ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 18
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
दो वरदान (Bal Ram Katha)
पाठ परिचय एवं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: 'बाल रामकथा' का तीसरा अध्याय 'दो वरदान' रामायण महाकाव्य का सर्वाधिक भावुक, नाटकीय और युगांतरकारी मोड़ है। कथाकार मधुकर उपाध्याय ने इस अध्याय में मानवीय मनोभावों, राजमहलों के भीतर पनपने वाले ईर्ष्या-द्वेष, कुसंगति के विनाशकारी प्रभाव और रघुकुल की वचन-मर्यादा के भीषण धर्म-संकट का अत्यंत सजीव, मार्मिक और यथार्थवादी चित्रण किया है। जनकपुर में चारों राजकुमारों (राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न) के भव्य विवाह के उपरांत अयोध्या में कई वर्षों तक सुख, शांति और समृद्धि का स्वर्ण-काल रहा। चारों भाई राजकाज, प्रजा-सेवा और धर्म-पालन में संलग्न रहे। इसी बीच भरत और शत्रुघ्न अपने मामा युधाजित के विशेष आग्रह पर अपने ननिहाल कैकेय देश (राजा अश्वपति के यहाँ) गए हुए थे। वहाँ वे कई माह से आनंदपूर्वक निवास कर रहे थे, किंतु अयोध्या और अपने प्रिय भाइयों की याद उन्हें निरंतर आती रहती थी।
राजा दशरथ का वृद्धावस्था विचार एवं राजसभा का ऐतिहासिक निर्णय: राजा दशरथ अब अत्यंत वृद्ध हो चले थे। उनके केश श्वेत हो चुके थे और वे शारीरिक रूप से शिथिलता का अनुभव कर रहे थे। वे अपने संपूर्ण जीवनकाल में प्रजा-कल्याण और राजधर्म का पालन करते आए थे। उनके चारों पुत्रों में श्रीराम ज्येष्ठ थे और गुणों में सबसे आगे थे। श्रीराम न केवल अस्त्र-शस्त्र और शास्त्रों में पारंगत थे, बल्कि वे अत्यंत विनम्र, न्यायप्रिय, मृदुभाषी, गंभीर और प्रजा के सुख-दुख को अपना समझने वाले आदर्श राजकुमार थे। अयोध्या की समस्त प्रजा, मंत्री और सामंत श्रीराम से अगाध प्रेम करते थे और उन्हें अपना भावी राजा देखना चाहते थे। राजा दशरथ के मन में विचार आया कि उनका शरीर अब राजकाज का भारी बोझ उठाने में असमर्थ है, अतः अपने जीवनकाल में ही श्रीराम को युवराज पद पर अभिषिक्त कर राजकाज की बागडोर उन्हें सौंप दी जाए। दशरथ ने इस विषय में अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ, प्रमुख मंत्रियों और सभासदों से परामर्श किया। राजसभा में जब राजा दशरथ ने अपना यह प्रस्ताव रखा, तो संपूर्ण सभा हर्ष-ध्वनि से गूँज उठी। सभासदों ने एक स्वर में कहा कि श्रीराम जैसा गुणवान, धर्मात्मा और प्रजा-वत्सल राजा पाकर पूरी अयोध्या धन्य हो जाएगी। राजा दशरथ ने तत्काल निर्णय लिया कि कल प्रातःकाल ही पुष्य नक्षत्र के पावन योग में श्रीराम का राज्याभिषेक संपन्न किया जाएगा। यद्यपि भरत और शत्रुघ्न इस अवसर पर अयोध्या में उपस्थित नहीं थे, किंतु राजा दशरथ का मानना था कि ऐसे मांगलिक और शुभ कार्य में विलंब करना उचित नहीं है, और भरत का मन इतना निर्मल है कि वह अयोध्या लौटकर इस निर्णय से अत्यंत प्रसन्न ही होगा।
