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ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 17
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

जंगल और जनकपुर (Bal Ram Katha)

सरयू तट की प्रथम रात्रि एवं 'बला-अतिबला' विद्या की पावन दीक्षा: प्रस्तुत अध्याय 'जंगल और जनकपुर' पूरक पाठ्यपुस्तक 'बाल रामकथा' का द्वितीय एवं अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह कथा मूल रूप से महर्षि वाल्मीकि रचित 'रामायण' तथा गोस्वामी तुलसीदास रचित 'रामचरितमानस' पर आधारित है, जिसका अत्यंत सरस, रोचक और प्रवाहपूर्ण संक्षेपण लेखक मधुकर उपाध्याय द्वारा किया गया है। कथा का आरंभ अयोध्या से वन की ओर प्रस्थान के सजीव दृश्य से होता है। महर्षि विश्वामित्र आगे-आगे तीव्र गति से डग भर रहे थे, उनके पीछे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और उनके पीछे सजग प्रहरी के रूप में लक्ष्मण चल रहे थे। दिनभर वे पवित्र सरयू नदी के किनारे-किनारे चलते रहे। जब संध्या की लालिमा आकाश में छा गई और सूर्यास्त का समय हुआ, तो महर्षि विश्वामित्र ने पहली बार सरयू के किनारे रात्रि-विश्राम का निर्णय लिया। राजसी विलासों में पले-बढ़े दोनों सुकुमार राजकुमारों ने बिना किसी शिकायत के तिनकों और सूखी पत्तियों की शैय्या बनाई। विश्वामित्र राजकुमारों की सहनशीलता, अनुशासन और विनय को देखकर मन ही मन अत्यंत मुग्ध हुए। उन्होंने अत्यंत वात्सल्यपूर्वक राम और लक्ष्मण को अपने पास बैठाया और उन्हें दो अद्वितीय दैवीय विद्याओं—'बला' और 'अतिबला'—की दीक्षा दी। मुनि ने स्पष्ट किया कि इन विद्याओं को सिद्ध कर लेने के उपरांत उन्हें कभी भी भूख और प्यास का कष्ट नहीं सताएगा, घोर परिश्रम के पश्चात भी शरीर में थकान (क्लांति) का अनुभव नहीं होगा, और यदि वे निद्रा में या असावधान भी होंगे, तब भी कोई मायावी शत्रु उन पर आक्रमण करके उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकेगा। यह दीक्षा आगामी भीषण संघर्षों के लिए उनका रक्षा-कवच बनी। सरयू-गंगा संगम एवं ताड़का वन का भयानक परिवेश: अगली सुबह जब पूर्व दिशा में उषा की स्वर्णिम किरणें फूटीं, तो महर्षि विश्वामित्र ने अत्यंत कोमल वाणी में राम को जगाया—'उठो तात! प्राची दिशा में अरुणोदय हो चुका है, प्रातः संध्या का समय आ गया है।' दोनों भाइयों ने सरयू के पावन जल में स्नान कर गुरु वंदना की और पुनः यात्रा आरंभ की। चलते-चलते वे उस पावन स्थल पर पहुँचे जहाँ सरयू नदी का गंगा के साथ संगम होता था। वहाँ स्थानीय मल्लाहों की सहायता से उन्होंने नौका द्वारा गंगा नदी को पार किया। गंगा पार करते ही प्रकृति का रूप अचानक भयानक हो उठा। पेड़ों की सघनता इतनी अधिक थी कि सूर्य का प्रकाश भी धरती को स्पर्श नहीं कर पाता था। दिन के समय भी गहरा अंधकार छाया रहता था। चारों ओर से हिंसक पशुओं की दहाड़, सूखी पत्तियों की भयानक सरसराहट और पक्षियों की कर्कश ध्वनियाँ गूँज रही थीं। दोनों राजकुमारों के मुख पर जिज्ञासा देखकर महर्षि विश्वामित्र ने उस भयानक वन का अतीत बताया। उन्होंने कहा: 'हे राम! यह वन पूर्व काल में अत्यंत रमणीक, हरा-भरा और संपन्न था। यहाँ दो विशाल और समृद्ध जनपद बसे हुए थे—'मलद' और 'करूष'। किंतु जब से यहाँ सुकेतु यक्ष की पुत्री दुष्ट राक्षसी ताड़का ने अपना डेरा डाला है, उसने अपनी क्रूरता और नरभक्षण से इन सुंदर जनपदों को उजाड़कर वीरान कर दिया है। अब इस भयानक क्षेत्र को संपूर्ण आर्यावर्त में 'ताड़का वन' के नाम से जाना जाता है।' ताड़का का भीषण आतंक एवं श्रीराम द्वारा ताड़का-वध: महर्षि विश्वामित्र ने ताड़का की उत्पत्ति का रहस्य बताते हुए कहा कि वह सुकेतु यक्ष की पुत्री थी और उसका विवाह झंझ नामक राक्षस से हुआ था। महर्षि अगस्त्य के शाप के कारण वह अत्यंत कुरूप, विशालकाय और विकराल नरभक्षी राक्षसी बन गई थी। उसमें सहस्र हाथियों का शारीरिक बल था और वह आकाश से पत्थरों व विशाल वृक्षों की वर्षा करने की मायावी शक्ति रखती थी। भय के मारे उस वन में कोई भी मनुष्य या ऋषि पैर रखने का साहस नहीं करता था। विश्वामित्र ने राम को सम्बोधित करते हुए दृढ़तापूर्वक आदेश दिया: 'हे रघुनंदन! इस दुष्ट निशाचरी ने धर्म और मानवता को त्रस्त कर रखा है। इसका वध करना तुम्हारा क्षत्रिय धर्म है। यह सोचकर संकोच मत करो कि वह एक स्त्री है। जो पापिनी समस्त प्रजा और ऋषियों के विनाश पर तुली हो, उसका संहार करना ही राजा का परम कर्तव्य है।' गुरु की आज्ञा पाते ही श्रीराम ने अपने गांडीव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और कान तक खींचकर भयंकर टंकार की। उस टंकार की वज्र-समान गूँज से संपूर्ण वन दहल उठा। टंकार की ध्वनि सुनते ही क्रोध से अंधी होकर ताड़का चीत्कार करती हुई दौड़ी। उसने राम और लक्ष्मण पर विशाल शिलाखंडों और पेड़ों की बौछार कर दी। वीर लक्ष्मण ने अपने पैने बाणों से उन पत्थरों को आकाश में ही काट डाला। जब ताड़का अत्यंत निकट आ पहुँची, तो सूर्यास्त का समय देखकर श्रीराम ने एक अचूक, तीक्ष्ण बाण का संधान किया। वह बाण सीधे ताड़का के वक्षस्थल (छाती) को चीरता हुआ निकल गया। ताड़का भयानक चीत्कार करते हुए धरती पर गिरी और निष्प्राण हो गई। ताड़का के मरते ही उस घने जंगल से आतंक का साया सदा के लिए हट गया और देवताओं ने आकाश से पुष्पवृष्टि कर श्रीराम की जय-जयकार की। दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की प्राप्ति एवं सिद्धाश्रम में सिद्ध-यज्ञ का संपादन: ताड़का के वध से महर्षि विश्वामित्र का हृदय आनंद और गर्व से भर गया। उन्होंने उस रात्रि उसी वन में विश्राम किया जो अब भयमुक्त और शांत हो चुका था। अगली सुबह विश्वामित्र ने श्रीराम के अद्वितीय शौर्य और विनम्रता से संतुष्ट होकर उन्हें ब्रह्मांड के समस्त दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। उन्होंने राम और लक्ष्मण को आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, वायव्यास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, कालचक्र, विष्णुचक्र और ब्रह्मास्त्र सहित सौ से भी अधिक दिव्य अस्त्रों की दीक्षा दी। मुनि ने न केवल उन अस्त्रों को चलाने (आह्वान) का रहस्य सिखाया, अपितु उनका संहार करने (वापस शांत करने) की गूढ़ विद्या भी सिखाई। इसके पश्चात वे महर्षि के तपोवन 'सिद्धाश्रम' पहुँचे। सिद्धाश्रम में अन्य सभी मुनियों और ऋषियों ने दोनों राजकुमारों का भावभीना स्वागत किया। अगले ही दिन से विश्वामित्र का अनुष्ठान आरंभ हुआ। यह सिद्ध-यज्ञ छह दिनों तक निरंतर चलना था। यज्ञ की दीक्षा लेते ही महर्षि विश्वामित्र ने मौन-व्रत धारण कर लिया। अब यज्ञ की वेदी और आश्रम की संपूर्ण सुरक्षा का भार राम और लक्ष्मण के कंधों पर था। दोनों भाइयों ने लगातार छह दिनों और रातों तक न तो अन्न-जल की चिंता की और न ही अपनी पलकें झपकाईं। वे हाथों में धनुष-बाण लिए यज्ञकुंड के चारों ओर सजग प्रहरी की भाँति निरंतर पहरा देते रहे। मारीच-सुबाहु का आक्रमण एवं राक्षसी सेना का विनाश: यज्ञ के पाँच दिन शांतिपूर्वक बीत गए। छठे दिन, जब यज्ञ अपनी अंतिम पूर्णाहुति के निकट था, अचानक आकाश में काले-कजरारे मेघ घिर आए और भीषण गर्जना होने लगी। ताड़का के प्रतिशोध की ज्वाला में जलते हुए उसके दोनों मायावी पुत्र—मारीच और सुबाहु—विशाल राक्षसी सेना के साथ सिद्धाश्रम पर टूट पड़े। वे यज्ञवेदी पर रक्त, माँस और अपवित्र हड्डियों की वर्षा करने लगे। श्रीराम तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने स्थिति की