ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 10
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प्रगति: अध्ययनरत
संसार पुस्तक है (Vasant)
सीआईएससीई कक्षा 6 हिंदी (वसंत भाग 1) का पाठ 'संसार पुस्तक है' आधुनिक भारत के निर्माता एवं प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (1889–1964) द्वारा अपनी दस वर्षीया पुत्री इंदिरा प्रियदर्शिनी (इंदिरा गांधी) को लिखे गए अत्यंत ज्ञानवर्धक, वात्सल्यपूर्ण और दार्शनिक पत्रों का एक अनमोल संकलन है। मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में लिखे गए इन पत्रों के संग्रह का नाम 'लेटर्स फ्रॉम अ फादर टू हिज डॉटर' (Letters from a Father to His Daughter) था, जिसका अत्यंत सजीव, सरल, प्रवाहपूर्ण और मुहावरेदार हिंदी अनुवाद उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने 'पिता के पत्र पुत्री के नाम' शीर्षक से किया था। यह पाठ न केवल पत्र-साहित्य (Epistolary Literature) का एक उत्कृष्ट प्रतिमान है, बल्कि यह बाल-पाठकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper), भौगोलिक चेतना, प्रकृति-निरीक्षण और विश्व-बंधुत्व की उदात्त भावना का बीजारोपण करता है।
निबंध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायी है। सन 1928 की गर्मियों में दस वर्षीया नन्हीं इंदिरा अपनी पढ़ाई और स्वास्थ्य लाभ के लिए उत्तराखंड के पर्वतीय नगर मसूरी में थीं, जबकि उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वाधीनता संग्राम के कारण इलाहाबाद की नैनी सेंट्रल जेल में बंद थे। पिता और पुत्री के बीच सैकड़ों मील की भौगोलिक दूरी थी। नेहरू जी पत्र के आरंभ में याद करते हैं कि जब इंदिरा उनके पास इलाहाबाद के आनंद भवन में रहती थीं, तो वे स्वभाववश अपने पिता से दुनिया-भर की ढेरों बातें और बाल-सुलभ प्रश्न पूछा करती थीं और नेहरू जी धैर्यपूर्वक उनके उत्तर दिया करते थे। परंतु मसूरी और इलाहाबाद के बीच यह प्रत्यक्ष बातचीत संभव नहीं थी। अतः नेहरू जी ने अपनी पुत्री के एकाकीपन को ज्ञान के असीम आलोक से भरने के लिए पत्रों का माध्यम चुना। उन्होंने निश्चय किया कि वे इन छोटे-छोटे पत्रों में इंदिरा को हमारी इस पृथ्वी की उत्पत्ति, उसके प्राचीन इतिहास, उसमें रहने वाले विभिन्न देशों, जातियों और प्रकृति के अद्भुत रहस्यों की कहानियाँ सुनाएँगे।
नेहरू जी सबसे पहले इंदिरा को एक अत्यंत व्यापक, उदार और वैश्विक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि यदि हमें संसार की सच्ची कहानी जाननी है, तो हमें केवल अपने देश हिंदुस्तान या इंग्लैंड के बारे में नहीं सोचना चाहिए। इंग्लैंड तो यूरोप का केवल एक छोटा-सा टापू है और हिंदुस्तान इतना विशाल देश होते हुए भी समूची पृथ्वी की सतह का केवल एक छोटा-सा हिस्सा है। यदि हम केवल एक देश की बात सोचेंगे, तो हमारा दृष्टिकोण संकीर्ण और एकांगी हो जाएगा। सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें इस पृथ्वी पर बसने वाले सभी देशों और उन सभी मानव-समुदायों को अपना समझना होगा। नेहरू जी यहाँ भारतीय संस्कृति के अमर आदर्श 'वसुधैव कुटुंबकम्' (समूची पृथ्वी ही एक परिवार है) की आधारशिला रखते हैं, जहाँ दुनिया के सभी लोग हमारे भाई-बहन हैं।
