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ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 14
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

वन के मार्ग में (Vasant)

पाठ का ऐतिहासिक, पौराणिक एवं साहित्यिक संदर्भ: कक्षा 6 हिंदी 'वसंत भाग 1' का चौदहवाँ अध्याय 'वन के मार्ग में' हिंदी साहित्य के सूर्य, भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा के शिरोमणि महाकवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित अत्यंत मार्मिक और सुकोमल काव्य-रचना है। यह पाठ तुलसीदास जी के सुप्रसिद्ध मुक्तक ग्रंथ 'कवितावली' के 'अयोध्याकांड' से संकलित दो सवैयों पर आधारित है। सामान्यतः जनमानस तुलसीदास जी को 'श्रीरामचरितमानस' के रचयिता के रूप में जानता है, जिसकी रचना मुख्य रूप से अवधी भाषा में दोहा-चौपाई छंद में हुई है। किंतु तुलसीदास जी ब्रजभाषा के भी उतने ही प्रकांड और अद्वितीय विद्वान थे। 'कवितावली', 'गीतावली', 'विनयपत्रिका' और 'दोहावली' जैसी कृतियों में तुलसीदास जी ने ब्रजभाषा के माधुर्य और सवैया तथा कवित्त छंदों का जो अप्रतिम प्रयोग किया है, वह रीतिकाल और भक्तिकाल के श्रेष्ठतम कवियों की बराबरी करता है। 'वन के मार्ग में' शीर्षक यह पाठ ब्रजभाषा सवैया छंद की गेयता, नाद-सौंदर्य और चित्रात्मकता का अनुपम शिखर है, जिसमें राम, सीता और लक्ष्मण के वन-प्रस्थान का अत्यंत सजीव, मानवीय और कारुणिक चित्रण किया गया है। कथा की पृष्ठभूमि: अयोध्या से वन-गमन की त्रासदी: इस काव्य की पृष्ठभूमि उस ऐतिहासिक और हृदयविदारक घटना से जुड़ी है जब अयोध्या के चक्रवर्ती राजा दशरथ अपने ज्येष्ठ और सर्वाधिक प्रिय पुत्र श्री राम का राज्याभिषेक करने की घोषणा करते हैं। पूरी अयोध्या नगरी में आनंद का उत्सव मनाया जा रहा था, किंतु मंथरा के बहकावे में आकर रानी कैकेयी राजा दशरथ से अपने दो पुराने वरदान माँग बैठती हैं। पहले वरदान में भरत को अयोध्या का राजसिंहासन और दूसरे वरदान में श्री राम को चौदह वर्ष का कठोर वनवास। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बिना किसी विरोध, संकोच या क्रोध के पिता के वचनों की मर्यादा रखने के लिए मुस्कुराते हुए राजसी वस्त्र उतारकर वल्कल वस्त्र धारण कर लेते हैं। यद्यपि माता सीता और अनुज लक्ष्मण को वन जाने का कोई आदेश नहीं था, किंतु सीता जी अपने पत्नी-धर्म का पालन करते हुए महलों के समस्त ऐश्वर्य को ठुकराकर राम के साथ वन जाने का दृढ़ संकल्प लेती हैं। इसी प्रकार लक्ष्मण अपने भ्रातृ-धर्म का निर्वाह करते हुए दोनों की सेवा के लिए साथ चल पड़ते हैं। यह पाठ उस समय का दृश्य प्रस्तुत करता है जब तीनों तपस्वी वेश में अयोध्या के भव्य राजमहलों और परकोटे की सीमा लाँघकर बीहड़, उजाड़ और कंकरीले वन के रास्ते पर पहला कदम रखते हैं। प्रथम सवैया का गहन भावार्थ एवं सुकुमारता का सजीव अंकन: प्रथम सवैया की शुरुआत उस मार्मिक क्षण से होती है जब सीता जी अयोध्या नगरी से बाहर निकलती हैं। तुलसीदास जी लिखते हैं: 'पुर तें निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दए मग में डग द्वै।' अर्थात राजा जनक की दुलारी पुत्री और रघुकुल के तिलक श्री राम की वधू (सीता जी) महलों से निकलकर धैर्य धारण करते हुए रास्ते में अभी दो ही कदम (अर्थात थोड़ी ही दूर) चली थीं। 'डग द्वै' (दो कदम) शब्द यहाँ अत्यंत प्रतीकात्मक है। इसका अर्थ यह नहीं कि वे केवल दो कदम चलीं, बल्कि यह दर्शाता है कि महलों में पालकियों और रथों में घूमने वाली सुकुमारी जानकी ने जीवन में कभी कच्ची जमीन पर पैदल चलना सीखा ही नहीं था, अतः थोड़ी-सी दूरी तय करते ही उनका शरीर बुरी तरह थक गया। आगे कवि सीता जी की शारीरिक व्याकुलता का नख-शिख वर्णन करते हैं: 'झलकीं भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गए मधुराधर वै।' जेठ की जलती धूप, कंकरीली जमीन और तेज गर्मी के कारण सीता जी के विशाल, गोरे और सुंदर मस्तक (भाल) पर पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूँदें (कनी जल की) मोतियों की तरह झलकने लगीं। प्यास और थकान के कारण उनके दोनों मधुर, कोमल और रक्तिम होंठ (मधुराधर) सूखकर पपड़ी जैसे हो गए। वे अपनी व्याकुलता को छिपाने का प्रयास करती हैं, किंतु उनका सुकोमल शरीर साथ नहीं दे पाता। फिर सीता जी का भोला और करुण प्रश्न सामने आता है: 'फिरि बूझति हैं, चलनौ अब केतिक, पर्नकुटी करिहौ कित ह्वै?' वे अत्यधिक थककर अपने प्रियतम श्री राम से पूछती हैं, "हे नाथ! अभी और कितनी दूर चलना है? और हम विश्राम करने के लिए पत्तों की कुटिया (पर्णकुटी) कहाँ पर बनाएंगे?" सीता जी का यह प्रश्न उनके बाल-सुलभ भोलेपन, अपार थकान और महलों की उस राजकुमारी की विवशता को प्रकट करता है जिसने कभी पत्तों की झोपड़ी देखी भी नहीं थी। सवैया की अंतिम पंक्ति दांपत्य प्रेम और मानवीय संवेदना का चरमोत्कर्ष है: 'तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै।' अपनी सुकुमारी पत्नी (तिय) की इस भारी व्याकुलता और बेबसी को देखकर प्रियतम (पिय) श्री राम के अत्यंत सुंदर कमलनयन आंसुओं से भर गए और उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। तुलसीदास जी ने यहाँ ईश्वर के मानवीय रूप को उभारा है। श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम और सर्वसमर्थ भगवान हैं, किंतु इस क्षण में वे एक ऐसे संवेदनशील पति हैं जिसका हृदय अपनी पत्नी को अपने कारण कष्ट सहते देखकर हाहाकार कर उठता है। राम के मन में यह पश्चाताप और संकोच है कि जो जानकी महलों की स्वामिनी थीं, वह आज उनके कारण नंगे पाँव धूप में जल रही हैं। द्वितीय सवैया का गहन भावार्थ: दांपत्य प्रेम और चातुर्य की लीला: द्वितीय सवैया में तुलसीदास जी ने सीता जी की पति-सेवा और श्री राम की अनूठी चतुर प्रेम-लीला का चित्रण किया है। जब तीनों वन के मार्ग