गंभीरता को भाँपते हुए अत्यंत रणनीतिक निर्णय लिया। राम जानते थे कि मारीच को अभी जीवित रखना विधाता की किसी भावी योजना का अंग है। अतः उन्होंने मारीच पर 'शीतेषु' (मानवास्त्र / बिना फल वाला बाण) चलाया। उस प्रचंड बाण के वेग से मारीच वायु में उड़ता हुआ सौ योजन दूर दक्षिण सागर के तट पर जा गिरा। वह मरा नहीं, किंतु उसका अहंकार चूर-चूर हो गया और वह मूर्च्छित होकर जान बचाकर भागा। इसके तुरंत पश्चात श्रीराम ने दूसरा तीक्ष्ण 'आग्नेयास्त्र' सुबाहु पर छोड़ा। वह बाण सुबाहु की छाती में लगा और वह वहीं जलकर भस्म हो गया। उधर वीर लक्ष्मण ने अपने अचूक बाणों का जाल बिछाकर शेष समस्त राक्षसी सेना का संहार कर दिया। आकाश स्वच्छ हो गया, यज्ञ की अंतिम आहुतियाँ निर्विघ्न संपन्न हुईं। महर्षि विश्वामित्र ने मौन-व्रत समाप्त कर दोनों राजकुमारों को हृदय से लगा लिया और कहा: 'हे रघुनंदन! तुम्हारे असीम पौरुष से मेरा सिद्ध-यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हुआ और सिद्धाश्रम राक्षसों के भय से मुक्त हो गया।' मिथिला (जनकपुर) की ओर प्रस्थान एवं राजा जनक का आतिथ्य: यज्ञ की पूर्णता के पश्चात महर्षि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को एक नए अभियान की सूचना दी। उन्होंने कहा: 'हे राजकुमारों! विदेहराज महाराज जनक ने अपनी राजधानी मिथिला (जनकपुर) में एक विशाल यज्ञ और अद्भुत धनुष-प्रतियोगिता का आयोजन किया है। वहाँ भगवान शिव का एक अलौकिक और प्राचीन धनुष रखा है। संसार के बड़े-बड़े राजा और योद्धा उसे देखने आ रहे हैं। हम सब भी उस अद्भुत धनुष का दर्शन करने जनकपुर चलेंगे।' राम और लक्ष्मण गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर ऋषियों के दल के साथ मिथिला की ओर चल पड़े। गंगा नदी पार कर जब वे मिथिला की सीमा में प्रविष्ट हुए, तो नगर का अनुपम सौंदर्य देखकर मुग्ध रह गए। मिथिला नगरी ज्ञान, दर्शन, कला और शांति की पावन स्थली थी। जब विदेहराज राजा जनक को महर्षि विश्वामित्र के आगमन का समाचार मिला, तो वे अपने मंत्रियों और राजपुरोहित शतानंद के साथ नंगे पाँव उनकी अगवानी हेतु दौड़े आए। जनक ने महर्षि के चरणों में मस्तक नवाया और उनका भव्य स्वागत किया। तभी राजा जनक की दृष्टि विश्वामित्र के पीछे खड़े दो रूपवान, सुगठित और तेजस्वी राजकुमारों पर पड़ी। उनके अलौकिक तेज, सौम्य मुस्कान और भव्य व्यक्तित्व को देखकर ज्ञानी राजा जनक भी आत्म-विभोर हो गए। जनक ने विस्मित होकर पूछा: 'हे मुनिवर! ये दोनों अलौकिक किशोर कौन हैं? इन्हें देखकर मेरा विरक्त और ज्ञानी मन भी वात्सल्य और अपनत्व से भर उठा है।' विश्वामित्र ने गर्व से परिचय कराया: 'ये अयोध्यापति चक्रवर्ती महाराज दशरथ के ज्येष्ठ सुपुत्र राम और लक्ष्मण हैं। इन्होंने मेरे यज्ञ की रक्षा कर ताड़का और सुबाहु का संहार किया है। ये आपके यहाँ रखे शिव-धनुष का दर्शन करने आए हैं।' भगवान शिव का पिनाक धनुष एवं राजा जनक की कठोर प्रतिज्ञा: राजा जनक ने अत्यंत आदरपूर्वक महर्षि और दोनों राजकुमारों को एक सुंदर आम्रकुंज में ठहराया। संध्या के समय राजा जनक ने उस अद्भुत शिव-धनुष की पृष्ठभूमि और अपनी प्रतिज्ञा का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि यह धनुष साक्षात भगवान शिव का 'पिनाक' धनुष है, जो उनके पूर्वज देवरात को देवताओं द्वारा सौंपा गया था। यह धनुष इतना भारी और विशाल था कि इसे लोहे के एक आठ पहियों वाले विशाल संदूक में सुरक्षित रखा गया था, जिसे कई सौ बलिष्ठ पुरुष मिलकर बड़ी कठिनाई से खींच पाते थे। राजा जनक ने दुःखी मन से कहा: 'हे मुनिवर! मेरी एक पुत्री है—सीता। वह मुझे हल चलाते समय खेत की विदीर्ण भूमि से प्राप्त हुई थी, इसलिए वह अयोनिजा (भूमि-पुत्री) है। बाल्यकाल में सीता ने खेल-खेल में इस भारी शिव-धनुष को उठा लिया था, जिसे कोई हिला तक नहीं सकता था। तभी मैंने यह भीषण प्रतिज्ञा ली थी कि जो भी पराक्रमी वीर इस शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ मेरी पुत्री सीता का विवाह होगा। किंतु आज मुझे घोर निराशा हो रही है। देश-देशांतर के राजा, महाराजा, और यहाँ तक कि लंकापति रावण और बाणासुर जैसे महाबली योद्धा भी आए, किंतु वे सब इस धनुष को तिल-भर भी हिला नहीं सके। वे लज्जित होकर लौट गए। क्या मेरी सीता आजीवन अविवाहित रहेगी? क्या यह पृथ्वी शूरवीरों से रिक्त हो चुकी है?' जनक के इस विलाप को सुनकर लक्ष्मण की भृकुटि तन गई, किंतु श्रीराम ने शांत रहकर उन्हें संयमित किया। धनुष-भंग, सीता-स्वयंवर एवं चारों भाइयों का पावन परिणय: अगले दिन विशाल राजसभा में स्वयंवर का आयोजन हुआ। लोहे के विशाल संदूक में रखे शिव-धनुष को कई सौ सैनिक खींचकर सभा के मध्य लाए। सभा में उपस्थित सभी राजाओं के चेहरे निराशा और भय से मलिन थे। तब महर्षि विश्वामित्र ने शांत भाव से श्रीराम की ओर देखा और बोले: 'उठो राम! इस शिव-धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाओ और विदेहराज जनक का संताप दूर करो।' गुरु की आज्ञा पाते ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अत्यंत सहज भाव से उठे। उन्होंने गुरु विश्वामित्र के चरण स्पर्श किए और राजसभा के मध्य पहुँचे। श्रीराम ने मानो कोई बाल-क्रीड़ा हो, उस विशाल धनुष को एक ही हाथ से अनायास उठा लिया। संपूर्ण सभा में विस्मय की लहर दौड़ गई। राम ने जैसे ही धनुष के एक सिरे को धरती पर टिकाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और उसे कान तक खींचा, वह भारी धनुष अत्यधिक दबाव के कारण बीच से तड़ककर दो टुकड़ों में टूट गया! धनुष टूटने की ध्वनि इतनी भीषण थी मानो आकाश में एक साथ सैकड़ों वज्र गिर पड़े हों। संपूर्ण दिशाएँ काँप उठीं और सभा में उपस्थित लोग अचेत से हो गए। राजा जनक की प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा। उनका संताप मिट गया और प्रतिज्ञा पूर्ण हुई। राजमहलों से सुसज्जित होकर राजकुमारी सीता हाथों में जयमाला लिए मंद गति से आगे बढ़ीं। उन्होंने लज्जा और असीम आनंद के साथ वरमाला श्रीराम के गले में डाल दी। आकाश से देवताओं ने पुष्पवृष्टि की और संपूर्ण मिथिला में परमानंद छा गया। इसके उपरांत महर्षि विश्वामित्र की सहमति से राजा जनक ने अयोध्या दूत भेजे। अयोध्या में जब यह शुभ समाचार पहुँचा कि राम ने शिव-धनुष तोड़कर सीता का वरण किया है, तो संपूर्ण नगर उत्सव के सागर में डूब गया। महाराज दशरथ अपने दोनों अनुज पुत्रों—भरत और शत्रुघ्न—मंत्रियों, कुलगुरु वशिष्ठ और विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ बारात लेकर जनकपुर पहुँचे। जनकपुर में दोनों राजवंशों का ऐतिहासिक मिलन हुआ। राजा जनक ने महाराज दशरथ के समक्ष एक अत्यंत पावन और भव्य प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि उनके कुल की चार कन्याएँ हैं और दशरथ के चार सुयोग्य राजकुमार हैं। अतः चारों का विवाह एक साथ संपन्न हो: श्रीराम का विवाह सीता से, लक्ष्मण का विवाह जनक की कनिष्ठ पुत्री उर्मिला से, भरत का विवाह जनक के अनुज कुशध्वज की पुत्री मांडवी से, और शत्रुघ्न का विवाह कुशध्वज की छोटी पुत्री श्रुतकीर्ति से तय हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, ऋषियों के शुभाशीष और अपार मंगलगान के बीच चारों राजकुमारों का पावन पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ। इसके पश्चात अपार दहेज, उपहारों और वधुओं के साथ बारात सानंद अयोध्या लौटी, जहाँ संपूर्ण प्रजा ने दीपमालाएँ जलाकर अपने प्रिय राजकुमारों का भव्य स्वागत किया।

क्या आपने कभी सोचा है?