अयोध्या में उत्सव की तैयारियाँ एवं श्रीराम-सीता का उपवास: राज्याभिषेक की घोषणा होते ही समूची अयोध्या नगरी आनंद के सागर में डूब गई। नगर के प्रमुख मार्गों और राजपथों पर सुगंधित जल और गुलाब-जल का छिड़काव किया जाने लगा। चौराहों पर स्वर्ण-कलश और रेशमी पताकाएँ फहराई जाने लगीं। घरों के मुख्य द्वारों को आम के पल्लवों, फूलों की मालाओं और सुंदर रंगोलियों से सजाया गया। राजमहल में माता कौशल्या अपार हर्ष से भर उठीं और उन्होंने ब्राह्मणों को विपुल दान-दक्षिणा दी तथा देव-मंदिरों में अखंड दीप प्रज्वलित करवाए। उधर महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम और सीता के महल में जाकर उन्हें राज्याभिषेक के पूर्व का कठिन संयम-विधान समझाया। गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर श्रीराम और माता सीता ने उस रात अन्न-जल का त्याग कर भूमि पर कुश की शय्या पर शयन करते हुए एकाग्रचित्त होकर उपवास और ईश्वर-आराधना का व्रत धारण किया।
मंथरा का कुचक्र, ईर्ष्या का विष एवं कैकेयी का बुद्धि-भ्रम: जहाँ संपूर्ण अयोध्या में उल्लास और मंगल-गीतों की गूँज थी, वहीं राजमहल की एक कुबड़ी दासी मंथरा के मन में ईर्ष्या और द्वेष का भयंकर दावानल धधक रहा था। मंथरा रानी कैकेयी के साथ उनके मायके कैकेय देश से अयोध्या आई थी और वह कैकेयी के प्रति अत्यधिक अधिकार-भावना रखती थी। जब उसने अयोध्या की असाधारण सजावट, नगरवासियों की उत्फुल्लता और राजमहल की चहल-पहल देखी, तो वह विस्मित रह गई। उसने एक दासी से पूछा कि आज नगर में ऐसा क्या विशेष उत्सव है? दासी ने अत्यंत हर्षित होकर बताया कि कल प्रातःकाल राजा दशरथ हमारे प्राणप्रिय श्रीराम का युवराज पद पर अभिषेक करने जा रहे हैं। यह सुनते ही मंथरा के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसका चेहरा क्रोध और कुटिलता से विकृत हो गया। वह जल-भुनकर सीधे रानी कैकेयी के शयनकक्ष में दौड़ी, जहाँ कैकेयी सुखपूर्वक विश्राम कर रही थीं।
कैकेयी का आरंभिक वात्सल्य एवं मंथरा का षड्यंत्रकारी तर्कजाल: मंथरा ने हाँफते हुए और चीखते हुए कैकेयी को जगाया और कहा, 'अरी अभागिन! उठ, देख तेरे सिर पर कितना बड़ा अनर्थ मँडरा रहा है और तू यहाँ निश्चिंत सो रही है!' कैकेयी ने चौंककर पूछा कि क्या बात है, राजा दशरथ और उनके पुत्र कुशल से तो हैं? मंथरा ने कुटिल स्वर में कहा, 'राजा दशरथ ने तुम्हारे विरुद्ध गहरा षड्यंत्र रचा है। कल प्रातःकाल वे राम का राज्याभिषेक करने जा रहे हैं।' यह शुभ समाचार सुनते ही कैकेयी का हृदय आनंद से प्रफुल्लित हो उठा। उन्होंने बिना किसी संकोच के अपने गले से बहुमूल्य रत्नों का हार उतारा और मंथरा को पुरस्कार स्वरूप भेंट करते हुए कहा, 'मंथरा! तूने मुझे संसार का सबसे सुखद समाचार सुनाया है। राम मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं। राम और भरत में मेरे लिए कोई भेद नहीं है। राजा दशरथ का यह निर्णय सर्वथा उचित है।' मंथरा ने उस अमूल्य हार को क्रोध से पैर से ठोकर मारकर दूर फेंक दिया और कैकेयी की बुद्धि को भ्रष्ट करने के लिए कुतर्कों का ऐसा भयानक जाल बुना, जिसने एक धर्मपरायण माता के वात्सल्य को संहारक ईर्ष्या में बदल दिया।
