ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
ऐसे-ऐसे (Vasant)
१. एकांकी विधा का स्वरूप, नाट्य-शिल्प एवं संकलन-त्रय का सिद्धांत:
हिंदी साहित्य में 'एकांकी' नाटक का वह विशिष्ट और संक्षिप्त रूप है, जिसमें जीवन के किसी एक महत्वपूर्ण प्रसंग, घटना या चरित्र-विशेष की किसी एक प्रमुख समस्या को एक ही अंक और सीमित समय में अत्यंत प्रभावकारी ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। बड़े नाटकों में जहाँ कई अंक, अनगिनत दृश्य, अनेक गौण कथाएं और विशाल कालखंड होता है, वहीं एकांकी में 'संकलन-त्रय' (Three Unities) का कड़ाई से पालन किया जाता है। संकलन-त्रय के अंतर्गत तीन तत्व आते हैं: प्रथम, 'स्थान की एकता' (Unity of Place)—जिसके तहत प्रस्तुत एकांकी की पूरी घटना केवल एक कमरे यानी मोहन के घर की बैठक में घटित होती है; द्वितीय, 'समय की एकता' (Unity of Time)—जिसमें पूरी नाट्य-घटना दोपहर के लगभग एक से दो घंटे के सीमित समय में समाप्त हो जाती है; और तृतीय, 'कार्य की एकता' (Unity of Action)—जिसमें पूरी कथा केवल मोहन के पेट में होने वाले रहस्यमयी दर्द 'ऐसे-ऐसे' और उसके निदान के इर्द-गिर्द ही घूमती है। विष्णु प्रभाकर ने इस एकांकी में रंग-संकेतों (Stage Directions) का अत्यंत कुशल प्रयोग किया है। कोष्ठक में दिए गए निर्देश—जैसे कराहते हुए, पेट पकड़ते हुए, मुँह बनाकर, तख्त पर लेटते हुए—अभिनेताओं को यथार्थवादी अभिनय करने और पाठकों को मंच के सजीव दृश्य की कल्पना करने में पूर्ण सहायता प्रदान करते हैं।
२. एकांकीकार विष्णु प्रभाकर का साहित्यिक व्यक्तित्व एवं बाल-साहित्य दृष्टि:
विष्णु प्रभाकर (१९१२–२००९) आधुनिक हिंदी साहित्य के उन मूर्धन्य रचनाकारों में अग्रणी हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, गांधीवादी जीवन-दर्शन और मानवीय संवेदनाओं को अपनी लेखनी का आधार बनाया। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरानपुर गांव में जन्मे विष्णु प्रभाकर ने उपन्यास, नाटक, एकांकी, कहानी और जीवनी विधाओं में कालजयी साहित्य का सृजन किया। महान बांग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन पर आधारित उनका विशाल जीवनी-उपन्यास 'आवारा मसीहा' भारतीय साहित्य की अद्वितीय धरोहर माना जाता है, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष २००४ में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' से अलंकृत किया। बाल-साहित्य के क्षेत्र में विष्णु प्रभाकर का दृष्टिकोण अत्यंत उदार, संवेदनशील और मनोवैज्ञानिक था। वे बच्चों को उपदेश देने के बजाय उनकी भावनाओं, उनकी स्वाभाविक चंचलता, खेल-कूद के प्रति उनके आकर्षण और सज़ा के भय से उत्पन्न होने वाले रक्षात्मक व्यवहार (Defense Mechanisms) को गहराई से समझते थे। 'ऐसे-ऐसे' एकांकी में उन्होंने किसी भी प्रकार की कृत्रिमता के बिना यह दिखाया है कि किस प्रकार एक सामान्य बच्चा होमवर्क न होने पर डांट से बचने के लिए काल्पनिक बीमारी का आश्रय लेता है।