में आगे बढ़ते हैं, तो सीता जी को लगता है कि श्री राम भी धूप और थकान से व्याकुल हो रहे हैं। किंतु एक आदर्श भारतीय पत्नी की भाँति वे यह नहीं कहतीं कि "मैं थक गई हूँ, आप रुक जाइए", बल्कि वे लक्ष्मण का सहारा लेकर अत्यंत संकोच और चातुर्य से राम को विश्राम देने का प्रस्ताव रखती हैं। सीता जी कहती हैं: 'जल को गए लक्खन, हैं लरिका परखो, पिय! घाम घरीक ह्वै ठाढ़े।' अर्थात हे स्वामी! लक्ष्मण तो अभी बालक हैं और वे वन में हमारे लिए पीने का शीतल जल ढूँढने गए हैं। जब तक वे जल लेकर लौटते हैं, तब तक हे प्रिय! किसी वृक्ष की छाया में एक घड़ी (थोड़ी देर) खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर लीजिए। सीता जी का यह कथन उनके देवर के प्रति वात्सल्य, मातृत्व और अपने पति के प्रति असीम चिंता को प्रकट करता है। इसके बाद सीता जी राम की सेवा का संकल्प दोहराती हैं: 'पोंछि पसेउ बयारि करौं, अरु पाँय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े।' सीता जी कहती हैं कि जब आप छाया में खड़े होंगे, तब मैं अपने आँचल से आपका पसीना पोंछकर आपको हवा झलूँगी, और गर्म बालू तथा जलती हुई रेत से तपे आपके दोनों चरणों को जल से धोकर शीतल करूँगी। यहाँ सीता जी स्वयं भीषण रूप से थकी हुई हैं, उनके पाँव छालों से भरे हैं, फिर भी उन्हें अपनी नहीं, अपने पति के कष्ट की चिंता है। यही भारतीय नारी के अमर त्याग और एकनिष्ठ पातिव्रत की पराकाष्ठा है। किंतु श्री राम अंतर्यामी हैं, वे सीता के मन के इस छल-विहीन संकोच को तुरंत ताड़ जाते हैं: 'तुलसी रघुबीर प्रिया श्रम जानि कै बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े।' तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम यह भली-भाँति समझ गए कि वास्तव में लक्ष्मण नहीं, बल्कि स्वयं उनकी प्रिया सीता अत्यधिक थक चुकी हैं और वे संकोचवश रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। अतः सीता को विश्राम देने के लिए श्री राम एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गए और जानबूझकर बहुत देर तक अपने पैरों में चुभे काँटे निकालने का अभिनय करने लगे। राम जानते थे कि जब तक वे बैठे रहेंगे, तब तक सीता जी को भी बैठने और सुस्ताने का अवसर मिल जाएगा। एक पत्नी को विश्राम देने के लिए भगवान का यह प्रेमपूर्ण चातुर्य विश्व साहित्य में अनुपम है। सवैया का अंतिम भावविभोर करने वाला दृश्य: 'जानकी नाह को नेह लख्यो, पुलक्यौ तनु, बारि बिलोचन बाढ़े।' जब जानकी (सीता जी) ने अपने स्वामी (नाह) के इस अगाध, निश्छल और सूक्ष्म प्रेम (नेह) को देखा और समझा कि वे केवल उन्हें आराम पहुँचाने के लिए देर तक काँटे निकाल रहे हैं, तो सीता जी का रोम-रोम रोमांचित (पुलकित) हो उठा। उनके हृदय में कृतज्ञता, आदर और अनुराग का समुद्र उमड़ पड़ा और उनके दोनों सुंदर नेत्रों में आनंद तथा प्रेम के आँसू छलक आए। यहाँ शृंगार रस और दांपत्य निष्ठा का वह दिव्य रूप प्रकट होता है जहाँ वाणी मौन हो जाती है और केवल प्रेम की मूक भाषा ही सब कुछ कह देती है। सवैया छंद, ब्रजभाषा और काव्य-शिल्प का अप्रतिम सौंदर्य: गोस्वामी तुलसीदास जी ने इन दोनों पदों की रचना साहित्यिक ब्रजभाषा में मत्तगयंद सवैया छंद के अंतर्गत की है। सवैया छंद में 23 वर्ण होते हैं (सात भगण और दो गुरु), जिसकी लय और प्रवाह में एक प्राकृतिक संगीत बजता है। पदों में प्रयुक्त शब्द जैसे 'पुर तें', 'रघुबीर-बधू', 'डग द्वै', 'मधुराधर', 'पर्नकुटी', 'लरिका', 'घरीक', 'पसेउ', 'भूभुरि-डाढ़े', 'कंटक', 'नाह' और 'बिलोचन' ब्रजभाषा के ठेठ, कोमल और रसमय स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं। काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से इसमें माधुर्य गुण और वैदर्भी रीति की प्रधानता है। अलंकारों में अनुप्रास अलंकार की अद्भुत छटा सर्वत्र बिखरी हुई है, जैसे 'धरि धीर दए' में 'ध' और 'द' की आवृत्ति, 'चारु चलीं जल च्वै' में 'च' वर्ण की संगीतात्मक आवृत्ति, 'घाम घरीक' में 'घ' की आवृत्ति, 'पाँय पखारिहौं' में 'प' की आवृत्ति, 'कंटक काढ़े' में 'क' की आवृत्ति, 'नाह को नेह' में 'न' की आवृत्ति और 'बारि बिलोचन बाढ़े' में 'ब' वर्ण की अत्यंत कर्णप्रिय आवृत्ति हुई है। इसके साथ ही, सीता जी की स्वाभाविक शारीरिक थकान का जो यथार्थ और सजीव अंकन हुआ है, वह स्वभावोक्ति अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण है। पारिवारिक आदर्श एवं समकालीन जीवन में प्रासंगिकता: आधुनिक युग के विद्यार्थियों के लिए 'वन के मार्ग में' पाठ का अध्ययन चरित्र-निर्माण और मानवीय मूल्यों की दृष्टि से अत्यंत अपरिहार्य है। आज के उपभोक्तावादी और भौतिकवादी युग में जहाँ परिवार टूट रहे हैं, लोग तनिक-सी कठिनाई आने पर एक-दूसरे का साथ छोड़ देते हैं और केवल सुख के साथी बनते हैं, वहाँ राम और सीता का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चा दांपत्य और सच्चा परिवार वही है जो सुख के महलों में ही नहीं, बल्कि वन के काँटों और जलती धूप में भी एक-दूसरे की छाया बनकर खड़ा रहे। सीता जी का महलों को छोड़कर पति के संग वन जाना हमें त्याग और निष्ठा सिखाता है। राम का अपनी पत्नी के प्रति गहरा आदर, संवेदनशीलता और काँटा निकालने के बहाने विश्राम देने की चतुर लीला हमें यह सिखाती है कि पुरुषों को सदैव अपने परिवार और जीवन-संगिनी के प्रति संवेदनशील, आदरपूर्ण और सहयोगी होना चाहिए। निष्कर्ष: संक्षेप में कहें तो, 'वन के मार्ग में' केवल भक्ति काल का एक पौराणिक पद मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवीय हृदय की कोमलतम भावनाओं का शाश्वत महाकाव्य है। यह हमें मर्यादा, प्रेम, समर्पण, धैर्य और कर्तव्य-निष्ठा का वह पावन संदेश देता है जो सदियों से भारतीय संस्कृति की आत्मा रहा है और युगों-युगों तक मानवता को सन्मार्ग दिखाता रहेगा।

