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ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 15
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

साँस-साँस में बाँस (Vasant)

पाठ का परिचय, लेखक एवं अनुवादक का योगदान: कक्षा 6 हिंदी 'वसंत भाग 1' का पंद्रहवाँ अध्याय 'साँस-साँस में बाँस' एक अत्यंत ज्ञानवर्धक, रोचक, सांस्कृतिक और पर्यावरणपरक निबंध है। इस पाठ के मूल लेखक प्रसिद्ध समाजशास्त्री एवं शोधकर्ता एलेक्स एम. जॉर्ज (Alex M. George) हैं, तथा इसका अत्यंत सहज, प्रवाहमयी और सुबोध हिंदी अनुवाद शशि सबलोक (Shashi Sablok) ने किया है। यह निबंध पूर्वोत्तर भारत (विशेष रूप से नागालैंड, असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश) के जनजीवन, जनजातीय परंपराओं और बाँस के साथ उनके अविभाज्य रिश्ते पर प्रकाश डालता है। आधुनिक भारत के महानगरीय जीवन में जहाँ प्लास्टिक, कंक्रीट और सिंथेटिक वस्तुओं का साम्राज्य फैल चुका है, यह निबंध हमें प्रकृति की उस हरी-भरी गोद में ले जाता है जहाँ मनुष्य और वनस्पति का संबंध केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक है। लेखक ने अत्यंत सरल भाषा में यह सिद्ध किया है कि पूर्वोत्तर के लोगों के जीवन का ऐसा कोई कोना, कोई संस्कार या कोई दिनचर्या नहीं है जो बाँस से अछूती हो। 'साँस-साँस में बाँस' शीर्षक की दार्शनिक एवं व्यावहारिक सार्थकता: इस पाठ का शीर्षक 'साँस-साँस में बाँस' अत्यंत काव्यात्मक, सजीव और विचारोत्तेजक है। 'साँस-साँस' का अर्थ है—जीवन का प्रत्येक पल, प्रत्येक धड़कन और निरंतर चलने वाली जीवन-प्रक्रिया। पूर्वोत्तर के निवासियों के लिए बाँस केवल जंगल में उगने वाला एक पौधा नहीं है, बल्कि वह उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक हर पग पर उपस्थित रहने वाला अनिवार्य सहचर है। जब कोई शिशु जन्म लेता है, तो उसे सुलाने के लिए बाँस की लचीली खपच्चियों से बुना हुआ पालना या डलिया तैयार की जाती है। बचपन में वह बाँस की फिरकी, चकई और सीटी से खेलता है। बड़ा होकर जब वह किसान या मछुआरा बनता है, तो वह बाँस के बने हल, टोकरियों और मछली पकड़ने के फंदों (जलोई व पोलो) का उपयोग करता है। जब वह अपना घर बनाता है, तो घर के खंभे, फर्श, दीवारें, छप्पर, खिड़कियाँ और चहारदीवारी (बाड़) सब कुछ बाँस से ही बनती है। उसकी रसोई में अनाज रखने की कुठिला, चमचे, डलिया और बर्तन बाँस के होते हैं। यहाँ तक कि वह जो भोजन करता है, उसमें बाँस की ताज़ा कोपलों (करी) की अत्यंत स्वादिष्ट और पौष्टिक सब्जी तथा अचार शामिल होता है। वृद्धावस्था में चलने के लिए बाँस की लाठी उसका संबल बनती है और जब उसका देहावसान होता है, तो उसके पार्थिव शरीर को श्मशान तक ले जाने वाली अर्थी (टिकठी) भी बाँस से ही बाँधी जाती है। इस प्रकार, जन्म से लेकर मरण तक मनुष्य का संपूर्ण अस्तित्व बाँस में रचा-बसा है। यही कारण है कि लेखक ने इस निबंध का नाम 'साँस-साँस में बाँस' रखकर इस अटूट सांस्कृतिक बंधन को अमर कर दिया है। चंगकी भबनबा की नागा लोक-कथा: जादुई उद्भव का मिथक: निबंध का प्रारंभ नागालैंड की एक अत्यंत लोकप्रिय और विस्मयकारी लोक-कथा से होता है। नागालैंड की लोक-मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में 'चंगकी भबनबा' नाम का एक अत्यंत सिद्ध और चमत्कारी पुरुष हुआ करता था। वह एक महान जादूगर था जो अपने जीवनकाल में लोगों की भलाई के लिए अनेक जादुई करतब दिखाया करता था। जब उसकी मृत्यु का समय निकट आया, तो उसने अपने गाँव और कबीले के लोगों को अपने पास बुलाया और एक रहस्यमयी अंतिम वसीयत की। उसने कहा, "मेरे प्यारे देशवासियो! जब मेरी मृत्यु हो जाए, तो तुम मुझे दफना देना। किंतु मेरी मृत्यु के ठीक छठे दिन मेरी कब्र को खोदना। जब तुम कब्र खोदोगे, तो तुम्हें उसमें से एक ऐसी अनुपम और चमत्कारी वस्तु प्राप्त होगी जो तुम्हारे और तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों के जीवन को हमेशा-हमेशा के लिए बदल देगी और तुम्हारे हर काम आएगी।" लोग जादूगर चंगकी भबनबा का अत्यंत आदर करते थे। जादूगर की मृत्यु के बाद विधि-विधान से उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। ठीक छठे दिन जब ग्रामीणों ने विस्मय और उत्सुकता के साथ उसकी कब्र को खोदा, तो उन्होंने देखा कि कब्र की मिट्टी से बाँस के नन्हें-नन्हें, हरे-भरे अंकुर (प्ररोह) फूट रहे थे। लोक-विश्वास के अनुसार, कब्र से निकले इन्हीं जादुई अंकुरों से धरती पर बाँस का प्रादुर्भाव हुआ और धीरे-धीरे पूरे पूर्वोत्तर के जंगलों में बाँस की सैकड़ों प्रजातियाँ फैल गईं। यह लोक-कथा प्रतीकात्मक रूप से यह दर्शाती है कि पूर्वोत्तर के जनजातीय समाज की दृष्टि में बाँस कोई साधारण घास नहीं, बल्कि किसी सिद्ध पुरुष का वह जादुई वरदान है जो मानव जाति की रक्षा और सेवा के लिए स्वयं प्रकृति की कोख से प्रकट हुआ है। बाँस की सही आयु का चयन और कटाई का मौसम: बाँस से कोई भी कलात्मक वस्तु बनाने के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण चरण होता है—जंगल से उपयुक्त बाँस का चयन करना। निबंध में लेखक ने बाँस काटने के वैज्ञानिक और पारंपरिक नियमों का अत्यंत प्रामाणिक विवरण दिया है। हर बाँस कटाई के योग्य नहीं होता। शिल्पकारों और कारीगरों के अनुसार केवल एक से तीन वर्ष (1 to 3 years) की आयु वाले बाँस ही कटाई के लिए सर्वोत्तम माने जाते हैं। इस आयु का बाँस युवा होता है, उसके भीतर पर्याप्त नमी और प्राकृतिक लचीलापन होता है। उसे आसानी से मोड़ा जा सकता है और चीरकर मनचाही खपच्चियाँ बनाई जा सकती हैं। यदि बाँस तीन वर्ष से अधिक पुराना हो जाए, तो वह अत्यंत सख्त, रूखा और कड़ा हो जाता है। ऐसे बूढ़े बाँस को जब चीरने का प्रयास किया जाता है, तो वह बीच में से चटक जाता है और टूटकर बेकार हो जाता है। इसके विपरीत, यदि बाँस एक वर्ष से भी छोटा हो, तो वह बहुत नरम और कमजोर होता है। कटाई का समय प्रायः शीत ऋतु (सर्दियों के महीने) में रखा जाता है, क्योंकि इस मौसम में बाँस में कीट-पतंगे या घुन लगने की संभावना न्यूनतम होती है। 