य क्रोड (Outer Core, २,९००-५,१५० किमी, जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का भू-डायनेमो है) और लेहमैन असंबद्धता द्वारा पृथक ठोस आंतरिक क्रोड (Inner Core, ५,१५०-६,३७१ किमी) शामिल है, जहाँ ३६ लाख वायुमंडलीय दबाव के कारण ५,०००°-६,०००°C के भीषण तापमान पर भी लोहा ठोस क्रिस्टलीय अवस्था में विद्यमान रहता है। यह अध्याय २५ गहन उपखंडों वाले ५ मॉड्यूल्स, ९२०x५२० रिस्पॉन्सिव वेक्टर SVG संप्रत्यय मानचित्र, ८ वैज्ञानिक सूत्रों, ८ हल किए गए प्रामाणिक उदाहरणों, ७ परीक्षार्थी ट्रैप चेतावनियों, ८ मुख्य सारांश बिंदुओं, ८ महत्वपूर्ण निष्कर्षों, ५ विस्तृत स्व-मूल्यांकन प्रश्नों एवं ५ आधुनिक CBT बहुविकल्पीय प्रश्नों (MCQ) से सुसज्जित है।

🔥 पृथ्वी के केंद्र की यात्रा: हमारे पैरों के नीचे आखिर क्या छिपा है?

क्या आप जानते हैं कि यदि पृथ्वी की तुलना एक सामान्य सेब (Apple) से की जाए, तो वह ठोस पथरीली भूपर्पटी जिस पर सारे महाद्वीप, महासागर और मानव सभ्यताएं बसी हैं, सेब के पतले छिलके से भी अधिक बारीक है?

हमारे पैरों के हजारों किलोमीटर नीचे सूर्य की सतह जितना खौलता हुआ नरक (६,०००°C) धधक रहा है, जहाँ दबाव सतह की तुलना में लाखों गुना अधिक है। दक्षिण अफ्रीका में सोने की खदान में ४ किलोमीटर नीचे काम करने वाले खनिकों को ६६°C गर्म चट्टानों के बीच जीवित रखने के लिए सतह से बर्फ का घोल पाइपों द्वारा नीचे पंप किया जाता है। रूस में कोला प्रायद्वीप पर जब वैज्ञानिकों ने १२.३ किमी गहरा गड्ढा खोदा, तो उनके टंगस्टन ड्रिल बिट मक्खन की तरह पिघलने लगे!

भूवैज्ञानिकों को कैसे पता चला कि हमारे पैरों के नीचे पिघले हुए सफेद-गर्म लोहे का एक अथाह समंदर हिलोरें ले रहा है जो हमें अंतरिक्ष के जानलेवा सौर तूफानों से बचाता है? आइए पृथ्वी के संकेंद्री मंडलों में उतरें और पृथ्वी की आंतरिक संरचना के रोमांचक रहस्यों को उजागर करें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 भूगोल पाठ्यक्रम "हमारा पृथ्वी" (Our Earth) के प्रथम अध्याय "पृथ्वी की आंतरिक संरचना" (Interior of the Earth / অধ্যায় ১: পৃথিবীর অন্দরমহল / अध्याय १: पृथ्वी का अंतरतम) के संपूर्ण, प्रामाणिक एवं विस्तृत अध्ययन मार्गदर्शिका में आपका स्वागत है। हमारी पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग ४.६ अरब (४६० करोड़) वर्ष पूर्व सौर निहारिका (Solar Nebula) के गुरुत्वीय संकुचन एवं धूल-कणों के संचयन से हुई थी। अपनी प्रारंभिक पिघली हुई तप्त अवस्था में गुरुत्वीय विभेदीकरण (Gravitational Differentiation) की प्रक्रिया द्वारा भारी धात्विक तत्व (जैसे लोहा और निकल) केंद्र की ओर डूब गए और केंद्रीय क्रोड का निर्माण किया, जबकि हल्के सिलिकेट खनिज तैरकर सतह पर आ गए और ठंडे होकर पतली भूपर्पटी (Crust) के रूप में जम गए। पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग ६,३७१ किमी (भूमध्यरेखीय त्रिज्या ६,३७८ किमी, ध्रुवीय त्रिज्या ६,३५७ किमी) है। इस विशाल गहराई की तुलना में मानव का प्रत्यक्ष भूगर्भिक अन्वेषण आश्चर्यजनक रूप से सतही रहा है: दक्षिण अफ्रीका की म्पोनेन्ग सोने की खान बमुश्किल ३.९ से ४.० किमी गहरी है (जहाँ चट्टानों का तापमान ६६°C तक पहुँच जाता है), और रूस के कोला प्रायद्वीप में खोदा गया विश्व का सबसे गहरा वैज्ञानिक बोरहोल (SG-3) १२,२६२ मीटर (लगभग १२.३ किमी) तक ही पहुँच सका, जहाँ तापमान १८०°C तक पहुँचने के कारण ड्रिलिंग रोकनी पड़ी। इसका अर्थ है कि मानव प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी की त्रिज्या के ०.१९% भाग तक ही पहुँच सका है! अतः पृथ्वी के गहरे अंतरतम का अध्ययन परोक्ष भूभौतिकीय प्रमाणों पर निर्भर है: ज्वालामुखीय मैग्मा और ज़ेनोनिथ, भू-तापीय प्रवणता (प्रति ३२-३३ मीटर गहराई पर १°C तापमान वृद्धि), पृथ्वी का औसत घनत्व (५.५१७ ग्राम/सेमी³), भू-चुंबकत्व, उल्कापिंडों का संघटन और सबसे प्रमुख भूकंपीय तरंगों (P एवं S तरंगें) का परावर्तन व अपवर्तन। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को तीन संकेंद्री परतों में विभाजित किया गया है: (१) भूपर्पटी (Crust, ०-३५ किमी), जो कॉनराड असंबद्धता द्वारा ग्रेनाइटिक सियाल (SIAL) और बेसाल्टिक सिमा (SIMA) में विभाजित है; (२) मेंटल या मैंटल (गुरुमण्डल, ३५-२,९०० किमी), जो मोहोरोविसिक (मोहो) असंबद्धता द्वारा भूपर्पटी से अलग होता है, जिसमें दुर्बलतामंडल (एस्थेनोस्फीयर, १००-२५० किमी), ऊपरी मेंटल क्रोफेसिमा (CROFESIMA, ३५-७०० किमी), रेपिटी असंबद्धता (७०० किमी) और निचला मेंटल निफेसिमा (NIFESIMA, ७००-२,९०० किमी) शामिल हैं; तथा (३) क्रोड या केन्द्रमण्डल (Core / Barysphere, २,९००-६,३७१ किमी), जो गुटेनबर्ग असंबद्धता द्वारा मेंटल से अलग होता है, जिसमें पिघला हुआ बाह्य क्रोड (Outer Core, २,९००-५,१५० किमी, जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का भू-डायनेमो है) और लेहमैन असंबद्धता द्वारा पृथक ठोस आंतरिक क्रोड (Inner Core, ५,१५०-६,३७१ किमी) शामिल है, जहाँ ३६ लाख वायुमंडलीय दबाव के कारण ५,०००°-६,०००°C के भीषण तापमान पर भी लोहा ठोस क्रिस्टलीय अवस्था में विद्यमान रहता है। यह अध्याय २५ गहन उपखंडों वाले ५ मॉड्यूल्स, ९२०x५२० रिस्पॉन्सिव वेक्टर SVG संप्रत्यय मानचित्र, ८ वैज्ञानिक सूत्रों, ८ हल किए गए प्रामाणिक उदाहरणों, ७ परीक्षार्थी ट्रैप चेतावनियों, ८ मुख्य सारांश बिंदुओं, ८ महत्वपूर्ण निष्कर्षों, ५ विस्तृत स्व-मूल्यांकन प्रश्नों एवं ५ आधुनिक CBT बहुविकल्पीय प्रश्नों (MCQ) से सुसज्जित है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • घनत्व (Density = द्रव्यमान / आयतन) और गुरुत्वीय विभेदीकरण का आधारभूत ज्ञान (भारी पदार्थ नीचे बैठते हैं और हल्के ऊपर तैरते हैं)।
  • ऊष्मा संचरण के प्रकार: ठोस चट्टानों में चालन (Conduction) तथा श्यान तरल में संवहन (Convection) तरंगों का प्रवाह।
  • भूकंपीय तरंगों की मूल प्रकृति: अनुदैर्ध्य प्राथमिक तरंगें (P-waves) बनाम अनुप्रस्थ द्वितीयक अपरूपण तरंगें (S-waves)।
  • पृथ्वी के भौगोलिक आयाम: औसत त्रिज्या (लगभग ६,३७१ किमी) तथा परिधि (लगभग ४०,००० किमी)।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • ४.६ अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी की तापीय उत्पत्ति और गुरुत्वीय विभेदीकरण (Gravitational Differentiation) की प्रक्रिया को स्पष्ट करना।
  • पृथ्वी के अंतरतम को जानने के प्रत्यक्ष (खनन, बोरहोल, मैग्मा) और परोक्ष (भूकंपीय तरंगें, घनत्व, उल्कापिंड, भू-चुंबकत्व) स्रोतों में अंतर करना।
  • भू-तापीय प्रवणता (प्रति ३२ मीटर पर १°C वृद्धि) का विश्लेषण करना और विभिन्न गहराइयों पर भूगर्भिक तापमान की गणना करना।
  • भूपर्पटी की संरचना को समझना तथा महाद्वीपीय भूपर्पटी (सियाल / SIAL, ग्रेनाइटिक, २.७ ग्राम/सेमी³) और महासागरीय भूपर्पटी (सिमा / SIMA, बेसाल्टिक, ३.० ग्राम/सेमी³) की तुलना करना।
  • मेंटल (गुरुमण्डल) की संरचना, दुर्बलतामंडल (एस्थेनोस्फीयर, १००-२५० किमी), क्रोफेसिमा (३५-७०० किमी) और निफेसिमा (७००-२,९०० किमी) का वैज्ञानिक परीक्षण करना।
  • तरल बाह्य क्रोड (२,९००-५,१५० किमी) और ठोस आंतरिक क्रोड (५,१५०-६,३७१ किमी) में भेद करना तथा भू-डायनेमो (Geodynamo) चुंबकीय प्रभाव को स्पष्ट करना।
  • पांच प्रमुख भूकंपीय असंबद्धताओं (Discontinuities) को "C-M-R-G-L" सूत्र द्वारा कंठस्थ करना: कॉनराड, मोहो, रेपिटी, गुटेनबर्ग और लेहमैन।
  • भूकंपीय तरंगों के वेग आरेख ($v_p$ और $v_s$) का मूल्यांकन करना और यह सिद्ध करना कि S-तरंग छाया क्षेत्र तरल बाह्य क्रोड का अकाट्य प्रमाण है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 १. पृथ्वी की तापीय उत्पत्ति, भूगर्भ...
2 २. भूपर्पटी (Crust) एवं स्थलमंडल (L...
3 ३. मेंटल या गुरुमण्डल (Mantle) एवं...
4 ४. क्रोड या केन्द्रमण्डल (Core / Ba...
5 ५. भूकंपीय अनुसंधान, असंबद्धता सारण...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

