ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 2
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
बचपन (Vasant)
पाठ का परिचय एवं संस्मरण विधा का सैद्धांतिक विवेचन:
आईसीएसई / सीआईएससीई कक्षा 6 हिन्दी पाठ्यक्रम के अंतर्गत पाठ्यपुस्तक 'वसंत भाग - 1' का द्वितीय अध्याय 'बचपन' हिन्दी साहित्य की एक अत्यंत लोकप्रिय, जीवंत और हृदयस्पर्शी गद्य रचना है। यह पाठ 'संस्मरण' (Memoir) विधा के अंतर्गत आता है। संस्मरण साहित्य की वह विशिष्ट विधा है जिसमें लेखक अपने जीवन में घटित वास्तविक घटनाओं, अनुभूतियों, व्यक्तियों और समकालीन सामाजिक परिवेश को अपनी स्मृति के आधार पर पूरी प्रामाणिकता, तटस्थता और कलात्मक आत्मीयता के साथ शब्दबद्ध करता है। प्रस्तुत पाठ में हिन्दी की मूर्धन्य साहित्यकार कृष्णा सोबती ने अपने बाल्यकाल की स्मृतियों को बड़े ही रोचक और चित्रात्मक ढंग से उकेरा है। वे पाठक को बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के उस ऐतिहासिक कालखंड में ले जाती हैं जब भारत में आधुनिक तकनीकी सुविधाओं का अभाव था, परंतु जीवन में सादगी, पारस्परिक आत्मीयता, प्राकृतिक सौंदर्य और पारिवारिक अनुशासन का गहरा प्रभाव था। इस पाठ के माध्यम से विद्यार्थी न केवल लेखिका के बाल्यकाल के रोचक प्रसंगों से परिचित होते हैं, बल्कि वे यह भी समझ पाते हैं कि पिछली एक सदी के दौरान मानव समाज की वेशभूषा, खान-पान, मनोरंजन के साधनों और जीवन-मूल्यों में किस प्रकार युगांतरकारी परिवर्तन आया है।
लेखिका परिचय एवं उनका साहित्यिक योगदान:
प्रस्तुत पाठ की लेखिका कृष्णा सोबती (18 फरवरी 1925 – 25 जनवरी 2019) हिन्दी कथा-साहित्य की अप्रतिम हस्ताक्षर और युग-प्रवर्तक रचनाकार थीं। उनका जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गुजरात नगर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। देश के विभाजन के पश्चात वे दिल्ली आ गईं और आजीवन स्वतंत्र लेखन में रत रहीं। कृष्णा सोबती अपनी विशिष्ट भाषा-शैली, निर्भीक अभिव्यक्ति, गहरी मानवीय संवेदना और जीवंत चरित्र-सृजन के लिए संपूर्ण भारतीय साहित्य जगत में समादृत हैं। उनकी भाषा में पंजाबी की सोंधी मिठास, उर्दू की नफासत और विशुद्ध हिन्दी शब्दावली का अनूठा सम्मिश्रण देखने को मिलता है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'ज़िन्दगीनामा', 'मित्रो मरजानी', 'डार से बिछुड़ी', 'सूरजमुखी अँधेरे के', 'ऐ लड़की', 'दिलोदानिश' और 'समय सरगम' अत्यंत विख्यात हैं। इसके अतिरिक्त 'हम हशमत' शीर्षक से प्रकाशित उनका शब्द-चित्र और संस्मरण संग्रह हिन्दी गद्य की अमूल्य निधि माना जाता है। साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2017 में भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान '53वें ज्ञानपीठ पुरस्कार' से विभूषित किया गया। इससे पूर्व उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी महत्तर सदस्यता (फेलोशिप), व्यास सम्मान तथा शलाका सम्मान सहित देश के शीर्षस्थ पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका था। 'बचपन' संस्मरण में लेखिका की आत्मीय संवाद शैली और उनकी पैनी निरीक्षण दृष्टि का उत्कृष्टतम रूप प्रकट हुआ है।
संस्मरण का क्रमबद्ध कथानक एवं प्रमुख प्रसंग:
प्रस्तुत पाठ को लेखिका ने बड़े ही सहज और आत्मीय अंदाज में संजोया है। संपूर्ण संस्मरण को अध्ययन की दृष्टि से निम्नलिखित पाँच प्रमुख प्रसंगों में विभाजित कर विश्लेषित किया जा सकता है:
लेखिका का वर्तमान स्वरूप एवं बचपन की वेशभूषा में बदलाव:
संस्मरण के आरंभ में लेखिका स्वयं को पाठकों के सामने एक दादी या नानी की उम्र की बुजुर्ग महिला के रूप में प्रस्तुत करती हैं। वे कहती हैं कि वे अब पिछली शताब्दी में पैदा हुई महिला हैं और उम्र बढ़ने के साथ उनके भीतर एक मानसिक सयानापन (परिपक्वता) आ गया है। इस सयानेपन का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव उनके पहनावों पर पड़ा है। वे बताती हैं कि बचपन में वे रंग-बिरंगे, चटक और चंचल कपड़े पहनना पसंद करती थीं। उन्होंने बचपन में अनेक प्रकार के परिधान पहने—जैसे फ्रॉक, निक्कर-वॉकर, गरारे, शरारे और चूड़ीदार तथा घेरदार कुर्ते। उनके कपड़ों में नीले, पीले, जामुनी, ग्रे और चॉकलेटी रंगों की प्रधानता होती थी। परंतु वर्तमान वृद्धावस्था में उनका मन चटक रंगों से हटकर केवल हल्के और सादे सफेद वस्त्र पहनने की ओर मुड़ गया है। वे घेरदार पोषाकों को छोड़कर अब सहज, ढीले-ढाले कुर्ते पहनती हैं। यह प्रसंग जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में मानवीय रुचि और स्वभाव में आने वाले स्वाभाविक परिवर्तन का मार्मिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
पारिवारिक अनुशासन, स्वावलंबन और शनिवार का कड़वा नियम:
लेखिका अपने बचपन के घरेलू अनुशासन की चर्चा करते हुए बताती हैं कि उनके परिवार में बच्चों को अपने छोटे-मोटे काम स्वयं करने की सख्त हिदायत थी। बच्चों को अपने मोज़े और स्टॉकिंग्स खुद धोने पड़ते थे; नौकरों को कपड़े धोने के लिए देना सर्वथा वर्जित था। रविवार की सुबह सारे बच्चे मिलकर अपने-अपने जूतों की मरम्मत और पॉलिश करने में जुट जाते थे। वे ब्रश और कपड़े से जूतों को तब तक रगड़ते थे जब तक कि चमड़े पर शानदार चमक न आ जाए। उस जमाने के जूते आज की तरह मुलायम नहीं होते थे। जब भी नया जूता मिलता, उसके साथ पैरों में छाले पड़ने का कष्ट भी शुरू हो जाता था। अतः बच्चे नए जूते पहनते ही मोज़े के अंदर रुई ठूँस लेते थे—'जूता लगा तो अंदर रुई!' इसके साथ ही शनिवार की सुबह उनके लिए किसी बुरे सपने की तरह होती थी। शनिवार को पेट साफ रखने के उद्देश्य से घर के सभी बच्चों को अनिवार्य रूप से कैस्टर ऑयल (अरंडी का तेल) अथवा ऑलिव ऑयल (जैतून का तेल) पीना पड़ता था। सुबह उठते ही उस तेल की गंध नाक में समा जाती थी और मेज पर रखे खुराक के निशान वाले छोटे काँच के गिलासों को देखते ही जी मिचलाने और उल्टी आने लगती थी। लेखिका बड़े व्यंग्यात्मक भाव से लिखती हैं कि यदि वे उस शनिवारीय दवा को न भी पीते, तो उनकी सेहत पर कोई विशेष विपत्ति नहीं आने वाली थी। यह प्रसंग तत्कालीन कठोर पारिवारिक अनुशासन और स्वास्थ्य संबंधी घरेलू मान्यताओं पर प्रकाश डालता है।
खान-पान एवं जीवन-शैली में ऐतिहासिक युगांतर (तब बनाम अब):
लेखिका अपने बाल्यकाल की तुलना आज के समय से करते हुए अनेक रोचक भौतिक और खान-पान संबंधी अंतर गिनाती हैं। वे बताती हैं कि उनके बचपन में गिने-चुने समृद्ध घरों में ही मनोरंजन के लिए ग्रामोफोन हुआ करते थे; रेडियो और टेलीविजन का कहीं कोई नामोनिशान नहीं था। खान-पान के संदर्भ में वे बताती हैं कि उस समय की सादी कुल्फी आज आइसक्रीम में तब्दील हो चुकी है। पहले बाजारों में बिकने वाले ताजे समोसे और कचौड़ी की जगह अब आधुनिक पैटीज़ और फास्ट-फूड ने ले ली है। उस दौर में गर्मियों में शहतूत, फाल्से और खसखस के ताजे फलों का प्राकृतिक शरबत घर-घर में बनाया और पिया जाता था, जिसकी जगह आज