'दाओ' औजार और खपच्चियाँ तैयार करने का सूक्ष्म हस्तकौशल: पूर्वोत्तर के बाँस-शिल्प का सबसे प्रमुख और अनिवार्य औजार है—'दाओ' (Dao)। दाओ एक विशेष प्रकार का चौड़े फल वाला, अत्यंत धारदार और आगे से थोड़ा मुड़ा हुआ पारंपरिक चाकू या कटार होती है। पूर्वोत्तर का कोई भी नागा या असमी कारीगर दाओ के बिना अपने शिल्प की कल्पना भी नहीं कर सकता। दाओ का प्रयोग बाँस को गाँठों से काटने, उसके तने को लम्बवत चीरने और खपच्चियों को छीलकर चिकना करने के लिए किया जाता है। बाँस को चीरकर जो पतली-पतली पट्टियाँ बनाई जाती हैं, उन्हें 'खपच्ची' (Bamboo Strips) कहा जाता है। खपच्चियाँ तैयार करना केवल शारीरिक बल का काम नहीं, बल्कि अत्यंत सधे हुए हाथों और एकाग्रता का कलात्मक कौशल है। कारीगर बाँस के लंबे डंडे को अपने घुटनों के बीच या जमीन पर टिकाता है और दाओ के तेज फल से बाँस को ऊपर से नीचे तक चीरता चला जाता है। खपच्ची की चौड़ाई और मोटाई इस बात पर निर्भर करती है कि उससे क्या बनाना है। यदि मजबूत टोकरी या अनाज की कुठिला बनानी है, तो खपच्चियाँ चौड़ी और थोड़ी मोटी रखी जाती हैं। किंतु यदि महीन चटाई, पंखा या टोपी बुननी है, तो खपच्चियों को कागज या धागे की तरह अत्यंत बारीक और पतला चीरा जाता है। चीरने के बाद खपच्चियों की छिलाई और घिसाई की जाती है। ताज़ी कटी हुई खपच्चियों के किनारों पर अत्यंत महीन और नुकीले रेशे होते हैं, जो हाथों में चुभ सकते हैं। कारीगर दाओ के फल को तिरछा पकड़कर खपच्ची को उसके नीचे से बार-बार खींचता है, जिससे खपच्ची का खुरदरापन दूर हो जाता है और वह रेशमी फीते की तरह चिकनी और अत्यंत लचीली बन जाती है। बुनाई की विविध शैलियाँ: ताना-बाना और डिज़ाइन: जब खपच्चियाँ तैयार हो जाती हैं, तब आरंभ होता है बुनाई (Weaving) का जादुई संसार। बाँस की बुनाई ठीक उसी प्रकार की जाती है जैसे करघे पर धागों से कपड़ा बुना जाता है। इसमें भी 'ताना' (Warp) और 'बाना' (Weft) का प्रयोग होता है। लम्बवत रूप से बिछाई गई आधार खपच्चियों को 'ताना' कहा जाता है, और उनके आर-पार क्षैतिज रूप से पिरोई जाने वाली खपच्चियों को 'बाना' कहा जाता है। कारीगर ताने और बाने को गूँथकर विभिन्न प्रकार की डिज़ाइनें बनाते हैं। सबसे सरल बुनाई 'चेकबोर्ड' (एक ऊपर, एक नीचे) होती है। इसके अतिरिक्त सबसे प्रसिद्ध बुनाई 'ट्विल' (Twill) कहलाती है, जिसमें खपच्चियों को 'दो ऊपर-दो नीचे' या 'तीन ऊपर-तीन नीचे' के क्रम में पिरोया जाता है। इससे टोकरी या चटाई की सतह पर तिरछी धारियों और हेरिंगबोन जैसी अत्यंत सुंदर ज्यामितीय आकृतियाँ उभर आती हैं। टोकरी बनाते समय पहले चौकोर या गोलाकार पेंदी बुनी जाती है, फिर खपच्चियों को ऊपर की ओर मोड़कर दीवारें उठाई जाती हैं, और अंत में ऊपरी किनारे को मजबूत बाँस की गोल छड़ी से लपेटकर कस दिया जाता है ताकि बुनाई कभी न खुले। प्राकृतिक रंगों की छटा: पर्यावरण-अनुकूल रंगाई कला: पूर्वोत्तर के कारीगर अपनी कला में कभी भी रासायनिक या जहरीले सिंथेटिक रंगों का प्रयोग नहीं करते। वे अपने परिवेश में उपलब्ध वनस्पतियों, पत्तियों और पेड़ों की छाल से शत-प्रतिशत प्राकृतिक रंग तैयार करते हैं। खपच्चियों को रंगने के लिए उन्हें उबलते हुए प्राकृतिक रंग के घोल में पकाया जाता है और फिर धूप में सुखाया जाता है। उदाहरण के लिए, हल्का हरा और पीला रंग प्राप्त करने के लिए इमली की हरी पत्तियों का उपयोग किया जाता है। गहरा कत्थई, चॉकलेटी या लाल रंग पाने के लिए विभिन्न वनों के पेड़ों की छाल तथा मजीठ की जड़ों का प्रयोग किया जाता है। चमकीले पीले रंग के लिए कच्ची हल्दी का प्रयोग होता है। इन प्राकृतिक रंगों से रंगी गई खपच्चियों से जब बहुरंगी टोकरियाँ और चटाइयाँ बुनी जाती हैं, तो वे वर्षों तक धूप और पानी में रहने के बावजूद अपनी चमक नहीं खोतीं और पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं पहुँचातीं। बाँस के बहुआयामी उपयोग: वास्तुकला से लेकर भोजन तक: पूर्वोत्तर भारत में बाँस का उपयोग केवल टोकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त है: वास्तुकला और आवास: पूर्वोत्तर का क्षेत्र भारी वर्षा और भूकंप संभावित (Earthquake-prone) क्षेत्र है। कंक्रीट के भारी मकान भूकंप में गिरकर जानलेवा बन जाते हैं, किंतु बाँस के बने हल्के और लचीले मकान भूकंप के झटकों को आसानी से झेल लेते हैं। घर के खंभे, फर्श, चटाई की दीवारें, खिड़कियाँ और छप्पर सब बाँस से बनाए जाते हैं। कृषि, मत्स्य-पालन और आजीविका: असम और मणिपुर के जल-प्लावित क्षेत्रों में मछली पकड़ने के लिए बाँस की तीलियों से विशेष शंक्वाकार जाल या फंदे बनाए जाते हैं, जिन्हें 'जलोई' या 'पोलो' कहा जाता है। इसे पानी में घुमाकर या कीचड़ में दबाकर आसानी से मछलियाँ पकड़ ली जाती हैं। इसके अतिरिक्त चाय बागानों में महिलाएँ अपनी पीठ पर बाँस की जो लंबी टोकरी बाँधती हैं, वह हल्की होने के बावजूद 30 से 40 किलो चाय की पत्तियाँ संभाल सकती है। खाद्य एवं पोषण: बाँस केवल कठोर लकड़ी नहीं देता, बल्कि वह एक स्वादिष्ट और पोषक भोजन भी है। वर्षा ऋतु में जमीन से फूटने वाले बाँस के ताज़ा, मुलायम अंकुरों (जिन्हें कोपल या करी कहा जाता है) को काटकर उबाला जाता है। इसकी मसालेदार सब्जी, करी, सूप और अचार पूर्वोत्तर के प्रत्येक घर का प्रिय और पारंपरिक व्यंजन है। इसमें प्रचुर मात्रा में फाइबर और विटामिन्स होते हैं। संगीत और लोक-संस्कृति: भारतीय शास्त्रीय और लोक संगीत का प्राण 'बाँसुरी' (Flute) बाँस के खोखले तने से ही बनती है। भगवान श्री कृष्ण की मुरली से लेकर पूर्वोत्तर के बिहू और चेराव (बाँस नृत्य) तक, बाँस की मधुर ध्वनि पूरे वातावरण को आनंदित करती है। पारिस्थितिकी, 'हरा सोना' और आधुनिक प्रासंगिकता: वैज्ञानिक दृष्टि से बाँस कोई काष्ठ-वृक्ष (Tree) नहीं है, बल्कि यह 'पोएसी' (Poaceae) कुल की एक विशालकाय 'घास' (Grass) है। यह संसार की सबसे तेजी से बढ़ने वाली वनस्पति है। अनुकूल परिस्थितियों में बाँस का एक पौधा 24 घंटे में एक मीटर (लगभग 3 फीट) तक बढ़ सकता है। इसे एक बार लगाने के बाद बार-बार रोपने की आवश्यकता नहीं होती; जब एक डंडा काटा जाता है, तो उसकी जड़ों से कई नए प्ररोह अपने-आप फूट पड़ते हैं। आज की इक्कीसवीं सदी में बाँस को वैश्विक स्तर पर 'हरा सोना' (Green Gold) कहा जा रहा है। इसके प्रमुख पारिस्थितिक लाभ निम्नलिखित हैं: मृदा-संरक्षण (Soil Conservation): बाँस का विशाल और सघन जड़-तंत्र (Root System) पहाड़ी मिट्टी को इतनी मजबूती से जकड़ लेता है कि मूसलाधार बारिश में भी भू-स्खलन और मिट्टी का कटाव नहीं होता। कार्बन सिंक और प्रचुर ऑक्सीजन: बाँस सामान्य वृक्षों की तुलना में 35% अधिक ऑक्सीजन वातावरण में छोड़ता है और भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर ग्लोबल वार्मिंग को कम करता है। प्लास्टिक का संपूर्ण विकल्प: आज पूरी दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण से त्रस्त है। बाँस की बनी बोतलें, टूथब्रश, बर्तन, स्ट्रॉ, टोकरियाँ और फर्नीचर पर्यावरण को शून्य नुकसान पहुँचाते हुए प्लास्टिक का सर्वोत्तम बायोडिग्रेडेबल विकल्प बन रहे हैं। निष्कर्ष: संक्षेप में कहें तो, एलेक्स एम. जॉर्ज का निबंध 'साँस-साँस में बाँस' हमें यह संदेश देता है कि पारंपरिक जनजातीय ज्ञान और प्रकृति-सम्मत जीवनशैली ही पृथ्वी के सुरक्षित भविष्य की एकमात्र कुंजी है। पूर्वोत्तर की बाँस संस्कृति हमें प्रकृति का दोहन करना नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ एकाकार होकर जीना सिखाती है। यह पाठ विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, हस्तशिल्प और श्रम के प्रति आदर, और पर्यावरण-संरक्षण की चेतना का संचार करता है।

