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WBB • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 8
अनुमानित समय: 50 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

सांप्रदायिकता से विभाजन

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) द्वारा स्वीकृत कक्षा 8 की इतिहास पाठ्यपुस्तक 'अतीत ও ঐতিহ্য' (Past and Heritage) के आठवें अध्याय 'साम्प्रदायिकता से विभाजन' (From Communalism to Partition) के संपूर्ण मास्टर अध्ययन मॉड्यूल में आपका स्वागत है। TargetExams Gold Standard शिक्षण पद्धति पर आधारित यह विस्तृत अध्याय आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे संवेदनशील, जटिल और युगांतरकारी अध्याय की पड़ताल करता है—किस प्रकार ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत धार्मिक पहचानों को राजनीतिक साम्प्रदायिकता में बदला गया और अंततः 1947 के खूनी विभाजन के रूप में परिणत हुआ।भारत के मध्यकाल से ही विभिन्न धार्मिक समुदाय लंबे समय तक सह-अस्तित्व में रहते हुए एक साझा समन्वित संस्कृति का निर्माण कर चुके थे। किन्तु 1857 के महाविद्रोह में हिंदू और मुसलमानों के संयुक्त प्रतिरोध से भयभीत होकर ब्रिटिश क्राउन ने सुनियोजित ढंग से 'बांटो और राज करो' (Divide and Rule) की नीति लागू की। 1837 में फारसी की जगह अंग्रेजी को सरकारी भाषा बनाना, 1872 की पहली धर्म-आधारित जनगणना और सामाजिक-आर्थिक विकास में असमानता ने दोनों समुदायों के मध्य अविश्वास के बीज बोए। कालांतर में सर सैयद अहमद खां के अलीगढ़ आंदोलन ने मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, किंतु साथ ही लोकतांत्रिक राजनीति से दूरी बनाने की सलाह भी दी।1905 के बंगाल विभाजन, 1906 के शिमला शिष्टमंडल और ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के साथ साम्प्रदायिक राजनीति का संस्थागत उभार हुआ। 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों में पृथक निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates) की शुरुआत ने भारतीय राजनीति को धर्म के आधार पर विभाजित कर दिया। यद्यपि 1916 के लखनऊ समझौते और 1919–22 के खिलाफत व असहयोग आंदोलन में महात्मा गांधी के नेतृत्व में अप्रत्याशित हिंदू-मुस्लिम एकता देखने को मिली, किंतु 1920 के दशक के बाद साम्प्रदायिक खाई और गहरी होती गई। 1930 में मुहम्मद इकबाल का संबोधन, 1933 में चौधरी रहमत अली का 'पाकिस्तान' पर्चा, और 1937 के चुनावों के बाद मुहम्मद अली जिन्ना का द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory) 1940 के ऐतिहासिक लाहौर प्रस्ताव में परिणत हुआ, जिसमें मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए 'स्वतंत्र राज्यों' की मांग की गई।द्वितीय विश्वयुद्ध, 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, कैबिनेट मिशन की विफलता और 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग के 'प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस' (Direct Action Day) के दौरान कलकत्ता व नोआखली के भयानक दंगों ने देश विभाजन को अपरिहार्य बना दिया। लॉर्ड माउंटबेटन की 3 जून 1947 की योजना और सर सिरिल रेडक्लिफ की रेखा ने पंजाब और बंगाल को दो टुकड़ों में चीरकर रख दिया। 15 अगस्त 1947 की आजादी के उल्लास के साथ 1.5 करोड़ लोगों का विस्थापन, 10 लाख से अधिक जानें और बंगाल में दशकों तक चला शरणार्थी संकट व कॉलोनी आंदोलन आज भी हमारे इतिहास का अमिट सच है।

🏛️ 1947 की ऐतिहासिक पहेली: सदियों का साझा जीवन एक ही दशक में कैसे बिखर गया?

जो हिंदू और मुसलमान सदियों से एक ही भाषा, लोक संस्कृति, कृषि और साझा विरासत से जुड़े हुए थे, वे मात्र पाँच हफ्तों में खींची गई एक सीमा रेखा से रातों-रात पराए कैसे हो गए?

1920 में खिलाफत और असहयोग आंदोलन के दौरान कलकत्ता की सड़कों पर हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर आजादी के नारे लगा रहे थे। लेकिन केवल छब्बीस वर्ष बाद, अगस्त 1946 में उसी कलकत्ता की सड़कों पर 'ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स' के रूप में भयानक खूनी दंगे हुए। क्या धार्मिक भिन्नता ने स्वाभाविक रूप से विभाजन कराया, या यह ब्रिटिश साम्राज्यवादी फूटनीति, चुनावी प्रणाली के दोषों और राजनीतिक गलतफहमियों का नतीजा था?

यह अध्याय औपनिवेशिक नीतियों से लेकर साम्प्रदायिकता के संस्थागतीकरण, लाहौर प्रस्ताव, कैबिनेट मिशन, रेडक्लिफ रेखा और बंगाल के शरणार्थियों के संघर्ष का सजीव विश्लेषण प्रस्तुत करता है। बोर्ड परीक्षा में उत्कृष्ट अंक अर्जित करने के साथ-साथ आधुनिक भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के महत्व को समझने के लिए यह इतिहास जानना अत्यंत आवश्यक है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) द्वारा स्वीकृत कक्षा 8 की इतिहास पाठ्यपुस्तक 'अतीत ও ঐতিহ্য' (Past and Heritage) के आठवें अध्याय 'साम्प्रदायिकता से विभाजन' (From Communalism to Partition) के संपूर्ण मास्टर अध्ययन मॉड्यूल में आपका स्वागत है। TargetExams Gold Standard शिक्षण पद्धति पर आधारित यह विस्तृत अध्याय आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे संवेदनशील, जटिल और युगांतरकारी अध्याय की पड़ताल करता है—किस प्रकार ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत धार्मिक पहचानों को राजनीतिक साम्प्रदायिकता में बदला गया और अंततः 1947 के खूनी विभाजन के रूप में परिणत हुआ।

भारत के मध्यकाल से ही विभिन्न धार्मिक समुदाय लंबे समय तक सह-अस्तित्व में रहते हुए एक साझा समन्वित संस्कृति का निर्माण कर चुके थे। किन्तु 1857 के महाविद्रोह में हिंदू और मुसलमानों के संयुक्त प्रतिरोध से भयभीत होकर ब्रिटिश क्राउन ने सुनियोजित ढंग से 'बांटो और राज करो' (Divide and Rule) की नीति लागू की। 1837 में फारसी की जगह अंग्रेजी को सरकारी भाषा बनाना, 1872 की पहली धर्म-आधारित जनगणना और सामाजिक-आर्थिक विकास में असमानता ने दोनों समुदायों के मध्य अविश्वास के बीज बोए। कालांतर में सर सैयद अहमद खां के अलीगढ़ आंदोलन ने मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, किंतु साथ ही लोकतांत्रिक राजनीति से दूरी बनाने की सलाह भी दी।

1905 के बंगाल विभाजन, 1906 के शिमला शिष्टमंडल और ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के साथ साम्प्रदायिक राजनीति का संस्थागत उभार हुआ। 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों में पृथक निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates) की शुरुआत ने भारतीय राजनीति को धर्म के आधार पर विभाजित कर दिया। यद्यपि 1916 के लखनऊ समझौते और 1919–22 के खिलाफत व असहयोग आंदोलन में महात्मा गांधी के नेतृत्व में अप्रत्याशित हिंदू-मुस्लिम एकता देखने को मिली, किंतु 1920 के दशक के बाद साम्प्रदायिक खाई और गहरी होती गई। 1930 में मुहम्मद इकबाल का संबोधन, 1933 में चौधरी रहमत अली का 'पाकिस्तान' पर्चा, और 1937 के चुनावों के बाद मुहम्मद अली जिन्ना का द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory) 1940 के ऐतिहासिक लाहौर प्रस्ताव में परिणत हुआ, जिसमें मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए 'स्वतंत्र राज्यों' की मांग की गई।