रासायनिक तत्वों से युक्त कोक, पेप्सी और डिब्बाबंद कोल्ड ड्रिंक्स ने ले ली है। उस समय शिमला में लेमनेड और विमटो नामक पेय मिलते थे। लेखिका और उनके भाई-बहनों को सप्ताह में केवल एक दिन मॉल रोड की प्रसिद्ध कन्फेक्शनरी शॉप से चॉकलेट और पेस्ट्री खरीदने की छूट थी। वे रात के भोजन के पश्चात बिस्तर में आराम से लेटकर धीरे-धीरे उस चॉकलेट का आनंद लेती थीं। इसके अलावा शिमला के रिज मैदान पर बिकने वाला प्रसिद्ध 'चना जोर गरम' और अनारदाने का खट्टा-मीठा चूर्ण बच्चों का सर्वाधिक प्रिय व्यंजन था। पुराने कागजों से बनी तिरछी नुकीली पुड़िया में मिलने वाले उस चने को खाते हुए पूरा रिज मैदान घूमना एक अविस्मरणीय आनंददायक अनुभव होता था। उस समय का यह लोक-गीत हर बच्चे की जुबान पर होता था—'चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार, चना जोर गरम...'
शिमला की भौगोलिक व सांस्कृतिक स्मृतियाँ:
लेखिका ने शिमला के प्राकृतिक और सांस्कृतिक परिवेश का अत्यंत सजीव चित्र खींचा है। शिमला का मॉल रोड, स्कैंडल पॉइंट, रिज का विशाल मैदान और जाखू का ऊँचा पहाड़ उनके बाल्यकाल के दैनिक जीवन के प्रमुख केंद्र थे। शाम के समय रिज मैदान पर लोगों की चहल-पहल, दूर-दूर से गूँजती क्राइस्ट चर्च की घंटियों की सुरीली आवाज और सूर्यास्त के समय आकाश में बिखरती गुलाबी-सुनहरी छटा का वर्णन मन को मोह लेता है। शिमला के बच्चों को कभी न कभी घोड़े (टट्टू) की सवारी करने का अवसर अवश्य मिलता था, जिसे वे अत्यंत गर्व और रोमांच का अनुभव मानते थे। इसके अतिरिक्त स्कैंडल पॉइंट के सामने एक जनरल स्टोर की दुकान की खिड़की में शिमला-कालका टॉय ट्रेन का एक सुंदर मॉडल रखा हुआ था। उस मॉडल में छोटी-छोटी पटरियों पर खड़ी ट्रेन, छोटे-छोटे डिब्बे, लाल बत्ती वाला सिग्नल और छोटा सा स्टेशन देखकर बच्चे घंटों विस्मय से निहारते रहते थे। उस जमाने में छुक-छुक करती वह ट्रेन तेज गति का सबसे बड़ा आश्चर्य मानी जाती थी और कभी आकाश में उड़ता हुआ हवाई जहाज दिख जाता तो बच्चे घरों से दौड़कर बाहर आ जाते और उसे किसी भारी-भरकम उड़ते हुए पक्षी की भाँति अचरज से देखते थे।
पहली बार चश्मा लगने की घटना, भाई की छेड़खानी एवं आत्म-स्वीकृति:
संस्मरण का अंतिम और सर्वाधिक मार्मिक प्रसंग लेखिका के चश्मा लगने से संबंधित है। लेखिका स्पष्ट स्वीकार करती हैं कि उनकी आँखें कमजोर होने का दोष किसी और का नहीं, बल्कि स्वयं उनका अपना था। वे दिन की प्राकृतिक रोशनी में पढ़ने के बजाय रात में टेबल लैंप की मंद और अप्रत्यक्ष रोशनी में देर तक पढ़ाई किया करती थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी दृष्टि कमजोर हो गई और उन्हें चश्मा लगाना पड़ा। जब वे पहली बार चश्मा लगाकर घर आईं, तो उनके चेहरे का रूप देखकर परिवार के सभी लोग हैरान रह गए। अंग्रेज डॉक्टर ने उन्हें दिलासा दिया था कि लगातार चश्मा पहनने से कुछ समय बाद नजर ठीक हो जाएगी और चश्मा उतर जाएगा, किंतु वह चश्मा आज वृद्धावस्था तक कभी नहीं उतरा; उम्र के साथ उसका नंबर ही बढ़ता गया। परिवार के सदस्य और रिश्तेदार उन्हें देखकर कहते—'अरे, इतनी छोटी उम्र में चश्मा! दूध पिया करो।' लेखिका संकोच में डॉक्टर की वही बात दोहरा देतीं। इस स्थिति में उनके चचेरे भाई ने उन्हें खूब छेड़ा। जब लेखिका ने पहली बार चश्मा लगाया तो भाई ने उन पर एक मजेदार व्यंग्य-शेर कसा:
'आँख पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की,
यह नहीं लड़की को मालूम सूरत बनी लंगूर की!'