१. पृथ्वी की तापीय उत्पत्ति, भूगर्भिक अन्वेषण की सीमाएँ एवं भू-तापीय गतिकी

१.१ पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आदिम तापीय विकास

हमारी पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग ४.६ अरब वर्ष पूर्व (४६० करोड़ वर्ष पूर्व) सौर निहारिका में घूमते हुए गैस, धूल-कणों और ग्रहाणुओं (Planetesimals) के गुरुत्वीय संचयन एवं संघनन से हुई थी। अपने प्रारंभिक भूवैज्ञानिक काल (हेडियन ईऑन) में निरंतर उल्कापिंडों की बमबारी, गुरुत्वीय संपीड़न और अल्पकालिक रेडियोधर्मी समस्थानिकों के विखंडन से इतनी प्रचंड ऊष्मा उत्पन्न हुई कि नवजात पृथ्वी पूरी तरह पिघलकर एक धधकते हुए तरल गोले में परिवर्तित हो गई।

इस तरल पिघली अवस्था में गुरुत्वीय विभेदीकरण (Gravitational Differentiation) की एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया घटित हुई:

  • अधिक घनत्व वाले भारी धात्विक तत्व—मुख्य रूप से लोहा ($\text{Fe}$) और निकल ($\text{Ni}$)—गुरुत्वाकर्षण के कारण केंद्र की ओर डूब गए और पृथ्वी के क्रोड या केन्द्रमण्डल (Core) का निर्माण किया।
  • मध्यम घनत्व वाले फेरोमैग्नेशियन सिलिकेट खनिज क्रोड के चारों ओर जमा होकर मोटे मेंटल या गुरुमण्डल (Mantle) के रूप में विकसित हुए।
  • कम घनत्व वाले हल्के एल्युमिनोसिलिकेट तत्व (सिलिका, एल्युमिनियम और पोटेशियम युक्त) तैरकर सतह पर आ गए, जहाँ अंतरिक्ष में ऊष्मा विकीर्ण करके वे ठंडे और क्रिस्टलीकृत होकर एक पतली, कठोर पथरीली परत बन गए—जिसे भूपर्पटी (Crust) कहा जाता है।

१.२ प्रत्यक्ष मानवीय अन्वेषण की सीमाएँ बनाम पृथ्वी का पैमाना

पृथ्वी एक चपटा लध्वक्ष गोलाभ (Oblate Spheroid) है जिसकी औसत त्रिज्या $R_{\oplus} \approx ६,३७१\text{ किमी}$ है (भूमध्यरेखीय त्रिज्या $= ६,३७८\text{ किमी}$; ध्रुवीय त्रिज्या $= ६,३५७\text{ किमी}$)। इस विशाल आयाम की तुलना में मानव द्वारा किया गया प्रत्यक्ष भौतिक अन्वेषण अत्यंत अल्प और सतही है:

अन्वेषण की उपलब्धि अधिकतम प्राप्त गहराई भूगर्भिक वातावरण व परिस्थितियाँ ग्रह के संदर्भ में अनुपात
गहरीतम खनन परियोजना (म्पोनेन्ग स्वर्ण खदान, दक्षिण अफ्रीका) $३.९\text{ से }४.०\text{ किमी}$ चट्टानों का तापमान ६६°C तक पहुँच जाता है; खनिकों को जीवित रखने के लिए सतह से बर्फ का घोल पाइपों से भेजा जाता है। पृथ्वी की त्रिज्या का मात्र ०.०६% भाग।
गहरा वैज्ञानिक बोरहोल (कोला सुपरडीप बोरहोल SG-3, रूस) $१२,२६२\text{ मीटर} \approx १२.३\text{ किमी}$ ड्रिलिंग में २४ वर्ष लगे (१९७०-१९९४)। तलहटी में तापमान १८०°C पहुँच गया (अनुमानित १००°C से कहीं अधिक), जिससे ड्रिल बिट्स प्लास्टिक की तरह मुड़ने लगे। पृथ्वी के केंद्र तक की दूरी का मात्र ०.१९% भाग!

१.३ भूभौतिकीय साक्ष्य: प्रत्यक्ष बनाम परोक्ष स्रोत

चूँकि मानव पृथ्वी के ६,३७१ किमी गहरे अंतरतम में १२.३ किमी से अधिक गहरा छेद नहीं कर सका है, इसलिए वैज्ञानिक दो प्रकार के साक्ष्यों के आधार पर आंतरिक संरचना का पता लगाते हैं:

  • प्रत्यक्ष स्रोत (Direct Sources):
    • सतही चट्टानें व नमूने: खनन से प्राप्त शैल नमूने, समुद्री तली की ड्रिलिंग से निकाले गए क्रोड।
    • ज्वालामुखीय मैग्मा व ज़ेनोनिथ (Xenoliths): ज्वालामुखीय उद्गार से निकलने वाला पिघला लावा तथा उसके साथ १०० से २०० किमी गहराई से बिना पिघले ऊपर आने वाले मेंटल के मूल शैल खंड (जैसे किम्बरलाइट पाइप्स में मिलने वाले हीरे)।
  • परोक्ष स्रोत (Indirect Sources):
    • भू-तापीय प्रवणता (Geothermal Gradient): गहराई के साथ तापमान, दबाव और घनत्व में निरंतर वृद्धि का मापन।
    • ग्रह का औसत घनत्व: न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम से पृथ्वी का औसत घनत्व $५.५१७\text{ ग्राम/सेमी}^३$ सिद्ध होता है। चूँकि सतही चट्टानों का घनत्व मात्र २.७-३.० ग्राम/सेमी³ है, अतः अंतरतम निश्चित रूप से अत्यधिक भारी ($>१०-१३\text{ ग्राम/सेमी}^३$) पदार्थों से बना है।
    • उल्कापिंड (Meteorites): अंतरिक्ष से गिरने वाले उल्कापिंडों का पदार्थ पृथ्वी के समकालीन है; लौह-उल्कापिंड पृथ्वी के धात्विक क्रोड का साक्षात् प्रमाण हैं।
    • भू-चुंबकत्व (Geomagnetism): पृथ्वी का द्विध्रुवीय चुंबकीय क्षेत्र प्रमाणित करता है कि अंतरतम में विद्युत चालक पिघला हुआ धातु निरंतर घूम रहा है (भू-डायनेमो)।
    • भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves): भूकंप के समय उत्पन्न होने वाली प्राथमिक (P) और द्वितीयक (S) तरंगों की गति और दिशा में होने वाले परिवर्तन पृथ्वी के एक्सरे (X-ray) की तरह आंतरिक परतों का सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं।

१.४ भू-तापीय प्रवणता एवं भूगर्भिक ऊष्मा के स्रोत

सतह से पृथ्वी के अंतरतम की ओर जाने पर जिस दर से तापमान में वृद्धि होती है, उसे भू-तापीय प्रवणता (Geothermal Gradient) कहा जाता है। ऊपरी महाद्वीपीय भूपर्पटी में तापमान वृद्धि की औसत दर है:

$$\text{भू-तापीय प्रवणता} \approx \text{प्रति } ३२-३३\text{ मीटर गहराई पर } १^\circ\text{C} \quad (\approx ३०^\circ\text{C प्रति किलोमीटर})$$

पृथ्वी के अंतरतम में ऊष्मा के प्रमुख स्रोत:

  1. आदिम अवशिष्ट ऊष्मा (Primordial Heat): पृथ्वी के निर्माण के समय ग्रहाणुओं की टक्कर और गुरुत्वीय संकुचन से संचित विशाल ऊष्मा, जो बाह्य चट्टानी परतों के कुचालक होने के कारण आज भी अंतरतम में सुरक्षित है।
  2. रेडियोधर्मी क्षय की ऊष्मा (Radioactive Decay Heat): चट्टानों और खनिजों में उपस्थित अस्थिर रेडियोधर्मी समस्थानिकों (यूरेनियम-$^{२३८}\text{U}$, थोरियम-$^{२३२}\text{Th}$, पोटेशियम-$^{४०}\text{K}$) के स्वतः विखंडन से निरंतर उत्सर्जित होने वाली नाभिकीय ऊष्मा।
  3. क्रिस्टलीकरण की गुप्त ऊष्मा: तरल बाह्य क्रोड के जमने से आंतरिक क्रोड की सतह पर मुक्त होने वाली ऊष्मा।

विशेष ध्यान दें: यदि ३०°C/किमी की यह सतही वृद्धि दर पृथ्वी के केंद्र (६,३७१ किमी) तक सीधी जारी रहती, तो केंद्र का तापमान १,९०,०००°C से अधिक हो जाता! वास्तव में स्थलमंडल के नीचे मेंटल में संवहन धाराओं के कारण तापमान वृद्धि की दर बहुत धीमी हो जाती है और केंद्र में तापमान लगभग ५,०००° से ६,०००°C के बीच स्थिर रहता है।

१.५ भू-तापीय बहिर्प्रकटीकरण: उष्ण जलप्रस्रवण एवं गिजार

जब भूमिगत जल गहरी दरारों से होकर नीचे जाता है और तप्त मैग्मा या रेडियोधर्मी चट्टानों के संपर्क में आता है, तो वह अत्यधिक गर्म हो जाता है:

  • उष्ण जलप्रस्रवण या गर्म कुंड (Hot Springs): जब भूगर्भ में गर्म हुआ जल सामान्य दबाव के साथ धरातल पर शांतिपूर्वक झरने के रूप में बाहर बहता है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित बक्रेश्वर (Bakreshwar) का अग्नि कुंड इसका प्रसिद्ध उदाहरण है (तापमान $\approx ८०^\circ\text{C}$, सल्फर, रेडॉन और हीलियम युक्त औषधीय जल)। हिमाचल प्रदेश का मणिकरण (Manikaran) ($९५^\circ\text{C}$) भी प्रसिद्ध गर्म कुंड है।
  • गिजार या उष्णोत्स (Geysers): जब अत्यधिक संकीर्ण नली में भूगर्भिक जल १००°C से अधिक खौल जाता है और भाप के भयानक दबाव से निश्चित समयांतराल पर उबलते पानी और वाष्प के विशाल फव्वारे के रूप में आकाश की ओर फूट पड़ता है (जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका के येलोस्टोन नेशनल पार्क का ओल्ड फेथफुल / Old Faithful गिजार)।

२. भूपर्पटी (Crust) एवं स्थलमंडल (Lithosphere)

