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ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 2
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

बचपन (Vasant)

पाठ का परिचय एवं संस्मरण विधा का सैद्धांतिक विवेचन: आईसीएसई / सीआईएससीई कक्षा 6 हिन्दी पाठ्यक्रम के अंतर्गत पाठ्यपुस्तक 'वसंत भाग - 1' का द्वितीय अध्याय 'बचपन' हिन्दी साहित्य की एक अत्यंत लोकप्रिय, जीवंत और हृदयस्पर्शी गद्य रचना है। यह पाठ 'संस्मरण' (Memoir) विधा के अंतर्गत आता है। संस्मरण साहित्य की वह विशिष्ट विधा है जिसमें लेखक अपने जीवन में घटित वास्तविक घटनाओं, अनुभूतियों, व्यक्तियों और समकालीन सामाजिक परिवेश को अपनी स्मृति के आधार पर पूरी प्रामाणिकता, तटस्थता और कलात्मक आत्मीयता के साथ शब्दबद्ध करता है। प्रस्तुत पाठ में हिन्दी की मूर्धन्य साहित्यकार कृष्णा सोबती ने अपने बाल्यकाल की स्मृतियों को बड़े ही रोचक और चित्रात्मक ढंग से उकेरा है। वे पाठक को बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के उस ऐतिहासिक कालखंड में ले जाती हैं जब भारत में आधुनिक तकनीकी सुविधाओं का अभाव था, परंतु जीवन में सादगी, पारस्परिक आत्मीयता, प्राकृतिक सौंदर्य और पारिवारिक अनुशासन का गहरा प्रभाव था। इस पाठ के माध्यम से विद्यार्थी न केवल लेखिका के बाल्यकाल के रोचक प्रसंगों से परिचित होते हैं, बल्कि वे यह भी समझ पाते हैं कि पिछली एक सदी के दौरान मानव समाज की वेशभूषा, खान-पान, मनोरंजन के साधनों और जीवन-मूल्यों में किस प्रकार युगांतरकारी परिवर्तन आया है। लेखिका परिचय एवं उनका साहित्यिक योगदान: प्रस्तुत पाठ की लेखिका कृष्णा सोबती (18 फरवरी 1925 – 25 जनवरी 2019) हिन्दी कथा-साहित्य की अप्रतिम हस्ताक्षर और युग-प्रवर्तक रचनाकार थीं। उनका जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गुजरात नगर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। देश के विभाजन के पश्चात वे दिल्ली आ गईं और आजीवन स्वतंत्र लेखन में रत रहीं। कृष्णा सोबती अपनी विशिष्ट भाषा-शैली, निर्भीक अभिव्यक्ति, गहरी मानवीय संवेदना और जीवंत चरित्र-सृजन के लिए संपूर्ण भारतीय साहित्य जगत में समादृत हैं। उनकी भाषा में पंजाबी की सोंधी मिठास, उर्दू की नफासत और विशुद्ध हिन्दी शब्दावली का अनूठा सम्मिश्रण देखने को मिलता है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'ज़िन्दगीनामा', 'मित्रो मरजानी', 'डार से बिछुड़ी', 'सूरजमुखी अँधेरे के', 'ऐ लड़की', 'दिलोदानिश' और 'समय सरगम' अत्यंत विख्यात हैं। इसके अतिरिक्त 'हम हशमत' शीर्षक से प्रकाशित उनका शब्द-चित्र और संस्मरण संग्रह हिन्दी गद्य की अमूल्य निधि माना जाता है। साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2017 में भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान '53वें ज्ञानपीठ पुरस्कार' से विभूषित किया गया। इससे पूर्व उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी महत्तर सदस्यता (फेलोशिप), व्यास सम्मान तथा शलाका सम्मान सहित देश के शीर्षस्थ पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका था। 'बचपन' संस्मरण में लेखिका की आत्मीय संवाद शैली और उनकी पैनी निरीक्षण दृष्टि का उत्कृष्टतम रूप प्रकट हुआ है। संस्मरण का क्रमबद्ध कथानक एवं प्रमुख प्रसंग: प्रस्तुत पाठ को लेखिका ने बड़े ही सहज और आत्मीय अंदाज में संजोया है। संपूर्ण संस्मरण को अध्ययन की दृष्टि से निम्नलिखित पाँच प्रमुख प्रसंगों में विभाजित कर विश्लेषित किया जा सकता है: लेखिका का वर्तमान स्वरूप एवं बचपन की वेशभूषा में बदलाव: संस्मरण के आरंभ में लेखिका स्वयं को पाठकों के सामने एक दादी या नानी की उम्र की बुजुर्ग महिला के रूप में प्रस्तुत करती हैं। वे कहती हैं कि वे अब पिछली शताब्दी में पैदा हुई महिला हैं और उम्र बढ़ने के साथ उनके भीतर एक मानसिक सयानापन (परिपक्वता) आ गया है। इस सयानेपन का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव उनके पहनावों पर पड़ा है। वे बताती हैं कि बचपन में वे रंग-बिरंगे, चटक और चंचल कपड़े पहनना पसंद करती थीं। उन्होंने बचपन में अनेक प्रकार के परिधान पहने—जैसे फ्रॉक, निक्कर-वॉकर, गरारे, शरारे और चूड़ीदार तथा घेरदार कुर्ते। उनके कपड़ों में नीले, पीले, जामुनी, ग्रे और चॉकलेटी रंगों की प्रधानता होती थी। परंतु वर्तमान वृद्धावस्था में उनका मन चटक रंगों से हटकर केवल हल्के और सादे सफेद वस्त्र पहनने की ओर मुड़ गया है। वे घेरदार पोषाकों को छोड़कर अब सहज, ढीले-ढाले कुर्ते पहनती हैं। यह प्रसंग जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में मानवीय रुचि और स्वभाव में आने वाले स्वाभाविक परिवर्तन का मार्मिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। पारिवारिक अनुशासन, स्वावलंबन और शनिवार का कड़वा नियम: लेखिका अपने बचपन के घरेलू अनुशासन की चर्चा करते हुए बताती हैं कि उनके परिवार में बच्चों को अपने छोटे-मोटे काम स्वयं करने की सख्त हिदायत थी। बच्चों को अपने मोज़े और स्टॉकिंग्स खुद धोने पड़ते थे; नौकरों को कपड़े धोने के लिए देना सर्वथा वर्जित था। रविवार की सुबह सारे बच्चे मिलकर अपने-अपने जूतों की मरम्मत और पॉलिश करने में जुट जाते थे। वे ब्रश और कपड़े से जूतों को तब तक रगड़ते थे जब तक कि चमड़े पर शानदार चमक न आ जाए। उस जमाने के जूते आज की तरह मुलायम नहीं होते थे। जब भी नया जूता मिलता, उसके साथ पैरों में छाले पड़ने का कष्ट भी शुरू हो जाता था। अतः बच्चे नए जूते पहनते ही मोज़े के अंदर रुई ठूँस लेते थे—'जूता लगा तो अंदर रुई!' इसके साथ ही शनिवार की सुबह उनके लिए किसी बुरे सपने की तरह होती थी। शनिवार को पेट साफ रखने के उद्देश्य से घर के सभी बच्चों को अनिवार्य रूप से कैस्टर ऑयल (अरंडी का तेल) अथवा ऑलिव ऑयल (जैतून का तेल) पीना पड़ता था। सुबह उठते ही उस तेल की गंध नाक में समा जाती थी और मेज पर रखे खुराक के निशान वाले छोटे काँच के गिलासों को देखते ही जी मिचलाने और उल्टी आने लगती थी। लेखिका बड़े व्यंग्यात्मक भाव से लिखती हैं कि यदि वे उस शनिवारीय दवा को न भी पीते, तो उनकी सेहत पर कोई विशेष विपत्ति नहीं आने वाली थी। यह प्रसंग तत्कालीन कठोर पारिवारिक अनुशासन और स्वास्थ्य संबंधी घरेलू मान्यताओं पर प्रकाश डालता है। खान-पान एवं जीवन-शैली में ऐतिहासिक युगांतर (तब बनाम अब): लेखिका अपने बाल्यकाल