भाई के इस शेर को सुनकर लेखिका को अत्यधिक खीझ और गुस्सा आया। वे अपने कमरे में जाकर आईने के सामने खड़ी हो गईं और बार-बार चश्मा उतारकर और पहनकर अपना चेहरा देखने लगीं—'सूरत बनी लंगूर की? नहीं-नहीं, हाँ-हाँ, नहीं-नहीं!' परंतु बाद में वे स्वयं अपनी सूरत देखकर हँस पड़ीं। धीरे-धीरे चश्मा उनके चेहरे का एक अभिन्न अंग बन गया। जब कभी वे चश्मा उतारतीं, तो उनका चेहरा खाली-खाली और अजीब सा लगने लगता। संस्मरण के अंत में लेखिका बताती हैं कि अब वृद्धावस्था में उन्हें सिर पर दुपट्टा ओढ़ने के स्थान पर शिमला की तरह-तरह के रंगों वाली हिमाचली टोपियाँ पहनना अधिक सहज और सुविधाजनक लगता है।
संस्मरण की भाषा-शैली एवं शिल्पगत सौंदर्य:
कृष्णा सोबती की गद्य-शैली अत्यंत सहज, प्रवाहमयी, बोलचाल के निकट और चित्रात्मक है। वे पाठकों से सीधे मुखातिब होती हैं, जिससे पाठक को लगता है मानो कोई अपनी बुजुर्ग दादी उसके सामने बैठकर अपने जीवन की दास्तान सुना रही हो। भाषा में अंग्रेजी के कई प्रचलित शब्द (जैसे—फ्रॉक, निक्कर, ट्यूनिक, स्टॉकिंग्स, ऑलिव ऑयल, कैस्टर ऑयल, ग्रामोफोन, पेस्ट्री, चॉकलेट, कन्फेक्शनरी, स्पीड, टेबल लैंप) अत्यंत स्वाभाविक रूप से घुले-मिले हैं, जो उस समय के शिमला के एंग्लो-इंडियन परिवेश को सजीव कर देते हैं। इसके अतिरिक्त पाठ में देशज, तद्भव और तत्सम शब्दों का सुंदर समन्वय है। भाषा की बात खंड में 'चमक' से 'चमकीला' जैसे भाववाचक संज्ञा से गुणवाचक विशेषण बनाने के नियम तथा मुहावरेदार प्रयोग पाठ को व्याकरणिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बनाते हैं।
पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap) और जीवन-दर्शन:
यह पाठ आधुनिक युवा पीढ़ी को यह गहरा संदेश देता है कि भौतिक सुख-सुविधाओं और तकनीकों के निरंतर बदलने के बावजूद मानवीय संवेदनाएँ, बचपन की निश्छल खुशियाँ और आत्म-निर्भरता के मूल्य कभी पुराने नहीं पड़ते। आज का बचपन जहाँ स्क्रीन और आभासी दुनिया में सिमट रहा है, वहीं लेखिका का बचपन प्रकृति, शारीरिक श्रम, स्वावलंबन और पारिवारिक जुड़ाव से महकता था। यह संस्मरण हमें अपने बुजुर्गों के अनुभवों का सम्मान करने और बदलते समय के साथ संतुलन बनाए रखने की अमूल्य प्रेरणा प्रदान करता है।