ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 15
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
साँस-साँस में बाँस (Vasant)
पाठ का परिचय, लेखक एवं अनुवादक का योगदान:
कक्षा 6 हिंदी 'वसंत भाग 1' का पंद्रहवाँ अध्याय 'साँस-साँस में बाँस' एक अत्यंत ज्ञानवर्धक, रोचक, सांस्कृतिक और पर्यावरणपरक निबंध है। इस पाठ के मूल लेखक प्रसिद्ध समाजशास्त्री एवं शोधकर्ता एलेक्स एम. जॉर्ज (Alex M. George) हैं, तथा इसका अत्यंत सहज, प्रवाहमयी और सुबोध हिंदी अनुवाद शशि सबलोक (Shashi Sablok) ने किया है। यह निबंध पूर्वोत्तर भारत (विशेष रूप से नागालैंड, असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश) के जनजीवन, जनजातीय परंपराओं और बाँस के साथ उनके अविभाज्य रिश्ते पर प्रकाश डालता है। आधुनिक भारत के महानगरीय जीवन में जहाँ प्लास्टिक, कंक्रीट और सिंथेटिक वस्तुओं का साम्राज्य फैल चुका है, यह निबंध हमें प्रकृति की उस हरी-भरी गोद में ले जाता है जहाँ मनुष्य और वनस्पति का संबंध केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक है। लेखक ने अत्यंत सरल भाषा में यह सिद्ध किया है कि पूर्वोत्तर के लोगों के जीवन का ऐसा कोई कोना, कोई संस्कार या कोई दिनचर्या नहीं है जो बाँस से अछूती हो।
'साँस-साँस में बाँस' शीर्षक की दार्शनिक एवं व्यावहारिक सार्थकता:
इस पाठ का शीर्षक 'साँस-साँस में बाँस' अत्यंत काव्यात्मक, सजीव और विचारोत्तेजक है। 'साँस-साँस' का अर्थ है—जीवन का प्रत्येक पल, प्रत्येक धड़कन और निरंतर चलने वाली जीवन-प्रक्रिया। पूर्वोत्तर के निवासियों के लिए बाँस केवल जंगल में उगने वाला एक पौधा नहीं है, बल्कि वह उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक हर पग पर उपस्थित रहने वाला अनिवार्य सहचर है। जब कोई शिशु जन्म लेता है, तो उसे सुलाने के लिए बाँस की लचीली खपच्चियों से बुना हुआ पालना या डलिया तैयार की जाती है। बचपन में वह बाँस की फिरकी, चकई और सीटी से खेलता है। बड़ा होकर जब वह किसान या मछुआरा बनता है, तो वह बाँस के बने हल, टोकरियों और मछली पकड़ने के फंदों (जलोई व पोलो) का उपयोग करता है। जब वह अपना घर बनाता है, तो घर के खंभे, फर्श, दीवारें, छप्पर, खिड़कियाँ और चहारदीवारी (बाड़) सब कुछ बाँस से ही बनती है। उसकी रसोई में अनाज रखने की कुठिला, चमचे, डलिया और बर्तन बाँस के होते हैं। यहाँ तक कि वह जो भोजन करता है, उसमें बाँस की ताज़ा कोपलों (करी) की अत्यंत स्वादिष्ट और पौष्टिक सब्जी तथा अचार शामिल होता है। वृद्धावस्था में चलने के लिए बाँस की लाठी उसका संबल बनती है और जब उसका देहावसान होता है, तो उसके पार्थिव शरीर को श्मशान तक ले जाने वाली अर्थी (टिकठी) भी बाँस से ही बाँधी जाती है। इस प्रकार, जन्म से लेकर मरण तक मनुष्य का संपूर्ण अस्तित्व बाँस में रचा-बसा है। यही कारण है कि लेखक ने इस निबंध का नाम 'साँस-साँस में बाँस' रखकर इस अटूट सांस्कृतिक बंधन को अमर कर दिया है।
चंगकी भबनबा की नागा लोक-कथा: जादुई उद्भव का मिथक:
निबंध का प्रारंभ नागालैंड की एक अत्यंत लोकप्रिय और विस्मयकारी लोक-कथा से होता है। नागालैंड की लोक-मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में 'चंगकी भबनबा' नाम का एक अत्यंत सिद्ध और चमत्कारी पुरुष हुआ करता था। वह एक महान जादूगर था जो अपने जीवनकाल में लोगों की भलाई के लिए अनेक जादुई करतब दिखाया करता था। जब उसकी मृत्यु का समय निकट आया, तो उसने अपने गाँव और कबीले के लोगों को अपने पास बुलाया और एक रहस्यमयी अंतिम वसीयत की। उसने कहा, "मेरे प्यारे देशवासियो! जब मेरी मृत्यु हो जाए, तो तुम मुझे दफना देना। किंतु मेरी मृत्यु के ठीक छठे दिन मेरी कब्र को खोदना। जब तुम कब्र खोदोगे, तो तुम्हें उसमें से एक ऐसी अनुपम और चमत्कारी वस्तु प्राप्त होगी जो तुम्हारे और तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों के जीवन को हमेशा-हमेशा के लिए बदल देगी और तुम्हारे हर काम आएगी।"
लोग जादूगर चंगकी भबनबा का अत्यंत आदर करते थे। जादूगर की मृत्यु के बाद विधि-विधान से उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। ठीक छठे दिन जब ग्रामीणों ने विस्मय और उत्सुकता के साथ उसकी कब्र को खोदा, तो उन्होंने देखा कि कब्र की मिट्टी से बाँस के नन्हें-नन्हें, हरे-भरे अंकुर (प्ररोह) फूट रहे थे। लोक-विश्वास के अनुसार, कब्र से निकले इन्हीं जादुई अंकुरों से धरती पर बाँस का प्रादुर्भाव हुआ और धीरे-धीरे पूरे पूर्वोत्तर के जंगलों में बाँस की सैकड़ों प्रजातियाँ फैल गईं। यह लोक-कथा प्रतीकात्मक रूप से यह दर्शाती है कि पूर्वोत्तर के जनजातीय समाज की दृष्टि में बाँस कोई साधारण घास नहीं, बल्कि किसी सिद्ध पुरुष का वह जादुई वरदान है जो मानव जाति की रक्षा और सेवा के लिए स्वयं प्रकृति की कोख से प्रकट हुआ है।
बाँस की सही आयु का चयन और कटाई का मौसम:
बाँस से कोई भी कलात्मक वस्तु बनाने के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण चरण होता है—जंगल से उपयुक्त बाँस का चयन करना। निबंध में लेखक ने बाँस काटने के वैज्ञानिक और पारंपरिक नियमों का अत्यंत प्रामाणिक विवरण दिया है। हर बाँस कटाई के योग्य नहीं होता। शिल्पकारों और कारीगरों के अनुसार केवल एक से तीन वर्ष (1 to 3 years) की आयु वाले बाँस ही कटाई के लिए सर्वोत्तम माने जाते हैं। इस आयु का बाँस युवा होता है, उसके भीतर पर्याप्त नमी और प्राकृतिक लचीलापन होता है। उसे आसानी से मोड़ा जा सकता है और चीरकर मनचाही खपच्चियाँ बनाई जा सकती हैं। यदि बाँस तीन वर्ष से अधिक पुराना हो जाए, तो वह अत्यंत सख्त, रूखा और कड़ा हो जाता है। ऐसे बूढ़े बाँस को जब चीरने का प्रयास किया जाता है, तो वह बीच में से चटक जाता है और टूटकर बेकार हो जाता है। इसके विपरीत, यदि बाँस एक वर्ष से भी छोटा हो, तो वह बहुत नरम और कमजोर होता है। कटाई का समय प्रायः शीत ऋतु (सर्दियों के महीने) में रखा जाता है, क्योंकि इस मौसम में बाँस में कीट-पतंगे या घुन लगने की संभावना न्यूनतम होती है।
'दाओ' औजार और खपच्चियाँ तैयार करने का सूक्ष्म हस्तकौशल:
पूर्वोत्तर के बाँस-शिल्प का सबसे प्रमुख और अनिवार्य औजार है—'दाओ' (Dao)। दाओ एक विशेष प्रकार का चौड़े फल वाला, अत्यंत धारदार और आगे से थोड़ा मुड़ा हुआ पारंपरिक चाकू या कटार होती है। पूर्वोत्तर का कोई भी नागा या असमी कारीगर दाओ के बिना अपने शिल्प की कल्पना भी नहीं कर सकता। दाओ का प्रयोग बाँस को गाँठों से काटने, उसके तने को लम्बवत चीरने और खपच्चियों को छीलकर चिकना करने के लिए किया जाता है।
