ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 7
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
टिकट अलबम (Vasant)
१. कहानी की पृष्ठभूमि, मूल तमिल साहित्य एवं अनुवाद-शिल्प:
'टिकट अलबम' मूल रूप से आधुनिक तमिल साहित्य के अग्रणी लेखक सुंदरा रामस्वामी (१९३१–२००५) द्वारा रचित एक अत्यंत प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक बाल-कहानी है, जिसका हिंदी में अत्यंत सरस, स्वाभाविक और मुहावरेदार अनुवाद सुमति अय्यर ने किया है। सुंदरा रामस्वामी, जिन्हें तमिल काव्य-जगत में 'पसुवय्या' के नाम से भी जाना जाता है, आधुनिक तमिल गद्य के उन स्तंभों में हैं जिन्होंने यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता और सामाजिक संवेदनशीलता को नई दिशा दी। उनका उपन्यास 'ओरु पुलियामरत्तिन कदै' (इमली का पेड़) भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर माना जाता है। अनुवादक सुमति अय्यर ने कहानी का अनुवाद करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि दक्षिण भारतीय परिवेश की स्वाभाविकता नष्ट न हो और साथ ही हिंदी भाषी विद्यार्थियों को यह अपनी ही कक्षा और मोहल्ले की कहानी प्रतीत हो। भाषा में 'अगुआ', 'खलना', 'कुढ़ना', 'छाती पर सांप लोटना', 'खून का घूंट पीना' और 'हाथ मारना' जैसे स्वाभाविक मुहावरों का प्रयोग इस अनुवाद को अत्यंत सजीव और प्रवाहमयी बना देता है।
२. डाक-टिकट संग्रह (Philately): ज्ञान, लगन और सांस्कृतिक खिड़की:
कहानी का केंद्रीय विषय डाक टिकटों का संग्रह है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'फिलाटेली' (Philately) कहा जाता है। डाक टिकट केवल डाक महसूल चुकाने के साधन नहीं होते, बल्कि वे किसी भी देश के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, महापुरुषों, प्राकृतिक संपदा और वन्यजीवों के सचित्र प्रतीक होते हैं। बीसवीं शताब्दी में जब इंटरनेट और डिजिटल मनोरंजन का अस्तित्व नहीं था, तब बच्चों और युवाओं के बीच विभिन्न देशों के टिकट जमा करना सबसे बौद्धिक, ज्ञानवर्धक और प्रतिष्ठित शौक माना जाता था। बच्चे टिकटों के विनिमय (Exchange) के लिए दूर-दूर तक भटकते थे—जैसे दो सामान्य टिकट देकर एक दुर्लभ देश का टिकट प्राप्त करना। यह शौक बच्चों में धैर्य, संचय की प्रवृत्ति, अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान और खोजी दृष्टि का विकास करता था। प्रस्तुत कहानी में अलबम केवल एक वस्तु नहीं है, बल्कि वह बच्चों की पहचान, उनका सामाजिक दर्जा (Status) और उनके आत्मसम्मान का प्रतीक बन जाता है।
३. राजप्पा का अनथक परिश्रम: मधुमक्खी जैसा संचय एवं पूर्व प्रतिष्ठा:
कहानी के आरंभ में राजप्पा के कठोर श्रम और उसकी लगन का विस्तृत वर्णन मिलता है। स्कूल भर में राजप्पा के अलबम की तूती बोलती थी। राजप्पा ने अपने अलबम को किसी जादुई चिराग से नहीं पाया था, बल्कि उसने एक-एक टिकट को ठीक उसी प्रकार संचित किया था जैसे मधुमक्खी दूर-दूर के फूलों से मकरंद लाकर बूँद-बूँद से शहद का छत्ता बनाती है। सुबह आठ बजते ही वह घर से बस्ता लेकर निकल पड़ता था और टिकट जमा करने वाले अन्य लड़कों के घरों के चक्कर काटता था। दो