इसके उपरांत नेहरू जी पृथ्वी के प्राचीनतम भूगर्भीय इतिहास की ओर बढ़ते हैं। वे बताते हैं कि आज हम जिस हरी-भरी, पर्वतों, नदियों और जीव-जंतुओं से भरी पृथ्वी को देखते हैं, यह हमेशा से ऐसी सुंदर और शीतल नहीं थी। हमारी यह धरती लाखों-करोड़ों वर्ष पुरानी है। अपनी आरंभिक अवस्था में यह आग का एक धधकता हुआ अत्यंत गर्म गोला थी। उस प्रचंड ताप के कारण करोड़ों वर्षों तक इस पृथ्वी पर कोई भी जानदार (जीवित) प्राणी, न मनुष्य, न पशु-पक्षी और न ही पेड़-पौधे जीवित रह सकते थे। उस युग में जीवन की कल्पना भी असंभव थी।
यहाँ नेहरू जी एक अत्यंत स्वाभाविक और गंभीर प्रश्न उठाते हैं—'जब उस पुराने जमाने में कोई आदमी था ही नहीं, तो उस समय की बातें हमें कैसे मालूम हों?' उस समय जब कोई मनुष्य नहीं था, तो इतिहास की किताबें कौन लिखता? क्योंकि कोई भी इतिहासकार उस समय उपस्थित नहीं था। नेहरू जी कहते हैं कि हम केवल घर बैठकर अपनी कोरी कल्पना के घोड़े दौड़ाकर उस समय का इतिहास नहीं जान सकते। कोरी कल्पना से तो हम सुंदर परियों की कहानियाँ गढ़ सकते हैं, जिनका यथार्थ और सच्चाई से कोई संबंध नहीं होता। सच्चा इतिहास जानने का वैज्ञानिक मार्ग क्या है? नेहरू जी बताते हैं कि यद्यपि उस जमाने में मनुष्यों द्वारा लिखी गई कोई कागजी किताब नहीं थी, परंतु हमारे पास प्रकृति की स्वयं लिखी हुई पुस्तकें मौजूद हैं।
यही इस पाठ का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय रूपक है—'संसार पुस्तक है'। नेहरू जी समझाते हैं कि पहाड़, समुद्र, सितारे, नदियाँ, जंगल, रेगिस्तान, पत्थरों के टुकड़े, पुरानी चट्टानें, जीवाश्म (Fossils) और प्राचीन जानवरों की ज़मीन में दबी हड्डियाँ—ये सभी प्रकृति की उस विशाल पुस्तक के जीवंत पृष्ठ हैं। जिस प्रकार किसी कागजी किताब को पढ़कर हम किसी देश का इतिहास जानते हैं, ठीक उसी प्रकार इन प्राकृतिक वस्तुओं का अध्ययन करके हम पृथ्वी के करोड़ों वर्ष पुराने इतिहास को प्रत्यक्ष पढ़ सकते हैं। प्रकृति का इतिहास किसी भी मनुष्य की लिखी पुस्तक से कहीं अधिक प्रामाणिक, प्राचीन और विस्मयकारी है।
परंतु इस प्रकृति रूपी पुस्तक को पढ़ा कैसे जाए? नेहरू जी 'प्रकृति की वर्णमाला' (Alphabet of Nature) की अत्यंत सुंदर और व्यावहारिक अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। वे एक सहज उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यदि किसी को कोई नई भाषा—चाहे वह हिंदी हो, उर्दू हो या अंग्रेजी हो—सीखनी होती है, तो वह सीधे बड़े-बड़े उपन्यास या निबंध नहीं पढ़ने लगता। उसे सबसे पहले उस भाषा के मूल 'अक्षर' (Alphabet) सीखने पड़ते हैं। क, ख, ग या A, B, C सीखे बिना कोई भी व्यक्ति भाषा नहीं पढ़ सकता। ठीक इसी प्रकार यदि हमें प्रकृति की इस महा-पुस्तक को पढ़ना है, तो हमें पहले प्रकृति के अक्षर सीखने होंगे। और प्रकृति के अक्षर क्या हैं? प्रकृति के अक्षर हैं—पत्थर, चट्टानें, नदियाँ, पहाड़ और कंकड़।