३. कथानक की विस्तृत रूपरेखा: मोहन का दर्द एवं पारिवारिक व्याकुलता:
कथानक का आरंभ एक मध्यमवर्गीय परिवार की सुसज्जित बैठक से होता है। मंच पर तीन दरवाज़े हैं—एक सड़क की ओर खुलता है, दूसरा अंदर के कमरे में जाता है और तीसरा रसोईघर की तरफ। बीच में एक तख्त बिछा है जिस पर बिछौना है। इसी तख्त पर आठ-नौ वर्ष का मोहन, जो तीसरी कक्षा का छात्र है, पेट पकड़कर बेचैनी से कराह रहा है। पास ही उसकी ममतामयी माँ बैठी है जो अत्यंत घबराई हुई है। मोहन बार-बार कराहते हुए कहता है—'ओह माँ! उल्टी आती है... कुछ ऐसे-ऐसे होता है।' माँ जब पूछती है कि बेटा बता तो सही, क्या चुभन होती है, क्या गोला सा फूटता है? तो मोहन हर प्रश्न पर केवल यही कहता है—'नहीं, बस ऐसे-ऐसे होता है।' माँ का मातृ-हृदय व्याकुल हो उठता है। वह सोचती है कि कहीं कोई गंभीर बीमारी जैसे हैज़ा, कालरा या आंतों की सूजन तो नहीं हो गई। माँ तुरंत घरेलू प्राथमिक उपचार शुरू करती है। वह हींग, अजवायन का चूर्ण देती है, नीबू का रस पिलाती है, सोंठ और काला नमक देती है तथा गर्म पानी की बोतल से मोहन के पेट की सिकाई करती है। किंतु मोहन का दर्द कम होने का नाम नहीं लेता। तभी पिता आते हैं और बताते हैं कि मोहन ने दफ्तर में उनके साथ केवल एक केला और एक संतरा खाया था, कोई तली-भुनी या बासी चीज़ नहीं खाई थी। बस अड्डे पर अचानक उसने कहा कि पेट में कुछ 'ऐसे-ऐसे' हो रहा है। पिता की समझ में भी कुछ नहीं आता और वे तुरंत पड़ोसी दीनानाथ जी के परामर्श पर डॉक्टर और वैद्य जी को बुलाने के लिए फोन मिलाते हैं।
४. सामाजिक परिवेश एवं दीनानाथ जी का पड़ोसी धर्म:
इस एकांकी की एक सुंदर विशेषता तत्कालीन भारतीय मध्यमवर्गीय समाज का सहज और आत्मीय ताना-बाना है। पड़ोस में रहने वाले दीनानाथ जी मोहन के बीमार होने की खबर सुनते ही तुरंत उनके घर पहुँचते हैं। वे केवल औपचारिकता निभाने नहीं आते, बल्कि एक सजग और स्नेही पड़ोसी की भांति माँ को ढाढ़स बंधाते हैं और कहते हैं कि आजकल शहर में नई-नई बीमारियां फैल रही हैं, इसलिए तुरंत किसी कुशल चिकित्सक को दिखाना चाहिए। वे मोहन की चंचलता का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि यह तो पूरे घर को सिर पर उठाए रहता है, आज इसका यूँ शांत पड़ जाना सचमुच चिंता की बात है। यह प्रसंग दर्शाता है कि भारतीय मोहल्लों और बस्तियों में पड़ोसी केवल पास रहने वाले लोग नहीं होते, बल्कि सुख-दुख के अभिन्न साझीदार होते हैं।
५. प्रथम प्रहसन: पारंपरिक वैद्य जी का आगमन एवं शास्त्रीय निदान:
पिता के बुलावे पर सबसे पहले पारंपरिक वैद्य जी अपनी दवाइयों की थैली लेकर प्रवेश करते हैं। वैद्य जी का चरित्र तत्कालीन पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का प्रतिनिधित्व करता है, जो बीमारी के मनोवैज्ञानिक पहलू को समझे बिना केवल शारीरिक लक्षणों और त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के सिद्धांतों पर आधारित होता है। वैद्य जी आते ही मोहन की कलाई पकड़कर नाड़ी का परीक्षण करते हैं। वे बड़े आत्मविश्वास से घोषणा करते हैं कि मोहन के शरीर में 'वात का प्रकोप' हो गया है। उनके अनुसार शीतल वायु कुपित होकर पेट में रुक गई है जिसके कारण यह शूल उठ रहा है। साथ ही वे पेट टटोलकर कहते हैं कि पेट साफ़ नहीं है, मल रुक जाने के कारण कब्ज हो गई है। वैद्य जी तुरंत अपनी थैली से दस्तावर पुड़िया निकालने की बात कहते हैं और निर्देश देते हैं कि हर आधे-आधे घंटे बाद इसे गर्म पानी से दिया जाए। वे दावा करते हैं कि दो-तीन दस्त होने के बाद सारा दर्द ऐसे गायब हो जाएगा जैसे गधे के सिर से सींग! पिताजी कृतज्ञतापूर्वक वैद्य जी को पाँच रुपये की भेंट देते हैं और वैद्य जी अपनी सफलता का आश्वासन देकर विदा होते हैं। यह दृश्य दर्शक के मन में हास्य उत्पन्न करता है क्योंकि जिस बीमारी का कोई भौतिक अस्तित्व ही नहीं है, उसका इतना गंभीर शास्त्रीय विश्लेषण किया जा रहा है।
६. द्वितीय प्रहसन: आधुनिक डॉक्टर साहब का आगमन एवं चिकित्सीय नुस्खा:
वैद्य जी के जाने के कुछ ही देर बाद आधुनिक एलोपैथिक डॉक्टर साहब का पदार्पण होता है। डॉक्टर साहब कोट-पैंट पहने हैं और उनके गले में स्टेथोस्कोप (आला) है। वे कुर्सी पर बैठकर पेशेवर अंदाज़ में मोहन की जीभ बाहर निकलवाकर देखते हैं और उसके पेट के विभिन्न हिस्सों को उंगलियों से दबाकर टटोलते हैं। जब वे पेट दबाते हैं तो मोहन जानबूझकर दर्द का स्वांग रचते हुए और जोर से कराहता है। डॉक्टर साहब गंभीरता से माँ-पिताजी को बताते हैं कि चिंता की कोई बात नहीं है, यह न तो अपेंडिसाइटिस है और न ही कोई गंभीर आंत्र-शोथ (कोलिक पेन)। उनके अनुसार यह केवल 'बदहजमी' (Dyspepsia) का मामला है। पेट में गैस बन गई है जो बाहर न निकलने के कारण फंदा डाल रही है। डॉक्टर साहब कहते हैं कि वे अपनी डिस्पेंसरी से एक खास खुराक (दवा) बनाकर भेजेंगे जिसे पीने के बाद मोहन की तबीयत आधे घंटे में बिल्कुल दुरुस्त हो जाएगी। वे पिताजी को दवा लेने के लिए अपने साथ चलने को कहते हैं। पिताजी उन्हें दस रुपये का नोट फीस के रूप में थमाते हैं। यह प्रसंग चिकित्सा व्यवस्था पर एक हल्का और चुटीला व्यंग्य है, जहाँ बीमारी का असली कारण जाने बिना दवाइयों और खुराक का व्यापार चल पड़ता है।
७. चरमोत्कर्ष एवं रहस्योद्घाटन: मास्टर जी का पदार्पण एवं मनोवैज्ञानिक समाधान:
जब माँ गर्म पानी की बोतल लिए बैठी है और पिताजी डॉक्टर के साथ दवा लेने गए हैं, तभी मोहन के स्कूल के मास्टर जी का प्रवेश होता है। मास्टर जी का आगमन इस एकांकी का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ (Turning Point) है। मास्टर जी एक अनुभवी, संवेदनशील और बाल-मनोविज्ञान के गहरे पारखी शिक्षक हैं। वे आते ही मोहन का हाल पूछते हैं और माँ से कहते हैं कि उन्होंने सुना कि मोहन के पेट में 'ऐसे-ऐसे' हो रहा है। मास्टर जी मंद मुस्कान के साथ कहते हैं कि वे इस 'ऐसे-ऐसे' नामक बीमारी को बहुत अच्छी तरह जानते हैं; यह बीमारी अक्सर स्कूल के बच्चों को तब होती है जब छुट्टियां समाप्त होने वाली होती हैं! इसके बाद मास्टर जी मोहन के पास तख्त पर बैठते हैं और बड़े प्यार से पूछते हैं—'मोहन! सच बताओ, क्या स्कूल का काम पूरा कर लिया है?' यह प्रश्न सुनते ही मोहन का सारा स्वांग बिखरने लगता है। वह लज्जित होकर चादर से अपना मुँह ढक लेता है और कोई उत्तर नहीं देता। माँ आश्चर्य से पूछती है कि क्या बात है मोहन? तब मोहन दबी आवाज़ में स्वीकार करता है कि महीने भर की छुट्टियों में उसने केवल खेल-कूद किया और स्कूल का गृहकार्य पूरा नहीं किया। अब कल स्कूल खुलना है और मास्टर जी की डांट तथा सज़ा के डर से बचने के लिए उसने पेट में दर्द का यह काल्पनिक नाटक रचा था। माँ यह सुनकर दंग रह जाती है और अपने माथे पर हाथ रख लेती है। किंतु मास्टर जी एक आदर्श शिक्षक की भांति मोहन को डांटते या पीटते नहीं हैं। वे हँसते हुए कहते हैं कि इस बीमारी की असली दवा वैद्य या डॉक्टर के पास नहीं, बल्कि उनके पास है। वे मोहन को दो दिन की और मोहलत (अतिरिक्त समय) देते हैं और कहते हैं कि इन दो दिनों में वह अपना सारा गृहकार्य पूरा कर ले, फिर उसका यह दर्द हमेशा के लिए भाग जाएगा। यह सुनते ही मोहन का सारा दर्द छूमंतर हो जाता है और वह झटपट बिस्तर से उठकर बैठ जाता है। ठीक उसी समय पिताजी डॉक्टर के यहाँ से दवा की शीशी लेकर कमरे में प्रवेश करते हैं। जब माँ उन्हें पूरा सच बताती है कि मोहन को कोई बीमारी नहीं थी बल्कि यह गृहकार्य न करने का बहाना था, तो पिताजी अवाक् रह जाते हैं। विस्मय और आश्चर्य के मारे उनके हाथ से दवा की शीशी छूटकर फर्श पर गिर जाती है और चूर-चूर हो जाती है। सभी पात्र एक साथ ठहाका मारकर हँस पड़ते हैं और नाटक समाप्त होता है।
८. प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण (Character Sketches):
क. मोहन: एकांकी का केंद्रीय पात्र, जो तीसरी कक्षा का आठ-नौ वर्षीय छात्र है। वह नटखट, कल्पनाशील और अभिनय-कुशल बालक है। छुट्टियों में काम टालने के कारण जब वह संकट में पड़ता है, तो सज़ा से बचने के लिए 'ऐसे-ऐसे' का काल्पनिक रोग गढ़ लेता है। यद्यपि उसका आचरण असत्य पर आधारित है, किंतु वह स्वभाव से दुर्भावनापूर्ण नहीं है। शिक्षक के स्नेहपूर्ण व्यवहार पर वह तुरंत अपना दोष स्वीकार कर लेता है।
