ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 14
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प्रगति: अध्ययनरत
वन के मार्ग में (Vasant)
पाठ का ऐतिहासिक, पौराणिक एवं साहित्यिक संदर्भ:
कक्षा 6 हिंदी 'वसंत भाग 1' का चौदहवाँ अध्याय 'वन के मार्ग में' हिंदी साहित्य के सूर्य, भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा के शिरोमणि महाकवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित अत्यंत मार्मिक और सुकोमल काव्य-रचना है। यह पाठ तुलसीदास जी के सुप्रसिद्ध मुक्तक ग्रंथ 'कवितावली' के 'अयोध्याकांड' से संकलित दो सवैयों पर आधारित है। सामान्यतः जनमानस तुलसीदास जी को 'श्रीरामचरितमानस' के रचयिता के रूप में जानता है, जिसकी रचना मुख्य रूप से अवधी भाषा में दोहा-चौपाई छंद में हुई है। किंतु तुलसीदास जी ब्रजभाषा के भी उतने ही प्रकांड और अद्वितीय विद्वान थे। 'कवितावली', 'गीतावली', 'विनयपत्रिका' और 'दोहावली' जैसी कृतियों में तुलसीदास जी ने ब्रजभाषा के माधुर्य और सवैया तथा कवित्त छंदों का जो अप्रतिम प्रयोग किया है, वह रीतिकाल और भक्तिकाल के श्रेष्ठतम कवियों की बराबरी करता है। 'वन के मार्ग में' शीर्षक यह पाठ ब्रजभाषा सवैया छंद की गेयता, नाद-सौंदर्य और चित्रात्मकता का अनुपम शिखर है, जिसमें राम, सीता और लक्ष्मण के वन-प्रस्थान का अत्यंत सजीव, मानवीय और कारुणिक चित्रण किया गया है।
कथा की पृष्ठभूमि: अयोध्या से वन-गमन की त्रासदी:
इस काव्य की पृष्ठभूमि उस ऐतिहासिक और हृदयविदारक घटना से जुड़ी है जब अयोध्या के चक्रवर्ती राजा दशरथ अपने ज्येष्ठ और सर्वाधिक प्रिय पुत्र श्री राम का राज्याभिषेक करने की घोषणा करते हैं। पूरी अयोध्या नगरी में आनंद का उत्सव मनाया जा रहा था, किंतु मंथरा के बहकावे में आकर रानी कैकेयी राजा दशरथ से अपने दो पुराने वरदान माँग बैठती हैं। पहले वरदान में भरत को अयोध्या का राजसिंहासन और दूसरे वरदान में श्री राम को चौदह वर्ष का कठोर वनवास। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बिना किसी विरोध, संकोच या क्रोध के पिता के वचनों की मर्यादा रखने के लिए मुस्कुराते हुए राजसी वस्त्र उतारकर वल्कल वस्त्र धारण कर लेते हैं। यद्यपि माता सीता और अनुज लक्ष्मण को वन जाने का कोई आदेश नहीं था, किंतु सीता जी अपने पत्नी-धर्म का पालन करते हुए महलों के समस्त ऐश्वर्य को ठुकराकर राम के साथ वन जाने का दृढ़ संकल्प लेती हैं। इसी प्रकार लक्ष्मण अपने भ्रातृ-धर्म का निर्वाह करते हुए दोनों की सेवा के लिए साथ चल पड़ते हैं। यह पाठ उस समय का दृश्य प्रस्तुत करता है जब तीनों तपस्वी वेश में अयोध्या के भव्य राजमहलों और परकोटे की सीमा लाँघकर बीहड़, उजाड़ और कंकरीले वन के रास्ते पर पहला कदम रखते हैं।
प्रथम सवैया का गहन भावार्थ एवं सुकुमारता का सजीव अंकन:
प्रथम सवैया की शुरुआत उस मार्मिक क्षण से होती है जब सीता जी अयोध्या नगरी से बाहर निकलती हैं। तुलसीदास जी लिखते हैं:
'पुर तें निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दए मग में डग द्वै।'
अर्थात राजा जनक की दुलारी पुत्री और रघुकुल के तिलक श्री राम की वधू (सीता जी) महलों से निकलकर धैर्य धारण करते हुए रास्ते में अभी दो ही कदम (अर्थात थोड़ी ही दूर) चली थीं। 'डग द्वै' (दो कदम) शब्द यहाँ अत्यंत प्रतीकात्मक है। इसका अर्थ यह नहीं कि वे केवल दो कदम चलीं, बल्कि यह दर्शाता है कि महलों में पालकियों और रथों में घूमने वाली सुकुमारी जानकी ने जीवन में कभी कच्ची जमीन पर पैदल चलना सीखा ही नहीं था, अतः थोड़ी-सी दूरी तय करते ही उनका शरीर बुरी तरह थक गया।
आगे कवि सीता जी की शारीरिक व्याकुलता का नख-शिख वर्णन करते हैं:
'झलकीं भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गए मधुराधर वै।'
जेठ की जलती धूप, कंकरीली जमीन और तेज गर्मी के कारण सीता जी के विशाल, गोरे और सुंदर मस्तक (भाल) पर पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूँदें (कनी जल की) मोतियों की तरह झलकने लगीं। प्यास और थकान के कारण उनके दोनों मधुर, कोमल और रक्तिम होंठ (मधुराधर) सूखकर पपड़ी जैसे हो गए। वे अपनी व्याकुलता को छिपाने का प्रयास करती हैं, किंतु उनका सुकोमल शरीर साथ नहीं दे पाता।
फिर सीता जी का भोला और करुण प्रश्न सामने आता है:
'फिरि बूझति हैं, चलनौ अब केतिक, पर्नकुटी करिहौ कित ह्वै?'