क्या आपने कभी सोचा है?

क्या आप किसी ऐसी वनस्पति की कल्पना कर सकते हैं जिसमें मनुष्य जन्म लेते ही अपने पहले झूले में सोता है, जिसकी कोपलों की स्वादिष्ट सब्जी और अचार अपनी थाली में खाता है, जिसके बने घर में वर्षा और आंधी से अपनी रक्षा करता है, जिसकी खपच्चियों से बनी टोकरियों में अपनी फसल समेटता है, जिसकी बाँसुरी की तान पर अपने लोकगीत गाता है, बुढ़ापे में जिसकी छड़ी का सहारा लेकर चलता है और मृत्यु के बाद जिसकी टिकठी (अर्थी) पर सवार होकर अपनी अंतिम यात्रा तय करता है? लेखक एलेक्स एम. जॉर्ज द्वारा रचित यह अद्भुत निबंध 'साँस-साँस में बाँस' हमें पूर्वोत्तर भारत की उस समृद्ध जनजातीय संस्कृति की सैर कराता है जहाँ बाँस केवल एक पेड़ या घास नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की प्रत्येक धड़कन और प्रत्येक साँस में समाया हुआ अमर जीवन-साथी है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

'साँस-साँस में बाँस' अध्याय का अध्ययन आधुनिक युग के प्रत्येक विद्यार्थी और जागरूक नागरिक के लिए अत्यंत आवश्यक और युगांतरकारी है। आज हमारा संपूर्ण ग्रह प्लास्टिक प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की अंधाधुंध कटाई और ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर पारिस्थितिक चुनौतियों से जूझ रहा है। आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने मनुष्य को प्रकृति से काटकर कृत्रिम और गैर-बायोडिग्रेडेबल वस्तुओं पर निर्भर बना दिया है। ऐसे संकट के समय में पूर्वोत्तर भारत की बाँस-संस्कृति पूरी दुनिया को सतत विकास (Sustainable Development) और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली का एक अद्भुत और व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत करती है। बाँस दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली घास है, जिसे 'हरा सोना' (Green Gold) कहा जाता है। यह पर्यावरण में प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ता है, पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी के कटाव को रोकता है और प्लास्टिक का शत-प्रतिशत प्राकृतिक विकल्प प्रदान करता है। यह अध्याय विद्यार्थियों को केवल पूर्वोत्तर की भौगोलिक और जनजातीय विविधता से ही परिचित नहीं कराता, बल्कि उनमें हस्तशिल्प, स्थानीय संसाधनों के सदुपयोग और पारंपरिक कारीगरी के प्रति गहरा सम्मान और संवेदनशीलता जगाता है। चंगकी भबनबा की लोक-कथा विद्यार्थियों में सांस्कृतिक धरोहर के प्रति गर्व का भाव भरती है, जबकि बाँस की कटाई, खपच्ची निर्माण और बुनाई का तकनीकी विवरण विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, धैर्य और श्रम की गरिमा का विकास करता है। इसके अतिरिक्त, परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ क्रियाओं से भाववाचक संज्ञा निर्माण, प्रत्यय-उपसर्ग और मुहावरों के सटीक प्रयोग की व्याकरणिक क्षमता प्रदान करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (नागालैंड, असम, मणिपुर आदि) की सामान्य भौगोलिक स्थिति और जनजातीय जीवन की प्राथमिक समझ।
  • बाँस के पौधे की सामान्य विशेषताओं (घास कुल, खोखला तना, गाँठें, तीव्र वृद्धि) का आधारभूत ज्ञान।
  • हस्तशिल्प और घरेलू कुटीर उद्योगों (जैसे टोकरी बनाना, चटाई बुनना) की सामान्य कार्यप्रणाली का परिचय।
  • हिंदी गद्य में सूचनात्मक एवं सांस्कृतिक निबंध विधा की सामान्य संरचना और भाव-ग्रहण की क्षमता।
  • संज्ञा, क्रिया, विशेषण तथा 'आई' प्रत्यय जोड़कर भाववाचक संज्ञा बनाने से जुड़े सामान्य व्याकरणिक नियमों की समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • पूर्वोत्तर भारत के जनजीवन में बाँस की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक भूमिका का समग्र विश्लेषण कर सकेंगे।
  • 'साँस-साँस में बाँस' शीर्षक की प्रतीकात्मकता को जन्म से मृत्यु तक मानव जीवन में बाँस की उपस्थिति के आधार पर स्पष्ट कर सकेंगे।
  • नागालैंड के जादुई पुरुष 'चंगकी भबनबा' की लोक-कथा और बाँस के उद्भव से जुड़े लोक-विश्वास का वर्णन कर सकेंगे।
  • बाँस की कटाई के लिए 1 से 3 वर्ष की आयु के चयन के पीछे छिपे वैज्ञानिक और व्यावहारिक कारणों की व्याख्या कर सकेंगे।
  • पूर्वोत्तर के पारंपरिक औजार 'दाओ' का स्वरूप, कार्य और खपच्चियाँ चीरने तथा चिकनाने की विधि को विस्तार से समझा सकेंगे।
  • बाँस की बुनाई में 'ताना' और 'बाना' की प्रक्रिया तथा चेकबोर्ड व ट्विल बुनाई की तकनीकों का तुलनात्मक विवरण दे सकेंगे।
  • इमली की पत्तियों, पेड़ों की छाल और हल्दी जैसी प्राकृतिक सामग्रियों से खपच्चियों की पर्यावरण-अनुकूल रंगाई का महत्व बता सकेंगे।
  • बाँस के बहुआयामी उपयोगों—भूकंप-रोधी मकान, खाद्य कोपलें (करी), मछली पकड़ने के फंदे (जलोई) और वाद्य-यंत्रों की सूची बना सकेंगे।
  • बाँस को 'घास' और 'हरा सोना' कहे जाने के पीछे छिपे पारिस्थितिक लाभों (मृदा-संरक्षण, प्रचुर ऑक्सीजन, प्लास्टिक-मुक्ति) को सिद्ध कर सकेंगे।
  • पाठ में प्रयुक्त तकनीकी शब्दावली (खपच्ची, दाओ, कुठिला, ताना-बाना) और व्याकरणिक रूपों ('आई' प्रत्यय युक्त भाववाचक संज्ञाओं) का शुद्ध प्रयोग कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: पाठ का परिचय, लेखक और 'स...
2 मॉड्यूल 2: नागालैंड की लोक-कथा — जा...
3 मॉड्यूल 3: बाँस की कटाई, आयु निर्धा...
4 मॉड्यूल 4: बाँस की बुनाई शैलियाँ, त...
5 मॉड्यूल 5: बाँस के बहुआयामी उपयोग —...
6 मॉड्यूल 6: 'भाषा की बात', व्याकरण औ...
7 मॉड्यूल 7: पर्यावरण संरक्षण, 'हरा स...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: पाठ का परिचय, लेखक और 'साँस-साँस में बाँस' का दार्शनिक अर्थ