अयोध्या के राजमहलों के रेशमी बिछौनों को त्यागकर जब दो सुकुमार किशोर राजकुमार—राम और लक्ष्मण—महर्षि विश्वामित्र के पीछे-पीछे घने वनों की ओर बढ़े, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह यात्रा भारतीय इतिहास और संस्कृति की दिशा बदल देगी! सरयू तट पर घास-फूस की शैय्या पर पहली रात बिताने से लेकर 'बला' और 'अतिबला' जैसी दिव्य विद्याओं की दीक्षा तक, और फिर मलद तथा करूष जनपदों को उजाड़ देने वाली नरभक्षी राक्षसी ताड़का का मात्र एक बाण से वध—श्रीराम ने अपनी अद्भुत वीरता का पहला परिचय दिया। किंतु परीक्षा यहीं समाप्त नहीं हुई! सिद्धाश्रम में छह दिनों तक बिना पलक झपकाए यज्ञ की रक्षा करना, मारीच को सौ योजन दूर फेंकना, और सुबाहु को भस्म करना केवल आरंभ था। असली रोमांच तब उपस्थित हुआ जब वे मिथिला नरेश राजा जनक के भव्य दरबार में पहुँचे, जहाँ लोहे के आठ पहियों वाले विशाल संदूक में रखा था भगवान शिव का अजेय 'पिनाक' धनुष, जिसे रावण और बाणासुर जैसे महायोद्धा भी तिल-भर न हिला सके थे। क्या एक सोलह वर्षीय सुकुमार किशोर उस भारी धनुष को उठा पाएगा? क्या जनक की वह कठोर प्रतिज्ञा पूरी होगी जिसने विश्व भर के वीरों को हताश कर दिया था? आइए, शौर्य, तपस्या, अलौकिक प्रेम और धर्म-संस्थापन की इस रोमांचकारी गाथा 'जंगल और जनकपुर' में प्रवेश करें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

बाल रामकथा का यह द्वितीय अध्याय 'जंगल और जनकपुर' विद्यार्थियों के चारित्रिक, नैतिक और सामाजिक विकास का एक स्वर्णिम अध्याय है। यह पाठ स्पष्ट करता है कि सच्ची शक्ति केवल शारीरिक बल या शस्त्रों में नहीं, अपितु विनय, गुरु-भक्ति, आत्म-संयम और लोक-कल्याण की भावना में निहित होती है। श्रीराम का चरित्र यह सिद्ध करता है कि एक श्रेष्ठ मनुष्य को संकट के समय धैर्य और गुरु के आदेश पर अटूट निष्ठा रखनी चाहिए। अध्याय का प्रथम भाग (जंगल) विद्यार्थियों को यह अमूल्य शिक्षा देता है कि जब समाज में राक्षसी और आततायी प्रवृत्तियाँ (जैसे ताड़का, मारीच और सुबाहु) जन-जीवन को त्रस्त करने लगें, तो एक वीर और धर्मपरायण व्यक्ति का यह कर्तव्य बन जाता है कि वह व्यक्तिगत संकोच को त्यागकर समाज की रक्षा हेतु शस्त्र उठाए। वहीं, ताड़का-वध यह रेखांकित करता है कि अपराध और अन्याय का कोई लिंग नहीं होता; अधर्म का विनाश करना ही सर्वोपरि राजधर्म है। अध्याय का द्वितीय भाग (जनकपुर) अहंकार पर विनम्रता की विजय का सार्वकालिक संदेश देता है। जहाँ रावण और बाणासुर जैसे उद्दंड राजा अपने बाहुबल के मद में शिव-धनुष को हिला तक न सके, वहीं श्रीराम ने पूर्ण विनम्रता और गुरु-आज्ञा से उस धनुष को सहज ही भंग कर दिया। अंततः, चारों भाइयों का एक साथ विवाह पारिवारिक सौहार्द, आदर्श गृहस्थ जीवन और दो महान संस्कृतियों (अयोध्या और मिथिला) के पावन समन्वय का अप्रतिम दृष्टांत प्रस्तुत करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • अध्याय 1 'अवधपुरी में राम' की मूल कथावस्तु, विश्वामित्र के आगमन और राम-लक्ष्मण के वन-प्रस्थान की जानकारी।
  • प्राचीन भारत में ऋषि-परंपरा, यज्ञ-संस्कृति, अनुष्ठानों में राक्षसी विघ्नों और क्षत्रिय दायित्वों की मूलभूत समझ।
  • स्वयंवर प्रथा, प्राचीन भारत में विवाह के प्रकार तथा धनुष-यज्ञ के सामाजिक व सांस्कृतिक संदर्भ का ज्ञान।
  • पौराणिक भौगोलिक स्थलों जैसे सरयू, गंगा, सिद्धाश्रम, मिथिला (जनकपुर) तथा मलद-करूष जनपदों का सामान्य परिचय।
  • पात्रों के नैतिक गुणों जैसे गुरु-भक्ति, आज्ञाकारिता, पराक्रम, विनम्रता और भ्रातृ-प्रेम का विश्लेषणात्मक बोध।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • सरयू तट पर बिताई गई प्रथम रात्रि, विश्वामित्र द्वारा प्रदत्त 'बला' और 'अतिबला' विद्याओं के स्वरूप एवं लाभों का वर्णन करना।
  • मलद और करूष जनपदों के उजड़ने के कारणों तथा ताड़का के आतंक एवं उसके पूर्व-इतिहास का तार्किक विश्लेषण करना।
  • श्रीराम द्वारा ताड़का-वध की घटना, विश्वामित्र के आदेश और क्षत्रिय के लोक-रक्षक धर्म की विवेचना करना।
  • सिद्धाश्रम में विश्वामित्र द्वारा सौंपे गए सौ से अधिक दिव्य अस्त्र-शस्त्रों और उनकी प्रयोग-संहारक विधियों को समझना।
  • छह दिनों के सिद्ध-यज्ञ के दौरान राम-लक्ष्मण की कर्तव्य-निष्ठा, मारीच पर मानवास्त्र तथा सुबाहु-वध की रणनीति का मूल्यांकन करना।
  • मिथिला (जनकपुर) के सौंदर्य, राजा जनक के विदेह स्वरूप एवं विश्वामित्र-राजकुमारों के स्वागत प्रसंग का सजीव चित्रण करना।
  • भगवान शिव के पिनाक धनुष की सामरिक व आध्यात्मिक विशेषताओं तथा राजा जनक की सीता-स्वयंवर प्रतिज्ञा को स्पष्ट करना।
  • राजसभा में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष को सहजता से उठाने, प्रत्यंचा चढ़ाने और धनुष-भंग की रोमांचक घटना का वर्णन करना।
  • अयोध्या से राजा दशरथ की बारात के आगमन तथा चारों राजकुमारों (राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) के सामूहिक पावन विवाह का विवरण देना।
  • अध्याय में प्रयुक्त उच्च-स्तरीय पौराणिक शब्दावली, व्याकरणिक प्रयोगों और नीतिपरक जीवन-मूल्यों को अभिव्यक्त करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: पाठ प्रवेश, सरयू तट की प...
2 मॉड्यूल 2: सरयू-गंगा संगम, ताड़का व...
3 मॉड्यूल 3: दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की...
4 मॉड्यूल 4: मारीच-सुबाहु का आक्रमण,...
5 मॉड्यूल 5: मिथिला (जनकपुर) की ओर प्...
6 मॉड्यूल 6: धनुष-यज्ञ राजसभा, श्रीरा...
7 मॉड्यूल 7: अयोध्या से बारात का आगमन...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: पाठ प्रवेश, सरयू तट की प्रथम रात्रि एवं 'बला-अतिबला' विद्या