क्या आपने कभी सोचा है?

जो जनक नंदिनी महलों के स्वर्ण-जड़ित शयनागारों में रेशमी बिस्तरों पर पली थीं, जिनके कोमल चरणों के नीचे गुलाब की पंखुड़ियाँ बिछाई जाती थीं, वे जब पिता के वचनों की रक्षा हेतु अपने पति श्री राम के संग नंगे पाँव बीहड़ जंगलों, काँटों और तपती धूप के मार्ग पर निकल पड़ीं, तो क्या बीती होगी उनके सुकोमल तन और मन पर? गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'कवितावली' (अयोध्याकांड) के ये दो अमर सवैये केवल चौदह वर्ष के वनवास की एक घटना नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी के त्याग, परस्पर समर्पण, अगाध प्रेम और मर्यादा का वह अनमोल दर्पण हैं जिसे पढ़कर हर सहृदय पाठक की आँखें सजल हो उठती हैं। यहाँ ईश्वर अलौकिक सिंहासन पर नहीं, बल्कि अपनी थकी हुई प्रिया के पैरों से देर तक बैठकर काँटे निकालते हुए एक अत्यंत संवेदनशील जीवन-साथी के रूप में दिखाई देते हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

'वन के मार्ग में' कविता का अध्ययन कक्षा 6 के विद्यार्थियों के बौद्धिक, नैतिक और साहित्यिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और युगांतरकारी है। आधुनिक समय में जहाँ बच्चे टीवी, इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से पाश्चात्य और एकांकी जीवनशैली से प्रभावित हो रहे हैं, वहाँ भारतीय संस्कृति के उदात्त पारिवारिक मूल्यों, मर्यादा और परस्पर त्याग की समझ विकसित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ये दो सवैये विद्यार्थियों को यह अमूल्य संदेश देते हैं कि जीवन में कठिनाइयाँ, अभाव और विपत्तियाँ किसी भी क्षण आ सकती हैं, किंतु जो मनुष्य धैर्य (धरि धीर) और कर्तव्य-निष्ठा के साथ उनका सामना करता है, वही सच्चा नायक बनता है। सीता जी का राजमहलों के विलासितापूर्ण सुखों को त्यागकर नंगे पाँव वन-मार्ग पर पति का साथ निभाना यह सिद्ध करता है कि प्रेम का वास्तविक स्वरूप भौतिक सुखों में नहीं, बल्कि परस्पर समर्पण और सहभागिता में है। वहीं दूसरी ओर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का अपनी थकी हुई पत्नी के प्रति अत्यंत कोमल, संवेदनशील व्यवहार और देर तक बैठकर काँटे निकालने का प्रसंग विद्यार्थियों में स्त्रियों और जीवन-साथी के प्रति आदर, संवेदनशीलता और सहयोग की स्वस्थ मानसिकता का निर्माण करता है। साहित्यिक दृष्टि से, यह अध्याय विद्यार्थियों को महाकवि तुलसीदास की बहुमुखी काव्य-प्रतिभा, साहित्यिक ब्रजभाषा के माधुर्य, सवैया छंद की संगीतात्मक गेयता और अनुप्रास तथा स्वभावोक्ति अलंकारों के व्यावहारिक प्रयोग से परिचित कराता है। परीक्षा की दृष्टि से इन सवैयों की सप्रसंग व्याख्या, कठिन ब्रज शब्दों के मानक हिंदी अर्थ और काव्य-सौंदर्य का विश्लेषण बोर्ड परीक्षा में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करने के लिए अनिवार्य आधारशिला तैयार करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • रामायण की आधारभूत कथा, विशेषकर राजा दशरथ के वचन, कैकेयी के वरदान और राम के 14 वर्ष के वनवास की सामान्य पृष्ठभूमि।
  • गोस्वामी तुलसीदास जी के सामान्य जीवन-परिचय और भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि के रूप में उनकी पहचान।
  • हिंदी पद्य में प्रयुक्त होने वाली अवधी और ब्रजभाषा के बीच के सामान्य अंतर और दोनों की काव्यगत मिठास की समझ।
  • पद्य विधा में भावार्थ, संदर्भ और प्रसंग लेखन के बुनियादी नियमों और काव्य की पंक्तियों से अर्थ ग्रहण करने की क्षमता।
  • काव्य-सौंदर्य के आधारभूत तत्वों जैसे रस (शृंगार, करुण), छंद (सवैया) और अनुप्रास अलंकार की प्रारंभिक अवधारणा।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • गोस्वामी तुलसीदास जी के ब्रजभाषा काव्य-संग्रह 'कवितावली' (अयोध्याकांड) के ऐतिहासिक व साहित्यिक संदर्भ को समझ सकेंगे।
  • प्रथम सवैया के आधार पर महलों में पली सुकुमारी सीता जी के वन-गमन, शारीरिक थकान और पसीने की बूँदों के सजीव दृश्य का वर्णन कर सकेंगे।
  • सीता जी द्वारा पूछे गए बाल-सुलभ प्रश्न ('चलनौ अब केतिक, पर्नकुटी करिहौ कित ह्वै?') के पीछे छिपी व्याकुलता और संकोच का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • अपनी पत्नी की व्याकुलता देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की आँखों से आँसू बहने के पीछे छिपी अगाध संवेदनशीलता को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • द्वितीय सवैया में सीता जी द्वारा लक्ष्मण की जल-खोज का सहारा लेकर राम को विश्राम देने की संकोचपूर्ण चतुराई का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • श्री राम द्वारा सीता जी की थकान को समझकर जानबूझकर देर तक बैठकर काँटे निकालने के बहाने विश्राम देने की प्रेम-लीला का भावार्थ लिख सकेंगे।
  • पति के निश्छल और मूक प्रेम को देखकर जानकी के पुलकित होने तथा नयनों में प्रेमाश्रु उमड़ने के दांपत्य सौंदर्य को रेखांकित कर सकेंगे।
  • सवैया छंद के वर्णिक स्वरूप, साहित्यिक ब्रजभाषा की कोमलकांत पदावली तथा अनुप्रास व स्वभावोक्ति अलंकारों का सटीक काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कर सकेंगे।
  • पाठ में प्रयुक्त ब्रजभाषा के कठिन शब्दों (जैसे भाल, मधुराधर, केतिक, पसेउ, भूभुरि-डाढ़े, कंटक, नाह, बिलोचन) के मानक हिंदी अर्थ लिख सकेंगे।
  • राम और सीता के दांपत्य जीवन के आदर्शों (त्याग, परस्पर संवेदनशीलता, सुख-दुःख में साथ) को आत्मसात कर अपने पारिवारिक जीवन में मानवीय मूल्यों को अपना सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: कवि परिचय, 'कवितावली' और...
2 मॉड्यूल 2: प्रथम सवैया — सीता जी की...
3 मॉड्यूल 3: द्वितीय सवैया — दांपत्य...
4 मॉड्यूल 4: दोनों सवैयों का काव्य-सौ...
5 मॉड्यूल 5: चरित्र-चित्रण — श्री राम...
6 मॉड्यूल 6: 'भाषा की बात', ब्रजभाषा...
7 मॉड्यूल 7: नैतिक शिक्षा, आधुनिक जीव...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: कवि परिचय, 'कवितावली' और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