साँस-साँस में बाँस — एलेक्स एम. जॉर्ज | कक्षा 6 हिंदी (वसंत भाग 1) पूर्वोत्तर भारत की बाँस-संस्कृति एवं हस्तशिल्प पैनल 1: विषय प्रवेश, भौगोलिक क्षेत्र एवं चंगकी भबनबा की लोक-कथा नागालैंड एवं पूर्वोत्तर की संस्कृति १. पाठ एवं लेखक परिचय मूल लेखक: एलेक्स एम. जॉर्ज (Alex M. George) हिंदी अनुवाद: शशि सबलोक (Shashi Sablok) विधा: सांस्कृतिक व पर्यावरणपरक निबंध भौगोलिक क्षेत्र: पूर्वोत्तर भारत (नागालैंड, असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा) केंद्रीय विचार: बाँस जीवन का आधार है जन्म के पालने से लेकर मृत्यु की शैया तक मनुष्य बाँस की वस्तुओं से घिरा रहता है। शीर्षक 'साँस-साँस में बाँस' इसी आत्मीयता को दर्शाता है २. चंगकी भबनबा की लोक-कथा पात्र: चंगकी भबनबा (नागालैंड का जादुई पुरुष) जादूगर की शक्ति: • जीवन भर लोगों के लिए अद्भुत करतब दिखाए। अंतिम वसीयत (इच्छा): "मेरी मृत्यु के छठे दिन मेरी कब्र खोदना, तुम्हें कुछ अत्यंत उपयोगी वस्तु मिलेगी।" कब्र का चमत्कार: • छठे दिन कब्र से बाँस के हरे-भरे अंकुर फूटे। • इन्हीं अंकुरों से धरती पर बाँस की विभिन्न किस्में आईं। लोक-कथा बाँस के जादुई और बहुउपयोगी गुणों का प्रतीक है ३. पूर्वोत्तर की बाँस-संस्कृति प्रमुख राज्य: नागालैंड, असम, मणिपुर, त्रिपुरा प्राकृतिक प्रचुरता: • भारी मानसूनी वर्षा और घने बाँस के जंगल। • भारत का 60% से अधिक बाँस पूर्वोत्तर में पाया जाता है। जनजातीय जीवन: • प्रत्येक नागा युवा को बाँस काटना व बुनना आता है। • बाँस ही उनकी आजीविका, कला और पहचान है। बाँस केवल एक पौधा नहीं, संस्कृति है पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी को बहने से रोकता है पैनल 2: बाँस की सही आयु का चयन, कटाई एवं खपच्चियाँ तैयार करने की विधि शिल्प-कला का प्रथम चरण १. बाँस की आयु का चयन • उपयुक्त आयु: 1 से 3 वर्ष की उम्र के बाँस • क्यों उपयुक्त हैं? इस आयु में बाँस कोमल, लचीले और मुड़ने योग्य होते हैं। • पुराने बाँस (3 वर्ष से अधिक): अत्यधिक कठोर हो जाते हैं और चीरते समय चटककर टूट जाते हैं। कटाई का समय: शीत ऋतु कीड़े और घुन लगने का भय कम २. विशेष औजार: 'दाओ' • 'दाओ' (Dao) क्या है? पूर्वोत्तर का चौड़े फल वाला विशेष धारदार मुड़ा हुआ चाकू। • इसका उपयोग: - बाँस को गाँठों से काटना - लम्बवत चीरकर फाँकें बनाना - खपच्चियों को छीलकर चिकनाना कारीगर का सर्वोत्तम मित्र दाओ के बिना बाँस का काम असंभव हल्के हाथ से दबाव देकर चीरना ३. खपच्चियाँ चीरने की कला • खपच्ची (Bamboo Strips): बाँस को पतली-पतली पट्टियों में चीरना खपच्ची कहलाता है। • कारीगरी का कौशल: खपच्ची की चौड़ाई मनचाही वस्तु के अनुसार तय की जाती है—टोकरी के लिए चौड़ी, चटाई के लिए बारीक। हाथ की सटीकता व संतुलन जरा-सी चूक से खपच्ची कट जाती है मोटाई कागज जैसी पतली भी हो सकती है ४. छिलाई व घिसाई • खुरदरापन हटाना: खपच्चियों के किनारों पर तेज रेशा होता है जो हाथ को काट सकता है। • घिसाई की विधि: दाओ के फल से खपच्चियों को बार-बार खुरचकर रेशमी और चिकना बनाया जाता है। लचीलापन प्राप्त करना बुनाई के लिए तैयार स्ट्रिप्स पैनल 3: बुनाई की तकनीकें (ताना-बाना) एवं प्राकृतिक रंगों का उपयोग पारंपरिक लोक-शिल्प का विज्ञान १. ताना और बाना (Warp & Weft) ताना (Warp): लम्बवत बिछाई गई आधार खपच्चियाँ बाना (Weft): क्षैतिज (आड़ी) पिरोई जाने वाली खपच्चियाँ बुनाई की प्रक्रिया: • खपच्चियों को एक-दूसरे के ऊपर-नीचे गूँथना। • चटाई की बुनाई जैसे कपड़े बुने जाते हैं। • दो ऊपर-दो नीचे या तीन ऊपर-तीन नीचे का क्रम। ट्विल (Twill) बुनाई: तिरछी धारियों की डिज़ाइन चेकबोर्ड और हेरिंगबोन पैटर्न की मनमोहक बनावट। मजबूती और लचीलेपन का वैज्ञानिक संतुलन २. टोकरी बनाने के चरण चरण १ (पेंदी बनाना): चौकोर या गोल आधार तैयार करना। चरण २ (दीवारें उठाना): खपच्चियों को मोड़कर ऊपर की ओर बुनना। चरण ३ (गला व किनारा बांधना): ऊपरी किनारे को मजबूत बाँस की पट्टी से लपेटकर बाँधना ताकि बुनाई खुले नहीं। विविध रूप: अंडाकार, शंक्वाकार, चपटी व गहरी टोकरियाँ चाय की पत्तियाँ चुनने वाली पीठ की टोकरी। हल्की किंतु 30-40 किलो भार उठाने में सक्षम ३. प्राकृतिक रंगों का प्रयोग रासायनिक रंगों का बहिष्कार: जनजातियाँ केवल वनस्पतियों के प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल रंग प्रयोग करती हैं। प्रमुख प्राकृतिक स्रोत: • इमली की पत्तियाँ: हल्का हरा व पीला रंग • पेड़ों की छाल व मजीठ: गहरा कत्थई व लाल • हल्दी एवं जामुन: चमकीला पीला व बैंगनी रंगाई की विधि: खपच्चियों को रंग के घोल में उबालना और धूप में सुखाना। सालों-साल रंग फीका नहीं पड़ता, पर्यावरण सुरक्षित पैनल 4: 'साँस-साँस में बाँस' — जन्म से मृत्यु तक मानव जीवन में बहुआयामी उपयोग पालने से लेकर श्मशान तक १. पालना, खिलौने व बाल्यकाल • शिशु का पालना (झूला): बाँस की लचीली खपच्चियों से बना हल्का व हवादार पालना। • खिलौने व चकई: बाँस की फिरकी, सीटी, गाड़ियाँ और धनुष-बाण। • जीवन का आरंभ: बच्चा आँख खोलते ही बाँस के झूले में साँस लेता है। शिशु काल से अटूट नाता २. घर, दीवारें व फर्नीचर • पूरा घर बाँस का: खंभे, फर्श, चटाई की दीवारें, छप्पर और खिड़कियाँ। • घरेलू सामग्री: - चारपाई, मोढ़े, टोकरियाँ - अनाज रखने की 'कुठिला' - चम्मच, गिलास, टोपी • भूकंप-रोधी संरचना: बाँस के घर भूकंप में नहीं गिरते। प्रकृति-अनुकूल वास्तुकला ३. भोजन, मछली पकड़ना व शिकार • स्वादिष्ट व्यंजन: बाँस की ताज़ा कोपलें (करी) सब्जी व अचार के रूप में प्रसिद्ध। • मछली के फंदे (जलोई): शंक्वाकार फंदा पानी में रखकर मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। • हथियार व औजार: धनुष-बाण, भाले, कृषि हल। पौष्टिक आहार व आजीविका ४. संगीत, कला व अंतिम यात्रा • मधुर वाद्य-यंत्र: बाँसुरी, शहनाई की नलिका, ताल-वाद्य व खड़ताल। • बुजुर्गों की लाठी: सहारे के लिए बाँस की छड़ी। • अंतिम यात्रा (अर्थी): मृत्यु के बाद शव को बाँस की टिकठी पर ले जाया जाता है। आदि से अंत तक सहचर पैनल 5: 'हरा सोना' (Green Gold), पर्यावरण संरक्षण एवं परीक्षा रणनीति इकोलॉजिकल महत्ता व व्याकरण ज्ञान १. बाँस: 'हरा सोना' एवं पारिस्थितिकी वैज्ञानिक पहचान: बाँस पेड़ नहीं, एक विशाल 'घास' है तीव्रतम वृद्धि: एक दिन में 1 मीटर तक बढ़ सकता है पारिस्थितिक लाभ: • मृदा-संरक्षण: इसकी जड़ें पहाड़ी मिट्टी को जकड़कर भू-स्खलन और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं। • ऑक्सीजन का स्रोत: सामान्य पेड़ों से 35% अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है और कार्बन सोखता है। • प्लास्टिक का विकल्प: बाँस के स्ट्रॉ, कटलरी और बोतलें प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्ति दिलाती हैं। सतत विकास (Sustainable Development) काटने के बाद पुनः अपने-आप तेजी से उग जाता है २. भाषा की बात (व्याकरण सूत्र) • क्रिया से भाववाचक संज्ञा ('आई' प्रत्यय): बुनना $ ightarrow$ बुनाई | काटना $ ightarrow$ कटाई छीलना $ ightarrow$ छिलाई | घिसना $ ightarrow$ घिसाई रंगना $ ightarrow$ रंगाई | सुखाना $ ightarrow$ सुखाई • विशेषण शब्दों की रचना: जादू $ ightarrow$ जादुई | गाँठ $ ightarrow$ गाँठदार सजावट $ ightarrow$ सजावटी | प्रकृति $ ightarrow$ प्राकृतिक • पुनरुक्त शब्द-युग्म: साँस-साँस, तरह-तरह, पतली-पतली, नई-नई • मुहावरेदार प्रयोग: हाथ का कमाल (कौशल) | ताना-बाना बुनना व्याकरणिक शुद्धता से 100% अंक मिलते हैं ३. संभावित महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न Q1. पाठ का नाम 'साँस-साँस में बाँस' क्यों है? Ans: जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य बाँस की वस्तुओं पर निर्भर है; यह जीवन में समाया है। Q2. चंगकी भबनबा कौन थे और उनकी क्या इच्छा थी? Ans: वे नागालैंड के जादूगर थे; उन्होंने अपनी कब्र को छठे दिन खोदने की इच्छा प्रकट की थी। Q3. खपच्चियों के लिए 1-3 वर्ष का बाँस क्यों काटते हैं? Ans: क्योंकि इस आयु का बाँस लचीला होता है; अधिक उम्र का बाँस सख्त होकर टूट जाता है। Q4. 'दाओ' क्या है और इसका क्या काम है? Ans: चौड़े फल वाला मुड़ा हुआ चाकू, जो बाँस चीरने और खपच्चियों को छीलने के काम आता है। तकनीकी शब्दों का सटीक प्रयोग करें