CISCE कक्षा 6 हिन्दी (बाल रामकथा) - अध्याय 2 जंगल और जनकपुर | कथाकार: मधुकर उपाध्याय (मूल: वाल्मीकि / तुलसीदास) 1 सरयू तट की प्रथम रात्रि, विश्वामित्र का स्नेह एवं 'बला-अतिबला' विद्या की दीक्षा सरयू तट पर प्रथम पड़ाव • अयोध्या से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान • दिनभर सरयू नदी के किनारे तेज गति से चले • सूर्यास्त होने पर सरयू तट पर पहली रात विश्राम • कोमल तिनकों और पत्तों की शैय्या बनाई • मुनि ने दोनों भाइयों को पुत्रवत दुलारा प्रातःकाल का विहंगम दृश्य "उठो तात! प्राची दिशा में अरुणोदय हुआ" सरयू स्नान व प्रभात संध्या-वंदन अनुशासन एवं गुरु-आज्ञाकारिता की मिसाल दैवीय गुप्त विद्याओं की दीक्षा • विश्वामित्र द्वारा प्रदत्त विशिष्ट विद्याएँ: 1. बला (Bala) | 2. अतिबला (Atibala) तपस्या से अर्जित अमोघ दैवीय शक्तियाँ • इन विद्याओं के अलौकिक लाभ: - कभी भूख और प्यास की पीड़ा नहीं सताएगी - घोर परिश्रम के बाद भी थकान (क्लांति) नहीं होगी - सोते अथवा असावधान रहने पर कोई आक्रमण नहीं कर सकेगा - सौंदर्य, तेज और ओज में निरंतर वृद्धि होगी ★ परीक्षा दृष्टि: बला-अतिबला का महत्व सरयू-गंगा संगम एवं नौका-पार • पवित्र संगम स्थल पर पहुँचकर जल-वंदन • स्थानीय मल्लाहों द्वारा नौका की व्यवस्था • गंगा पार करते ही वातावरण में भारी परिवर्तन भयावह वन का आरंभ • पेड़ों की घनी छाया से दिन में भी अंधकार • हिंसक जीवों की भयानक गर्जना • सूखी पत्तियों की चरमराहट व दुर्गम मार्ग • विश्वामित्र ने आगे के संकट की पूर्व-सूचना दी ★ ताड़का वन की सीमा में प्रवेश 2 मलद व करूष जनपदों का विनाश, ताड़का का भीषण आतंक एवं श्रीराम द्वारा ताड़का-वध मलद व करूष का इतिहास • पूर्व में अत्यंत सुंदर व समृद्ध जनपद थे • सुकेतु यक्ष की पुत्री 'ताड़का' का उपद्रव • अगस्त्य मुनि के शाप से विकराल राक्षसी बनी ताड़का का क्रूर आतंक • सहस्र हाथियों के समान अपार शारीरिक बल • जो भी वन में जाता, उसे मारकर खा जाती • सुंदर जनपद उजड़कर 'ताड़का वन' कहलाया • पुत्र: मारीच और सुबाहु (अत्यंत मायावी) • संपूर्ण क्षेत्र में मानव-शून्य सन्नाटा ★ आतंक के अंत का समय निकट आया विश्वामित्र का आदेश व धनुष टंकार • मुनि का आदेश: "स्त्री-वध का संकोच मत करो" • प्रजा-रक्षा व लोक-कल्याण ही क्षत्रिय का धर्म • श्रीराम ने गांडीव धनुष की प्रत्यंचा खींची धनुष की भयंकर टंकार टंकार की गूँज से दिशाएँ दहल उठीं क्रोध से अंधी होकर ताड़का गर्जते हुए दौड़ी • ताड़का ने पत्थरों और पेड़ों की वर्षा की • लक्ष्मण ने बाण-वर्षा से पत्थरों को आकाश में काटा • दोनों भाइयों का अद्वितीय शौर्य एवं समन्वय ★ ताड़का का मायावी रूप विफल हुआ ताड़का-वध एवं वन की मुक्ति • सूर्यास्त का समय निकट था (असुर बल बढ़ता) • श्रीराम ने शब्दभेदी बाण का संधान किया तीक्ष्ण बाण का अचूक प्रहार बाण सीधे ताड़का की छाती में लगा चीत्कार करते हुए ताड़का धराशायी होकर निष्प्राण हुई • आकाश से देवताओं द्वारा पुष्प-वर्षा • ताड़का वन का भय सदा के लिए समाप्त हुआ • विश्वामित्र ने अत्यंत प्रसन्न होकर राम को छाती से लगाया • श्रीराम के लोक-रक्षक स्वरूप का प्रथम प्रमाण ★ सिद्धाश्रम की राह निष्कंटक हुई 3 सिद्धाश्रम का पावन सिद्ध-यज्ञ, दिव्य अस्त्रों की दीक्षा एवं मारीच-सुबाहु संग्राम सौ से अधिक दिव्य अस्त्र • ताड़का-वध से मुनि अत्यंत प्रमुदित • राम को अपनी समस्त गुप्त अस्त्र-विद्याएँ सौंपीं • आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, वायव्यास्त्र, ब्रह्मास्त्र अस्त्र प्रयोग एवं संहार की विधि • अस्त्र का आह्वान (मंत्र द्वारा चलाना) • संहार विधि (अस्त्र को पुनः शांत करना) • राम ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक विद्याएँ ग्रहण कीं • लक्ष्मण को भी इन विद्याओं में सहभागी बनाया ★ सिद्धाश्रम में प्रवेश एवं यज्ञ की तैयारी छह दिनों का अखंड पहरा • मुनि का मौन-व्रत एवं यज्ञ-दीक्षा आरंभ • विश्वामित्र छह दिनों तक मौन रहे • राम और लक्ष्मण ने पलक तक नहीं झपकाई अतुलनीय कर्तव्य-परायणता • दिन-रात हाथों में धनुष ताने सजग खड़े रहे • न भूख की चिंता, न निद्रा का लेश • पाँच दिन शांतिपूर्वक व्यतीत हुए • छठे दिन अंतिम पूर्णाहुति का समय आया ★ आकाश में राक्षसों की अचानक गर्जना मारीच व सुबाहु का अंत • राक्षसों द्वारा रक्त-माँस की वर्षा श्रीराम का रणनीतिक बाण-प्रहार 1. बिना फल वाला बाण (मानवास्त्र) $ ightarrow$ मारीच पर मारीच 100 योजन दूर समुद्र तट पर जा गिरा (जीवित बचा) 2. आग्नेयास्त्र $ ightarrow$ सुबाहु के सीने में (भस्म हुआ) • लक्ष्मण ने बाणों से शेष सेना को नष्ट किया • यज्ञ निर्विघ्न संपन्न, ऋषियों में जय-जयकार विश्वामित्र का संकल्प पूर्ण हुआ अब मिथिला के धनुष-यज्ञ का आह्वान ★ अगला गंतव्य: मिथिला नगरी (जनकपुर) 4 मिथिला (जनकपुर) में प्रवेश, राजा जनक का स्वागत एवं शिव-धनुष की कठिन प्रतिज्ञा मिथिला आगमन एवं जनक की विस्मृति • सिद्धाश्रम से मुनि दल सहित गंगा पार कर मिथिला पहुँचना • विदेहराज जनक द्वारा विश्वामित्र की चरण-वंदना • दोनों सुंदर व सुकुमार बालकों को देखकर जनक विस्मित: "हे मुनिवर! ये दोनों तेजस्वी किशोर कौन हैं?" "इन्हें देखकर मेरा विरक्त मन भी वात्सल्य से भर उठा है" मुनि: "ये अयोध्या नरेश दशरथ के सुपुत्र राम और लक्ष्मण हैं" • सुंदर उपवन में ठहराव; नगरवासियों में राजकुमारों के दर्शन की उत्कंठा • विश्वामित्र का वास्तविक उद्देश्य: शिव-धनुष का दर्शन कराना ★ जनकपुर में स्वयंवर की पूर्व-संध्या भगवान शिव का पिनाक धनुष एवं जनक की प्रतिज्ञा • शिव-धनुष की विशेषता: • भगवान शिव द्वारा परशुराम और जनक के पूर्वजों को प्रदत्त • आठ पहियों वाले विशाल लोहे के संदूक में रखा जाता था • कई सौ बलिष्ठ पुरुष मिलकर इसे खींचकर लाते थे राजा जनक की कठोर प्रतिज्ञा (सीता-स्वयंवर) "जो वीर इस शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा," "उसी के साथ मेरी अयोनिजा पुत्री सीता का विवाह होगा।" • बड़े-बड़े राजा, रावण और बाणासुर इसे हिला तक न सके • जनक की हताशा: "क्या पृथ्वी वीरों से शून्य हो गई है?" ★ विश्वामित्र की रहस्यमयी मुस्कान एवं योजना 5 धनुष-भंग, सीता-जयमाला, अयोध्या से बारात का आगमन एवं चारों भाइयों का पावन विवाह धनुष-भंग का पराक्रम • मुनि की आज्ञा: "उठो राम! संताप हरो" • राम सहज भाव से आगे बढ़े • एक हाथ से भारी शिव-धनुष उठा लिया धनुष का बीच से टूटना जैसे ही डोरी खींचकर प्रत्यंचा चढ़ाई, धनुष वज्र-समान ध्वनि के साथ टूट गया! • संपूर्ण ब्रह्मांड में ध्वनि गूँज उठी • राजा जनक का संताप मिटा, हर्षोल्लास ★ सीता जी ने राम को वरमाला पहनाई अयोध्या से बारात का आगमन • जनक के दूत अयोध्या पहुँचे • राजा दशरथ की आँखों में हर्ष के आँसू • महाराज दशरथ, भरत, शत्रुघ्न सहित विशाल बारात का जनकपुर आगमन • हाथी, घोड़े, रथ और चतुरंगिणी सेना • कुलगुरु वशिष्ठ व राजपुरोहितों का संग • जनकपुर में अभूतपूर्व स्वागत व सत्कार • दो महान राजवंशों (रघु व विदेह) का मिलन ★ चारों राजकुमारों के परिणय की योजना चारों भाइयों का विवाह संबंध • जनक का भव्य चतुर्मुखी प्रस्ताव: 1. श्री राम $\leftrightarrow$ सीता (जनक की ज्येष्ठ पुत्री) 2. लक्ष्मण $\leftrightarrow$ उर्मिला (जनक की कनिष्ठ पुत्री) 3. भरत $\leftrightarrow$ मांडवी (कुशध्वज की पुत्री) 4. शत्रुघ्न $\leftrightarrow$ श्रुतकीर्ति (कुशध्वज की पुत्री) • वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य पाणिग्रहण संस्कार • वधुओं सहित बारात सानंद अयोध्या लौटी • अयोध्या में दीपमाला एवं अनंत उत्सव ★ अध्याय 3 'दो वरदान' का मार्ग प्रशस्त TargetExams CISCE Class 6 Hindi Study Material | बाल रामकथा: जंगल और जनकपुर | 100% Comprehensive Gold Standard