की तुलना आज के समय से करते हुए अनेक रोचक भौतिक और खान-पान संबंधी अंतर गिनाती हैं। वे बताती हैं कि उनके बचपन में गिने-चुने समृद्ध घरों में ही मनोरंजन के लिए ग्रामोफोन हुआ करते थे; रेडियो और टेलीविजन का कहीं कोई नामोनिशान नहीं था। खान-पान के संदर्भ में वे बताती हैं कि उस समय की सादी कुल्फी आज आइसक्रीम में तब्दील हो चुकी है। पहले बाजारों में बिकने वाले ताजे समोसे और कचौड़ी की जगह अब आधुनिक पैटीज़ और फास्ट-फूड ने ले ली है। उस दौर में गर्मियों में शहतूत, फाल्से और खसखस के ताजे फलों का प्राकृतिक शरबत घर-घर में बनाया और पिया जाता था, जिसकी जगह आज रासायनिक तत्वों से युक्त कोक, पेप्सी और डिब्बाबंद कोल्ड ड्रिंक्स ने ले ली है। उस समय शिमला में लेमनेड और विमटो नामक पेय मिलते थे। लेखिका और उनके भाई-बहनों को सप्ताह में केवल एक दिन मॉल रोड की प्रसिद्ध कन्फेक्शनरी शॉप से चॉकलेट और पेस्ट्री खरीदने की छूट थी। वे रात के भोजन के पश्चात बिस्तर में आराम से लेटकर धीरे-धीरे उस चॉकलेट का आनंद लेती थीं। इसके अलावा शिमला के रिज मैदान पर बिकने वाला प्रसिद्ध 'चना जोर गरम' और अनारदाने का खट्टा-मीठा चूर्ण बच्चों का सर्वाधिक प्रिय व्यंजन था। पुराने कागजों से बनी तिरछी नुकीली पुड़िया में मिलने वाले उस चने को खाते हुए पूरा रिज मैदान घूमना एक अविस्मरणीय आनंददायक अनुभव होता था। उस समय का यह लोक-गीत हर बच्चे की जुबान पर होता था—'चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार, चना जोर गरम...' शिमला की भौगोलिक व सांस्कृतिक स्मृतियाँ: लेखिका ने शिमला के प्राकृतिक और सांस्कृतिक परिवेश का अत्यंत सजीव चित्र खींचा है। शिमला का मॉल रोड, स्कैंडल पॉइंट, रिज का विशाल मैदान और जाखू का ऊँचा पहाड़ उनके बाल्यकाल के दैनिक जीवन के प्रमुख केंद्र थे। शाम के समय रिज मैदान पर लोगों की चहल-पहल, दूर-दूर से गूँजती क्राइस्ट चर्च की घंटियों की सुरीली आवाज और सूर्यास्त के समय आकाश में बिखरती गुलाबी-सुनहरी छटा का वर्णन मन को मोह लेता है। शिमला के बच्चों को कभी न कभी घोड़े (टट्टू) की सवारी करने का अवसर अवश्य मिलता था, जिसे वे अत्यंत गर्व और रोमांच का अनुभव मानते थे। इसके अतिरिक्त स्कैंडल पॉइंट के सामने एक जनरल स्टोर की दुकान की खिड़की में शिमला-कालका टॉय ट्रेन का एक सुंदर मॉडल रखा हुआ था। उस मॉडल में छोटी-छोटी पटरियों पर खड़ी ट्रेन, छोटे-छोटे डिब्बे, लाल बत्ती वाला सिग्नल और छोटा सा स्टेशन देखकर बच्चे घंटों विस्मय से निहारते रहते थे। उस जमाने में छुक-छुक करती वह ट्रेन तेज गति का सबसे बड़ा आश्चर्य मानी जाती थी और कभी आकाश में उड़ता हुआ हवाई जहाज दिख जाता तो बच्चे घरों से दौड़कर बाहर आ जाते और उसे किसी भारी-भरकम उड़ते हुए पक्षी की भाँति अचरज से देखते थे। पहली बार चश्मा लगने की घटना, भाई की छेड़खानी एवं आत्म-स्वीकृति: संस्मरण का अंतिम और सर्वाधिक मार्मिक प्रसंग लेखिका के चश्मा लगने से संबंधित है। लेखिका स्पष्ट स्वीकार करती हैं कि उनकी आँखें कमजोर होने का दोष किसी और का नहीं, बल्कि स्वयं उनका अपना था। वे दिन की प्राकृतिक रोशनी में पढ़ने के बजाय रात में टेबल लैंप की मंद और अप्रत्यक्ष रोशनी में देर तक पढ़ाई किया करती थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी दृष्टि कमजोर हो गई और उन्हें चश्मा लगाना पड़ा। जब वे पहली बार चश्मा लगाकर घर आईं, तो उनके चेहरे का रूप देखकर परिवार के सभी लोग हैरान रह गए। अंग्रेज डॉक्टर ने उन्हें दिलासा दिया था कि लगातार चश्मा पहनने से कुछ समय बाद नजर ठीक हो जाएगी और चश्मा उतर जाएगा, किंतु वह चश्मा आज वृद्धावस्था तक कभी नहीं उतरा; उम्र के साथ उसका नंबर ही बढ़ता गया। परिवार के सदस्य और रिश्तेदार उन्हें देखकर कहते—'अरे, इतनी छोटी उम्र में चश्मा! दूध पिया करो।' लेखिका संकोच में डॉक्टर की वही बात दोहरा देतीं। इस स्थिति में उनके चचेरे भाई ने उन्हें खूब छेड़ा। जब लेखिका ने पहली बार चश्मा लगाया तो भाई ने उन पर एक मजेदार व्यंग्य-शेर कसा: 'आँख पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की, यह नहीं लड़की को मालूम सूरत बनी लंगूर की!' भाई के इस शेर को सुनकर लेखिका को अत्यधिक खीझ और गुस्सा आया। वे अपने कमरे में जाकर आईने के सामने खड़ी हो गईं और बार-बार चश्मा उतारकर और पहनकर अपना चेहरा देखने लगीं—'सूरत बनी लंगूर की? नहीं-नहीं, हाँ-हाँ, नहीं-नहीं!' परंतु बाद में वे स्वयं अपनी सूरत देखकर हँस पड़ीं। धीरे-धीरे चश्मा उनके चेहरे का एक अभिन्न अंग बन गया। जब कभी वे चश्मा उतारतीं, तो उनका चेहरा खाली-खाली और अजीब सा लगने लगता। संस्मरण के अंत में लेखिका बताती हैं कि अब वृद्धावस्था में उन्हें सिर पर दुपट्टा ओढ़ने के स्थान पर शिमला की तरह-तरह के रंगों वाली हिमाचली टोपियाँ पहनना अधिक सहज और सुविधाजनक लगता है। संस्मरण की भाषा-शैली एवं शिल्पगत सौंदर्य: कृष्णा सोबती की गद्य-शैली अत्यंत सहज, प्रवाहमयी, बोलचाल के निकट और चित्रात्मक है। वे पाठकों से सीधे मुखातिब होती हैं, जिससे पाठक को लगता है मानो कोई अपनी बुजुर्ग दादी उसके सामने बैठकर अपने जीवन की दास्तान सुना रही हो। भाषा में अंग्रेजी के कई प्रचलित शब्द (जैसे—फ्रॉक, निक्कर, ट्यूनिक, स्टॉकिंग्स, ऑलिव ऑयल, कैस्टर ऑयल, ग्रामोफोन, पेस्ट्री, चॉकलेट, कन्फेक्शनरी, स्पीड, टेबल लैंप) अत्यंत स्वाभाविक रूप से घुले-मिले हैं, जो उस समय के शिमला के एंग्लो-इंडियन परिवेश को सजीव कर देते हैं। इसके अतिरिक्त पाठ में देशज, तद्भव और तत्सम शब्दों का सुंदर समन्वय है। भाषा की बात खंड में 'चमक' से 'चमकीला' जैसे भाववाचक संज्ञा से गुणवाचक विशेषण बनाने के नियम तथा मुहावरेदार प्रयोग पाठ को व्याकरणिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बनाते हैं। पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap) और जीवन-दर्शन: यह पाठ आधुनिक युवा पीढ़ी को यह गहरा संदेश देता है कि भौतिक सुख-सुविधाओं और तकनीकों के निरंतर बदलने के बावजूद मानवीय संवेदनाएँ, बचपन की निश्छल खुशियाँ और आत्म-निर्भरता के मूल्य कभी पुराने नहीं पड़ते। आज का बचपन जहाँ स्क्रीन और आभासी दुनिया में सिमट रहा है, वहीं लेखिका का बचपन प्रकृति, शारीरिक श्रम, स्वावलंबन और पारिवारिक जुड़ाव से महकता था। यह संस्मरण हमें अपने बुजुर्गों के अनुभवों का सम्मान करने और बदलते समय के साथ संतुलन बनाए रखने की अमूल्य प्रेरणा प्रदान करता है।