मंथरा की विष-बुझी युक्तियाँ: मंथरा ने कैकेयी को डराते हुए कहा कि यदि राम राजा बन गए, तो कौशल्या राजमाता बन जाएगी और उसका प्रभाव सर्वोपरि होगा। कैकेयी, जो आज पटरानी की तरह समस्त रानियों में श्रेष्ठ मानी जाती है, कल कौशल्या की दासी बन जाएगी। उसने भरत के भविष्य का भयानक चित्र खींचा—'राम के राजा बनते ही भरत को या तो हमेशा के लिए देश निकाला दे दिया जाएगा या उन्हें कारागार में डाल दिया जाएगा, अथवा उनके प्राण ही ले लिए जाएँगे। राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही परंपरा से राजा बनता है और उसके बाद राम का पुत्र राजा बनेगा, जिससे भरत का वंश राजसत्ता से हमेशा के लिए बेदखल हो जाएगा। राजा दशरथ ने जानबूझकर भरत को ननिहाल भेजा है ताकि उनकी अनुपस्थिति में यह काम चोरी-छिपे पूरा कर लिया जाए।' मंथरा की इन जहरीली बातों ने धीरे-धीरे कैकेयी के विवेक पर अंधकार का पर्दा डाल दिया। कैकेयी के मन में भरत के प्रति अंधा मोह और कौशल्या व राम के प्रति असुरक्षा और ईर्ष्या की ज्वाला भड़क उठी। कैकेयी ने व्याकुल होकर मंथरा से पूछा, 'अब तुम ही बताओ मंथरा, मैं क्या करूँ जिससे भरत को राज मिले और राम राजा न बन सकें?'
देवासुर संग्राम की ऐतिहासिक धरोहर एवं दो संचित वरदान: तब मंथरा ने कैकेयी को उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाई, जिसे कैकेयी लगभग भूल चुकी थीं। वर्षों पूर्व देवासुर संग्राम के समय देवराज इंद्र की सहायता हेतु राजा दशरथ युद्ध में गए थे। राजा दशरथ के साथ रानी कैकेयी भी रणक्षेत्र में गई थीं और वे राजा के रथ की कुशल सारथि थीं। शम्बरासुर नामक भयंकर असुर के साथ हुए उस युद्ध में असुरों के भीषण अस्त्र-प्रहार से राजा दशरथ का रथ डगमगाने लगा और रथ के पहिये की धुरी की कील (आलपिन) निकलकर गिर गई। यदि धुरी बाहर आ जाती, तो रथ पलट जाता और राजा दशरथ रणभूमि में ही मारे जाते। उस संकटपूर्ण क्षण में रानी कैकेयी ने अपने प्राणों की तनिक भी परवाह न करते हुए अपनी कोमल उँगली को लोहे की धुरी के छिद्र में डाल दिया और रथ को संतुलित रखा। जब राजा दशरथ असुरों के वार से मूर्छित हो गए, तो कैकेयी अदम्य साहस का परिचय देते हुए रथ को सुरक्षित रणक्षेत्र से बाहर निकाल लाईं और राजा का उपचार करके उनके प्राण बचाए। जब दशरथ को चेत आया और उन्होंने कैकेयी के इस अप्रतिम शौर्य और त्याग को देखा, तो उन्होंने गदगद होकर कैकेयी को दो वरदान माँगने का वचन दिया था। उस समय कैकेयी ने कहा था कि उन्हें इस समय किसी वस्तु की अभिलाषा नहीं है, वे आवश्यकता पड़ने पर ये दोनों वरदान राजा से माँग लेंगी। मंथरा ने कैकेयी से कहा, 'रानी! आज वही समय आ गया है। तुम राजा दशरथ से अपने वे ही दोनों पुराने वरदान माँग लो। पहले वरदान में भरत का राज्याभिषेक माँगना और दूसरे वरदान में राम को चौदह वर्ष का वनवास माँगना।' जब कैकेयी ने पूछा कि राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास ही क्यों, तो मंथरा ने कूटनीतिक धूर्तता से समझाया कि चौदह वर्षों में भरत का शासन पूरी तरह सुदृढ़ हो जाएगा, प्रजा भरत की निष्ठावान बन जाएगी और राम जब चौदह वर्ष बाद लौटेंगे, तब तक उनका प्रभाव समाप्त हो चुका होगा।