२.१ भूपर्पटी की संरचना एवं आयाम

भूपर्पटी (Crust / भूत्वक) पृथ्वी की सबसे बाहरी, ठोस और भंगुर चट्टानी परत है। यद्यपि समस्त स्थलीय जीवन, मानव सभ्यता और जैवमंडल इसी परत पर स्थित हैं, फिर भी यह पृथ्वी के कुल आयतन का १% से भी कम और कुल द्रव्यमान का मात्र ०.५% भाग घेरती है। भूपर्पटी की मोटाई सभी स्थानों पर एक समान नहीं है:

  • महासागरों के नीचे: अत्यंत पतली, औसतन मात्र ५ से १० किमी।
  • महाद्वीपीय मैदानों और पठारों के नीचे: मध्यम मोटी, औसतन ३० से ५० किमी।
  • नवीन वलित पर्वतों के नीचे (जैसे हिमालय, ऐंडीज): अत्यधिक मोटी, गहरी समस्थितिक जड़ों (Isostatic roots) के कारण ७० से ७५ किमी तक गहरी।

२.२ महाद्वीपीय भूपर्पटी (सियाल / SIAL)

ऊपरी महाद्वीपीय भूपर्पटी को वैज्ञानिक शब्दावली में सियाल (SIAL) कहा जाता है। यह नामकरण इसके दो प्रमुख रासायनिक तत्वों के आधार पर किया गया है: सिलिका ($\text{Si}$) और एल्युमिनियम ($\text{Al}$)।

  • शैल संघटन: हल्के रंग की, अम्लीय (Felsic), स्थूलकणीय आग्नेय शैल ग्रेनाइट (Granite) तथा ग्रेनोडायराइट की प्रधानता।
  • औसत घनत्व: अपेक्षाकृत हल्का, औसतन लगभग २.७ ग्राम/सेमी³।
  • मोटाई: महाद्वीपीय ढालों के नीचे ३० किमी से लेकर पर्वतों के नीचे ७० किमी तक; गहरे महासागरीय नितल पर सियाल पूरी तरह अनुपस्थित होता है।
  • भूवैज्ञानिक आयु: प्राचीन, ३.८ से ४.० अरब वर्ष पुरानी चट्टानें (जैसे कनाडा की अकास्टा नीस, भारत का सिंहभूम क्रेटॉन)।

२.३ महासागरीय भूपर्पटी (सिमा / SIMA)

निचली निरंतर भूपर्पटी और महासागरीय नितल को वैज्ञानिक रूप से सिमा (SIMA) कहा जाता है। यह नाम सिलिका ($\text{Si}$) और मैग्नीशियम ($\text{Mg}$) के प्रथम अक्षरों को जोड़कर बना है।

  • शैल संघटन: गहरे काले रंग की, भारी, क्षारीय (Mafic), सूक्ष्मकणीय ज्वालामुखीय शैल बेसाल्ट (Basalt) एवं गैब्रो की प्रधानता।
  • औसत घनत्व: अपेक्षाकृत भारी, औसतन लगभग ३.० ग्राम/सेमी³।
  • मोटाई: अत्यंत पतली, मात्र ५ से १० किमी।
  • निरंतरता: यह समस्त महासागरों के नितल का निर्माण करती है और हल्के महाद्वीपीय सियाल के नीचे भी क्षैतिज रूप से निरंतर फैली हुई है।
  • भूवैज्ञानिक आयु: भूवैज्ञानिक दृष्टि से नवीन (२० करोड़ वर्ष से कम पुरानी), क्योंकि मध्य-महासागरीय कटकों पर नवीन सिमा बनती रहती है और गर्तों में सबडक्शन द्वारा मेंटल में नष्ट होती रहती है।

२.४ कॉनराड असंबद्धता (Conrad Discontinuity)

१९२५ ईस्वी में ऑस्ट्रियाई भूकंपविज्ञानी विक्टर कॉनराड (Victor Conrad) ने महाद्वीपीय भूपर्पटी के भीतर भूकंपीय तरंगों की गति में अचानक परिवर्तन की खोज की। हल्के ग्रेनाइटिक ऊपरी सियाल (SIAL) को भारी बेसाल्टिक निचले सिमा (SIMA) से अलग करने वाली सीमा रेखा को कॉनराड असंबद्धता कहा जाता है।

  • गहराई: महाद्वीपों के नीचे १५ से २० किमी की गहराई पर स्थित।
  • भूकंपीय वेग में छलांग: प्राथमिक भूकंपीय तरंगों ($v_p$) की गति सियाल में लगभग ६.० किमी/सेकंड से बढ़कर सिमा में ६.६-६.८ किमी/सेकंड हो जाती है।
  • विशेषता: यह असंबद्धता केवल महाद्वीपों के नीचे पाई जाती है; महासागरों के नीचे यह अनुपस्थित होती है क्योंकि वहाँ सियाल परत नहीं होती।

२.५ स्थलमंडल (Lithosphere / अश्ममंडल)

ग्रीक शब्द 'लिथोस' (Lithos = पत्थर) से व्युत्पन्न, यांत्रिकी की दृष्टि से स्थलमंडल (Lithosphere) पृथ्वी का सबसे बाहरी ठंडा, कठोर एवं दृढ़ चट्टानी खोल है, जो निम्न दो परतों से मिलकर बना है:

$$\text{स्थलमंडल} = \text{संपूर्ण भूपर्पटी (सियाल + सिमा)} + \text{ऊपरी मेंटल का सबसे ऊपरी ठोस कठोर भाग}$$

स्थलमंडल की औसत मोटाई लगभग १०० किमी है (महासागरों के नीचे ५०-१०० किमी, प्राचीन महाद्वीपीय क्रेटॉन के नीचे १५०-२०० किमी)। यह स्थलमंडल कई विशाल और लघु खंडों में टूटा हुआ है जिन्हें विवर्तनिक प्लेटें (Tectonic Plates) कहा जाता है, जो नीचे स्थित तप्त, लचीले दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) पर तैरती हैं।

३. मेंटल या गुरुमण्डल (Mantle) एवं दुर्बलतामंडल (Asthenosphere)

३.१ मेंटल का परिचय एवं ग्रह में इसका योगदान

भूपर्पटी के ठीक नीचे और क्रोड के ऊपर स्थित पृथ्वी की मध्यवर्ती एवं सबसे विशाल संकेंद्री परत को मेंटल या गुरुमण्डल (Mantle) कहा जाता है। यह भूपर्पटी के आधार से लेकर २,९०० किमी की गहराई तक फैली हुई है (इसकी कुल मोटाई लगभग २,८६५ किमी है)।

  • ग्रह में हिस्सेदारी: मेंटल पृथ्वी के कुल आयतन का लगभग ८४% भाग और कुल द्रव्यमान का लगभग ६७% भाग (दो-तिहाई) समाहित करता है।
  • शैल संघटन: यह भारी, अल्ट्रा-मैफिक (अति-क्षारीय) सिलिकेट शैलों से निर्मित है जिसमें मैग्नीशियम व लोहे से भरपूर पेरिडोटाइट (Peridotite) शैल (ऑलिविन और पाइरोक्सिन खनिज) की प्रधानता होती है, जो उच्च दबाव में ब्रिजमेनाइट और रिंगवुडाइट में बदल जाती है।
  • घनत्व विस्तार: ऊपरी भाग में ३.४ ग्राम/सेमी³ से बढ़कर तलहटी में ५.६ ग्राम/सेमी³ तक पहुँच जाता है।

३.२ मोहोरोविसिक असंबद्धता / मोहो (Mohorovičić Discontinuity / Moho)

१९०९ ईस्वी में क्रोएशियाई मौसमविद् एवं भूकंपविज्ञानी आंद्रिया मोहोरोविसिक (Andrija Mohorovičić) ने जगरेब के पास आए भूकंप के सीस्मोग्राम का विश्लेषण करते हुए पाया कि दूरस्थ स्टेशनों पर भूकंपीय तरंगें अपेक्षा से पहले पहुँच रही थीं। भूपर्पटी (Crust) को मेंटल (Mantle) से पृथक करने वाली इस युगांतरकारी सीमा को मोहोरोविसिक असंबद्धता या संक्षेप में मोहो (Moho) कहा जाता है।

भूभौतिकीय मापदंड मोहो के ऊपर (भूपर्पटी) मोहो के नीचे (मेंटल)
प्रमुख शैल संघटन ग्रेनाइट एवं बेसाल्ट (सियाल व सिमा) पेरिडोटाइट (अल्ट्रा-मैफिक लौह-मैग्नीशियम सिलिकेट)
औसत शैल घनत्व २.७ से ३.० ग्राम/सेमी³ ३.३ से ३.४ ग्राम/सेमी³ (अचानक तीव्र वृद्धि)
P-तरंग का वेग ($v_p$) $\approx ६.० - ६.५\text{ किमी/सेकंड}$ $\mathbf{\approx ८.१\text{ किमी/सेकंड}}$ (तुरंत $+३५\%$ की छलांग)
औसत गहराई महासागरों के नीचे ५-१० किमी; मैदानों में ३०-३५ किमी; पर्वतों के नीचे ७० किमी

३.३ ऊपरी मेंटल एवं क्रोफेसिमा (CROFESIMA)

मोहो असंबद्धता (३०-३५ किमी) से लेकर ७०० किमी की गहराई तक के भाग को ऊपरी मेंटल (Upper Mantle) कहा जाता है। इस परत में चार रासायनिक तत्वों की प्रधानता होती है: क्रोमियम ($\text{Cr}$), लोहा ($\text{Fe}$ / Ferrum), सिलिकॉन ($\text{Si}$) और मैग्नीशियम ($\text{Mg}$)। इन तत्वों के प्रतीकों को जोड़कर इसे क्रोफेसिमा (CROFESIMA) कहा जाता है।

  • घनत्व: ३.४ ग्राम/सेमी³ से बढ़कर ४.५ ग्राम/सेमी³ तक।
  • तापमान: ऊपरी भाग में १,०००°C से बढ़कर आधार पर लगभग २,०००°C तक।
  • संक्रमण मंडल (Transition Zone, ४१०-६६० किमी): उच्च दबाव के कारण ऑलिविन खनिज का रूपांतरण वेड्सलेआइट और रिंगवुडाइट में होता है, जिससे भूकंपीय तरंगों की गति में क्रमिक वृद्धि होती है।

३.४ दुर्बलतामंडल (Asthenosphere): प्लेट विवर्तनिकी का चालक इंजन

ऊपरी मेंटल में १०० किमी से २५० किमी की गहराई के बीच स्थित अत्यंत महत्वपूर्ण प्लास्टिक जैसी परत को दुर्बलतामंडल या एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere) कहा जाता है (ग्रीक शब्द 'एस्थेनेस' = दुर्बल या लचीला):