द्वितीय विश्वयुद्ध, 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, कैबिनेट मिशन की विफलता और 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग के 'प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस' (Direct Action Day) के दौरान कलकत्ता व नोआखली के भयानक दंगों ने देश विभाजन को अपरिहार्य बना दिया। लॉर्ड माउंटबेटन की 3 जून 1947 की योजना और सर सिरिल रेडक्लिफ की रेखा ने पंजाब और बंगाल को दो टुकड़ों में चीरकर रख दिया। 15 अगस्त 1947 की आजादी के उल्लास के साथ 1.5 करोड़ लोगों का विस्थापन, 10 लाख से अधिक जानें और बंगाल में दशकों तक चला शरणार्थी संकट व कॉलोनी आंदोलन आज भी हमारे इतिहास का अमिट सच है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विस्तार तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक ढांचे की समझ (कक्षा 8 अध्याय 2 व 3)।
  • 1857 के महाविद्रोह तथा कंपनी शासन के अंत के बाद ब्रिटिश क्राउन द्वारा सत्ता अधिग्रहण का ज्ञान (अध्याय 5)।
  • भारतीय राष्ट्रवाद का उदय, नरमपंथी-गरमपंथी राजनीति और 1905 के स्वदेशी आंदोलन की जानकारी (अध्याय 6 व 7)।
  • साम्प्रदायिकता (Communalism), राष्ट्रवाद (Nationalism), और पृथक निर्वाचन (Separate Electorates) जैसे शब्दों का सामान्य अर्थ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश साम्राज्य की 'बांटो और राज करो' नीति तथा 1837 की भाषा नीति और 1872 की जनगणना के सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण करना।
  • सर सैयद अहमद खां के अलीगढ़ आंदोलन, शिमला शिष्टमंडल तथा 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना के ऐतिहासिक संदर्भ को स्पष्ट करना।
  • मार्ले-मिंटो सुधार (1909) की पृथक निर्वाचन प्रणाली, लखनऊ समझौता (1916), साम्प्रदायिक पंचाट (1932) व पूना पैक्ट का संवैधानिक मूल्यांकन करना।
  • मुहम्मद इकबाल के दर्शन, रहमत अली की पाकिस्तान अवधारणा, जिन्ना के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत तथा 1940 के लाहौर प्रस्ताव के मूल बिंदुओं की व्याख्या करना।
  • क्रिप्स मिशन, भारत छोड़ो आंदोलन, कैबिनेट मिशन की त्रि-स्तरीय योजना तथा 16 अगस्त 1946 के प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के परिणामों को रेखांकित करना।
  • माउंटबेटन योजना और रेडक्लिफ रेखा द्वारा पंजाब और बंगाल के विभाजन, शरणार्थी त्रासदी तथा बंगाल के कॉलोनी आंदोलन का तुलनात्मक अध्ययन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 चरण 1: औपनिवेशिक भारत में साम्प्रदा...
2 चरण 2: साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का...
3 चरण 3: द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का विक...
4 चरण 4: युद्धकालीन संकट, राजनीतिक गत...
5 चरण 5: माउंटबेटन योजना, आजादी व विभ...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

चरण 1: औपनिवेशिक भारत में साम्प्रदायिक राजनीति की उत्पत्ति (1857–1909)

1.1 1857 के बाद की ब्रिटिश नीतियां व 'बांटो और राज करो'

1857 के महाविद्रोह में भारतीय हिंदू और मुस्लिम सिपाहियों और जनता ने एकजुट होकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया था। विद्रोह के दमन के बाद ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन अपने हाथ में ले लिया। भारतीयों की इस साझा एकता से भयभीत होकर ब्रिटिश अधिकारियों ने सचेत रूप से 'बांटो और राज करो' (Divide and Rule) की नीति लागू की।

औपनिवेशिक इतिहासकारों और प्रशासकों ने भारतीय समाज को एक साझा राष्ट्र न मानकर 'हिंदू' और 'मुस्लिम' नामक दो स्थायी शत्रुतापूर्ण समुदायों के रूप में चित्रित करना शुरू किया। साम्राज्यवादी सरकार ने अपने शासन को टिकाए रखने के लिए समय-समय पर एक समुदाय को दूसरे के विरुद्ध भड़काने और संरक्षण देने की नीति अपनाई।

ऐतिहासिक तथ्य: 1857 के तुरंत बाद अंग्रेजों का मानना था कि मुगल शासक वर्ग ही इस विद्रोह का मुख्य जिम्मेदार था, इसलिए उन्होंने मुसलमानों के प्रति कड़ा रुख अपनाया। किंतु 19वीं सदी के अंत में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) के नेतृत्व में हिंदू शिक्षित मध्यम वर्ग ने स्वशासन की मांग तेज की, तब अंग्रेजों ने पासा पलटते हुए मुस्लिम कुलीन वर्ग को कांग्रेस के विरुद्ध इस्तेमाल करना शुरू किया।

1.2 1837 की भाषा नीति और आर्थिक असमानताएं

साम्प्रदायिक विभाजन का एक गहरा सामाजिक-आर्थिक कारण ब्रिटिश सरकार की 1837 की भाषा नीति थी। 1837 में कंपनी सरकार ने अदालतों और प्रशासनिक कार्यालयों से फारसी (Persian) भाषा की मान्यता समाप्त कर दी और उसके स्थान पर उच्च स्तर पर अंग्रेजी तथा जिला स्तर पर स्थानीय भाषाओं (जैसे बांग्ला) को लागू किया।

पारंपरिक मुस्लिम कुलीन वर्ग (अशराफ), जिसकी आजीविका और शिक्षा फारसी पर आधारित थी, अचानक सरकारी नौकरियों और वकालत से बाहर हो गया। दूसरी ओर, बंगाल के उच्चवर्गीय हिंदुओं ने 1817 में स्थापित हिंदू कॉलेज के माध्यम से आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा को बहुत तेजी से अपनाया और प्रशासन, न्यायपालिका व वाणिज्य में अपनी मजबूत पकड़ बना ली।

  • सरकारी नौकरियों में असंतुलन: 1870 के दशक तक उच्च प्रशासनिक पदों पर मुस्लिम अधिकारियों की संख्या हिंदुओं की तुलना में नगण्य थी।
  • बंगाल की कृषि संरचना: बंगाल में अधिकांश जमींदार, साहूकार और मध्यस्थ हिंदू थे, जबकि पूर्वी बंगाल के अधिकांश गरीब किसान (रैयत) मुस्लिम थे।
  • आर्थिक शोषण को साम्प्रदायिक रंग: जमींदारी शोषण और कर्जदारी के आर्थिक संघर्षों ने आगे चलकर आसानी से साम्प्रदायिक तनाव का रूप धारण कर लिया।

1.3 1872 की जनगणना और डब्लू. डब्लू. हंटर की पुस्तक

1872 में ब्रिटिश भारत की पहली अखिल भारतीय जनगणना (Census) आयोजित की गई। इस जनगणना की सबसे प्रमुख विशेषता यह थी कि आबादी को धर्म के आधार पर वर्गीकृत करके गिना गया। आंकड़ों से पहली बार यह स्पष्ट रूप से सार्वजनिक हुआ कि पूर्वी बंगाल और पश्चिमी पंजाब में मुस्लिम आबादी स्पष्ट बहुमत में थी।

1871 में ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी सर विलियम विल्सन हंटर (W.W. Hunter) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द इंडियन मुसलमान्स' (The Indian Musalmans) प्रकाशित की। हंटर ने आंकड़ों के साथ सिद्ध किया कि आधुनिक शिक्षा, संपत्ति और नौकरियों में मुस्लिम समाज अत्यंत पिछड़ चुका है। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी कि यदि मुसलमानों के असंतोष को दूर नहीं किया गया, तो यह ब्रिटिश सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

हंटर ने मुसलमानों को विशेष सरकारी छात्रवृत्तियां, नौकरियां और प्रशासनिक संरक्षण देने की सिफारिश की। इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार और मुस्लिम शिक्षित कुलीन वर्ग के बीच नए सामंजस्य की शुरुआत हुई।

1.4 सर सैयद अहमद खां और अलीगढ़ आंदोलन

19वीं सदी में भारतीय मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण के प्रमुख अग्रदूत सर सैयद अहमद खां (1817–1898) थे। उन्होंने समझा कि पश्चिमी आधुनिक वैज्ञानिक और अंग्रेजी शिक्षा के बिना मुस्लिम समुदाय का सामाजिक व आर्थिक उत्थान संभव नहीं है। इस उद्देश्य से उन्होंने अलीगढ़ आंदोलन का सूत्रपात किया।

  • एम.ए.ओ. कॉलेज की स्थापना (1875): उन्होंने 1875 में अलीगढ़ में 'मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल (MAO) कॉलेज' की स्थापना की (जो 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना)।
  • दृष्टिकोण में परिवर्तन: अपने प्रारंभिक जीवन में सर सैयद ने हिंदू और मुस्लिम को 'भारत की दो सुंदर आंखें' कहा था। किंतु 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद उनके विचारों में भारी बदलाव आया।
  • बहुमत के शासन की आशंका: उन्होंने तर्क दिया कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में पश्चिमी शैली का बहुमत-आधारित लोकतंत्र लागू होने पर अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय हमेशा के लिए बहुसंख्यक हिंदुओं के अधीन हो जाएगा।
  • ब्रिटिश राज के प्रति निष्ठा: अतः उन्होंने मुसलमानों को कांग्रेस के राजनीतिक आंदोलनों से दूर रहकर आधुनिक शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने और ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहने की सलाह दी।

1.5 शिमला शिष्टमंडल व मुस्लिम लीग की स्थापना (1906)

1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा किए गए बंगाल विभाजन ने पूर्वी बंगाल के मुस्लिम कुलीन वर्ग में यह आशा जगाई कि नए मुस्लिम बहुल प्रांत में उनका विकास होगा। स्वदेशी आंदोलन के बढ़ते दबाव में जब विभाजन रद्द होने की संभावना बनी, तब मुस्लिम नेताओं ने अपने अलग राजनीतिक संगठन की आवश्यकता महसूस की।

1 अक्टूबर 1906 को आगा खां (Aga Khan III) के नेतृत्व में 35 मुस्लिम रईसों और नवाबों का एक प्रतिनिधिमंडल शिमला में वायसराय लॉर्ड मिंटो से मिला। इसे इतिहास में 'शिमला शिष्टमंडल' (Simla Deputation) कहा जाता है। उन्होंने तीन मुख्य मांगें रखीं:

  1. व्यवस्थापिका परिषदों में मुसलमानों को उनकी जनसंख्या और ऐतिहासिक महत्व के आधार पर विशेष प्रतिनिधित्व दिया जाए।
  2. मुस्लिम प्रतिनिधियों का चुनाव केवल मुस्लिम मतदाता ही करें—अर्थात पृथक निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates)।
  3. एक मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना में सरकारी सहायता।