क्या आपने कभी सोचा है?

क्या आपने कभी कल्पना की है कि जब आज के स्मार्टफोन, टेलीविजन, कंप्यूटर, वीडियो गेम और रंग-बिरंगे आधुनिक फास्ट-फूड नहीं थे, तब आपके दादा-दादी या परदादा-परदादी का बचपन कैसा बीतता था? सोचिए उस दौर की जब घरों में मनोरंजन के नाम पर केवल एक पुराना ग्रामोफोन होता था, कोल्ड ड्रिंक्स की जगह शहतूत और फाल्से का ताजा शरबत पिया जाता था, और हफ्ते में सिर्फ एक बार चॉकलेट खरीदने की सख्त इजाजत मिलती थी! ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी की महान कथाकार कृष्णा सोबती जब अपने बचपन की खिड़की खोलती हैं, तो हमें एक ऐसे रोमांचक युग की सैर कराती हैं जहाँ शनिवार की सुबह पेट साफ रखने के लिए कड़वा अरंडी का तेल (कैस्टर ऑयल) जबरन पीना पड़ता था, अपने मोज़े और जूते खुद धोकर चमकाने पड़ते थे, और जब पहली बार आँखों पर चश्मा चढ़ा तो चचेरे भाई ने 'सूरत बनी लंगूर की' कहकर पूरे घर को हँसा-हँसाकर लोटपोट कर दिया था! यह केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि दो शताब्दियों के बीच समय, संस्कृति, तकनीक और संवेदनाओं के जादुई बदलाव की एक ऐसी भावपूर्ण दास्तान है जो हर उम्र के पाठक के चेहरे पर एक मीठी मुस्कान बिखेर देती है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

