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WBB • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 13
अनुमानित समय: 50 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) द्वारा निर्धारित कक्षा 8 के भूगोल पाठ्यक्रम "हमारी पृथ्वी" (Our Earth) के चतुर्थ अध्याय "वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार" (Pressure Belts and Winds / अध्याय 4: वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार / অধ্যায় ৪: বায়ুচাপ বলয় ও বায়ুপ্রবাহ) के प्रामाणिक एवं संपूर्ण अध्ययन मार्गदर्शिका में आपका स्वागत है। पृथ्वी का वायुमंडल गैसों का एक विशाल, निरंतर गतिशील महासागर है, जिसका अपना द्रव्यमान और भार होता है तथा जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण धरातल के प्रत्येक वर्ग सेंटीमीटर पर नीचे की ओर निरंतर दबाव डालता है। समुद्र तल पर मानक वायुमंडलीय दाब 1013.25 मिलीबार (या टोरीसेली के पारद बैरोमीटर में 76 सेमी पारा स्तंभ के बराबर) होता है। धरातल पर सूर्य के ताप के असमान वितरण तथा पृथ्वी की दैनिक घूर्णन गति के कारण वायुदाब में अंतर उत्पन्न होता है, जिससे भूमंडल पर 7 स्थायी वायुदाब पेटियों का निर्माण हुआ है: तापीय कारणों से निर्मित विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी (शांत कटिबंध या डोलड्रम्स व ITCZ); गतिकीय कारणों से निर्मित उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटियाँ (25°-35° अक्षांश, ऐतिहासिक अश्व अक्षांश); गतिकीय उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटियाँ (60°-70° अक्षांश); तथा तापीय ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटियाँ (80°-90° अक्षांश)। वायुदाब के संतुलन हेतु हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर दाब प्रवणता बल (PGF) के अधीन बहती है, जिसे पवन (Wind) कहते हैं। पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न कोरिऑलिस बल के प्रभाव से पवनें मुड़ जाती हैं, जो फेरेल के नियम (उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विक्षेप) तथा बायस बैलट के नियम का पालन करती हैं। इस नियम पर आधारित तीन प्रमुख सनातनी पवनें बहती हैं: व्यापारिक पवनें (जो उष्ण मरुस्थलों का निर्माण करती हैं), पछुआ पवनें (जिनके कारण दक्षिणी गोलार्ध के खुले महासागरों में गरजता चालीसा, प्रचंड पचासा और चीखता साठा बहती हैं) तथा ध्रुवीय पवनें। इसके साथ ही दिन-रात की सामयिक पवनें (जल व स्थल समीर, घाटी व पर्वतीय समीर), ऋतुनिष्ठ मानसूनी पवनें, विभिन्न महाद्वीपों की स्थानीय पवनें (लू, चिनूक, फ़ॉन, सिरोक्को, हरमट्टन, मिस्ट्रल, बोरा, ब्लिजार्ड) तथा विनाशकारी चक्रवात और शांत प्रतिचक्रवात इस तंत्र को पूर्ण करते हैं। इस अध्याय में 5 व्यापक मॉड्यूल, 25 शैक्षणिक उपखंड, उत्तरदायी वेक्टर SVG संकल्पना मानचित्र, 8 वैज्ञानिक वायुमंडलीय सूत्र, 8 विस्तृत पाठ्यपुस्तकीय हल किए गए उदाहरण, 7 परीक्षक जाल चेतावनियां, 8 मुख्य सारांश बिंदु, 8 मुख्य निष्कर्ष, 5 स्व-मूल्यांकन प्रश्न तथा 5 CBT डायग्नोस्टिक बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) शामिल हैं।

🌬️ हवा का अदृश्य भार और महासागरीय तूफानों की गर्जना: पवन तंत्र का अद्भुत रहस्य!

क्या आप जानते हैं कि इस समय आपके सिर और कंधों पर हवा प्रति वर्ग सेंटीमीटर लगभग 1 किलोग्राम का भार डाल रही है—यानी आपके पूरे शरीर पर लगभग 10 से 15 टन का भारी वायुमंडलीय दबाव पड़ रहा है?

फिर भी आप इसे महसूस नहीं करते, क्योंकि आपके शरीर के भीतर बहने वाले रक्त और शारीरिक द्रवों का दबाव बाहर के इस वायुमंडलीय दबाव को पूर्णतः संतुलित कर देता है!

पालतू जहाजों को महीनों तक थाम देने वाले शांत कटिबंध (Doldrums) और प्यासे नाविकों द्वारा घोड़ों को समुद्र में फेंकने वाले रहस्यमय अश्व अक्षांश (Horse Latitudes) से लेकर दक्षिणी सागरों को कंपा देने वाले गरजता चालीसा (Roaring Forties) और गंगा के मैदानों की झुलसाने वाली लू (Loo) तक—आइए गहराई से समझें वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार के प्रामाणिक वैज्ञानिक नियम!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) द्वारा निर्धारित कक्षा 8 के भूगोल पाठ्यक्रम "हमारी पृथ्वी" (Our Earth) के चतुर्थ अध्याय "वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार" (Pressure Belts and Winds / अध्याय 4: वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार / অধ্যায় ৪: বায়ুচাপ বলয় ও বায়ুপ্রবাহ) के प्रामाणिक एवं संपूर्ण अध्ययन मार्गदर्शिका में आपका स्वागत है। पृथ्वी का वायुमंडल गैसों का एक विशाल, निरंतर गतिशील महासागर है, जिसका अपना द्रव्यमान और भार होता है तथा जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण धरातल के प्रत्येक वर्ग सेंटीमीटर पर नीचे की ओर निरंतर दबाव डालता है। समुद्र तल पर मानक वायुमंडलीय दाब 1013.25 मिलीबार (या टोरीसेली के पारद बैरोमीटर में 76 सेमी पारा स्तंभ के बराबर) होता है। धरातल पर सूर्य के ताप के असमान वितरण तथा पृथ्वी की दैनिक घूर्णन गति के कारण वायुदाब में अंतर उत्पन्न होता है, जिससे भूमंडल पर 7 स्थायी वायुदाब पेटियों का निर्माण हुआ है: तापीय कारणों से निर्मित विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी (शांत कटिबंध या डोलड्रम्स व ITCZ); गतिकीय कारणों से निर्मित उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटियाँ (25°-35° अक्षांश, ऐतिहासिक अश्व अक्षांश); गतिकीय उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटियाँ (60°-70° अक्षांश); तथा तापीय ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटियाँ (80°-90° अक्षांश)। वायुदाब के संतुलन हेतु हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर दाब प्रवणता बल (PGF) के अधीन बहती है, जिसे पवन (Wind) कहते हैं। पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न कोरिऑलिस बल के प्रभाव से पवनें मुड़ जाती हैं, जो फेरेल के नियम (उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विक्षेप) तथा बायस बैलट के नियम का पालन करती हैं। इस नियम पर आधारित तीन प्रमुख सनातनी पवनें बहती हैं: व्यापारिक पवनें (जो उष्ण मरुस्थलों का निर्माण करती हैं), पछुआ पवनें (जिनके कारण दक्षिणी गोलार्ध के खुले महासागरों में गरजता चालीसा, प्रचंड पचासा और चीखता साठा बहती हैं) तथा ध्रुवीय पवनें। इसके साथ ही दिन-रात की सामयिक पवनें (जल व स्थल समीर, घाटी व पर्वतीय समीर), ऋतुनिष्ठ मानसूनी पवनें, विभिन्न महाद्वीपों की स्थानीय पवनें (लू, चिनूक, फ़ॉन, सिरोक्को, हरमट्टन, मिस्ट्रल, बोरा, ब्लिजार्ड) तथा विनाशकारी चक्रवात और शांत प्रतिचक्रवात इस तंत्र को पूर्ण करते हैं। इस अध्याय में 5 व्यापक मॉड्यूल, 25 शैक्षणिक उपखंड, उत्तरदायी वेक्टर SVG संकल्पना मानचित्र, 8 वैज्ञानिक वायुमंडलीय सूत्र, 8 विस्तृत पाठ्यपुस्तकीय हल किए गए उदाहरण, 7 परीक्षक जाल चेतावनियां, 8 मुख्य सारांश बिंदु, 8 मुख्य निष्कर्ष, 5 स्व-मूल्यांकन प्रश्न तथा 5 CBT डायग्नोस्टिक बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) शामिल हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • वायुमंडल के संघटन (नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड एवं जलवाष्प) का प्राथमिक ज्ञान।
  • तापमान बढ़ने पर हवा के फैलने व हल्की होने तथा ठंडी होने पर सिकुड़ने व भारी होने की अवधारणा।
  • पश्चिम से पूर्व की ओर पृथ्वी की दैनिक घूर्णन गति तथा अक्षांश रेखाओं की बुनियादी पहचान।
  • बल एवं दाब की मूल अवधारणा ($ ext{दाब} = ext{बल} / ext{क्षेत्रफल}$) तथा गुरुत्वाकर्षण बल।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • वायुमंडलीय दाब की परिभाषा, टोरीसेली के बैरोमीटर की कार्यप्रणाली तथा सेमी पारा स्तंभ से मिलीबार (mb) में रूपांतरण समझाना।
  • वायुदाब की विषमता के चार प्रमुख कारकों: तापमान, ऊंचाई, जलवाष्प तथा पृथ्वी की घूर्णन गति का वैज्ञानिक विश्लेषण करना।
  • पृथ्वी की 7 स्थायी वायुदाब पेटियों की स्थिति तथा उनकी उत्पत्ति (तापीय बनाम गतिकीय) का सप्रमाण वर्णन करना।
  • वायुदाब पेटियों के मौसमी खिसकाव (सूर्य के उत्तरायण व दक्षिणायन) तथा भूमध्यसागरीय वर्षा व भारतीय मानसून पर उसके प्रभाव का मूल्यांकन करना।
  • दाब प्रवणता बल (PGF), कोरिऑलिस बल, फेरेल के नियम एवं बायस बैलट के नियम के भौतिक सिद्धांतों को प्रतिपादित करना।
  • सनातनी पवनों (व्यापारिक, पछुआ, ध्रुवीय) का वर्गीकरण करना तथा गरजता चालीसा, प्रचंड पचासा व चीखता साठा के कारणों को समझाना।
  • सामयिक पवनों (सागर व थल समीर, अनाबैटिक व कैटाबैटिक समीर, मानसून) तथा प्रसिद्ध स्थानीय पवनों (लू, चिनूक, फ़ॉन, सिरोक्को, हरमट्टन) के लक्षणों की पहचान करना।
  • चक्रवात एवं प्रतिचक्रवात के वायुदाब, घूर्णन दिशा व मौसम की तुलना करना तथा एनीमोमीटर व वात-पताका द्वारा पवन मापन को समझना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. वायुदाब की अवधारणा, नियंत्रण कार...
2 2. विश्व की सात स्थायी वायुदाब पेटि...
3 3. पवन गति के बुनियादी नियम एवं प्र...
4 4. सनातनी पवनें, सामयिक पवनें एवं व...
5 5. अनियमित पवनें, चक्रवात-प्रतिचक्र...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. वायुदाब की अवधारणा, नियंत्रण कारक एवं मापक यंत्र