लॉर्ड मिंटो ने इन मांगों का गर्मजोशी से स्वागत किया। इसके ठीक तीन महीने बाद, 30 दिसंबर 1906 को ढाका के नवाब सलीमुल्लाह के निमंत्रण पर ढाका में आयोजित अखिल भारतीय मुस्लिम शिक्षा सम्मेलन में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग (All India Muslim League) की औपचारिक स्थापना हुई। आगा खां इसके पहले स्थायी अध्यक्ष बने।

चरण 2: साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का संस्थागतीकरण (1909–1932)

2.1 मार्ले-मिंटो सुधार (1909) व पृथक निर्वाचन

शिमला शिष्टमंडल के वादे को पूरा करने के लिए ब्रिटिश संसद ने भारतीय परिषद अधिनियम 1909 पारित किया, जिसे मार्ले-मिंटो सुधार कहा जाता है।

इस अधिनियम के द्वारा भारतीय संवैधानिक इतिहास में पहली बार पृथक निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates) को कानूनी मान्यता दी गई। इसके तहत कुछ निश्चित चुनाव क्षेत्रों को मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए आरक्षित किया गया, जहां केवल मुस्लिम नागरिक ही मतदान कर सकते थे।

नागदंत के बीज: वायसराय लॉर्ड मिंटो ने भारत सचिव जॉन मार्ले को एक पत्र में लिखा: 'हम वास्तव में नागदंत (dragon's teeth) बो रहे हैं, और इसकी फसल अत्यंत कड़वी होगी।' पृथक निर्वाचन के कारण नेताओं को चुनाव जीतने के लिए केवल अपने धार्मिक समुदाय को खुश करना पड़ता था, जिससे राष्ट्रीय एकता और साझा राजनीति की जड़ें हमेशा के लिए कमजोर हो गईं।

2.2 लखनऊ समझौता (1916): एकता का क्षणिक दौर

1910 के दशक में वैश्विक परिस्थितियों के चलते कांग्रेस और मुस्लिम लीग कुछ समय के लिए निकट आए। बाल्कन युद्ध और प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य (खलीफा) पर ब्रिटिश हमलों ने भारतीय मुसलमानों को नाराज कर दिया था, वहीं 1911 में बंगाल विभाजन के रद्दीकरण ने मुस्लिम लीग को निराश किया।

दिसंबर 1916 में लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के संयुक्त वार्षिक अधिवेशन में ऐतिहासिक लखनऊ समझौता (Lucknow Pact) संपन्न हुआ। इसके प्रमुख वास्तुकार मुहम्मद अली जिन्ना थे, जिन्हें सरोजिनी नायडू ने 'हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत' कहा था।

  • कांग्रेस की स्वीकृति: कांग्रेस ने पहली बार औपचारिक रूप से मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार कर लिया।
  • वेटेज फॉर्मूला: जहां मुसलमान अल्पसंख्यक थे (जैसे यूपी, बिहार), वहां उन्हें अधिक सीटें दी गईं; बदले में मुस्लिम बहुल पंजाब व बंगाल में लीग ने कुछ कम सीटें स्वीकार कीं।
  • संयुक्त संवैधानिक मांग: दोनों दलों ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष स्वशासन (Dominion Status) की साझा मांग प्रस्तुत की।

2.3 खिलाफत व असहयोग आंदोलन (1919–1922)

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद तुर्की के खलीफा के अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए अली बंधुओं (मौलाना मुहम्मद अली और शौकत अली) तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद के नेतृत्व में खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ।

महात्मा गांधी ने इस आंदोलन को हिंदू और मुस्लिम समुदायों को एक सूत्र में पिरोने का स्वर्णिम अवसर माना। उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के न्याय और 'स्वराज' की मांग को खिलाफत के साथ जोड़कर 1920 में राष्ट्रव्यापी असहयोग आंदोलन आरंभ किया।

दोनों समुदायों ने कंधे से कंधा मिलाकर विदेशी सामान, सरकारी अदालतों और स्कूलों का बहिष्कार किया। किंतु फरवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी द्वारा आंदोलन वापस लेने और 1924 में तुर्की में कमाल अतातुर्क द्वारा खिलाफत समाप्त कर दिए जाने से यह आंदोलन अचानक बिखर गया। इस आकस्मिक ठहराव ने दोनों समुदायों के बीच गंभीर राजनीतिक निराशा और आपसी अविश्वास को जन्म दिया।

2.4 1920 के दशक के साम्प्रदायिक दंगे व पुनरुत्थानवादी संगठन

असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद बने राजनीतिक शून्य का लाभ उठाकर दोनों ओर के साम्प्रदायिक और पुनरुत्थानवादी संगठनों का प्रभाव तेजी से बढ़ा। कोहाट, ढाका, कलकत्ता और मुल्तान में भयानक साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे।

  • हिंदू महासभा (1915): पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित इस संगठन ने 1920 के दशक में विनायक दामोदर सावरकर के नेतृत्व में उग्र 'हिंदुत्व' की विचारधारा अपनाई।
  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS, 1925): 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा हिंदुओं को सांस्कृतिक और शारीरिक रूप से संगठित करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया।
  • शुद्धि और संगठन बनाम तबलीग और तंजीम: आर्य समाज ने 'शुद्धि' व 'संगठन' आंदोलन चलाया, जिसके उत्तर में मुस्लिम संगठनों ने 'तबलीग' व 'तंजीम' अभियान शुरू किए।

मस्जिदों के आगे बाजा बजाने और कुर्बानी जैसे धार्मिक मुद्दों को लेकर मोहल्लों में तनाव और दंगे आम बात हो गए।

2.5 साम्प्रदायिक पंचाट (1932) व पूना पैक्ट

लंदन में गोलमेज सम्मेलनों में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर सहमति न बनने के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड (Ramsay MacDonald) ने 16 अगस्त 1932 को कुख्यात साम्प्रदायिक पंचाट (Communal Award) की घोषणा की।

इस पंचाट में मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों के पृथक निर्वाचन को जारी रखते हुए पहली बार हिंदू समाज के दलित वर्ग (Depressed Classes) को भी एक अलग अल्पसंख्यक मानकर उनके लिए पृथक निर्वाचन दे दिया गया।

पुणे की यरवदा जेल में बंद महात्मा गांधी ने हिंदू समाज को विखंडित करने के इस औपनिवेशिक षड्यंत्र के विरुद्ध 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन शुरू किया। गहन वार्ताओं के बाद डॉ. बी. आर. आंबेडकर और मदन मोहन मालवीय के बीच 24 सितंबर 1932 को ऐतिहासिक पूना पैक्ट (Poona Pact) हुआ। पूना पैक्ट के तहत दलितों के लिए पृथक निर्वाचन समाप्त कर दिया गया और संयुक्त निर्वाचन के अंतर्गत आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गई।

चरण 3: द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का विकास व पाकिस्तान प्रस्ताव (1930–1940)

3.1 1930 में मुहम्मद इकबाल का इलाहाबाद संबोधन

उत्तर-पश्चिम भारत में मुसलमानों के लिए एक स्वायत्त क्षेत्रीय मातृभूमि की दार्शनिक रूपरेखा सबसे पहले प्रख्यात कवि व विचारक सर मुहम्मद इकबाल ने 1930 में मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में प्रस्तुत की।

इकबाल ने कहा: 'पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक संयुक्त राज्य बना दिया जाए। ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर या बाहर, इस उत्तर-पश्चिमी भारतीय मुस्लिम राज्य का गठन ही मुझे मुसलमानों का अंतिम भाग्य प्रतीत होता है।'

यद्यपि इकबाल ने भारत के पूर्ण विभाजन का आह्वान नहीं किया था, किंतु उनके विचार ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की भौगोलिक स्वायत्तता को बौद्धिक मान्यता दी, जिसने आगे चलकर पाकिस्तान की मांग का आधार तैयार किया।

3.2 चौधरी रहमत अली और 'पाकिस्तान' शब्द (1933)

जनवरी 1933 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र चौधरी रहमत अली ने अपने साथियों के साथ चार पृष्ठों का एक राजनीतिक पर्चा प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक था: 'Now or Never: Are We to Live or Perish for Ever?' (अब नहीं तो कभी नहीं)।

इस पर्चे में रहमत अली ने उत्तर-पश्चिम भारत की पांच मुस्लिम बहुल प्रशासनिक इकाइयों के आद्यक्षरों को मिलाकर पहली बार 'PAKSTAN' (बाद में 'PAKISTAN') शब्द गढ़ा:

P = Punjab (पंजाब)
A = Afghania (उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत)
K = Kashmir (कश्मीर)
S = Sind (सिंध)
TAN = Baluchistan (बलूचिस्तान)

उर्दू और फारसी में 'पाक' का अर्थ 'पवित्र' और 'स्तान' का अर्थ 'भूमि' होता है। समकालीन वरिष्ठ राजनेताओं ने इसे 'छात्र की दिवास्वप्न कल्पना' कहकर खारिज कर दिया, किंतु मात्र एक दशक के भीतर यही विचार एक विशाल जनआंदोलन में तब्दील हो गया।

3.3 1937 के प्रांतीय चुनाव और राजनीतिक मोड़

भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत 1937 में 11 ब्रिटिश प्रांतों में चुनाव कराए गए।

चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए शानदार रहे—उसने 7 प्रांतों में स्पष्ट बहुमत से सरकार बनाई। इसके विपरीत मुस्लिम लीग का प्रदर्शन निराशाजनक रहा; उसे कुल मुस्लिम वोटों का 5% से भी कम मिला और वह किसी भी मुस्लिम बहुल प्रांत में सरकार नहीं बना सकी।

  • बंगाल में कृषक प्रजा पार्टी: बंगाल में शेर-ए-बंगाल ए. के. फजलुल हक की धर्मनिरपेक्ष कृषक प्रजा पार्टी (KPP) ने अच्छा प्रदर्शन किया। कांग्रेस द्वारा समर्थन से इनकार के बाद हक ने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन सरकार बनाई।
  • पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी: पंजाब में सर सिकंदर हयात खान की बहु-साम्प्रदायिक यूनियनिस्ट पार्टी सत्ता में आई।
  • संयुक्त प्रांत (UP) का टकराव: संयुक्त प्रांत में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग को मंत्रिमंडल में शामिल करने से मना कर दिया और शर्त रखी कि लीग के विधायक कांग्रेस में विलय करें। इससे जिन्ना अत्यधिक आहत हुए।

जिन्ना ने कांग्रेस पर 'हिंदू राज' थोपने और मुस्लिम संस्कृति व उर्दू को नष्ट करने का आक्रामक आरोप लगाकर मुसलमानों को लामबंद करना शुरू किया।

3.4 जिन्ना का द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory)

1937 के बाद मुहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग को कुलीनों के क्लब से निकालकर एक आक्रामक जन-संगठन में बदल दिया। उन्होंने अपने प्रसिद्ध द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory) का प्रचार किया।

जिन्ना का स्पष्ट तर्क था कि हिंदू और मुसलमान केवल दो धर्म या अल्पसंख्यक नहीं हैं, बल्कि वे दो पूर्णतः भिन्न राष्ट्र (Nations) हैं:

'हिंदू और मुसलमान दो भिन्न धार्मिक दर्शनों, सामाजिक रीति-रिवाजों और साहित्यों से संबंध रखते हैं। वे न तो आपस में विवाह करते हैं और न ही साथ भोजन करते हैं। वे वास्तव में दो अलग सभ्यताओं के अंग हैं। एक साझी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन दो राष्ट्रों को बांधने का प्रयास केवल अंतर्कलह और विनाश की ओर ले जाएगा।'

जिन्ना के अनुसार, आत्मनिर्णय के लोकतांत्रिक अधिकार के तहत भारतीय मुसलमानों को अपनी संप्रभु मातृभूमि प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार है।

3.5 लाहौर प्रस्ताव (1940) — 'स्वतंत्र राज्यों' की मांग

23 मार्च 1940 को लाहौर के मिंटो पार्क में आयोजित मुस्लिम लीग के 27वें वार्षिक अधिवेशन में ऐतिहासिक लाहौर प्रस्ताव (Lahore Resolution) पारित हुआ, जिसे आम तौर पर 'पाकिस्तान प्रस्ताव' कहा जाता है।

यह प्रस्ताव बंगाल के प्रधानमंत्री ए. के. फजलुल हक द्वारा तैयार और प्रस्तुत किया गया था। प्रस्ताव का मुख्य अंश था:

'भारत के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को भौगोलिक दृष्टि से पुनर्गठित कर ऐसे क्षेत्रों में विभाजित किया जाए जिससे वे “स्वतंत्र राज्य” (Independent States) बन सकें, जिनमें घटक इकाइयां स्वायत्त और संप्रभु होंगी।'

परीक्षा महत्वपूर्ण बिंदु: मूल लाहौर प्रस्ताव में 'पाकिस्तान' शब्द नहीं था और वहां 'स्वतंत्र राज्य' (बहुवचन) शब्द प्रयुक्त हुआ था। फजलुल हक और बंगाली नेताओं की मूल परिकल्पना में पूर्व में बंगाल-असम को मिलाकर एक अलग स्वायत्त राज्य और पश्चिम में एक अलग राज्य का विचार था। बाद में 1946 में जिन्ना ने इसे बदलकर 'एकल पाकिस्तान' में तब्दील कर दिया।

चरण 4: युद्धकालीन संकट, राजनीतिक गतिरोध व प्रत्यक्ष कार्रवाई (1942–1946)

4.1 क्रिप्स मिशन (1942) व भारत छोड़ो आंदोलन

1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ने पर भारतीयों की सहमति के बिना उन्हें युद्ध में घसीट लिया गया, जिसके विरोध में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया। 1942 में जापानी सेना बर्मा पर कब्जा करते हुए भारत की सीमा तक आ पहुंची। युद्ध में भारतीयों का सहयोग पाने के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने सर स्टैफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा।

क्रिप्स प्रस्ताव में युद्ध के बाद संविधान सभा और डोमिनियन स्टेटस का वादा किया गया, किंतु यह छूट भी दी गई कि जो प्रांत संघ में नहीं रहना चाहता, वह अलग संविधान बना सकता है। कांग्रेस ने इसे परोक्ष रूप से देश विभाजन का रास्ता मानकर खारिज कर दिया। गांधीजी ने इसे 'दीवालिया होते बैंक का उत्तर-तिथिक चेक (post-dated cheque)' कहा। मुस्लिम लीग ने भी स्पष्ट पाकिस्तान न मिलने के कारण इसे खारिज कर दिया।

क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद गांधीजी ने 8 अगस्त 1942 को बंबई में भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) का आह्वान किया—'करो या मरो'। सरकार ने तुरंत कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं को जेल में डाल दिया। 1942 से 1945 तक कांग्रेस नेताओं के जेल में रहने का लाभ उठाकर मुस्लिम लीग ने ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में सहयोग देकर मुस्लिम प्रांतों में अपना प्रभाव मजबूत कर लिया।

4.2 राजाजी फॉर्मूला (1944) व गांधी-जिन्ना वार्ता

1944 में वरिष्ठ कांग्रेस नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) ने कांग्रेस और लीग के गतिरोध को समाप्त करने के लिए एक समझौता सूत्र प्रस्तुत किया, जिसे राजाजी फॉर्मूला कहा जाता है।

इसमें प्रस्ताव था कि मुस्लिम लीग आजादी की मांग में कांग्रेस का साथ दे और युद्ध के बाद मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जनमत संग्रह कराकर विभाजन पर निर्णय लिया जाए।

सितंबर 1944 में गांधीजी ने बंबई में जिन्ना से लगातार 18 दिनों तक बातचीत की। किंतु जिन्ना ने यह फॉर्मूला खारिज कर दिया। जिन्ना की मांग थी कि केवल मुस्लिम ही जनमत संग्रह में वोट दें और उन्हें पूरे छह प्रांत (पंजाब, बंगाल, असम, सिंध, सीमांत व बलूचिस्तान) बिना किसी बंटवारे के मिलें। उन्होंने कटे-छंटे पाकिस्तान को स्वीकार करने से मना कर दिया, जिससे वार्ता विफल रही।

4.3 वेवेल योजना व शिमला सम्मेलन (1945)

युद्ध समाप्ति के बाद जून 1945 में वायसराय लॉर्ड वेवेल ने शिमला में सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया। वेवेल ने प्रस्ताव रखा कि वायसराय की कार्यकारिणी में कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय होंगे, जिसमें सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों का समान प्रतिनिधित्व (5-5 सदस्य) होगा।

यह सम्मेलन जिन्ना की इस हठधर्मिता के कारण टूट गया कि कार्यकारिणी में सभी 5 मुस्लिम सदस्यों को नामांकित करने का एकमात्र एकाधिकार मुस्लिम लीग को ही होगा।

कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राष्ट्रवादी मुस्लिम विद्वान मौलाना अबुल कलाम आजाद थे। कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि वह एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय पार्टी है और वह मुस्लिम सदस्यों को नामांकित करने का पूरा अधिकार रखती है। लॉर्ड वेवेल ने जिन्ना के अनुचित दबाव के आगे झुकते हुए सम्मेलन भंग कर दिया, जिससे जिन्ना की राजनीतिक वीटो शक्ति स्थापित हो गई।

4.4 1945–46 के आम चुनाव: पूर्ण ध्रुवीकरण

1945-46 की सर्दियों में केंद्रीय व प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव हुए। मुस्लिम लीग ने इस चुनाव को 'पाकिस्तान पर जनमत संग्रह' के रूप में लड़ा।

चुनाव परिणामों ने देश में पूर्ण साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की पुष्टि की:

  • केंद्रीय विधानसभा: मुस्लिम लीग ने केंद्रीय विधानसभा की सभी 30 मुस्लिम सीटों पर 100% विजय प्राप्त की। कांग्रेस ने सामान्य सीटों पर भारी बहुमत पाया।
  • प्रांतीय सीटें: लीग ने 509 आरक्षित मुस्लिम सीटों में से 442 सीटें जीतीं।
  • बंगाल में एकछत्र विजय: बंगाल में हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने 119 में से 113 मुस्लिम सीटें जीतकर भारत में एकमात्र एकल मुस्लिम लीग सरकार बनाई।

इस चुनाव ने पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी और बंगाल की कृषक प्रजा पार्टी को मिटा दिया और जिन्ना भारतीय मुसलमानों के निर्विवाद प्रवक्ता बन गए।

4.5 कैबिनेट मिशन (1946) व प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस (16 अगस्त 1946)