वन के मार्ग में — गोस्वामी तुलसीदास | कक्षा 6 हिंदी (वसंत भाग 1) 'कवितावली' (अयोध्याकांड) के अमर सवैये पैनल 1: कवि परिचय, मूल ग्रंथ ('कवितावली') एवं काव्य-रूप भक्तिकाल एवं ब्रजभाषा सवैया छंद १. महाकवि गोस्वामी तुलसीदास काल: भक्तिकाल (रामभक्ति शाखा के शिरोमणि) मूल रचना: 'कवितावली' (अयोध्याकांड) काव्य छंद: सवैया छंद (वर्णिक वृत्त, गेय शैली) काव्य भाषा: साहित्यिक ब्रजभाषा (माधुर्य गुण) प्रमुख रस: शृंगार रस (संयोग/विप्रलंभ) व करुण रस विशेषता: मानवीय संवेदनाओं का सजीव अंकन ईश्वर को भी मानवीय रूप में अनुभव करना तुलसीदास के सवैये हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। रामचरितमानस के अतिरिक्त कवितावली मुक्तक काव्य है २. ऐतिहासिक व पौराणिक पृष्ठभूमि प्रसंग: अयोध्या से राम, सीता व लक्ष्मण का प्रस्थान कारण: पिता दशरथ के वचन व कैकेयी के दो वरदान पात्रों का स्वरूप: • श्री राम: पितृ-आज्ञापालक, धीर-वीर एवं मर्यादा पुरुषोत्तम • सीता जी: महलों की सुकुमारी, पतिव्रता एवं धर्मपरायणा • लक्ष्मण: त्यागी, सेवाभावी एवं अनुज-धर्मपालक वन का मार्ग: कंकरीले रास्ते, तीखी धूप, गर्म बालू व काँटों से भरा मार्ग राजसी वैभव त्यागकर नंगे पाँव वन-गमन ३. सवैया छंद व भाषा का सौंदर्य सवैया छंद की प्रकृति: • 22 से 26 वर्णों का सुकोमल वर्णिक छंद। • लयबद्ध, संगीतात्मक एवं गेय प्रकृति। • शृंगार और करुण भावों की अभिव्यक्ति के लिए श्रेष्ठ। ब्रजभाषा का लालित्य: • कोमलकांत पदावली व कर्णप्रिय अनुप्रास। • 'पुर तें', 'डग द्वै', 'पसेउ', 'भूभुरि-डाढ़े', 'कंटक'। माधुर्य गुण एवं चित्रात्मक शैली पढ़ते ही आँखों के सामने सजीव दृश्य उपस्थित होता है पैनल 2: प्रथम सवैया — सुकुमारी जानकी की थकान एवं राम के प्रेमाश्रु पुर तें निकसी रघुबीर-बधू... मूल सवैया (प्रथम पद) "पुर तें निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दए मग में डग द्वै। झलकीं भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गए मधुराधर वै। फिरि बूझति हैं, 'चलनो अब केतिक, पर्नकुटी करिहौ कित ह्वै?' तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै।" केंद्रीय भाव: नगर से निकलते ही सुकुमारी सीता जी की व्याकुलता और अपनी पत्नी के कष्ट को देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम राम का द्रवित होना। शृंगार और करुणा का मार्मिक संगम शब्दार्थ एवं चरण-वार विश्लेषण • पुर तें निकसी: अयोध्या नगर से बाहर निकलीं • रघुबीर-बधू: श्री राम की पत्नी (सीता जी / जानकी) • धरि धीर / डग द्वै: धैर्य धारण करके रास्ते में अभी दो ही कदम चली थीं • भाल कनी जल की: माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं • पुट सूखि मधुराधर: दोनों मधुर और कोमल होंठ प्यास से सूख गए • बूझति हैं / केतिक: पूछती हैं कि अभी और कितनी दूर चलना है? • पर्नकुटी कित करिहौ: पत्तों की कुटिया आप कहाँ बनाएंगे? • तिय की आतुरता: पत्नी की व्याकुलता देखकर पिय (राम) की • अँखियाँ जल च्वै: सुंदर आँखों से अश्रुधारा बह निकली सुकुमारी पत्नी का कष्ट देखकर पति का हृदय द्रवित होना पैनल 3: द्वितीय सवैया — कांटा निकालने की लीला एवं दांपत्य प्रेम जल को गए लक्खन, हैं लरिका... मूल सवैया (द्वितीय पद) "जल को गए लक्खन, हैं लरिका परखो, पिय! घाम घरीक ह्वै ठाढ़े। पोंछि पसेउ बयारि करौं, अरु पाँय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े। तुलसी रघुबीर प्रिया श्रम जानि कै बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े। जानकी नाह को नेह लख्यो, पुलक्यौ तनु, बारि बिलोचन बाढ़े।" केंद्रीय भाव: परस्पर सेवा, त्याग और अनूठे दांपत्य प्रेम की पराकाष्ठा। सीता जी की पति-सेवा और श्री राम का पत्नी को विश्राम देने का प्रयास। भारतीय संस्कृति में दांपत्य का उच्चतम आदर्श शब्दार्थ एवं चरण-वार विश्लेषण • लक्खन हैं लरिका: लक्ष्मण अभी बालक हैं, पानी लेने गए हैं • परखो घाम घरीक: छाया में एक घड़ी खड़े होकर प्रतीक्षा करें • पोंछि पसेउ बयारि: मैं आपका पसीना पोंछकर पंखा झल दूँ • भूभुरि-डाढ़े पाँय: गर्म रेत/धूल से जले पैरों को धो दूँ • प्रिया श्रम जानि कै: पत्नी सीता को अत्यंत थकी हुई जानकर • बिलंब कंटक काढ़े: राम देर तक बैठकर कांटे निकालते रहे • नाह को नेह लख्यो: स्वामी (पति) के इस असीम प्रेम को देखकर • पुलक्यौ तनु: सीता जी का रोम-रोम पुलकित हो उठा • बारि बिलोचन बाढ़े: नेत्रों में प्रेमाश्रु उमड़ आए कांटा निकालने के बहाने सीता को विश्राम देने की चतुर लीला पैनल 4: काव्य-सौंदर्य, रस, छंद, अलंकार एवं शब्द-कोश साहित्यिक ब्रजभाषा का शिखर १. रस, गुण एवं छंद मुख्य रस: शृंगार रस (संयोग व विप्रलंभ का सम्मिश्रण) गौण रस: करुण रस (सीता जी की थकान व विवशता) काव्य गुण: माधुर्य एवं प्रसाद गुण छंद विधान: सवैया छंद (23 वर्ण, मत्तगयंद सवैया) शैली: चित्रात्मक, संवादात्मक एवं भावपूर्ण संगीतात्मकता एवं गेयता का अनुपम योग प्रत्येक पंक्ति में यति और गति का पूर्ण संतुलन है। कंठस्थ करने योग्य सहज और मधुर पदावली २. अलंकार विधान • अनुप्रास अलंकार: - 'धरि धीर दए' ('ध' और 'द' वर्ण की आवृत्ति) - 'चारु चलीं जल च्वै' ('च' वर्ण की सुंदर आवृत्ति) - 'घाम घरीक' ('घ' वर्ण की आवृत्ति) - 'पाँय पखारिहौं' ('प' वर्ण की आवृत्ति) - 'कंटक काढ़े' ('क' वर्ण की आवृत्ति) - 'नाह को नेह' ('न' वर्ण की आवृत्ति) - 'बारि बिलोचन बाढ़े' ('ब' वर्ण की आवृत्ति) • स्वभावोक्ति अलंकार: सीता की स्वाभाविक थकान और राम की आँखों से आँसू टपकने का यथार्थ स्वाभाविक चित्रण। अलंकार भावों को अलंकृत करते हैं ३. ब्रजभाषा शब्दावली (Word Bank) रघुबीर-बधू: श्री राम की पत्नी (सीता जी) भाल: माथा / मस्तक कनी जल की: पसीने की बूँदें मधुराधर: कोमल मधुर होंठ पर्नकुटी: पत्तों से बनी कुटिया तिय / पिय: पत्नी (स्त्री) / पति (प्रियतम) लक्खन / लरिका: लक्ष्मण / लड़का (बालक) घरीक / ठाढ़े: एक घड़ी (थोड़ी देर) / खड़े होकर पसेउ / बयारि: पसीना / हवा (पंखा झलना) भूभुरि-डाढ़े: गर्म रेत से तपे हुए (पैर) कंटक / बिलोचन: काँटा / सुंदर आँखें बारि बाढ़े: आँसू उमड़ आए पैनल 5: चरित्र-दर्शन, जीवन-मूल्य एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ दांपत्य आदर्श एवं सप्रसंग व्याख्या सूत्र १. दांपत्य प्रेम के उच्चतम मानक सीता जी का त्याग व समर्पण: • महलों के राजसी सुख छोड़कर पति के संग वन जाना। • स्वयं थकने पर भी पति के पसीने व पैरों की चिंता। • देवर लक्ष्मण के प्रति वात्सल्य और स्नेह का भाव। श्री राम की संवेदनशीलता व चातुर्य: • पत्नी के कष्ट पर अश्रुपात—अहंकार-मुक्त प्रेम। • सीता को विश्राम देने हेतु देर तक कांटे निकालने का बहाना। • पत्नी के आत्मसम्मान और संकोच की पूर्ण रक्षा। सीख: सच्चा प्रेम शब्दों में नहीं, मौन सेवा में है कठिन समय में एक-दूसरे का संबल बनना ही पारिवारिक सुख की आधारशिला है। सुख में सब साथी होते हैं, दुःख में साथ निभाना ही धर्म है २. सप्रसंग व्याख्या का 4-चरणीय सूत्र Step 1: संदर्भ (Context): प्रस्तुत सवैया हमारी पाठ्यपुस्तक 'वसंत भाग 1' के पाठ 'वन के मार्ग में' से लिया गया है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं। यह 'कवितावली' से संकलित है। Step 2: प्रसंग (Background): यहाँ सीता जी के वन-गमन की सुकुमारता/राम के कांटा निकालने की लीला का मार्मिक वर्णन है। Step 3: भावार्थ (Detailed Meaning): शब्दों के भाव को स्पष्ट करते हुए सरल भाषा में अर्थ। Step 4: विशेष/काव्य-सौंदर्य (Poetic Beauty): ब्रजभाषा, सवैया छंद, अनुप्रास अलंकार, माधुर्य गुण। यह 4-स्टेप ढाँचा पूरे 5 अंक दिलाता है ३. संभावित महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न Q1. सीता जी के माथे पर पसीना क्यों आ गया? Ans: वे महलों की सुकुमारी थीं, कभी पैदल नहीं चली थीं, इसलिए थोड़ी दूर चलने पर ही पसीना आ गया। Q2. श्री राम की आँखों से आँसू क्यों बहने लगे? Ans: अपनी सुकुमारी पत्नी को प्यास और थकान से व्याकुल देखकर राम का हृदय पिघल गया। Q3. राम देर तक बैठकर कांटे क्यों निकालते रहे? Ans: वे सीता जी को थकी जानकर उन्हें विश्राम देने के लिए जानबूझकर समय लगा रहे थे। Q4. 'नाह को नेह लख्यो' का क्या अभिप्राय है? Ans: पति राम के अगाध प्रेम को देखकर सीता जी रोमांचित हो उठीं और उनके नेत्र सजल हो गए। ब्रजभाषा के मूल शब्दों के उद्धरण अवश्य दें

१. महाकवि तुलसीदास, 'कवितावली' एवं काव्य-परिवेश

भक्तिकाल के अमर महाकवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा ब्रजभाषा में रचित 'कवितावली' (अयोध्याकांड) के सवैयों का ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय विश्लेषण।

१.१ गोस्वामी तुलसीदास का जीवन और काव्य-दृष्टि

हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की सगुण रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि गोस्वामी तुलसीदास (1532–1623 ई.) भारतीय संस्कृति और काव्य-जगत के दैदीप्यमान सूर्य हैं। उनका जन्म बाँदा जिले (उत्तर प्रदेश) के राजापुर गाँव में माना जाता है। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। तुलसीदास जी का बचपन अत्यंत अभावों और संघर्षों में बीता, किंतु गुरु नरहरिदास की कृपा से उन्हें राम-भक्ति का पावन मार्ग मिला।

तुलसीदास जी समन्वयवादी कवि थे। उन्होंने अवधी और ब्रजभाषा दोनों पर समान अधिकार के साथ कालजयी साहित्य का सृजन किया। जहाँ उनका अमर महाकाव्य 'श्रीरामचरितमानस' अवधी भाषा के दोहा-चौपाई छंद में रचा गया है, वहीं 'कवितावली', 'गीतावली' और 'विनयपत्रिका' ब्रजभाषा के माधुर्य और छंद-विधान के बेजोड़ उदाहरण हैं। 'कवितावली' में तुलसीदास जी ने कवित्त और सवैया छंदों का प्रयोग करते हुए राम-कथा के विभिन्न मार्मिक प्रसंगों को मुक्तक रूप में प्रस्तुत किया है।