1.1 वायुदाब की अवधारणा एवं मानक समुद्र तलीय दाब

वायु विभिन्न गैसों का एक भौतिक मिश्रण है जिसका अपना निश्चित द्रव्यमान और भार होता है। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण वायुमंडल की गैसें धरातल की ओर आकर्षित होती हैं। भौतिक भूगोल में वायुमंडलीय दाब (Atmospheric Pressure) को समुद्र तल पर प्रति इकाई अनुप्रस्थ क्षेत्रफल पर लंबवत स्थित संपूर्ण वायु स्तंभ के नीचे की ओर लगने वाले भार के रूप में परिभाषित किया जाता है।

समुद्र तल पर 45° अक्षांश पर और 0° सेल्सियस तापमान पर वायु का दाब पारे के 76 सेमी (या 760 मिमी या 29.92 इंच) ऊंचे स्तंभ को संतुलित रखता है। मौसम विज्ञान की भाषा में इसे मानक वायुमंडलीय दाब (Standard Atmospheric Pressure) कहते हैं। इसका मान:

  • मानक वायुदाब: 1013.25 मिलीबार (mb) या 1013.25 हेक्टोपास्कल (hPa), जो प्रति वर्ग मीटर पर लगभग $1.013 \times 10^5\text{ न्यूटन}$ बल के बराबर होता है।
  • उच्च वायुदाब (High Pressure): किसी क्षेत्र का वायुदाब 1013.25 मिलीबार से अधिक होने पर उसे उच्चदाब कहते हैं (समदाब रेखाओं पर 1020 mb, 1024 mb आदि द्वारा दर्शाया जाता है)।
  • निम्न वायुदाब (Low Pressure): किसी क्षेत्र का वायुदाब 1013.25 मिलीबार से कम होने पर उसे निम्नदाब कहते हैं (समदाब रेखाओं पर 1000 mb, 992 mb या प्रचंड चक्रवातों में 960 mb से भी नीचे गिर जाता है)।

1.2 बैरोमीटर: टोरीसेली, फॉर्टिन एवं निर्द्रव (एनेरॉइड) बैरोमीटर

वायुमंडलीय दाब मापने हेतु प्रयुक्त यंत्र को बैरोमीटर या वायुदाबमापी (Barometer) कहते हैं:

बैरोमीटर का प्रकार कार्य सिद्धांत विशेषताएं एवं उपयोगिता
टोरीसेली का पारद बैरोमीटर (1643) पारे से भरी एक तरफ बंद कांच की नली को पारे के पात्र में उल्टा खड़ा किया जाता है; नली में पारे की ऊंचाई बाहरी हवा के दाब से संतुलित रहती है। नली के ऊपरी खाली भाग को "टोरीसेली का शून्यस्थान" (Torricellian Vacuum) कहते हैं; यह मूलभूत वैज्ञानिक आधार है।
फॉर्टिन का बैरोमीटर (Fortin's Barometer) हाथीदांत के संकेतक, समायोज्य चमड़े की तलहटी तथा वर्नियर पैमाने से युक्त अत्यधिक परिशुद्ध पारद बैरोमीटर। मौसम वेधशालाओं का प्रामाणिक यंत्र; अत्यंत सटीक पाठ्यांक देता है किंतु कांच और पारे के कारण भारी व नाजुक होता है।
निर्द्रव या एनेरॉइड बैरोमीटर (Aneroid Barometer) तरल-रहित (ग्रीक a-neros = बिना द्रव के); आंशिक रूप से हवा निकाले गए लचीले धातु के डिब्बे (विडी कैप्सूल) के संकुचन-प्रसारण से सुई घूमती है। हल्का, मजबूत तथा आसानी से ले जाने योग्य; पर्वतारोहियों, विमान चालकों (ऊंचाईमापी या Altimeter के रूप में) तथा सर्वेक्षण में उपयोगी।

1.3 वायुदाब की विषमता के कारण: तापमान बनाम घनत्व

धरातल पर सर्वत्र वायुदाब एक समान नहीं रहता। इसका मुख्य नियंत्रक वायु का तापमान है:

  • तापमान का प्रभाव (व्युत्क्रमानुपाती संबंध): जब सूर्य की किरणों से हवा गर्म होती है, तो उसके अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ती है और हवा फैलती है। फैलने से वायु का घनत्व घट जाता है और वह हल्की होकर ऊपर उठ जाती है। यह हल्की हवा धरातल पर कम भार डालती है, जिससे तापीय निम्न वायुदाब (Thermal Low) बनता है।
  • शीतलता का प्रभाव: हवा ठंडी होने पर सिकुड़ती और भारी हो जाती है। यह सघन भारी हवा नीचे बैठती है और धरातल पर संचित होकर तापीय उच्च वायुदाब (Thermal High) का निर्माण करती है।
  • मूल भौगोलिक नियम: तापमान और वायुदाब में विपरीत संबंध होता है — तापमान अधिक होने पर वायुदाब कम तथा तापमान कम होने पर वायुदाब अधिक होता है।

1.4 ऊंचाई के साथ वायुदाब का ह्रास

वायु संपीड्य (Compressible) होती है, अतः ऊपर की परतों के भार से धरातल के निकट की वायु अत्यधिक घनी और भारी होती है। ऊंचाई बढ़ने के साथ ऊपर का वायु स्तंभ घटता जाता है और वायु विरल हो जाती है:

  • दाब ह्रास की दर: निचले क्षोभमंडल में प्रति 110 मीटर की ऊंचाई पर लगभग 1 सेमी पारा स्तंभ का दाब घट जाता है, जो प्रति 300 मीटर पर लगभग 34 मिलीबार (या प्रति 8.5-9 मीटर पर 1 मिलीबार) की कमी के समतुल्य है।
  • पर्वतों पर प्रभाव: माउंट एवरेस्ट के शिखर (8,848 मीटर) पर वायुदाब समुद्र तल के दाब का एक-तिहाई से भी कम (मात्र 314 मिलीबार) रह जाता है। इतनी विरल हवा में ऑक्सीजन की कमी के कारण पर्वतारोहियों को सांस लेने में कठिनाई होती है और ऑक्सीजन सिलेंडर ले जाना पड़ता है।

1.5 जलवाष्प का प्रभाव: शुष्क वायु बनाम आर्द्र वायु

सामान्यतः लोग सोचते हैं कि नमी मिलने से हवा भारी हो जाती है, किंतु वास्तव में समान तापमान और दाब पर आर्द्र वायु शुष्क वायु की तुलना में हल्की होती है:

आवोगाद्रो का नियम एवं आणविक द्रव्यमान:
1. शुष्क वायु के प्रमुख घटक नाइट्रोजन ($\text{N}_2$, आणविक भार 28) और ऑक्सीजन ($\text{O}_2$, आणविक भार 32) हैं, जिससे शुष्क वायु का औसत आणविक भार लगभग 28.97 ग्राम/मोल होता है।
2. जलवाष्प ($\text{H}_2\text{O}$) का आणविक भार मात्र $(2 \times 1) + 16 = \mathbf{18\text{ ग्राम/मोल}}$ होता है।
3. आवोगाद्रो के नियम के अनुसार समान ताप और दाब पर सभी गैसों के समान आयतन में अणुओं की संख्या समान होती है। जब हवा में जलवाष्प मिलती है, तो हल्के जल के अणु भारी नाइट्रोजन और ऑक्सीजन के अणुओं को हटा देते हैं।
4. परिणामस्वरूप आर्द्र वायु हल्की होकर ऊपर उठती है और वहां गंभीर निम्न वायुदाब का निर्माण करती है (जैसे वर्षा ऋतु में मानसूनी निम्नदाब)।