प्रकृति के अक्षरों को कैसे पढ़ा जाता है, इसे समझाने के लिए नेहरू जी एक नन्हे, चमकीले गोल कंकड़ (रोड़े) की आत्मकथा का अत्यंत सजीव, वैज्ञानिक और रोमांचक विवरण देते हैं। वे इंदिरा से कहते हैं कि यदि तुम सड़क के किनारे या नदी के तट पर पड़े एक गोल, चिकने और चमकदार रोड़े को हाथ में लो, तो क्या तुमने कभी सोचा कि यह ऐसा गोल और बिना किसी खुरदरे कोने का कैसे बन गया? यदि तुम प्रकृति के अक्षर पढ़ना जानती हो, तो यह छोटा-सा रोड़ा तुम्हें अपनी पूरी जीवन-गाथा खुद सुना देगा।
रोड़े की यह आत्मकथा प्रकृति के अपरदन (Erosion) और जल-प्रवाह के भूवैज्ञानिक नियमों का अत्यंत सरल पाठ है। कभी यह कंकड़ भी किसी विशाल चट्टान का एक हिस्सा था। किसी पहाड़ के ढलान पर वह बड़ी चट्टान से टूटकर अलग हो गया। उस समय वह ठीक उसी पत्थर के टुकड़े की तरह था जिसे आज तुम पहाड़ों में देखती हो—जिसमें नुकीले कोने, धारदार किनारे और खुरदरी सतह होती है। वह पहाड़ की तलहटी में न जाने कितने वर्षों तक उपेक्षित पड़ा रहा। फिर एक दिन मूसलाधार बारिश हुई। बारिश के तेज़ पानी ने उस भारी पत्थर को बहाकर नीचे एक छोटी घाटी में धकेल दिया। वहाँ से एक पहाड़ी नाले ने अपने तेज़ बहाव के साथ उसे आगे धकेलते हुए एक छोटे से दरिया (नदी) में पहुँचा दिया।
उस छोटे दरिया से वह बहते-बहते बड़े दरिया (बड़ी नदी) में पहुँच गया। इस पूरी लंबी यात्रा के दौरान वह पत्थर नदी के पेंदे (तली) में निरंतर लुढ़कता रहा। नदी के पानी के प्रचंड दबाव और तली की अन्य चट्टानों व रेत के साथ निरंतर होने वाले घर्षण (Friction) के कारण उसके सारे नुकीले और धारदार कोने धीरे-धीरे घिसते चले गए। उसकी खुरदरी सतह चिकनी होती गई और घिसते-घिसते वह एक सुंदर, गोलमटोल, चिकना और चमकदार कंकड़ बन गया। नदी का बहाव जब किसी मोड़ पर धीमा हुआ, तो उसने उस चमकीले कंकड़ को किनारे की रेत पर छोड़ दिया, जिसे आज तुमने अपनी हथेली में उठा लिया है।
नेहरू जी यहाँ एक अत्यंत दूरगामी और वैज्ञानिक कल्पना जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि यदि नदी उस कंकड़ को किनारे न छोड़ती और अपने साथ और आगे बहाकर ले जाती, तो क्या होता? नदी के जल में निरंतर आगे लुढ़कते-लुढ़कते वह कंकड़ और अधिक घिसता, छोटा होता जाता, और अंत में घिसते-घिसते वह बालू (रेत / Sand) का एक नन्हा कण बन जाता। वह बालू का कण बहकर समुद्र के मुहाने पर पहुँच जाता और अपने जैसे लाखों-करोड़ों अन्य बालू के कणों से जा मिलता। उन सब कणों के मिलने से समुद्र के किनारे एक सुंदर, चमकीला और सुनहरा बालू का तट (Beach) बन जाता, जिस पर छोटे-छोटे बच्चे खेलते और रेत के सुंदर-सुंदर घरौंदे (Sandcastles) बनाते।
इस प्रकार नेहरू जी एक नन्हे से कंकड़ की यात्रा को समुद्र के किनारे बच्चों के खेल से जोड़कर प्रकृति के विशाल चक्र को पूर्ण करते हैं। वे कहते हैं कि जब एक छोटा-सा रोड़ा अपनी इतनी लंबी, रोमांचक और अद्भुत कहानी सुना सकता है, तो सोचो कि हमारे चारों ओर फैले हुए ये विशालकाय पहाड़, गहरी नदियाँ, अथाह समुद्र और सदियों पुरानी चट्टानें हमें प्रकृति के कितने अनगिनत और महान रहस्यों की कहानियाँ सुना सकती हैं! इसके लिए आवश्यकता केवल इस बात की है कि हमारी आँखें खुली हों, हमारे कान सजग हों और हमारे मन में सीखने की तीव्र जिज्ञासा विद्यमान हो।