बाँस को चीरकर जो पतली-पतली पट्टियाँ बनाई जाती हैं, उन्हें 'खपच्ची' (Bamboo Strips) कहा जाता है। खपच्चियाँ तैयार करना केवल शारीरिक बल का काम नहीं, बल्कि अत्यंत सधे हुए हाथों और एकाग्रता का कलात्मक कौशल है। कारीगर बाँस के लंबे डंडे को अपने घुटनों के बीच या जमीन पर टिकाता है और दाओ के तेज फल से बाँस को ऊपर से नीचे तक चीरता चला जाता है। खपच्ची की चौड़ाई और मोटाई इस बात पर निर्भर करती है कि उससे क्या बनाना है। यदि मजबूत टोकरी या अनाज की कुठिला बनानी है, तो खपच्चियाँ चौड़ी और थोड़ी मोटी रखी जाती हैं। किंतु यदि महीन चटाई, पंखा या टोपी बुननी है, तो खपच्चियों को कागज या धागे की तरह अत्यंत बारीक और पतला चीरा जाता है।
चीरने के बाद खपच्चियों की छिलाई और घिसाई की जाती है। ताज़ी कटी हुई खपच्चियों के किनारों पर अत्यंत महीन और नुकीले रेशे होते हैं, जो हाथों में चुभ सकते हैं। कारीगर दाओ के फल को तिरछा पकड़कर खपच्ची को उसके नीचे से बार-बार खींचता है, जिससे खपच्ची का खुरदरापन दूर हो जाता है और वह रेशमी फीते की तरह चिकनी और अत्यंत लचीली बन जाती है।
बुनाई की विविध शैलियाँ: ताना-बाना और डिज़ाइन:
जब खपच्चियाँ तैयार हो जाती हैं, तब आरंभ होता है बुनाई (Weaving) का जादुई संसार। बाँस की बुनाई ठीक उसी प्रकार की जाती है जैसे करघे पर धागों से कपड़ा बुना जाता है। इसमें भी 'ताना' (Warp) और 'बाना' (Weft) का प्रयोग होता है। लम्बवत रूप से बिछाई गई आधार खपच्चियों को 'ताना' कहा जाता है, और उनके आर-पार क्षैतिज रूप से पिरोई जाने वाली खपच्चियों को 'बाना' कहा जाता है।
कारीगर ताने और बाने को गूँथकर विभिन्न प्रकार की डिज़ाइनें बनाते हैं। सबसे सरल बुनाई 'चेकबोर्ड' (एक ऊपर, एक नीचे) होती है। इसके अतिरिक्त सबसे प्रसिद्ध बुनाई 'ट्विल' (Twill) कहलाती है, जिसमें खपच्चियों को 'दो ऊपर-दो नीचे' या 'तीन ऊपर-तीन नीचे' के क्रम में पिरोया जाता है। इससे टोकरी या चटाई की सतह पर तिरछी धारियों और हेरिंगबोन जैसी अत्यंत सुंदर ज्यामितीय आकृतियाँ उभर आती हैं। टोकरी बनाते समय पहले चौकोर या गोलाकार पेंदी बुनी जाती है, फिर खपच्चियों को ऊपर की ओर मोड़कर दीवारें उठाई जाती हैं, और अंत में ऊपरी किनारे को मजबूत बाँस की गोल छड़ी से लपेटकर कस दिया जाता है ताकि बुनाई कभी न खुले।
प्राकृतिक रंगों की छटा: पर्यावरण-अनुकूल रंगाई कला:
पूर्वोत्तर के कारीगर अपनी कला में कभी भी रासायनिक या जहरीले सिंथेटिक रंगों का प्रयोग नहीं करते। वे अपने परिवेश में उपलब्ध वनस्पतियों, पत्तियों और पेड़ों की छाल से शत-प्रतिशत प्राकृतिक रंग तैयार करते हैं। खपच्चियों को रंगने के लिए उन्हें उबलते हुए प्राकृतिक रंग के घोल में पकाया जाता है और फिर धूप में सुखाया जाता है। उदाहरण के लिए, हल्का हरा और पीला रंग प्राप्त करने के लिए इमली की हरी पत्तियों का उपयोग किया जाता है। गहरा कत्थई, चॉकलेटी या लाल रंग पाने के लिए विभिन्न वनों के पेड़ों की छाल तथा मजीठ की जड़ों का प्रयोग किया जाता है। चमकीले पीले रंग के लिए कच्ची हल्दी का प्रयोग होता है। इन प्राकृतिक रंगों से रंगी गई खपच्चियों से जब बहुरंगी टोकरियाँ और चटाइयाँ बुनी जाती हैं, तो वे वर्षों तक धूप और पानी में रहने के बावजूद अपनी चमक नहीं खोतीं और पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं पहुँचातीं।
बाँस के बहुआयामी उपयोग: वास्तुकला से लेकर भोजन तक:
पूर्वोत्तर भारत में बाँस का उपयोग केवल टोकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त है:
वास्तुकला और आवास: पूर्वोत्तर का क्षेत्र भारी वर्षा और भूकंप संभावित (Earthquake-prone) क्षेत्र है। कंक्रीट के भारी मकान भूकंप में गिरकर जानलेवा बन जाते हैं, किंतु बाँस के बने हल्के और लचीले मकान भूकंप के झटकों को आसानी से झेल लेते हैं। घर के खंभे, फर्श, चटाई की दीवारें, खिड़कियाँ और छप्पर सब बाँस से बनाए जाते हैं।
