ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 17
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
जंगल और जनकपुर (Bal Ram Katha)
सरयू तट की प्रथम रात्रि एवं 'बला-अतिबला' विद्या की पावन दीक्षा:
प्रस्तुत अध्याय 'जंगल और जनकपुर' पूरक पाठ्यपुस्तक 'बाल रामकथा' का द्वितीय एवं अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह कथा मूल रूप से महर्षि वाल्मीकि रचित 'रामायण' तथा गोस्वामी तुलसीदास रचित 'रामचरितमानस' पर आधारित है, जिसका अत्यंत सरस, रोचक और प्रवाहपूर्ण संक्षेपण लेखक मधुकर उपाध्याय द्वारा किया गया है। कथा का आरंभ अयोध्या से वन की ओर प्रस्थान के सजीव दृश्य से होता है। महर्षि विश्वामित्र आगे-आगे तीव्र गति से डग भर रहे थे, उनके पीछे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और उनके पीछे सजग प्रहरी के रूप में लक्ष्मण चल रहे थे। दिनभर वे पवित्र सरयू नदी के किनारे-किनारे चलते रहे। जब संध्या की लालिमा आकाश में छा गई और सूर्यास्त का समय हुआ, तो महर्षि विश्वामित्र ने पहली बार सरयू के किनारे रात्रि-विश्राम का निर्णय लिया।
राजसी विलासों में पले-बढ़े दोनों सुकुमार राजकुमारों ने बिना किसी शिकायत के तिनकों और सूखी पत्तियों की शैय्या बनाई। विश्वामित्र राजकुमारों की सहनशीलता, अनुशासन और विनय को देखकर मन ही मन अत्यंत मुग्ध हुए। उन्होंने अत्यंत वात्सल्यपूर्वक राम और लक्ष्मण को अपने पास बैठाया और उन्हें दो अद्वितीय दैवीय विद्याओं—'बला' और 'अतिबला'—की दीक्षा दी। मुनि ने स्पष्ट किया कि इन विद्याओं को सिद्ध कर लेने के उपरांत उन्हें कभी भी भूख और प्यास का कष्ट नहीं सताएगा, घोर परिश्रम के पश्चात भी शरीर में थकान (क्लांति) का अनुभव नहीं होगा, और यदि वे निद्रा में या असावधान भी होंगे, तब भी कोई मायावी शत्रु उन पर आक्रमण करके उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकेगा। यह दीक्षा आगामी भीषण संघर्षों के लिए उनका रक्षा-कवच बनी।
सरयू-गंगा संगम एवं ताड़का वन का भयानक परिवेश:
अगली सुबह जब पूर्व दिशा में उषा की स्वर्णिम किरणें फूटीं, तो महर्षि विश्वामित्र ने अत्यंत कोमल वाणी में राम को जगाया—'उठो तात! प्राची दिशा में अरुणोदय हो चुका है, प्रातः संध्या का समय आ गया है।' दोनों भाइयों ने सरयू के पावन जल में स्नान कर गुरु वंदना की और पुनः यात्रा आरंभ की। चलते-चलते वे उस पावन स्थल पर पहुँचे जहाँ सरयू नदी का गंगा के साथ संगम होता था। वहाँ स्थानीय मल्लाहों की सहायता से उन्होंने नौका द्वारा गंगा नदी को पार किया।