हिन्दी साहित्य और सीआईएससीई कक्षा 6 की पाठ्यचर्या के परिप्रेक्ष्य में कृष्णा सोबती का संस्मरण 'बचपन' अत्यंत युगांतरकारी और महत्वपूर्ण अध्याय है। सर्वप्रथम, यह पाठ विद्यार्थियों को हिन्दी गद्य की अत्यंत सशक्त और जीवंत विधा 'संस्मरण' के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है। कहानी या उपन्यास के काल्पनिक संसार से इतर संस्मरण में यथार्थपरक प्रामाणिकता और आत्मीय सत्य का साक्षात्कार होता है, जिससे विद्यार्थियों में अपनी अनुभूतियों और व्यक्तिगत स्मृतियों को व्यवस्थित रूप से लिपिबद्ध करने की रचनात्मक अभिव्यक्ति विकसित होती है। द्वितीयतः, यह पाठ बीसवीं सदी के आरंभिक भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं तकनीकी इतिहास का एक जीवंत दस्तावेज है। आधुनिक विद्यार्थी, जो जन्म से ही इंटरनेट, स्मार्टफोन, टेलीविजन और प्रसंस्कृत फास्ट-फूड के युग में सांस ले रहे हैं, इस पाठ के माध्यम से यह जान पाते हैं कि ग्रामोफोन से लेकर डिजिटल युग तक समाज की जीवन-शैली में कितना विशाल परिवर्तन आया है। यह तुलना उनमें ऐतिहासिक चेतना और वैज्ञानिक समझ को परिपक्व बनाती है। तृतीयतः, पाठ में वर्णित घरेलू अनुशासन—जैसे अपने मोज़े स्वयं धोना, जूतों पर पॉलिश करना और स्वास्थ्य हेतु औषधीय नियमों का पालन करना—आज के बच्चों में स्वावलंबन, श्रम के प्रति आदर और आत्मनिर्भरता के अनिवार्य संस्कारों का बीजारोपण करता है। अंततः, व्याकरणिक दृष्टि से संज्ञा से गुणवाचक विशेषण की रचना और आगत शब्दों का सटीक भाषा-प्रयोग विद्यार्थियों की भाषिक दक्षता और शब्द-सामर्थ्य को सुदृढ़ करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • हिन्दी गद्य की मूल विधाओं (कहानी, निबंध, संस्मरण) के बीच आधारभूत अंतर की प्राथमिक समझ।
  • बीसवीं सदी के आरंभिक भारतीय समाज एवं तत्कालीन औपनिवेशिक/पर्वतीय जीवन-शैली की सामान्य जानकारी।
  • संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण एवं प्रत्यय जैसे बुनियादी व्याकरणिक संप्रत्ययों का प्रारंभिक ज्ञान।
  • अपने दैनिक अनुभवों एवं पारिवारिक संस्मरणों को सरल हिन्दी वाक्यों में व्यक्त करने की योग्यता।
  • पीढ़ीगत बदलाव (Generation Gap) तथा तब और अब के खान-पान व पहनावे के तुलनात्मक बोध की समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • संस्मरण विधा के स्वरूप, विशेषताओं एवं आत्मकथात्मक प्रथम-पुरुष शैली के भाषिक शिल्प को स्पष्ट रूप से समझ सकेंगे।
  • ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका कृष्णा सोबती के जीवन-वृत्त, उनकी अप्रतिम भाषा-शैली और साहित्यिक योगदान का सांगोपांग विश्लेषण कर सकेंगे।
  • बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध और आधुनिक काल के बीच वेशभूषा, खान-पान, मनोरंजन के साधनों तथा तकनीकी सुविधाओं के युगांतर को तुलनात्मक रूप से रेखांकित कर सकेंगे।
  • पाठ में वर्णित पारिवारिक अनुशासन और स्वावलंबन के संस्कारों (मोज़े धोना, जूते चमकाना) के नैतिक महत्व को अपने दैनिक जीवन में आत्मसात कर सकेंगे।
  • शनिवार के कैस्टर ऑयल नियम, नए जूतों के छाले तथा रुई के प्रयोग जैसे हास्य-व्यंग्यपूर्ण प्रसंगों के निहितार्थ को समझ सकेंगे।
  • शिमला के भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश (रिज मैदान, मॉल रोड, क्राइस्ट चर्च, स्कैंडल पॉइंट, टॉय ट्रेन) के ऐतिहासिक महत्व का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • पहली बार चश्मा लगने की घटना, भाई द्वारा छेड़े जाने (लंगूर का रूपक) तथा लेखिका की सहज आत्म-स्वीकृति के मनोवैज्ञानिक द्वंद्व को व्याख्यायित कर सकेंगे।
  • 'भाषा की बात' खंड के आधार पर भाववाचक संज्ञा से गुणवाचक विशेषण (जैसे चमक से चमकीला) बनाने के व्याकरणिक नियमों में दक्षता प्राप्त कर सकेंगे।
  • पाठ में प्रयुक्त आगत विदेशी शब्दों (अंग्रेजी/उर्दू) तथा देशज शब्दावली की पहचान कर भाषा के समृद्ध सांस्कृतिक समन्वय को समझ सकेंगे।
  • बोर्ड परीक्षा के अनुरूप दीर्घ-उत्तरीय, लघु-उत्तरीय एवं संदर्भ-सहित व्याख्या प्रश्नों का सटीक, संतुलित और उच्च-अंकदायी उत्तर तैयार कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 लेखिका परिचय, संस्मरण विधा का स्वरू...
2 परिधान, वेशभूषा का युगांतर एवं शनिव...
3 शिमला की स्मृतियाँ, मॉल रोड, बेकरी...
4 रिज मैदान, टट्टू की सवारी, स्कैंडल...
5 चश्मे पर भाई की छेड़खानी, लंगूर का...
6 भाषा की बात एवं व्याकरणिक अनुशीलन
7 पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap), जी...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

लेखिका परिचय, संस्मरण विधा का स्वरूप एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