2. विश्व की सात स्थायी वायुदाब पेटियाँ एवं उनका मौसमी स्थानांतरण

2.1 विश्व की सात स्थायी वायुदाब पेटियाँ

धरातल पर सौर ताप के असमान वितरण तथा पृथ्वी की दैनिक घूर्णन गति के सम्मिलित प्रभाव से संपूर्ण पृथ्वी पर 7 स्थायी वायुदाब पेटियाँ (7 Permanent Pressure Belts) पाई जाती हैं:

पेटी का नाम अक्षांशीय विस्तार उत्पत्ति का प्रकार वायुमंडलीय विशेषताएं
1. विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी 5° उत्तर – 5° दक्षिण तापीय (Thermal) वर्षभर लंबवत सूर्य किरणें, अत्यधिक ताप, हल्की हवा का संवहनीय उत्थान; क्षैतिज पवन-विहीन शांत कटिबंध या डोलड्रम्स (Doldrums) व ITCZ।
2. उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी (उत्तर) 25° उत्तर – 35° उत्तर गतिकीय (Dynamic) विषुवत रेखा से उठी ठंडी वायु का नीचे बैठना (अवरोहण); मेघ-रहित शुष्क शांत मौसम; अश्व अक्षांश (Horse Latitudes); सहारा व थार मरुस्थल।
3. उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी (दक्षिण) 25° दक्षिण – 35° दक्षिण गतिकीय (Dynamic) दक्षिणी गोलार्ध में वायु का अवरोहण; शुष्क उच्चदाब; अटाकामा, कालाहारी एवं ऑस्ट्रेलियाई मरुस्थल।
4. उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी (उत्तर) 60° उत्तर – 70° उत्तर गतिकीय (Dynamic) पृथ्वी के घूर्णन जनित अपकेंद्री बल से वायु का बाहर छिटकना तथा गर्म पछुआ व ठंडी ध्रुवीय पवनों के टकराव से वाताग्री उत्थान; भीषण चक्रवाती निम्नदाब।
5. उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी (दक्षिण) 60° दक्षिण – 70° दक्षिण गतिकीय (Dynamic) अंटार्कटिका के चारों ओर खुले महासागरों में तीव्र अपकेंद्री विक्षेप; निरंतर प्रचंड समुद्री चक्रवात।
6. उत्तरी ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी 80° उत्तर – 90° उत्तर तापीय (Thermal) अत्यंत तिरछी किरणें व 6 महीने की ध्रुवीय रात; भयानक ठंड से वायु सिकुड़कर भारी हो जाती है और स्थायी उच्चदाब बनाती है।
7. दक्षिणी ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी 80° दक्षिण – 90° दक्षिण तापीय (Thermal) अंटार्कटिका के 3,000 मीटर ऊंचे बर्फीले पठार पर पृथ्वी का न्यूनतम तापमान (माइनस 89°C तक); सर्वाधिक शक्तिशाली स्थायी तापीय उच्चदाब।

2.2 शांत कटिबंध (डोलड्रम्स) एवं ITCZ

विषुवत रेखा के दोनों ओर 5° उत्तर से 5° दक्षिण अक्षांशों के मध्य यह पेटी फैली है:

  • संवहनीय उत्थान एवं क्षैतिज पवनों का अभाव: वर्षभर अत्यधिक ताप के कारण हवा गर्म होकर फैलती है और लंबवत ऊपर उठ जाती है। फलस्वरूप धरातल के समानांतर कोई क्षैतिज पवन नहीं चलती और मौसम पूरी तरह शांत रहता है। इसलिए इसे शांत कटिबंध (Equatorial Calms) या डोलड्रम्स (Doldrums) कहते हैं। प्राचीन पालदार जहाज हवा न मिलने के कारण यहां हफ्तों तक फंसे रहते थे।
  • अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ): उत्तरी गोलार्ध की उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी गोलार्ध की दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें यहां आपस में मिलती हैं, जिससे हवा ऊपर उठकर प्रतिदिन दोपहर बाद मूसलाधार संवहनीय वर्षा करती है।

2.3 उपोष्णकटिबंधीय उच्चदाब पेटी एवं अश्व अक्षांश (Horse Latitudes)

दोनों गोलार्धों में 25° से 35° अक्षांशों के मध्य उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी स्थित है:

  • गतिकीय उत्पत्ति: विषुवत रेखा से ऊपर उठी गर्म हवा ऊपरी वायुमंडल में ठंडी होकर ध्रुवों की ओर बढ़ती है और पृथ्वी के घूर्णन से विक्षेपित होकर 30° अक्षांश के पास नीचे बैठती है। नीचे उतरने पर हवा संकुचित और गर्म होती है, जिससे मेघ-रहित खुला आकाश और शुष्क शांत मौसम बनता है।
  • अश्व अक्षांश (Horse Latitudes) का नामकरण: मध्यकाल में स्पेन और यूरोप से पालदार जहाजों में घोड़े लादकर अमेरिका और वेस्ट इंडीज भेजा जाता था। अटलांटिक महासागर की इस शांत उच्चदाब पेटी में हवा बिल्कुल न चलने के कारण जहाज हफ्तों तक गतिहीन खड़े रहते थे। पीने के पानी और चारे की भारी कमी होने पर नाविक जहाजों का वजन घटाने और अपने लिए पानी बचाने हेतु जीवित घोड़ों को समुद्र में फेंक देते थे। इसी दर्दनाक इतिहास के कारण 25° से 35° उत्तरी अक्षांश को "अश्व अक्षांश" (Horse Latitudes) कहा जाता है।

2.4 वायुदाब पेटियों का मौसमी स्थानांतरण

सूर्य की उत्तरायण और दक्षिणायन की आभासी गति के साथ-साथ पृथ्वी की ये पेटियाँ भी ऋतु के अनुसार 5° से 10° उत्तर या दक्षिण खिसक जाती हैं:

  • सूर्य का उत्तरायण (21 जून - ग्रीष्म संक्रांति): सूर्य कर्क रेखा (23.5° उत्तर) पर लंबवत चमकता है। सभी वायुदाब पेटियाँ 5° से 10° उत्तर की ओर खिसक जाती हैं। इससे विषुवतीय निम्नदाब भारत के ऊपर आ जाता है और दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनों का विस्फोट होता है।
  • सूर्य का दक्षिणायन (22 दिसंबर - मकर संक्रांति): सूर्य मकर रेखा (23.5° दक्षिण) पर लंबवत चमकता है। सभी वायुदाब पेटियाँ 5° से 10° दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं।
  • भूमध्यसागरीय जलवायु पर प्रभाव: गर्मियों में उपोष्ण उच्चदाब पेटी उत्तर खिसक जाने से भूमध्यसागरीय क्षेत्र शुष्क व्यापारिक पवनों के प्रभाव में आ जाता है (शुष्क ग्रीष्मकाल)। सर्दियों में पेटियाँ दक्षिण खिसकने से यह क्षेत्र नम पछुआ पवनों के प्रभाव में आकर भरपूर वर्षा प्राप्त करता है (आर्द्र शीतकाल)।

3. पवन गति के बुनियादी नियम एवं प्रेरक बल

3.1 पवन की परिभाषा एवं दाब प्रवणता बल (PGF)

वायुदाब में अंतर के कारण उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर वायु के क्षैतिज संचलन को पवन (Wind) कहते हैं, जबकि लंबवत संचलन को वायु धारा (Air Current) कहते हैं।

  • दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force - PGF): दो स्थानों के बीच दूरी के संदर्भ में वायुदाब में होने वाले परिवर्तन की दर को दाब प्रवणता बल कहते हैं: $$PGF = -\frac{1}{\rho} \frac{\Delta P}{\Delta d}$$
  • समदाब रेखाओं का अंतराल: समदाब रेखा (Isobar) मानचित्र पर समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा है। समदाब रेखाएं जब पास-पास होती हैं, तो दाब प्रवणता तीव्र होती है और तेज आंधी चलती है। रेखाएं दूर-दूर होने पर हवा मंद गति से बहती है।
  • दिशा: यह बल हमेशा समदाब रेखाओं के समकोण (90°) पर उच्चदाब से निम्नदाब की ओर कार्य करता है।

3.2 कोरिऑलिस बल (Coriolis Force) एवं पृथ्वी का घूर्णन

यदि पृथ्वी स्थिर होती तो हवा सीधी रेखा में उच्चदाब से निम्नदाब की ओर चलती। परंतु पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा में अपनी धुरी पर घूमती है। 1835 में फ्रांसीसी गणितज्ञ गैस्पार्ड गुस्ताव डी कोरिऑलिस ने सिद्ध किया कि घूमती हुई पृथ्वी पर गतिशील वस्तुओं पर एक आभासी विक्षेपक बल कार्य करता है, जिसे कोरिऑलिस बल (Coriolis Force) कहते हैं:

कोरिऑलिस बल का सूत्र:
$$F_c = 2 m v \Omega \sin \phi$$ जहाँ $m$ द्रव्यमान, $v$ पवन का वेग, $\Omega$ पृथ्वी का कोणीय वेग ($7.292 \times 10^{-5}\text{ rad/s}$), तथा $\phi$ अक्षांश है।
1. विषुवत रेखा पर शून्य: विषुवत रेखा पर $\phi = 0^\circ$, अतः $\sin 0^\circ = 0$। इसलिए विषुवत रेखा पर कोरिऑलिस बल शून्य होता है।
2. ध्रुवों पर अधिकतम: ध्रुवों पर $\phi = 90^\circ$, अतः $\sin 90^\circ = 1$। इसलिए दोनों ध्रुवों पर कोरिऑलिस बल सर्वाधिक होता है।
3. यह बल केवल पवन की दिशा को मोड़ता है, उसकी गति को नहीं बदलता।

3.3 फेरेल का नियम (Ferrel's Law)

1855 में अमेरिकी मौसम वैज्ञानिक विलियम फेरेल ने कोरिऑलिस प्रभाव का उपयोग कर पवन गति का मूलभूत नियम दिया:

फेरेल का नियम:
पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण उत्पन्न कोरिऑलिस बल के प्रभाव से सभी पवनें और समुद्री धाराएं उत्तरी गोलार्ध में अपनी गति की दाहिनी ओर (Right) तथा दक्षिणी गोलार्ध में अपनी गति की बाईं ओर (Left) मुड़ जाती हैं।
  • व्यापारिक पवनों पर प्रभाव: उपोष्ण उच्चदाब (30°N) से विषुवत रेखा की ओर चलने वाली हवा दाहिनी ओर मुड़कर उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवन बन जाती है। दक्षिणी गोलार्ध (30°S) से आने वाली हवा बाईं ओर मुड़कर दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवन बन जाती है।
  • पछुआ पवनों पर प्रभाव: उत्तरी गोलार्ध में ध्रुवों की ओर जाने वाली हवा दाहिनी ओर मुड़कर दक्षिण-पश्चिमी पछुआ पवन बनती है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़कर उत्तर-पश्चिमी पछुआ पवन बनती है।

3.4 बायस बैलट का नियम (Buys Ballot's Law)

1857 में डच वैज्ञानिक सी. एच. डी. बायस बैलट ने पवन दिशा और वायुदाब के बीच संबंध का नियम प्रतिपादित किया:

बायस बैलट का नियम:
उत्तरी गोलार्ध में जिस दिशा से हवा आ रही है, उस ओर पीठ करके खड़े होने पर बाईं ओर निम्न वायुदाब तथा दाईं ओर उच्च वायुदाब होता है।
दक्षिणी गोलार्ध में यह स्थिति बिल्कुल विपरीत होती है: हवा की ओर पीठ करने पर दाईं ओर निम्नदाब तथा बाईं ओर उच्चदाब होता है।

3.5 घर्षण बल एवं भू-विक्षेपी (जियोस्ट्रोफिक) पवन

  • घर्षण बल: धरातल के समीप (निचले 1,000 मीटर में) पहाड़ों, वृक्षों व इमारतों के घर्षण से पवन का वेग कम हो जाता है, जिससे कोरिऑलिस बल कमजोर पड़ता है और हवा समदाब रेखाओं को तिरछे (20°-45° कोण पर) काटती हुई निम्नदाब में प्रवेश करती है।
  • भू-विक्षेपी पवन (Geostrophic Wind): धरातल से 1 किमी ऊपर घर्षणहीन मुक्त वायुमंडल में पवन की गति इतनी बढ़ जाती है कि दाब प्रवणता बल और कोरिऑलिस बल परस्पर समान व विपरीत दिशा में संतुलित हो जाते हैं ($PGF = F_c$)। तब पवन समदाब रेखाओं के लंबवत न जाकर सीधी समदाब रेखाओं के समानांतर बहती है। इसे भू-विक्षेपी पवन कहते हैं।

4. सनातनी पवनें, सामयिक पवनें एवं विश्व की प्रमुख स्थानीय पवनें

4.1 सनातनी या नियतवाही पवनें (Planetary Winds)

पृथ्वी की स्थायी वायुदाब पेटियों के मध्य वर्षभर एक निश्चित दिशा में नियमित रूप से चलने वाली पवनों को सनातनी বা ग्रहीय पवनें (Planetary Winds) कहते हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं:

  • 1. व्यापारिक বা सन्मार्गी पवनें (Trade Winds):
    • उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटियों (25°-35°) से विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी (0°-5°) की ओर चलती हैं।
    • अंग्रेजी शब्द Trade जर्मन शब्द Track से बना है जिसका अर्थ है 'निश्चित मार्ग'। पालदार व्यापारी जहाजों को गति देने के कारण इन्हें व्यापारिक पवनें कहा गया।
    • उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर मुड़कर उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़कर दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें कहलाती हैं।
    • ठंडे उपोष्ण से गर्म विषुवत वृत्त की ओर चलने के कारण इनकी नमी सोखने की क्षमता बढ़ती है। महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर वर्षा करने के बाद पश्चिमी तटों तक पहुंचते-पहुंचते ये पूरी तरह शुष्क हो जाती हैं। इसलिए विश्व के सभी प्रमुख गर्म मरुस्थल (सहारा, थार, अटाकामा, कालाहारी) महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर स्थित हैं।
  • 2. पछुआ पवनें (Westerlies):
    • उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटियों से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटियों (60°-70°) की ओर बहती हैं।
    • उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण-पश्चिमी पछुआ पवनें तथा दक्षिणी गोलार्ध में उत्तर-पश्चिमी पछुआ पवनें कहलाती हैं।
    • उत्तरी गोलार्ध में विशाल महाद्वीपों व पर्वतों के घर्षण के कारण पछुआ पवनों की गति अनियमित रहती है।
    • दक्षिणी गोलार्ध में 40° से 60° दक्षिण अक्षांशों के बीच कोई स्थलखंड नहीं है—केवल निर्बाध विशाल महासागर है। किसी अवरोध के न होने से पछुआ पवनें भयानक वेग से गरजती हुई चलती हैं, जिन्हें नाविकों ने विशेष नाम दिए:
      • गरजता चालीसा (Roaring Forties - 40°द): लगातार गरजने वाली तूफानी पछुआ पवनें।
      • प्रचंड पचासा (Furious Fifties - 50°द): विकराल समुद्री आंधी और 15 मीटर ऊंची लहरें।
      • चीखता साठा (Screaming Sixties - 60°द): ध्रुवीय बर्फीली हवाओं के साथ चीखती हुई चलने वाली तूफानी हवाएं।
  • 3. ध्रुवीय पवनें (Polar Easterlies):
    • ध्रुवीय उच्चदाब से उपध्रुवीय निम्नदाब की ओर बहती हैं।
    • उत्तरी गोलार्ध में उत्तर-पूर्वी ध्रुवीय पवनें तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण-पूर्वी ध्रुवीय पवनें कहलाती हैं। ये अत्यंत ठंडी, शुष्क एवं भयानक बर्फीले तूफान लाती हैं।

4.2 सामयिक पवनें: सागर समीर एवं थल समीर

ऋतु या दिन-रात के समय के अनुसार अपनी दिशा बदलने वाली पवनों को सामयिक पवनें (Periodic Winds) कहते हैं:

विशेषता सागर समीर (Sea Breeze) थल समीर (Land Breeze)
चलने का समय दिन के समय (दोपहर 2 बजे से शाम 4 बजे तक सर्वाधिक तीव्र)। रात के समय (भोर के समय सर्वाधिक वेग)।
तापीय कारण पानी की तुलना में स्थल का विशिष्ट ताप कम होने से दिन में जमीन तेजी से तपती है। रात में पार्थिव विकिरण से जमीन बहुत तेजी से ठंडी हो जाती है, किंतु पानी धीरे ठंडा होता है।
वायुदाब की स्थिति तप्त स्थल पर निम्न वायुदाब तथा ठंडे सागर पर उच्च वायुदाब। ठंडे स्थल पर उच्च वायुदाब तथा अपेक्षाकृत गर्म सागर पर निम्न वायुदाब।
प्रवाह की दिशा सागर से स्थल की ओर बहती है। स्थल से सागर की ओर बहती है।
मौसम पर प्रभाव तटीय क्षेत्रों में ठंडी नम हवा लाकर गर्मी से राहत देती है (दीघा, पुरी, मुंबई)। शुष्क व शांत हवा; तटीय मछुआरे भोर में इसी हवा के सहारे नावें लेकर समुद्र में जाते हैं।

4.3 घाटी एवं पर्वतीय समीर (अनाबैटिक व कैटाबैटिक समीर)

  • घाटी समीर या अनाबैटिक पवन (Anabatic Wind): दिन में सूर्य के ताप से पर्वतीय ढाल की हवा तेजी से गर्म होकर हल्की हो जाती है और ढाल के सहारे ऊपर चढ़ती है। इसे घाटी समीर कहते हैं। दोपहर तक यह पर्वत शिखरों पर कपासी बादल बनाती है।
  • पर्वतीय समीर या कैटाबैटिक पवन (Katabatic Wind): रात में पर्वत शिखर तीव्र विकिरण से अत्यधिक ठंडे हो जाते हैं। शिखरों की ठंडी, भारी हवा गुरुत्वाकर्षण के कारण ढालों से फिसलकर नीचे घाटी के तल में जमा हो जाती है। इसे पर्वतीय समीर कहते हैं। इसके कारण घाटी के तल में भारी ठंडी हवा और ऊपर गर्म हवा तैरती है, जिसे तापमान का व्युत्क्रमण (Temperature Inversion) कहते हैं। इससे घाटी के तल में घना कोहरा व पाला पड़ता है।