गंगा पार करते ही प्रकृति का रूप अचानक भयानक हो उठा। पेड़ों की सघनता इतनी अधिक थी कि सूर्य का प्रकाश भी धरती को स्पर्श नहीं कर पाता था। दिन के समय भी गहरा अंधकार छाया रहता था। चारों ओर से हिंसक पशुओं की दहाड़, सूखी पत्तियों की भयानक सरसराहट और पक्षियों की कर्कश ध्वनियाँ गूँज रही थीं। दोनों राजकुमारों के मुख पर जिज्ञासा देखकर महर्षि विश्वामित्र ने उस भयानक वन का अतीत बताया। उन्होंने कहा: 'हे राम! यह वन पूर्व काल में अत्यंत रमणीक, हरा-भरा और संपन्न था। यहाँ दो विशाल और समृद्ध जनपद बसे हुए थे—'मलद' और 'करूष'। किंतु जब से यहाँ सुकेतु यक्ष की पुत्री दुष्ट राक्षसी ताड़का ने अपना डेरा डाला है, उसने अपनी क्रूरता और नरभक्षण से इन सुंदर जनपदों को उजाड़कर वीरान कर दिया है। अब इस भयानक क्षेत्र को संपूर्ण आर्यावर्त में 'ताड़का वन' के नाम से जाना जाता है।'
ताड़का का भीषण आतंक एवं श्रीराम द्वारा ताड़का-वध:
महर्षि विश्वामित्र ने ताड़का की उत्पत्ति का रहस्य बताते हुए कहा कि वह सुकेतु यक्ष की पुत्री थी और उसका विवाह झंझ नामक राक्षस से हुआ था। महर्षि अगस्त्य के शाप के कारण वह अत्यंत कुरूप, विशालकाय और विकराल नरभक्षी राक्षसी बन गई थी। उसमें सहस्र हाथियों का शारीरिक बल था और वह आकाश से पत्थरों व विशाल वृक्षों की वर्षा करने की मायावी शक्ति रखती थी। भय के मारे उस वन में कोई भी मनुष्य या ऋषि पैर रखने का साहस नहीं करता था।
विश्वामित्र ने राम को सम्बोधित करते हुए दृढ़तापूर्वक आदेश दिया: 'हे रघुनंदन! इस दुष्ट निशाचरी ने धर्म और मानवता को त्रस्त कर रखा है। इसका वध करना तुम्हारा क्षत्रिय धर्म है। यह सोचकर संकोच मत करो कि वह एक स्त्री है। जो पापिनी समस्त प्रजा और ऋषियों के विनाश पर तुली हो, उसका संहार करना ही राजा का परम कर्तव्य है।' गुरु की आज्ञा पाते ही श्रीराम ने अपने गांडीव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और कान तक खींचकर भयंकर टंकार की। उस टंकार की वज्र-समान गूँज से संपूर्ण वन दहल उठा।
टंकार की ध्वनि सुनते ही क्रोध से अंधी होकर ताड़का चीत्कार करती हुई दौड़ी। उसने राम और लक्ष्मण पर विशाल शिलाखंडों और पेड़ों की बौछार कर दी। वीर लक्ष्मण ने अपने पैने बाणों से उन पत्थरों को आकाश में ही काट डाला। जब ताड़का अत्यंत निकट आ पहुँची, तो सूर्यास्त का समय देखकर श्रीराम ने एक अचूक, तीक्ष्ण बाण का संधान किया। वह बाण सीधे ताड़का के वक्षस्थल (छाती) को चीरता हुआ निकल गया। ताड़का भयानक चीत्कार करते हुए धरती पर गिरी और निष्प्राण हो गई। ताड़का के मरते ही उस घने जंगल से आतंक का साया सदा के लिए हट गया और देवताओं ने आकाश से पुष्पवृष्टि कर श्रीराम की जय-जयकार की।
दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की प्राप्ति एवं सिद्धाश्रम में सिद्ध-यज्ञ का संपादन:
ताड़का के वध से महर्षि विश्वामित्र का हृदय आनंद और गर्व से भर गया। उन्होंने उस रात्रि उसी वन में विश्राम किया जो अब भयमुक्त और शांत हो चुका था। अगली सुबह विश्वामित्र ने श्रीराम के अद्वितीय शौर्य और विनम्रता से संतुष्ट होकर उन्हें ब्रह्मांड के समस्त दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। उन्होंने राम और लक्ष्मण को आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, वायव्यास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, कालचक्र, विष्णुचक्र और ब्रह्मास्त्र सहित सौ से भी अधिक दिव्य अस्त्रों की दीक्षा दी। मुनि ने न केवल उन अस्त्रों को चलाने (आह्वान) का रहस्य सिखाया, अपितु उनका संहार करने (वापस शांत करने) की गूढ़ विद्या भी सिखाई।