मार्च 1946 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने सत्ता हस्तांतरण के लिए तीन ब्रिटिश मंत्रियों का उच्चस्तरीय कैबिनेट मिशन भेजा—लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए. वी. अलेक्जेंडर।

कैबिनेट मिशन ने संप्रभु पाकिस्तान की मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया और देश की एकता बनाए रखने के लिए त्रि-स्तरीय संघीय योजना प्रस्तुत की:

  • केंद्रीय संघ: केवल रक्षा, विदेश और संचार मामले संभालेगा।
  • तीन प्रांतीय समूह:
      • ग्रुप A (हिंदू बहुल): मद्रास, बंबई, यूपी, बिहार, सीपी व उड़ीसा।
      • ग्रुप B (उत्तर-पश्चिम मुस्लिम बहुल): पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत।
      • ग्रुप C (पूर्वी मुस्लिम बहुल): बंगाल और असम।

नेहरू के एक बयान के बाद कि संविधान सभा किसी पूर्व शर्त से बंधी नहीं होगी, जिन्ना ने अपनी स्वीकृति वापस ले ली।

मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को 'प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस' (Direct Action Day) घोषित किया। सुहरावर्दी सरकार द्वारा कलकत्ता में सरकारी छुट्टी घोषित किए जाने के बाद भयानक साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिसे 'द ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स' कहा जाता है। चार दिनों में 5,000 से 10,000 लोग मारे गए।

यह हिंसा नोआखली और त्रिपुरा में फैली, जिसके प्रतिशोध में बिहार और पंजाब में भयानक मारकाट मची। गांधीजी ने नोआखली में नंगे पांव शांति यात्रा की, किंतु मानवीय संबंध इस कदर टूट चुके थे कि विभाजन अब अपरिहार्य हो गया था।

चरण 5: माउंटबेटन योजना, आजादी व विभाजन की त्रासदी (1947)

5.1 माउंटबेटन योजना (3 जून 1947)

मार्च 1947 में अंतिम वायसराय बनकर आए लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने देश में गृहयुद्ध की स्थिति देखकर यह निष्कर्ष निकाला कि अखंड भारत असंभव है और विभाजन ही रक्तपात रोकने का एकमात्र उपाय है।

3 जून 1947 को उन्होंने अपनी ऐतिहासिक योजना प्रसारित की, जिसे माउंटबेटन योजना या 3 जून की योजना कहा जाता है:

  • ब्रिटिश भारत को दो स्वतंत्र डोमिनियनों में बांटा जाएगा: भारत और पाकिस्तान।
  • बंगाल और पंजाब की प्रांतीय विधानसभाएं दो भागों में बैठकर मतदान करेंगी; यदि कोई एक भाग भी विभाजन चाहेगा तो प्रांत का बंटवारा होगा।
  • उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह कराया जाएगा।
  • सत्ता हस्तांतरण की तिथि को 10 महीने पहले करके 15 अगस्त 1947 तय कर दिया गया।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने इस योजना को स्वीकार किया। 20 जून 1947 को बंगाल विधानसभा ने बंगाल के विभाजन के पक्ष में मतदान किया।

5.2 भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 व रेडक्लिफ रेखा

माउंटबेटन योजना के आधार पर ब्रिटिश संसद ने 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 (Indian Independence Act 1947) पारित किया।

पंजाब और बंगाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा तय करने के लिए लंदन के वकील सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में दो सीमा आयोग (Boundary Commissions) गठित किए गए।

  • पाँच हफ्तों की अविश्वसनीय समयसीमा: रेडक्लिफ इससे पहले कभी भारत नहीं आए थे। उन्हें पुराने नक्शों और अधूरी जानकारी के आधार पर मात्र 36 दिनों में 8.8 करोड़ लोगों की किस्मत तय करनी थी।
  • रेडक्लिफ रेखा (Radcliffe Line): रेडक्लिफ द्वारा खींची गई सीमा ने बंगाल को पश्चिम बंगाल (भारत) और पूर्वी बंगाल (पूर्वी पाकिस्तान) में बांट दिया।
  • घोषणा में विलंब: माउंटबेटन ने रेडक्लिफ के फैसले को 17 अगस्त 1947 (स्वतंत्रता के दो दिन बाद) प्रकाशित किया, ताकि हिंसा का दोष अंग्रेजों पर न आए।

5.3 14–15 अगस्त 1947: स्वतंत्रता व मध्यरात्रि का रक्तपात

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान का जन्म हुआ और जिन्ना ने कराची में शपथ ली। 14-15 अगस्त की मध्यरात्रि को स्वतंत्र भारत का उदय हुआ। जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में अमर भाषण दिया: 'Tryst with Destiny' (नियति से मिलन)।

किंतु राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दिल्ली के समारोहों से सैकड़ों मील दूर कलकत्ता के बेलियाघाटा स्थित हैदरी मंजिल में उपवास और प्रार्थना कर रहे थे ताकि साम्प्रदायिक आग को बुझाया जा सके।

गांधीजी के नैतिक प्रभाव ने कलकत्ता में शांति स्थापित की, जिसे देखकर माउंटबेटन ने उन्हें 'वन-मैन बाउंड्री फोर्स' (One-Man Boundary Force) कहा था।

5.4 मानवीय त्रासदी व शरणार्थी संकट (Refugee Crisis)

1947 का विभाजन मानव इतिहास का सबसे बड़ा और हिंसक जबरन विस्थापन सिद्ध हुआ। लगभग 1.5 करोड़ (देढ़ करोड़) लोगों को अपने पूर्वजों की धरती छोड़कर सीमाओं के पार जाना पड़ा।

दंगों में 5 से 10 लाख निर्दोष लोग मारे गए और 75,000 से अधिक महिलाओं के साथ बर्बर हिंसा और अपहरण की घटनाएं हुईं।

बंगाल में पूर्वी बंगाल से आए लाखों शरणार्थियों ने सियालदह रेलवे स्टेशन, ढाकुरिया झील और उपनगरीय रेलवे पटरियों के किनारे अत्यधिक अमानवीय परिस्थितियों में शरण ली, जिससे भीषण शरणार्थी संकट उत्पन्न हुआ।

5.5 पंजाब बनाम बंगाल व शरणार्थी कॉलोनी आंदोलन

WBBSE पाठ्यक्रम के अनुसार पंजाब और बंगाल के विभाजन अनुभवों में गहरा अंतर था:

विशेषतापंजाब का विभाजन अनुभवबंगाल का विभाजन अनुभव
विस्थापन की प्रकृतिएकमुश्त और त्वरित तबादला: कुछ ही महीनों में पश्चिमी पंजाब से लगभग सभी हिंदू-सिख भारत आ गए और पूर्वी पंजाब के मुस्लिम पाकिस्तान चले गए।दशकों तक जारी निरंतर पलायन: 1947, 1950 (बरिसाल दंगे), 1964 और 1971 (बांग्लादेश मुक्ति संग्राम) के दौरान लगातार शरणार्थियों की लहरें आती रहीं।
सरकारी पुनर्वासकेंद्रीय सरकार द्वारा पूर्ण मुआवजा: खाली हुई जमीनों का आवंटन तथा फरीदाबाद व दिल्ली जैसे योजनाबद्ध उपनगरों का निर्माण कराया गया।उपेक्षा व अस्थायी मानना: 1950 के नेहरू-लियाकत समझौते के तहत शरणार्थियों को अस्थायी मानकर मुआवजा नहीं दिया गया; दंडकारण्य और अंडमान जैसे दुर्गम क्षेत्रों में भेजने का प्रयास किया गया।
संघर्ष व कॉलोनी आंदोलनव्यापार और केंद्रीय पुनर्वास सहायता से समाज में पुनर्स्थापित हुए।जबरदखल कॉलोनी आंदोलन: जादवपुर, विजयगढ़ और दमदम जैसे क्षेत्रों में शरणार्थियों ने खाली पड़ी जमीनों पर कब्जे कर 'जबरदखल कॉलोनियां' (Squatter Colonies) बनाईं और UCRC के नेतृत्व में स्कूल, सड़कें व बाजार स्वयं विकसित किए।

बंगाली शरणार्थियों के इस संघर्ष और जीवटता ने स्वतंत्र पश्चिम बंगाल की राजनीति, शिक्षा और संस्कृति को गहरे रूप से पुनर्गठित किया।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