CISCE • CLASS 6 • HINDI वसंत भाग - 1 • पाठ 2 : बचपन (संस्मरण) लेखिका: ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित मूर्धन्य साहित्यकार कृष्णा सोबती (1925–2019) विधा: संस्मरण (Memoir) • ऐतिहासिक व सांस्कृतिक जीवन-झांकी 👓 पैनल 1: लेखिका एवं संस्मरण विधा कृष्णा सोबती का जीवन-वृत्त, वैचारिक वैशिष्ट्य एवं संस्मरण का स्वरूप 📌 लेखिका परिचय एवं उपलब्धियाँ जन्म: 18 फरवरी 1925, गुजरात (पश्चिम पंजाब, अब पाकिस्तान)। सर्वोच्च सम्मान: 53वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार (2017), साहित्य अकादमी पुरस्कार। कालजयी कृतियाँ: 'ज़िन्दगीनामा', 'मित्रो मरजानी', 'डार से बिछुड़ी', 'समय सरगम'। व्यक्तित्व चित्र: 'हम हशमत' (अपने समकालीनों का अद्वितीय रेखाचित्र संग्रह)। काव्य-गद्य दर्शन (Literary Vision): कृष्णा सोबती हिन्दी कथा-साहित्य की अप्रतिम शिल्पी हैं। उनकी भाषा में पंजाबी, उर्दू और ठेठ देशज शब्दों का सजीव प्रवाह और संस्मरण में गहरा आत्मीय भाव है। 📖 'संस्मरण' (Memoir) विधा की विशेषताएँ 1. स्मृति-आधारित प्रामाणिकता (Authenticity of Memory): लेखक अपने बीते जीवन की वास्तविक घटनाओं, परिवेश व व्यक्तियों को सजीव करता है। 2. आत्मकथात्मक उत्तम पुरुष शैली (First-Person Narrative): 'मैं तुम्हें अपने बचपन की ओर ले जाऊँगी...'—पाठक से सीधा आत्मीय संवाद। 3. युगीन सामाजिक व सांस्कृतिक दस्तावेज (Cultural Chronicle): बीसवीं सदी के आरंभिक भारत की वेशभूषा, खान-पान, तकनीक व सोच का जीवंत दर्पण। पाठ का उद्देश्य: नई पीढ़ी को अतीत की सादगी और बदलाव से परिचित कराना पैनल 2: वेशभूषा व शनिवार की दिनचर्या रंग-बिरंगे परिधानों से सफेद पोशाक तक एवं तेल पीने का कड़वा अनुभव 👗 परिधान एवं पहनावे का युगांतर (Fashion Evolution) बचपन के रंग-बिरंगे वस्त्र • फ्रॉक, निक्कर-वॉकर, गरारे • शरारे और चूड़ीदार-घेरदार कुर्ते • रंग: नीला, पीला, जामुनी, ग्रे, चॉकलेटी, कैस्टर धारी उमंग, चंचलता व उल्लास वृद्धावस्था का सादा पहनावा • केवल हल्के और सफेद वस्त्र • घेरदार पोशाकों की जगह सहज व ढीले-ढाले कुर्ते • चटक रंगों से दूरी गंभीरता, परिपक्वता व शांति स्वावलंबन का संस्कार (Self-reliance): बच्चों को अपने मोज़े व स्टॉकिंग्स खुद धोने पड़ते थे; नौकरों को देने की सख्त मनाही थी। रविवार की सुबह जूतों पर ब्रश और कपड़े से पॉलिश कर उन्हें चमकाया जाता था। 🧪 शनिवार का 'कैस्टर ऑयल' नियम (The Saturday Ritual) कैस्टर ऑयल (अरंडी का तेल) व ऑलिव ऑयल (जैतून का तेल): • प्रत्येक शनिवार सुबह पेट साफ रखने हेतु यह कड़वी दवा अनिवार्य रूप से पिलाई जाती थी। • शनिवार की सुबह से ही नाक में उस तेल की गंध आने लगती थी और मितली होने लगती थी। काँच का छोटा गिलासी माप (Dosing Glass): काँच के छोटे गिलास जिन पर खुराक के लिए निशान लगे होते थे; उन्हें देखते ही उबकाई आती थी। लेखिका कहती हैं: यदि हम न भी पीते तो कोई बड़ी बीमारी नहीं होने वाली थी! नए जूतों का दंश और रुई का उपाय: • उस समय के जूते सख्त होते थे; नए जूते पहनते ही पैरों में छाले (काटना) पड़ जाते थे। • नियम: "नया जूता लगा तो अंदर रुई!"—छाले से बचाव हेतु मोज़े के अंदर रुई ठोस ली जाती। पैनल 3: खान-पान व शिमला की स्मृतियाँ तुलनात्मक भोजन-संस्कृति, रिज मैदान, क्राइस्ट चर्च एवं मॉल रोड 🍽️ खान-पान में युगांतर: तब (Past) बनाम अब (Present) लेखिका का बचपन (तब) आधुनिक समय (अब) बदलाव का प्रभाव ग्रामोफ़ोन (Gramophone) रेडियो, टेलीविज़न, स्मार्टफोन डिजिटल संचार क्रांति कुल्फ़ी (Kulfi) आइसक्रीम (Ice Cream) प्रसंस्कृत डेज़र्ट्स समोसा और कचौड़ी पैटीज़ और बर्गर फास्ट-फूड का विस्तार शहतूत, फाल्सा, खसखस शरबत कोक, पेप्सी, कोल्ड ड्रिंक्स प्राकृतिक पेय से रसायनों की ओर लेमनेड और विमटो एनर्जी ड्रिंक्स, कार्बोनेटेड सोडा वैश्विक ब्रांड्स का दबदबा 🏔️ शिमला रिज मैदान, बेकरी एवं चना जोर गरम कन्फेक्शनरी शॉप (मॉल रोड): • शाम को ब्राउन ब्रेड लाने की ड्यूटी; पेस्ट्री और चॉकलेट की भीनी-भीनी मनमोहक खुशबू। • हफ्ते में केवल एक बार चॉकलेट खरीदने की सख्त पारिवारिक छूट थी। चना जोर गरम और अनारदाना चूर्ण: • पुरानी किताबों के कागज़ से बनी तिरछी नुकीली पुड़िया (नीचे से पतली, ऊपर से चौड़ी)। • प्रसिद्ध लोक-गीत: "चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार, चना जोर गरम..." रिज मैदान, घोड़े की सवारी व चर्च की घंटियाँ: • शिमला के बच्चों को कभी न कभी टट्टू (घोड़े) की सवारी का रोमांच अवश्य मिलता था। • शाम होते ही क्राइस्ट चर्च की बजती घंटियों की गूँज दूर-दूर तक फैल जाती थी। पैनल 4: चश्मा एवं भाई की छेड़खानी कम रोशनी में पढ़ाई का परिणाम, लंगूर का उपहास एवं आत्म-सम्मान 🔍 चश्मा लगने का कारण एवं डॉक्टर का आश्वासन कारण: अपनी ही गलती (Self-Neglect): दिन की प्राकृतिक रोशनी को छोड़कर रात में टेबल लैंप की मंद रोशनी में पढ़ाई करना। लेखिका स्पष्ट कहती हैं: "इसका सारा कसूर मेरा ही था!" अंग्रेज़ डॉक्टर का दिलासा: डॉक्टर ने कहा था—"कुछ दिन चश्मा लगाओगी तो नज़र सामान्य हो जाएगी और उतर जाएगा।" परंतु चश्मा आज तक नहीं उतरा; उम्र के साथ नंबर केवल बढ़ता ही चला गया। अटपटापन एवं रिश्तेदारों की सहानुभूति: पहली बार चश्मा लगाने पर चेहरा विचित्र लगा; रिश्तेदार कहते—"दूध पिया करो!" लेखिका डॉक्टर का वाक्य दोहरा देतीं कि कुछ दिन में उतर जाएगा। मनोवैज्ञानिक द्वंद्व: संकोच, असहजता एवं स्वयं को स्वीकार करने का संघर्ष। 🐒 चचेरे भाई की छेड़खानी: 'लंगूर' का रूपक भाई द्वारा बनाया गया व्यंग्य-शेर: "आँख पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की, यह नहीं लड़की को मालूम सूरत बनी लंगूर की!" लेखिका की तात्कालिक प्रतिक्रिया: • लेखिका को भाई के इस शेर पर बहुत खीझ (गुस्सा) आई। • परंतु अकेले कमरे में आईने के सामने बार-बार चश्मा उतारकर देखा और खुद हँसीं। हिमाचली टोपियाँ एवं सहज आत्म-स्वीकृति: • धीरे-धीरे चश्मा चेहरे में घुल-मिल गया; बिना चश्मे के चेहरा खाली-खाली लगने लगा। • अब दुपट्टे की जगह सिर पर रंग-बिरंगी हिमाचली टोपियाँ पहनना उन्हें अधिक भाता है। पैनल 5: व्याकरण एवं जीवन-दर्शन संज्ञा से विशेषण रचना, संस्मरण शिल्प एवं पीढ़ीगत अंतर का सार 📝 'भाषा की बात' — व्याकरणिक संप्रत्यय 1. भाववाचक संज्ञा से विशेषण निर्माण: • चमक (संज्ञा) + ईला (प्रत्यय) = चमकीला (गुणवाचक विशेषण) • गुलाबी, चॉकलेटी, कड़वा, खट्टा, सादा (गुण व स्वाद बोधक विशेषण) 2. संस्मरण में आगत विदेशी (अंग्रेज़ी) शब्द: • फ्रॉक, ट्यूनिक, स्टॉकिंग्स, ऑलिव ऑयल, कैस्टर ऑयल, ग्रामोफ़ोन • टेबल लैंप, पेस्ट्री, चॉकलेट, बेकरी, स्कैंडल पॉइंट, स्पीड 3. क्रिया-विशेषण एवं मुहावरेदार प्रयोग: • "हँसते-हँसते लोटपोट होना" (अत्यधिक हँसना) • "सूरत लंगूर की बनना" (चेहरा हास्यास्पद दिखना) • रीतिवाचक प्रयोग: "मज़े ले-लेकर खाना", "छूटते ही भागना" चित्रात्मक भाषा शैली पाठ को सजीव और दृश्यमान बनाती है। 💡 पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap) एवं जीवन-दर्शन 1. स्वावलंबन और आत्म-निर्भरता की सीख: लेखिका के बचपन में बच्चे अपने निजी कार्य (मोज़े धोना, जूते चमकाना) स्वयं करते थे। यह अनुशासन आधुनिक बच्चों को श्रम के सम्मान का पाठ पढ़ाता है। 2. सादगी बनाम कृत्रिमता: अतीत का खान-पान प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक था (शहतूत/फाल्से का शरबत, चना)। आधुनिक युग में रासायनिक कोल्ड ड्रिंक्स और जंक फूड स्वास्थ्य को हानि पहुँचा रहे हैं। 3. मानवीय संबंधों और बुजुर्गों का आदर: लेखिका स्वयं को अब दादी या नानी की उम्र का मानती हैं। वे स्पष्ट करती हैं कि समय के साथ केवल साधन बदलते हैं, जीवन के शाश्वत मूल्य नहीं बदलते। बुजुर्गों के अनुभवों का सम्मान करना ही संस्कारी समाज का आधार है। निष्कर्ष: परिवर्तन प्रकृति का नियम है, पर जीवन-मूल्य सदा अमर रहते हैं।