इसके पश्चात वे महर्षि के तपोवन 'सिद्धाश्रम' पहुँचे। सिद्धाश्रम में अन्य सभी मुनियों और ऋषियों ने दोनों राजकुमारों का भावभीना स्वागत किया। अगले ही दिन से विश्वामित्र का अनुष्ठान आरंभ हुआ। यह सिद्ध-यज्ञ छह दिनों तक निरंतर चलना था। यज्ञ की दीक्षा लेते ही महर्षि विश्वामित्र ने मौन-व्रत धारण कर लिया। अब यज्ञ की वेदी और आश्रम की संपूर्ण सुरक्षा का भार राम और लक्ष्मण के कंधों पर था। दोनों भाइयों ने लगातार छह दिनों और रातों तक न तो अन्न-जल की चिंता की और न ही अपनी पलकें झपकाईं। वे हाथों में धनुष-बाण लिए यज्ञकुंड के चारों ओर सजग प्रहरी की भाँति निरंतर पहरा देते रहे।
मारीच-सुबाहु का आक्रमण एवं राक्षसी सेना का विनाश:
यज्ञ के पाँच दिन शांतिपूर्वक बीत गए। छठे दिन, जब यज्ञ अपनी अंतिम पूर्णाहुति के निकट था, अचानक आकाश में काले-कजरारे मेघ घिर आए और भीषण गर्जना होने लगी। ताड़का के प्रतिशोध की ज्वाला में जलते हुए उसके दोनों मायावी पुत्र—मारीच और सुबाहु—विशाल राक्षसी सेना के साथ सिद्धाश्रम पर टूट पड़े। वे यज्ञवेदी पर रक्त, माँस और अपवित्र हड्डियों की वर्षा करने लगे।
श्रीराम तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने स्थिति की गंभीरता को भाँपते हुए अत्यंत रणनीतिक निर्णय लिया। राम जानते थे कि मारीच को अभी जीवित रखना विधाता की किसी भावी योजना का अंग है। अतः उन्होंने मारीच पर 'शीतेषु' (मानवास्त्र / बिना फल वाला बाण) चलाया। उस प्रचंड बाण के वेग से मारीच वायु में उड़ता हुआ सौ योजन दूर दक्षिण सागर के तट पर जा गिरा। वह मरा नहीं, किंतु उसका अहंकार चूर-चूर हो गया और वह मूर्च्छित होकर जान बचाकर भागा।
इसके तुरंत पश्चात श्रीराम ने दूसरा तीक्ष्ण 'आग्नेयास्त्र' सुबाहु पर छोड़ा। वह बाण सुबाहु की छाती में लगा और वह वहीं जलकर भस्म हो गया। उधर वीर लक्ष्मण ने अपने अचूक बाणों का जाल बिछाकर शेष समस्त राक्षसी सेना का संहार कर दिया। आकाश स्वच्छ हो गया, यज्ञ की अंतिम आहुतियाँ निर्विघ्न संपन्न हुईं। महर्षि विश्वामित्र ने मौन-व्रत समाप्त कर दोनों राजकुमारों को हृदय से लगा लिया और कहा: 'हे रघुनंदन! तुम्हारे असीम पौरुष से मेरा सिद्ध-यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हुआ और सिद्धाश्रम राक्षसों के भय से मुक्त हो गया।'
मिथिला (जनकपुर) की ओर प्रस्थान एवं राजा जनक का आतिथ्य:
यज्ञ की पूर्णता के पश्चात महर्षि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को एक नए अभियान की सूचना दी। उन्होंने कहा: 'हे राजकुमारों! विदेहराज महाराज जनक ने अपनी राजधानी मिथिला (जनकपुर) में एक विशाल यज्ञ और अद्भुत धनुष-प्रतियोगिता का आयोजन किया है। वहाँ भगवान शिव का एक अलौकिक और प्राचीन धनुष रखा है। संसार के बड़े-बड़े राजा और योद्धा उसे देखने आ रहे हैं। हम सब भी उस अद्भुत धनुष का दर्शन करने जनकपुर चलेंगे।' राम और लक्ष्मण गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर ऋषियों के दल के साथ मिथिला की ओर चल पड़े।