साम्प्रदायिकता और विभाजन की ऐतिहासिक कालक्रम तालिका (1857–1947)
$$1857 महाविद्रोह ⇒ 1906 मुस्लिम लीग ⇒ 1940 लाहौर प्रस्ताव ⇒ 1947 देश विभाजन$$
वर्षऐतिहासिक घटनासंवैधानिक व राजनीतिक महत्व
1837फारसी की समाप्तिअंग्रेजी अनिवार्य होने से पारंपरिक मुस्लिम कुलीन वर्ग प्रशासनिक सेवाओं से बाहर हुआ।
1872प्रथम जनगणनाधर्म के आधार पर जनसंख्या की गणना; पूर्वी बंगाल व पश्चिमी पंजाब में मुस्लिम बहुलता उजागर।
1875एम.ए.ओ. कॉलेज की स्थापनासर सैयद अहमद खां द्वारा आधुनिक शिक्षा का प्रसार; राजनीतिक रूप से कांग्रेस से दूरी।
1905बंगाल विभाजनलॉर्ड कर्जन द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल को विभाजित करने की साम्राज्यवादी नीति।
1906शिमला शिष्टमंडल व मुस्लिम लीगआगा खां के नेतृत्व में पृथक निर्वाचन की मांग; 30 दिसंबर को ढाका में मुस्लिम लीग का गठन।
1909मार्ले-मिंटो सुधारमुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन व्यवस्था लागू कर साम्प्रदायिकता को वैधानिक मान्यता।
1916लखनऊ समझौताकांग्रेस व मुस्लिम लीग में ऐतिहासिक एकता; स्वशासन की संयुक्त मांग और पृथक निर्वाचन की स्वीकृति।
1919–22खिलाफत व असहयोग आंदोलनगांधीजी व अली बंधुओं के नेतृत्व में हिंदू-मुस्लिम जनएकता का ऐतिहासिक शिखर।
1930इकबाल का इलाहाबाद भाषणकवि मुहम्मद इकबाल द्वारा उत्तर-पश्चिम में स्वायत्त मुस्लिम राज्य की अवधारणा।
1932साम्प्रदायिक पंचाट व पूना पैक्टमैक्डोनाल्ड का पंचाट; गांधीजी का अनशन व आंबेडकर के साथ पूना पैक्ट से संयुक्त निर्वाचन में सीटें आरक्षित।
1933रहमत अली का पर्चाकैम्ब्रिज में 'Now or Never' पर्चे में 'PAKSTAN' शब्द गढ़ा गया।
1937प्रांतीय चुनावकांग्रेस की भारी विजय; लीग की विफलता; जिन्ना द्वारा आक्रामक साम्प्रदायिक अभियान का आरंभ।
1940लाहोर प्रस्ताव (पाकिस्तान प्रस्ताव)फजलुल हक द्वारा प्रस्तुत; मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में 'स्वतंत्र राज्यों' की मांग।
1942क्रिप्स मिशन व भारत छोड़ोक्रिप्स प्रस्ताव विफल; भारत छोड़ो आंदोलन; कांग्रेस नेतृत्व जेल में; लीग का प्रसार।
1945शिमला सम्मेलनवायसराय वेवेल का सम्मेलन; सभी मुस्लिम सदस्यों पर जिन्ना के एकाधिकार की जिद से बैठक विफल।
1946कैबिनेट मिशन व प्रत्यक्ष कार्रवाईत्रि-स्तरीय योजना विफल; 16 अगस्त को मुस्लिम लीग की प्रत्यक्ष कार्रवाई व कलकत्ता दंगे।
1947माउंटबेटन योजना व विभाजन3 जून योजना स्वीकृत; रेडक्लिफ रेखा द्वारा पंजाब व बंगाल विभाजित; 1.5 करोड़ विस्थापित।
चुनावी ध्रुवीकरण तुलना: 1937 बनाम 1946 के आम चुनाव
$$बंगाल में (1946): {113}{119} मुस्लिम सीटों पर विजय ⇒ एकल मुस्लिम लीग मंत्रिमंडल$$
1937 के चुनावों में मुस्लिम लीग ने कुल 482 मुस्लिम सीटों में से केवल 109 सीटें (22.6%) जीती थीं। किन्तु 1946 के चुनावों में उग्र साम्प्रदायिक प्रचार के बल पर लीग ने 509 में से 442 सीटें (86.8%) और बंगाल में 119 में से 113 सीटें जीतकर पूर्ण राजनीतिक ध्रुवीकरण कर दिया।
पृथक निर्वाचन बनाम पूना पैक्ट की संयुक्त आरक्षण प्रणाली
$$पृथक निर्वाचन ⇒ साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण | संयुक्त निर्वाचन ⇒ सामाजिक समन्वय$$
पृथक निर्वाचन ने धार्मिक विभाजन को स्थायी बना दिया था; पूना पैक्ट के संयुक्त आरक्षण ने भारतीय समाज के साझा ताने-बाने को सुरक्षित रखा।
1946 की कैबिनेट मिशन त्रि-स्तरीय संघीय संरचना
$$ग्रुप A (हिंदू बहुल) \ + \ ग्रुप B (उत्तर-पश्चिम मुस्लिम) \ + \ ग्रुप C (बंगाल व असम)$$
अनिवार्य समूहन (Compulsory Grouping) को लेकर कांग्रेस और लीग में गंभीर मतभेद के कारण यह योजना टूट गई।
1933 में चौधरी रहमत अली का 'PAKSTAN' संक्षेपण सूत्र
$$'पाक' (पवित्र) + 'स्तान' (भूमि) ⇒ 'पवित्र भूमि'$$
विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि रहमत अली के मूल सूत्र में पूर्वी बंगाल का कोई उल्लेख नहीं था।
रेडक्लिफ सीमा आवंटन अनुपात व विसंगतियां
$$मुर्शिदाबाद (मुस्लिम बहुल) → भारत ⇔ खुलना (हिंदू बहुल) → पाकिस्तान$$
सीमा पर 68 वर्षों तक अनसुलझे छिटमहलों (Enclaves) का गंभीर संकट बना रहा, जिसे 2015 के भूमि सीमा समझौते (LBA) द्वारा सुलझाया गया।
1947 के विभाजन की जनसांख्यिकीय क्षति के संकेतक
$$मानव इतिहास का सबसे बड़ा और खूनी अनिवार्य पलायन$$
इसने स्वतंत्र भारत में पश्चिम बंगाल और पंजाब पर दशकों तक चलने वाले शरणार्थी पुनर्वास का भीषण संकट उत्पन्न किया।
बंगाल में शरणार्थियों के आगमन के चार प्रमुख दौर
$$पश्चिम बंगाल में कुल शरणार्थी > 60 लाख से अधिक (25 वर्षों में)$$
इसके परिणामस्वरूप कलकत्ता और उपनगरों में ऐतिहासिक जबरदखल कॉलोनी आंदोलन (Refugee Colony Movement) का जन्म हुआ।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
मार्च 1888 के मेरठ भाषण में सर सैयद अहमद खां ने मुसलमानों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से दूर रहने की सलाह क्यों दी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

ऐतिहासिक संदर्भ: 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई, जो लोकतांत्रिक चुनाव और सिविल सेवा परीक्षाओं की मांग कर रही थी।

जनसंख्या का अनुपात: सर सैयद ने स्पष्ट किया कि भारत में हिंदू और मुसलमानों का अनुपात चार और एक का है। सामान्य बहुमत में मुस्लिम हमेशा अल्पसंख्यक रहेंगे।

शिक्षा की कमी: 1837 में फारसी हटने के बाद मुस्लिम आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा में काफी पिछड़ गए थे, जिससे खुली प्रतियोगिता में उनके चुने जाने की संभावना कम थी।

राजनीतिक रणनीति: उन्होंने आंदोलन के बजाय शिक्षा पर ध्यान देने और ब्रिटिश सरकार की कृपा से अपने अधिकारों की रक्षा करने की सलाह दी।

उदाहरण 2
मार्ले-मिंटो सुधारों की पृथक निर्वाचन प्रणाली ने साम्प्रदायिकता को किस तरह स्थायी रूप दिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

निर्वाचन की प्रकृति: संयुक्त निर्वाचन में उम्मीदवार को सभी धर्मों के मतदाताओं से वोट मांगना पड़ता है, जिससे उसे उदारवादी रुख अपनाना पड़ता है।

पृथक निर्वाचन का असर: पृथक निर्वाचन में केवल मुस्लिम मतदाता ही वोट दे सकते थे, जिससे नेताओं को जीतने के लिए केवल अपने धार्मिक समुदाय की भावनाएं भड़कानी पड़ती थीं।

साम्राज्यवादी हित: अंग्रेज सरकार ने विधायिकाओं में भारतीय राष्ट्रवादियों की साझा एकता को तोड़कर हर बहस को साम्प्रदायिक विवाद में बदल दिया।

उदाहरण 3
23 मार्च 1940 को ए. के. फजलुल हक द्वारा प्रस्तुत मूल लाहौर प्रस्ताव में 'Independent States' (स्वतंत्र राज्यों) का क्या अर्थ था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मूल पाठ: प्रस्ताव में उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों को मिलाकर 'Independent States' (बहुवचन) बनाने की मांग की गई थी।

बंगाली दृष्टिकोण: फजलुल हक चाहते थे कि पूर्व में बंगाल और असम को मिलाकर एक अलग स्वायत्त राज्य बने, जो पश्चिमी कुलीनों के वर्चस्व से मुक्त रहे।

1946 का बदलाव: 1946 में दिल्ली सम्मेलन में जिन्ना ने इसे बदलकर 'एकल पाकिस्तान' कर दिया, जिसका बंगाली नेताओं ने तीखा विरोध किया था।

उदाहरण 4
कैबिनेट मिशन के प्रांतीय समूहन (A, B, C ग्रुप) को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग में क्या विवाद था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

समूहन योजना: मिशन ने भारत को तीन समूहों में बांटा: ग्रुप A (हिंदू बहुल), ग्रुप B (उत्तर-पश्चिम मुस्लिम), और ग्रुप C (बंगाल व असम)।

लीग का दृष्टिकोण: जिन्ना का कहना था कि यह समूहन अनिवार्य है और कोई प्रांत इससे बाहर नहीं हो सकता, जिससे पाकिस्तान का निर्माण सुनिश्चित हो सके।

कांग्रेस की आपत्ति: कांग्रेस का तर्क था कि असम और सीमांत प्रांत जैसे प्रांतों को अपनी इच्छा से समूह चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