कोपभवन की रणनीति एवं कैकेयी का दारुण हठ: मंथरा ने कैकेयी को राजा दशरथ को विवश करने की पूरी कूटनीतिक चाल भी सिखाई। उसने कहा कि तुम अपने समस्त रत्नजड़ित आभूषण उतारकर फेंक दो, मैले और फटे वस्त्र पहन लो, केश बिखेरकर कोपभवन (राजमहल का वह कक्ष जहाँ क्रोधित या दुखी रानी एकांत में जाती थी) के फर्श पर लेट जाओ। राजा दशरथ तुमसे अत्यधिक प्रेम करते हैं, वे तुम्हारा दुख सहन नहीं कर पाएँगे। जब वे आएँ, तो उनसे बात मत करना, रोना और जब वे तुम्हारी हर इच्छा पूरी करने की शपथ खा लें, तभी अपने दोनों वरदान माँगना। कैकेयी ने मंथरा की सीख को पूरी तरह आत्मसात कर लिया और कोपभवन में जाकर धूल-धूसरित होकर भूमि पर लेट गईं। उनके बिखरे हुए स्वर्ण-आभूषण फर्श पर ऐसे पड़े थे मानो आकाश से टूटकर गिरे हुए तारे हों।
कोपभवन में राजा दशरथ का आगमन एवं राम-शपथ का वचन: उधर राजा दशरथ राजसभा से निवृत्त होकर अत्यंत प्रसन्न मन से अपनी सबसे प्रिय रानी कैकेयी को राम के राज्याभिषेक का शुभ समाचार देने उनके महल पहुँचे। किंतु प्रासाद में सन्नाटा था। पूछने पर प्रतिहारी ने काँपते हुए बताया कि महारानी कोपभवन में हैं। दशरथ चकित और चिंतित होकर कोपभवन में प्रविष्ट हुए। वहाँ का करुण और विकराल दृश्य देखकर राजा के होश उड़ गए। रानी कैकेयी मैले वस्त्रों में, बाल बिखेरे, आँसुओं से भीगी भूमि पर अचेत सी पड़ी थीं। राजा दशरथ व्याकुल होकर उनके पास बैठ गए, उनके सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और अत्यंत कोमल वाणी में पूछा, 'प्रिये! तुम्हें क्या कष्ट है? क्या तुम अस्वस्थ हो? यदि कोई रोग है, तो मैं तुरंत राजवैद्यों को बुलाता हूँ। क्या किसी ने तुम्हारा अपमान किया है? तुम जानती हो कि मुझे तुमसे अधिक कोई प्रिय नहीं है। तुम जो माँगोगी, मैं वही दूँगा। मैं अपने प्राणप्रिय, धर्मात्मा श्रीराम की सौगंध खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी हर इच्छा पूर्ण करूँगा।' जब कैकेयी ने देखा कि राजा दशरथ ने अपने सबसे प्रिय पुत्र राम की सौगंध खा ली है और वे वचन के बंधन में पूरी तरह बँध चुके हैं, तब कैकेयी ने अपना रूप बदला और उठकर बैठ गईं।