4.4 मानसूनी पवनें (Monsoon Winds)

मानसून शब्द अरबी के मौसिम (Mawsim) से बना है, जिसका अर्थ ऋतु है। यह वास्तव में सागर और थल समीर का विशाल महाद्वीपीय रूप है:

  • ग्रीष्मकालीन दक्षिण-पश्चिम मानसून: गर्मियों में उत्तर-पश्चिम भारत अत्यधिक गर्म होकर गहरा निम्नदाब केंद्र बनाता है। हिंद महासागर से आने वाली दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें विषुवत रेखा पार कर फेरेल के नियमानुसार दाहिनी ओर मुड़कर दक्षिण-पश्चिम मानसून के रूप में भारत में प्रवेश करती हैं और भारी वर्षा करती हैं।
  • शीतकालीन उत्तर-पूर्वी मानसून: सर्दियों में स्थलखंड ठंडा होकर उच्चदाब बनाता है और समुद्र पर निम्नदाब रहता है। स्थल से समुद्र की ओर शुष्क व ठंडी उत्तर-पूर्वी मानसूनी हवाएं चलती हैं।

4.5 विश्व की प्रसिद्ध स्थानीय पवनें (Local Winds)

स्थानीय धरातलीय एवं तापीय विषमताओं से किसी छोटे क्षेत्र में चलने वाली पवनों को स्थानीय पवनें (Local Winds) कहते हैं:

पवन का नाम प्रकृति एवं तापमान प्रवाह क्षेत्र भौगोलिक एवं पर्यावरणीय महत्व
लू (Loo) अत्यंत गर्म एवं शुष्क (45°-50°C) उत्तरी भारत (थार मरुस्थल, गंगा का मैदान, पश्चिम बंगाल) मई-जून की दोपहर में चलने वाली झुलसाने वाली हवा; लू लगने (हीटस्ट्रोक) से मृत्यु तक हो सकती है।
चिनूक (Chinook) गर्म एवं शुष्क ढालू पवन उत्तरी अमेरिका में रॉकी पर्वत के पूर्वी ढाल पर रेड इंडियन भाषा में अर्थ "हिमभक्षी" (Snow Eater); सर्दियों में बर्फ पिघलाकर चरागाह खोल देती है।
फ़ॉन (Foehn) गर्म एवं शुष्क कैटाबैटिक यूरोप के आल्प्स पर्वत के उत्तरी ढाल पर (स्विट्जरलैंड) ढाल से नीचे उतरते समय रुद्धोष्म ताप से गर्म होती है; अंगूर पकाने व बर्फ पिघलाने में सहायक।
सिरोक्को (Sirocco) गर्म, शुष्क व धूल-भरी सहारा मरुस्थल से भूमध्य सागर पार कर इटली की ओर सहारा की लाल धूल लाती है; जब वहां वर्षा होती है तो इसे "रक्त वर्षा" (Blood Rain) कहते हैं।
हरमट्टन (Harmattan) गर्म व अत्यधिक शुष्क सहारा से गिनी तट की ओर (पश्चिम अफ्रीका) तटीय आर्द्र चिपचिपे मौसम को सुखाकर स्वास्थ्यप्रद बनाती है, इसलिए इसे "डॉक्टर" (The Doctor) कहते हैं।
मिस्ट्रल (Mistral) अत्यंत ठंडी व तीव्र उत्तरी हवा फ्रांस की रोन घाटी से भूमध्य सागर की ओर सर्दियों में तंग घाटी से प्रचंड गति से बहकर फसलों व अंगूर के बागों को नुकसान पहुंचाती है।
बोरा (Bora) अत्यंत ठंडी व झोंकेदार हवा जूलियन आल्प्स से एड्रियाटिक सागर के तट पर (इटली) शीतकालीन भयानक कैटाबैटिक पवन, जिसकी गति 150 किमी/घंटा तक पहुंच जाती है।
ब्लिजार्ड (Blizzard / बर्फीला तूफान) अत्यधिक ठंडी हिमानी आंधी ध्रुवीय क्षेत्र, कनाडा, रूस व साइबेरिया शून्य से नीचे तापमान तथा तेज उड़ती बर्फ; दृश्यता बिल्कुल शून्य कर देती है।

5. अनियमित पवनें, चक्रवात-प्रतिचक्रवात एवं आधुनिक मौसम मापन

5.1 अनियमित पवनें: चक्रवात बनाम प्रतिचक्रवात

वायुमंडल में अचानक उत्पन्न स्थानीय दाब विषमता के कारण चलने वाली अस्थिर पवनों को आकस्मिक या अनियमित पवनें (Variable Winds) कहते हैं:

मापदंड चक्रवात (Cyclone) प्रतिचक्रवात (Anticyclone)
केंद्रीय वायुदाब केंद्र में गहरा निम्न वायुदाब तथा बाहर की ओर उच्चदाब। केंद्र में शक्तिशाली उच्च वायुदाब तथा बाहर की ओर निम्नदाब।
वायु की दिशा बाहर के उच्चदाब से हवा तेजी से केंद्र की ओर आकर ऊपर उठती है (अभिसरण)। ऊपर से शुष्क हवा केंद्र में उतरती है और बाहर की ओर फैलती है (अपसरण)।
घूर्णन दिशा: उत्तरी गोलार्ध घड़ी की सुई के विपरीत (Counter-Clockwise)। घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise)।
घूर्णन दिशा: दक्षिणी गोलार्ध घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise)। घड़ी की सुई के विपरीत (Counter-Clockwise)।
मौसम की दशाएं भयानक तूफानी आंधी, घने काले कपासी-वर्षी मेघ, तड़ित-झंझा, मूसलाधार वर्षा व विनाशकारी समुद्री लहरें। शांत, सुखद व सुहावना मौसम, मेघ-रहित नीला आकाश, मंद हवा, वर्षा की पूर्ण अनुपस्थिति।

5.2 उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं उनके क्षेत्रीय नाम

उष्णकटिबंधीय महासागरों पर जब जल का तापमान 26.5°C से अधिक हो जाता है, तो भारी मात्रा में वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा से उत्पन्न विनाशकारी चक्रवातों को विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है:

  • चक्रवात या साइक्लोन (Cyclone): बंगाल की खाड़ी, अरब सागर एवं हिंद महासागर (जैसे अम्फान, यास, रेमल, फानी तथा बंगाल का ऐतिहासिक आश्विन का तूफान)।
  • टाइफून (Typhoon): दक्षिण चीन सागर, पूर्वी चीन सागर एवं जापान के तटों पर।
  • हरीकेन (Hurricane): कैरेबियन सागर, मैक्सिको की खाड़ी एवं उत्तरी अटलांटिक महासागर (अमेरिका)।
  • विली-विली (Willy-Willy): उत्तर-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के तटीय सागर में।
  • टॉरनेडो (Tornado): पृथ्वी का सबसे छोटा किंतु सर्वाधिक तीव्र गति वाला वायुमंडलीय भंवर; यह कपासी-वर्षी मेघ से सूंड के आकार में धरातल पर उतरता है और इसके केंद्र में हवा की गति 300 से 450 किमी/घंटा से भी अधिक हो जाती है (अमेरिका की मिसिसिपी घाटी का "टॉरनेडो एली" तथा पश्चिम बंगाल का स्थानीय कालবৈশাখী)।

5.3 चक्रवात की संरचना एवं "चक्रवात की आंख"

एक पूर्ण विकसित उष्णकटिबंधीय चक्रवात में तीन स्पष्ट संकेंद्री भाग दिखाई देते हैं:

  • 1. चक्रवात की आंख (Eye of the Cyclone): चक्रवात का बिल्कुल केंद्रीय भाग (व्यास 10 से 30 किमी)। यहां हवा ऊपर से धीरे-धीरे नीचे उतरती है, जिससे संघनन नहीं हो पाता। अतः यहां हवा बिल्कुल शांत, आकाश साफ या आंशिक बादलों वाला तथा वर्षा पूरी तरह बंद रहती है। यहां वायुदाब पृथ्वी का न्यूनतम होता है।
  • 2. आंख की दीवार (Eye Wall): आंख को घेरे हुए 10-15 किमी चौड़ी विशाल कपासी-वर्षी मेघों की गोलाकार दीवार। यह चक्रवात का सबसे हिंसक भाग है, जहाँ हवाएं सर्वाधिक वेग (150-250 किमी/घंटा) से घूमती हैं और मूसलाधार बारिश व बिजली कड़कती है।
  • 3. सर्पिलाकार मेघ पट्टियाँ (Spiral Rain Bands): आंख से बाहर सैकड़ों किलोमीटर तक फैली घूमती हुई बादलों की भुजाएं, जो मुख्य तूफान आने से पहले ही तेज हवा और फुहारें लाती हैं।

5.4 मौसम मापक यंत्र: एनीमोमीटर एवं वात-पताका

वेधशालाओं में पवन संचार के दो प्रमुख मापदंड मापे जाते हैं:

  • वात-पताका या विंड वेन (Wind Vane): पवन की दिशा बताता है। एक धुरी पर स्वतंत्र घूमने वाला तीर लगा होता है। तीर की नोक हमेशा उस दिशा की ओर रहती है जिस दिशा से हवा आ रही होती है। हवा का नाम हमेशा उसके आने की दिशा पर रखा जाता है (जैसे पूर्व से आने वाली हवा पुरवैया कहलाती है)।
  • एनीमोमीटर या पवनवेगमापी (Anemometer): पवन का वेग या गति मापता है। 1846 में डॉ. जॉन रॉबिन्सन द्वारा आविष्कृत इस यंत्र में एक ऊर्ध्वाधर धुरी पर 3 या 4 खोखले धातु के कटोरे लगे होते हैं। हवा लगने पर कटोरे घूमते हैं और मीटर पर पवन का वेग सीधे किलोमीटर प्रति घंटा (km/h) या नॉट (Knot) में दर्ज होता है ($1\text{ नॉट} = 1.852\text{ किमी/घंटा}$)।

5.5 स्वच्छ ऊर्जा के रूप में पवन ऊर्जा एवं भविष्य

पवन की गतिज ऊर्जा एक अक्षय, प्रदूषण-मुक्त एवं नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है। आधुनिक पवन चक्कियाँ या विंड टर्बाइन (Wind Turbines) इस गतिज ऊर्जा को सीधे बिजली में बदलती हैं:

  • पवन शक्ति का घनीय नियम: पवन टर्बाइन से उत्पन्न विद्युत शक्ति पवन के वेग के घन के समानुपाती ($P \propto v^3$) होती है। यानी पवन का वेग यदि दोगुना ($2v$) हो जाए, तो बिजली उत्पादन 8 गुना बढ़ जाता है ($2^3 = 8$)!
  • भारत की स्थिति: पवन ऊर्जा उत्पादन में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है। तमिलनाडु का मुप्पंडल विंड फार्म विश्व के सबसे बड़े संयंत्रों में है; इसके अलावा गुजरात, राजस्थान व महाराष्ट्र में विशाल पवन फार्म हैं। पश्चिम बंगाल में सागर द्वीप और बक्खाली के तटीय क्षेत्रों में पवन ऊर्जा संयंत्र संचालित हैं।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

हाइड्रोस्टैटिक वायुमंडलीय दाब सूत्र
P_0 = 13600 किग्रा/मी^3 × 9.80665 मी/से^2 × 0.76 मी ≈ 101325 पास्कल = 1013.25 मिलीबार
टोरीसेली के 76 सेमी पारा स्तंभ के बराबर समुद्र तल के अंतरराष्ट्रीय मानक वायुदाब 1013.25 मिलीबार का गणितीय प्रमाण है।
क्षैतिज दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force - PGF)
PGF P (समदाब रेखाओं के घनत्व के समानुपाती)
समदाब रेखाएं जितनी पास-पास होंगी, दाब प्रवणता उतनी ही तीव्र होगी और हवा उतनी ही प्रचंड आंधी के रूप में चलेगी।
कोरिऑलिस त्वरण एवं विक्षेपण सूत्र
a_c = 0 (विषुवत रेखा पर = 0^), a_c = 2 v (ध्रुवों पर अधिकतम = 90^)
विषुवत रेखा पर कोरिऑलिस बल शून्य होने के कारण ही 0° से 5° अक्षांश के मध्य कोई उष्णकटिबंधीय चक्रवात नहीं बन सकता।
भू-विक्षेपी (जियोस्ट्रोफिक) पवन संतुलन सूत्र
PGF = F_{Coriolis} ⇒ पवन समदाब रेखाओं के समानांतर बहती है
धरातल से 1 किमी ऊपर जेट स्ट्रीम जैसी हवाएं इस सूत्र के अनुसार सीधी समदाब रेखाओं के समानांतर बहती हैं।
आदर्श गैस नियम एवं आर्द्र वायु का घनत्व
M_{आर्द्र वायु} < M_{शुष्क वायु} ⇒ _{आर्द्र} < _{शुष्क} (समान T, P पर)
प्रमाणित करता है कि जलवाष्प (18 ग्राम/मोल) मिलने पर भारी गैसें हटने से आर्द्र वायु हल्की हो जाती है और निम्नदाब बनाती है।
बैरोमीट्रिक ऊंचाई निर्धारण सूत्र (Hypsometric Formula)
P ≈ प्रति 110 मीटर पर 1 सेमी पारा या प्रति 300 मीटर पर 34 मिलीबार कमी
एनेरॉइड अल्टीमीटर इसी सिद्धांत पर विमानों और पर्वतारोहण में सटीक ऊंचाई मापने का कार्य करता है।
पवन ऊर्जा एवं विद्युत शक्ति उत्पादन सूत्र
P v^3 ⇒ वेग दोगुना (2v) होने पर शक्ति 8 गुना बढ़ जाती है
यह स्पष्ट करता है कि पवन ऊर्जा संयंत्रों को केवल तेज हवा वाले तटीय या पर्वतीय गलियारों में ही क्यों लगाया जाता है।
चक्रवाती अपकेंद्री त्वरण एवं संतुलन
v_{cyclone} = {r ≤ft({1}{ P}{ r})} (आंख की दीवार पर सर्वाधिक)
चक्रवात की आंख की दीवार के पास अत्यधिक तीव्र दाब प्रवणता और भारी पवन वेग (200 किमी/घंटा से अधिक) का कारण समझाता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
समुद्र तल पर एक टोरीसेली बैरोमीटर में पारे के स्तंभ की ऊंचाई 76.0 सेमी मापी गई। यदि पारे का घनत्व 13,600 किग्रा/घन मीटर तथा गुरुत्वीय त्वरण 9.8 मी/से² हो, तो वायुमंडलीय दाब पास्कल (N/m²) में ज्ञात कीजिए तथा इसे मिलीबार (mb) में बदलिए। (दिया है: 1 mb = 100 पास्कल)।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. सूत्र: हाइड्रोस्टैटिक दाब समीकरण:

$$P = \rho \cdot g \cdot h$$

  1. दिए गए मान:
    • पारे का घनत्व $\rho = 13,600\text{ किग्रा/घन मीटर}$
    • गुरुत्वीय त्वरण $g = 9.8\text{ मी/से}^2$
    • पारे के स्तंभ की ऊंचाई $h = 76.0\text{ सेमी} = 0.76\text{ मीटर}$
  2. पास्कल में दाब की गणना:

$$P = 13,600 \times 9.8 \times 0.76 = 101,292.8\text{ पास्कल} \approx 101,300\text{ N/m}^2$$

  1. मिलीबार (mb) में रूपांतरण:

$$\text{मिलीबार में दाब} = \frac{101,292.8}{100} \approx 1012.93\text{ mb} \approx 1013\text{ मिलीबार}$$

निष्कर्ष: 76 सेमी पारे के स्तंभ द्वारा आरोपित वायुमंडलीय दाब लगभग 101,300 पास्कल या 1013 मिलीबार के बराबर होता है, जो समुद्र तल का अंतरराष्ट्रीय मानक दाब है।

उदाहरण 2
दो मौसम केंद्रों ‘क’ तथा ‘ख’ के मध्य 250 किलोमीटर की क्षैतिज दूरी है। केंद्र ‘क’ पर 1022 मिलीबार तथा केंद्र ‘ख’ पर 1002 मिलीबार वायुदाब दर्ज किया गया। प्रति 100 किलोमीटर पर क्षैतिज दाब प्रवणता ज्ञात कीजिए तथा पवन की तीव्रता पर टिप्पणी कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. सूत्र: दाब प्रवणता ज्ञात करने का समीकरण:

$$\text{दाब प्रवणता} = \frac{\Delta P}{\Delta d}$$

  1. दिए गए मान:
    • दाब अंतर $\Delta P = 1022\text{ mb} - 1002\text{ mb} = 20\text{ मिलीबार}$
    • दोनों केंद्रों की दूरी $\Delta d = 250\text{ किमी}$
  2. प्रति किमी दाब प्रवणता:

$$\text{प्रवणता} = \frac{20\text{ mb}}{250\text{ किमी}} = 0.08\text{ mb/किमी}$$

  1. प्रति 100 किलोमीटर पर दाब प्रवणता:

$$\text{प्रति 100 किमी पर प्रवणता} = 0.08 \times 100 = 8.0\text{ मिलीबार}$$

टिप्पणी: प्रति 100 किमी पर 8.0 मिलीबार का अंतर अत्यधिक तीव्र दाब प्रवणता को दर्शाता है (जो किसी शक्तिशाली चक्रवात का सूचक है)। अतः केंद्र ‘क’ से ‘ख’ की ओर अत्यंत प्रचंड वेग से तूफानी आंधी चलेगी तथा उत्तरी गोलार्ध में होने पर हवा अपनी दाहिनी ओर मुड़ जाएगी।