विफलता: नेहरू के बयान के बाद जिन्ना ने स्वीकृति वापस लेकर 16 अगस्त को प्रत्यक्ष कार्रवाई का आह्वान कर दिया।

उदाहरण 5
सर सिरिल रेडक्लिफ के सीमा आयोग को बंगाल का विभाजन करते समय किन व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

समय का अभाव: रेडक्लिफ को पुराने नक्शों और अधूरी जानकारी के आधार पर मात्र 36 दिनों में सीमा खींचनी पड़ी।

कलकत्ता विवाद: मुस्लिम लीग कलकत्ता चाहती थी, किंतु लगभग 75% हिंदू आबादी और आर्थिक महत्व के कारण इसे भारत को दिया गया।

मुर्शिदाबाद-खुलना अदला-बदली: हुगली-भागीरथी नदी मार्ग सुरक्षित रखने के लिए मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद भारत को मिला और हिंदू बहुल खुलना पाकिस्तान को दिया गया।

मानवीय संकट: सीमा रेखा घरों और खेतों के बीच से निकली, जिससे दशकों तक छिटमहलों का अनसुलझा संकट बना रहा।

उदाहरण 6
माउंटबेटन योजना के तहत बंगाल के विभाजन का कानूनी निर्णय कैसे लिया गया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

दो अलग सत्र: बंगाल विधानसभा को गैर-मुस्लिम बहुल और मुस्लिम बहुल दो हिस्सों में बांटा गया।

संयुक्त सत्र: पूरी विधानसभा के संयुक्त मतदान में 126 विरुद्ध 90 मतों से पाकिस्तान में शामिल होने का प्रस्ताव पारित हुआ।

पश्चिम बंगाल का अलग मतदान: किंतु गैर-मुस्लिम बहुल भाग के सदस्यों ने अलग बैठकर 58 विरुद्ध 21 मतों से प्रांत का बंटवारा कर भारत में रहने का निर्णय लिया।

परिणाम: योजना के नियमानुसार किसी एक भाग के विभाजन चाहने पर भी प्रांत का बंटवारा अनिवार्य था, अतः विभाजन तय हो गया।

उदाहरण 7
हुसैन शहीद सुहरावर्दी और शरत चंद्र बोस की अविभाजित स्वतंत्र बंगाल योजना क्यों विफल हुई?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

प्रस्ताव: सुहरावर्दी और शरत बोस ने भारत और पाकिस्तान दोनों से अलग एक संप्रभु, संयुक्त बंगाल का प्रस्ताव रखा था।

उद्देश्य: बंगाली भाषा व संस्कृति की एकता बनाए रखना और हिंदू-मुस्लिम की साझी सरकार बनाना।

शीर्ष नेतृत्व का विरोध: नेहरू और पटेल ने भारत के कई टुकड़ों में बिखरने के डर से इसे पूरी तरह खारिज कर दिया; जिन्ना ने भी उत्साह नहीं दिखाया।

जनभावना: 1946 के कलकत्ता दंगों के बाद कलकत्ता के हिंदू मध्यवर्ग को मुस्लिम लीग के नेतृत्व पर बिल्कुल भरोसा नहीं था।

उदाहरण 8
पश्चिम बंगाल का 'जबरदखल कॉलोनी आंदोलन' शरणार्थियों की आत्मनिर्भरता और अधिकार की लड़ाई का प्रतीक कैसे बना?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

सरकारी मदद की कमी: पंजाबी शरणार्थियों की तरह मुआवजा न मिलने से लाखों शरणार्थी सियालदह स्टेशन और सड़कों पर पड़े रहे।

भूमि कब्जा: UCRC के नेतृत्व में शरणार्थियों ने कलकत्ता के आसपास खाली पड़ी निजी व सरकारी जमीनों पर कॉलोनियां बसाईं (जैसे विजयगढ़, जादवपुर)।

आत्मनिर्भर प्रयास: शरणार्थियों ने स्वयं सड़कें बनाईं, नल लगवाए, स्कूल व बाजार स्थापित किए और पुलिसिया बेदखली का डटकर मुकाबला किया।

राजनीतिक प्रभाव: इस आंदोलन ने पश्चिम बंगाल में वामपंथी राजनीति और जनचेतना को मजबूत आधार प्रदान किया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि मुस्लिम लीग ने 1906 में स्थापना के समय से ही पाकिस्तान राज्य की मांग की थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

1906 में मुस्लिम लीग केवल ब्रिटिश राज के तहत मुसलमानों के लिए शिक्षा, नौकरियों में आरक्षण और पृथक निर्वाचन चाहती थी। अलग पाकिस्तान की औपचारिक मांग 1940 के लाहौर अधिवेशन में ही पहली बार उठाई गई।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

साम्प्रदायिक पंचाट (1932) और पूना पैक्ट (1932) को एक ही घटना मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

साम्प्रदायिक पंचाट ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैक्डोनाल्ड की घोषणा थी, जिसमें दलितों को पृथक निर्वाचन दिया गया। पूना पैक्ट महात्मा गांधी और डॉ. बी. आर. आंबेडकर के बीच ऐतिहासिक समझौता था, जिसके तहत पृथक निर्वाचन समाप्त कर संयुक्त निर्वाचन में सीटें आरक्षित की गईं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

16 अगस्त 1946 और 15 अगस्त 1947 की तिथियों में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

16 अगस्त 1946 मुस्लिम लीग का 'प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस' (Direct Action Day) था जिसके कारण कलकत्ता में भयानक दंगे हुए। जबकि 15 अगस्त 1947 भारत का स्वतंत्रता दिवस है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि विभाजन का असर केवल पंजाब और बंगाल तक ही सीमित था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

हालांकि पंजाब और बंगाल भौगोलिक रूप से विभाजित हुए, किंतु सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP), असम के सिलहट, बिहार, दिल्ली और संयुक्त प्रांत में भी भयानक साम्प्रदायिक हिंसा और व्यापक विस्थापन हुआ।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि रेडक्लिफ रेखा जमीनी स्तर पर मौके पर जाकर सर्वेक्षण करके खींची गई थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सर सिरिल रेडक्लिफ कभी भारत-पाकिस्तान सीमा के गांवों में नहीं गए; उन्होंने नई दिल्ली के दफ्तर में बैठकर पुराने नक्शों और जिला प्रशासन के आंकड़ों के आधार पर मात्र 36 दिनों में लकीर खींची थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

कृषक प्रजा पार्टी (KPP) को एक साम्प्रदायिक दल मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कृषक प्रजा पार्टी कोई साम्प्रदायिक संगठन नहीं था; यह हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के गरीब किसानों और रैयतों का गैर-साम्प्रदायिक दल था। कांग्रेस द्वारा समर्थन न मिलने पर हक ने विवश होकर मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

क्रिप्स मिशन (1942) और कैबिनेट मिशन (1946) के उद्देश्यों को एक समान समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

क्रिप्स मिशन ने प्रांतों को संघ से अलग होने की छूट दी थी। इसके विपरीत कैबिनेट मिशन (1946) ने संप्रभु पाकिस्तान की मांग को स्पष्ट रूप से खारिज कर भारत की एकता बनाए रखने हेतु त्रि-स्तरीय योजना का प्रस्ताव दिया था।

साम्प्रदायिकता से विभाजन (1857–1947) – समयरेखा एवं विभाजन का मार्ग

WBBSE कक्षा 8 इतिहास • अध्याय 8 संकल्पना मानचित्र साम्प्रदायिकता से विभाजन (1857–1947) अतीत ও ঐতিহ্য चरण 1 (1857-1909) औपनिवेशिक विभाजन बांटो और राज करो नीति 1857 के बाद के बदलाव • 1837: फारसी की जगह अंग्रेजी • 1872: पहली धर्म-आधारित जनगणना अलीगढ़ आंदोलन • सर सैयद अहमद खां (1875) • एम.ए.ओ. कॉलेज की स्थापना • पृथक राजनीतिक पहचान का बीजारोपण मुस्लिम लीग की स्थापना • 1905: बंगाल विभाजन (कर्जन) • 1906: शिमला शिष्टमंडल • 1906: ढाका में मुस्लिम लीग गठन 1909: पृथक निर्वाचन मार्ले-मिंटो सुधारों द्वारा धर्म के आधार पर पृथक निर्वाचन मंडल देकर साम्प्रदायिकता को वैधानिक रूप। → स्थायी राजनीतिक विभाजन चरण 2 (1916-1939) समझौते व ध्रुवीकरण सद्भाव से स्थायी अलगाव एकता और दरार • 1916: लखनऊ पैक्ट (एकजुटता) • 1919-22: खिलाफत-असहयोग आंदोलन • 1920 का दशक: दंगे व तनाव 1932: साम्प्रदायिक पंचाट • मैक्डोनाल्ड साम्प्रदायिक पंचाट • गांधीजी का आमरण अनशन • पूना पैक्ट: आरक्षित सीटें व्यवस्था पाकिस्तान की परिकल्पना • 1930: इकबाल का इलाहाबाद भाषण • 1933: रहमत अली का 'Now or Never' • मुस्लिम स्वभूमि का विचार 1937: प्रांतीय चुनाव सामान्य सीटों पर कांग्रेस विजयी; बंगाल: फजलुल हक (KPP + लीग); पंजाब: यूनियनिस्ट सरकार; → जिन्ना द्वारा लीग का पुनर्गठन चरण 3 (1940-1946) संकट और गतिरोध युद्धकाल और खूनी हिंसा 1940: लाहौर प्रस्ताव • द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की औपचारिक मांग • प्रस्तावकर्ता: ए. के. फजलुल हक • मुस्लिम बहुल स्वतंत्र राज्यों की मांग युद्धकालीन गतिरोध • 1942: क्रिप्स मिशन विफल • 1942: भारत छोड़ो आंदोलन • 1945: शिमला सम्मेलन विफल 1946: कैबिनेट मिशन • त्रि-स्तरीय संघीय योजना (A, B, C) • संप्रभु पाकिस्तान मांग खारिज • समूहन विवाद से समझौता भंग 16 अगस्त 1946 प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस; कलकत्ता में भीषण साम्प्रदायिक दंगे; नोआखली व बिहार में हिंसा की ज्वाला; → विभाजन अब अपरिहार्य बना चरण 4 (1947) विभाजन व त्रासदी स्वतंत्रता और विस्थापन माउंटबेटन योजना • 3 जून 1947 विभाजन का खाका • कांग्रेस और लीग द्वारा स्वीकृत • स्वतंत्रता अधिनियम पारित (जुलाई) रेडक्लिफ रेखा • सर सिरिल रेडक्लिफ आयोग • पंजाब व बंगाल का विभाजन • 17 अगस्त 1947 सीमा प्रकाशित आजादी और रक्तपात • 14 अगस्त: पाकिस्तान का जन्म • 15 अगस्त: भारत की आजादी • 10 लाख से अधिक लोगों का नरसंहार शरणार्थी संकट 1.5 करोड़ लोगों का विस्थापन; पंजाब में तीव्र व अचानक तबादला; बंगाल में दशकों तक जारी पलायन, सियालदह स्टेशन व कॉलोनी आंदोलन। TargetExams WBBSE Gold Standard • ऐतिहासिक क्रम: औपनिवेशिक विभाजन → पृथक निर्वाचन → द्वि-राष्ट्र सिद्धांत → प्रत्यक्ष कार्रवाई → रेडक्लिफ विभाजन → शरणार्थी संकट

