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ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

ऐसे-ऐसे (Vasant)

१. एकांकी विधा का स्वरूप, नाट्य-शिल्प एवं संकलन-त्रय का सिद्धांत: हिंदी साहित्य में 'एकांकी' नाटक का वह विशिष्ट और संक्षिप्त रूप है, जिसमें जीवन के किसी एक महत्वपूर्ण प्रसंग, घटना या चरित्र-विशेष की किसी एक प्रमुख समस्या को एक ही अंक और सीमित समय में अत्यंत प्रभावकारी ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। बड़े नाटकों में जहाँ कई अंक, अनगिनत दृश्य, अनेक गौण कथाएं और विशाल कालखंड होता है, वहीं एकांकी में 'संकलन-त्रय' (Three Unities) का कड़ाई से पालन किया जाता है। संकलन-त्रय के अंतर्गत तीन तत्व आते हैं: प्रथम, 'स्थान की एकता' (Unity of Place)—जिसके तहत प्रस्तुत एकांकी की पूरी घटना केवल एक कमरे यानी मोहन के घर की बैठक में घटित होती है; द्वितीय, 'समय की एकता' (Unity of Time)—जिसमें पूरी नाट्य-घटना दोपहर के लगभग एक से दो घंटे के सीमित समय में समाप्त हो जाती है; और तृतीय, 'कार्य की एकता' (Unity of Action)—जिसमें पूरी कथा केवल मोहन के पेट में होने वाले रहस्यमयी दर्द 'ऐसे-ऐसे' और उसके निदान के इर्द-गिर्द ही घूमती है। विष्णु प्रभाकर ने इस एकांकी में रंग-संकेतों (Stage Directions) का अत्यंत कुशल प्रयोग किया है। कोष्ठक में दिए गए निर्देश—जैसे कराहते हुए, पेट पकड़ते हुए, मुँह बनाकर, तख्त पर लेटते हुए—अभिनेताओं को यथार्थवादी अभिनय करने और पाठकों को मंच के सजीव दृश्य की कल्पना करने में पूर्ण सहायता प्रदान करते हैं। २. एकांकीकार विष्णु प्रभाकर का साहित्यिक व्यक्तित्व एवं बाल-साहित्य दृष्टि: विष्णु प्रभाकर (१९१२–२००९) आधुनिक हिंदी साहित्य के उन मूर्धन्य रचनाकारों में अग्रणी हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, गांधीवादी जीवन-दर्शन और मानवीय संवेदनाओं को अपनी लेखनी का आधार बनाया। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरानपुर गांव में जन्मे विष्णु प्रभाकर ने उपन्यास, नाटक, एकांकी, कहानी और जीवनी विधाओं में कालजयी साहित्य का सृजन किया। महान बांग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन पर आधारित उनका विशाल जीवनी-उपन्यास 'आवारा मसीहा' भारतीय साहित्य की अद्वितीय धरोहर माना जाता है, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष २००४ में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' से अलंकृत किया। बाल-साहित्य के क्षेत्र में विष्णु प्रभाकर का दृष्टिकोण अत्यंत उदार, संवेदनशील और मनोवैज्ञानिक था। वे बच्चों को उपदेश देने के बजाय उनकी भावनाओं, उनकी स्वाभाविक चंचलता, खेल-कूद के प्रति उनके आकर्षण और सज़ा के भय से उत्पन्न होने वाले रक्षात्मक व्यवहार (Defense Mechanisms) को गहराई से समझते थे। 'ऐसे-ऐसे' एकांकी में उन्होंने किसी भी प्रकार की कृत्रिमता के बिना यह दिखाया है कि किस प्रकार एक सामान्य बच्चा होमवर्क न होने पर डांट से बचने के लिए काल्पनिक बीमारी का आश्रय लेता है। ३. कथानक की विस्तृत रूपरेखा: मोहन का दर्द एवं पारिवारिक व्याकुलता: कथानक का आरंभ एक मध्यमवर्गीय परिवार की सुसज्जित बैठक से होता है। मंच पर तीन दरवाज़े हैं—एक सड़क की ओर खुलता है, दूसरा अंदर के कमरे में जाता है और तीसरा रसोईघर की तरफ। बीच में एक तख्त बिछा है जिस पर बिछौना है। इसी तख्त पर आठ-नौ वर्ष का मोहन, जो तीसरी कक्षा का छात्र है, पेट पकड़कर बेचैनी से कराह रहा है। पास ही उसकी ममतामयी माँ बैठी है जो अत्यंत घबराई हुई है। मोहन बार-बार कराहते हुए कहता है—'ओह माँ! उल्टी आती है... कुछ ऐसे-ऐसे होता है।' माँ जब पूछती है कि बेटा बता तो सही, क्या चुभन होती है, क्या गोला सा फूटता है? तो मोहन हर प्रश्न पर केवल यही कहता है—'नहीं, बस ऐसे-ऐसे होता है।' माँ का मातृ-हृदय व्याकुल हो उठता है। वह सोचती है कि कहीं कोई गंभीर बीमारी जैसे हैज़ा, कालरा या आंतों की सूजन तो नहीं हो गई। माँ तुरंत घरेलू प्राथमिक उपचार शुरू करती है। वह हींग, अजवायन का चूर्ण देती है, नीबू का रस पिलाती है, सोंठ और काला नमक देती है तथा गर्म पानी की बोतल से मोहन के पेट की सिकाई करती है। किंतु मोहन का दर्द कम होने का नाम नहीं लेता। तभी पिता आते हैं और बताते हैं कि मोहन ने दफ्तर में उनके साथ केवल एक केला और एक संतरा खाया था, कोई तली-भुनी या बासी चीज़ नहीं खाई थी। बस अड्डे पर अचानक उसने कहा कि पेट में कुछ 'ऐसे-ऐसे' हो रहा है। पिता की समझ में भी कुछ नहीं आता और वे तुरंत पड़ोसी दीनानाथ जी के परामर्श पर डॉक्टर और वैद्य जी को बुलाने के लिए फोन मिलाते हैं। ४. सामाजिक परिवेश एवं दीनानाथ जी का पड़ोसी धर्म: इस एकांकी की एक सुंदर विशेषता तत्कालीन भारतीय मध्यमवर्गीय समाज का सहज और आत्मीय ताना-बाना है। पड़ोस में रहने वाले दीनानाथ जी मोहन के बीमार होने की खबर सुनते ही तुरंत उनके घर पहुँचते हैं। वे केवल औपचारिकता निभाने नहीं आते, बल्कि एक सजग और स्नेही पड़ोसी की भांति माँ को ढाढ़स बंधाते हैं और कहते हैं कि आजकल शहर में नई-नई बीमारियां फैल रही हैं, इसलिए तुरंत किसी कुशल चिकित्सक को दिखाना चाहिए। वे मोहन की चंचलता का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि यह तो पूरे घर को सिर पर उठाए रहता है, आज इसका यूँ शांत पड़ जाना सचमुच चिंता की बात है। यह प्रसंग दर्शाता है कि भारतीय मोहल्लों और बस्तियों में पड़ोसी केवल पास रहने वाले लोग नहीं होते, बल्कि सुख-दुख के अभिन्न साझीदार होते हैं। ५. प्रथम प्रहसन: पारंपरिक वैद्य जी का आगमन एवं शास्त्रीय निदान: पिता के बुलावे पर सबसे पहले पारंपरिक वैद्य जी अपनी दवाइयों की थैली लेकर प्रवेश करते हैं। वैद्य जी का चरित्र तत्कालीन पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का प्रतिनिधित्व करता है, जो बीमारी के मनोवैज्ञानिक पहलू को समझे बिना केवल शारीरिक लक्षणों और त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के सिद्धांतों पर आधारित होता है। वैद्य जी आते ही मोहन की कलाई पकड़कर नाड़ी का परीक्षण करते हैं। वे बड़े आत्मविश्वास से घोषणा करते हैं कि मोहन के शरीर में 'वात का प्रकोप' हो गया है। उनके अनुसार शीतल वायु कुपित होकर पेट में रुक गई है जिसके कारण यह शूल उठ रहा है। साथ ही वे पेट टटोलकर कहते हैं कि पेट साफ़ नहीं है, मल रुक जाने के कारण कब्ज हो गई है। वैद्य जी तुरंत अपनी थैली से दस्तावर पुड़िया निकालने की बात कहते हैं और निर्देश देते हैं कि हर आधे-आधे घंटे बाद इसे गर्म पानी से दिया जाए। वे दावा करते हैं कि दो-तीन दस्त होने के बाद सारा दर्द ऐसे गायब हो जाएगा जैसे गधे के सिर से सींग! पिताजी कृतज्ञतापूर्वक वैद्य जी को पाँच रुपये की भेंट देते हैं और वैद्य जी अपनी सफलता का आश्वासन देकर विदा होते हैं। यह दृश्य दर्शक के मन में हास्य उत्पन्न करता है क्योंकि जिस बीमारी का कोई भौतिक अस्तित्व ही नहीं है, उसका इतना गंभीर शास्त्रीय विश्लेषण किया जा रहा है। ६. द्वितीय प्रहसन: आधुनिक डॉक्टर साहब का आगमन एवं चिकित्सीय नुस्खा: वैद्य जी के जाने के कुछ ही देर बाद आधुनिक एलोपैथिक डॉक्टर साहब का पदार्पण होता है। डॉक्टर साहब कोट-पैंट पहने हैं और उनके गले में स्टेथोस्कोप (आला) है। वे कुर्सी पर बैठकर पेशेवर अंदाज़ में मोहन की जीभ बाहर निकलवाकर देखते हैं और उसके पेट के विभिन्न हिस्सों को उंगलियों से दबाकर टटोलते हैं। जब वे पेट दबाते हैं तो मोहन जानबूझकर दर्द का स्वांग रचते हुए और जोर से कराहता है। डॉक्टर साहब गंभीरता से माँ-पिताजी को बताते हैं कि चिंता की कोई बात नहीं है, यह न तो अपेंडिसाइटिस है और न ही कोई गंभीर आंत्र-शोथ (कोलिक पेन)। उनके अनुसार यह केवल 'बदहजमी' (Dyspepsia) का मामला है। पेट में गैस बन गई है जो बाहर न निकलने के कारण फंदा डाल रही है। डॉक्टर साहब कहते हैं कि वे अपनी डिस्पेंसरी से एक खास खुराक (दवा) बनाकर भेजेंगे जिसे पीने के बाद मोहन की तबीयत आधे घंटे में बिल्कुल दुरुस्त हो जाएगी। वे पिताजी को दवा लेने के लिए अपने साथ चलने को कहते हैं। पिताजी उन्हें दस रुपये का नोट फीस के रूप में थमाते हैं। यह प्रसंग चिकित्सा व्यवस्था पर एक हल्का और चुटीला व्यंग्य है, जहाँ बीमारी का असली कारण जाने बिना दवाइयों और खुराक का व्यापार चल पड़ता है। ७. चरमोत्कर्ष एवं रहस्योद्घाटन: मास्टर जी का पदार्पण एवं मनोवैज्ञानिक समाधान: जब माँ गर्म पानी की बोतल लिए बैठी है और पिताजी डॉक्टर के साथ दवा लेने गए हैं, तभी मोहन के स्कूल के मास्टर जी का प्रवेश होता है। मास्टर जी का आगमन इस एकांकी का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ (Turning Point) है। मास्टर जी एक अनुभवी, संवेदनशील और बाल-मनोविज्ञान के गहरे पारखी शिक्षक हैं। वे आते ही मोहन का हाल पूछते हैं और माँ से कहते हैं कि उन्होंने सुना कि मोहन के पेट में 'ऐसे-ऐसे' हो रहा है। मास्टर जी मंद मुस्कान के साथ कहते हैं कि वे इस 'ऐसे-ऐसे' नामक बीमारी को बहुत अच्छी तरह जानते हैं; यह बीमारी अक्सर स्कूल के बच्चों को तब होती है जब छुट्टियां समाप्त होने वाली होती हैं! इसके बाद मास्टर जी मोहन के पास तख्त पर बैठते हैं और बड़े प्यार से पूछते हैं—'मोहन! सच बताओ, क्या स्कूल का काम पूरा कर लिया है?' यह प्रश्न सुनते ही मोहन का सारा स्वांग बिखरने लगता है। वह लज्जित होकर चादर से अपना मुँह ढक लेता है और कोई उत्तर नहीं देता। माँ आश्चर्य से पूछती है कि क्या बात है मोहन? तब मोहन दबी आवाज़ में स्वीकार करता है कि महीने भर की छुट्टियों में उसने केवल खेल-कूद किया और स्कूल का गृहकार्य पूरा नहीं किया। अब कल स्कूल खुलना है और मास्टर जी की डांट तथा सज़ा के डर से बचने के लिए उसने पेट में दर्द का यह काल्पनिक नाटक रचा था। माँ यह सुनकर दंग रह जाती है और अपने माथे पर हाथ रख लेती है। किंतु मास्टर जी एक आदर्श शिक्षक की भांति मोहन को डांटते या पीटते नहीं हैं। वे हँसते हुए कहते हैं कि इस बीमारी की असली दवा वैद्य या डॉक्टर के पास नहीं, बल्कि उनके पास है। वे मोहन को दो दिन की और मोहलत (अतिरिक्त समय) देते हैं और कहते हैं कि इन दो दिनों में वह अपना सारा गृहकार्य पूरा कर ले, फिर उसका यह दर्द हमेशा के लिए भाग जाएगा। यह सुनते ही मोहन का सारा दर्द छूमंतर हो जाता है और वह झटपट बिस्तर से उठकर बैठ जाता है। ठीक उसी समय पिताजी डॉक्टर के यहाँ से दवा की शीशी लेकर कमरे में प्रवेश करते हैं। जब माँ उन्हें पूरा सच बताती है कि मोहन को कोई बीमारी नहीं थी बल्कि यह गृहकार्य न करने का बहाना था, तो पिताजी अवाक् रह जाते हैं। विस्मय और आश्चर्य के मारे उनके हाथ से दवा की शीशी छूटकर फर्श पर गिर जाती है और चूर-चूर हो जाती है। सभी पात्र एक साथ ठहाका मारकर हँस पड़ते हैं और नाटक समाप्त होता है। ८. प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण (Character Sketches): क. मोहन: एकांकी का केंद्रीय पात्र, जो तीसरी कक्षा का आठ-नौ वर्षीय छात्र है। वह नटखट, कल्पनाशील और अभिनय-कुशल बालक है। छुट्टियों में काम टालने के कारण जब वह संकट में पड़ता है, तो सज़ा से बचने के लिए 'ऐसे-ऐसे' का काल्पनिक रोग गढ़ लेता है। यद्यपि उसका आचरण असत्य पर आधारित है, किंतु वह स्वभाव से दुर्भावनापूर्ण नहीं है। शिक्षक के स्नेहपूर्ण व्यवहार पर वह तुरंत अपना दोष स्वीकार कर लेता है। ख. माँ: ममता, वात्सल्य और पारंपरिक घरेलू चिकित्सा की साक्षात मूर्ति। वह बच्चे के ज़रा से कष्ट पर घबरा उठती है और हींग, अजवायन से लेकर गर्म पानी की बोतल तक सब कुछ आज़मा डालती है। उसका अत्यधिक लाड़-प्यार ही अनजाने में मोहन को बहानेबाजी का अवसर देता है। ग. पिताजी: एक कर्तव्यनिष्ठ, व्यावहारिक मध्यमवर्गीय दफ्तरकर्मी। वे बच्चे की स्थिति देखकर घबराते हैं और बिना देर किए टेलीफोन से चिकित्सकों को बुलाते हैं तथा फीस चुकाते हैं। अंत में उनके हाथ से दवा की शीशी का गिरना उनके भोलेपन और हतप्रभ होने को दर्शाता है। घ. मास्टर जी: एकांकी के सर्वाधिक आदर्श और प्रभावशाली पात्र। वे बाल-मनोविज्ञान के ज्ञाता हैं जो कठोर अनुशासन के स्थान पर सहानुभूति, संवाद और सुधारात्मक अवसर देने में विश्वास रखते हैं। वे मोहन को सज़ा देने के बजाय दो दिन की मोहलत देकर उसकी समस्या का स्थायी समाधान करते हैं। ङ. वैद्य जी व डॉक्टर: समाज की दो भिन्न चिकित्सा पद्धतियों के प्रतिनिधि, जो रोग की शारीरिक व्याख्या में इतने उलझ जाते हैं कि उसके मनोवैज्ञानिक और मानसिक कारण को छू भी नहीं पाते। ९. 'भाषा की बात' एवं व्याकरणिक आयाम: प्रस्तुत पाठ में व्यावहारिक हिंदी व्याकरण के अनेक महत्वपूर्ण तत्व समाहित हैं। प्रथम, 'शब्द-युग्म' (पुनरुक्त शब्द) जैसे 'ऐसे-ऐसे', 'बार-बार', 'नई-नई', जो किसी भाव की निरंतरता या तीव्रता को प्रकट करते हैं। द्वितीय, अर्थ के आधार पर वाक्य-भेद—जैसे विधानवाचक वाक्य ('मोहन ने केला और संतरा खाया'), निषेधवाचक वाक्य ('मोहन ने स्कूल का काम पूरा नहीं किया'), प्रश्नवाचक वाक्य ('क्या पेट में दर्द हो रहा है?') और आज्ञावाचक वाक्य ('उठो और दो दिन में काम पूरा करो')। तृतीय, मुहावरों का सहज प्रयोग—जैसे 'छकाना' (बहुत परेशान करना), 'पेट में दाढ़ी होना' (कम उम्र में बहुत चालाक होना) और 'हवाइयां उड़ना' (चेहरे का रंग उड़ना या डर जाना)। यह पाठ छात्रों को व्यावहारिक संवाद शैली और व्याकरणिक शुद्धता का उत्कृष्ट पाठ पढ़ाता है। १०. नैतिक संदेश एवं जीवन-मूल्य: एकांकी 'ऐसे-ऐसे' पाठकों को दोहरे स्तर पर नैतिक जीवन-मूल्य सिखाती है। छात्रों के स्तर पर यह 'समय-प्रबंधन' (Time Management) और ईमानदारी का संदेश देती है। काम को कल पर टालना (Procrastination) केवल तनाव, भय और अपराध-बोध को जन्म देता है। बहानेबाजी से कुछ समय के लिए सज़ा टल सकती है, किंतु अंततः सच्चाई सामने आने पर अपमान और उपहास का पात्र बनना पड़ता है। वहीं माता-पिता और शिक्षकों के स्तर पर यह रचना 'भयमुक्त शिक्षा' और संवेदनशील संवाद का संदेश देती है। जब विद्यालय में सज़ा का भय समाप्त होता है और शिक्षक मित्र तथा मार्गदर्शक बनता है, तो बच्चे बिना किसी भय के अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार की ओर अग्रसर होते हैं।