१. पाठ की पृष्ठभूमि, लेखक एवं सांस्कृतिक मर्म

पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, पर्यावरण-सम्मत जीवनशैली और मानव अस्तित्व के हर पहलू में बाँस की अपरिहार्य उपस्थिति का सूक्ष्म अध्ययन।

१.१ लेखक एलेक्स एम. जॉर्ज एवं अनुवादक शशि सबलोक

इस ज्ञानवर्धक और जीवंत निबंध के मूल लेखक एलेक्स एम. जॉर्ज (Alex M. George) हैं। वे एक प्रतिष्ठित समाजशास्त्री और शोधकर्ता हैं, जिन्होंने पूर्वोत्तर भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में रहकर जनजातीय समाजों, उनके स्थानीय ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के साथ उनके संतुलन का गहन अध्ययन किया। इस निबंध का अत्यंत सरस, रोचक और प्रवाहमयी हिंदी अनुवाद शशि सबलोक (Shashi Sablok) ने किया है।

लेखक का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल बाँस के उपयोग गिनाना नहीं है, बल्कि उस संवेदनशील संस्कृति से परिचित कराना है जो प्रकृति से केवल उतना ही ग्रहण करती है जितना जीने के लिए आवश्यक है। यह निबंध हमें सिखाता है कि किस प्रकार एक साधारण 'घास' किसी पूरे जनसमुदाय की कला, अर्थव्यवस्था और अस्मिता का आधार बन सकती है।

१.२ शीर्षक की सार्थकता: जन्म से मृत्यु तक बाँस का सहचर्य

पाठ का शीर्षक 'साँस-साँस में बाँस' अत्यंत अर्थपूर्ण और लाक्षणिक है। 'साँस-साँस' का भाव है—जीवन का प्रत्येक पल और श्वास। पूर्वोत्तर (विशेषकर नागालैंड, असम, मणिपुर आदि) में जन्म से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक मनुष्य बाँस की बनाई गई वस्तुओं के बीच ही साँस लेता है:

"नवजात शिशु के पालने (झूले) से लेकर, बचपन के खिलौनों, युवावस्था के घर, आजीविका के औजारों, भोजन की थाली, बुढ़ापे की लाठी और मृत्यु के बाद श्मशान ले जाने वाली अर्थी (टिकठी) तक—हर स्थान पर बाँस साक्षात उपस्थित रहता है।"

१.३ मानव जीवन-चक्र और बाँस की भूमिका (Life-Cycle Matrix)

जीवन की अवस्था बाँस की वस्तु / उपयोग सांस्कृतिक एवं व्यावहारिक महत्व
शैशवावस्था (जन्म) पालना (झूला) एवं डलिया शिशु के लिए हल्का, लचीला और हवादार प्राकृतिक बिस्तर
बाल्यकाल (बचपन) चकई, फिरकी, सीटी, धनुष-बाण प्राकृतिक सामग्री से बने सुरक्षित और पारंपरिक खिलौने
युवावस्था (आवास व गृहस्थी) घर के खंभे, दीवारें, छप्पर, कुठिला भूकंप-रोधी मकान और अनाज सुरक्षित रखने का कोठार
कर्म व आजीविका टोकरियाँ, मछली के फंदे (जलोई), हल कृषि, मत्स्य-पालन और हस्तशिल्प व्यापार का साधन
भोजन व उत्सव ताज़ा कोपलें (करी), बाँसुरी, चेराव नृत्य स्वादिष्ट आहार और संगीत-नृत्य की प्राण-वायु
वृद्धावस्था सहारे की लाठी (छड़ी) कमजोर कदमों को मजबूती प्रदान करने वाला संबल
मृत्यु (अंतिम यात्रा) अर्थी (टिकठी) संसार से विदाई के समय पार्थिव शरीर का अंतिम आधार

मॉड्यूल 2: नागालैंड की लोक-कथा — जादुई चंगकी भबनबा और बाँस की उत्पत्ति

२. चंगकी भबनबा की लोक-कथा: बाँस के जादुई उद्भव का मिथक

नागालैंड की पारंपरिक लोक-कथा जहाँ एक परोपकारी जादुई पुरुष की कब्र से मानव जाति के लिए बाँस का वरदान प्रकट हुआ।

२.१ चंगकी भबनबा और उसकी अंतिम वसीयत

पूर्वोत्तर के नागा समुदाय में एक अत्यंत प्राचीन और रोचक लोक-कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार बहुत समय पहले चंगकी भबनबा (Chanki Bhabanba) नाम का एक बड़ा चमत्कारी और ज्ञानी पुरुष रहता था। वह अनेक जादुई विद्याएँ जानता था और अपने जीवन में सदैव ग्रामीणों की सहायता के लिए तत्पर रहता था।

जब चंगकी भबनबा बूढ़ा हुआ और उसने अपनी मृत्यु का आभास किया, तो उसने कबीले के प्रमुख लोगों को बुलाकर कहा:

"जब मैं मर जाऊँ, तो मुझे रीति-रिवाज से दफना देना। किंतु मेरी मृत्यु के ठीक छठे दिन मेरी कब्र को खोदना। जब तुम कब्र खोदोगे, तो तुम्हें उसमें से एक ऐसी अनोखी वस्तु मिलेगी जो तुम्हारे जीवन की हर आवश्यकता को पूरा करेगी।"