  • भौतिक अवस्था: १,०००° से १,४००°C के उच्च तापमान और मध्यम दबाव के कारण पेरिडोटाइट शैल अपने गलनांक के करीब पहुँच जाती है और उसमें १% से ५% आंशिक पिघलन (Partial Melting) हो जाती है। इससे यह परत जेली, मोम या गर्म डामर (Plastically deformable) जैसी लचीली बन जाती है।
  • निम्न वेग क्षेत्र (Low-Velocity Zone - LVZ): आंशिक पिघलन के कारण इस परत में P और S तरंगों की गति मंद पड़ जाती है, अतः इसे LVZ कहा जाता है।
  • मैग्मा का प्राथमिक स्रोत: जब ऊपर की भूपर्पटी में दरार पड़ती है, तो दबाव घटने से यहाँ की चट्टानें तुरंत पिघलकर मैग्मा बन जाती हैं और ज्वालामुखी के रूप में फूट पड़ती हैं।
  • संवहन धाराएँ: रेडियोधर्मी ताप के कारण इस अर्ध-पिघली परत में तापीय संवहन धाराएँ (Thermal Convection Currents) चक्राकार रूप में चलती हैं, जो इसके ऊपर तैरती दृढ़ स्थलमंडलीय प्लेटों को प्रति वर्ष २ से १० सेमी की गति से खिसकाती हैं।

३.५ रेपिटी असंबद्धता एवं निचला मेंटल / निफेसिमा (NIFESIMA)

लगभग ७०० किमी की गहराई पर ऊपरी मेंटल और निचले मेंटल को अलग करने वाली सीमा रेखा को रेपिटी असंबद्धता (Repetti Discontinuity) कहा जाता है।

रेपिटी असंबद्धता के नीचे ७०० किमी से २,९०० किमी तक का भाग निचला मेंटल (Lower Mantle) कहलाता है:

  • रासायनिक संघटन (NIFESIMA / निफेसिमा): इसमें निकल ($\text{Ni}$), लोहा ($\text{Fe}$ / Ferrum), सिलिकॉन ($\text{Si}$) और मैग्नीशियम ($\text{Mg}$) तत्वों की प्रधानता होती है।
  • भौतिक अवस्था: पूर्णतः ठोस एवं सघन क्रिस्टलीय अवस्था। यहाँ तापमान २,०००° से ३,०००°C तक पहुँच जाता है, किंतु ऊपर की परतों के १३ लाख वायुमंडलीय दबाव के कारण चट्टानें पिघल नहीं पातीं और ठोस अवस्था में बंधी रहती हैं। यहाँ पृथ्वी का सबसे प्रचुर खनिज ब्रिजमेनाइट (Bridgmanite) पाया जाता है।
  • घनत्व: ४.५ ग्राम/सेमी³ से बढ़कर आधार पर ५.६ ग्राम/सेमी³ हो जाता है।

४. क्रोड या केन्द्रमण्डल (Core / Barysphere) एवं भू-चुंबकत्व

४.१ क्रोड का परिचय, संघटन एवं ग्रह में हिस्सेदारी

पृथ्वी का सबसे भीतरी संकेंद्री गोलाकार भाग क्रोड, केन्द्रमण्डल (Core) अथवा गुरुगोलक (Barysphere) कहलाता है। यह २,९०० किमी की गहराई से लेकर पृथ्वी के ठीक केंद्र ६,३७१ किमी तक विस्तृत है (इसकी त्रिज्या लगभग ३,४७१ किमी है)।

  • द्रव्यमान व आयतन की विषमता: क्रोड पृथ्वी के कुल आयतन का मात्र १६% भाग घेरता है, किंतु अपने अत्यधिक धात्विक घनत्व के कारण यह पृथ्वी के कुल द्रव्यमान का लगभग ३२% (लगभग एक-तिहाई) हिस्सा समाहित करता है।
  • रासायनिक संघटन (NIFE / निफे): यह मुख्य रूप से निकल ($\text{Ni}$) और लोहा ($\text{Fe}$ / Ferrum) की भारी मिश्रधातु से बना है, जिसमें ५ से १०% हल्के तत्व (सल्फर, सिलिकॉन, ऑक्सीजन) घुले हुए हैं।

४.२ गुटेनबर्ग असंबद्धता (Gutenberg Discontinuity)

१९१४ ईस्वी में जर्मन-अमेरिकी भूकंपविज्ञानी बेनो गुटेनबर्ग (Beno Gutenberg) ने पृथ्वी के अंतरतम की सबसे नाटकीय सीमा की खोज की: ठोस सिलिकेट निचले मेंटल को पिघले हुए धात्विक बाह्य क्रोड से अलग करने वाली २,९०० किमी गहराई पर स्थित सीमा को गुटेनबर्ग असंबद्धता कहा जाता है।

  • पृथ्वी का सबसे बड़ा घनत्व परिवर्तन: ठोस सिलिकेट शैल ($\approx ५.६\text{ ग्राम/सेमी}^३$) से सीधे भारी तरल लोहे ($\approx ९.९\text{ ग्राम/सेमी}^३$) में परिवर्तन।
  • भूकंपीय व्यवहार:
    • द्वितीयक (S) तरंगें पूर्णतः लुप्त हो जाती हैं: S-तरंगें तरल माध्यम में प्रवाहित नहीं हो सकतीं ($\mu = ०$), अतः वे २,९०० किमी पर पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं, जिससे पृथ्वी पर १०५° से १८०° के बीच S-तरंग छाया क्षेत्र बनता है।
    • प्राथमिक (P) तरंगों का वेग अचानक गिरता है: अपरूपण दृढ़ता समाप्त होने के कारण P-तरंगों की गति मेंटल में १३.७ किमी/सेकंड से अचानक गिरकर तरल क्रोड में ८.१ किमी/सेकंड रह जाती है और वे भीतर की ओर तीव्र रूप से अपवर्तित हो जाती हैं।

४.३ बाह्य क्रोड (Outer Core) एवं भू-डायनेमो प्रभाव

२,९०० किमी से ५,१५० किमी की गहराई तक फैले भाग को बाह्य क्रोड (Outer Core) कहा जाता है। यह सफेद-गर्म खौलते हुए पिघले हुए तरल लोहे और निकल का एक विशाल महासागर है:

  • भौतिक मापदंड: मोटाई $\approx २,२५०\text{ किमी}$; घनत्व $= ९.९\text{ से }१२.२\text{ ग्राम/सेमी}^३$; तापमान $= ३,७००^\circ\text{ से }४,५००^\circ\text{C}$।
  • भू-डायनेमो प्रभाव (Geodynamo Effect): बाह्य क्रोड विद्युत का उत्कृष्ट सुचालक है। आंतरिक क्रोड से उठने वाली प्रचंड तापीय संवहन धाराएँ और पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न कोरिओलिस बल मिलकर इस पिघले लोहे को चक्राकार भंवरों (Helical convective loops) में घुमाते हैं। विद्युत-चुंबकीय प्रेरण के नियमानुसार, घूमता हुआ तरल लोहा विशाल विद्युत धाराएँ उत्पन्न करता है, जिससे पृथ्वी का वैश्विक द्विध्रुवीय चुंबकीय क्षेत्र (Earth's Magnetic Field) उत्पन्न होता है।
  • जीवन के लिए सुरक्षा कवच: यह चुंबकीय क्षेत्र अंतरिक्ष में हजारों किलोमीटर तक फैलकर चुंबकमंडल (Magnetosphere) बनाता है, जो सूर्य से आने वाली जानलेवा सौर पवनों (Solar Wind) और घातक ब्रह्मांडीय किरणों को पृथ्वी से दूर मोड़ देता है। इसके बिना हमारा वायुमंडल और जलवाष्प अंतरिक्ष में उड़ जाते, जैसा कि मंगल ग्रह पर हुआ।

४.४ लेहमैन असंबद्धता (Lehmann Discontinuity)

१९३६ ईस्वी तक वैज्ञानिक यह मानते थे कि पूरा क्रोड पिघला हुआ तरल है। किंतु १९३६ में डेनमार्क की प्रसिद्ध महिला भूकंपविज्ञानी इंग लेहमैन (Inge Lehmann) ने न्यूजीलैंड के भूकंपों की P-तरंगों का अध्ययन करके सिद्ध किया कि क्रोड के केंद्र में एक ठोस गोला स्थित है। तरल बाह्य क्रोड को ठोस आंतरिक क्रोड से अलग करने वाली ५,१५० किमी गहराई पर स्थित सीमा को लेहमैन असंबद्धता कहा जाता है।

४.५ आंतरिक क्रोड (Inner Core): ठोस धात्विक हृदय

५,१५० किमी से पृथ्वी के केंद्र ६,३७१ किमी तक विस्तृत भाग को आंतरिक क्रोड (Inner Core) कहा जाता है। यह लगभग १,२२१ किमी त्रिज्या वाला ठोस क्रिस्टलीय धात्विक गोला है (चंद्रमा के आकार का लगभग ७०%):

  • भौतिक मापदंड: घनत्व $= १३.०\text{ से }१३.६\text{ ग्राम/सेमी}^३$; तापमान $= \mathbf{५,०००^\circ\text{ से }६,०००^\circ\text{C}}$ (सूर्य की सतह जितना तप्त!); दबाव $= \mathbf{३६\text{ लाख वायुमंडलीय दबाव से अधिक} \approx ३६०\text{ GPa}}$।
  • अत्यधिक गर्मी में भी यह ठोस क्यों है? (The Solid Core Paradox): सामान्य वायुमंडलीय दबाव पर लोहा १,५३८°C पर पिघल जाता है। किंतु पृथ्वी के केंद्र में ऊपर की संपूर्ण पृथ्वी के चट्टानी स्तंभों का ३६ लाख वायुमंडलीय दबाव पड़ता है। क्लैपिरॉन नियम के अनुसार, इस अत्यधिक दबाव के कारण लोहे के परमाणु आपस में इतने कसकर बंध जाते हैं कि लोहे का गलनांक बढ़कर ६,२००°C से अधिक हो जाता है। चूँकि वहाँ का वास्तविक तापमान (५,५००°C) इस बढ़े हुए गलनांक से कम है, इसलिए आंतरिक क्रोड पूरी तरह ठोस क्रिस्टलीय अवस्था में विद्यमान रहता है!