क्या आपने कभी सोचा है?

क्या आपने कभी स्कूल का गृहकार्य अधूरा रह जाने पर पेट दर्द या सिर दर्द का कोई ऐसा रहस्यमयी बहाना बनाया है, जिसका नाम कोई डॉक्टर या वैद्य भी न ढूंढ सके? विष्णु प्रभाकर की कालजयी हास्य-व्यंग्य एकांकी 'ऐसे-ऐसे' हमें एक ऐसे ही चतुर, नटखट और तीसरी कक्षा के छात्र मोहन से मिलाती है, जो महीने भर की छुट्टियों में मौज-मस्ती करने के बाद स्कूल खुलने से ठीक एक दिन पहले एक अजीबोगरीब बीमारी का शिकार हो जाता है। जब माँ पूछती है कि बेटा क्या दर्द है, तो वह पेट पकड़कर केवल एक ही रट लगाता है—'बस कुछ ऐसे-ऐसे होता है!' हींग, अजवायन, सोंठ, गर्म पानी की बोतल, वैद्य जी की वात-कब्ज नाशक पुड़िया और डॉक्टर साहब की बदहजमी वाली खुराक—सब कुछ व्यर्थ साबित होता है। किंतु जैसे ही स्कूल के अनुभवी मास्टर जी कमरे में कदम रखते हैं, वे एक ही नज़र में उस 'ऐसे-ऐसे' की असली नब्ज़ पहचान लेते हैं! यह नाटक केवल ठहाकों का फव्वारा नहीं है, बल्कि बाल-मनोविज्ञान, समय-प्रबंधन, भयमुक्त शिक्षा और पारिवारिक वात्सल्य का एक अत्यंत सजीव, रोचक और शिक्षाप्रद आईना है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

एकांकी 'ऐसे-ऐसे' का अध्ययन कक्षा ६ के विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक, मनोवैज्ञानिक और नैतिक तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर यह पाठ विद्यार्थियों को आत्म-निरीक्षण (Self-reflection) का अवसर प्रदान करता है। विद्यालयी जीवन में लगभग प्रत्येक विद्यार्थी कभी न कभी गृहकार्य अधूरा रहने या परीक्षा के डर से बचने के लिए बहानेबाजी की स्थिति से गुज़रता है। यह एकांकी छात्रों को यह बोध कराती है कि बहाने बनाना किसी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि यह अपने माता-पिता को अनावश्यक मानसिक व आर्थिक पीड़ा पहुँचाने का कारण बनता है। जब विद्यार्थी मोहन के बहाने के कारण परिवार की व्याकुलता, वैद्य जी और डॉक्टर की फीस तथा दवाइयों की बर्बादी को देखते हैं, तो वे अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति अधिक सजग होते हैं। शैक्षणिक और साहित्यिक स्तर पर यह पाठ छात्रों को एकांकी विधा के आधारभूत तत्वों—जैसे संकलन-त्रय, मंच-सज्जा, पात्र-योजना, रंग-संकेत और स्वाभाविक संवादात्मकता—से भलीभांति परिचित कराता है। यह पाठ कक्षा में अभिनय और नाट्य-मंचन के लिए आदर्श है, जिससे विद्यार्थियों में अभिव्यक्ति-कौशल, संवाद-वाचन, भाव-भंगिमा और आत्मविश्वास का विकास होता है। इसके अतिरिक्त, यह पाठ शिक्षकों और अभिभावकों को यह अमूल्य संदेश देता है कि कठोर डांट-फटकार के स्थान पर सहानुभूतिपूर्ण संवाद और सुधारात्मक अवसर देने से ही बच्चों में स्थाई परिवर्तन संभव है। संक्षेप में, यह पाठ हास्य और मनोरंजन के आवरण में जीवन के गंभीर सत्य को सहजता से आत्मसात कराने वाली एक कालजयी रचना है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • हिंदी वर्णमाला, देवनागरी लिपि तथा कक्षा ६ स्तर के व्यावहारिक गद्य एवं सरल वाक्यों के पठन-पाठन का ज्ञान।
  • नाट्य-संवाद शैली, पात्रों के नाम और कोष्ठक में दिए जाने वाले रंग-संकेतों (मंच-निर्देशों) की सामान्य समझ।
  • विद्यालयी जीवन, गृहकार्य (होमवर्क), छुट्टियों की मौज-मस्ती तथा बाल-सुलभ शरारतों के दैनिक अनुभवों की समझ।
  • पारंपरिक घरेलू नुस्खों (हींग, अजवायन, सोंठ) तथा सामान्य बीमारियों के प्राथमिक उपचार की बुनियादी जानकारी।
  • सरल व्याकरणिक अवधारणाओं जैसे शब्द-युग्म, संज्ञा, सर्वनाम, मुहावरे एवं वाक्य-भेदों का आधारभूत ज्ञान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • एकांकी विधा की परिभाषा, स्वरूप तथा संकलन-त्रय (समय, स्थान और कार्य की एकता) के नियमों को स्पष्ट रूप से समझ सकेंगे।
  • विष्णु प्रभाकर के जीवन-परिचय, उनके गांधीवादी जीवन-दर्शन तथा बाल-मनोवैज्ञानिक लेखन की विशेषताओं का उल्लेख कर सकेंगे।
  • एकांकी के सातों प्रमुख पात्रों (मोहन, माँ, पिताजी, दीनानाथ, वैद्य जी, डॉक्टर, मास्टर जी) की भूमिका व चरित्र-चित्रण का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • कथानक के क्रमिक विकास, मोहन के बहाने 'ऐसे-ऐसे' के रहस्य तथा मास्टर जी द्वारा उसके मनोवैज्ञानिक समाधान को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • पारंपरिक आयुर्वेद (वैद्य जी) और आधुनिक एलोपैथी (डॉक्टर साहब) के निदान पर किए गए हल्के हास्य-व्यंग्य को समझ सकेंगे।
  • रंग-संकेतों (Stage Directions) के महत्व को पहचानकर एकांकी के संवादों का कक्षा में प्रभावी और जीवंत अभिनय कर सकेंगे।
  • अर्थ के आधार पर वाक्य के प्रमुख भेदों (विधानवाचक, निषेधवाचक, प्रश्नवाचक, आज्ञावाचक आदि) की पहचान व रूपांतरण कर सकेंगे।
  • पाठ में प्रयुक्त द्विरुक्त शब्द-युग्मों ('ऐसे-ऐसे', 'बार-बार') तथा मुहावरों ('छकाना', 'हवाइयां उड़ना') का अर्थ समझकर वाक्य-प्रयोग कर सकेंगे।
  • कार्य को समय पर पूरा करने (समय-प्रबंधन) के महत्व को समझकर बहानेबाजी और असत्य से बचने की नैतिक प्रेरणा प्राप्त करेंगे।
  • परीक्षा में पूछे जाने वाले लघु, दीर्घ उत्तरीय, विश्लेषणात्मक तथा संदर्भ-आधारित प्रश्नों के सटीक और मानक उत्तर लिख सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 एकांकीकार परिचय, एकांकी विधा के तत्...
2 नाट्य-दृश्य १: मोहन का 'ऐसे-ऐसे' दर...
3 नाट्य-दृश्य २: दीनानाथ का पड़ोस-धर्...
4 नाट्य-दृश्य ३: आधुनिक डॉक्टर साहब क...
5 नाट्य-दृश्य ४: मास्टर जी का पदार्पण...
6 एकांकी का नाट्य-शिल्प, चरित्र-चित्र...
7 'भाषा की बात': व्याकरणिक विश्लेषण,...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