1.1 पाठ परिचय एवं कथा का नया मोड़

प्रस्तुत अध्याय 'जंगल और जनकपुर' पूरक पाठ्यपुस्तक 'बाल रामकथा' का दूसरा महत्वपूर्ण अध्याय है। यह आख्यान महर्षि वाल्मीकि रचित 'रामायण' और गोस्वामी तुलसीदास रचित 'रामचरितमानस' के बालकाण्ड की अत्यंत रोमांचकारी, पराक्रमपूर्ण एवं दिव्य घटनाओं का सुगम गद्य रूपांतरण है, जिसे लेखक मधुकर उपाध्याय ने सरल बाल-सुलभ शैली में प्रस्तुत किया है।

प्रथम अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार महर्षि विश्वामित्र के साथ सोलह वर्षीय किशोर राम और लक्ष्मण अयोध्या के राजमहलों को छोड़कर वन-गमन के लिए निकले। प्रस्तुत अध्याय इस यात्रा के दो मुख्य पड़ावों—'जंगल' (सिद्धाश्रम में यज्ञ-रक्षा एवं ताड़का, सुबाहु का वध) और 'जनकपुर' (मिथिला में शिव-धनुष भंग एवं सीता-स्वयंवर)—को एक सूत्र में पिरोता है।

1.2 सरयू तट पर प्रथम रात्रि विश्राम

अयोध्या की प्राचीर पार कर महर्षि विश्वामित्र आगे-आगे तीव्र गति से डग भर रहे थे। उनके ठीक पीछे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और उनके पीछे सजग प्रहरी की भाँति धनुष ताने लक्ष्मण चल रहे थे। तीनों दिनभर पवित्र सरयू नदी के सुरम्य किनारे-किनारे दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते रहे।

  • राजसी सुखों का सहज त्याग: जो राजकुमार महलों में मखमली और रेशमी बिछौनों पर सोते थे, उन्होंने सरयू तट पर सूखी घास, तिनकों और पत्तों की शैय्या बनाकर बिना किसी संकोच या शिकायत के सहज विश्राम किया।
  • सूर्यास्त की वेला: जब संध्या की लालिमा सरयू के जल में घुलकर उसे सिंदूरी बना रही थी, मुनि ने वहाँ पहला पड़ाव डाला। राजकुमारों की विनम्रता और सहनशक्ति देखकर विश्वामित्र का हृदय वात्सल्य से भर उठा।

1.3 'बला' और 'अतिबला' विद्याओं की अलौकिक दीक्षा

महर्षि विश्वामित्र ने रात्रि के शांत वातावरण में दोनों राजकुमारों को अपने समीप बुलाया। उन्होंने सरयू के पावन जल का आचमन कराकर उन्हें अपनी वर्षों की कठोर तपस्या से अर्जित दो परम गुप्त दैवीय विद्याओं की दीक्षा दी:

1. बला (Bala) विद्या

शारीरिक बल, स्फूर्ति और जीवनी-शक्ति का अक्षय स्रोत। इसके प्रभाव से भूख और प्यास की वेदना समाप्त हो जाती है तथा शरीर में कभी थकान (क्लांति) का अनुभव नहीं होता।

2. अतिबला (Atibala) विद्या

मानसिक ओज और अभेद्य सुरक्षा का कवच। इसके प्रभाव से निद्रा की अवस्था में या असावधान होने पर भी कोई मायावी राक्षस राजकुमारों पर आक्रमण नहीं कर सकता था।

विश्वामित्र ने कहा: "हे राम! इन विद्याओं के प्रभाव से तीनों लोकों में तुम्हारी बराबरी करने वाला कोई न होगा। तुम्हारा रूप, तेज और बल सदैव अक्षुण्ण रहेगा।" दोनों भाइयों ने अत्यंत श्रद्धा से यह दीक्षा ग्रहण की।

मॉड्यूल 2: सरयू-गंगा संगम, ताड़का वन का भयानक परिवेश एवं ताड़का-वध

2.1 सरयू-गंगा संगम एवं नौका द्वारा गंगा पार

प्रातःकाल उषा की पहली किरण फूटते ही विश्वामित्र ने राम को मधुर स्वर में पुकारा—"उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजेन्द्र मुखं प्रक्षालयस्व।" अर्थात 'उठो तात! प्राची दिशा में अरुणोदय हो चुका है, प्रभात संध्या का समय है।' दोनों भाइयों ने स्नान कर संध्या-वंदन किया और यात्रा पुनः आरंभ हुई।

चलते-चलते वे उस पावन स्थल पर पहुँचे जहाँ सरयू नदी का विशाल गंगा से संगम होता था। वहाँ स्थानीय नाविकों की सहायता से वे सुंदर काष्ठ-नौका द्वारा गंगा के उस पार पहुँचे। गंगा पार करते ही एक अत्यंत बीहड़ और भयानक वन आरंभ हो गया।

2.2 मलद और करूष का विनाश: 'ताड़का वन' का अतीत

उस घने जंगल में दिन के समय भी सूर्य की किरणें धरती तक नहीं पहुँच पाती थीं। विशालकाय वृक्षों की शाखाएँ एक-दूसरे से गुंथी हुई थीं। चारों ओर से हिंसक जन्तुओं की भयानक दहाड़ और सूखी पत्तियों की चरमराहट से सन्नाटा टूटता था।

सुंदर जनपदों का श्मशान बनना:

• मलद और करूष: महर्षि विश्वामित्र ने बताया कि पूर्व समय में यहाँ 'मलद' और 'करूष' नामक दो अत्यंत समृद्ध, शस्य-श्यामला और सुंदर जनपद बसे हुए थे।

• सुकेतु यक्ष की पुत्री ताड़का: सुकेतु यक्ष को ब्रह्मा के वरदान से एक सहस्र हाथियों के बल वाली पुत्री ताड़का प्राप्त हुई थी। उसका विवाह झंझ नामक राक्षस से हुआ था।

• अगस्त्य मुनि का शाप: जब झंझ ने अगस्त्य मुनि पर आक्रमण किया तो मुनि ने उसे भस्म कर दिया। प्रतिशोध में ताड़का मुनि को मारने दौड़ी, तब मुनि ने उसे शाप देकर अत्यंत कुरूप, विकराल और नरभक्षी राक्षसी बना दिया।

ताड़का के आतंक से सुंदर नगर वीरान हो गए। जो भी व्यक्ति उस वन में प्रवेश करता, ताड़का उसे मार डालती थी। इसी कारण संपूर्ण क्षेत्र मानव-विहीन होकर 'ताड़का वन' कहलाने लगा।

2.3 धनुष-टंकार एवं श्रीराम द्वारा ताड़का-वध

महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को क्षत्रिय धर्म का बोध कराते हुए कड़ा निर्देश दिया: "हे रघुनंदन! स्त्री समझकर इसके वध में संकोच मत करो। जो पापिनी समस्त प्रजा, धर्म और ऋषियों के विनाश पर तुली हो, उसका संहार करना राजा का परम कर्तव्य है।"

1. प्रत्यंचा की भीषण टंकार: श्रीराम ने अपने धनुष पर डोरी चढ़ाकर कान तक खींचकर टंकार की। उस भयंकर नाद से पूरा वन थर्रा उठा।

2. ताड़का का प्रलयंकारी आक्रमण: टंकार सुनते ही ताड़का क्रोध से अंधी होकर गर्जती हुई दौड़ी। उसने आकाश से शिलाखंडों और उखड़े हुए विशाल वृक्षों की वर्षा कर दी।

3. लक्ष्मण का पराक्रम: वीर लक्ष्मण ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उन शिलाखंडों को आकाश में ही टुकड़े-टुकड़े कर दिया।

4. अचूक बाण से संहार: सूर्यास्त का समय निकट था, जब राक्षसों की आसुरी शक्ति दोगुनी हो जाती है। श्रीराम ने बिना विलंब किए एक शब्दभेदी अचूक बाण का संधान किया। बाण सीधे ताड़का के वक्षस्थल में लगा और वह चीत्कार करती हुई धराशायी होकर निष्प्राण हो गई।

ताड़का के मरते ही आकाश से देवताओं ने पुष्प-वृष्टि की। वह बीहड़ वन भयमुक्त हो गया और महर्षि विश्वामित्र ने अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीराम का मस्तक चूम लिया।

मॉड्यूल 3: दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की दीक्षा एवं सिद्धाश्रम में सिद्ध-यज्ञ का आरंभ

3.1 सौ से अधिक दिव्य अस्त्रों का हस्तांतरण

ताड़का-वध के पश्चात उस शांत हो चुके वन में रात्रि बिताकर अगली सुबह महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम के अगाध पराक्रम और विनय से प्रसन्न होकर उन्हें ब्रह्मांड के समस्त गुप्त दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए।

विश्वामित्र ने श्रीराम को निम्नलिखित प्रमुख अस्त्र-शस्त्रों की दीक्षा दी:

प्राकृतिक व दैवीय अस्त्र

आग्नेयास्त्र (अग्नि-बाण), वरुणास्त्र (जल-बाण), वायव्यास्त्र (प्रचंड वायु), सूर्य-अस्त्र और चन्द्र-अस्त्र।