ऑस्ट्रेलिया के टिकट के बदले एक फिनलैंड का टिकट लेता, तो दो पाकिस्तान के टिकट के बदले एक कनाडा का दुर्लभ टिकट लाता। स्कूल की घंटी बजने और दोपहर की छुट्टियों के बाद भी वह मीलों पैदल धूप में भटकता रहता था। उसके पास विभिन्न देशों के अनगिनत टिकटों का ऐसा सुव्यवस्थित संग्रह था कि कक्षा के सभी लड़के-लड़कियां उसके अलबम को श्रद्धा और विस्मय से देखते थे। यहाँ तक कि गांव के सरपंच के धनी लड़के ने राजप्पा के अलबम को पच्चीस रुपये की भारी कीमत में खरीदने की पेशकश की थी, किंतु राजप्पा ने स्वाभिमान से मना कर दिया था कि 'घमंडी कहीं का! क्या अपने घर के बच्चे को पच्चीस रुपये में बेच दोगे?' राजप्पा का यह स्वाभिमान उसके श्रम से उपजा था।
४. नागराजन का आगमन: सिंगापुर का उपहार एवं रातों-रात लोकप्रियता:
किंतु यह स्थिति सदा एक जैसी नहीं रही। नागराजन के मामा ने सिंगापुर से एक चमचमाता, बड़ा और बेहद आकर्षक टिकट अलबम पार्सल द्वारा भेज दिया। नागराजन ने इस अलबम को बनाने के लिए कोई पसीना नहीं बहाया था, न कोई पैदल यात्रा की थी और न कोई विनिमय का गणित लगाया था; उसे यह सब कुछ एक तैयार उपहार (Ready-made gift) के रूप में अनायास मिल गया था। अलबम के पहले पृष्ठ पर नागराजन के मामा ने मोती जैसे सुंदर अक्षरों में एक चेतावनी भरी इबारत लिख भेजी थी—'ए. एम. नागराजन — इस अलबम को चुराने वाला बेशर्म है। ऊपर लिखे नाम को देखा है? यह अलबम मेरा है। जब तक घास हरी है और कमल लाल, सूरज जब तक पूर्व से उगे और पश्चिम में छिपे, उस अनंत काल तक के लिए यह अलबम मेरा है, रहेगा!' लड़कों और लड़कियों ने इस वाक्य को तुरंत अपनी-अपनी कॉपियों और अलबमों में नकल कर लिया। नागराजन का यह अलबम स्कूल में आते ही तहलका मचा देता है। प्रार्थना सभा से लेकर आधी छुट्टी तक सभी छात्र-छात्राएं नागराजन को घेरे रहते हैं। नागराजन घमंड में सबको अपनी गोदी में रखकर अलबम दिखाता है, पर किसी को हाथ नहीं लगाने देता।
५. उपेक्षा का दंश एवं ईर्ष्या का अंकुरण:
नागराजन के अलबम की इस चकाचौंध ने राजप्पा के साम्राज्य को एक ही झटके में ध्वस्त कर दिया। अब कोई भी राजप्पा के अलबम की बात नहीं करता था। उसकी वर्षों की तपस्या, उसका अनथक परिश्रम और उसका ज्ञान सब कुछ सहपाठियों की दृष्टि में व्यर्थ हो गया। सहपाठी लड़के खुलेआम कहने लगे कि राजप्पा का अलबम तो अब नागराजन के अलबम के सामने 'कूड़ा' है। यह शब्द राजप्पा के कलेजे में तीर की तरह चुभ गया। राजप्पा दिन-रात कुढ़ने लगा। उसके मन में उपेक्षा, असहायता और अपमान का ऐसा कड़वा घूंट भर गया जिसने धीरे-धीरे भयंकर ईर्ष्या का रूप ले लिया। राजप्पा सोचता कि नागराजन को टिकटों के मूल्य और दुर्लभता का कोई ज्ञान नहीं है; केवल एक बड़ा और सुंदर कवर पा लेने से कोई अलबम महान नहीं बन जाता। किंतु दुनिया बाहरी चमक-दमक देखती है, आंतरिक श्रम को नहीं। इसी कुंठा ने राजप्पा को एक विनाशकारी मार्ग की ओर धकेल दिया।
६. चोरी का घातक कदम: नागराजन के घर का प्रसंग:
एक शाम राजप्पा अपने अंतर्द्वंद्व और ईर्ष्या के वशीभूत होकर नागराजन के घर की ओर चल पड़ा। उसका उद्देश्य नागराजन को यह समझाना या ललकारना था कि असली संग्रह क्या होता है, किंतु वहाँ पहुँचते ही परिस्थितियों ने एक नया और खतरनाक मोड़ ले लिया। नागराजन उस समय घर पर नहीं था, वह शहर गया हुआ था। कमरे में केवल उसकी बहन कामाक्षी थी। कामाक्षी ने भाई के अलबम की भूरि-भूरि प्रशंसा की और फिर नीचे चली गई। कमरे में सन्नाटा छा गया। राजप्पा ने नागराजन की मेज़ पर रखी किताबों को टटोलना शुरू किया। अचानक दराज़ के पास उसे चाबी मिल गई। उसने ताला खोला। दराज़ में वही सुंदर सिंगापुर वाला अलबम रखा था। पहले पृष्ठ पर लिखी चेतावनी को पढ़कर राजप्पा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने एक क्षण के लिए सोचा, किंतु ईर्ष्या के उन्माद में विवेक खो बैठा। उसने अलबम को उठाया, अपनी कमीज़ के नीचे खोंसा, दराज़ बंद की और दबे पाँव सीढ़ियाँ उतरकर तेज़ी से अपने घर की ओर भाग निकला। घर पहुँचकर उसने अलबम को अपनी किताबों की अलमारी के पीछे छिपा दिया।
७. अपराध-बोध की यातना एवं अप्पू का आगमन:
अलबम चुराते ही राजप्पा की आत्मा पर अपराध-बोध का भारी पहाड़ टूट पड़ा। उसने सोचा था कि अलबम पाकर उसे विजय और संतोष मिलेगा, किंतु मिला केवल असह्य भय और मानसिक संताप। उसका गला सूख गया, मुँह कड़वा हो गया और भूख-प्यास सब उड़ गई। रात में जब माँ ने खाना खाने को कहा, तो उससे एक निवाला भी नहीं निगला गया। उसका चेहरा भयानक और पीला पड़ गया। अगली सुबह उसका सहपाठी अप्पू उसके घर आया। अप्पू ने आग में घी डालते हुए बताया कि नागराजन का अलबम चोरी हो गया है और नागराजन रात भर फूट-फूटकर रोता रहा है। अप्पू ने यह भी बताया कि नागराजन के पिता डी.एस.पी. (पुलिस उपाधीक्षक) के दफ्तर में काम करते हैं और वे किसी भी क्षण पुलिस को खबर कर सकते हैं। अप्पू ने संदेह की सुई राजप्पा पर घुमाते हुए कहा कि कामाक्षी ने बताया था कि नागराजन के कमरे में आखिरी बार केवल राजप्पा ही आया था। यह सुनते ही राजप्पा के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई और उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया।
८. साँकल की खटखटाहट एवं अलबम का अग्नि-समर्पण:
अप्पू के जाने के बाद राजप्पा भय से कांपता हुआ कमरे में अकेला बैठा था। तभी बाहर के मुख्य द्वार पर ज़ोर-ज़ोर से साँकल खटखटाने की आवाज़ आई। राजप्पा ने समझा कि पुलिस आ गई है और अब घर की तलाशी ली जाएगी। यदि पुलिस ने अलबम पकड़ लिया, तो उसे हथकड़ी लगाकर सारे स्कूल और मोहल्ले के सामने ले जाया जाएगा। माँ रसोईघर से चिल्लाई—'अरे राजप्पा! दरवाज़ा खोल, कोई आया है। सुनता क्यों नहीं?' राजप्पा आतंक की चरम सीमा पर पहुँच गया। वह अलबम लेकर गुसलखाने (बाथरूम) की ओर भागा और अंदर से कुंडी चढ़ा ली। उसने देखा कि सामने रसोईघर की अंगीठी में गर्म पानी करने के लिए कोयले धधक रहे थे। बिना एक पल सोचे, पुलिस के डर से बचने के लिए उसने उस अनमोल सिंगापुर वाले अलबम को धधकती अंगीठी में झोंक दिया! कुछ ही पलों में सुंदर-सुंदर विदेशी टिकट, जिन पर कितने देशों की गाथाएं अंकित थीं, धुएं और राख के ढेर में तब्दील हो गए। अलबम को जलते देखकर राजप्पा की आँखों से पश्चाताप और आत्म-ग्लानि के खारे आंसू बह निकले। जब उसने दरवाज़ा खोला, तो देखा कि बाहर पुलिस नहीं, बल्कि स्वयं नागराजन रोता हुआ खड़ा था!