एकांकीकार परिचय, एकांकी विधा के तत्व एवं मंच-सज्जा

एकांकी नाटक ऐसे-ऐसे (Vasant Bhag 1 — पाठ ६) एकांकीकार: विष्णु प्रभाकर | विधा: हास्य-व्यंग्य बाल-एकांकी | केंद्रीय विषय: बाल-मनोविज्ञान व बहानेबाज़ी CISCE Class 6 Hindi • संपूर्ण संकल्पना मानचित्र, चरित्र-चित्रण, मंच-शिल्प, शब्दार्थ व व्याकरणिक विश्लेषण पात्र: ७ कक्षा ३ का मोहन पैनल १: एकांकीकार परिचय, एकांकी विधा एवं मुख्य पात्रों की योजना (Dramatis Personae) १. एकांकीकार: विष्णु प्रभाकर (1912–2009) • जन्म व व्यक्तित्व: मुज़फ्फरनगर (उ.प्र.), गांधीवादी आदर्शवादी लेखक। • अमर कृति एवं सम्मान: शरतचंद्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' के लेखक। पद्म भूषण (2004) व साहित्य अकादमी पुरस्कार। • बाल-साहित्य में योगदान: बच्चों की मनोदशा, भय, कल्पना और चंचलता का अत्यंत सजीव, स्वाभाविक व मार्मिक चित्रण। उद्देश्य: भयमुक्त व संवादपूर्ण बाल-शिक्षा २. एकांकी विधा (One-Act Play) की विशेषताएँ • एक अंक व एक दृश्य: संपूर्ण नाटक एक ही कमरे (बैठक) में घटित होता है। • संकलन-त्रय (Three Unities): समय की एकता (१-२ घंटे), स्थान की एकता (घर की बैठक) एवं कार्य की एकता (पेट-दर्द)। • रंग-संकेत (Stage Directions): कोष्ठक में दिए निर्देश जो पात्रों की भाव-भंगिमा, स्वर तथा मंच की गतिविधियों का मार्गदर्शन करते हैं। रस: हास्य रस (चमत्कारिक चरमोत्कर्ष) ३. पात्र-संसार (Dramatis Personae) १. मोहन: कक्षा ३ का छात्र, केंद्रीय पात्र, नटखट। २. माँ: ममतामयी, घरेलू नुस्खों से इलाज करने वाली। ३. पिताजी: दफ्तरकर्मी, तुरंत डॉक्टर-वैद्य बुलाने वाले। ४. दीनानाथ: पड़ोसी, सामाजिक सद्भाव के प्रतीक। ५. वैद्य जी: नाड़ी-परीक्षक, वात-कब्ज का निदान। ६. डॉक्टर: एलोपैथ, बदहजमी-गैस की खुराक देने वाले। ७. मास्टर जी: पारखी शिक्षक, असली मर्ज़ के ज्ञाता! मंच-सज्जा: तीन दरवाजे (सड़क, अंदर, बैठक), तख्त पर बिछा बिछौना, बीच में मेज-कुर्सी, फोन पैनल २: नाट्य-दृश्य १ — मोहन का रहस्यमयी दर्द, माँ की ममता एवं घरेलू चिकित्सा का दौर कथानक आरंभ: 'कुछ ऐसे-ऐसे होता है' की पहेली • घटना का समय एवं संदर्भ: दोपहर का समय; मोहन तख्त पर पड़ा कराह रहा है और बार-बार पेट पकड़कर 'ओह माँ! उल्टी आती है... ऐसे-ऐसे होता है' चिल्लाता है। • भोजन का विवरण (पिताजी द्वारा): दफ्तर में केवल 'एक केला और एक संतरा' खाया था; कोई अन्य अनुचित खाद्य सामग्री नहीं खाई थी। बस अड्डे पर अचानक पेट दर्द उठा। • माँ की व्याकुलता एवं वात्सल्य: माँ सिर पुचकारती है, मुँह का रंग उड़ता देखती है और नई-नई बीमारियों (कालरा/हैज़ा) के भय से कांप उठती है। मोहन का तकिया-कलाम: "कुछ नहीं, बस ऐसे-ऐसे होता है!" घरेलू प्राथमिक उपचार एवं सामाजिक परिवेश • माँ द्वारा आजमाए गए प्राथमिक घरेलू नुस्खे: १. हींग व अजवायन का चूर्ण पेट के अफारे व गैस शमन हेतु २. नीबू का रस व पानी पाचन सुधारने हेतु शीतल पेय ३. सोंठ व काला नमक कफ-वात शामक पारंपरिक चूर्ण ४. गर्म पानी की बोतल पेट की मांसपेशियों की बाहरी सिकाई • दीनानाथ जी का पड़ोसी धर्म: "अरे मोहन की माँ, इसे किसी अच्छी डॉक्टर-वैद्य को दिखाओ। शहर में नई-नई बीमारियां निकली हैं... यह तो बड़ा चंचल लड़का है।" पड़ोसी का स्वतः आकर सहायता करना भारतीय सामाजिक ताने-बाने को दर्शाता है। पिताजी द्वारा वैद्य जी व डॉक्टर को टेलीफोन से बुलावा पैनल ३: नाट्य-दृश्य २ — चिकित्सा-प्रहसन: पारंपरिक आयुर्वेद बनाम आधुनिक एलोपैथी का द्वंद्व पारंपरिक वैद्य जी: वात का प्रकोप एवं दस्तावर पुड़िया • नाड़ी-परीक्षण (Pulse Diagnosis): वैद्य जी मोहन की कलाई पकड़कर नाड़ी दबाते हैं और कहते हैं— "वात का प्रकोप है। शरीर में वायु बढ़ गई है जो रुककर दर्द कर रही है।" • कब्ज का निदान (Constipation): "पेट साफ़ नहीं हुआ। मल रुक जाने से वायु कुपित हो गई है।" • प्रस्तावित उपचार एवं फीस: आधे-आधे घंटे बाद गर्म पानी से देने हेतु 'पुड़िया' भेजते हैं। "दो-तीन दस्त होंगे, बस फिर सब ठीक हो जाएगा।" पिताजी ५ रु. भेंट देते हैं। हास्य तत्व: काल्पनिक बीमारी का शास्त्रीय वात-पित्त-कफ में वर्गीकरण! आधुनिक डॉक्टर: बदहजमी (Dyspepsia), गैस एवं खुराक • शारीरिक परीक्षण (Clinical Examination): डॉक्टर साहब मोहन की जीभ देखते हैं और पेट टटोलते हैं— "चेहरा तो बता रहा है इसे काफी दर्द है। कोई कोलिक पेन या अपेंडिसाइटिस नहीं है।" • बदहजमी व गैस का निष्कर्ष: "बस ज़रा बदहजमी है। कभी-कभी हवा रुक जाती है और फंदा डाल लेती है।" • सुझाई गई दवा एवं फीस: "एक खुराक पीने के बाद ही तबीयत संभल जाएगी। पिताजी साथ चलें दवा ले आएं।" पिताजी डॉक्टर साहब को १० रुपये का नोट फीस के रूप में थमाते हैं। व्यंग्य: चिकित्सा जगत बिना बीमारी के भी दवा और खुराक थमा देता है! पैनल ४: नाट्य-दृश्य ३ — मास्टर जी का पदार्पण: मनोवैज्ञानिक निदान एवं हास्यपूर्ण चरमोत्कर्ष १. मास्टर जी का मनोवैज्ञानिक संवाद • शिक्षक की अंतर्दृष्टि (Teacher's Insight): मास्टर जी आते ही कहते हैं—"सुना है मोहन के पेट में 'ऐसे-ऐसे' हो रहा है। मैं ऐसे कई लड़कों को जानता हूँ जिन्हें यह बीमारी स्कूल खुलने पर होती है!" • अमोध प्रश्न एवं मोहन की चुप्पी: "मोहन! स्कूल का काम तो पूरा कर लिया है न?" मोहन मुँह छिपा लेता है और चादर ओढ़ लेता है। मोहन चुप रहता है। • माँ की हैरानी: माँ पूछती है—"क्या काम पूरा नहीं किया?" मोहन धीरे से सिर हिलाता है—"जी, सब नहीं हुआ... कुछ सवाल रह गए हैं।" रहस्योद्घाटन: 'ऐसे-ऐसे' कोई बीमारी नहीं, होमवर्क न करने का डर है! २. सुधारात्मक समाधान एवं नाटकीय परिणति • मास्टर जी का सकारात्मक निर्णय: मास्टर जी मोहन को डांटते या पीटते नहीं, बल्कि कहते हैं— "तुम्हें दो दिन की छुट्टी दी जाती है। इन दो दिनों में स्कूल का सारा काम पूरा कर लेना, फिर तुम्हारा 'ऐसे-ऐसे' दर्द हमेशा के लिए भाग जाएगा।" • मोहन का अचानक स्वस्थ होना: मोहन मुँह से चादर हटाता है और उठकर बैठ जाता है। दर्द गायब! • हास्यपूर्ण चरमोत्कर्ष (Climax): पिताजी दवा की शीशी लेकर अंदर आते हैं। जब सारा सच सुनते हैं, तो हक्के-बक्के रह जाते हैं और हाथ से शीशी छूटकर फर्श पर फूट जाती है! नाटकीय अंत: "वाह मोहन वाह! तुमने तो खूब छकाया!" (सबका अट्टहास) पैनल ५: नाट्य-शिल्प, संवाद-कौशल, 'भाषा की बात' (व्याकरण) एवं शिक्षा-दर्शन १. नाट्य-शिल्प एवं रंगमंच • जीवंत संवादात्मकता: छोटे, चुटीले, यथार्थवादी संवाद जो मध्यमवर्गीय घरेलू वातावरण रचते हैं। • रंग-संकेतों की महत्ता: (कराहते हुए), (मुँह बनाकर), (तख्त पर पटकते हुए) अभिनय को गति देते हैं। • गतिशीलता एवं कौतूहल: दर्द का रहस्य अंत तक बना रहता है, जिससे दर्शक बंधे रहते हैं। रस: हास्य रस | स्थायी भाव: हास २. 'भाषा की बात' — व्याकरण • शब्द-युग्म (द्विरुक्त शब्द): 'ऐसे-ऐसे', 'बार-बार', 'नई-नई' भाव में तीव्रता व पुनरावृत्ति लाते हैं। • वाक्य-भेद (अर्थ के आधार पर): १. विधानवाचक: मोहन केला खाता है। २. निषेधवाचक: मोहन ने काम नहीं किया। ३. प्रश्नवाचक: क्या ऐसे-ऐसे होता है? ४. आज्ञावाचक: उठकर काम पूरा करो। मुहावरे: छकाना (परेशान करना), पेट में दाढ़ी होना ३. शिक्षा-दर्शन एवं नैतिक मूल्य • समय-प्रबंधन (Time Management): छुट्टियों के कार्य को अंतिम दिन के लिए टालना मानसिक तनाव और भय का कारण बनता है। • भयमुक्त शिक्षा (Fearless Learning): सज़ा का डर बच्चों को झूठ बोलने पर विवश करता है; सहानुभूतिपूर्ण संवाद ही समाधान है। • सत्यवादिता का महत्व: झूठ बोलने से परिवार परेशान होता है और अंत में स्वयं ही हास्य का पात्र बनना पड़ता है। मास्टर जी की सीख: समझदारी, सहानुभूति व समय-पालन