१.२ अयोध्या से वन-गमन की पौराणिक पृष्ठभूमि

यह पाठ 'कवितावली' के 'अयोध्याकांड' से संकलित है। इसकी पृष्ठभूमि राजा दशरथ द्वारा श्री राम के राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा के षड्यंत्र से प्रेरित रानी कैकेयी के दो वरदानों से जुड़ी है। कैकेयी के वरदान के अनुसार भरत को अयोध्या का राजसिंहासन और श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया गया।

श्री राम ने पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया। यद्यपि माता सीता और लक्ष्मण को वन जाने का कोई आदेश नहीं था, किंतु सीता जी ने महलों के राजसी सुखों और दास-दासियों की सेवा को त्यागकर अपने पति के संग वन-मार्ग में चलने का निर्णय लिया। इसी प्रकार अनुज लक्ष्मण भी दोनों की सेवा हेतु साथ चल पड़े। यह पाठ उस समय का सजीव चित्र खींचता है जब तीनों अयोध्या की सुखद सीमाओं को पार कर बीहड़, उजाड़ और काँटेदार वन के मार्ग पर पहला कदम रखते हैं।

१.३ सवैया छंद का शास्त्रीय वैशिष्ट्य

प्रस्तुत दोनों पद सवैया छंद (मत्तगयंद सवैया) में रचित हैं:

  • वर्णिक छंद: सवैया एक अत्यंत लोकप्रिय वर्णिक वृत्त है, जिसमें प्रत्येक चरण में 22 से 26 वर्ण होते हैं। मत्तगयंद सवैया में 23 वर्ण (सात भगण और दो गुरु) होते हैं।
  • गेयता एवं नाद-सौंदर्य: इस छंद में एक स्वाभाविक प्रवाह, झंकार और संगीतात्मकता होती है, जिससे इसे अत्यंत मधुर स्वर में गाया जा सकता है।
  • भाव-प्रकाशन: शृंगार और करुण रस के सुकोमल भावों को व्यक्त करने के लिए सवैया छंद हिंदी काव्य का सबसे उपयुक्त माध्यम माना गया है।

मॉड्यूल 2: प्रथम सवैया — सीता जी की सुकुमारता और श्री राम का अश्रुपात

२. प्रथम सवैया: सुकुमारी जानकी की थकान एवं राम का द्रवित होना

"पुर तें निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दए मग में डग द्वै..." — सुकोमल मानवीय भावनाओं और दांपत्य करुणा की अमर अभिव्यक्ति।

मूल सवैया (प्रथम पद)

पुर तें निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दए मग में डग द्वै।
झलकीं भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गए मधुराधर वै।
फिरि बूझति हैं, 'चलनो अब केतिक, पर्नकुटी करिहौ कित ह्वै?'
तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै।

२.१ प्रथम सवैया के कठिन शब्दों के मानक अर्थ (Word Meanings)

ब्रजभाषा शब्द मानक हिंदी अर्थ काव्यगत संदर्भ / व्याख्या
पुर तें नगर से (अयोध्या नगरी से) महलों और अयोध्या की सीमा से बाहर निकलते ही
रघुबीर-बधू श्री राम की पत्नी (सीता जी) रघुकुल के श्रेष्ठ नायक श्री राम की वधू
धरि धीर धैर्य धारण करके मन को मजबूत और शांत रखकर
मग में डग द्वै रास्ते में दो ही कदम (थोड़ी दूर) सुकुमारता के कारण थोड़ी दूरी ही तय कर पाईं
भाल / कनी जल की माथा / पसीने की बूँदें माथे पर मोतियों जैसी पसीने की बूँदें चमक उठीं
पुट / मधुराधर दोनों पुट (होंठ) / कोमल मधुर ओंठ प्यास और गर्मी से कोमल होंठ सूख गए
बूझति हैं / केतिक पूछती हैं / कितना / कहाँ तक व्याकुल होकर प्रश्न पूछती हैं कि कितनी दूर चलना है
पर्नकुटी / कित पत्तों की कुटिया / कहाँ पर विश्राम के लिए पत्तों की झोपड़ी कहाँ बनेगी
तिय / पिय पत्नी (स्त्री) / पति (प्रियतम राम) सीता जी एवं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम
चारु / जल च्वै सुंदर / आँसू चूने (टपकने) लगे राम की सुंदर आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली

२.२ सप्रसंग व्याख्या (Detailed Explanation)

संदर्भ: प्रस्तुत सवैया हमारी पाठ्यपुस्तक 'वसंत भाग 1' के पाठ 14 'वन के मार्ग में' से लिया गया है। इसके रचयिता भक्तिकाल के महान कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। यह पद उनकी प्रसिद्ध ब्रजभाषा रचना 'कवितावली' (अयोध्याकांड) से संकलित है।

प्रसंग: इसमें अयोध्या से वन जाते समय सुकुमारी सीता जी की शारीरिक थकान, व्याकुलता और अपनी पत्नी का कष्ट देखकर श्री राम के अत्यंत द्रवित होने का कारुणिक चित्रण किया गया है।

भावार्थ: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि रघुकुल के शिरोमणि श्री राम की वधू सीता जी महलों से बाहर निकलकर धैर्य धारण करके रास्ते में अभी दो ही कदम (थोड़ी ही दूर) चली थीं कि उनके सुंदर माथे पर पसीने की बूँदें झलकने लगीं। तेज धूप और प्यास के कारण उनके दोनों कोमल और मधुर होंठ सूख गए। वे अपनी व्याकुलता छिपा न सकीं और भोलेपन से श्री राम से पूछने लगीं कि—"हे प्रियतम! अभी और कितनी दूर चलना है? और हम विश्राम करने के लिए पत्तों की कुटिया (पर्णकुटी) कहाँ पर बनाएंगे?" अपनी सुकुमारी पत्नी की इस व्याकुलता, लाचारी और कष्ट को देखकर प्रियतम श्री राम की अत्यंत सुंदर आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली।

काव्य-सौंदर्य: यहाँ सीता जी की सुकुमारता का यथार्थ चित्रण हुआ है। श्री राम का रोना उनकी मानवीय संवेदनशीलता और अपनी पत्नी के प्रति अगाध प्रेम को सिद्ध करता है। भाषा मधुर ब्रजभाषा है और सवैया छंद में सुंदर संगीतात्मक प्रवाह है।

मॉड्यूल 3: द्वितीय सवैया — दांपत्य प्रेम और काँटा निकालने की मधुर लीला

३. द्वितीय सवैया: काँटा निकालने की लीला एवं दांपत्य का उच्चतम आदर्श

"जल को गए लक्खन, हैं लरिका परखो, पिय! घाम घरीक ह्वै ठाढ़े..." — परस्पर सेवा, त्याग और मूक प्रेम की अनुपम दांपत्य लीला।

मूल सवैया (द्वितीय पद)

जल को गए लक्खन, हैं लरिका परखो, पिय! घाम घरीक ह्वै ठाढ़े।
पोंछि पसेउ बयारि करौं, अरु पाँय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े।
तुलसी रघुबीर प्रिया श्रम जानि कै बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े।
जानकी नाह को नेह लख्यो, पुलक्यौ तनु, बारि बिलोचन बाढ़े।

३.१ द्वितीय सवैया के कठिन शब्दों के मानक अर्थ (Word Meanings)

ब्रजभाषा शब्द मानक हिंदी अर्थ काव्यगत संदर्भ / व्याख्या
लक्खन / लरिका लक्ष्मण / लड़का (बालक) देवर लक्ष्मण के प्रति वात्सल्य और अपनत्व
परखो / पिय प्रतीक्षा कीजिए / हे प्रियतम! सीता जी अपने पति से रुकने का अनुरोध करती हैं
घाम घरीक ठाढ़े धूप से बचकर एक घड़ी खड़े होकर किसी वृक्ष की छाया में थोड़ी देर सुस्ताने का सुझाव
पोंछि पसेउ बयारि पसीना पोंछकर पंखा (हवा) करूँगी पति के पसीने को पोंछकर शीतल हवा झलना
पाँय पखारिहौं दोनों पैरों को जल से धोऊँगी धूल और जलते पत्थरों से तपे चरणों की सेवा
भूभुरि-डाढ़े गर्म रेत या तपी हुई बालू से जले हुए तेज धूप में तपती जमीन पर नंगे पाँव चलने की व्यथा
प्रिया श्रम जानि कै सीता को अत्यधिक थकी हुई जानकर राम ने पत्नी की भीषण थकान को तुरंत पहचान लिया
बिलंब कंटक काढ़े देर तक बैठकर काँटा निकालते रहे सीता को विश्राम देने हेतु जानबूझकर समय लगाया
नाह को नेह लख्यो स्वामी (पति) के इस अगाध प्रेम को देखा सीता जी समझ गईं कि राम केवल उनके लिए बैठे हैं
पुलक्यौ तनु / बिलोचन बाढ़े शरीर रोमांचित हो उठा / नेत्रों में आँसू बढ़ गए कृतज्ञता और प्रेमाश्रुओं का अलौकिक संगम