उदाहरण 3
एक पर्वतारोही दल ने समुद्र तल के आधार शिविर पर 1013 मिलीबार वायुदाब दर्ज किया। हिमालय के कैंप 3 पर पहुंचने पर उनके एनेरॉइड बैरोमीटर में पाठ्यांक 673 मिलीबार प्राप्त हुआ। यदि निचले क्षोभमंडल में प्रति 8.8 मीटर की ऊंचाई पर 1 मिलीबार दाब घटता है, तो कैंप 3 की अनुमानित ऊंचाई ज्ञात कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. कुल वायुदाब ह्रास ($\Delta P$):

$$\Delta P = 1013\text{ mb} - 673\text{ mb} = 340\text{ मिलीबार}$$

  1. ऊंचाई के साथ ह्रास दर: प्रति 1 मिलीबार दाब कम होने पर ऊंचाई 8.8 मीटर बढ़ती है।
  2. कैंप 3 की ऊंचाई ($h$):

$$h = 340 \times 8.8\text{ मीटर} = 2,992\text{ मीटर} \approx 3,000\text{ मीटर}$$

निष्कर्ष: कैंप 3 समुद्र तल से लगभग 3,000 मीटर (या 3 किमी) की ऊंचाई पर स्थित है। इस ऊंचाई पर समुद्र तल के वायुदाब का लगभग एक-तिहाई भाग कम हो चुका है, जिससे पर्वतारोहियों को सांस लेने में श्रम करना पड़ता है।

उदाहरण 4
फेरेल के नियम की सहायता से स्पष्ट कीजिए कि उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी (30°N) से विषुवत रेखा की ओर चलने वाली पवनें "उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें" तथा (30°S) से चलने वाली पवनें "दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें" क्यों कहलाती हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. मूल प्रवाह दिशा: हवा हमेशा 30° उपोष्ण उच्चदाब से 0° विषुवतीय निम्नदाब की ओर चलती है।
  2. उत्तरी गोलार्ध में:
    • प्रारंभिक दाब प्रवणता बल की दिशा: ठीक दक्षिण की ओर (30°N से 0°)।
    • फेरेल के नियमानुसार उत्तरी गोलार्ध में गतिमान हवा अपनी गति की दाहिनी ओर (Right) मुड़ जाती है।
    • दक्षिण की ओर बहती हवा दाहिनी ओर (पश्चिम की ओर) मुड़ने से उसकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम हो जाती है।
    • पवन का नाम हमेशा उसके आने की दिशा पर होता है, अतः इसे उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवन (North-East Trade Wind) कहते हैं।
  3. दक्षिणी गोलार्ध में:
    • प्रारंभिक दाब प्रवणता बल की दिशा: ठीक उत्तर की ओर (30°S से 0°)।
    • फेरेल के नियमानुसार दक्षिणी गोलार्ध में गतिमान हवा अपनी गति की बाईं ओर (Left) मुड़ जाती है।
    • उत्तर की ओर बहती हवा बाईं ओर (पश्चिम की ओर) मुड़ने से उसकी दिशा दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम हो जाती है।
    • अतः इसे दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवन (South-East Trade Wind) कहते हैं। निष्कर्ष: कोरिऑलिस बल और फेरेल के विक्षेपण के कारण ही दोनों गोलार्धों में उत्तर-दक्षिण चलने वाली हवाएं पूर्वी व्यापारिक पवनों का रूप ले लेती हैं।
उदाहरण 5
दक्षिणी गोलार्ध की पछुआ पवनें उत्तरी गोलार्ध की तुलना में इतनी अधिक प्रचंड व तूफानी क्यों होती हैं? "गरजता चालीसा", "प्रचंड पचासा" और "चीखता साठा" के भौगोलिक कारणों की विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. स्थल एवं जल के वितरण में भारी असमानता:
    • उत्तरी गोलार्ध में विशाल महाद्वीप और ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं (रॉकी, आल्प्स, हिमालय) विस्तृत हैं, जो घर्षण द्वारा पछुआ पवनों के वेग को तोड़कर कमजोर कर देती हैं।
    • परंतु दक्षिणी गोलार्ध में 40° दक्षिण से 65° दक्षिण अक्षांशों के मध्य कोई बड़ा स्थलखंड नहीं है—वहां 81% से अधिक क्षेत्र में केवल खुला और निर्बाध महासागर फैला है।
  2. घर्षण-रहित वायुमंडलीय त्वरण:
    • महासागरों पर किसी भी प्रकार का धरातलीय अवरोध न होने से उपोष्ण उच्चदाब और उपध्रुवीय निम्नदाब के मध्य दाब प्रवणता बल हवा को निरंतर प्रचंड गति प्रदान करता रहता है।
  3. नाविकों द्वारा ऐतिहासिक नामकरण:
    • गरजता चालीसा (40°द): 40° दक्षिण अक्षांश पर खुले समुद्र में बिना रुके गरजने वाली तूफानी पछुआ हवाएं।
    • प्रचंड पचासा (50°द): 50° दक्षिण अक्षांश पर उठने वाले भयानक समुद्री तूफान और 15 मीटर ऊंची समुद्री लहरें।
    • चीखता साठा (60°द): 60° दक्षिण अक्षांश पर अंटार्कटिका के बर्फीले झंझावातों के साथ चीखती हुई सीटी जैसी आवाज में चलने वाली हवाएं। निष्कर्ष: स्थलीय अवरोधों की पूर्ण अनुपस्थिति ही दक्षिणी गोलार्ध की पछुआ पवनों के इस प्रचंड स्वरूप का एकमात्र वैज्ञानिक कारण है।
उदाहरण 6
पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्रों (दीघा, बक्खाली) में दिन के समय सागर समीर और भोर के समय थल समीर चलने की तापीय एवं वायुदाब प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. दिन में सागर समीर (Sea Breeze):
    • दिन में तेज धूप से बालू व मिट्टी से बना स्थलखंड जल की तुलना में बहुत तेजी से गर्म होता है (स्थल का विशिष्ट ताप जल का 1/5 होता है)।
    • तप्त स्थल की हवा गर्म होकर फैलती है और ऊपर उठकर स्थानीय स्तर पर निम्न वायुदाब बनाती है।
    • पास का ठंडा बंगाल की खाड़ी का सागर अपेक्षाकृत उच्चदाब पर रहता है।
    • अतः दोपहर से शाम तक सागर की ठंडी, आर्द्र हवा स्थल की ओर बहती है, जिसे सागर समीर कहते हैं। यह तटीय जलवायु को सुखद बनाती है।
  2. रात में थल समीर (Land Breeze):
    • रात में सूर्य के अभाव में स्थलखंड तेजी से विकिरण द्वारा अपनी ऊष्मा खोकर ठंडा हो जाता है, जबकि सागर का जल धीरे-धीरे ठंडा होता है।
    • भोर के समय ठंडा स्थल उच्च वायुदाब का केंद्र बन जाता है, जबकि अपेक्षाकृत गर्म सागर पर निम्न वायुदाब रहता है।
    • तब स्थल से सागर की ओर ठंडी व शुष्क हवा बहने लगती है, जिसे थल समीर कहते हैं। मछुआरे इस हवा के सहारे समुद्र में नाव लेकर जाते हैं। निष्कर्ष: दिन और रात के 24 घंटे में स्थल व जल के विपरीत तापन-शीतलन से उत्पन्न यह चक्र सामयिक पवनों का आदर्श उदाहरण है।
उदाहरण 7
कोरिऑलिस बल के गणितीय सूत्र से सिद्ध कीजिए कि विषुवत रेखा पर कोरिऑलिस बल शून्य होता है तथा 0° से 5° अक्षांश के मध्य उष्णकटिबंधीय चक्रवात क्यों नहीं बन सकते?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. कोरिऑलिस बल का सूत्र:

$$F_c = 2 m v \Omega \sin \phi$$

जहाँ $\Omega$ पृथ्वी का कोणीय घूर्णन वेग तथा $\phi$ अक्षांश है। 2. विषुवत रेखा पर ($\phi = 0^\circ$):

  • $\sin 0^\circ = 0$।
  • अतः कोरिऑलिस बल $F_c = 2 m v \Omega \times 0 = \mathbf{0}$।
  • अर्थात विषुवत रेखा पर कोई घूर्णन विक्षेप बल नहीं होता।
  1. चक्रवात न बनने का कारण:
    • किसी चक्रवात के निर्माण हेतु हवाओं का घूमकर केंद्रीय निम्नदाब के चारों ओर तीव्र भंवर या कुंडली बनाना अनिवार्य होता है।
    • विषुवत रेखा से 5° उत्तर व दक्षिण के मध्य कोरिऑलिस बल लगभग शून्य ($\sin \phi \approx 0$) होता है, जिसके कारण हवाएं मुड़ नहीं पातीं।
    • हवाएं मुड़ने की जगह सीधे निम्नदाब केंद्र में प्रवेश कर उस गड्ढे को तुरंत भर देती हैं और चक्रवात नहीं बन पाता। निष्कर्ष: कोरिऑलिस बल की अनुपस्थिति ही विषुवतीय शांत कटिबंध (0°-5°) को चक्रवातों से पूरी तरह मुक्त रखती है।
उदाहरण 8
एक पवन चक्की के पंखों का कुल घूर्णन क्षेत्रफल 1,200 वर्ग मीटर है। वायु का घनत्व 1.2 किग्रा/घन मीटर है। यदि पवन का वेग 5 मी/सेकंड से बढ़कर 10 मी/सेकंड हो जाए, तो उत्पादित विद्युत शक्ति में कितने गुना वृद्धि होगी और शक्ति का वेग से क्या संबंध है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. सूत्र: पवन ऊर्जा समीकरण:

$$P = \frac{1}{2} \cdot \rho \cdot A \cdot v^3$$

  1. प्रथम स्थिति (पवन वेग $v_1 = 5\text{ मी/से}$):

$$v_1^3 = 5^3 = 125\text{ मी}^3/\text{से}^3$$

$$P_1 = \frac{1}{2} \times 1.2 \times 1,200 \times 125 = 0.6 \times 1,200 \times 125 = 720 \times 125 = 90,000\text{ वाट} = \mathbf{90\text{ किलोवाट}}$$