पाठ का परिचय एवं प्रास्ताविक परिप्रेक्ष्य

'ऐसे-ऐसे' आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रख्यात गांधीवादी नाटककार विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय, जीवंत और मनोरंजक हास्य-व्यंग्य बाल-एकांकी है। यह एकांकी केवल बच्चों को हंसाने का साधन नहीं है, बल्कि यह विद्यालयी जीवन में विद्यार्थियों की मानसिकता, गृहकार्य से बचने की रक्षात्मक प्रवृत्तियों (Defense Mechanisms), माता-पिता की अंध-चिंता और अनुभवी शिक्षकों की मनोवैज्ञानिक सूझबूझ का अद्भुत दस्तावेज़ है।

१. एकांकीकार: विष्णु प्रभाकर (१९१२–२००९) का साहित्यिक परिचय

विष्णु प्रभाकर का जन्म २१ जून १९१२ को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरानपुर गांव में हुआ था। वे आजीवन गांधीवादी विचारधारा, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक न्याय और मानवीय करुणा के संवाहक रहे। उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं:

  • अमर कृति 'आवारा मसीहा': बांग्ला के महान उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के संघर्षपूर्ण जीवन पर आधारित जीवनी-उपन्यास 'आवारा मसीहा' लिखने में विष्णु प्रभाकर जी को १४ वर्षों का कठोर शोध करना पड़ा। यह कृति भारतीय जीवनी-साहित्य का मील का पत्थर मानी जाती है।
  • प्रमुख रचनाएं: उपन्यास—'ढलती रात', 'तट के बंधन', 'अर्धनारीश्वर' (साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित); नाटक व एकांकी—'डॉक्टर', 'युगे-युगे क्रांति', 'टूटते परिवेश', 'प्रकाश और परछाइयाँ', 'ऐसे-ऐसे'।
  • सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान: उन्हें वर्ष २००४ में भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित 'पद्म भूषण' सम्मान, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा मूर्तिदेवी पुरस्कार से अलंकृत किया गया।
  • बाल-मनोविज्ञान के चितेरे: विष्णु जी बच्चों के मन में झांकने की विलक्षण क्षमता रखते थे। वे बच्चों पर उपदेश थोपने के बजाय उनकी स्वाभाविक चंचलता और भय को सहानुभूतिपूर्वक उद्घाटित करते हैं।

२. एकांकी विधा का स्वरूप एवं संकलन-त्रय (Three Unities)

'एकांकी' शब्द का शाब्दिक अर्थ है—एक अंक वाला नाटक। नाटक और एकांकी में वही अंतर है जो महाकाव्य और खंडकाव्य में, अथवा उपन्यास और कहानी में होता है। एकांकी की शास्त्रीय विशेषताएं निम्नलिखित तालिका में स्पष्ट की गई हैं:

एकांकी के तत्व सैद्धांतिक परिभाषा एकांकी 'ऐसे-ऐसे' में क्रियान्वयन
स्थान की एकता (Unity of Place) पूरी नाट्य-घटना एक ही निश्चित स्थान पर घटित होनी चाहिए। संपूर्ण एकांकी मोहन के घर की बैठक (ड्राइंग रूम) में घटित होती है; दृश्य नहीं बदलता।
समय की एकता (Unity of Time) नाट्य-काल वास्तविक जीवन के सीमित समय (१-२ घंटे) के बराबर हो। दोपहर के लगभग एक से दो घंटे के भीतर ही पूरी समस्या उत्पन्न और समाप्त हो जाती है।
कार्य की एकता (Unity of Action) एक ही मुख्य कथा हो; कोई उप-कथा या भटकाव न हो। पूरी एकांकी केवल मोहन के काल्पनिक दर्द 'ऐसे-ऐसे' और उसके निदान पर केंद्रित है।
रंग-संकेत (Stage Directions) मंच-सज्जा और अभिनय के लिए कोष्ठक में दिए गए निर्देश। (कराहते हुए), (पेट पकड़कर), (मुँह बनाकर), (तख्त पर पटकते हुए) आदि जीवंत निर्देश।

३. मंच-सज्जा एवं रंगमंचीय वातावरण

नाटक के आरंभ में लेखक ने मंच-सज्जा का अत्यंत सूक्ष्म और व्यावहारिक विवरण दिया है:

  • तीन दरवाज़े: एक दरवाज़ा बाहर सड़क वाले बरामदे में खुलता है, दूसरा अंदर के कमरे में और तीसरा रसोईघर में। यह व्यवस्था पात्रों के स्वाभाविक आवागमन (Entry/Exit) को गति देती है।
  • मध्य कक्ष: बीच में एक लकड़ी का तख्त बिछा है जिस पर साफ बिछौना पड़ा है। एक ओर मेज़ पर टेलीफोन रखा है और कुछ कुर्सियां रखी हैं।
  • ध्वनि व प्रभाव: मोहन के कराहने की धीमी आवाज़ें, दरवाजे की घंटी और टेलीफोन की घंटी मध्यमवर्गीय पारिवारिक माहौल को सजीव बनाती हैं।

नाट्य-दृश्य १: मोहन का 'ऐसे-ऐसे' दर्द, माँ की ममता एवं घरेलू चिकित्सा

नाट्य-प्रसंग: रहस्यमयी दर्द का आरंभ

दोपहर का समय है। आठ-नौ वर्ष का मोहन, जो तीसरी कक्षा में पढ़ता है, तख्त पर पड़ा बेचैनी से कराह रहा है। वह बार-बार अपने दोनों हाथों से पेट पकड़ता है और मुँह बिगाड़कर रोनी सूरत बनाते हुए चिल्लाता है। उसके पास बैठी माँ घबराकर उसका सिर सहलाती है और इस अज्ञात बीमारी की थाह लेने की चेष्टा करती है।

१. 'ऐसे-ऐसे' — संवाद एवं बाल-स्वांग की संरचना

मोहन और उसकी माँ के बीच का संवाद बाल-मनोविज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है:

माँ: (पुचकारकर) "ना-ना, मेरे बेटे, ऐसे मत कर। अभी ठीक हुआ जाता है। अभी डॉक्टर को बुलाया है... ले तब तक सेंक ले। (गर्म पानी की बोतल पेट पर लगाती है) बता तो सही, दर्द कैसा है? क्या कोई गोला सा फूटता है?"

मोहन: (कराहते हुए) "नहीं... गोला भी नहीं फूटता।"

माँ: "तो क्या कोई चाकू सा चुभता है?"

मोहन: "चाकू भी नहीं चुभता... बस कुछ ऐसे-ऐसे होता है, माँ! बस ऐसे-ऐसे!"

विश्लेषण: मोहन जानबूझकर दर्द का कोई निश्चित लक्षण नहीं बताता। यदि वह कहे कि 'गोला फूटता है' या 'चाकू चुभता है', तो पकड़ा जाने का डर है क्योंकि माँ तुरंत उस लक्षण का सटीक इलाज ढूंढ लेगी। 'ऐसे-ऐसे' एक ऐसा अमूर्त और अस्पष्ट शब्द है जिसका न कोई ओर है न छोर। यह बच्चों की स्वाभाविक सुरक्षात्मक युक्ति है।

२. खान-पान का यथार्थ एवं पिताजी का साक्ष्य

जब माँ पिता से पूछती है कि इसने बाहर क्या उल्टा-सीधा खा लिया, तो पिताजी घटना का प्रामाणिक विवरण देते हैं:

  • दफ्तर में खान-पान: पिताजी मोहन को अपने साथ दफ्तर ले गए थे। दिन भर वह उनके साथ रहा और वहाँ केवल 'एक केला और एक संतरा' खाया था। उसने कोई बासी या अस्वास्थ्यकर भोजन नहीं किया था।
  • बस अड्डे पर अचानक दर्द: दफ्तर से लौटते समय बस अड्डे पर मोहन बिल्कुल ठीक-ठाक उछल-कूद कर रहा था। अचानक बस की प्रतीक्षा करते समय उसने पिताजी से कहा—"पिताजी, मेरे पेट में कुछ ऐसे-ऐसे हो रहा है।"
  • घर पहुँचकर तख्त पर गिरना: घर पहुँचते ही वह सीधे तख्त पर औंधे मुँह गिर पड़ा और तब से लगातार तड़प रहा है। उसका चेहरा सफेद पड़ गया है।

३. माँ के पारंपरिक घरेलू प्राथमिक नुस्खे

भारतीय परिवारों में डॉक्टर के आने से पहले रसोईघर के मसालों और दादी-नानी के नुस्खों का प्रयोग किया जाता है। माँ ने निम्नलिखित उपचार किए:

१. हींग व अजवायन गैस, अफारे और पेट फूलने की समस्या के निवारण हेतु पारंपरिक पाचक चूर्ण।
२. नीबू का पानी पाचन क्रिया को सक्रिय करने और पेट की अम्लता (Acidity) को शांत करने के लिए।
३. सोंठ व काला नमक कफ और वात दोषों को नियंत्रित करने वाला आयुर्वेद-सम्मत पारंपरिक मिश्रण।
४. गर्म पानी की बोतल पेट की मांसपेशियों की ऐंठन (Cramps) को कम करने हेतु बाह्य ऊष्मा सिकाई।

इन तमाम घरेलू नुस्खों के बाद भी जब मोहन का कराहना बंद नहीं हुआ, तो माँ की चिंता चरम पर पहुँच गई। उसे भय सताने लगा कि कहीं मोहन को हैज़ा (कालरा) जैसी कोई महामारी न हो गई हो।

नाट्य-दृश्य २: दीनानाथ का पड़ोस-धर्म एवं पारंपरिक वैद्य जी का आगमन

नाट्य-प्रसंग: सामाजिक परिवेश एवं वैद्य जी का प्रवेश

मोहन की बीमारी की खबर पाकर पड़ोसी दीनानाथ जी घर में आते हैं। उनके आने से मध्यमवर्गीय भारतीय समाज के आपसी आत्मीय संबंधों का उद्घाटन होता है। कुछ ही देर में पिताजी के बुलावे पर पारंपरिक वैद्य जी अपनी दवाइयों की थैली लिए आ धमकते हैं। यहाँ से नाटक में प्रहसन और व्यंग्य का दौर प्रारंभ होता है।

१. दीनानाथ जी का पड़ोसी धर्म एवं सामाजिक यथार्थ

दीनानाथ जी का चरित्र एकांकी में अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका निभाता है:

  • स्नेह व आत्मीयता: दीनानाथ जी कहते हैं—"मोहन की माँ, इसे किसी अच्छे डॉक्टर-वैद्य को दिखाओ। आजकल शहर में न जाने कौन-कौन सी नई बीमारियां निकली हैं।"
  • मोहन की चंचलता का साक्ष्य: वे कहते हैं कि मोहन तो ऐसा लड़का है जो पूरे घर और मोहल्ले को सिर पर उठाए रहता है; एक मिनट शांत नहीं बैठता। आज उसका यूँ तख्त पर निश्चेष्ट पड़ा रहना सचमुच चिंता का विषय है।
  • पड़ोसी धर्म का आदर्श: सुख में चाहे कोई न पहुंचे, किंतु विपत्ति के समय बिना बुलाए दौड़कर आना भारतीय सामाजिक संस्कृति का अभिन्न अंग है जिसे दीनानाथ जी मूर्त रूप देते हैं।

२. वैद्य जी का आगमन एवं नाड़ी-परीक्षण (Pulse Diagnosis)

वैद्य जी धोती-कुर्ता पहने, हाथ में दवा की पोटली लिए प्रवेश करते हैं। उनका आत्मविश्वास देखने योग्य है:

वैद्य जी: (मोहन की कलाई पकड़कर) "कहो बेटा, क्या बात है? नाड़ी देखूँ... हूँ! वात का प्रकोप है। शरीर में शीतल वायु बढ़ गई है।"

माँ: "वात का प्रकोप! वैद्य जी, यह तो कहता है पेट में कुछ ऐसे-ऐसे होता है।"

वैद्य जी: "हाँ-हाँ, वही तो! जब पेट साफ़ नहीं होता, तो रुकी हुई वायु कुपित होकर पेट में चक्कर काटती है। मल रुक जाने से कब्ज हो गया है। बस अभी अपनी दुकान से दस्तावर पुड़िया भेजता हूँ। आधे-आधे घंटे बाद गर्म पानी से दीजिएगा। दो-तीन दस्त होंगे और सारा दर्द काफूर हो जाएगा!"