अध्याय का प्रवेश-द्वार: अतीत की खिड़की से झांकता बचपन

"मैं तुम्हें अपने बचपन की ओर ले जाऊँगी। मैं तुमसे कुछ इतनी बड़ी हूँ कि तुम्हारी दादी भी हो सकती हूँ, तुम्हारी नानी भी। बड़ी मौसी भी, बड़ी बुआ भी। परिवार में मुझे सभी लोग 'जीजी' कहकर ही पुकारते हैं।" प्रस्तुत पंक्तियों के साथ कृष्णा सोबती अपने संस्मरण का आरंभ करती हैं। यह आत्मीय संबोधन पाठक और लेखिका के बीच की पीढ़ीगत दूरी को तत्काल समाप्त कर देता है और पाठक को अनुभव होता है मानो वह अपनी ही किसी आत्मीय बुजुर्ग महिला की गोद में बैठकर बीते जमाने की जादुई कहानियाँ सुन रहा हो।

1. लेखिका कृष्णा सोबती: जीवन-वृत्त एवं साहित्यिक व्यक्तित्व

कृष्णा सोबती (18 फरवरी 1925 – 25 जनवरी 2019) बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के भारतीय साहित्य की सर्वाधिक सशक्त, निर्भीक और मौलिक रचनाकारों में से एक थीं। उनका जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गुजरात नगर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शिमला और लाहौर में प्राप्त की। देश-विभाजन की दारुण विभीषिका के बाद वे दिल्ली आ गईं। उन्होंने जीवन भर किसी भी प्रकार के साहित्यिक या वैचारिक समझौते के बिना अपनी अंतरात्मा की आवाज पर साहित्य-सृजन किया।

सर्वोच्च सम्मान एवं पुरस्कार
  • 53वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार (2017): भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान।
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1980): अमर उपन्यास 'ज़िन्दगीनामा' के लिए।
  • साहित्य अकादमी महत्तर सदस्यता (फेलोशिप): 1996 में साहित्य का शीर्ष सम्मान।
  • व्यास सम्मान एवं शलाका सम्मान: हिन्दी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान हेतु।
कालजयी रचना-संसार
  • उपन्यास: मित्रो मरजानी, ज़िन्दगीनामा, डार से बिछुड़ी, सूरजमुखी अँधेरे के, ऐ लड़की, दिलोदानिश, समय सरगम।
  • संस्मरण एवं शब्दचित्र: हम हशमत (भाग 1, 2 व 3), शब्दों के आलोक में, सोबती एक सोहबत।
  • कथा-संग्रह: बादलों के घेरे, बादलों के रंग।

2. संस्मरण (Memoir) विधा की तात्विक विशेषताएँ

साहित्य में 'संस्मरण' गद्य की एक विशिष्ट और अत्यंत लोकप्रिय विधा है। संस्मरण शब्द 'सम् + स्मरण' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है—'भली-भाँति याद करना'। जब कोई लेखक अपनी स्मृति के संचित कोष से किसी व्यक्ति, घटना, स्थान या कालखंड को अपनी संवेदनशील दृष्टि से पुनर्जीवित करता है, तब संस्मरण का जन्म होता है।