३.२ सप्रसंग व्याख्या (Detailed Explanation)

संदर्भ: प्रस्तुत सवैया हमारी पाठ्यपुस्तक 'वसंत भाग 1' के पाठ 14 'वन के मार्ग में' से उद्धृत है। इसके रचयिता भक्तिकाल के शिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं और यह 'कवितावली' (अयोध्याकांड) से लिया गया है।

प्रसंग: इस पद में वन के मार्ग में श्री राम और सीता जी के परस्पर अनूठे दांपत्य प्रेम, परोपकार और काँटा निकालने के बहाने सीता को विश्राम देने की चतुर लीला का वर्णन किया गया है।

भावार्थ: जब तीनों आगे बढ़ते हैं और सीता जी देखती हैं कि श्री राम भी थक रहे हैं, तो वे स्वयं रुकने का आग्रह करने में संकोच करती हैं। वे लक्ष्मण का सहारा लेकर कहती हैं—"हे प्रियतम! लक्ष्मण अभी बालक हैं और वे पानी लेने गए हैं। जब तक वे लौटते हैं, तब तक आप किसी पेड़ की छाया में एक घड़ी (थोड़ी देर) खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर लीजिए। तब तक मैं आपके शरीर का पसीना पोंछकर आपको हवा झल दूँगी, और गर्म रेत से जले हुए आपके पैरों को जल से धो दूँगी।" तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम अंतर्यामी हैं, वे अपनी प्रिया सीता की इस भारी थकान को तुरंत समझ गए। सीता जी को संकोच न हो और उन्हें विश्राम मिल सके, इसलिए श्री राम स्वयं छाया में बैठ गए और जानबूझकर बहुत देर तक अपने पैरों में चुभे काँटे निकालने लगे। जब जानकी जी ने अपने पति (नाथ) के इस अगाध, निश्छल और मूक प्रेम को देखा, तो उनका संपूर्ण शरीर रोमांचित (पुलकित) हो उठा और उनके सुंदर नेत्रों में आनंद तथा कृतज्ञता के प्रेमाश्रु छलक आए।

काव्य-सौंदर्य: यहाँ दांपत्य प्रेम की पराकाष्ठा है जहाँ वाणी के बिना ही हृदय के भाव एक-दूसरे तक पहुँच जाते हैं। 'कंटक काढ़े', 'नाह को नेह' और 'बारि बिलोचन बाढ़े' में अनुप्रास अलंकार का अलौकिक सौंदर्य है। सवैया छंद की गेयता अत्यंत मनोहारी है।

मॉड्यूल 4: दोनों सवैयों का काव्य-सौंदर्य, रस, छंद और अलंकार विश्लेषण

४. काव्य-सौंदर्य: रस, छंद, अलंकार एवं शिल्प विधान

महाकवि तुलसीदास की अमर कृति 'कवितावली' के सवैयों में साहित्यिक ब्रजभाषा, माधुर्य गुण एवं नाद-सौंदर्य का अनुपम संगम।

४.१ रस एवं काव्य गुण (Rasa & Guna)

इन दोनों सवैयों में भावों की अत्यंत सूक्ष्म और सुकोमल अभिव्यक्ति हुई है:

  • शृंगार रस (संयोग व विप्रलंभ का सम्मिश्रण): इन पदों में दांपत्य प्रेम का अलौकिक रूप प्रकट हुआ है। राम और सीता एक-दूसरे के सम्मुख हैं, इसलिए संयोग शृंगार है; किंतु वन-मार्ग के कष्ट और वियोग की आशंका के कारण इसमें विप्रलंभ की सुकोमल छाया भी उपस्थित है।
  • करुण रस (Karuna Rasa): महलों में पली सुकुमारी जानकी के माथे पर पसीना और उनके होंठों का सूखना देखकर पाठक और दर्शक का हृदय भी करुणा से भर उठता है। राम की आँखों से आँसू बहने में कारुणिक संवेदना अपनी चरम सीमा पर है।
  • माधुर्य गुण एवं वैदर्भी रीति: कर्णकटु वर्णों का पूर्ण अभाव है। कोमलकांत पदावली और ब्रजभाषा की मिठास के कारण यह काव्य हृदय को आनंदित और द्रवित करता है।

४.२ मत्तगयंद सवैया छंद (Metrical Structure)

सवैया छंद हिंदी साहित्य का अत्यंत लोकप्रिय और मनभावन वर्णिक छंद है:

लक्षण: मत्तगयंद सवैया में प्रत्येक चरण में 23 वर्ण होते हैं। इसका शास्त्रीय गण-विधान 'सात भगण' (भ = ऽ।।) और अंत में 'दो गुरु' (ऽऽ) का होता है।

इस छंद की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्वाभाविक गति और यति है। जब इसे स्वरबद्ध करके गाया जाता है, तो इसके प्रत्येक चरण के अंत में एक अद्भुत नाद-झंकार उत्पन्न होती है जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।

४.३ अलंकार सौंदर्य (Poetic Ornaments)

पाठ में निम्नलिखित अलंकारों का अत्यंत स्वाभाविक और मनोरम प्रयोग हुआ है:

  1. छेकानुप्रास एवं वृत्यनुप्रास अलंकार: अनेक पंक्तियों में एक ही व्यंजन वर्ण की सुंदर आवृत्ति हुई है:
    • 'धरि धीर दए' — 'ध' और 'द' वर्ण की आवृत्ति।
    • 'चारु चलीं जल च्वै' — 'च' वर्ण की आवृत्ति से नाद-सौंदर्य की सृष्टि।
    • 'घाम घरीक' — 'घ' वर्ण की आवृत्ति।
    • 'पाँय पखारिहौं' — 'प' वर्ण की आवृत्ति।
    • 'कंटक काढ़े' — 'क' वर्ण की आवृत्ति।
    • 'नाह को नेह' — 'न' वर्ण की आवृत्ति।
    • 'बारि बिलोचन बाढ़े' — 'ब' वर्ण की अत्यंत मनमोहक आवृत्ति।
  2. स्वभावोक्ति अलंकार: जब किसी स्वाभाविक स्थिति का बिना किसी अतिशयोक्ति के ज्यों-का-त्यों सजीव चित्रण किया जाए। सीता जी के माथे पर पसीना छलकना, होंठों का सूखना और राम का रोना अत्यंत स्वाभाविक और मानवीय है।
  3. रूपक एवं मानवीकरण की छटा: 'मधुराधर' (अधरों की मधुरता) और 'कनी जल की' (पसीने की बूँदों का मोतियों सा झलकना)।

मॉड्यूल 5: चरित्र-चित्रण — श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण का आदर्श स्वरूप

५. चरित्र-दर्शन: मर्यादा, त्याग और पारिवारिक समरसता

श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण के पावन चरित्रों के माध्यम से भारतीय पारिवारिक संस्कृति और दांपत्य निष्ठा के उच्चतम आदर्शों का प्रकटीकरण।

५.१ माता सीता: त्याग, सुकुमारता और पातिव्रत की मूर्ति

सीता जी राजा जनक की लाड़ली पुत्री और अयोध्या की पटरानी बनने वाली थीं। उनका जीवन राजमहलों के विलास और दासियों की सेवा में बीता था:

  • अपार त्याग: जब श्री राम को वनवास मिला, तो सीता जी ने महलों के सारे सुखों को एक पल में ठुकराकर पति के साथ वन जाने का निश्चय किया।
  • शारीरिक सुकुमारता: वे कभी धूप और काँटों में नहीं चली थीं, अतः थोड़ी ही दूर चलने पर उनके माथे पर पसीना आ गया और होंठ सूख गए।
  • पति के प्रति अगाध चिंता: स्वयं भयंकर रूप से थकी होने के बावजूद वे अपने कष्ट को छिपाकर राम के पसीने और गर्म पैरों की चिंता करती हैं।
  • देवर के प्रति वात्सल्य: लक्ष्मण को 'लरिका' (बालक) कहकर उनके प्रति मातृत्व और स्नेह का भाव दर्शाती हैं।

५.२ श्री राम: मर्यादा पुरुषोत्तम एवं संवेदनशील जीवन-साथी

तुलसीदास जी ने यहाँ श्री राम को केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील और विचारशील पति के रूप में चित्रित किया है:

  • पत्नी के कष्ट पर अश्रुपात: सीता को व्याकुल देखकर राम की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। यह उनके कोमल हृदय और निष्कलंक प्रेम को प्रकट करता है।
  • प्रेमपूर्ण चातुर्य: जब वे देखते हैं कि सीता जी संकोचवश रुकने को तैयार नहीं हैं, तो वे जानबूझकर देर तक बैठकर अपने पैरों से काँटे निकालते हैं ताकि सीता को विश्राम मिल सके।
  • सच्चा दांपत्य सम्मान: राम सीता के स्वाभिमान और संकोच का पूरा सम्मान करते हैं और बिना एक भी शब्द बोले उन्हें राहत पहुँचाते हैं।