वे अत्यधिक थककर अपने प्रियतम श्री राम से पूछती हैं, "हे नाथ! अभी और कितनी दूर चलना है? और हम विश्राम करने के लिए पत्तों की कुटिया (पर्णकुटी) कहाँ पर बनाएंगे?" सीता जी का यह प्रश्न उनके बाल-सुलभ भोलेपन, अपार थकान और महलों की उस राजकुमारी की विवशता को प्रकट करता है जिसने कभी पत्तों की झोपड़ी देखी भी नहीं थी।
सवैया की अंतिम पंक्ति दांपत्य प्रेम और मानवीय संवेदना का चरमोत्कर्ष है:
'तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै।'
अपनी सुकुमारी पत्नी (तिय) की इस भारी व्याकुलता और बेबसी को देखकर प्रियतम (पिय) श्री राम के अत्यंत सुंदर कमलनयन आंसुओं से भर गए और उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। तुलसीदास जी ने यहाँ ईश्वर के मानवीय रूप को उभारा है। श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम और सर्वसमर्थ भगवान हैं, किंतु इस क्षण में वे एक ऐसे संवेदनशील पति हैं जिसका हृदय अपनी पत्नी को अपने कारण कष्ट सहते देखकर हाहाकार कर उठता है। राम के मन में यह पश्चाताप और संकोच है कि जो जानकी महलों की स्वामिनी थीं, वह आज उनके कारण नंगे पाँव धूप में जल रही हैं।
द्वितीय सवैया का गहन भावार्थ: दांपत्य प्रेम और चातुर्य की लीला:
द्वितीय सवैया में तुलसीदास जी ने सीता जी की पति-सेवा और श्री राम की अनूठी चतुर प्रेम-लीला का चित्रण किया है। जब तीनों वन के मार्ग में आगे बढ़ते हैं, तो सीता जी को लगता है कि श्री राम भी धूप और थकान से व्याकुल हो रहे हैं। किंतु एक आदर्श भारतीय पत्नी की भाँति वे यह नहीं कहतीं कि "मैं थक गई हूँ, आप रुक जाइए", बल्कि वे लक्ष्मण का सहारा लेकर अत्यंत संकोच और चातुर्य से राम को विश्राम देने का प्रस्ताव रखती हैं।
सीता जी कहती हैं:
'जल को गए लक्खन, हैं लरिका परखो, पिय! घाम घरीक ह्वै ठाढ़े।'
अर्थात हे स्वामी! लक्ष्मण तो अभी बालक हैं और वे वन में हमारे लिए पीने का शीतल जल ढूँढने गए हैं। जब तक वे जल लेकर लौटते हैं, तब तक हे प्रिय! किसी वृक्ष की छाया में एक घड़ी (थोड़ी देर) खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर लीजिए। सीता जी का यह कथन उनके देवर के प्रति वात्सल्य, मातृत्व और अपने पति के प्रति असीम चिंता को प्रकट करता है।
इसके बाद सीता जी राम की सेवा का संकल्प दोहराती हैं:
'पोंछि पसेउ बयारि करौं, अरु पाँय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े।'
सीता जी कहती हैं कि जब आप छाया में खड़े होंगे, तब मैं अपने आँचल से आपका पसीना पोंछकर आपको हवा झलूँगी, और गर्म बालू तथा जलती हुई रेत से तपे आपके दोनों चरणों को जल से धोकर शीतल करूँगी। यहाँ सीता जी स्वयं भीषण रूप से थकी हुई हैं, उनके पाँव छालों से भरे हैं, फिर भी उन्हें अपनी नहीं, अपने पति के कष्ट की चिंता है। यही भारतीय नारी के अमर त्याग और एकनिष्ठ पातिव्रत की पराकाष्ठा है।
किंतु श्री राम अंतर्यामी हैं, वे सीता के मन के इस छल-विहीन संकोच को तुरंत ताड़ जाते हैं:
'तुलसी रघुबीर प्रिया श्रम जानि कै बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े।'
तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम यह भली-भाँति समझ गए कि वास्तव में लक्ष्मण नहीं, बल्कि स्वयं उनकी प्रिया सीता अत्यधिक थक चुकी हैं और वे संकोचवश रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। अतः सीता को विश्राम देने के लिए श्री राम एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गए और जानबूझकर बहुत देर तक अपने पैरों में चुभे काँटे निकालने का अभिनय करने लगे। राम जानते थे कि जब तक वे बैठे रहेंगे, तब तक सीता जी को भी बैठने और सुस्ताने का अवसर मिल जाएगा। एक पत्नी को विश्राम देने के लिए भगवान का यह प्रेमपूर्ण चातुर्य विश्व साहित्य में अनुपम है।