३. वैद्य जी के प्रसंग में निहित व्यंग्य एवं हास्य

इस दृश्य में लेखक ने पारंपरिक चिकित्सा व्यवस्था की कमियों पर अत्यंत सुरुचिपूर्ण हास्य-व्यंग्य किया है:

  • काल्पनिक बीमारी का शास्त्रीय नामकरण: मोहन का दर्द केवल मानसिक और मनगढ़ंत है, किंतु वैद्य जी अपनी विद्वता का प्रदर्शन करने के लिए उसे सीधे 'वात-पित्त-कफ' और 'कब्ज' से जोड़ देते हैं।
  • अति-आत्मविश्वास: वैद्य जी दावा करते हैं कि उनकी एक पुड़िया से दर्द ऐसे भाग जाएगा जैसे गधे के सिर से सींग! यह चिकित्सकों के खोखले दावों पर व्यंग्य है।
  • आर्थिक पक्ष: पिताजी वैद्य जी को सम्मानपूर्वक पाँच रुपये का नोट भेंट करते हैं। बिना किसी वास्तविक रोग के परिवार पर आर्थिक बोझ पड़ना शुरू हो जाता है।

नाट्य-दृश्य ३: आधुनिक डॉक्टर साहब का आगमन, बदहजमी का निदान एवं चिकित्सीय व्यंग्य

नाट्य-प्रसंग: आधुनिक चिकित्सा का प्रवेश

वैद्य जी के जाने के तुरंत बाद आधुनिक एलोपैथिक डॉक्टर साहब का आगमन होता है। वे पश्चिमी वेशभूषा में हैं और अपने क्लिनिकल उपकरणों के साथ आत्मविश्वास से भरे हैं। वैद्य जी जहाँ आयुर्वेद के वात-कफ में उलझे थे, वहीं डॉक्टर साहब आधुनिक चिकित्सा शब्दावली का सहारा लेते हैं।

१. डॉक्टर साहब का शारीरिक परीक्षण (Clinical Examination)

डॉक्टर साहब कुर्सी पर बैठकर मोहन का व्यवस्थित परीक्षण करते हैं:

डॉक्टर: (हँसकर) "कहो भाई मोहन! क्या बात है? बड़ों-बड़ों को छका दिया तुमने! ज़रा जीभ तो दिखाओ अपनी।" (मोहन जीभ निकालता है)

डॉक्टर: (पेट टटोलते हुए) "हूँ! कोई कोलिक पेन (Colic Pain / ऐंठन भरा शूल) तो मालूम नहीं होता। अपेंडिसाइटिस (Appendicitis) का भी कोई लक्षण नहीं दिखता।"

माँ: (कांपते स्वर में) "डॉक्टर साहब! अपेंडिसाइटिस तो नहीं है न?"

डॉक्टर: "नहीं-नहीं, बिल्कुल नहीं। घबराइए मत। चेहरा बता रहा है कि दर्द तो है, पर यह केवल 'बदहजमी' (Dyspepsia) है। कभी-कभी हवा रुक जाती है और फंदा डाल लेती है। बस एक खुराक दवा पीने के बाद सब ठीक हो जाएगा।"

२. तुलनात्मक विश्लेषण: वैद्य जी बनाम डॉक्टर साहब

दोनों चिकित्सकों के दृष्टिकोण और निदान की तुलना निम्नलिखित तालिका में दर्शायी गई है:

तुलना का आधार पारंपरिक वैद्य जी आधुनिक डॉक्टर साहब
जांच की पद्धति नाड़ी-परीक्षण (कलाई दबाकर रक्त-प्रवाह देखना) जीभ का निरीक्षण, पेट टटोलना व स्टेथोस्कोप
रोग का नामकरण 'वात का प्रकोप' एवं 'कब्ज' 'बदहजमी' (Dyspepsia) एवं 'गैस का फंदा'
प्रस्तावित उपचार दस्तावर आयुर्वेदिक पुड़िया (गर्म पानी से) एलोपैथिक तरल मिश्रण (एक खुराक दवा)
ली गई फीस ५ रुपये की भेंट १० रुपये का नोट

३. समाज एवं चिकित्सा व्यवस्था पर व्यंग्य

लेखक विष्णु प्रभाकर ने इस दृश्य के माध्यम से समाज की एक विडंबना को उजागर किया है:

  • व्यावसायिक औपचारिकता: दोनों में से किसी भी चिकित्सक ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि बच्चे के जीवन में क्या चल रहा है—स्कूल, खेल या कोई तनाव। वे केवल शारीरिक तंत्र को दोष देकर दवाइयां बेचने में लग गए।
  • मध्यमवर्गीय परिवार का आर्थिक तनाव: बिना किसी बीमारी के परिवार ने पुड़िया, दवा और फीस में १५ रुपये (जो उस समय एक बड़ी राशि थी) व्यय कर दिए।

नाट्य-दृश्य ४: मास्टर जी का पदार्पण, मनोवैज्ञानिक रहस्योद्घाटन एवं हास्यपूर्ण चरमोत्कर्ष

नाट्य-प्रसंग: चरमोत्कर्ष एवं यथार्थ का उद्घाटन

पिताजी डॉक्टर के साथ दवा की शीशी लेने गए हैं। माँ गर्म पानी की बोतल से मोहन के पेट की सिकाई कर रही है। ठीक इसी समय मोहन के स्कूल के मास्टर जी कमरे में प्रवेश करते हैं। मास्टर जी का आगमन एकांकी का चरमोत्कर्ष (Climax) रचता है और पूरी समस्या को एक नया मोड़ देता है।

१. मास्टर जी की अंतर्दृष्टि एवं बाल-मनोविज्ञान

मास्टर जी एक अनुभवी और संवेदनशील शिक्षक हैं। वे आते ही कहते हैं:

मास्टर जी: "नमस्ते माता जी! सुना है मोहन के पेट में कुछ 'ऐसे-ऐसे' हो रहा है?"

माँ: "हाँ मास्टर जी! न जाने क्या बीमारी है। बेचारा तड़प रहा है। वैद्य जी पुड़िया दे गए हैं, डॉक्टर साहब खुराक लेने गए हैं।"

मास्टर जी: (मुस्कुराते हुए) "माता जी! मोहन की इस 'ऐसे-ऐसे' की बीमारी की दवा मेरे पास है। मैं ऐसे बहुत से लड़कों को जानता हूँ जो स्कूल खुलने के वक्त इस खास दर्द के शिकार हो जाते हैं!"

मास्टर जी: (मोहन के पास जाकर) "कहो मोहन, कल तो स्कूल जाना है न? यह बताओ—स्कूल का काम पूरा कर लिया है?"

मोहन: (शर्म से मुँह छिपाकर चादर ओढ़ लेता है और मौन रहता है)

२. रहस्य का उद्घाटन: 'ऐसे-ऐसे' की असली बीमारी

जब मास्टर जी मोहन से बार-बार पूछते हैं, तो मोहन धीरे से चादर के भीतर से सिर हिलाता है कि 'काम पूरा नहीं हुआ... कुछ सवाल रह गए हैं।'

  • महीने भर की मौज-मस्ती: छुट्टियों में पूरे महीने मोहन ने केवल खेल-कूद किया और पढ़ाई को हाथ नहीं लगाया। जब केवल एक दिन बचा, तो काम का पहाड़ देखकर वह डर गया।
  • सज़ा का भय: स्कूल में मास्टर जी की डांट और सज़ा से बचने के लिए उसने अचानक पेट दर्द का बहाना बना लिया।
  • माँ का विस्मय: माँ जब यह सुनती है तो अवाक् रह जाती है—"हैं! तो यह सब काम न करने का नाटक था? और मैं बेचारी इतनी घबरा गई!"

३. सुधारात्मक निर्णय एवं हास्यपूर्ण नाट्य-समाप्ति

मास्टर जी मोहन को कोई सज़ा नहीं देते। वे जानते हैं कि अपमान या पिटाई से बच्चा विद्रोही बन सकता है। वे एक मनोवैज्ञानिक समाधान निकालते हैं:

मास्टर जी: "अच्छा उठो मोहन! तुम्हें दो दिन की छुट्टी और दी जाती है। इन दो दिनों में तुम अपना सारा काम पूरा कर लेना। फिर तुम्हारा यह 'ऐसे-ऐसे' दर्द हमेशा के लिए भाग जाएगा।"

(मोहन झटपट चादर फेंककर उठ खड़ा होता है। उसका चेहरा चमकने लगता है!)

(ठीक उसी क्षण पिताजी डॉक्टर के यहाँ से दवा की शीशी लेकर कमरे में प्रवेश करते हैं।)

माँ: "अरे सुनिए! इसे कोई बीमारी नहीं थी, यह तो स्कूल का काम न करने का डर था!"

पिताजी: (हक्के-बक्के होकर देखते हैं और उनके हाथ से दवा की शीशी छूटकर फर्श पर गिर पड़ती है और फूट जाती है!) "वाह मोहन वाह! तुमने तो हमें खूब छकाया!" (सभी ठहाका मारकर हँस पड़ते हैं—पर्दा गिरता है।)

एकांकी का नाट्य-शिल्प, चरित्र-चित्रण एवं बाल-मनोविज्ञान

साहित्यिक एवं मनोवैज्ञानिक मीमांसा

'ऐसे-ऐसे' एकांकी की सफलता केवल इसके हास्य में नहीं, बल्कि इसके सुगठित नाट्य-शिल्प और बाल-मनोविज्ञान की यथार्थवादी अभिव्यक्ति में है। लेखक ने मध्यमवर्गीय समाज के पात्रों को उनकी कमजोरियों, विशेषताओं और संवेदनाओं के साथ साक्षात खड़ा कर दिया है।

१. प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण (Character Sketches)

१. मोहन (केंद्रीय पात्र)

कक्षा ३ का छात्र; स्वभाव से नटखट, खेल-प्रिय और अभिनय में निपुण। काम टालने की आदत के कारण सज़ा से बचने हेतु काल्पनिक दर्द का स्वांग रचता है। किंतु शिक्षक के स्नेहपूर्ण व्यवहार पर तुरंत आत्म-स्वीकृति दे देता है।

२. माँ (वात्सल्य की मूर्ति)

अत्यधिक ममतामयी और संवेदनशील। बच्चे के ज़रा से रोने पर घबरा जाती है और हींग, अजवायन से लेकर गर्म पानी तक सब आजमाती है। उसका अंध-वात्सल्य मोहन को बहाने का अवसर देता है।

३. पिताजी (कर्तव्यनिष्ठ पिता)

दफ्तर में काम करने वाले व्यावहारिक मध्यमवर्गीय व्यक्ति। बच्चे की अस्वस्थता पर तुरंत डॉक्टर-वैद्य बुलाते हैं और फीस चुकाते हैं। अंत में शीशी का गिरना उनके सीधेपन को दर्शाता है।

४. मास्टर जी (आदर्श शिक्षक)

बाल-मनोविज्ञान के मर्मज्ञ। वे जानते हैं कि बच्चों को सज़ा का डर झूठ बोलने पर मजबूर करता है। वे मोहन को डांटने के बजाय दो दिन की मोहलत देकर समस्या का स्थायी समाधान करते हैं।

२. बाल-मनोविज्ञान के प्रमुख सिद्धांत

आधुनिक शिक्षाशास्त्र और बाल-मनोविज्ञान के संदर्भ में यह पाठ तीन महत्वपूर्ण नियमों को रेखांकित करता है:

  • कार्य-विलंबन (Procrastination): बच्चे वर्तमान के आनंद (मौज-मस्ती) को भविष्य के कर्तव्य से अधिक प्राथमिकता देते हैं। जब समय समाप्त हो जाता है, तो वे अत्यधिक तनाव और घबराहट का शिकार होते हैं।
  • शारीरिक लक्षणों में रूपांतरण (Somatization): मनोवैज्ञानिक भय कई बार बच्चों में शारीरिक दर्द के रूप में प्रकट होता है (या वे उसका स्वांग रचते हैं)। मोहन का दर्द यद्यपि बहाना था, पर उसका भय वास्तविक था।
  • भयमुक्त शिक्षा का महत्व: यदि विद्यालय में शिक्षक का भय न होता, तो मोहन को कभी झूठ बोलने की आवश्यकता न पड़ती। मास्टर जी का सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण सिद्ध करता है कि प्यार और विश्वास ही शिक्षा का सही आधार है।

'भाषा की बात': व्याकरणिक विश्लेषण, शब्द-युग्म, वाक्य-भेद एवं मुहावरे

भाषा की बात — व्याकरण एवं व्यावहारिक भाषा-कौशल

पाठ 'ऐसे-ऐसे' में प्रयुक्त भाषा सहज, बोलचाल की खड़ी बोली हिंदी है जिसमें उर्दू, तद्भव और देशज शब्दों का स्वाभाविक मिश्रण है। इस मॉड्यूल में हम पाठ के व्याकरणिक आयामों का सविस्तार अध्ययन करेंगे।

१. शब्द-युग्म एवं द्विरुक्त शब्द (Reduplicated Words)

जब एक ही शब्द की बिना किसी परिवर्तन के दोबारा आवृत्ति होती है, तो उसे 'द्विरुक्त शब्द' या 'पुनरुक्त शब्द-युग्म' कहते हैं। पाठ में प्रयुक्त प्रमुख शब्द-युग्म:

  • ऐसे-ऐसे: किसी अनिर्दिष्ट, रहस्यमयी या मनगढ़ंत स्थिति को प्रकट करने वाला लाक्षणिक युग्म।
  • बार-बार: क्रिया की अनवरत पुनरावृत्ति (जैसे—मोहन बार-बार पेट पकड़ता है)।
  • नई-नई: विशेषण की अतिशयता (जैसे—शहर में नई-नई बीमारियां निकली हैं)।
  • आधे-आधे: समय के अंतराल की समरूपता (जैसे—आधे-आधे घंटे बाद खुराक देना)।

२. अर्थ के आधार पर वाक्य-भेद (Types of Sentences by Meaning)

CISCE बोर्ड परीक्षा में अर्थ के आधार पर वाक्य के भेदों की पहचान और रूपांतरण पर प्रश्न अवश्य पूछे जाते हैं:

वाक्य का भेद लक्षण एवं पहचान पाठ से सोदाहरण वाक्य
१. विधानवाचक (Assertive) किसी कार्य के सामान्य रूप से होने की सूचना मिलती है। मोहन ने दफ्तर में एक केला और एक संतरा खाया था।
२. निषेधवाचक (Negative) कार्य के न होने या इनकार का बोध होता है ('नहीं/मत')। मोहन ने स्कूल का गृहकार्य पूरा नहीं किया था।
३. प्रश्नवाचक (Interrogative) किसी बात के विषय में प्रश्न पूछा जाता है ('क्या/क्यों')। क्या तुम्हारे पेट में कोई चाकू सा चुभता है?
४. आज्ञावाचक (Imperative) आज्ञा, आदेश, निर्देश या उपदेश का बोध होता है। उठो मोहन और दो दिन में अपना सारा काम पूरा करो।
५. विस्मयवाचक (Exclamatory) हर्ष, शोक, आश्चर्य या विस्मय का भाव प्रकट होता है। वाह मोहन वाह! तुमने तो हमें खूब छकाया!

३. प्रमुख मुहावरे एवं उनका सटीक प्रयोग

  • छकाना: अर्थ: बहुत तंग करना, हैरान या परेशान करना।
    प्रयोग: मोहन ने पेट दर्द का ऐसा बहाना बनाया कि पूरे परिवार को दिन भर छका दिया।
  • पेट में दाढ़ी होना: अर्थ: छोटी उम्र में अत्यधिक चालाक या भेदिया होना।
    प्रयोग: तीसरी कक्षा के मोहन ने जैसा अभिनय किया, उसे देखकर लगता है कि उसके तो पेट में दाढ़ी है।
  • हवाइयां उड़ना: अर्थ: डर या घबराहट से चेहरे का रंग फीका पड़ जाना।
    प्रयोग: मास्टर जी को सामने खड़ा देखकर मोहन के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं।
  • गधे के सिर से सींग गायब होना: अर्थ: किसी वस्तु या दर्द का पूरी तरह से लुप्त हो जाना।
    प्रयोग: मास्टर जी द्वारा दो दिन की छुट्टी मिलते ही मोहन का दर्द गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गया।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
एकांकी 'ऐसे-ऐसे' में प्रयुक्त मुहावरे 'छकाना' तथा शब्द 'बदहजमी' का अर्थ स्पष्ट करते हुए इनका अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. छकाना:

  • अर्थ: बहुत परेशान करना, हैरान करना या तंग करना (मुहावरा)।
  • वाक्य-प्रयोग: शरारती बंदर ने छत पर कूद-कूदकर घर के सभी सदस्यों को दिन भर छका दिया।

२. बदहजमी:

  • अर्थ: अपच, भोजन का ठीक से न पचना (Dyspepsia/Indigestion)।
  • वाक्य-प्रयोग: विवाह समारोह में अधिक तला-भुना और गरिष्ठ भोजन करने से सोहन को बदहजमी हो गई।
उदाहरण 2
मोहन पेट में दर्द का क्या लक्षण बताता है? माँ उसके इस बताने के ढंग से इतनी अधिक क्यों घबरा जाती है? स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मोहन के दर्द बताने के ढंग और माँ की घबराहट का कारण निम्नलिखित तीन बिंदुओं में स्पष्ट है:

  1. अस्पष्ट व रहस्यमयी लक्षण: मोहन किसी भी सामान्य लक्षण का नाम नहीं लेता। जब माँ पूछती है कि क्या कोई गोला फूटता है या चाकू चुभता है, तो वह दोनों से इनकार कर देता है और केवल यही रट लगाता है कि—'बस कुछ ऐसे-ऐसे होता है।'
  2. तख्त पर कराहना और रंग उड़ना: मोहन जिस तरह पेट पकड़कर तख्त पर लोट रहा था और चेहरा पीला बनाकर कराह रहा था, उससे माँ को लगा कि बच्चे को कोई असह्य और जानलेवा पीड़ा हो रही है।
  3. अज्ञात बीमारी व महामारी का भय: जब घरेलू नुस्खे (हींग, अजवायन, सोंठ, गर्म पानी की बोतल) पूरी तरह बेअसर साबित हुए, तो माँ को भय सताने लगा कि कहीं शहर में फैली कोई नई भयंकर बीमारी जैसे हैज़ा (कालरा) या आंतों की गंभीर बीमारी तो नहीं हो गई।
उदाहरण 3
वैद्य जी और डॉक्टर साहब ने मोहन के दर्द का क्या-क्या कारण बताया? लेखक ने इन दोनों के माध्यम से समाज की किस विसंगति पर व्यंग्य किया है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. वैद्य जी का निदान:

वैद्य जी ने नाड़ी देखकर कहा कि मोहन के शरीर में 'वात का प्रकोप' हो गया है। पेट साफ़ न होने के कारण मल रुक गया है और कब्ज की वजह से रुकी हुई वायु पेट में घूमकर दर्द कर रही है। उन्होंने गर्म पानी से लेने के लिए दस्तावर पुड़िया दी।

२. डॉक्टर साहब का निदान:

डॉक्टर साहब ने जीभ देखकर और पेट टटोलकर कहा कि यह कोई अपेंडिसाइटिस या कोलिक पेन नहीं है, बल्कि केवल 'बदहजमी' (Dyspepsia) है। गैस रुककर फंदा डाल रही है, जिसके लिए उन्होंने एक खुराक दवा की व्यवस्था की।

३. सामाजिक व्यंग्य:

लेखक ने व्यंग्य किया है कि दोनों चिकित्सकों ने बच्चे के मानसिक तनाव या स्कूल के डर को समझने की ज़रा भी चेष्टा नहीं की। वे एक काल्पनिक रोग पर अपने-अपने शास्त्रीय सिद्धांतों की मुहर लगाकर दवाइयों और फीस (५ रु. व १० रु.) का व्यापार करने में लग गए।

उदाहरण 4
मास्टर जी ने मोहन के 'ऐसे-ऐसे' दर्द का असली कारण कैसे भाँप लिया? उन्होंने मोहन को सज़ा देने के बजाय जो उपाय किया, उससे उनके शिक्षक-व्यक्तित्व की कौन सी विशेषताएं प्रकट होती हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मास्टर जी की मनोवैज्ञानिक दृष्टि और उनके सुधारात्मक दृष्टिकोण का विश्लेषण निम्नलिखित है:

  • अनुभवी पारखी दृष्टि: मास्टर जी अनुभवी शिक्षक थे और जानते थे कि स्कूल खुलने के समय बच्चे डांट से बचने के लिए कैसे-कैसे बहाने बनाते हैं। वे आते ही समझ गए कि मोहन के चेहरे पर किसी गंभीर शारीरिक रोग का नहीं, बल्कि अपराध-बोध और भय का रंग है।
  • सटीक मनोवैज्ञानिक प्रश्न: उन्होंने सीधे पूछा—'मोहन! स्कूल का काम तो पूरा कर लिया है न?' इस सीधे प्रश्न पर मोहन का मुँह छिपाकर चादर ओढ़ लेना ही इस बात का अकाट्य प्रमाण था कि दर्द पेट में नहीं, बल्कि गृहकार्य न होने के डर में है।
  • भयमुक्त शिक्षा का आदर्श (दो दिन की मोहलत): यदि मास्टर जी मोहन को डांटते या पीटते, तो बच्चा और अधिक भयभीत होकर ढीठ बन जाता। मास्टर जी ने उसे डांटने के बजाय बड़े स्नेह से दो दिन की अतिरिक्त मोहलत दी ताकि वह अपना सारा काम पूरा कर सके।
  • शिक्षक-व्यक्तित्व की विशेषताएं: यह निर्णय दर्शाता है कि मास्टर जी केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले अध्यापक नहीं, बल्कि बाल-मनोविज्ञान के मर्मज्ञ, संवेदनशील, धैर्यवान और सुधारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले एक आदर्श मार्गदर्शक थे।
उदाहरण 5
निम्नलिखित वाक्यों के अर्थ के आधार पर भेद पहचानिए तथा निर्देशानुसार रूपांतरित कीजिए: (क) 'मोहन ने केला और संतरा खाया।' (निषेधवाचक वाक्य में बदलिए) (ख) 'क्या तुम्हारे पेट में चाकू सा चुभता है?' (विधानवाचक वाक्य में बदलिए) (ग) 'मोहन! उठकर अपना गृहकार्य पूरा करो।' (वाक्य का भेद पहचानिए) (घ) 'वाह मोहन! तुमने तो सबको छका दिया।' (वाक्य का भेद पहचानिए)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) रूपांतरण:

  • मूल वाक्य: 'मोहन ने केला और संतरा खाया।' (विधानवाचक)
  • निषेधवाचक रूप: 'मोहन ने केला और संतरा नहीं खाया।' (कार्य के न होने का बोध)।

(ख) रूपांतरण:

  • मूल वाक्य: 'क्या तुम्हारे पेट में चाकू सा चुभता है?' (प्रश्नवाचक)
  • विधानवाचक रूप: 'तुम्हारे पेट में चाकू सा चुभता है।' (सामान्य कथन)।

(ग) भेद पहचान:

  • वाक्य: 'मोहन! उठकर अपना गृहकार्य पूरा करो।'
  • भेद: आज्ञावाचक वाक्य (Imperative Sentence), क्योंकि इसमें शिक्षक द्वारा छात्र को कार्य करने का आदेश/निर्देश दिया गया है।

(घ) भेद पहचान:

  • वाक्य: 'वाह मोहन! तुमने तो सबको छका दिया।'
  • भेद: विस्मयवाचक वाक्य (Exclamatory Sentence), क्योंकि इसमें 'वाह' पद द्वारा आश्चर्य और विस्मय का भाव प्रकट हुआ है।
उदाहरण 6
निम्नलिखित नाट्य-संवाद की सप्रसंग व्याख्या करते हुए इसका एकांकी-शिल्प एवं हास्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए: 'मास्टर जी: अच्छा उठो मोहन! तुम्हें दो दिन की छुट्टी और दी जाती है। तुम इन दो दिनों में अपना सारा काम पूरा कर लेना, फिर तुम्हारा यह "ऐसे-ऐसे" भाग जाएगा। (मोहन मुँह छिपाए-छिपाए ही हँसता है और उठकर बैठ जाता है। इतने में पिताजी दवा की शीशी लेकर आते हैं।) माँ: अरे सुनिए! इसे कोई बीमारी नहीं थी, यह तो स्कूल का काम न करने का डर था! पिताजी: (हक्के-बक्के रह जाते हैं और हाथ से शीशी गिरकर फूट जाती है) वाह मोहन वाह! तुमने तो हमें खूब छकाया!'
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. संदर्भ: प्रस्तुत नाट्य-संवाद हमारी पाठ्यपुस्तक 'वसंत भाग-१' के पाठ ६ 'ऐसे-ऐसे' से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध गांधीवादी नाटककार विष्णु प्रभाकर हैं। यह एकांकी बाल-मनोविज्ञान, गृहकार्य के भय और पारिवारिक परिवेश पर आधारित एक उत्कृष्ट हास्य-व्यंग्य रचना है।

२. प्रसंग: यह संवाद एकांकी का चरमोत्कर्ष (Climax) है, जहाँ मास्टर जी मोहन के पेट दर्द का असली सच सबके सामने प्रकट करते हैं और सज़ा के बदले दो दिन की मोहलत देकर पूरे परिवार को विस्मय और हास्य के सागर में डुबो देते हैं।

३. व्याख्या: मास्टर जी मोहन को समझाते हुए कहते हैं कि अब बहाने बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। वे उसे स्कूल की ओर से दो दिन की अतिरिक्त छूट देते हैं ताकि वह शांतिपूर्वक अपना अधूरा गृहकार्य पूरा कर सके। यह सुनते ही मोहन के मन से सज़ा का सारा भय निकल जाता है और उसका मनगढ़ंत 'ऐसे-ऐसे' दर्द चमत्कारिक रूप से छूमंतर हो जाता है। वह तुरंत चादर हटाकर उठ बैठता है। ठीक उसी समय सीधे-सादे पिताजी डॉक्टर के यहाँ से खरीदी गई दवा की शीशी लेकर कमरे में प्रवेश करते हैं। जब माँ हँसते हुए उन्हें बताती है कि मोहन को कोई शारीरिक रोग नहीं था बल्कि यह केवल स्कूल का काम न करने का स्वांग था, तो पिताजी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता। अवाक् होकर देखते हुए उनके हाथ से दवा की शीशी फर्श पर छूटकर गिर जाती है और चूर-चूर हो जाती है। पिताजी विस्मय और लाड़ भरे स्वर में कहते हैं कि वाह मोहन! तुमने तो बड़ों-बड़ों को मूर्ख बनाकर दिन भर खूब परेशान किया।

४. नाट्य-शिल्प एवं विशेष:

  • हास्य रस का चरमोत्कर्ष: शीशी का हाथ से गिरकर फूटना एक दृश्य-हास्य (Visual Comedy / Slapstick) का निर्माण करता है जो दर्शकों के मुख पर स्वतः अट्टहास ला देता है।
  • जीवंत रंग-संकेत: कोष्ठक में दिए गए निर्देश—(हक्के-बक्के रह जाते हैं), (शीशी गिरकर फूट जाती है)—मंचीय अभिनय को यथार्थवादी गति प्रदान करते हैं।
  • भाषा एवं मुहावरा: व्यावहारिक, सहज खड़ी बोली जिसमें 'खूब छकाया' मुहावरे का अत्यंत स्वाभाविक और चुटीला प्रयोग हुआ है।
  • शिक्षाशास्त्रीय संदेश: कठोर दंड के स्थान पर सहानुभूतिपूर्ण मोहलत देने से बच्चे की मनोव्यथा का स्थायी समाधान होता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

'ऐसे-ऐसे' कोई वास्तविक शारीरिक रोग नहीं है। यह तीसरी कक्षा के छात्र मोहन द्वारा महीने भर की छुट्टियों में गृहकार्य पूरा न करने के कारण स्कूल की डांट और सज़ा से बचने के लिए गढ़ा गया एक काल्पनिक बहाना है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह दोनों निदान वस्तुतः एक हास्य-व्यंग्यात्मक प्रहसन (Medical Farce) हैं। लेखक ने यह दिखाया है कि किस प्रकार दोनों चिकित्सक बिना किसी वास्तविक रोग के अपनी-अपनी शास्त्रीय शब्दावली का प्रदर्शन करके दवा और फीस का व्यापार करने लगते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

कोष्ठक में दिए गए शब्द 'रंग-संकेत' (Stage Directions) हैं। ये अभिनेताओं की भाव-भंगिमा, शारीरिक चेष्टा और मंच-सज्जा के निर्देश होते हैं, इन्हें मुख से बोला नहीं जाता बल्कि अभिनय द्वारा मंच पर दिखाया जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह बाल-मनोविज्ञान का एक अत्यंत संवेदनशील और सकारात्मक शिक्षाशास्त्रीय उपागम है। कठोर दंड देने से बच्चा ढीठ और विद्रोही बन जाता, किंतु सहानुभूति और मोहलत देकर मास्टर जी ने मोहन के भय को समाप्त कर उसे काम पूरा करने का रचनात्मक अवसर दिया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

'पेट में दाढ़ी होना' एक लाक्षणिक मुहावरा है जिसका अर्थ 'कम उम्र में बहुत अधिक चालाक, अनुभवी या भेदिया होना' होता है। मोहन के अभिनय कौशल और बहानेबाजी के संदर्भ में इसका प्रयोग किया जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

एकांकी दृश्य-काव्य (नाटक) का एक विशिष्ट रूप है। इसके उत्तर में संकलन-त्रय (स्थान, समय व कार्य की एकता), रंग-संकेत, पात्र-योजना तथा मंचीय प्रभाव का उल्लेख करना अनिवार्य होता है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

एकांकी नाटक ऐसे-ऐसे (Vasant Bhag 1 — पाठ ६) एकांकीकार: विष्णु प्रभाकर | विधा: हास्य-व्यंग्य बाल-एकांकी | केंद्रीय विषय: बाल-मनोविज्ञान व बहानेबाज़ी CISCE Class 6 Hindi • संपूर्ण संकल्पना मानचित्र, चरित्र-चित्रण, मंच-शिल्प, शब्दार्थ व व्याकरणिक विश्लेषण पात्र: ७ कक्षा ३ का मोहन पैनल १: एकांकीकार परिचय, एकांकी विधा एवं मुख्य पात्रों की योजना (Dramatis Personae) १. एकांकीकार: विष्णु प्रभाकर (1912–2009) • जन्म व व्यक्तित्व: मुज़फ्फरनगर (उ.प्र.), गांधीवादी आदर्शवादी लेखक। • अमर कृति एवं सम्मान: शरतचंद्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' के लेखक। पद्म भूषण (2004) व साहित्य अकादमी पुरस्कार। • बाल-साहित्य में योगदान: बच्चों की मनोदशा, भय, कल्पना और चंचलता का अत्यंत सजीव, स्वाभाविक व मार्मिक चित्रण। उद्देश्य: भयमुक्त व संवादपूर्ण बाल-शिक्षा २. एकांकी विधा (One-Act Play) की विशेषताएँ • एक अंक व एक दृश्य: संपूर्ण नाटक एक ही कमरे (बैठक) में घटित होता है। • संकलन-त्रय (Three Unities): समय की एकता (१-२ घंटे), स्थान की एकता (घर की बैठक) एवं कार्य की एकता (पेट-दर्द)। • रंग-संकेत (Stage Directions): कोष्ठक में दिए निर्देश जो पात्रों की भाव-भंगिमा, स्वर तथा मंच की गतिविधियों का मार्गदर्शन करते हैं। रस: हास्य रस (चमत्कारिक चरमोत्कर्ष) ३. पात्र-संसार (Dramatis Personae) १. मोहन: कक्षा ३ का छात्र, केंद्रीय पात्र, नटखट। २. माँ: ममतामयी, घरेलू नुस्खों से इलाज करने वाली। ३. पिताजी: दफ्तरकर्मी, तुरंत डॉक्टर-वैद्य बुलाने वाले। ४. दीनानाथ: पड़ोसी, सामाजिक सद्भाव के प्रतीक। ५. वैद्य जी: नाड़ी-परीक्षक, वात-कब्ज का निदान। ६. डॉक्टर: एलोपैथ, बदहजमी-गैस की खुराक देने वाले। ७. मास्टर जी: पारखी शिक्षक, असली मर्ज़ के ज्ञाता! मंच-सज्जा: तीन दरवाजे (सड़क, अंदर, बैठक), तख्त पर बिछा बिछौना, बीच में मेज-कुर्सी, फोन पैनल २: नाट्य-दृश्य १ — मोहन का रहस्यमयी दर्द, माँ की ममता एवं घरेलू चिकित्सा का दौर कथानक आरंभ: 'कुछ ऐसे-ऐसे होता है' की पहेली • घटना का समय एवं संदर्भ: दोपहर का समय; मोहन तख्त पर पड़ा कराह रहा है और बार-बार पेट पकड़कर 'ओह माँ! उल्टी आती है... ऐसे-ऐसे होता है' चिल्लाता है। • भोजन का विवरण (पिताजी द्वारा): दफ्तर में केवल 'एक केला और एक संतरा' खाया था; कोई अन्य अनुचित खाद्य सामग्री नहीं खाई थी। बस अड्डे पर अचानक पेट दर्द उठा। • माँ की व्याकुलता एवं वात्सल्य: माँ सिर पुचकारती है, मुँह का रंग उड़ता देखती है और नई-नई बीमारियों (कालरा/हैज़ा) के भय से कांप उठती है। मोहन का तकिया-कलाम: "कुछ नहीं, बस ऐसे-ऐसे होता है!" घरेलू प्राथमिक उपचार एवं सामाजिक परिवेश • माँ द्वारा आजमाए गए प्राथमिक घरेलू नुस्खे: १. हींग व अजवायन का चूर्ण पेट के अफारे व गैस शमन हेतु २. नीबू का रस व पानी पाचन सुधारने हेतु शीतल पेय ३. सोंठ व काला नमक कफ-वात शामक पारंपरिक चूर्ण ४. गर्म पानी की बोतल पेट की मांसपेशियों की बाहरी सिकाई • दीनानाथ जी का पड़ोसी धर्म: "अरे मोहन की माँ, इसे किसी अच्छी डॉक्टर-वैद्य को दिखाओ। शहर में नई-नई बीमारियां निकली हैं... यह तो बड़ा चंचल लड़का है।" पड़ोसी का स्वतः आकर सहायता करना भारतीय सामाजिक ताने-बाने को दर्शाता है। पिताजी द्वारा वैद्य जी व डॉक्टर को टेलीफोन से बुलावा पैनल ३: नाट्य-दृश्य २ — चिकित्सा-प्रहसन: पारंपरिक आयुर्वेद बनाम आधुनिक एलोपैथी का द्वंद्व पारंपरिक वैद्य जी: वात का प्रकोप एवं दस्तावर पुड़िया • नाड़ी-परीक्षण (Pulse Diagnosis): वैद्य जी मोहन की कलाई पकड़कर नाड़ी दबाते हैं और कहते हैं— "वात का प्रकोप है। शरीर में वायु बढ़ गई है जो रुककर दर्द कर रही है।" • कब्ज का निदान (Constipation): "पेट साफ़ नहीं हुआ। मल रुक जाने से वायु कुपित हो गई है।" • प्रस्तावित उपचार एवं फीस: आधे-आधे घंटे बाद गर्म पानी से देने हेतु 'पुड़िया' भेजते हैं। "दो-तीन दस्त होंगे, बस फिर सब ठीक हो जाएगा।" पिताजी ५ रु. भेंट देते हैं। हास्य तत्व: काल्पनिक बीमारी का शास्त्रीय वात-पित्त-कफ में वर्गीकरण! आधुनिक डॉक्टर: बदहजमी (Dyspepsia), गैस एवं खुराक • शारीरिक परीक्षण (Clinical Examination): डॉक्टर साहब मोहन की जीभ देखते हैं और पेट टटोलते हैं— "चेहरा तो बता रहा है इसे काफी दर्द है। कोई कोलिक पेन या अपेंडिसाइटिस नहीं है।" • बदहजमी व गैस का निष्कर्ष: "बस ज़रा बदहजमी है। कभी-कभी हवा रुक जाती है और फंदा डाल लेती है।" • सुझाई गई दवा एवं फीस: "एक खुराक पीने के बाद ही तबीयत संभल जाएगी। पिताजी साथ चलें दवा ले आएं।" पिताजी डॉक्टर साहब को १० रुपये का नोट फीस के रूप में थमाते हैं। व्यंग्य: चिकित्सा जगत बिना बीमारी के भी दवा और खुराक थमा देता है! पैनल ४: नाट्य-दृश्य ३ — मास्टर जी का पदार्पण: मनोवैज्ञानिक निदान एवं हास्यपूर्ण चरमोत्कर्ष १. मास्टर जी का मनोवैज्ञानिक संवाद • शिक्षक की अंतर्दृष्टि (Teacher's Insight): मास्टर जी आते ही कहते हैं—"सुना है मोहन के पेट में 'ऐसे-ऐसे' हो रहा है। मैं ऐसे कई लड़कों को जानता हूँ जिन्हें यह बीमारी स्कूल खुलने पर होती है!" • अमोध प्रश्न एवं मोहन की चुप्पी: "मोहन! स्कूल का काम तो पूरा कर लिया है न?" मोहन मुँह छिपा लेता है और चादर ओढ़ लेता है। मोहन चुप रहता है। • माँ की हैरानी: माँ पूछती है—"क्या काम पूरा नहीं किया?" मोहन धीरे से सिर हिलाता है—"जी, सब नहीं हुआ... कुछ सवाल रह गए हैं।" रहस्योद्घाटन: 'ऐसे-ऐसे' कोई बीमारी नहीं, होमवर्क न करने का डर है! २. सुधारात्मक समाधान एवं नाटकीय परिणति • मास्टर जी का सकारात्मक निर्णय: मास्टर जी मोहन को डांटते या पीटते नहीं, बल्कि कहते हैं— "तुम्हें दो दिन की छुट्टी दी जाती है। इन दो दिनों में स्कूल का सारा काम पूरा कर लेना, फिर तुम्हारा 'ऐसे-ऐसे' दर्द हमेशा के लिए भाग जाएगा।" • मोहन का अचानक स्वस्थ होना: मोहन मुँह से चादर हटाता है और उठकर बैठ जाता है। दर्द गायब! • हास्यपूर्ण चरमोत्कर्ष (Climax): पिताजी दवा की शीशी लेकर अंदर आते हैं। जब सारा सच सुनते हैं, तो हक्के-बक्के रह जाते हैं और हाथ से शीशी छूटकर फर्श पर फूट जाती है! नाटकीय अंत: "वाह मोहन वाह! तुमने तो खूब छकाया!" (सबका अट्टहास) पैनल ५: नाट्य-शिल्प, संवाद-कौशल, 'भाषा की बात' (व्याकरण) एवं शिक्षा-दर्शन १. नाट्य-शिल्प एवं रंगमंच • जीवंत संवादात्मकता: छोटे, चुटीले, यथार्थवादी संवाद जो मध्यमवर्गीय घरेलू वातावरण रचते हैं। • रंग-संकेतों की महत्ता: (कराहते हुए), (मुँह बनाकर), (तख्त पर पटकते हुए) अभिनय को गति देते हैं। • गतिशीलता एवं कौतूहल: दर्द का रहस्य अंत तक बना रहता है, जिससे दर्शक बंधे रहते हैं। रस: हास्य रस | स्थायी भाव: हास २. 'भाषा की बात' — व्याकरण • शब्द-युग्म (द्विरुक्त शब्द): 'ऐसे-ऐसे', 'बार-बार', 'नई-नई' भाव में तीव्रता व पुनरावृत्ति लाते हैं। • वाक्य-भेद (अर्थ के आधार पर): १. विधानवाचक: मोहन केला खाता है। २. निषेधवाचक: मोहन ने काम नहीं किया। ३. प्रश्नवाचक: क्या ऐसे-ऐसे होता है? ४. आज्ञावाचक: उठकर काम पूरा करो। मुहावरे: छकाना (परेशान करना), पेट में दाढ़ी होना ३. शिक्षा-दर्शन एवं नैतिक मूल्य • समय-प्रबंधन (Time Management): छुट्टियों के कार्य को अंतिम दिन के लिए टालना मानसिक तनाव और भय का कारण बनता है। • भयमुक्त शिक्षा (Fearless Learning): सज़ा का डर बच्चों को झूठ बोलने पर विवश करता है; सहानुभूतिपूर्ण संवाद ही समाधान है। • सत्यवादिता का महत्व: झूठ बोलने से परिवार परेशान होता है और अंत में स्वयं ही हास्य का पात्र बनना पड़ता है। मास्टर जी की सीख: समझदारी, सहानुभूति व समय-पालन