५. भूकंपीय अनुसंधान, असंबद्धता सारणी एवं भूगर्भिक संश्लेषण

५.१ पांच प्रमुख भूकंपीय असंबद्धताएँ (C-M-R-G-L स्मृति सूत्र)

पृथ्वी की आंतरिक परतों के बीच पाँच प्रमुख संक्रमण सीमाएँ पाई जाती हैं जहाँ घनत्व और भूकंपीय तरंगों के वेग में अचानक परिवर्तन आता है। विद्यार्थी सतह से केंद्र के क्रम में इन्हें "C-M-R-G-L" सूत्र द्वारा आसानी से याद रख सकते हैं:

सूत्र अक्षर असंबद्धता का नाम खोजकर्ता एवं वर्ष औसत गहराई विभाजित की जाने वाली भूगर्भिक परतें
C कॉनराड असंबद्धता (Conrad) विक्टर कॉनराड (१९२५) १५ - २० किमी ऊपरी महाद्वीपीय सियाल (SIAL) व निचला सिमा (SIMA)
M मोहोरोविसिक / मोहो (Moho) आंद्रिया मोहोरोविसिक (१९०९) ३० - ३५ किमी भूपर्पटी (Crust) एवं मेंटल (Mantle) ($V_p$ ६.० से बढ़कर ८.१ किमी/से.)
R रेपिटी असंबद्धता (Repetti) विलियम रेपिटी (१९३०) $\approx ७००\text{ किमी}$ ऊपरी मेंटल (क्रोफेसिमा) एवं निचला मेंटल (निफेसिमा)
G गुटेनबर्ग असंबद्धता (Gutenberg) बेनो गुटेनबर्ग (१९१४) २,९०० किमी निचला मेंटल एवं बाह्य क्रोड (S-तरंगें बंद, P-तरंगें १३.७ से घटकर ८.१)
L लेहमैन असंबद्धता (Lehmann) इंग लेहमैन (१९३६) ५,१५० किमी तरल बाह्य क्रोड एवं ठोस आंतरिक क्रोड

५.२ पृथ्वी की आंतरिक परतों की विस्तृत तुलनात्मक तालिका

भूगर्भिक परत गहराई का विस्तार भौतिक अवस्था प्रमुख खनिज एवं तत्व घनत्व (ग्राम/सेमी³) तापमान सीमा
सियाल (महाद्वीपीय भूपर्पटी) ० - ३५ किमी कठोर ठोस ग्रेनाइट ($\text{Si, Al}$) २.७ १५° - ५००°C
सिमा (महासागरीय भूपर्पटी) ५ - १० किमी कठोर ठोस बेसाल्ट ($\text{Si, Mg}$) ३.० २००° - ७००°C
दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) १०० - २५० किमी अर्ध-पिघला प्लास्टिक पेरिडोटाइट आंशिक पिघलन (१-५%) ३.४ - ३.५ १,०००° - १,४००°C
क्रोफेसिमा (ऊपरी मेंटल) ३५ - ७०० किमी ठोस / लचीला $\text{Cr, Fe, Si, Mg}$ ३.४ - ४.५ १,०००° - २,०००°C
निफेसिमा (निचला मेंटल) ७०० - २,९०० किमी सघन ठोस ब्रिजमेनाइट ($\text{Ni, Fe, Si, Mg}$) ४.५ - ५.६ २,०००° - ३,०००°C
बाह्य क्रोड (Outer Core) २,९०० - ५,१५० किमी पिघला तरल तरल लोहा व निकल ($\text{Fe-Ni}$) ९.९ - १२.२ ३,७००° - ४,५००°C
आंतरिक क्रोड (Inner Core) ५,१५० - ६,३७१ किमी क्रिस्टलीय ठोस ठोस लोहा व निकल ($\text{Fe-Ni}$) १३.० - १३.६ ५,०००° - ६,०००°C

५.३ भूकंपीय तरंग छाया क्षेत्र: आंतरिक अवस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण

जब किसी स्थान पर भूकंप आता है, तो उसकी भूगर्भिक तरंगें पूरी पृथ्वी में फैलती हैं और सीस्मोग्राफ द्वारा दो विशिष्ट छाया क्षेत्र (Shadow Zones) दर्ज किए जाते हैं:

  • S-तरंग छाया क्षेत्र (१०५° से १८०°): द्वितीयक अनुप्रस्थ तरंगें केवल ठोस माध्यम में चल सकती हैं और तरल में शून्य हो जाती हैं ($\mu = ०$)। जब S-तरंगें २,९०० किमी पर तरल बाह्य क्रोड से टकराती हैं, तो वे पूरी तरह रुक जाती हैं। परिणामस्वरूप, भूकंप अधिकेंद्र से १०५° से परे पृथ्वी के किसी भी भाग (कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल का ४०% से अधिक) में कोई सीधी S-तरंग दर्ज नहीं होती। यह इस बात का अकाट्य वैज्ञानिक प्रमाण है कि बाह्य क्रोड पिघला हुआ तरल है।
  • P-तरंग छाया क्षेत्र (१०५° से १४२°): प्राथमिक अनुदैर्ध्य तरंगें ठोस और तरल दोनों में चल सकती हैं, किंतु तरल बाह्य क्रोड में प्रवेश करते ही उनका वेग १३.७ से घटकर ८.१ किमी/सेकंड रह जाता है, जिससे वे केंद्र की ओर तीव्र रूप से झुक (अपवर्तित हो) जाती हैं। इस अपवर्तन के कारण १०५° और १४२° के बीच एक गोलाकार पट्टी बन जाती है जहाँ कोई सीधी P-तरंग नहीं पहुँच पाती।

५.४ भूगर्भिक संश्लेषण: पृथ्वी का अंतरतम मानव जीवन के लिए क्यों आवश्यक है?

पृथ्वी का धधकता हुआ आंतरिक इंजन धरातल पर जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है:

  1. भू-चुंबकीय सुरक्षा कवच: यदि बाह्य क्रोड में पिघला लोहा न घूमता, तो चुंबकीय क्षेत्र नहीं बनता; घातक सौर पवनें हमारे वायुमंडल और जल को उड़ा ले जातीं और पृथ्वी मंगल की तरह बंजर हो जाती।
  2. प्लेट विवर्तनिकी एवं कार्बन पुनर्चक्रण: एस्थेनोस्फीयर की संवहन धाराएँ महाद्वीपों को गति देती हैं और ज्वालामुखियों व सबडक्शन के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड व खनिजों का पुनर्चक्रण करके जलवायु संतुलन बनाए रखती हैं।
  3. भू-तापीय ऊर्जा एवं उपजाऊ मृदा: भू-तापीय ऊर्जा प्रदूषण-मुक्त बिजली प्रदान करती है और मेंटल से निकले लावा के क्षरण से उपजाऊ काली मृदा (रेगुर) बनती है जो विश्व कृषि का आधार है।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

रैखिक भू-तापीय प्रवणता सूत्र (Linear Geothermal Gradient)
$$G ≈ ०.०३^/मीटर ऊपरी भूपर्पटी में$$
यह नियम केवल ऊपरी ठोस भूपर्पटी (०-१५ किमी) तक ही वैध है; मेंटल और क्रोड में संवहन के कारण तापमान वृद्धि की दर बहुत धीमी हो जाती है।
पृथ्वी का औसत घनत्व समाकलन सूत्र
$$ ≈ ५.५१७ ग्राम/सेमी^३ = ५,५१७ किग्रा/मी^३$$
१७९८ ईस्वी में हेनरी कैवेंडिश ने टॉर्सन बैलेंस प्रयोग द्वारा सर्वप्रथम पृथ्वी का द्रव्यमान और घनत्व सही मापा था।
भूकंपीय P-तरंग वेग एवं प्रत्यास्थता गुणांक
$$v_p ≈ ६.० किमी/से (भूपर्पटी) → ८.१ (मोहो) → १३.७ (मेंटल आधार)$$
स्पष्ट करता है कि बाह्य क्रोड में प्रवेश करते ही P-तरंगों की गति १३.७ से गिरकर ८.१ किमी/सेकंड क्यों हो जाती है।
भूकंपीय S-तरंग वेग एवं तरल अपरूपण प्रमाण
$$v_s = ० बाह्य क्रोड में; v_s ≈ ३.५-७.३ किमी/से ठोस मेंटल में$$
यह समीकरण अकाट्य वैज्ञानिक प्रमाण प्रदान करता है कि पृथ्वी का बाह्य क्रोड पिघली हुई तरल अवस्था में है।
स्थैतिक शैलोपरी दबाव सूत्र (Lithostatic Pressure)
$$P ≈ १.३५ Mbar २,९०० किमी पर; P ≈ ३.६ Mbar केंद्र पर$$
पृथ्वी के केंद्र में दबाव ३६ लाख वायुमंडलीय दबाव (३६० GPa) से अधिक होता है, जो ६,०००°C तापमान पर भी आंतरिक क्रोड को ठोस बनाए रखता है।
एडम्स-विलियमसन ग्रहीय घनत्व समीकरण
$$(r) = {K} (भूकंपीय प्राचल)$$
प्रमाणित करता है कि बिना गहराई में गड्ढा खोदे भूकंपीय तरंगों के वेग से घनत्व का सटीक निर्धारण कैसे होता है।
क्रोड-मेंटल आयतन एवं द्रव्यमान विभाजन अनुपात
$$भूपर्पटी: <१\% आयतन, ≈ ०.५\% द्रव्यमान$$
मेंटल पृथ्वी के आयतन में सबसे बड़ा है (>८३%), जबकि क्रोड मात्र १६% आयतन में लगभग एक-तिहाई द्रव्यमान समेटे हुए है।
आंतरिक क्रोड गलनांक हेतु क्लैपिरॉन समीकरण
$$T_m(लोहा ३६० GPa पर) ≈ ६,२००^ > T_{वास्तविक} (५,५००^)$$
यह नियम स्पष्ट करता है कि आंतरिक क्रोड ठोस क्यों है जबकि उससे कम गर्म बाह्य क्रोड तरल है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
रूस के कोला सुपरडीप बोरहोल (SG-3) को १२,२६२ मीटर की गहराई तक खोदा गया था। यदि औसत सतही तापमान १०°C और ऊपरी भूपर्पटी की औसत भू-तापीय प्रवणता प्रति ३३ मीटर पर १°C मानी जाए, तो: (क) बोरहोल की तलहटी पर सैद्धांतिक तापमान की गणना कीजिए, तथा (ख) इसकी तुलना वास्तविक मापे गए तापमान (१८०°C) से कीजिए और समझाइए कि भूवैज्ञानिक क्यों चकित रह गए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. दिए गए आँकड़े:

  • सतही तापमान $T_0 = १०^\circ\text{C}$
  • बोरहोल की गहराई $z = १२,२६२\text{ मीटर}$
  • सामान्य भू-तापीय प्रवणता $= \frac{१^\circ\text{C}}{३३\text{ मीटर}}$ ($\approx ३०^\circ\text{C/किमी}$)

२. सैद्धांतिक तापमान वृद्धि की गणना: सामान्य महाद्वीपीय दर ($३०^\circ\text{C/किमी}$) से:

$$\Delta T = १२.२६२\text{ किमी} \times ३०^\circ\text{C/किमी} \approx ३६७.८६^\circ\text{C}$$