सवैया का अंतिम भावविभोर करने वाला दृश्य:
'जानकी नाह को नेह लख्यो, पुलक्यौ तनु, बारि बिलोचन बाढ़े।'
जब जानकी (सीता जी) ने अपने स्वामी (नाह) के इस अगाध, निश्छल और सूक्ष्म प्रेम (नेह) को देखा और समझा कि वे केवल उन्हें आराम पहुँचाने के लिए देर तक काँटे निकाल रहे हैं, तो सीता जी का रोम-रोम रोमांचित (पुलकित) हो उठा। उनके हृदय में कृतज्ञता, आदर और अनुराग का समुद्र उमड़ पड़ा और उनके दोनों सुंदर नेत्रों में आनंद तथा प्रेम के आँसू छलक आए। यहाँ शृंगार रस और दांपत्य निष्ठा का वह दिव्य रूप प्रकट होता है जहाँ वाणी मौन हो जाती है और केवल प्रेम की मूक भाषा ही सब कुछ कह देती है।
सवैया छंद, ब्रजभाषा और काव्य-शिल्प का अप्रतिम सौंदर्य:
गोस्वामी तुलसीदास जी ने इन दोनों पदों की रचना साहित्यिक ब्रजभाषा में मत्तगयंद सवैया छंद के अंतर्गत की है। सवैया छंद में 23 वर्ण होते हैं (सात भगण और दो गुरु), जिसकी लय और प्रवाह में एक प्राकृतिक संगीत बजता है। पदों में प्रयुक्त शब्द जैसे 'पुर तें', 'रघुबीर-बधू', 'डग द्वै', 'मधुराधर', 'पर्नकुटी', 'लरिका', 'घरीक', 'पसेउ', 'भूभुरि-डाढ़े', 'कंटक', 'नाह' और 'बिलोचन' ब्रजभाषा के ठेठ, कोमल और रसमय स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं।
काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से इसमें माधुर्य गुण और वैदर्भी रीति की प्रधानता है। अलंकारों में अनुप्रास अलंकार की अद्भुत छटा सर्वत्र बिखरी हुई है, जैसे 'धरि धीर दए' में 'ध' और 'द' की आवृत्ति, 'चारु चलीं जल च्वै' में 'च' वर्ण की संगीतात्मक आवृत्ति, 'घाम घरीक' में 'घ' की आवृत्ति, 'पाँय पखारिहौं' में 'प' की आवृत्ति, 'कंटक काढ़े' में 'क' की आवृत्ति, 'नाह को नेह' में 'न' की आवृत्ति और 'बारि बिलोचन बाढ़े' में 'ब' वर्ण की अत्यंत कर्णप्रिय आवृत्ति हुई है। इसके साथ ही, सीता जी की स्वाभाविक शारीरिक थकान का जो यथार्थ और सजीव अंकन हुआ है, वह स्वभावोक्ति अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण है।
पारिवारिक आदर्श एवं समकालीन जीवन में प्रासंगिकता:
आधुनिक युग के विद्यार्थियों के लिए 'वन के मार्ग में' पाठ का अध्ययन चरित्र-निर्माण और मानवीय मूल्यों की दृष्टि से अत्यंत अपरिहार्य है। आज के उपभोक्तावादी और भौतिकवादी युग में जहाँ परिवार टूट रहे हैं, लोग तनिक-सी कठिनाई आने पर एक-दूसरे का साथ छोड़ देते हैं और केवल सुख के साथी बनते हैं, वहाँ राम और सीता का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चा दांपत्य और सच्चा परिवार वही है जो सुख के महलों में ही नहीं, बल्कि वन के काँटों और जलती धूप में भी एक-दूसरे की छाया बनकर खड़ा रहे। सीता जी का महलों को छोड़कर पति के संग वन जाना हमें त्याग और निष्ठा सिखाता है। राम का अपनी पत्नी के प्रति गहरा आदर, संवेदनशीलता और काँटा निकालने के बहाने विश्राम देने की चतुर लीला हमें यह सिखाती है कि पुरुषों को सदैव अपने परिवार और जीवन-संगिनी के प्रति संवेदनशील, आदरपूर्ण और सहयोगी होना चाहिए।
निष्कर्ष:
संक्षेप में कहें तो, 'वन के मार्ग में' केवल भक्ति काल का एक पौराणिक पद मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवीय हृदय की कोमलतम भावनाओं का शाश्वत महाकाव्य है। यह हमें मर्यादा, प्रेम, समर्पण, धैर्य और कर्तव्य-निष्ठा का वह पावन संदेश देता है जो सदियों से भारतीय संस्कृति की आत्मा रहा है और युगों-युगों तक मानवता को सन्मार्ग दिखाता रहेगा।