गंगा नदी पार कर जब वे मिथिला की सीमा में प्रविष्ट हुए, तो नगर का अनुपम सौंदर्य देखकर मुग्ध रह गए। मिथिला नगरी ज्ञान, दर्शन, कला और शांति की पावन स्थली थी। जब विदेहराज राजा जनक को महर्षि विश्वामित्र के आगमन का समाचार मिला, तो वे अपने मंत्रियों और राजपुरोहित शतानंद के साथ नंगे पाँव उनकी अगवानी हेतु दौड़े आए। जनक ने महर्षि के चरणों में मस्तक नवाया और उनका भव्य स्वागत किया। तभी राजा जनक की दृष्टि विश्वामित्र के पीछे खड़े दो रूपवान, सुगठित और तेजस्वी राजकुमारों पर पड़ी। उनके अलौकिक तेज, सौम्य मुस्कान और भव्य व्यक्तित्व को देखकर ज्ञानी राजा जनक भी आत्म-विभोर हो गए। जनक ने विस्मित होकर पूछा: 'हे मुनिवर! ये दोनों अलौकिक किशोर कौन हैं? इन्हें देखकर मेरा विरक्त और ज्ञानी मन भी वात्सल्य और अपनत्व से भर उठा है।' विश्वामित्र ने गर्व से परिचय कराया: 'ये अयोध्यापति चक्रवर्ती महाराज दशरथ के ज्येष्ठ सुपुत्र राम और लक्ष्मण हैं। इन्होंने मेरे यज्ञ की रक्षा कर ताड़का और सुबाहु का संहार किया है। ये आपके यहाँ रखे शिव-धनुष का दर्शन करने आए हैं।'
भगवान शिव का पिनाक धनुष एवं राजा जनक की कठोर प्रतिज्ञा:
राजा जनक ने अत्यंत आदरपूर्वक महर्षि और दोनों राजकुमारों को एक सुंदर आम्रकुंज में ठहराया। संध्या के समय राजा जनक ने उस अद्भुत शिव-धनुष की पृष्ठभूमि और अपनी प्रतिज्ञा का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि यह धनुष साक्षात भगवान शिव का 'पिनाक' धनुष है, जो उनके पूर्वज देवरात को देवताओं द्वारा सौंपा गया था। यह धनुष इतना भारी और विशाल था कि इसे लोहे के एक आठ पहियों वाले विशाल संदूक में सुरक्षित रखा गया था, जिसे कई सौ बलिष्ठ पुरुष मिलकर बड़ी कठिनाई से खींच पाते थे।
राजा जनक ने दुःखी मन से कहा: 'हे मुनिवर! मेरी एक पुत्री है—सीता। वह मुझे हल चलाते समय खेत की विदीर्ण भूमि से प्राप्त हुई थी, इसलिए वह अयोनिजा (भूमि-पुत्री) है। बाल्यकाल में सीता ने खेल-खेल में इस भारी शिव-धनुष को उठा लिया था, जिसे कोई हिला तक नहीं सकता था। तभी मैंने यह भीषण प्रतिज्ञा ली थी कि जो भी पराक्रमी वीर इस शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ मेरी पुत्री सीता का विवाह होगा। किंतु आज मुझे घोर निराशा हो रही है। देश-देशांतर के राजा, महाराजा, और यहाँ तक कि लंकापति रावण और बाणासुर जैसे महाबली योद्धा भी आए, किंतु वे सब इस धनुष को तिल-भर भी हिला नहीं सके। वे लज्जित होकर लौट गए। क्या मेरी सीता आजीवन अविवाहित रहेगी? क्या यह पृथ्वी शूरवीरों से रिक्त हो चुकी है?' जनक के इस विलाप को सुनकर लक्ष्मण की भृकुटि तन गई, किंतु श्रीराम ने शांत रहकर उन्हें संयमित किया।