२.२ कब्र से अंकुरण और लोक-विश्वास का मर्म

जादूगर की मृत्यु के बाद लोगों ने वैसा ही किया। जब छठे दिन लोगों ने भारी उत्सुकता और श्रद्धा से चंगकी भबनबा की कब्र को खोदा, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। कब्र के भीतर से बाँस के हरे-भरे, कोमल और ताज़ा अंकुर फूट रहे थे।

नागालैंड के लोगों का दृढ़ विश्वास है कि उन्हीं चमत्कारी अंकुरों से संसार में बाँस के पौधों का विस्तार हुआ। जादूगर की देह मानो बाँस बनकर फिर से जीवित हो उठी ताकि वह मृत्यु के बाद भी अपने लोगों की सेवा कर सके।

यह लोक-कथा यह संदेश देती है कि जनजातीय समाज प्रकृति के उपहारों को केवल 'संसाधन' (Resource) नहीं मानता, बल्कि उन्हें अपने पूर्वजों का आशीर्वाद और पवित्र धरोहर समझकर उनका आदर और संरक्षण करता है।

मॉड्यूल 3: बाँस की कटाई, आयु निर्धारण और खपच्चियाँ बनाने की कला

३. शिल्प का प्रथम सोपान: कटाई, 'दाओ' एवं खपच्ची निर्माण

बाँस की सही आयु का चयन, विशेष औजार 'दाओ' द्वारा लम्बवत चीरना और खपच्चियों को चिकना व लचीला बनाने की पारंपरिक तकनीक।

३.१ बाँस की आयु का चयन: 1 से 3 वर्ष ही क्यों?

बाँस का शिल्पकार जंगल में जाकर किसी भी बाँस को अंधाधुंध नहीं काटता। वह बाँस के रंग, गाँठों और छाल को देखकर उसकी आयु पहचानता है:

  • 1 से 3 वर्ष की आयु (सर्वोत्तम): इस उम्र का बाँस युवा होता है। इसके तने में आवश्यक प्राकृतिक नमी और असीम लचीलापन होता है। इसे बिना चटके किसी भी कोण पर मोड़ा जा सकता है और इसकी मनचाही पतली खपच्चियाँ निकाली जा सकती हैं।
  • 3 वर्ष से अधिक पुराना बाँस (अनुपयुक्त): 3 साल के बाद बाँस अत्यधिक कड़ा, सख्त और भुरभुरा हो जाता है। जब दाओ से इसे चीरा जाता है, तो यह सीधा कटने के बजाय बीच में से टूटकर चटक जाता है।
  • कटाई का मौसम: बाँस की कटाई प्रायः सर्दियों (शीत ऋतु) में की जाती है। इस समय बाँस में रस कम होता है, जिससे लकड़ी में कीड़े और घुन लगने की आशंका न्यूनतम हो जाती है।

३.२ पूर्वोत्तर का विशिष्ट औजार: 'दाओ' (Dao)

पूर्वोत्तर भारत के बाँस-कारीगर का सबसे प्रिय और अनिवार्य औजार 'दाओ' होता है। दाओ एक भारी, चौड़े फल वाला और आगे से थोड़ा मुड़ा हुआ अत्यंत धारदार चाकू होता है।

दाओ के बहुमुखी कार्य:

  1. बाँस के डंडों को गाँठों के पास से सफाई से काटना।
  2. बाँस को ऊपर से नीचे तक लम्बवत चीरकर फाँकें अलग करना।
  3. खपच्चियों को छीलकर उनके रेशे और खुरदरापन दूर करना।

३.३ खपच्ची चीरने और घिसाई का हस्तकौशल

बाँस से पतली-पतली पट्टियाँ तैयार करने की क्रिया को 'खपच्ची चीरना' कहा जाता है। कारीगर दाओ को बाँस के सिरे पर रखता है और हल्के दबाव से नीचे तक खींचता है।

खपच्ची की चौड़ाई और मोटाई बनाई जाने वाली वस्तु के अनुसार तय होती है। अनाज भरने वाली कुठिला या मजबूत टोकरी के लिए खपच्चियाँ चौड़ी रखी जाती हैं, जबकि महीन चटाई, पंखा या टोपी के लिए खपच्चियाँ कागज जैसी पतली चीरी जाती हैं।

चीरने के तुरंत बाद खपच्ची के किनारे बहुत तीखे होते हैं, जो कारीगर की उँगलियों को काट सकते हैं। अतः कारीगर दाओ के फल से खपच्चियों को बार-बार खुरचकर घिसता है, जिससे वे रेशम जैसी चिकनी, कोमल और बुनाई के लिए पूरी तरह लचीली बन जाती हैं।

मॉड्यूल 4: बाँस की बुनाई शैलियाँ, ताना-बाना और प्राकृतिक रंगाई

४. बुनाई का शिल्प-शास्त्र: ताना-बाना एवं प्राकृतिक रंगाई

वस्त्रों की भाँति खपच्चियों को गूँथने की कला, तिरछी धारियों वाली ट्विल बुनाई और पेड़-पौधों से तैयार स्थायी प्राकृतिक रंग।

४.१ ताना और बाना (Warp & Weft Weaving)

बाँस की बुनाई ठीक उसी तरह की जाती है जैसे करघे पर धागों से कपड़ा बुना जाता है:

  • ताना (Warp): लम्बवत (खड़ी) रूप से बिछाई गई खपच्चियों को 'ताना' कहा जाता है। ये बुनाई का मूल ढाँचा बनती हैं।
  • बाना (Weft): ताने के आर-पार क्षैतिज (आड़ी) रूप से ऊपर-नीचे पिरोई जाने वाली खपच्चियों को 'बाना' कहा जाता है।
  • चेकबोर्ड बुनाई: जब एक खपच्ची ऊपर और एक नीचे रखी जाती है, तो शतरंज के बोर्ड जैसी चौकोर रचना बनती है।
  • ट्विल (Twill) बुनाई: जब खपच्चियों को 'दो ऊपर-दो नीचे' या 'तीन ऊपर-तीन नीचे' के क्रम में गूँथा जाता है, तो सतह पर तिरछी धारियों वाली मजबूत डिज़ाइन उभर आती है।

४.२ टोकरी बनाने के तीन प्रमुख चरण

टोकरी का निर्माण अत्यंत सुव्यवस्थित प्रक्रिया से गुजरता है:

  1. पेंदी (आधार) तैयार करना: खपच्चियों को चौकोर या गोलाकार रूप में गूँथकर टोकरी का निचला तला बनाया जाता है।
  2. दीवारें उठाना: पेंदी की खपच्चियों को ऊपर की ओर मोड़कर बाने की खपच्चियों से चारों ओर गोलाकार बुनाई की जाती है।
  3. गला व किनारा कसना: टोकरी के ऊपरी खुले सिरे को मजबूत बाँस की छड़ी से लपेटकर खपच्चियों से कस दिया जाता है ताकि टोकरी जीवन भर खुले नहीं।

४.३ प्राकृतिक रंगाई: पर्यावरण-अनुकूल रंगों की छटा

पूर्वोत्तर के कारीगर रासायनिक रंगों का बहिष्कार करते हैं। वे प्रकृति से रंग तैयार करते हैं:

  • इमली की पत्तियाँ: खपच्चियों को हल्का हरा और पीला रंग देने के लिए इमली की पत्तियों के काढ़े में उबाला जाता है।
  • पेड़ों की छाल व मजीठ: गहरा लाल, कत्थई या चॉकलेटी रंग प्राप्त करने के लिए जंगल के पेड़ों की छाल का उपयोग होता है।
  • कच्ची हल्दी: चटक चमकीला पीला रंग तैयार करने के लिए हल्दी का प्रयोग किया जाता है।

मॉड्यूल 5: बाँस के बहुआयामी उपयोग — आवास, भोजन, वाद्य और आजीविका

५. बाँस के बहुआयामी उपयोग: वास्तुकला से लेकर थाली तक

पूर्वोत्तर की वास्तुकला, स्वादिष्ट खाद्य व्यंजन, मत्स्य-पालन और संगीत-नृत्य में बाँस का अपरिहार्य योगदान।