भूवैज्ञानिक दृष्टि से यह पाठ विद्यार्थियों को यह समझाता है कि पृथ्वी का कोई भी भू-भाग स्थिर या अपरिवर्तनीय नहीं है। आज जहाँ ऊँचे-ऊँचे हिमालय जैसे पर्वत खड़े हैं, करोड़ों वर्ष पूर्व वहाँ 'टेथिस सागर' नामक एक विशाल समुद्र लहराता था। आज भी जब वैज्ञानिक हिमालय की ऊँची चोटियों पर चट्टानों की खुदाई करते हैं, तो उन्हें वहाँ प्राचीन समुद्री जीवों, मछलियों और शंखों के जीवाश्म (Fossils) प्राप्त होते हैं। ये जीवाश्म ही प्रकृति के वे पावन हस्ताक्षर हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि हमारी यह धरती निरंतर परिवर्तनशील और विकासमान रही है। नेहरू जी का यह पाठ भूगोल, इतिहास, भौतिकी और साहित्य का एक ऐसा अनुपम संगम है जो विद्यार्थियों को चहारदीवारी के संकुचित अध्ययन से बाहर निकालकर समूचे ब्रह्मांड की प्रयोगशाला में खड़ा कर देता है।
मुंशी प्रेमचंद के अनुवाद ने नेहरू जी के इन गंभीर वैज्ञानिक विचारों को अत्यंत सरस, सुबोध और आत्मीय भाषा प्रदान की है। इस पाठ की भाषा में खड़ी बोली हिंदी के सहज प्रवाह के साथ-साथ 'दरिया', 'घरौंदे', 'जानदार', 'हाल' जैसे लोक-प्रचलित तद्भव और उर्दू शब्दों का बड़ा स्वाभाविक प्रयोग हुआ है, जिससे यह पाठ किसी दुरूह वैज्ञानिक शोध-पत्र के बजाय एक स्नेहमयी पिता की रोचक कहानी बन जाता है।
इसके साथ ही, यह पाठ आधुनिक युग के माता-पिताओं और शिक्षकों के लिए भी एक आदर्श मार्गदर्शिका है। स्वाधीनता संग्राम की भीषण व्यस्तताओं, राजनीतिक उथल-पुथल और जेल की कठिन यातनाओं के बीच भी एक पिता का अपनी दस वर्षीया पुत्री के बौद्धिक विकास के प्रति इतना सजग, स्नेहमयी और धैर्यपूर्ण होना यह सिखाता है कि बच्चों के साथ आत्मीय संवाद स्थापित करना कितना महत्वपूर्ण है। नेहरू जी उपदेश नहीं देते, बल्कि एक सच्चे मित्र और मार्गदर्शक की भाँति अपनी नन्हीं बेटी को स्वयं सोचने, खोजने और निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित करते हैं। यह पाठ न केवल एक साहित्यिक धरोहर है, बल्कि यह बाल-मनोविज्ञान और शिक्षा-शास्त्र का एक शाश्वत प्रकाश-स्तंभ है।
सीआईएससीई कक्षा 6 के विद्यार्थियों के लिए 'संसार पुस्तक है' पाठ का अध्ययन बहुआयामी दृष्टिकोण से अत्यंत अनिवार्य है। यह पाठ विद्यार्थियों को रटंत विद्या (Rote Learning) से मुक्त कर प्रत्यक्ष अवलोकन (Observation), तार्किक चिंतन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि सीखने का दायरा केवल विद्यालय की कक्षाओं और पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे आस-पास बिखरी हुई समूची प्रकृति ही ज्ञान का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है। प्रस्तुत अध्ययन सामग्री में इस पाठ के सभी वैचारिक, भूगर्भीय, भाषाई और परीक्षा-उपयोगी पक्षों का गहन, प्रमाणिक और सर्वांगीण विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।