धनुष-भंग, सीता-स्वयंवर एवं चारों भाइयों का पावन परिणय:
अगले दिन विशाल राजसभा में स्वयंवर का आयोजन हुआ। लोहे के विशाल संदूक में रखे शिव-धनुष को कई सौ सैनिक खींचकर सभा के मध्य लाए। सभा में उपस्थित सभी राजाओं के चेहरे निराशा और भय से मलिन थे। तब महर्षि विश्वामित्र ने शांत भाव से श्रीराम की ओर देखा और बोले: 'उठो राम! इस शिव-धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाओ और विदेहराज जनक का संताप दूर करो।' गुरु की आज्ञा पाते ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अत्यंत सहज भाव से उठे। उन्होंने गुरु विश्वामित्र के चरण स्पर्श किए और राजसभा के मध्य पहुँचे।
श्रीराम ने मानो कोई बाल-क्रीड़ा हो, उस विशाल धनुष को एक ही हाथ से अनायास उठा लिया। संपूर्ण सभा में विस्मय की लहर दौड़ गई। राम ने जैसे ही धनुष के एक सिरे को धरती पर टिकाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और उसे कान तक खींचा, वह भारी धनुष अत्यधिक दबाव के कारण बीच से तड़ककर दो टुकड़ों में टूट गया! धनुष टूटने की ध्वनि इतनी भीषण थी मानो आकाश में एक साथ सैकड़ों वज्र गिर पड़े हों। संपूर्ण दिशाएँ काँप उठीं और सभा में उपस्थित लोग अचेत से हो गए।
राजा जनक की प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा। उनका संताप मिट गया और प्रतिज्ञा पूर्ण हुई। राजमहलों से सुसज्जित होकर राजकुमारी सीता हाथों में जयमाला लिए मंद गति से आगे बढ़ीं। उन्होंने लज्जा और असीम आनंद के साथ वरमाला श्रीराम के गले में डाल दी। आकाश से देवताओं ने पुष्पवृष्टि की और संपूर्ण मिथिला में परमानंद छा गया।
इसके उपरांत महर्षि विश्वामित्र की सहमति से राजा जनक ने अयोध्या दूत भेजे। अयोध्या में जब यह शुभ समाचार पहुँचा कि राम ने शिव-धनुष तोड़कर सीता का वरण किया है, तो संपूर्ण नगर उत्सव के सागर में डूब गया। महाराज दशरथ अपने दोनों अनुज पुत्रों—भरत और शत्रुघ्न—मंत्रियों, कुलगुरु वशिष्ठ और विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ बारात लेकर जनकपुर पहुँचे।
जनकपुर में दोनों राजवंशों का ऐतिहासिक मिलन हुआ। राजा जनक ने महाराज दशरथ के समक्ष एक अत्यंत पावन और भव्य प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि उनके कुल की चार कन्याएँ हैं और दशरथ के चार सुयोग्य राजकुमार हैं। अतः चारों का विवाह एक साथ संपन्न हो: श्रीराम का विवाह सीता से, लक्ष्मण का विवाह जनक की कनिष्ठ पुत्री उर्मिला से, भरत का विवाह जनक के अनुज कुशध्वज की पुत्री मांडवी से, और शत्रुघ्न का विवाह कुशध्वज की छोटी पुत्री श्रुतकीर्ति से तय हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, ऋषियों के शुभाशीष और अपार मंगलगान के बीच चारों राजकुमारों का पावन पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ। इसके पश्चात अपार दहेज, उपहारों और वधुओं के साथ बारात सानंद अयोध्या लौटी, जहाँ संपूर्ण प्रजा ने दीपमालाएँ जलाकर अपने प्रिय राजकुमारों का भव्य स्वागत किया।