कृषि, मत्स्य-पालन और आजीविका: असम और मणिपुर के जल-प्लावित क्षेत्रों में मछली पकड़ने के लिए बाँस की तीलियों से विशेष शंक्वाकार जाल या फंदे बनाए जाते हैं, जिन्हें 'जलोई' या 'पोलो' कहा जाता है। इसे पानी में घुमाकर या कीचड़ में दबाकर आसानी से मछलियाँ पकड़ ली जाती हैं। इसके अतिरिक्त चाय बागानों में महिलाएँ अपनी पीठ पर बाँस की जो लंबी टोकरी बाँधती हैं, वह हल्की होने के बावजूद 30 से 40 किलो चाय की पत्तियाँ संभाल सकती है।
खाद्य एवं पोषण: बाँस केवल कठोर लकड़ी नहीं देता, बल्कि वह एक स्वादिष्ट और पोषक भोजन भी है। वर्षा ऋतु में जमीन से फूटने वाले बाँस के ताज़ा, मुलायम अंकुरों (जिन्हें कोपल या करी कहा जाता है) को काटकर उबाला जाता है। इसकी मसालेदार सब्जी, करी, सूप और अचार पूर्वोत्तर के प्रत्येक घर का प्रिय और पारंपरिक व्यंजन है। इसमें प्रचुर मात्रा में फाइबर और विटामिन्स होते हैं।
संगीत और लोक-संस्कृति: भारतीय शास्त्रीय और लोक संगीत का प्राण 'बाँसुरी' (Flute) बाँस के खोखले तने से ही बनती है। भगवान श्री कृष्ण की मुरली से लेकर पूर्वोत्तर के बिहू और चेराव (बाँस नृत्य) तक, बाँस की मधुर ध्वनि पूरे वातावरण को आनंदित करती है।
पारिस्थितिकी, 'हरा सोना' और आधुनिक प्रासंगिकता:
वैज्ञानिक दृष्टि से बाँस कोई काष्ठ-वृक्ष (Tree) नहीं है, बल्कि यह 'पोएसी' (Poaceae) कुल की एक विशालकाय 'घास' (Grass) है। यह संसार की सबसे तेजी से बढ़ने वाली वनस्पति है। अनुकूल परिस्थितियों में बाँस का एक पौधा 24 घंटे में एक मीटर (लगभग 3 फीट) तक बढ़ सकता है। इसे एक बार लगाने के बाद बार-बार रोपने की आवश्यकता नहीं होती; जब एक डंडा काटा जाता है, तो उसकी जड़ों से कई नए प्ररोह अपने-आप फूट पड़ते हैं।
आज की इक्कीसवीं सदी में बाँस को वैश्विक स्तर पर 'हरा सोना' (Green Gold) कहा जा रहा है। इसके प्रमुख पारिस्थितिक लाभ निम्नलिखित हैं:
मृदा-संरक्षण (Soil Conservation): बाँस का विशाल और सघन जड़-तंत्र (Root System) पहाड़ी मिट्टी को इतनी मजबूती से जकड़ लेता है कि मूसलाधार बारिश में भी भू-स्खलन और मिट्टी का कटाव नहीं होता।
कार्बन सिंक और प्रचुर ऑक्सीजन: बाँस सामान्य वृक्षों की तुलना में 35% अधिक ऑक्सीजन वातावरण में छोड़ता है और भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर ग्लोबल वार्मिंग को कम करता है।
प्लास्टिक का संपूर्ण विकल्प: आज पूरी दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण से त्रस्त है। बाँस की बनी बोतलें, टूथब्रश, बर्तन, स्ट्रॉ, टोकरियाँ और फर्नीचर पर्यावरण को शून्य नुकसान पहुँचाते हुए प्लास्टिक का सर्वोत्तम बायोडिग्रेडेबल विकल्प बन रहे हैं।
निष्कर्ष:
संक्षेप में कहें तो, एलेक्स एम. जॉर्ज का निबंध 'साँस-साँस में बाँस' हमें यह संदेश देता है कि पारंपरिक जनजातीय ज्ञान और प्रकृति-सम्मत जीवनशैली ही पृथ्वी के सुरक्षित भविष्य की एकमात्र कुंजी है। पूर्वोत्तर की बाँस संस्कृति हमें प्रकृति का दोहन करना नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ एकाकार होकर जीना सिखाती है। यह पाठ विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, हस्तशिल्प और श्रम के प्रति आदर, और पर्यावरण-संरक्षण की चेतना का संचार करता है।