५.१ वास्तुकला: भूकंप-रोधी बाँस के मकान

पूर्वोत्तर भारत एक तीव्र भूकंप-संभावित क्षेत्र है। यहाँ कंक्रीट और ईंट के भारी मकान अत्यंत जोखिम भरे होते हैं। स्थानीय जनजातियों ने सदियों के अनुभव से बाँस के अद्भुत मकान विकसित किए:

  • घर के आधारभूत खंभे मोटे बाँस के बनाए जाते हैं।
  • दीवारें बाँस की बुनी हुई चटाइयों (Matting) से तैयार की जाती हैं, जिन पर मिट्टी या गोबर का लेप किया जाता है।
  • भूकंप के तेज झटके आने पर बाँस का लचीला ढाँचा हिलता तो है, किंतु कभी ढहता नहीं, जिससे जनहानि नहीं होती।

५.२ भोजन, आजीविका एवं मछली पकड़ने के फंदे

बाँस का उपयोग आहार और आजीविका में:

  • बाँस की करी (कोपलें): वर्षा ऋतु में उगने वाले बाँस के मुलायम अंकुरों की मसालेदार सब्जी और अचार पूर्वोत्तर का अत्यंत पौष्टिक और स्वादिष्ट पारंपरिक भोजन है।
  • जलोई व पोलो: असम और मणिपुर में उथले पानी और कीचड़ में मछली पकड़ने के लिए बाँस की तीलियों से शंक्वाकार फंदा बनाया जाता है।
  • चाय बागानों की टोकरियाँ: असम के चाय बागानों में महिलाएँ अपनी पीठ पर बाँस की जो टोकरी रखती हैं, वह बहुत हल्की और टिकाऊ होती है।
  • कुठिला: अनाज को नमी और चूहों से सुरक्षित रखने के लिए बाँस की विशाल कुठिला बनाई जाती है।

५.३ संगीत वाद्य एवं मिजोरम का चेराव (बाँस नृत्य)

बाँस से मधुर बाँसुरी (Flute) बनाई जाती है। इसके अलावा मिजोरम का प्रसिद्ध 'चेराव नृत्य' (Cheraw / Bamboo Dance) बाँस के डंडों की ताल पर ही किया जाता है, जहाँ नर्तक बाँस के जोड़ों के बीच अत्यंत फुर्ती से पद-संचालन करते हैं।

मॉड्यूल 6: 'भाषा की बात', व्याकरण और शिल्प-कला की शब्दावली

६. भाषा की बात (व्याकरण) एवं शिल्प शब्दावली

सीआईएससीई एवं एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के अनुसार क्रियाओं से भाववाचक संज्ञा निर्माण, प्रत्यय-उपसर्ग और मुहावरे।

६.१ क्रिया से भाववाचक संज्ञा निर्माण ('आई' प्रत्यय)

पाठ में बाँस-शिल्प से जुड़ी अनेक क्रियाएँ आई हैं। इनमें 'आई' प्रत्यय जोड़कर कार्य-संज्ञाएँ (भाववाचक संज्ञाएँ) बनाई जाती हैं:

मूल क्रिया प्रत्यय भाववाचक संज्ञा वाक्य प्रयोग
बुनना आई बुनाई इस बाँस की टोकरी की बुनाई बहुत बारीक है।
काटना आई कटाई सर्दियों में बाँस की कटाई की जाती है।
छीलना आई छिलाई खपच्चियों की छिलाई दाओ से की जाती है।
घिसना आई घिसाई घिसाई करने से खपच्ची चिकनी हो जाती है।
रंगना आई रंगाई इमली की पत्तियों से खपच्चियों की रंगाई होती है।

६.२ विशिष्ट शिल्प शब्दावली

  • खपच्ची: बाँस की पतली-पतली लचीली पट्टियाँ।
  • दाओ: पूर्वोत्तर का चौड़े फल वाला मुड़ा हुआ धारदार चाकू।
  • कुठिला: अनाज संग्रह करने का बाँस का विशाल कोठार।
  • जलोई / पोलो: मछली पकड़ने का बाँस से बना शंक्वाकार फंदा।
  • कोपल (करी): बाँस के मुलायम ताज़ा अंकुर, जिनकी सब्जी बनती है।

मॉड्यूल 7: पर्यावरण संरक्षण, 'हरा सोना' (Green Gold) और आधुनिक आत्मनिर्भरता

७. 'हरा सोना' (Green Gold) एवं पर्यावरण का सुरक्षा-कवच

प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्ति, मृदा-अपरदन की रोकथाम और इक्कीसवीं सदी में सतत विकास का प्राकृतिक समाधान।

७.१ वैज्ञानिक सत्य: बाँस पेड़ नहीं, घास (Grass) है

वैज्ञानिक दृष्टि से बाँस कोई काष्ठ-वृक्ष नहीं है, बल्कि यह घास कुल (Poaceae family) का सदस्य है। इसकी वृद्धि की गति संसार में सर्वाधिक है:

  • अनुकूल परिस्थितियों में बाँस एक दिन (24 घंटे) में लगभग 1 मीटर (3 फीट) तक बढ़ सकता है।
  • इसे काटने पर यह नष्ट नहीं होता, बल्कि इसकी प्रकंद (Rhizome) जड़ों से नए-नए अंकुर तेजी से फूट पड़ते हैं।

७.२ पर्यावरण संरक्षण एवं प्लास्टिक-मुक्ति का विकल्प

  1. मृदा-अपरदन पर रोक: पूर्वोत्तर की भारी वर्षा में बाँस का सघन जड़-जाल मिट्टी को कसकर पकड़े रखता है, जिससे भू-स्खलन रुकता है।
  2. प्रचुर ऑक्सीजन उत्पादन: बाँस अन्य पेड़ों की तुलना में 35% अधिक ऑक्सीजन वातावरण में छोड़ता है और कार्बन सोखता है।
  3. प्लास्टिक का इको-फ्रेंडली विकल्प: आज बाँस से बनी बोतलें, बर्तन, टूथब्रश और टोकरियाँ प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करने में क्रांति ला रही हैं।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
पाठ का नाम 'साँस-साँस में बाँस' क्यों रखा गया है? इसका क्या अभिप्राय है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (2 अंक):
पाठ का नाम 'साँस-साँस में बाँस' इसलिए रखा गया है क्योंकि पूर्वोत्तर भारत (विशेषकर नागालैंड, असम आदि) के लोगों के जीवन का प्रत्येक क्षण और प्रत्येक कार्य बाँस से जुड़ा हुआ है। मनुष्य जन्म लेते ही बाँस के पालने (झूले) में सोता है, जीवन भर बाँस के मकान, भोजन, औजारों और बर्तनों का उपयोग करता है, और मृत्यु के बाद उसकी अंतिम यात्रा भी बाँस की टिकठी (अर्थी) पर ही होती है। इस प्रकार बाँस मनुष्य की प्रत्येक साँस और धड़कन में समाया हुआ है।

उदाहरण 2
चंगकी भबनबा कौन थे और उनकी कब्र से बाँस के अंकुर निकलने की लोक-कथा क्या संदेश देती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (3 अंक):

  • परिचय: चंगकी भबनबा नागालैंड के एक प्रसिद्ध और सिद्ध जादुई पुरुष थे, जो जीवन भर लोगों की भलाई करते रहे।
  • अंतिम वसीयत एवं चमत्कार: उन्होंने मृत्यु पूर्व कहा था कि उनकी कब्र को छठे दिन खोदा जाए। छठे दिन कब्र खोदने पर उसमें से बाँस के नन्हें अंकुर फूटे, जिनसे संसार में बाँस की विभिन्न प्रजातियों की उत्पत्ति हुई।
  • लोक-संदेश: यह लोक-कथा यह संदेश देती है कि बाँस कोई साधारण पौधा नहीं, बल्कि मानव जाति के कल्याण के लिए पूर्वजों और प्रकृति का दिया गया एक चमत्कारी और पवित्र वरदान है।
उदाहरण 3
खपच्चियाँ बनाने के लिए केवल 1 से 3 वर्ष की आयु के बाँस ही क्यों काटे जाते हैं? तीन वर्ष से अधिक पुराने बाँस क्यों नहीं काटे जाते?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (3 अंक):
बाँस की कटाई के लिए 1 से 3 वर्ष की आयु का चयन निम्नलिखित वैज्ञानिक कारणों से किया जाता है:

  1. लचीलापन एवं नमी: 1 से 3 वर्ष की उम्र के बाँस में प्राकृतिक नमी और लचीलापन होता है, जिससे इसे आसानी से मोड़ा जा सकता है और मनचाही पतली खपच्चियाँ निकाली जा सकती हैं।
  2. पुराने बाँस का कड़ापन: तीन वर्ष से अधिक पुराने बाँस अत्यधिक सख्त, सूखे और भुरभुरे हो जाते हैं। जब इन्हें दाओ से चीरने का प्रयास किया जाता है, तो ये बीच में से चटककर टूट जाते हैं।
  3. कीटों से सुरक्षा: इस आयु के बाँस को जब सर्दियों में काटा जाता है, तो इसमें घुन या कीड़े लगने का भय भी नहीं रहता।
उदाहरण 4
पूर्वोत्तर के पारंपरिक औजार 'दाओ' का स्वरूप क्या है और खपच्चियाँ तैयार करने तथा उन्हें चिकनाने में इसका उपयोग किस प्रकार किया जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (4 अंक):

१. 'दाओ' का स्वरूप:
'दाओ' पूर्वोत्तर भारत का एक अत्यंत विशिष्ट, चौड़े फल वाला और आगे से थोड़ा मुड़ा हुआ भारी और तेज धारदार पारंपरिक चाकू होता है। यह बाँस-कारीगर का सबसे प्रमुख औजार है।

२. खपच्चियाँ चीरने में उपयोग:
कारीगर बाँस को जमीन या घुटनों के बीच टिकाता है और दाओ के तेज फल को बाँस के सिरे पर रखकर नीचे की ओर खींचता है। इससे बाँस लम्बवत दिशा में पतली-पतली पट्टियों (खपच्चियों) में चीर लिया जाता है।

३. छिलाई एवं चिकनाई:
ताज़ी कटी खपच्चियों के नुकीले रेशे हाथों को काट सकते हैं। कारीगर दाओ के फल को तिरछा पकड़कर खपच्ची को उसके नीचे से तेजी से खींचता है। इस घिसाई से खपच्ची के सभी खुरदुरे रेशे हट जाते हैं और वह रेशम की तरह चिकनी और लचीली बन जाती है।

उदाहरण 5
बाँस की बुनाई में 'ताना' और 'बाना' क्या है? खपच्चियों को रंगने के लिए किन-किन प्राकृतिक सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (4 अंक):

१. ताना और बाना:

  • ताना (Warp): बुनाई के समय लम्बवत (खड़ी) रूप से बिछाई गई आधार खपच्चियों को 'ताना' कहा जाता है।
  • बाना (Weft): ताने के आर-पार क्षैतिज (आड़ी) दिशा में ऊपर-नीचे गूँथी जाने वाली खपच्चियों को 'बाना' कहा जाता है। ताने और बाने के मिलन से ही चेकबोर्ड और ट्विल जैसी मनमोहक बुनाई बनती है।

२. प्राकृतिक रंगाई की सामग्रियाँ:
कारीगर किसी भी रासायनिक रंग का उपयोग नहीं करते; वे केवल प्राकृतिक वनस्पतियों का प्रयोग करते हैं:

  1. इमली की पत्तियाँ: खपच्चियों को हल्का हरा और पीला रंग देने के लिए।
  2. पेड़ों की छाल व मजीठ: गहरा लाल, कत्थई या चॉकलेटी रंग प्राप्त करने के लिए।
  3. कच्ची हल्दी: चटक चमकीला पीला रंग तैयार करने के लिए। खपच्चियों को रंग के घोल में उबालकर धूप में सुखाया जाता है।
उदाहरण 6
बाँस को 'हरा सोना' (Green Gold) क्यों कहा जाता है? आधुनिक पर्यावरण संरक्षण और प्लास्टिक प्रदूषण के संदर्भ में इसके महत्व पर सविस्तार प्रकाश डालिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (5 अंक):

१. 'हरा सोना' कहे जाने का कारण:
बाँस को आर्थिक और पारिस्थितिक दोनों दृष्टियों से 'हरा सोना' कहा जाता है। यह पूर्वोत्तर के लाखों जनजातीय परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन है और एक बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा है। वैज्ञानिक रूप से बाँस कोई काष्ठ-वृक्ष नहीं, बल्कि संसार की सबसे तेजी से बढ़ने वाली 'घास' है जो 24 घंटे में 1 मीटर तक बढ़ सकती है।

२. पर्यावरण संरक्षण में महत्व:

  • मृदा-संरक्षण एवं भू-स्खलन की रोकथाम: बाँस का सघन जड़-तंत्र (Root System) पहाड़ी मिट्टी को कसकर बाँधे रखता है, जिससे भारी मानसूनी वर्षा में भी मिट्टी का कटाव और भू-स्खलन नहीं होता।
  • प्रचुर ऑक्सीजन उत्पादन: बाँस सामान्य पेड़ों की तुलना में 35% अधिक ऑक्सीजन वातावरण में छोड़ता है और भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करता है।

३. प्लास्टिक प्रदूषण का शत-प्रतिशत विकल्प:
आज पूरी दुनिया प्लास्टिक कचरे से संकट में है। बाँस से बने बर्तन, बोतलें, टोकरियाँ, फर्नीचर, टूथब्रश और स्ट्रॉ पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल हैं। बाँस की वस्तुएँ पर्यावरण को शून्य नुकसान पहुँचाती हैं और सतत विकास (Sustainable Development) का सबसे आदर्श समाधान प्रस्तुत करती हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
नागालैंड के जादुई पुरुष चंगकी भबनबा ने मृत्यु से पहले लोगों से क्या कहा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: चंगकी भबनबा ने कहा था कि उनकी मृत्यु के ठीक छठे दिन उनकी कब्र को खोदा जाए, जहाँ से लोगों को जीवन भर काम आने वाली एक अत्यंत उपयोगी वस्तु (बाँस के अंकुर) प्राप्त होगी।
कब्र खोदने के दिन और मिलने वाली वस्तु का स्मरण करें।
2
बाँस की खपच्चियाँ बनाने के लिए 3 वर्ष से अधिक पुराने बाँस क्यों नहीं काटे जाते?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तीन वर्ष से अधिक पुराने बाँस अत्यधिक सख्त, सूखे और भुरभुरे हो जाते हैं। जब इन्हें दाओ से चीरने का प्रयास किया जाता है, तो ये बीच में से चटककर टूट जाते हैं और मुड़ते नहीं हैं।
पुराने बाँस के कड़ेपन और टूटने के स्वभाव को याद करें।
3
'दाओ' क्या है और कारीगर इसका उपयोग किन-किन कार्यों के लिए करता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 'दाओ' पूर्वोत्तर का चौड़े फल वाला, आगे से मुड़ा हुआ धारदार पारंपरिक चाकू है। इसका उपयोग बाँस को गाँठों से काटने, लम्बवत चीरकर खपच्चियाँ बनाने और उन्हें छीलकर चिकना करने में होता है।
पूर्वोत्तर का चौड़े फल वाला चाकू और उसके तीन काम याद करें।
4
बाँस की बुनाई में 'ताना' और 'बाना' किसे कहते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बुनाई में लम्बवत (खड़ी) रूप से बिछाई गई आधार खपच्चियों को 'ताना' कहा जाता है, और उनके आर-पार क्षैतिज (आड़ी) दिशा में गूँथी जाने वाली खपच्चियों को 'बाना' कहा जाता है।
लम्बवत और क्षैतिज खपच्चियों के नाम का स्मरण करें।
5
खपच्चियों को प्राकृतिक रूप से रंगने के लिए किन वनस्पतियों का उपयोग किया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: खपच्चियों को हल्का हरा व पीला रंग देने के लिए इमली की पत्तियों, गहरा कत्थई व लाल रंग पाने के लिए पेड़ों की छाल व मजीठ, तथा चमकीला पीला रंग पाने के लिए कच्ची हल्दी का उपयोग किया जाता है।
इमली की पत्तियाँ, पेड़ों की छाल और हल्दी को याद करें।
6
'बुनना' और 'काटना' क्रियाओं में 'आई' प्रत्यय जोड़कर भाववाचक संज्ञा बनाइए और वाक्य में प्रयोग कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: १. बुनना + आई = बुनाई (वाक्य: इस नागा टोकरी की बुनाई अत्यंत मजबूत और सुंदर है।) २. काटना + आई = कटाई (वाक्य: सर्दियों के मौसम में बाँस की कटाई करना सबसे सुरक्षित होता है।)
बुनना $ ightarrow$ बुनाई, काटना $ ightarrow$ कटाई।
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