दो कठोर वरदानों का विस्फोट एवं राजा दशरथ का दारुण विलाप: कैकेयी ने कठोर वाणी में कहा, 'महाराज! आप रघुकुल के प्रतापी राजा हैं। पहले आप स्मरण करें कि देवासुर संग्राम में आपने मुझे दो वरदान देने का वचन दिया था। यदि आप सत्यवादी हैं और अपने वचन पर अटल हैं, तो आज मुझे वे दोनों वरदान दीजिए।' राजा ने सहज भाव से सहमति दी। तब कैकेयी ने मानो राजा की छाती पर वज्र का प्रहार करते हुए कहा: 'मेरा पहला वरदान यह है कि कल प्रातः जिस सिंहासन पर राम का राज्याभिषेक होना है, उस पर मेरे पुत्र भरत का राज्याभिषेक किया जाए! और मेरा दूसरा वरदान यह है कि राम तापस वेश धारण कर चौदह वर्ष के लिए दंडक वन में प्रस्थान करें!' यह सुनते ही राजा दशरथ स्तब्ध रह गए। उनके कानों में मानों पिघला हुआ सीसा पड़ गया हो। उनका पूरा शरीर काँपने लगा और वे 'हा राम! हा राम!' कहते हुए मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।
राजा की करुण याचना एवं कैकेयी का पाषाण-हृदय: कुछ समय बाद जब राजा दशरथ को होश आया, तो वे दीन-हीन याचक की भाँति कैकेयी के पैरों में गिर पड़े। उनकी आँखों से अश्रुओं की अविरल धारा बह रही थी। वे विलाप करते हुए बोले, 'कैकेयी! तू यह क्या अनर्थ माँग रही है? राम ने तेरा क्या बिगाड़ा है? तू तो सदा कहती थी कि राम तुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं। भरत को तू सारा राज्य दे दे, मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है। मैं स्वयं भरत का राज्याभिषेक कर दूँगा, किंतु राम को वन मत भेज! राम के बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकूँगा। मुझ वृद्ध पर दया कर, अपने ये क्रूर वरदान वापस ले ले!' किंतु कैकेयी पर राजा के विलाप और अश्रुओं का तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ा। वह पाषाण की मूर्ति की भाँति अडिग खड़ी रही और उसने उल्टे राजा को कुल-कलंक की धमकी दी। उसने कहा, 'महाराज! रघुकुल की रीति रही है कि प्राण भले ही चले जाएँ, किंतु वचन कभी नहीं टूटता। यदि आप अपने दिए गए वचन से पीछे हटते हैं, तो संसार आप पर थूकेगा और रघुकुल की सत्य-प्रतिष्ठा सदा के लिए धूल में मिल जाएगी। यदि कल प्रातः राम वन को नहीं गए और भरत को राज्य नहीं मिला, तो मैं आपके सामने विष पीकर अपने प्राण दे दूँगी और इस महापाप का कलंक आपके माथे पर लगेगा।' सारी रात राजा दशरथ तड़पते, रोते, कैकेयी को समझाते और बार-बार मूर्छित होते रहे, किंतु रात का अंधकार जितना गहरा था, कैकेयी का हठ उससे भी अधिक अचल और कठोर बना रहा।
प्रभात का दारुण विरोधाभास एवं अध्याय का नैतिक सार: धीरे-धीरे रात बीत गई और प्रभात की पहली किरण फूटी। पूरी अयोध्या नगरी में मंगल-तूर्य, शंख और भेरी की मधुर ध्वनियाँ गूँजने लगीं। नागरिक सज-धज कर राजमहल की ओर उमड़ पड़े। चारों ओर उल्लास का सागर लहरा रहा था, किंतु राजमहल के भीतर कोपभवन में विषाद, रुदन और मृत्यु जैसी नीरवता छाई हुई थी। राजा दशरथ अश्रु-विगलित, निस्तेज और संज्ञाशून्य पड़े थे। यह अध्याय हमें सिखाता है कि कुसंगति और ईर्ष्या किस प्रकार एक सद्गुणी और वात्सल्यमयी माँ के विवेक को भी पूर्णतः नष्ट कर सकती है। साथ ही, यह अध्याय रघुकुल की उस कठोर मर्यादा को रेखांकित करता है, जहाँ सत्य और वचन की रक्षा के लिए व्यक्तिगत सुख, पारिवारिक संबंध और यहाँ तक कि प्राणों का उत्सर्ग भी सहर्ष स्वीकार कर लिया जाता है।