परम संहारक चक्र व बाण

विष्णुचक्र, कालचक्र, ऐन्द्रास्त्र, ब्रह्मास्त्र तथा मायावी शक्तियों को नष्ट करने वाले विशिष्ट मानवास्त्र।

मुनि ने श्रीराम को न केवल इन अस्त्रों को चलाने (आह्वान) का मंत्र सिखाया, अपितु उनका संहार करने (वापस बुलाकर शांत करने) की विधि भी समझाई। श्रीराम ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर इन अस्त्रों को प्रणाम किया और लक्ष्मण को भी इनका सहभागी बनाया।

3.2 सिद्धाश्रम में प्रवेश एवं सिद्ध-यज्ञ का अनुष्ठान

इसके पश्चात विश्वामित्र दोनों राजकुमारों को लेकर अपने पावन तपोवन 'सिद्धाश्रम' पहुँचे। आश्रम के समस्त मुनियों, तपस्वियों और ब्रह्मचारियों ने ताड़का-वध का समाचार सुनकर दोनों राजकुमारों का पुष्प-हारों और वेदमंत्रों से अपूर्व स्वागत किया।

अगली ही सुबह से महर्षि विश्वामित्र का सिद्ध-यज्ञ आरंभ हो गया। यह अनुष्ठान लगातार छह दिनों तक चलना था। दीक्षा लेते ही महर्षि विश्वामित्र ने कड़ा मौन-व्रत धारण कर लिया, जिसके अनुसार वे छह दिनों तक न तो बोल सकते थे और न ही क्रोध कर सकते थे।

3.3 राम-लक्ष्मण का छह दिनों का अखंड पहरा

यज्ञशाला और ऋषियों की सुरक्षा का संपूर्ण दायित्व अब राम और लक्ष्मण के सुकुमार कंधों पर था। दोनों भाइयों ने कर्तव्य-निष्ठा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया:

  • बिना पलक झपकाए पहरा: छह दिनों और रातों तक दोनों राजकुमारों ने निद्रा का सर्वथा त्याग कर दिया। वे हाथों में धनुष-बाण लिए यज्ञवेदी के चारों ओर लगातार चक्कर लगाते रहे।
  • अथक परिश्रम: 'बला' और 'अतिबला' विद्याओं के प्रभाव से उन्हें भूख, प्यास या थकान की तनिक भी अनुभूति नहीं हुई। उनके मुख-मंडल पर एक दिव्य तेज और गंभीरता बनी रही।
  • पाँच दिनों की शांति: पाँच दिनों तक यज्ञ निर्विघ्न चलता रहा और आश्रम में शांति छाई रही, किंतु दोनों भाई जानते थे कि असली परीक्षा अंतिम दिन की पूर्णाहुति के समय होगी।

मॉड्यूल 4: मारीच-सुबाहु का आक्रमण, यज्ञ-रक्षा एवं सिद्धाश्रम की मुक्ति

4.1 छठे दिन की पूर्णाहुति एवं आकाश में आसुरी गर्जना

पाँच दिनों की कठिन परीक्षा शांतिपूर्वक संपन्न हो चुकी थी। छठे दिन प्रातःकाल जब महर्षि विश्वामित्र और अन्य ऋत्विज यज्ञ की अंतिम पूर्णाहुति की तैयारी कर रहे थे, तभी अचानक आकाश में भयानक गड़गड़ाहट होने लगी। दिन के उजाले में घने काले बादल छा गए और वायु में दुर्गंध फैल गई।

अपनी माता ताड़का के वध के प्रतिशोध की ज्वाला में जलते हुए उसके दो मायावी पुत्र—मारीच और सुबाहु— एक विशाल राक्षसी सेना के साथ सिद्धाश्रम पर टूट पड़े। वे यज्ञवेदी को अपवित्र करने के लिए आकाश से रक्त, माँस और अस्थियों की भीषण वर्षा करने लगे।

4.2 श्रीराम का सामरिक कौशल: मारीच व सुबाहु का दमन

श्रीराम ने रंचमात्र भी घबराए बिना अत्यंत शांत और रणनीतिक भाव से अपने तरकश से बाण निकाले:

1. मारीच पर 'शीतेषु' (मानवास्त्र) का प्रहार: श्रीराम दिव्य दृष्टि से जानते थे कि मारीच का जीवन भावी ईश्वरीय लीला (स्वर्ण-मृग प्रसंग) हेतु आवश्यक है। अतः उन्होंने बिना फल वाला (बिना नोक का) प्रचंड बाण चलाया। उस बाण के असीम आघात से मारीच हवा में उड़ता हुआ सौ योजन (लगभग 800-1200 किमी) दूर दक्षिण सागर के तट पर जा गिरा। उसका अहंकार टूट गया और वह मूर्च्छित होकर भागा।

2. सुबाहु पर आग्नेयास्त्र का प्रहार: श्रीराम ने दूसरा बाण 'आग्नेयास्त्र' संधान किया। यह प्रज्वलित बाण सीधे सुबाहु की छाती में लगा और वह वहीं जलकर भस्म हो गया।

3. लक्ष्मण द्वारा सेना का संहार: वीर लक्ष्मण ने अपने तीक्ष्ण बाणों की सघन वर्षा से आकाश को पाट दिया और भागती हुई शेष राक्षसी सेना का समूल नाश कर दिया।

यज्ञशाला में शांति लौट आई। महर्षि विश्वामित्र ने निर्विघ्न पूर्णाहुति दी और अपना मौन-व्रत समाप्त किया। ऋषियों ने जयघोष करते हुए दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिया। महर्षि विश्वामित्र का वर्षों पुराना सिद्ध-यज्ञ अंततः सफल हुआ।

मॉड्यूल 5: मिथिला (जनकपुर) की ओर प्रस्थान, राजा जनक का स्वागत एवं शिव-धनुष का रहस्य

5.1 जनकपुर (मिथिला) की ओर प्रस्थान एवं नगर-सौंदर्य

यज्ञ संपन्न होने के पश्चात महर्षि विश्वामित्र ने दोनों भाइयों से कहा: "हे राम और लक्ष्मण! विदेहराज महाराज जनक ने मिथिला में एक विशाल धनुष-यज्ञ का अनुष्ठान रखा है। वहाँ भगवान शिव का एक अद्भुत और प्राचीन धनुष रखा है। हम सब उस शिव-धनुष का दर्शन करने जनकपुर चलेंगे।"

गंगा पार कर जब मुनि-मंडली मिथिला पहुँची, तो नगर का पावन, शांत और सुसंस्कृत वातावरण देखकर सभी मुग्ध हो गए। मिथिला केवल वैभवशाली ही नहीं, अपितु तत्त्वज्ञान, दर्शन और धर्मचर्चा की विश्व-प्रसिद्ध नगरी थी।

5.2 राजा जनक की अगवानी एवं राजकुमारों पर मुग्ध होना

विश्वामित्र के आगमन का समाचार मिलते ही विदेहराज राजा जनक अपने मंत्रियों और कुलगुरु शतानंद के साथ नंगे पाँव अगवानी हेतु दौड़े आए। जनक ने मुनि के चरणों में शीश नवाया और जब उनकी दृष्टि राम और लक्ष्मण पर पड़ी, तो वे स्तब्ध रह गए:

विदेहराज जनक का आश्चर्य:

"हे मुनिवर! ये दोनों अलौकिक, तेजस्वी और सुंदर किशोर कौन हैं? यद्यपि मैं 'विदेह' (देह-भाव से परे ज्ञानी) हूँ, किंतु इन्हें देखकर मेरा मन असीम वात्सल्य और प्रेम से द्रवित हो रहा है।" विश्वामित्र ने मुस्कुराते हुए परिचय कराया: "ये अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं। इन्होंने मेरे यज्ञ की रक्षा कर राक्षसों का संहार किया है।"

5.3 भगवान शिव का पिनाक धनुष एवं जनक की भीषण प्रतिज्ञा

राजा जनक ने मुनि और राजकुमारों को सुंदर उपवन में ठहराया और शिव-धनुष का रहस्य उद्घाटित किया:

  • शिव-धनुष (पिनाक): यह धनुष साक्षात देवाधिदेव महादेव का था, जो जनक के पूर्वज देवरात को धरोहर स्वरूप सौंपा गया था। यह धनुष इतना भारी था कि इसे आठ पहियों वाले लोहे के संदूक में रखा गया था, जिसे कई सौ बलिष्ठ पुरुष मिलकर खींचते थे।
  • सीता की बाल्य-लीला: जनक ने बताया कि उनकी अयोनिजा (भूमि से प्रकट) पुत्री सीता ने बाल्यकाल में इस भारी धनुष को सहज ही एक हाथ से उठा लिया था।
  • कठोर स्वयंवर प्रतिज्ञा: तभी जनक ने प्रण किया था: "जो वीर इस शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ सीता का विवाह होगा।"
  • राजाओं की विफलता: देश-विदेश के बड़े-बड़े राजा, रावण और बाणासुर जैसे योद्धा भी उस धनुष को तिल-भर हिला न सके। जनक ने हताश होकर कहा: "क्या यह पृथ्वी वीरों से खाली हो गई है?"