५.३ अनुज लक्ष्मण: निष्काम सेवा और भ्रातृ-धर्म का शिखर

यद्यपि लक्ष्मण पद में प्रत्यक्ष उपस्थित नहीं हैं, किंतु सीता जी के संवाद "जल को गए लक्खन, हैं लरिका" से स्पष्ट होता है कि लक्ष्मण वन के मार्ग में अपने अग्रज राम और भाभी सीता की सेवा के लिए निरंतर समर्पित हैं। वे भीषण धूप में दोनों के लिए पीने का शीतल जल ढूँढने गए हैं। उनका त्याग और भ्रातृ-निष्ठा भारतीय पारिवारिक संस्कृति का अनुपम आदर्श है।

मॉड्यूल 6: 'भाषा की बात', ब्रजभाषा शब्दावली और व्याकरण

६. भाषा की बात (व्याकरण) एवं ब्रजभाषा शब्द-कोश

सीआईएससीई एवं एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के अनुसार ब्रजभाषा से मानक हिंदी रूपांतरण, शब्द-युग्म और परीक्षा व्याकरण।

६.१ ब्रजभाषा शब्दों का मानक हिंदी रूप (Master Word Bank)

ब्रजभाषा पद मानक हिंदी रूप व्याकरणिक कोटि / अर्थ
पुर तें नगर से अपादान कारक (अयोध्या नगर से बाहर)
डग द्वै दो कदम (थोड़ी दूर) संख्यावाचक विशेषण + संज्ञा
भाल माथा / मस्तक तत्सम संज्ञा
कनी जल की पसीने की बूँदें 'कनी' = कण/बूँद, 'जल' = पसीना/स्वेद
पुट / मधुराधर दोनों होंठ / कोमल मधुर ओंठ कर्मधारय समास (मधुर + अधर)
बूझति हैं / केतिक पूछती हैं / कितना (कहाँ तक) क्रिया पद / परिमाणवाचक प्रश्न
पर्नकुटी / कित पत्तों की झोपड़ी / कहाँ तत्पुरुष समास (पर्ण की कुटी)
तिय / पिय स्त्री (पत्नी) / प्रियतम (पति) तद्भव संज्ञा शब्द-युग्म
चारु / च्वै सुंदर / टपकना (चूना) विशेषण / क्रिया
लरिका / परखो बालक (लड़का) / प्रतीक्षा कीजिए संज्ञा / प्रेरणार्थक क्रिया
पसेउ / बयारि पसीना / हवा (पंखा झलना) तद्भव शब्द (स्वेद $ ightarrow$ पसेउ)
पाँय पखारिहौं पैर धोऊँगी भविष्यत् काल क्रिया
भूभुरि-डाढ़े गर्म रेत से तपे हुए विशेषण पद (भूभुरि = गर्म रेत)
कंटक / बिलंब लौं काँटा / देर तक तत्सम संज्ञा / क्रिया-विशेषण
नाह / नेह नाथ (पति) / स्नेह (प्रेम) भाववाचक संज्ञा
पुलक्यौ तनु शरीर रोमांचित हो उठा रोमांच का सात्विक भाव
बारि बिलोचन बाढ़े नेत्रों में आँसू उमड़ आए बारि = जल, बिलोचन = आँखें

६.२ महत्वपूर्ण शब्द-युग्म एवं विपरीतार्थक शब्द

  • तिय - पिय: पत्नी - पति (अनुप्रासयुक्त शब्द-युग्म)
  • धीर - अधीर: धैर्यवान - व्याकुल/धैर्यहीन (विलोम)
  • घाम - छाँह: धूप - छाया (विलोम)
  • कंटक - कुसुम: काँटा - फूल (विलोम)
  • नेह - द्वेष: प्रेम - ईर्ष्या/शत्रुता (विलोम)

मॉड्यूल 7: नैतिक शिक्षा, आधुनिक जीवन-मूल्य और परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ

७. नैतिक शिक्षा, आधुनिक जीवन-मूल्य एवं परीक्षा तकनीक

कठिन समय में धैर्य, त्याग और दांपत्य निष्ठा की अमर प्रेरणा तथा बोर्ड परीक्षा में शत-प्रतिशत अंक प्राप्ति सूत्र।

७.१ विद्यार्थियों के लिए नैतिक एवं चारित्रिक संदेश

'वन के मार्ग में' पाठ आधुनिक विद्यार्थियों को निम्नलिखित शाश्वत जीवन-मूल्य सिखाता है:

  1. विपरीत परिस्थितियों में धैर्य (धरि धीर): जीवन सदा सुखद नहीं रहता; जब भी कोई संकट आए, तो विचलित होने के बजाय धैर्य से काम लेना चाहिए।
  2. सुख-दुःख में परस्पर सहयोग: सच्चा जीवन-साथी या सच्चा मित्र वही है जो केवल सुख में ही नहीं, बल्कि दुःख और विपत्ति में भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ निभाए।
  3. स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता: श्री राम का अपनी थकी हुई पत्नी के प्रति आदर, संकोच और काँटे निकालने का उपक्रम यह सिखाता है कि पुरुषों को सदैव घर की स्त्रियों और अपनी संगिनी के प्रति संवेदनशील और सहयोगी होना चाहिए।
  4. मूक सेवा का मूल्य: प्रेम शब्दों के लंबे भाषणों में नहीं, बल्कि चुपचाप एक-दूसरे के कष्ट को दूर करने के छोटे-छोटे प्रयासों में झलकता है।

७.२ सप्रसंग व्याख्या लेखन का 4-चरणीय स्वर्ण नियम (Board Exam Strategy)

बोर्ड परीक्षा में सवैयों की व्याख्या लिखते समय पूरे 5 में से 5 अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर को सदैव इन चार शीर्षकों में विभाजित करें:

  • १. संदर्भ: पाठ्यपुस्तक 'वसंत भाग 1', पाठ 'वन के मार्ग में', कवि गोस्वामी तुलसीदास, मूल ग्रंथ 'कवितावली' (अयोध्याकांड)।
  • २. प्रसंग: पद की घटना का 2-3 पंक्तियों में सार (जैसे—सीता जी की थकान या राम द्वारा काँटा निकालना)।
  • ३. भावार्थ: प्रत्येक पंक्ति के कठिन शब्दों को स्पष्ट करते हुए विशद और सरल भाषा में अर्थ।
  • ४. काव्य-सौंदर्य / विशेष: (अ) ब्रजभाषा, (आ) सवैया छंद, (इ) अनुप्रास व स्वभावोक्ति अलंकार, (ई) माधुर्य गुण, (उ) शृंगार व करुण रस।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
अयोध्या नगर से बाहर निकलते ही सीता जी के माथे पर पसीने की बूँदें क्यों झलकने लगीं और उनके होंठ क्यों सूख गए?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (2 अंक):
सीता जी मिथिला के राजा जनक की लाड़ली पुत्री और अयोध्या के राजमहलों की रानी थीं। वे सदा पालकियों और रेशमी सुखों में रही थीं और उन्होंने कभी धूप में नंगे पाँव पैदल चलना नहीं सीखा था। जब वे वन के बीहड़ मार्ग पर अभी थोड़ी ही दूर (डग द्वै) चली थीं, तो तेज धूप, जेठ की गर्मी और अपार शारीरिक थकान के कारण उनके माथे पर पसीने की बूँदें झलकने लगीं तथा प्यास के कारण उनके कोमल मधुर होंठ सूख गए।

उदाहरण 2
'फिरि बूझति हैं, चलनो अब केतिक, पर्नकुटी करिहौ कित ह्वै?' — सीता जी के इस कथन से उनके किस स्वभाव और स्थिति का पता चलता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (3 अंक):
सीता जी के इस कथन से उनकी निम्नलिखित स्थितियों और स्वभाव का पता चलता है:

  1. अत्यधिक शारीरिक थकान: थोड़ी दूर चलने पर ही सीता जी का कोमल शरीर थककर चूर हो गया था और वे अब आगे चलने में असमर्थ महसूस कर रही थीं।
  2. विश्राम की स्वाभाविक चाह: वे जल्द से जल्द किसी कुटिया में बैठकर आराम करना चाहती थीं, इसलिए पूछती हैं कि पत्तों की कुटिया कहाँ बनेगी।
  3. बाल-सुलभ भोलापन: महलों में रहने वाली सुकुमारी जानकी को वन के असीम विस्तार का कोई अनुभव नहीं था। उन्हें लगा कि कुटिया थोड़ी ही दूर पर बन जाएगी।
उदाहरण 3
सीता जी की आतुरता (व्याकुलता) देखकर श्री राम की आँखों से आँसू क्यों बहने लगे? स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (3 अंक):
सीता जी की व्याकुलता देखकर श्री राम के रोने के निम्नलिखित मुख्य कारण थे:

  • पत्नी के प्रति अगाध प्रेम: श्री राम अपनी पत्नी सीता से अगाध प्रेम करते थे। जब उन्होंने देखा कि महलों की रानी के माथे से पसीना बह रहा है और प्यास से होंठ सूख रहे हैं, तो उनका हृदय हाहाकार कर उठा।
  • संकोच और पश्चाताप: राम के मन में यह भाव आया कि वनवास का आदेश तो केवल उन्हें मिला था, किंतु उनके कारण इस सुकुमारी जानकी को भी यह भीषण कष्ट भोगना पड़ रहा है।
  • मानवीय संवेदना: तुलसीदास जी ने यहाँ राम के मर्यादा पुरुषोत्तम ईश्वर रूप के साथ-साथ एक अत्यंत संवेदनशील, दयालु और सहृदय पति के मानवीय रूप को उजागर किया है।
उदाहरण 4
द्वितीय सवैया में सीता जी ने लक्ष्मण का सहारा लेकर श्री राम को विश्राम देने का प्रस्ताव किस प्रकार रखा? इसमें उनकी कौन-सी दांपत्य भावना प्रकट होती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (4 अंक):

द्वितीय सवैया में सीता जी की संकोचपूर्ण सेवा-भावना और दांपत्य निष्ठा अत्यंत सुंदर ढंग से प्रकट हुई है:

  1. चतुर प्रस्ताव: सीता जी स्वयं भीषण थकी हुई थीं, किंतु वे संकोचवश सीधे यह नहीं कहतीं कि वे थक गई हैं। वे कहती हैं कि लक्ष्मण अभी बालक हैं और पानी लेने गए हैं, इसलिए जब तक वे लौटते हैं, तब तक किसी वृक्ष की छाया में एक घड़ी खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर लीजिए।
  2. पति-सेवा का संकल्प: सीता जी कहती हैं कि इस बीच मैं आपके शरीर का पसीना पोंछकर आपको हवा झलूँगी और गर्म रेत से तपे आपके पैरों को शीतल जल से धोऊँगी।
  3. दांपत्य भावना: यहाँ सीता जी की आत्म-बलिदान की भावना दिखाई देती है। उन्हें अपने पैरों के छालों और थकान की चिंता नहीं है, बल्कि वे अपने पति को तनिक-सी राहत देने के लिए व्याकुल हैं। यही भारतीय नारी का आदर्श पातिव्रत है।
उदाहरण 5
श्री राम द्वारा देर तक बैठकर काँटा निकालने के पीछे क्या रहस्य था? इससे उनके चरित्र की कौन-सी विशेषता उजागर होती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (4 अंक):

'तुलसी रघुबीर प्रिया श्रम जानि कै बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े' पंक्ति में श्री राम के प्रेम का गहरा रहस्य छिपा हुआ है:

  • प्रेम का रहस्य: श्री राम अंतर्यामी थे। वे समझ गए कि सीता जी केवल उनके विश्राम की बात कर रही हैं, जबकि वास्तव में स्वयं सीता जी की देह थकान से टूट रही है। सीता जी संकोचवश बैठने को तैयार नहीं थीं। अतः सीता को विश्राम देने के उद्देश्य से श्री राम स्वयं बैठ गए और जानबूझकर बहुत देर तक अपने पैरों से काँटे निकालने का उपक्रम करते रहे।
  • मूक संवेदनशीलता: राम ने बिना कहे सीता जी को आराम करने का पूरा समय दे दिया।
  • चारित्रिक विशेषता: इससे श्री राम के अत्यंत संवेदनशील, चतुर, मर्यादावान और अपनी जीवन-संगिनी का सम्मान करने वाले आदर्श पति के रूप का दर्शन होता है। उनका प्रेम केवल शब्दों का नहीं, बल्कि मूक और व्यावहारिक कर्म का प्रेम है।
उदाहरण 6
'वन के मार्ग में' पाठ के आधार पर गोस्वामी तुलसीदास के काव्य-सौंदर्य (रस, छंद, अलंकार, भाषा) और दांपत्य आदर्श पर सविस्तार प्रकाश डालिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (5 अंक):

१. भाषा एवं छंद सौंदर्य:
प्रस्तुत दोनों पद गोस्वामी तुलसीदास की प्रसिद्ध कृति 'कवितावली' (अयोध्याकांड) से संकलित हैं। इनकी भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है, जिसमें कोमलकांत पदावली और माधुर्य गुण की प्रधानता है। छंद मत्तगयंद सवैया है (23 वर्णिक), जिसकी लय, गति और यति में एक स्वाभाविक संगीतात्मक झंकार बजती है।

२. रस एवं अलंकार विधान:

  • रस: मुख्य रस शृंगार (संयोग और विप्रलंभ का मधुर मिश्रण) है, जिसके साथ करुण रस की अंतर्धारा प्रवाहित है।
  • अनुप्रास अलंकार: 'धरि धीर', 'चारु चलीं जल च्वै', 'घाम घरीक', 'पाँय पखारिहौं', 'कंटक काढ़े', 'नाह को नेह' और 'बारि बिलोचन बाढ़े' में वर्णों की मधुर आवृत्ति से अद्भुत नाद-सौंदर्य उत्पन्न हुआ है।
  • स्वभावोक्ति अलंकार: सुकुमारी सीता के माथे पर पसीने की बूँदों और होंठ सूखने का यथार्थ स्वाभाविक चित्रण हुआ है।

३. दांपत्य आदर्श एवं मानवीय मूल्य:
यह काव्य भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी के रिश्ते की सर्वोच्च गरिमा को प्रस्तुत करता है। सीता जी का पति के संग वन जाना त्याग की मिसाल है। स्वयं कष्ट में रहकर पति के पसीने की चिंता करना नारी का समर्पण दिखाता है, जबकि राम का सीता को विश्राम देने हेतु देर तक काँटे निकालना पुरुषों के लिए संवेदनशीलता का पाठ है। जब जानकी पति के इस प्रेम को देखकर पुलकित होती हैं, तो दांपत्य प्रेम अलौकिक ऊँचाई को छू लेता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
अयोध्या से निकलते ही सीता जी के माथे और होंठों की क्या दशा हुई?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अयोध्या से निकलते ही थोड़ी दूर चलने पर सीता जी के माथे पर पसीने की बूँदें झलकने लगीं और प्यास व तेज धूप के कारण उनके दोनों कोमल मधुर होंठ सूख गए।
पसीने की बूँदें और प्यास से अधरों का सूखना याद करें।
2
सीता जी ने श्री राम से व्याकुल होकर क्या प्रश्न पूछा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सीता जी ने व्याकुल होकर पूछा—'हे प्रियतम! अभी और कितनी दूर चलना है और हम विश्राम करने के लिए पत्तों की कुटिया (पर्णकुटी) कहाँ बनाएंगे?'
पर्णकुटी और दूरी से संबंधित प्रश्न का स्मरण करें।
3
श्री राम की आँखों से आँसू क्यों बहने लगे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अपनी सुकुमारी पत्नी सीता को धूप, प्यास और थकान से व्याकुल देखकर तथा यह सोचकर कि उनके कारण सीता को यह कष्ट सहना पड़ रहा है, श्री राम की सुंदर आँखों से आँसू बहने लगे।
सुकुमारी पत्नी की आतुरता और महलों की राजकुमारी के कष्ट को याद करें।
4
द्वितीय सवैया में सीता जी ने श्री राम से छाया में खड़े होने का क्या कारण बताया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सीता जी ने कहा कि लक्ष्मण बालक हैं और जल लेने गए हैं, अतः जब तक वे लौटते हैं, तब तक किसी वृक्ष की छाया में एक घड़ी खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर लीजिए।
लक्ष्मण के जल लाने और बालक होने का प्रसंग सोचें।
5
श्री राम ने छाया में बैठकर बहुत देर तक काँटे क्यों निकाले?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: श्री राम समझ गए थे कि सीता जी अत्यधिक थक चुकी हैं और संकोचवश रुकने को तैयार नहीं हैं। अतः सीता को विश्राम देने के उद्देश्य से श्री राम ने जानबूझकर देर तक बैठकर काँटे निकालने का उपक्रम किया।
सीता की थकान और उन्हें विश्राम देने की चतुर लीला का विचार करें।
6
'नाह को नेह लख्यो, पुलक्यौ तनु, बारि बिलोचन बाढ़े' पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जब जानकी जी ने अपने पति (नाथ) के इस अगाध और मूक प्रेम को देखा कि वे केवल उन्हें विश्राम देने के लिए काँटा निकाल रहे हैं, तो सीता जी का रोम-रोम रोमांचित हो उठा और उनके नेत्रों में प्रेमाश्रु छलक आए।
पति के प्रेम को देखकर जानकी का रोमांचित होना और आँसू आना।
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