तत्व संस्मरण की विशेषता 'बचपन' पाठ में अनुप्रयोग
1. यथार्थपरक प्रामाणिकता काल्पनिक घटनाओं के स्थान पर जीवन के सच्चे और प्रामाणिक अनुभवों का अंकन। शिमला का मॉल रोड, शनिवार को कैस्टर ऑयल पीना, नए जूतों के छाले—सभी सत्य घटनाएँ हैं।
2. उत्तम पुरुष शैली कथा 'मैं' अथवा 'हम' के माध्यम से सीधे पाठक से मुखातिब होकर कही जाती है। 'मैं तुम्हें अपने बचपन की ओर ले जाऊँगी', 'हम शनिवार को...' जैसी आत्मीय उक्तियाँ।
3. युगीन सामाजिक दस्तावेज समकालीन समाज, संस्कृति, पहनावे, खान-पान और प्रौद्योगिकी का ऐतिहासिक दर्पण। ग्रामोफोन बनाम रेडियो/टीवी, शहतूत का शरबत बनाम पेप्सी/कोक, टॉय ट्रेन का मॉडल।
4. चित्रात्मक भाषा शब्दों के माध्यम से ऐसा दृश्य उपस्थित करना कि पाठक घटना को आँखों से घटता देखे। चने की तिरछी पुड़िया, चर्च की घंटियों की गूँज, आईने के सामने खड़े होकर चश्मा उतारना।

3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बीसवीं सदी का आरंभिक भारत

कृष्णा सोबती का जन्म 1925 में हुआ था। यह वह समय था जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और शिमला ब्रिटिश हुकूमत की 'ग्रीष्मकालीन राजधानी' (Summer Capital) हुआ करता था। शिमला का वातावरण आधा भारतीय और आधा ब्रिटिश एंग्लो-इंडियन प्रभाव से ओतप्रोत था। वहाँ के समृद्ध और मध्यमवर्गीय परिवारों में अंग्रेजियत का कुछ प्रभाव था, जैसे—कन्फेक्शनरी, ब्राउन ब्रेड, पेस्ट्री, लेमनेड, विमटो, ट्यूनिक और ऑलिव ऑयल का प्रचलन। परंतु इसके साथ ही भारतीय संयुक्त परिवारों के कड़े अनुशासन, आत्मनिर्भरता के संस्कार और लोक-संस्कृति (जैसे चना जोर गरम और अनारदाने का चूर्ण) भी पूरी जीवंतता के साथ मौजूद थे।

परिधान, वेशभूषा का युगांतर एवं शनिवार की औषधीय दिनचर्या

वेशभूषा का मनोविज्ञान: चटक रंगों से सादगी की ओर

"हाँ, इन दिनों कुछ ऐसा करने लगा है कि मन करता है, सफेद पहनो। गहरे नहीं, हल्के रंग। मैंने पिछले दशकों में तरह-तरह की पोशाकें पहनी हैं—पहले फ्रॉक, फिर निक्कर-वॉकर, गरारे, शरारे और अब चूड़ीदार और घेरदार कुर्ते। बचपन के कुछ फ्रॉक तो मुझे अब तक याद हैं..." लेखिका यहाँ स्पष्ट करती हैं कि मनुष्य की उम्र के साथ उसकी सौंदर्य-दृष्टि और पहनावे की प्राथमिकताएँ कैसे बदल जाती हैं।

1. परिधानों की विकास-यात्रा (Costume Transformation)

लेखिका अपने जीवन के विभिन्न चरणों में पहने गए वस्त्रों का स्मरण करते हुए बताती हैं कि उनका बाल्यकाल रंगों के उल्लास से भरा हुआ था:

  • बचपन के फ्रॉक: हल्की नीली और पीली धारी वाला फ्रॉक, गोल कॉलर और बाजू पर गोल कफ। एक हल्का गुलाबी फ्रॉक जिस पर महीन चुन्नटें थीं और नीचे गुलाबी रंग की फ्रिल (झालर) लगी हुई थी।
  • रंगों की विविधता: बचपन में उन्होंने नीला, पीला, जामुनी, ग्रे, काला और चॉकलेटी—सभी प्रकार के गहरे और चटक रंग पहने। ये रंग बाल-मन की उमंग, उत्साह और स्वच्छंदता के प्रतीक थे।
  • अन्य परिधान: फ्रॉक के पश्चात निक्कर-वॉकर, गरारे, शरारे और अंततः चूड़ीदार व घेरदार कुर्ते पहने।
  • वृद्धावस्था का सादा स्वरूप: उम्र के अंतिम पड़ाव में लेखिका का मन चटक रंगों से ऊब चुका था। वे केवल सफेद और हल्के रंग के ढीले-ढाले, आरामदायक वस्त्र पहनती थीं, जो जीवन की परिपक्वता, शांति और सादगी को दर्शाते हैं।

2. स्वावलंबन और श्रम के कड़े पारिवारिक संस्कार

लेखिका के परिवार में बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने पर विशेष बल दिया जाता था। आज के समय में जहाँ बच्चे अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी माता-पिता या घरेलू सहायकों पर आश्रित रहते हैं, वहीं लेखिका के बचपन में नियम अत्यंत कठोर थे:

घरेलू स्वावलंबन के दो प्रमुख नियम
  1. मोज़े खुद धोना: बच्चों को अपने मोज़े और स्टॉकिंग्स स्वयं साबुन से धोने पड़ते थे। किसी भी नौकर या नौकरानी को मोज़े धोने के लिए देना परिवार के नियमों का घोर उल्लंघन माना जाता था।
  2. रविवार की जूता-पॉलिश: रविवार की सुबह स्कूल की छुट्टी के दिन सारे भाई-बहन कतार में बैठकर अपने-अपने जूतों की मरम्मत और पॉलिश करते थे। वे पहले ब्रश से मिट्टी झाड़ते, फिर पॉलिश लगाकर कपड़े से रगड़-रगड़कर जूतों को शीशे की तरह चमकाते थे।

3. शनिवार का 'कैस्टर ऑयल' नियम और जूतों के छाले

संस्मरण का यह प्रसंग बाल-सुलभ पीड़ा और हास्य का अनोखा सम्मिश्रण है:

शनिवारीय दवा: कैस्टर व ऑलिव ऑयल

हर शनिवार को पेट साफ रखने के लिए सभी बच्चों को अरंडी का तेल (Castor Oil) अथवा जैतून का तेल (Olive Oil) पिलाया जाता था। शनिवार की सुबह से ही घर में उस तेल की सड़ांध फैल जाती थी। मेज पर रखे खुराक के निशान वाले काँच के छोटे गिलासों को देखते ही बच्चों को उबकाई (मितली) आने लगती थी। लेखिका बड़े चुटीले अंदाज में लिखती हैं कि अगर वे उस तेल को न भी पीते तो भी उनका स्वास्थ्य खराब नहीं होता!