मॉड्यूल 6: धनुष-यज्ञ राजसभा, श्रीराम द्वारा शिव-धनुष का सहज भंजन एवं सीता-स्वयंवर

6.1 राजसभा का दृश्य एवं विश्वामित्र का आदेश

अगले दिन विशाल राजसभा में स्वयंवर का आयोजन हुआ। आठ पहियों वाले लोहे के विशाल संदूक को खींचकर कई सौ सैनिक सभा के मध्य लाए। संदूक खोला गया, तो उसमें भगवान शिव का विशाल, प्राचीन और अजेय धनुष चमक रहा था।

राजा जनक के विलाप और संपूर्ण सभा में छाई निराशा को देखकर महर्षि विश्वामित्र ने अत्यंत शांत और गरिमामय स्वर में श्रीराम को सम्बोधित किया: "उत्तिष्ठ राम भञ्ज चापं, जनकस्य संतापं हर।" अर्थात "उठो राम! इस शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाओ और राजा जनक का संताप दूर करो।"

6.2 श्रीराम द्वारा धनुष उठाना एवं धनुष-भंग का रोमांच

गुरु की आज्ञा पाते ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अत्यंत विनम्रता से उठे। उन्होंने मुनि विश्वामित्र के चरण स्पर्श किए और मंद गति से धनुष की ओर बढ़े:

1. सहजता से उठाना: श्रीराम ने मानो कोई पुष्प की माला हो, उस भारी शिव-धनुष को एक ही हाथ से अनायास ऊपर उठा लिया। संपूर्ण सभा विस्मय से अवाक रह गई।

2. प्रत्यंचा चढ़ाना: श्रीराम ने धनुष के एक सिरे को धरती पर टिकाया और डोरी को खींचकर जैसे ही प्रत्यंचा चढ़ाने लगे, धनुष पर अत्यधिक दबाव पड़ा।

3. वज्र-समान भीषण ध्वनि: जैसे ही डोरी कान तक खींची गई, वह प्राचीन धनुष बीच से तड़ककर दो टुकड़ों में टूट गया! धनुष टूटने की आवाज इतनी भयानक थी मानो एक साथ सैकड़ों आकाशीय बिजलियाँ गिर पड़ी हों। संपूर्ण दिशाएँ काँप उठीं।

6.3 सीता-स्वयंवर एवं जयमाला अर्पण

धनुष टूटते ही राजा जनक की आँखों से हर्ष के अश्रु बह निकले। उनकी कठोर प्रतिज्ञा पूर्ण हुई। राजमहलों से सुंदर वस्त्राभूषणों में सजी राजकुमारी सीता हाथों में सुगंधित जयमाला लिए सखियों के संग सभा में पधारीं।

सीता जी ने परम लज्जा, आदर और असीम आनंद के साथ वरमाला श्रीराम के गले में डाल दी। आकाश से देवताओं ने नगाड़े बजाए और पुष्पों की वर्षा की। संपूर्ण मिथिला नगरी "श्रीराम-जानकी की जय" के नारों से गूँज उठी।

मॉड्यूल 7: अयोध्या से बारात का आगमन, चारों भाइयों का विवाह एवं पावन संदेश

7.1 अयोध्या में शुभ समाचार एवं बारात का प्रस्थान

महर्षि विश्वामित्र की अनुमति पाकर राजा जनक ने तीव्रगामी दूतों को अयोध्या भेजा। जब अयोध्या में यह समाचार पहुँचा कि राम ने शिव-धनुष तोड़कर सीता का वरण कर लिया है, तो राजा दशरथ और तीनों रानियों की प्रसन्नता का पारावार न रहा।

महाराज दशरथ ने बिना विलंब किए अपने अनुज पुत्रों—भरत और शत्रुघ्न—मंत्रियों, कुलगुरु वशिष्ठ और विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ जनकपुर के लिए प्रस्थान किया। बारात के मिथिला पहुँचने पर राजा जनक ने उनका ऐतिहासिक और अभूतपूर्व स्वागत किया।

7.2 चारों भाइयों का सामूहिक चतुर्मुखी विवाह

राजा जनक ने महाराज दशरथ के समक्ष एक अत्यंत पावन और भव्य प्रस्ताव रखा कि उनके कुल की चार कन्याएँ हैं और दशरथ के चार सुयोग्य पुत्र हैं, अतः चारों भाइयों का परिणय एक ही मंडप में संपन्न हो:

राजकुमार (वर) राजकुमारी (वधू) संबंध व परिचय
1. श्री राम सीता (जानकी) राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री (भूमि-सुता)
2. लक्ष्मण उर्मिला राजा जनक की कनिष्ठ पुत्री
3. भरत मांडवी जनक के अनुज कुशध्वज (सांकाश्य नरेश) की पुत्री
4. शत्रुघ्न श्रुतकीर्ति कुशध्वज की कनिष्ठ पुत्री

वैदिक विधि-विधान, अग्नि-साक्षी और सप्तपदी के साथ चारों युगलों का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ।

7.3 सानंद अयोध्या वापसी एवं अध्याय का सार

विवाह के उपरांत अपार उपहार, गज-रथ और वधुओं के साथ बारात अयोध्या लौटी। अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को दीपकों से सजाया, घर-घर तोरण बाँधे और वधुओं का भव्य स्वागत किया। माताओं ने अपनी बहुओं की आरती उतारी।

पाठ का दार्शनिक संदेश:

यह अध्याय यह सिखाता है कि जो व्यक्ति गुरु के प्रति समर्पित, धर्म के प्रति निष्ठावान और आचरण में विनम्र होता है, विधाता उसके मार्ग के समस्त संकटों (ताड़का, सुबाहु) को दूर कर उसे सर्वोच्च यश और सिद्धि (धनुष-भंग व सीता-वरण) प्रदान करता है। यहीं से बाल रामकथा के अगले अध्याय 'दो वरदान' की पृष्ठभूमि तैयार होती है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
महर्षि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को कौन-सी दो दिव्य विद्याएँ सिखाईं और उनके क्या लाभ थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1. विद्याओं के नाम: सरयू तट पर प्रथम रात्रि विश्राम के समय महर्षि विश्वामित्र ने दोनों राजकुमारों को 'बला' और 'अतिबला' नामक दो गुप्त दैवीय विद्याओं की दीक्षा दी।

2. इन विद्याओं के लाभ:

  • इन विद्याओं के प्रभाव से कभी भूख और प्यास की पीड़ा नहीं सताती थी।
  • अत्यधिक परिश्रम के उपरांत भी शरीर में थकान (क्लांति) का अनुभव नहीं होता था।
  • निद्रा की अवस्था में या असावधान रहने पर भी कोई मायावी शत्रु उन पर आक्रमण करके उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकता था।
उदाहरण 2
मलद और करूष जनपदों का क्या अतीत था और वे वीरान होकर 'ताड़का वन' कैसे बन गए?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1. जनपदों का अतीत: गंगा पार स्थित 'मलद' और 'करूष' पूर्व काल में अत्यंत रमणीक, समृद्ध, शस्य-श्यामला और घनी आबादी वाले सुंदर जनपद थे। यहाँ सर्वत्र शांति और संपन्नता थी।

2. ताड़का का प्रादुर्भाव एवं शाप: सुकेतु यक्ष की पुत्री ताड़का में सहस्र हाथियों का बल था। उसके पति झंझ के वध के पश्चात जब ताड़का ने अगस्त्य मुनि पर आक्रमण किया, तो मुनि ने उसे शाप देकर अत्यंत कुरूप, विकराल और नरभक्षी राक्षसी बना दिया।

3. 'ताड़का वन' बनना: ताड़का ने मलद और करूष में भयानक उत्पात मचाया। उसने बस्तियों को उजाड़ दिया और जो भी मनुष्य उस वन में प्रवेश करता, उसे मारकर खा जाती। उसके इसी आतंक से वे सुंदर जनपद उजड़कर वीरान हो गए और संपूर्ण क्षेत्र 'ताड़का वन' कहलाने लगा।

उदाहरण 3
ताड़का-वध के समय महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को स्त्री-वध के संकोच के संबंध में क्या उपदेश दिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

ताड़का-वध के समय जब श्रीराम के मन में स्त्री पर बाण चलाने का स्वाभाविक संकोच हुआ, तब महर्षि विश्वामित्र ने उन्हें क्षत्रिय राजधर्म का उपदेश देते हुए कहा:

  • स्त्री-वध संकोच का त्याग: 'हे रघुनंदन! यह सोचकर कि यह एक स्त्री है, इसके वध में तनिक भी संकोच मत करो।'
  • प्रजा-रक्षा ही परम धर्म: क्षत्रिय और राजा का सर्वोपरि कर्तव्य प्रजा, धर्म और संतों की रक्षा करना है। जो पापिनी समस्त लोकों के विनाश पर तुली हो, उसके संहार में कोई पाप नहीं लगता।
  • पूर्व राजाओं का दृष्टांत: प्राचीन काल में भी धर्म और लोक-कल्याण की रक्षा हेतु अनेक राजाओं ने आततायी और क्रूर स्त्रियों का वध किया था। अतः बिना झिझक इस अधर्मिणी का अंत करो।
उदाहरण 4
सिद्धाश्रम में यज्ञ की पूर्णाहुति के समय मारीच और सुबाहु पर श्रीराम ने किस प्रकार और कौन-से बाणों से प्रहार किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1. राक्षसों का आक्रमण: छह दिनों के सिद्ध-यज्ञ के अंतिम दिन जब महर्षि विश्वामित्र मौन रहकर पूर्णाहुति दे रहे थे, तभी ताड़का के पुत्र मारीच और सुबाहु राक्षसी सेना के साथ यज्ञवेदी पर रक्त-माँस बरसाने लगे।