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
एकांकी 'ऐसे-ऐसे' प्रख्यात गांधीवादी साहित्यकार एवं 'आवारा मसीहा' के रचयिता विष्णु प्रभाकर (1912–2009) द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय हास्य-व्यंग्य बाल-एकांकी है।
मुख्य बिंदु 2
एकांकी का केंद्रीय पात्र मोहन है, जो तीसरी कक्षा का आठ-नौ वर्षीय नटखट और चंचल छात्र है, जो तख्त पर पड़ा पेट पकड़कर कराह रहा है।
मुख्य बिंदु 3
मोहन के पेट दर्द का कोई निश्चित लक्षण नहीं है; माँ के पूछने पर वह न गोला फूटने की बात स्वीकार करता है न चाकू चुभने की, बल्कि केवल 'कुछ ऐसे-ऐसे होता है' की रट लगाता है।
मुख्य बिंदु 4
पिताजी स्पष्ट करते हैं कि मोहन ने दफ्तर में उनके साथ केवल एक केला और एक संतरा खाया था, किंतु बस अड्डे पर अचानक उसने पेट में दर्द होने की बात कही।
मुख्य बिंदु 5
माँ ममतावश व्याकुल होकर हींग, अजवायन, नीबू का रस, सोंठ तथा गर्म पानी की बोतल से सिकाई जैसे तमाम घरेलू प्राथमिक नुस्खे आजमाती है, किंतु कोई लाभ नहीं होता।
मुख्य बिंदु 6
पड़ोसी दीनानाथ जी आकर सामाजिक सद्भाव प्रकट करते हैं तथा शहर में फैली नई बीमारियों की आशंका जताते हुए कुशल चिकित्सक को दिखाने की सलाह देते हैं।
मुख्य बिंदु 7
पारंपरिक वैद्य जी नाड़ी देखकर 'वात का प्रकोप' तथा 'कब्ज' का निदान बताते हैं और गर्म पानी से देने के लिए दस्तावर पुड़िया भेजते हैं (पिताजी ५ रु. भेंट देते हैं)।
मुख्य बिंदु 8
एलोपैथिक डॉक्टर साहब जीभ देखकर और पेट टटोलकर 'बदहजमी' (Dyspepsia) और 'गैस का फंदा' बताते हैं तथा एक खुराक दवा का नुस्खा देते हैं (पिताजी १० रु. फीस देते हैं)।
मुख्य बिंदु 9
स्कूल के अनुभवी मास्टर जी आते ही बाल-मनोविज्ञान से समझ जाते हैं कि महीने भर की छुट्टियों का गृहकार्य अधूरा रहने के कारण मोहन सज़ा के डर से यह स्वांग रच रहा है।
मुख्य बिंदु 10
मास्टर जी मोहन को डांटने के बजाय दो दिन की अतिरिक्त मोहलत देते हैं; यह सुनते ही मोहन का सारा दर्द छूमंतर हो जाता है और पिता के हाथ से दवा की शीशी छूटकर फर्श पर चूर-चूर हो जाती है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
मोहन पेट में दर्द का क्या लक्षण बताता है और वह दर्द का कोई निश्चित नाम क्यों नहीं लेता?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मोहन पेट में दर्द का कोई निश्चित लक्षण न बताकर केवल यही कहता है कि 'बस कुछ ऐसे-ऐसे होता है'। वह कोई निश्चित लक्षण (जैसे गोला फूटना या चाकू चुभना) इसलिए नहीं बताता क्योंकि यदि वह कोई विशिष्ट नाम लेता, तो माँ तुरंत उसका सटीक घरेलू इलाज कर देती या डॉक्टर उसकी पोल पकड़ लेते। 'ऐसे-ऐसे' एक अस्पष्ट बहाना था जिसे कोई पकड़ नहीं सकता था।
सोचिए कि यदि मोहन पेट में चुभन या उल्टी का पक्का नाम लेता, तो क्या होता।
2
माँ ने डॉक्टर और वैद्य के आने से पहले मोहन के इलाज के लिए कौन-कौन से घरेलू उपाय किए?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: माँ ने मोहन के पेट दर्द को शांत करने के लिए निम्नलिखित घरेलू उपाय किए: १. हींग और अजवायन का पाचक चूर्ण दिया। २. पाचन क्रिया सुधारने हेतु नीबू का पानी पिलाया। ३. सोंठ और काले नमक का पारंपरिक मिश्रण दिया। ४. पेट की ऐंठन को कम करने के लिए गर्म पानी की बोतल से पेट की सिकाई की।
रसोईघर के पाचक मसालों और गर्म पानी के उपयोग को याद कीजिए।
3
वैद्य जी ने नाड़ी देखकर मोहन के दर्द का क्या कारण बताया और क्या उपचार सुझाया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वैद्य जी ने मोहन की कलाई पकड़कर नाड़ी का परीक्षण किया और घोषणा की कि शरीर में 'वात का प्रकोप' हो गया है। पेट साफ़ न होने के कारण मल रुक गया है और कब्ज की वजह से रुकी हुई वायु पेट में घूमकर दर्द कर रही है। उपचार के लिए उन्होंने गर्म पानी से आधे-आधे घंटे बाद देने हेतु अपनी दुकान से दस्तावर पुड़िया भेजने की बात कही।
आयुर्वेद के तीन दोषों (वात, पित्त, कफ) में से वायु के विकार को याद कीजिए।
4
डॉक्टर साहब ने मोहन की जांच किस प्रकार की और उन्होंने क्या निदान व दवा बताई?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: डॉक्टर साहब ने मोहन की जीभ बाहर निकलवाकर देखी और पेट को उंगलियों से टटोलकर जांच की। उन्होंने अपेंडिसाइटिस और कोलिक पेन का खंडन करते हुए कहा कि यह केवल 'बदहजमी' (Dyspepsia) है और गैस रुककर फंदा डाल रही है। उन्होंने कहा कि एक खुराक दवा पीने के बाद ही तबीयत बिल्कुल संभल जाएगी।
जीभ का निरीक्षण, पेट टटोलना और बदहजमी के संबंध को याद कीजिए।
5
मास्टर जी ने मोहन के 'ऐसे-ऐसे' दर्द का असली कारण क्या बताया और उन्होंने क्या उपाय किया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मास्टर जी ने बताया कि मोहन को कोई शारीरिक बीमारी नहीं है, बल्कि महीने भर की छुट्टियों में खेल-कूद करने के कारण उसका स्कूल का गृहकार्य (होमवर्क) अधूरा रह गया है। कल स्कूल में डांट और सज़ा से बचने के लिए उसने यह बहाना बनाया है। मास्टर जी ने उसे सज़ा देने के बजाय दो दिन की और मोहलत दी ताकि वह अपना सारा काम पूरा कर सके।
महीने भर की छुट्टियों, गृहकार्य और दो दिन की मोहलत को याद कीजिए।
6
नाट्य के अंत में पिताजी के हाथ से दवा की शीशी क्यों छूटकर गिर गई और इससे किस रस की सृष्टि हुई?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पिताजी जब डॉक्टर के यहाँ से दवा की शीशी खरीदकर लाए और माँ ने उन्हें सारा सच बताया कि मोहन को कोई बीमारी नहीं थी बल्कि यह गृहकार्य न करने का बहाना था, तो पिताजी विस्मय और आश्चर्य से हक्के-बक्के रह गए। इसी हड़बड़ाहट में उनके हाथ से दवा की शीशी छूटकर फर्श पर गिर पड़ी और फूट गई। इस दृश्य से एकांकी में उत्कृष्ट 'हास्य रस' की सृष्टि हुई।
पिताजी के विस्मय और कमरे में गूंजे ठहाके को याद कीजिए।
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