किंतु बाल्टिक शील्ड जैसे प्राचीन क्रेटॉन ठंडे होते हैं, जहाँ वैज्ञानिकों ने मात्र ७.५°C/किमी वृद्धि का अनुमान लगाया था और तलहटी पर लगभग १००°C तापमान की भविष्यवाणी की थी ($१०^\circ\text{C} + १२.२६ \times ७.५ \approx १००^\circ\text{C}$)।

३. वास्तविक प्रेक्षण से तुलना: वास्तव में १२ किमी पर तापमान १८०°C (३५६°F) दर्ज किया गया, जो वैज्ञानिकों के १००°C के अनुमान से लगभग दोगुना था! इस अप्रत्याशित ताप और हाइड्रोथर्मल तरल पदार्थों के कारण चट्टानें स्पंज जैसी लचीली हो गई थीं और ड्रिल बिट्स मक्खन की तरह मुड़ने लगे, जिसके कारण १९९२ में खुदाई हमेशा के लिए रोकनी पड़ी।

निष्कर्ष: (क) बाल्टिक शील्ड के लिए अनुमानित तापमान लगभग १००°C था। (ख) वास्तविक तापमान १८०°C निकला, जिससे साबित हुआ कि प्राचीन महाद्वीपीय क्रेटॉन में गहराई पर रेडियोधर्मी क्षय से उत्पन्न ऊष्मा पहले के अनुमानों से कहीं अधिक है।

उदाहरण 2
मानव जाति द्वारा खोदे गए सबसे गहरे बोरहोल (कोला सुपरडीप बोरहोल SG-3, गहराई १२.२६२ किमी) ने पृथ्वी की औसत त्रिज्या (६,३७१ किमी) के कितने प्रतिशत भाग को भेदा है? यह तथ्य पृथ्वी के हमारे प्रत्यक्ष ज्ञान के बारे में क्या प्रकट करता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. दिए गए मान:

  • कोला बोरहोल की गहराई $d_{\text{कोला}} = १२.२६२\text{ किमी}$
  • पृथ्वी की औसत त्रिज्या $R_{\oplus} = ६,३७१\text{ किमी}$

२. प्रतिशत गहराई की गणना:

$$\text{प्रतिशत} = \left(\frac{d_{\text{कोला}}}{R_{\oplus}}\right) \times १००\%$$

$$\text{प्रतिशत} = \left(\frac{१२.२६२}{६,३७१}\right) \times १००\% = ०.००१९२४६ \times १००\% \approx \mathbf{०.१९२\%}$$

३. भूवैज्ञानिक निष्कर्ष:

  • मानव जाति पृथ्वी के केंद्र तक की दूरी का एक प्रतिशत का पाँचवाँ हिस्सा (०.१९%) भी मुश्किल से छू पाई है!
  • यह गड्ढा महाद्वीपीय भूपर्पटी (३५ किमी) की एक-तिहाई गहराई तक ही पहुँच सका और कभी मोहो या मेंटल तक नहीं पहुँच पाया।

निष्कर्ष: हमारे पैरों के नीचे की ९९.८% से अधिक पृथ्वी का कभी प्रत्यक्ष भौतिक नमूना नहीं लिया गया है; हमारा सारा गहरा भूवैज्ञानिक ज्ञान परोक्ष भूभौतिकीय विधियों (विशेषकर भूकंपीय तरंगों) से प्राप्त हुआ है।

उदाहरण 3
स्पष्ट कीजिए कि पृथ्वी का क्रोड ग्रह के कुल आयतन का मात्र लगभग १६% भाग घेरने के बावजूद कुल द्रव्यमान के लगभग ३२% भाग का प्रतिनिधित्व क्यों करता है? अपने उत्तर में गुरुत्वीय विभेदीकरण और घनत्व की संकल्पना का प्रयोग कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. आयतन और द्रव्यमान की विषमता:

  • क्रोड का आयतन अनुपात $= \frac{V_{\text{core}}}{V_{\oplus}} \approx १६.२\%$
  • क्रोड का द्रव्यमान अनुपात $= \frac{M_{\text{core}}}{M_{\oplus}} \approx ३१.५\%$

२. गुरुत्वीय विभेदीकरण का प्रभाव:

  • ४.६ अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी की तप्त पिघली अवस्था में गुरुत्वीय विभेदीकरण के कारण भारी धात्विक तत्व (लोहा, घनत्व $\approx ७.९\text{ ग्राम/सेमी}^३$ तथा निकल, घनत्व $\approx ८.९\text{ ग्राम/सेमी}^३$) डूबकर केंद्र में जमा हो गए, जबकि हल्के सिलिकेट तैरकर ऊपर आ गए।

३. घनत्व विषमता एवं अत्यधिक संपीड़न:

  • भूपर्पटी का औसत घनत्व मात्र $\approx २.८\text{ ग्राम/सेमी}^३$ और मेंटल का $\approx ४.५\text{ ग्राम/सेमी}^३$ है।
  • इसके विपरीत क्रोड का घनत्व ९.९ ग्राम/सेमी³ से १३.६ ग्राम/सेमी³ है—जो भूपर्पटीय चट्टानों से ४ से ५ गुना अधिक सघन है!
  • केंद्र में ३६ लाख वायुमंडलीय दबाव के कारण धात्विक परमाणु अत्यंत सघन रूप से संपीडित हैं।

४. गणितीय सत्यापन:

$$\text{द्रव्यमान} = \text{घनत्व} \times \text{आयतन}$$

चूँकि क्रोड का औसत घनत्व ($\approx ११\text{ ग्राम/सेमी}^३$) पृथ्वी के औसत घनत्व ($५.५\text{ ग्राम/सेमी}^३$) का लगभग दोगुना है, अतः आधा आयतन दोगुना द्रव्यमान अनुपात देता है:

$$१६\% \text{ आयतन} \times \frac{११.०}{५.५} \approx ३२\% \text{ द्रव्यमान}$$

निष्कर्ष: भारी धात्विक संरचना ($\text{Fe-Ni}$) और प्रचंड गुरुत्वीय संपीड़न के कारण क्रोड का घनत्व अत्यधिक है, जिससे ग्रह के मात्र छठे हिस्से के आयतन में लगभग एक-तिहाई द्रव्यमान समाहित है।

उदाहरण 4
मोहोरोविसिक असंबद्धता (महाद्वीपों के नीचे ~३५ किमी गहराई) पर प्राथमिक भूकंपीय तरंगों का वेग ($v_p$) निचली भूपर्पटी में ६.० किमी/सेकंड से अचानक छलांग लगाकर ऊपरी मेंटल में ८.१ किमी/सेकंड हो जाता है। ज्ञात कीजिए: (क) तरंग वेग में प्रतिशत वृद्धि, तथा (ख) इस वेग छलांग के लिए उत्तरदायी शैल-वैज्ञानिक (Petrological) कारण स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. दिए गए मान:

  • निचली भूपर्पटी में तरंग वेग $v_1 = ६.०\text{ किमी/से}$
  • ऊपरी मेंटल में तरंग वेग $v_2 = ८.१\text{ किमी/से}$

२. प्रतिशत वृद्धि की गणना:

$$\Delta v = v_2 - v_1 = ८.१ - ६.० = २.१\text{ किमी/से}$$

$$\text{प्रतिशत वृद्धि} = \left(\frac{\Delta v}{v_1}\right) \times १००\% = \left(\frac{२.१}{६.०}\right) \times १००\% = \mathbf{३५.०\%}$$

३. वेग वृद्धि का शैल-वैज्ञानिक कारण:

  • तरंग भौतिकी के अनुसार: $v_p = \sqrt{\frac{K + \frac{४}{३}\mu}{\rho}}$।
  • मोहो के ऊपर भूपर्पटी बेसाल्ट/ग्रेनाइट शैलों (सिमा/सियाल) से बनी है जिनका घनत्व $\approx ३.०\text{ ग्राम/सेमी}^३$ और आयतन प्रत्यास्थता ($K$) मध्यम है।
  • मोहो के ठीक नीचे रासायनिक संघटन में भारी परिवर्तन होता है: मेंटल अल्ट्रा-मैफिक पेरिडोटाइट शैल (सघन ऑलिविन व पाइरोक्सिन खनिज) से बना है जिसका घनत्व ३.३-३.४ ग्राम/सेमी³ है।
  • पेरिडोटाइट की क्रिस्टलीय बनावट के कारण इसका आयतन प्रत्यास्थता गुणांक ($K$) और अपरूपण दृढ़ता ($\mu$) बहुत तेजी से बढ़ती है, जो घनत्व वृद्धि की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी होती है। इसके फलस्वरूप तरंग वेग में तुरंत $+३५\%$ का उछाल आता है।

निष्कर्ष: (क) P-तरंग के वेग में ३५.०% की छलांग लगती है। (ख) यह तीव्र उछाल भूपर्पटीय बेसाल्ट से मेंटल के सघन पेरिडोटाइट शैल में संक्रमण का सूचक है।

उदाहरण 5
गुटेनबर्ग असंबद्धता (मेंटल के आधार पर २,९०० किमी गहराई) पर शैलोपरी स्थैतिक दबाव का अनुमान लगाइए, यह मानते हुए कि मेंटल का औसत घनत्व $\bar{\rho} = ४,५००\text{ किग्रा/मी}^३$ और गुरुत्वीय त्वरण $g = १०\text{ मी/से}^२$ है। परिणाम को पास्कल और मेगाबार (Mbar) में व्यक्त कीजिए तथा सामान्य वायुमंडलीय दबाव ($१\text{ atm} \approx १०^५\text{ Pa}$) से इसकी तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. दिए गए मान:

  • गहराई $z = २,९००\text{ किमी} = २,९००,०००\text{ मीटर} = २.९ \times १०^६\text{ मी}$
  • औसत मेंटल घनत्व $\bar{\rho} \approx ४,५००\text{ किग्रा/मी}^३$
  • औसत गुरुत्वीय त्वरण $g \approx १०\text{ मी/से}^२$

२. स्थैतिक दबाव सूत्र लागू करने पर:

$$P = \bar{\rho} \cdot g \cdot z$$

$$P = ४,५००\text{ किग्रा/मी}^३ \times १०\text{ मी/से}^२ \times २.९ \times १०^६\text{ मी} = १.३०५ \times १०^{११}\text{ पास्कल (Pa)}$$

३. गीगापास्कल (GPa) और मेगाबार (Mbar) में रूपांतरण:

$$१\text{ GPa} = १०^९\text{ Pa} \implies P \approx १३०.५\text{ GPa}$$

$$१\text{ bar} = १०^५\text{ Pa} \implies P = \frac{१.३०५ \times १०^{११}}{१०^५} = १.३०५ \times १०^६\text{ bar} \approx \mathbf{१.३\text{ मेगाबार (Mbar)}}$$