९. प्रायश्चित, सर्वस्व-समर्पण एवं नैतिक उत्थान:
नागराजन की आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं। वह सिसकते हुए बोला—'यार राजप्पा, मेरा अलबम किसी ने चुरा लिया!' नागराजन का यह रुदन राजप्पा के हृदय को चीर गया। राजप्पा समझ गया कि उसने कितनी बड़ी अनहोनी और पाप कर दिया है। उस क्षण राजप्पा के भीतर का सारा अहंकार, सारी ईर्ष्या और सारा द्वेष पूरी तरह भस्म हो चुका था। वह चुपचाप अपनी अलमारी के पास गया और उसने अपनी कई वर्षों की अनथक तपस्या, अपने पसीने से सींचे हुए उस प्रिय अलबम को बाहर निकाला, जिसे उसने कभी किसी को छूने तक नहीं दिया था। उसने कांपते हाथों से अपना अलबम नागराजन की गोदी में रख दिया और कहा—'यह लो, इसे तुम रख लो। सच कह रहा हूँ, यह अब तुम्हारा है।' नागराजन को विश्वास नहीं हुआ। उसने समझा कि राजप्पा मज़ाक कर रहा है। किंतु जब राजप्पा ने बार-बार कसम खाकर और रोते हुए कहा, तो नागराजन स्तब्ध रह गया। नागराजन अलबम लेकर नीचे उतरने लगा। राजप्पा ने पीछे से आवाज़ दी—'नागराजन, आज रात इसे मुझे देखने दो। कल सुबह मैं तुम्हें दे जाऊंगा।' किंतु फिर उसने तुरंत कहा कि नहीं, तुम इसे अभी ले जाओ। नागराजन के जाते ही राजप्पा ने कमरे की किवाड़ बंद कर ली, तकिए पर मुँह रखकर फूट-फूटकर रो पड़ा। यह रोना हार का नहीं था, यह पश्चाताप, प्रायश्चित और आत्मा की शुद्धि का अश्रु-अभिषेक था।
१०. 'भाषा की बात', व्याकरणिक आयाम एवं नैतिक संदेश:
प्रस्तुत कहानी में भाषा और शिल्प का उत्कृष्ट संतुलन दिखाई देता है। व्याकरण की दृष्टि से कहानी में तत्सम शब्द (ईर्ष्या, पश्चाताप, अग्नि, प्रतिष्ठा, संचय), तद्भव शब्द (आंसू, कीचड़, पसीना, साँकल, अंगीठी), विदेशी आगत शब्द (अलबम, स्कूल, डी.एस.पी., पार्सल, टिकट) तथा देशज मुहावरों का अत्यंत प्रभावशाली प्रयोग हुआ है। कहानी का मुख्य नैतिक संदेश यह है कि ईर्ष्या मनुष्य की बुद्धि और विवेक को भ्रष्ट कर देती है। दूसरों की रेडीमेड सफलता या उपहारों से जलने के बजाय हमें अपने परिश्रम पर गर्व करना चाहिए। किंतु साथ ही कहानी यह भी सिखाती है कि मनुष्य से यदि भूल हो जाए, तो सच्चे पश्चाताप और सर्वस्व-त्याग से ही उस भूल का प्रायश्चित संभव है।