  1. द्वितीय स्थिति (वेग दोगुना होकर $v_2 = 10\text{ मी/से}$):

$$v_2^3 = 10^3 = 1,000\text{ मी}^3/\text{से}^3$$

$$P_2 = \frac{1}{2} \times 1.2 \times 1,200 \times 1,000 = 720 \times 1,000 = 720,000\text{ वाट} = \mathbf{720\text{ किलोवाट}}$$

  1. अनुपात की तुलना:

$$\frac{P_2}{P_1} = \frac{720\text{ kW}}{90\text{ kW}} = 8 = 2^3$$

निष्कर्ष: पवन ऊर्जा पवन के वेग के घन के समानुपाती ($P \propto v^3$) होती है। हवा की गति केवल दोगुनी होने पर ही बिजली उत्पादन 8 गुना बढ़ जाता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पवन की दिशा के नामकरण में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पवन का नाम हमेशा उस दिशा के आधार पर रखा जाता है जिस दिशा से वह आ रही होती है। पछुआ पवन पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

आर्द्र हवा को शुष्क हवा से भारी समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जलवाष्प का आणविक भार (18) शुष्क हवा (28.97) से बहुत कम होता है, अतः आर्द्र हवा हल्की होकर निम्नदाब बनाती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

उपोष्ण उच्चदाब पेटी को तापीय समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उपोष्ण कटिबंध (25°-35°) अत्यधिक गर्म क्षेत्र है! यहां उच्चदाब हवा के नीचे बैठने (अवरोहण) के कारण गतिकीय रूप से बनता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

डोलड्राम्स या शांत कटिबंध को तूफानी क्षेत्र समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

डोलड्राम्स में क्षैतिज सतह पर हवा नहीं चलती; हवा लंबवत ऊपर उठती है जिससे धरातल पर पूर्ण शांति रहती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

फेरेल के नियम में दिशाओं का उलटा होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

फेरेल के नियम के अनुसार: उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विक्षेप होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अनाबैटिक और कैटाबैटिक के समय में त्रुटि।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अनाबैटिक (घाटी समीर) दिन में ऊपर चढ़ती है; कैटाबैटिक (पर्वतीय समीर) रात में ठंडी होकर नीचे घाटी में उतरती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

चक्रवात के घूर्णन को सामान्य घड़ी की तरह मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उत्तरी गोलार्ध में चक्रवात घड़ी की सुई के विपरीत (Counter-Clockwise) घूमता है, जबकि प्रतिचक्रवात घड़ी की दिशा में घूमता है।

विश्व की स्थायी वायुदाब पेटियाँ एवं सनातन पवन संचार — संकल्पनात्मक रूपरेखा

विश्व की स्थायी वायुदाब पेटियाँ एवं सनातन पवन संचार (कक्षा 8 भूगोल — अध्याय 4) 7 स्थायी वायुदाब पेटियाँ एवं सनातनी पवनें 80°उ – 90°उ उत्तरी ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी (तापीय उच्च) शीतल अवरोहण ↙ उत्तर-पूर्वी ध्रुवीय पवनें (दाहिनी ओर विक्षेपित) 60°उ – 70°उ उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी (गतिकीय निम्न) वाताग्री उत्थान ↗ दक्षिण-पश्चिमी पछुआ पवनें (उपध्रुवीय निम्न की ओर) 25°उ – 35°उ उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब (अश्व अक्षांश) वायु का बैठना ↙ उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें (सन्मार्गी पवनें) 5°उ – 5°द विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी (डोलड्रम्स / शांत कटिबंध / ITCZ) संवहनीय उत्थान ↖ दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें (बाईं ओर विक्षेपित) 25°द – 35°द उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी (गतिकीय) मरुस्थलीय क्षेत्र ↘ उत्तर-पश्चिमी पछुआ पवनें (गरजता चालीसा / खुले सागर) 60°द – 70°द उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी (गतिकीय निम्न) चक्रवाती तूफान 80°द – 90°द दक्षिणी ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी (अंटार्कटिका) अत्यधिक शीत वायुमंडलीय परिसंचरण कोशिकाएं एवं नियम त्रिकोशिकीय देशांतरीय परिसंचरण मॉडल हैडली कोशिका 0° – 30° अक्षांश व्यापारिक पवन लूप फेरेल कोशिका 30° – 60° अक्षांश पछुआ पवन लूप ध्रुवीय कोशिका 60° – 90° अक्षांश तापीय अवरोहण पवन गति के बुनियादी नियम (कोरिऑलिस प्रभाव) • फेरेल का नियम (1855): उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विक्षेप। • बायस बैलट का नियम (1857): हवा की ओर पीठ करके खड़े होने पर NH में बाईं ओर निम्नदाब, दाईं ओर उच्चदाब। दक्षिणी महासागरों की गरजती पछुआ पवनें 40°द: गरजता चालीसा (Roaring Forties) — निर्बाध समुद्री आंधी 50°द: प्रचंड पचासा (Furious Fifties) — तूफानी समुद्री हवाएं 60°द: चीखता साठा (Screaming Sixties) — ध्रुवीय बर्फीली आंधी सामयिक एवं प्रमुख स्थानीय पवनें सामयिक: सागर व थल समीर, घाटी व पर्वतीय समीर, मानसूनी पवन। गर्म स्थानीय: लू (भारत), फ़ॉन (आल्प्स), चिनूक (रॉकी/हिमभक्षी)। ठंडी स्थानीय: मिस्ट्रल (फ्रांस), बोरा (एड्रियाटिक), ब्लिजार्ड (ध्रुवीय)।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
वायुमंडलीय दाब धरातल के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर वायु का भार है, जिसका समुद्र तल पर मानक मान 1013.25 मिलीबार या 76 सेमी पारा स्तंभ होता है।
मुख्य बिंदु 2
वायुदाब के चार मुख्य नियंत्रक हैं: तापमान (उल्टा संबंध), ऊंचाई (प्रति 110 मीटर पर 1 सेमी पारा कमी), जलवाष्प (आर्द्र हवा हल्की) तथा पृथ्वी का घूर्णन।
मुख्य बिंदु 3
पृथ्वी पर 7 स्थायी वायुदाब पेटियाँ हैं: तापीय विषुवतीय निम्नदाब (डोलड्रम्स) व दो ध्रुवीय उच्चदाब; गतिकीय दो उपोष्ण उच्चदाब (अश्व अक्षांश) व दो उपध्रुवीय निम्नदाब।
मुख्य बिंदु 4
सूर्य के उत्तरायण व दक्षिणायन से वायुदाब पेटियाँ 5°-10° खिसकती हैं, जो भूमध्यसागरीय वर्षा तथा भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को नियंत्रित करती हैं।
मुख्य बिंदु 5
उच्चदाब से निम्नदाब की ओर दाब प्रवणता बल (PGF) हवा चलाता है तथा कोरिऑलिस बल फेरेल के नियम (उत्तर में दायां, दक्षिण में बायां) व बायस बैलट के अनुसार दिशा मोड़ता है।
मुख्य बिंदु 6
सनातनी पवनों में व्यापारिक पवनें (गर्म मरुस्थल), पछुआ पवनें (दक्षिणी सागरों में गरजता चालीसा, प्रचंड पचासा, चीखता साठा) तथा ध्रुवीय पवनें शामिल हैं।
मुख्य बिंदु 7
सामयिक पवनों में सागर व थल समीर, अनाबैटिक व कैटाबैटिक पर्वतीय समीर और मानसून प्रमुख हैं; स्थानीय पवनों में लू, चिनूक, फ़ॉन, हरमट्टन व मिस्ट्रल प्रसिद्ध हैं।
मुख्य बिंदु 8
चक्रवात गहरे निम्नदाब वाले तूफान हैं (NH में वामावर्त घूर्णन) जिनके केंद्र में शांत आंख होती है; पवन का वेग एनीमोमीटर तथा दिशा वात-पताका से मापी जाती है।
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कक्षा 8 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: Concept of History अध्याय 2: Rise of Regional Powers अध्याय 3: Establishment of Colonial Authority अध्याय 4: औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप अध्याय 5: औपनिवेशिक शासन के प्रति प्रतिक्रिया: सहयोग और विद्रोह अध्याय 6: राष्ट्रीयता का प्रारंभिक विकास अध्याय 7: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श और विकास अध्याय 8: सांप्रदायिकता से विभाजन अध्याय 9: भारतीय संविधान: लोकतांत्रिक ढांचा और नागरिकों के अधिकार अध्याय 10: पृथ्वी की आंतरिक संरचना अध्याय 11: अस्थिर पृथ्वी अध्याय 12: शैल (चट्टानें) अध्याय 13: वायुदाब पेटियाँ और पवन संचार अध्याय 14: बादल और वर्षा अध्याय 15: जलवायु प्रदेश अध्याय 16: मानव गतिविधियाँ एवं पर्यावरणीय अवनयन अध्याय 17: भारत के कुछ पड़ोसी देश और उनके साथ संबंध अध्याय 18: उत्तर अमेरिका महाद्वीप अध्याय 19: दक्षिण अमेरिका महाद्वीप अध्याय 20: ओशिनिया महाद्वीप

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