(सटीक PREM भूभौतिकीय मॉडल गणना से यह मान लगभग १३६ GPa अर्थात १.३५ Mbar प्राप्त होता है)।

४. सतही वायुमंडलीय दबाव से तुलना:

$$१\text{ वायुमंडल (atm)} \approx १०^५\text{ Pa}$$

$$\text{अनुपात} = \frac{१.३०५ \times १०^{११}}{१०^५} \approx \mathbf{१३\text{ लाख गुना वायुमंडलीय दबाव!}}$$

निष्कर्ष: क्रोड की सीमा पर दबाव सतह के वायुमंडलीय दबाव से लगभग १३ से १३.५ लाख गुना अधिक है, जो चट्टानों को इतना दबाए रखता है कि वे ३,०००°C ताप पर भी ठोस बनी रहती हैं।

उदाहरण 6
५ प्रमुख मापदंडों के आधार पर क्रोफेसिमा (ऊपरी मेंटल) और निफेसिमा (निचला मेंटल) के बीच एक व्यवस्थित तुलनात्मक सारणी प्रस्तुत कीजिए: गहराई विस्तार, रासायनिक तत्व, घनत्व, प्रमुख शैल संघटन तथा भौतिक अवस्था।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पृथ्वी के मेंटल के दो प्रमुख भागों के मध्य एक व्यवस्थित तुलनात्मक सारणी:

१. गहराई का विस्तार:

  • क्रोफेसिमा (ऊपरी मेंटल): भूपर्पटी के आधार (३०-३५ किमी) से ७०० किमी गहराई तक (रेपिटी असंबद्धता तक)।
  • निफेसिमा (निचला मेंटल): ७०० किमी से २,९०० किमी गहराई तक (गुटेनबर्ग असंबद्धता तक)।

२. प्रमुख रासायनिक तत्व:

  • क्रोफेसिमा: क्रोमियम ($\text{Cr}$), लोहा ($\text{Fe}$ / Ferrum), सिलिकॉन ($\text{Si}$) और मैग्नीशियम ($\text{Mg}$)।
  • निफेसिमा: निकल ($\text{Ni}$), लोहा ($\text{Fe}$ / Ferrum), सिलिकॉन ($\text{Si}$) और मैग्नीशियम ($\text{Mg}$)।

३. शैल घनत्व (ग्राम/सेमी³):

  • क्रोफेसिमा: ३.४ से ४.५ ग्राम/सेमी³।
  • निफेसिमा: ४.५ से ५.६ ग्राम/सेमी³ (अत्यधिक दबाव से क्रिस्टल संपीड़न के कारण अधिक सघन)।

४. प्रमुख शैल एवं खनिज संघटन:

  • क्रोफेसिमा: पेरिडोटाइट शैल, जिसमें ऑलिविन, पाइरोक्सिन और गार्नेट खनिजों की प्रधानता होती है।
  • निफेसिमा: ब्रिजमेनाइट, फेरोपेरिक्लेज और सिलिकेट पेरोव्स्काइट (पृथ्वी के सबसे सघन सिलिकेट क्रिस्टल)।

५. भौतिक अवस्था एवं गतिकी:

  • क्रोफेसिमा: ऊपरी भाग ठोस, मध्य भाग में लचीला अर्ध-पिघला दुर्बलतामंडल (एस्थेनोस्फीयर, १००-२५० किमी) जो प्लेट विवर्तनिकी को संचालित करता है।
  • निफेसिमा: पूर्णतः ठोस एवं दृढ़; २,५००°-३,०००°C तापमान होने पर भी १३ लाख वायुमंडलीय दबाव के कारण पिघल नहीं पाता।
उदाहरण 7
पृथ्वी का आंतरिक क्रोड ५,०००°C से ६,०००°C के भीषण तापमान पर भी पूरी तरह ठोस क्यों रहता है, जबकि बाह्य क्रोड अपेक्षाकृत कम तापमान (३,७००°-४,५००°C) पर पिघला हुआ तरल है? ऊष्मागतिकी के सिद्धांत के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. क्रोड अवस्था का विरोधाभास:

  • बाह्य क्रोड (२,९००-५,१५० किमी): तापमान ३,७००°-४,५००°C $\to$ पिघला हुआ तरल।
  • आंतरिक क्रोड (५,१५०-६,३७१ किमी): तापमान ५,०००°-६,०००°C $\to$ ठोस क्रिस्टलीय।
  • अधिक गर्म परत ठोस और कम गर्म परत तरल क्यों है?

२. ऊष्मागतिकी सिद्धांत: क्लैपिरॉन गलनांक उन्नयन:

  • किसी भी पदार्थ का गलनांक ($T_m$) एक स्थिर संख्या नहीं है; यह परिवेशी दबाव ($P$) पर सीधे निर्भर करता है।
  • क्लैपिरॉन समीकरण के अनुसार: $\frac{dT_m}{dP} = \frac{T_m \Delta V}{L_f}$।
  • चूँकि पिघलने पर लोहे का आयतन बढ़ता है ($\Delta V = V_{\text{तरल}} - V_{\text{ठोस}} > ०$), अतः बाहरी दबाव बढ़ाने से सघन ठोस अवस्था अधिक अनुकूल हो जाती है और पिघलने के लिए कहीं अधिक तापमान की आवश्यकता होती है।

३. दबाव की निर्णायक भूमिका:

  • बाह्य क्रोड में दबाव १३.५ से ३२ लाख वायुमंडलीय दबाव के बीच है। इस दबाव पर लोहे का गलनांक लगभग ३,५००°C होता है। चूँकि वहाँ का वास्तविक तापमान (४,०००°C) गलनांक से अधिक है, इसलिए लोहा पिघलकर तरल रहता है।
  • आंतरिक क्रोड में ऊपर की पूरी पृथ्वी का भार पड़ता है, जिससे दबाव ३६ लाख वायुमंडलीय दबाव ($३६०\text{ GPa}$) से भी ऊपर पहुँच जाता है।
  • ३६० GPa के इस अकल्पनीय दबाव पर लोहे का गलनांक बढ़कर ६,२००°C से अधिक हो जाता है!
  • चूँकि केंद्र का वास्तविक तापमान (५,०००°-६,०००°C) इस बढ़े हुए गलनांक से कम है, इसलिए लोहे के परमाणु पिघल नहीं सकते और एक अति-सघन हेक्सागोनल क्लोज-पैक्ड क्रिस्टल जालक में कसकर बंधे रहते हैं।

निष्कर्ष: पृथ्वी के केंद्र में पड़ने वाला भीषण स्थैतिक दबाव लोहे के गलनांक को वहाँ के वास्तविक तापमान से अधिक बढ़ा देता है, जिससे आंतरिक क्रोड पूरी तरह ठोस रहता है।

उदाहरण 8
स्पष्ट कीजिए कि अधिकेंद्र से १०५° और १८०° के कोणीय अंतराल के बीच S-तरंग छाया क्षेत्र की खोज ने किस प्रकार सिद्ध किया कि पृथ्वी का बाह्य क्रोड तरल है, रिचर्ड डिक्सन ओल्डहैम (१९०६) की खोज का उल्लेख करते हुए उत्तर दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. वैश्विक भूकंपीय प्रेक्षण:

  • जब पृथ्वी पर कहीं तीव्र भूकंप आता है, तो उसकी भूगर्भिक तरंगें अंतरतम से होकर यात्रा करती हैं।
  • अधिकेंद्र से ०° से १०५° की कोणीय दूरी पर स्थित सीस्मोग्राफ प्राथमिक ($P$) और द्वितीयक ($S$) दोनों तरंगों को दर्ज करते हैं।
  • किंतु १०५° से परे १८०° तक विपरीत गोलार्ध में पूरी पृथ्वी पर कहीं भी कोई सीधी S-तरंग दर्ज नहीं होती। पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल के ४०% से अधिक भाग में फैला यह अंध क्षेत्र "S-तरंग छाया क्षेत्र" कहलाता है।

२. तरंग संचरण भौतिकी का नियम:

  • S-तरंगें अनुप्रस्थ अपरूपण तरंगें होती हैं जिनका वेग $v_s = \sqrt{\mu/\rho}$ होता है, जहाँ $\mu$ माध्यम की अपरूपण दृढ़ता (Rigidity) है।
  • तरल पदार्थों (द्रव और गैस) में अपरूपण तनाव सहने की कोई क्षमता नहीं होती, अतः उनके लिए $\mu = ०$ होता है।
  • जब $\mu = ०$, तो सूत्रानुसार $v_s = \sqrt{०/\rho} = ०$। अतः S-तरंगें भौतिक रूप से तरल माध्यम में प्रवाहित हो ही नहीं सकतीं।

३. रिचर्ड डिक्सन ओल्डहैम की युगांतरकारी खोज (१९०६):

  • ब्रिटिश भूवैज्ञानिक आर. डी. ओल्डहैम ने देखा कि S-तरंगें ठोस मेंटल में तो २,९०० किमी तक निर्बाध गति से चलती हैं, किंतु २,९०० किमी की गहराई पर पहुँचते ही अचानक समाप्त हो जाती हैं।
  • चूँकि २,९०० किमी के बाद S-तरंगें पूरी तरह अवशोषित या परावर्तित हो जाती हैं, अतः ओल्डहैम ने निष्कर्ष निकाला कि २,९०० किमी से नीचे का केंद्रीय भाग—अर्थात बाह्य क्रोड—अनिवार्य रूप से पिघली हुई तरल अवस्था में है।

निष्कर्ष: १०५° से परे S-तरंगों की पूर्ण अनुपस्थिति इस बात का प्रत्यक्ष और अकाट्य भौतिक प्रमाण है कि पृथ्वी का बाह्य क्रोड तरल है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सियाल (SIAL) और सिमा (SIMA) के घनत्व और स्थिति को उलट देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सियाल (ग्रेनाइट, $ ho pprox २.७ ext{ ग्राम/सेमी}^३$) हल्का है और ऊपर तैरता है। सिमा (बेसाल्ट, $ ho pprox ३.० ext{ ग्राम/सेमी}^३$) भारी है और सियाल के नीचे निरंतर तली बनाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मान लेना कि संपूर्ण मेंटल पिघला हुआ तरल मैग्मा है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मेंटल का ९५% से अधिक भाग ठोस क्रिस्टलीय सिलिकेट शैल है। केवल दुर्बलतामंडल (एस्थेनोस्फीयर, १००-२५० किमी) ही १-५% आंशिक रूप से पिघला अर्ध-तरल है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