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. 1857 के महाविद्रोह के बाद ब्रिटिश साम्राज्य ने भारतीय एकता को तोड़ने के लिए 'बांटो और राज करो' (Divide and Rule) नीति अपनाई।
मुख्य बिंदु 2
  1. 1837 में फारसी हटने से मुस्लिम समाज पिछड़ा और 1872 की जनगणना ने आबादी को धर्म के आधार पर विभाजित किया।
मुख्य बिंदु 3
  1. सर सैयद अहमद खां ने अलीगढ़ आंदोलन से आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिया, किंतु मुसलमानों को कांग्रेस की राजनीति से दूर रखा।
मुख्य बिंदु 4
  1. 1906 के शिमला शिष्टमंडल के बाद ढाका में मुस्लिम लीग बनी और 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों में पृथक निर्वाचन प्रणाली लागू हुई।
मुख्य बिंदु 5
  1. 1916 के लखनऊ समझौते और 1919–22 के खिलाफत-असहयोग आंदोलन में साझी एकता दिखी, किंतु 1920 के दशक में दंगे और तनाव बढ़े।
मुख्य बिंदु 6
  1. मुहम्मद इकबाल (1930) व रहमत अली (1933) की परिकल्पना जिन्ना के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के जरिए 1940 के लाहौर प्रस्ताव में परिणत हुई।
मुख्य बिंदु 7
  1. 1942 के क्रिप्स मिशन व भारत छोड़ो के बाद 1946 का कैबिनेट मिशन विफल रहा और 16 अगस्त प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के कलकत्ता दंगों ने विभाजन तय किया।
मुख्य बिंदु 8
  1. 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना और रेडक्लिफ रेखा से पंजाब व बंगाल विभाजित हुए; 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए और बंगाल में कॉलोनी आंदोलन चला।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1870 के दशक में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय मुसलमानों के प्रति अपनी नीति क्यों बदली?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार मुसलमानों पर शक करती थी, किंतु 1870 के दशक में दो कारणों से नीति बदली:

  1. राष्ट्रवादी शिक्षित वर्ग का उदय: अंग्रेजी पढ़े-लिखे हिंदू मध्यम वर्ग ने स्वशासन और अधिकारों की मांग शुरू कर दी थी।
  2. डब्लू. डब्लू. हंटर की सिफारिशें: हंटर ने 'द इंडियन मुसलमान्स' (1871) में दिखाया कि शिक्षा व नौकरियों में भारी पिछड़ापन मुसलमानों में गुस्सा पैदा कर रहा है। उन्होंने सरकार को सलाह दी कि मुस्लिम शिक्षित वर्ग को संरक्षण देकर कांग्रेस के राष्ट्रवाद के विरुद्ध संतुलन बनाया जाए।

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 इतिहास पाठ्यपुस्तक के अनुसार महत्वपूर्ण अवधारणा।
2
1916 के लखनऊ समझौते का महत्व और मुख्य सीमा क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

महत्व: लखनऊ समझौते के जरिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने पहली बार संयुक्त रूप से स्वशासन की मांग की, जो साझी एकता का स्वर्णिम उदाहरण था।

सीमा: कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन को आधिकारिक मान्यता दे दी। इसके अलावा यह समझौता केवल शीर्ष नेताओं के बीच था; नीचे जनता में धर्मनिरपेक्ष चेतना न होने से 1920 के दशक में यह एकता टूट गई।


पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 इतिहास पाठ्यपुस्तक के अनुसार महत्वपूर्ण अवधारणा।
3
1937 के प्रांतीय चुनाव परिणामों ने जिन्ना की राजनीति को कैसे बदल दिया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

1937 के चुनावों में मुस्लिम लीग को 5% से भी कम वोट मिले और कांग्रेस ने संयुक्त प्रांत में लीग को मंत्रिमंडल में लेने से मना कर दिया।

जिन्ना को लगा कि साधारण बहुमत के लोकतंत्र में मुस्लिम कभी सत्ता में साझीदार नहीं बन सकते। उन्होंने समझौते की राह छोड़कर 'इस्लाम खतरे में है' का नारा दिया, लीग को जन-संगठन बनाया और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का आक्रामक प्रचार शुरू किया।


पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 इतिहास पाठ्यपुस्तक के अनुसार महत्वपूर्ण अवधारणा।
4
1946 के कैबिनेट मिशन की त्रि-स्तरीय संघीय योजना क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

देश की एकता बनाए रखने के लिए कैबिनेट मिशन ने तीन स्तरों की योजना बनाई थी:

  • पहला स्तर (केंद्रीय संघ): केवल रक्षा, विदेश और संचार मामले देखेगा।
  • दूसरा स्तर (तीन समूह): हिंदू बहुल प्रांत (ग्रुप A), उत्तर-पश्चिम मुस्लिम प्रांत (ग्रुप B), और बंगाल-असम (ग्रुप C)।
  • तीसरा स्तर (प्रांत): बाकी सभी अधिकारों में पूर्ण स्वायत्त होंगे।

समूहन अनिवार्य है या ऐच्छिक—इस विवाद के कारण यह योजना टूट गई।


पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 इतिहास पाठ्यपुस्तक के अनुसार महत्वपूर्ण अवधारणा।
5
पंजाब की तुलना में बंगाल का शरणार्थी संकट क्यों भिन्न और जटिल था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

WBBSE पाठ्यक्रम के अनुसार तीन मुख्य अंतर थे:

  1. विस्थापन की समयसीमा: पंजाब में कुछ ही महीनों में पूरी आबादी का तबादला हो गया; बंगाल में 1947, 1950, 1964 और 1971 में किश्तों में 25 वर्षों तक लोग आते रहे।
  2. सरकारी सहायता: केंद्र सरकार ने पंजाबी शरणार्थियों को जमीन और शहर बसाकर दिए; बंगाली शरणार्थियों को नेहरू-लियाकत समझौते के तहत 'अस्थायी' मानकर उपेक्षित किया।
  3. कॉलोनी आंदोलन: बंगाली शरणार्थियों ने सरकारी मदद की प्रतीक्षा किए बिना UCRC के तहत खाली जमीनें कब्जा कर कॉलोनियां बसाईं और अपने अधिकार हासिल किए।

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 इतिहास पाठ्यपुस्तक के अनुसार महत्वपूर्ण अवधारणा।
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अध्याय 1: Concept of History अध्याय 2: Rise of Regional Powers अध्याय 3: Establishment of Colonial Authority अध्याय 4: औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप अध्याय 5: औपनिवेशिक शासन के प्रति प्रतिक्रिया: सहयोग और विद्रोह अध्याय 6: राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास अध्याय 7: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श और विकास अध्याय 8: सांप्रदायिकता से विभाजन अध्याय 9: भारतीय संविधान: लोकतांत्रिक ढांचा और नागरिकों के अधिकार अध्याय 10: पृथ्वी की आंतरिक संरचना अध्याय 11: अस्थिर पृथ्वी अध्याय 12: शैल (चट्टानें) अध्याय 13: वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार अध्याय 14: बादल और वर्षा अध्याय 15: जलवायु प्रदेश अध्याय 16: मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन अध्याय 17: भारत के कुछ पड़ोसी देश और उनके साथ संबंध अध्याय 18: उत्तर अमेरिका महाद्वीप अध्याय 19: दक्षिण अमेरिका महाद्वीप अध्याय 20: ओशिनिया महाद्वीप

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