2. मारीच पर रणनीतिक प्रहार:

  • श्रीराम जानते थे कि मारीच का जीवित रहना भावी ईश्वरीय योजना (रावण-वध हेतु स्वर्ण-मृग प्रसंग) के लिए आवश्यक है।
  • अतः राम ने मारीच पर बिना फल वाला (बिना नोक का) 'शीतेषु' (मानवास्त्र) चलाया।
  • उस प्रचंड बाण के आघात से मारीच हवा में उड़ता हुआ सौ योजन दूर दक्षिण समुद्र के तट पर जा गिरा और मूर्च्छित होकर जान बचाकर भागा।

3. सुबाहु का वध: श्रीराम ने दूसरा बाण 'आग्नेयास्त्र' संधान किया, जिसने सुबाहु के वक्षस्थल को भेदकर उसे वहीं जलाकर भस्म कर दिया।

4. शेष सेना का अंत: वीर लक्ष्मण ने बाण-वर्षा से बाकी सभी उपद्रवी निशाचरों को मार गिराया और यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हुआ।

उदाहरण 5
भगवान शिव के पिनाक धनुष की क्या विशेषताएँ थीं और राजा जनक ने सीता-स्वयंवर के लिए क्या प्रतिज्ञा ली थी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1. शिव-धनुष (पिनाक) की विशेषताएँ:

  • यह साक्षात देवाधिदेव भगवान शिव का अमोघ और अत्यंत भारी धनुष था, जो जनक के पूर्वज देवरात को देवताओं द्वारा सौंपा गया था।
  • यह धनुष इतना भारी और विशाल था कि इसे लोहे के एक आठ पहियों वाले विशाल संदूक में रखा जाता था, जिसे कई सौ बलिष्ठ सैनिक मिलकर खींचते थे।
  • संसार का कोई भी वीर पुरुष, राजा, यहाँ तक कि लंकापति रावण और बाणासुर भी इसे तिल-भर हिलाने में असमर्थ रहे थे।

2. राजा जनक की स्वयंवर प्रतिज्ञा:

  • खेत जोतते समय भूमि से प्रकट हुई अयोनिजा पुत्री सीता ने बाल्यकाल में इस भारी धनुष को खेल-खेल में एक ही हाथ से उठा लिया था।
  • सीता के इस अलौकिक सामर्थ्य को देखकर राजा जनक ने प्रतिज्ञा की थी: 'जो भी शूरवीर भगवान शिव के इस धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ मेरी पुत्री सीता का विवाह होगा।'
उदाहरण 6
राजसभा में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष के भंजन की घटना का सजीव वर्णन कीजिए तथा बताइए कि अयोध्या से बारात आने के उपरांत किन चार युगलों का विवाह संपन्न हुआ?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1. श्रीराम द्वारा धनुष-भंग की घटना:

  • समस्त राजाओं की विफलता और जनक की निराशा देखकर महर्षि विश्वामित्र ने आदेश दिया: 'उठो राम! इस शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाओ और जनक का संताप दूर करो।'
  • श्रीराम अत्यंत विनम्रता से उठे, गुरु के चरण स्पर्श किए और राजसभा के मध्य पहुँचे। उन्होंने अनायास ही एक हाथ से उस भारी धनुष को कमल की नाल की भाँति उठा लिया।
  • जैसे ही श्रीराम ने धनुष के एक सिरे को भूमि पर टिकाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और डोरी को कान तक खींचा, वह प्राचीन धनुष अत्यधिक दबाव से बीच से टूटकर दो खंडों में बँट गया।
  • धनुष टूटने की भीषण वज्र-समान ध्वनि से संपूर्ण ब्रह्मांड काँप उठा। राजा जनक का संताप मिट गया और राजकुमारी सीता ने सखियों के संग आकर श्रीराम के गले में वरमाला डाल दी।

2. चारों युगलों का पावन विवाह:

अयोध्या से महाराज दशरथ के बारात लेकर आने पर राजा जनक के प्रस्ताव से चारों भाइयों का विवाह एक ही मंडप में संपन्न हुआ:

  1. श्री राम: जनक की ज्येष्ठ पुत्री सीता (जानकी) से।
  2. लक्ष्मण: जनक की कनिष्ठ पुत्री उर्मिला से।
  3. भरत: जनक के अनुज कुशध्वज (सांकाश्य नरेश) की पुत्री मांडवी से।
  4. शत्रुघ्न: कुशध्वज की कनिष्ठ पुत्री श्रुतकीर्ति से।

वैदिक रीति से संपन्न इस चतुर्मुखी विवाह के उपरांत चारों वधुओं के साथ बारात सानंद अयोध्या लौटी, जहाँ संपूर्ण नगर ने दीप जलाकर नव-दम्पतियों का स्वागत किया।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
विश्वामित्र ने सरयू नदी के तट पर पहली रात राम और लक्ष्मण को कौन-सी दो विद्याएँ सिखाईं और उनका क्या महत्व था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: विश्वामित्र ने 'बला' और 'अतिबला' नामक दो दिव्य विद्याएँ सिखाईं। इनका महत्व यह था कि इनके प्रभाव से व्यक्ति को कभी थकान नहीं होती, भूख-प्यास नहीं सताती, तथा निद्रा या असावधानी की अवस्था में भी कोई शत्रु या राक्षस उस पर प्रहार नहीं कर सकता।
थकान, भूख-प्यास और निद्रा में सुरक्षा से संबंधित विद्याएँ।
2
'ताड़का वन' का अतीत क्या था? वह सुंदर प्रदेश भयानक जंगल में कैसे परिवर्तित हो गया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ताड़का वन का अतीत अत्यंत गौरवशाली और सुंदर था। पहले वहाँ 'मलद' और 'करूष' नाम के दो अत्यंत समृद्ध, सुंदर और हरे-भरे जनपद बसे हुए थे। परंतु जब वहाँ राक्षसी ताड़का का प्रवेश हुआ, तो उसने अपनी क्रूरता, नरसंहार और पत्थरों की वर्षा से पूरी प्रजा को भगा दिया, जिससे वे संपन्न नगर वीरान और भयानक ताड़का वन में बदल गए।
मलद और करूष जनपद तथा राक्षसी ताड़का का भय।
3
श्रीराम ने राक्षसी ताड़का का वध किस प्रकार किया और इसके पीछे उनका क्या धर्म-संकट था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: श्रीराम के समक्ष एक स्त्री (राक्षसी) पर बाण चलाने का संकोच था, किंतु महर्षि विश्वामित्र ने समझाया कि लोक-कल्याण और प्रजा-रक्षा के लिए दुराचारी का वध करना राजा का परम धर्म है। महर्षि की आज्ञा मिलते ही श्रीराम ने अपने धनुष की टंकार की और जैसे ही ताड़का क्रोध में दौड़ी, राम ने अचूक बाण से उसके हृदय को भेदकर उसका संहार कर दिया।
स्त्री पर प्रहार का संकोच और महर्षि की आज्ञा।
4
सिद्धाश्रम के महायज्ञ में मारीच और सुबाहु के आक्रमण के समय श्रीराम ने उन दोनों के विरुद्ध कौन-से अस्त्रों का प्रयोग किया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: श्रीराम ने मारीच पर बिना फल वाला 'मानवास्त्र' (शीत बाण) चलाया, जिसके प्रचंड वेग से मारीच सौ योजन दूर समुद्र किनारे जा गिरा और मूर्छित हुआ, जिससे उसकी जान तो बच गई परंतु वह युद्ध छोड़कर भाग गया। वहीं सुबाहु पर श्रीराम ने 'आग्नेयास्त्र' का संधान किया, जिससे वह वहीं जलकर भस्म हो गया।
मानवास्त्र और आग्नेयास्त्र का भिन्न उपयोग।
5
मिथिला के राजा जनक ने सीता के विवाह हेतु क्या कठिन प्रतिज्ञा रखी थी और शिव-धनुष की क्या विशेषता थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: राजा जनक ने प्रतिज्ञा की थी कि जो भी वीर पुरुष भगवान शिव के विशाल 'पिनाक' धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा, उसी के साथ उनकी विदेह-नंदिनी पुत्री सीता का विवाह संपन्न होगा। यह धनुष लोहे के आठ पहियों वाले विशाल संदूक में सुरक्षित था, जिसे दो सौ बलिष्ठ सैनिक बड़ी कठिनाई से खींचकर लाते थे और बड़े-बड़े पराक्रमी राजा इसे तिल भर भी हिला नहीं पाते थे।
आठ पहियों का संदूक, पिनाक धनुष और प्रत्यंचा चढ़ाने की शर्त।
6
जनकपुर में किन-किन राजकुमारों का विवाह किन राजकुमारियों के साथ संपन्न हुआ? चारों जोड़ियों का स्पष्ट उल्लेख कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जनकपुर में रघुकुल के चारों राजकुमारों का विवाह संपन्न हुआ: 1. श्रीराम का विवाह राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री सीता से; 2. लक्ष्मण का विवाह राजा जनक की छोटी पुत्री उर्मिला से; 3. भरत का विवाह राजा जनक के छोटे भाई कुशध्वज की ज्येष्ठ पुत्री मांडवी से; तथा 4. शत्रुघ्न का विवाह कुशध्वज की कनिष्ठ पुत्री श्रुतकीर्ति से हुआ।
जनक और कुशध्वज की दो-दो पुत्रियाँ।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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