ख. माँ: ममता, वात्सल्य और पारंपरिक घरेलू चिकित्सा की साक्षात मूर्ति। वह बच्चे के ज़रा से कष्ट पर घबरा उठती है और हींग, अजवायन से लेकर गर्म पानी की बोतल तक सब कुछ आज़मा डालती है। उसका अत्यधिक लाड़-प्यार ही अनजाने में मोहन को बहानेबाजी का अवसर देता है।
ग. पिताजी: एक कर्तव्यनिष्ठ, व्यावहारिक मध्यमवर्गीय दफ्तरकर्मी। वे बच्चे की स्थिति देखकर घबराते हैं और बिना देर किए टेलीफोन से चिकित्सकों को बुलाते हैं तथा फीस चुकाते हैं। अंत में उनके हाथ से दवा की शीशी का गिरना उनके भोलेपन और हतप्रभ होने को दर्शाता है।
घ. मास्टर जी: एकांकी के सर्वाधिक आदर्श और प्रभावशाली पात्र। वे बाल-मनोविज्ञान के ज्ञाता हैं जो कठोर अनुशासन के स्थान पर सहानुभूति, संवाद और सुधारात्मक अवसर देने में विश्वास रखते हैं। वे मोहन को सज़ा देने के बजाय दो दिन की मोहलत देकर उसकी समस्या का स्थायी समाधान करते हैं।
ङ. वैद्य जी व डॉक्टर: समाज की दो भिन्न चिकित्सा पद्धतियों के प्रतिनिधि, जो रोग की शारीरिक व्याख्या में इतने उलझ जाते हैं कि उसके मनोवैज्ञानिक और मानसिक कारण को छू भी नहीं पाते।
९. 'भाषा की बात' एवं व्याकरणिक आयाम:
प्रस्तुत पाठ में व्यावहारिक हिंदी व्याकरण के अनेक महत्वपूर्ण तत्व समाहित हैं। प्रथम, 'शब्द-युग्म' (पुनरुक्त शब्द) जैसे 'ऐसे-ऐसे', 'बार-बार', 'नई-नई', जो किसी भाव की निरंतरता या तीव्रता को प्रकट करते हैं। द्वितीय, अर्थ के आधार पर वाक्य-भेद—जैसे विधानवाचक वाक्य ('मोहन ने केला और संतरा खाया'), निषेधवाचक वाक्य ('मोहन ने स्कूल का काम पूरा नहीं किया'), प्रश्नवाचक वाक्य ('क्या पेट में दर्द हो रहा है?') और आज्ञावाचक वाक्य ('उठो और दो दिन में काम पूरा करो')। तृतीय, मुहावरों का सहज प्रयोग—जैसे 'छकाना' (बहुत परेशान करना), 'पेट में दाढ़ी होना' (कम उम्र में बहुत चालाक होना) और 'हवाइयां उड़ना' (चेहरे का रंग उड़ना या डर जाना)। यह पाठ छात्रों को व्यावहारिक संवाद शैली और व्याकरणिक शुद्धता का उत्कृष्ट पाठ पढ़ाता है।
१०. नैतिक संदेश एवं जीवन-मूल्य:
एकांकी 'ऐसे-ऐसे' पाठकों को दोहरे स्तर पर नैतिक जीवन-मूल्य सिखाती है। छात्रों के स्तर पर यह 'समय-प्रबंधन' (Time Management) और ईमानदारी का संदेश देती है। काम को कल पर टालना (Procrastination) केवल तनाव, भय और अपराध-बोध को जन्म देता है। बहानेबाजी से कुछ समय के लिए सज़ा टल सकती है, किंतु अंततः सच्चाई सामने आने पर अपमान और उपहास का पात्र बनना पड़ता है। वहीं माता-पिता और शिक्षकों के स्तर पर यह रचना 'भयमुक्त शिक्षा' और संवेदनशील संवाद का संदेश देती है। जब विद्यालय में सज़ा का भय समाप्त होता है और शिक्षक मित्र तथा मार्गदर्शक बनता है, तो बच्चे बिना किसी भय के अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार की ओर अग्रसर होते हैं।