आंतरिक क्रोड को इसलिए तरल मान लेना क्योंकि वह बाह्य क्रोड से अधिक गर्म है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आंतरिक क्रोड पूरी तरह ठोस है। ३६ लाख वायुमंडलीय दबाव के कारण लोहे का गलनांक बढ़कर ६,२००°C से अधिक हो जाता है, जिससे वह ठोस बना रहता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गुटेनबर्ग असंबद्धता और मोहो असंबद्धता में भ्रम।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मोहो (Moho) भूपर्पटी को मेंटल से अलग करती है (३०-३५ किमी)। गुटेनबर्ग (Gutenberg) मेंटल को क्रोड से अलग करती है (२,९०० किमी)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझ लेना कि कोला सुपरडीप बोरहोल मेंटल तक पहुँच गया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कोला बोरहोल (१२.२६ किमी) महाद्वीपीय भूपर्पटी (३५ किमी) की केवल एक-तिहाई गहराई तक ही पहुँच पाया। कोई भी मानव ड्रिल आज तक मोहो या मेंटल तक नहीं पहुँच सकी है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भू-तापीय प्रवणता का रैखिक अतिप्रसार (Linear Extrapolation Fallacy)।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सतही दर (३०°C/किमी) केवल ऊपरी भूपर्पटी (०-१५ किमी) में ही लागू होती है। संवहनशील मेंटल और क्रोड में प्रवणता बहुत समतल हो जाती है और केंद्र का तापमान ५,०००°-६,०००°C ही रहता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि S-तरंगें बाह्य क्रोड में इसलिए नहीं चल पातीं क्योंकि वे "कमजोर" हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

S-तरंगें अनुप्रस्थ अपरूपण तरंगें हैं जिन्हें चलने के लिए माध्यम में दृढ़ता ($\mu > ०$) चाहिए। तरल में दृढ़ता शून्य होती है, अतः गणितीय और भौतिक रूप से तरल में S-तरंग का अस्तित्व संभव ही नहीं है।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना एवं प्रमुख भूकंपीय असंबद्धताएँ

पृथ्वी की आंतरिक संरचना एवं भूकंपीय असांतत्य रेखाएँ (WBBSE कक्षा 8) पृथ्वी के आंतरिक भाग का संकेंद्रीय स्तर-विन्यास भूपर्पटी, मैंटल (दुर्बलता मंडल / एस्थेनोस्फीयर) एवं क्रोड का प्रामाणिक चित्र भूपर्पटी (CRUST: 0 – 35 किमी) सियाल (SIAL: 2.7 ग्राम/सेमी³) एवं सिमा (SIMA: 3.0 ग्राम/सेमी³) <1% आयतन | ~0.5% द्रव्यमान कॉनराड असांतत्य (सियाल व सिमा) ⚡ मोहोरोविसिक असांतत्य (MOHO: ~30 – 35 किमी) | Vp वेग उछाल: 6.0 → 8.1 किमी/सेकंड ऊपरी मैंटल / क्रोफेसिमा (CROFESIMA: 35 – 700 किमी) Cr, Fe, Si, Mg | घनत्व: 3.4 – 4.5 ग्राम/सेमी³ | तापमान: 1000° – 2000°C एस्थेनोस्फीयर / दुर्बलता मंडल (100 – 250 किमी): अर्ध-तरल लचीली परत (मैग्मा का स्रोत) तापीय संवहन तरंगें कन्वेयर बेल्ट की भांति प्लेटों को गति प्रदान करती हैं रेपेत्ती असांतत्य (~700 किमी) | ऊपरी व निचले मैंटल के मध्य विभाजक निचला मैंटल / निफेसिमा (NIFESIMA: 700 – 2900 किमी) Ni, Fe, Si, Mg | ठोस पेरिडोटाइट एवं ब्रिजमेनाइट | घनत्व: 4.5 – 5.6 ग्राम/सेमी³ मैंटल: ~84% आयतन | 67% द्रव्यमान दाब: तलहटी पर लगभग 13.5 लाख वायुमंडलीय दाब ⚡ गुटेनबर्ग असांतत्य (2900 किमी) | S-तरंगें पूरी तरह अवरुद्ध (μ=0) | मैंटल/क्रोड सीमा बाह्य क्रोड / तरल निफे (OUTER CORE: 2900 – 5150 किमी) पिघला तरल लोहा व निकेल | घनत्व: 9.9 – 12.2 ग्राम/सेमी³ | तापमान: 3700° – 4500°C भू-डायनेमो (Geodynamo): तरल लोहे का चक्रवाती प्रवाह पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र बनाता है! S-तरंगें प्रवेश नहीं कर सकतीं; P-तरंग का वेग गिरकर 13.7 → 8.1 किमी/से हो जाता है क्रोड: ~16% आयतन | 32% द्रव्यमान लेहमैन असांतत्य (5150 किमी) | 1936 में इंगे लेहमैन द्वारा खोजी गई आंतरिक क्रोड / ठोस निफे (SOLID NIFE: 5150 – 6371 किमी) ठोस क्रिस्टलीय लोहा-निकेल धातु गोला | घनत्व: 13.0 – 13.6 ग्राम/सेमी³ तापमान: 5000° – 6000°C (सूर्य की सतह जितना!) | दाब: >36 लाख वायुमंडलीय दाब अत्यधिक स्थैतिक दाब के कारण लोहा अत्यधिक तापमान पर भी पिघल नहीं पाता, ठोस रहता है पृथ्वी केंद्र: 6,371 किमी भूकंपीय तरंग गतिवेग आरेख (Vp एवं Vs) तरंग वेग परिवर्तन ठोस मैंटल व तरल बाह्य क्रोड को प्रमाणित करता है 0 किमी (सतह) 2900 किमी (गुटेनबर्ग) 5150 किमी 6371 किमी मैंटल/क्रोड P-तरंग (Vp) गिरावट 13.7 → 8.1 S-तरंग (Vs) तरल क्रोड में Vs = 0! P-तरंगें: अनुदैर्ध्य | ठोस, द्रव व गैस—तीनों माध्यमों में गमन S-तरंगें: अनुप्रस्थ | केवल ठोस में गमन (तरल क्रोड द्वारा अवरुद्ध) प्रमुख 5 असांतत्य रेखाएँ (C-M-R-G-L सूत्र) असांतत्य रेखा गहराई विभाजित परतें 1. कॉनराड ~15 – 20 किमी सियाल एवं सिमा 2. मोहोरोविसिक (मोहो) ~30 – 35 किमी भूपर्पटी व मैंटल 3. रेपेत्ती ~700 किमी क्रोफेसिमा व निफेसिमा 4. गुटेनबर्ग 2,900 किमी मैंटल व क्रोड 5. लेहमैन 5,150 किमी बाह्य व आंतरिक क्रोड मानव अन्वेषण बनाम पृथ्वी की समग्र त्रिज्या: • सबसे गहरी सोने की खान: मपोनेन्ग (दक्षिण अफ्रीका) = 3.9 किमी (ताप: 66°C) • सबसे गहरा बोरहोल: कोला प्रायद्वीप (रूस) = 12.26 किमी (ताप: 180°C) पृथ्वी की 6,371 किमी त्रिज्या का मात्र 0.19% प्रत्यक्ष अन्वेषण हो पाया है!

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पृथ्वी की उत्पत्ति ४.६ अरब वर्ष पूर्व हुई; गुरुत्वीय विभेदीकरण द्वारा भारी लोहा-निकल केंद्र में डूबकर क्रोड बना और हल्के सिलिकेट तैरकर भूपर्पटी बने।
मुख्य बिंदु 2
पृथ्वी की औसत त्रिज्या ६,३७१ किमी है। मानव का गहरा वैज्ञानिक छेद (कोला बोरहोल: १२.२६ किमी) त्रिज्या का मात्र ०.१९% है, अतः आंतरिक ज्ञान भूकंपीय तरंगों और भू-चुंबकत्व पर आधारित है।
मुख्य बिंदु 3
ऊपरी भूपर्पटी में भू-तापीय प्रवणता प्रति ३२-३३ मीटर पर १°C (३०°C/किमी) है; भूगर्भिक ऊष्मा का मुख्य स्रोत आदिम संचित ऊष्मा और रेडियोधर्मी समस्थानिकों (U, Th, K) का क्षय है।
मुख्य बिंदु 4
भूपर्पटी (०-३५ किमी) महाद्वीपीय ग्रेनाइटिक सियाल (२.७ ग्राम/सेमी³) और महासागरीय बेसाल्टिक सिमा (३.० ग्राम/सेमी³) से बनी है, जो कॉनराड असंबद्धता द्वारा विभाजित हैं।
मुख्य बिंदु 5
मोहोरोविसिक (मोहो) असंबद्धता (३०-३५ किमी) भूपर्पटी और मेंटल की सीमा है, जहाँ P-तरंग का वेग ६.० से उछलकर ८.१ किमी/सेकंड हो जाता है।
मुख्य बिंदु 6
मेंटल (३५-२,९०० किमी, ८४% आयतन) ऊपरी मेंटल क्रोफेसिमा (जिसमें १००-२५० किमी पर दुर्बलतामंडल प्लेटों को गति देता है), रेपिटी सीमा (७०० किमी) और निचले मेंटल निफेसिमा में बंटा है।
मुख्य बिंदु 7
गुटेनबर्ग असंबद्धता (२,९०० किमी) ठोस मेंटल को पिघले तरल बाह्य क्रोड (२,९००-५,१५० किमी) से अलग करती है, जहाँ संवहनशील तरल लोहा पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र (भू-डायनेमो) बनाता है।
मुख्य बिंदु 8
लेहमैन असंबद्धता (५,१५० किमी) तरल बाह्य क्रोड को ठोस आंतरिक क्रोड (५,१५०-६,३७१ किमी) से अलग करती है, जहाँ ३६ लाख वायुमंडलीय दबाव लोहे को ५,०००°-६,०००°C पर भी ठोस रखता है।
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कक्षा 8 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: Concept of History अध्याय 2: Rise of Regional Powers अध्याय 3: Establishment of Colonial Authority अध्याय 4: औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप अध्याय 5: औपनिवेशिक शासन के प्रति प्रतिक्रिया: सहयोग और विद्रोह अध्याय 6: राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास अध्याय 7: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श और विकास अध्याय 8: सांप्रदायिकता से विभाजन अध्याय 9: भारतीय संविधान: लोकतांत्रिक ढांचा और नागरिकों के अधिकार अध्याय 10: पृथ्वी की आंतरिक संरचना अध्याय 11: अस्थिर पृथ्वी अध्याय 12: शैल (चट्टानें) अध्याय 13: वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार अध्याय 14: बादल और वर्षा अध्याय 15: जलवायु प्रदेश अध्याय 16: मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन अध्याय 17: भारत के कुछ पड़ोसी देश और उनके साथ संबंध अध्याय 18: उत्तर अमेरिका महाद्वीप अध्याय 19: दक्षिण अमेरिका महाद्वीप अध्याय 20: ओशिनिया महाद्वीप

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