नया जूता और रुई का अचूक नुस्खा

उस जमाने में जूते बहुत सख्त और कड़े चमड़े के बने होते थे। नया जूता मिलते ही खुशी के साथ-साथ पैरों में छाले पड़ने का डर भी सताने लगता था। इसलिए घर का एक सर्वमान्य नियम बन चुका था—"नया जूता लगा तो अंदर रुई!" यानी जैसे ही जूते से पैर कटने लगता, बच्चे मोज़े के अंदर रुई की गद्दी लगा लेते थे ताकि चलने में राहत मिले।

शिमला की स्मृतियाँ, मॉल रोड, बेकरी एवं खान-पान का युगांतर

खान-पान और जीवन-शैली में ऐतिहासिक युगांतर

कृष्णा सोबती पाठकों को बताती हैं कि कैसे एक शताब्दी के भीतर समाज की खान-पान की आदतें और मनोरंजन के साधन पूरी तरह बदल गए हैं। उस समय जो चीजें सादगी और प्राकृतिक स्वास्थ्य से जुड़ी थीं, आज उनकी जगह बाजारवाद, रसायनों और प्रसंस्कृत फास्ट-फूड ने ले ली है।

1. खान-पान एवं तकनीक: तब (लेखिका का बचपन) बनाम अब (वर्तमान काल)

परीक्षा की दृष्टि से 'तब और अब' की तुलना एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। इसे निम्नलिखित तालिका के माध्यम से भली-भाँति समझा जा सकता है:

घटक / क्षेत्र लेखिका के बचपन का समय (तब) आज का आधुनिक समय (अब)
1. मनोरंजन के साधन कुछ गिने-चुने समृद्ध घरों में केवल ग्रामोफ़ोन (Gramophone) होते थे। रेडियो, रंगीन टेलीविज़न, इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म।
2. मीठे शीतल व्यंजन ठेले और मटकों में बिकने वाली देशी दूधिया कुल्फ़ी। तरह-तरह की फ्लेवर्ड आइसक्रीम, जिलेटो और फ्रोज़न डेज़र्ट्स।
3. नमकीन नाश्ता हलवाई की दुकान से गरमा-गरम ताजे कचौड़ी और समोसे। पैटीज़, बर्गर, पिज़्ज़ा, फ्रेंच फ्राइज़ और अन्य बेकरी स्नैक्स।
4. शीतल पेय (शरबत) शहतूत, फाल्से और खसखस का ताजा प्राकृतिक फलों का शरबत। कोक, पेप्सी, थम्स अप, मिरिंडा तथा रासायनिक कार्बोनेटेड ड्रिंक्स।
5. बोतलबंद पेय लेमनेड (Lemonade) और विमटो (Vimto) जैसे साधारण कांच की बोतलों के पेय। मल्टीनेशनल ब्रांड्स के एनर्जी ड्रिंक्स और पैकेज्ड फ्लेवर्ड जूसेस।

2. शिमला मॉल रोड की बेकरी एवं चॉकलेट का आनंद

लेखिका का घर शिमला के मॉल रोड से बहुत अधिक दूर नहीं था। एक छोटी सी चढ़ाई चढ़कर वे सीधे रिज मैदान और मॉल रोड पर पहुँच जाती थीं। वहाँ की प्रमुख स्मृतियाँ इस प्रकार हैं:

  • ब्राउन ब्रेड लाने की ड्यूटी: शाम के समय मॉल रोड की बेकरी से ताजी खुशबूदार 'ब्राउन ब्रेड' लाने की जिम्मेदारी लेखिका और उनके भाई-बहनों की होती थी।
  • कन्फेक्शनरी की मनमोहक खुशबू: दुकान में घुसते ही विभिन्न प्रकार की पेस्ट्री और ताजी चॉकलेट की महक हवा में तैरती रहती थी।
  • चॉकलेट का सख्त नियम: बच्चों को हर रोज चॉकलेट खाने की छूट नहीं थी। सप्ताह में सिर्फ एक बार चॉकलेट खरीदने की सख्त इजाजत थी। लेखिका के पास सबसे ज्यादा चॉकलेट और टॉफी का स्टॉक रहता था, क्योंकि वे उसे तुरंत रास्ते में नहीं खाती थीं, बल्कि घर लौटकर रात के खाने के बाद बिस्तर में आराम से लेटकर मजे ले-लेकर खाती थीं।

3. चना जोर गरम और अनारदाने का चूर्ण

शिमला के रिज मैदान पर घूमने का सबसे बड़ा आकर्षण था—'चना जोर गरम'।

चने वाले की पुड़िया बनाने की कला अद्भुत थी। वह पुराने अखबारों या रद्दी किताबों के कागज़ से एक ऐसी तिरछी शंकु-आकार (कॉनिकल) पुड़िया बनाता था जो नीचे से बिल्कुल बारीक और बंद होती थी, परंतु ऊपर से इतनी चौड़ी होती थी कि हाथ आसानी से अंदर चला जाए। चने के ऊपर खट्टा-मीठा तीखा मसाला और अनारदाने का चूर्ण छिड़का जाता था। बच्चे उस पुड़िया में से एक-एक चना मुँह में डालते और कदम-कदम पर मजे लेते हुए पूरा रिज मैदान घूम जाते थे। उस समय स्कूल के हर बच्चे को यह लोकप्रिय गीत याद था:

"चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार, चना जोर गरम..."

रिज मैदान, टट्टू की सवारी, स्कैंडल पॉइंट एवं पहली बार चश्मा लगना

शिमला का विहंगम दृश्य एवं तकनीकी विस्मय

"शाम को रंग-बिरंगे गुब्बारे, सामने जाखू का पहाड़, ऊँचा चर्च, चर्च की घंटियाँ बजतीं तो दूर-दूर तक उनका संगीत फैल जाता... लगता इसके संगीत से प्रभु ईसा स्वयं कुछ कह रहे हैं।" कृष्णा सोबती ने शिमला के प्राकृतिक और सांस्कृतिक वातावरण का ऐसा सजीव शब्द-चित्र खींचा है कि पाठक स्वयं को उस पहाड़ी नगर की ठंडी हवाओं के बीच महसूस करने लगता है।

1. रिज मैदान और टट्टू (घोड़े) की सवारी

शिमला के रिज मैदान का खुला विस्तार बच्चों के लिए असीम आनंद का केंद्र था:

  • टट्टू की सवारी: शिमला के हर बच्चे को बचपन में कभी न कभी घोड़े (टट्टू) पर बैठने का अवसर अवश्य मिलता था। लेखिका और उनके भाई-बहन जब घोड़ों पर सवार होते, तो स्वयं को किसी शूरवीर से कम नहीं समझते थे। ननिहाल के घोड़ों को वे बहुत खूबसूरत और रोबीला बताती हैं।
  • सूर्यास्त का विहंगम दृश्य: शाम ढलते ही रिज के सामने दूर-दूर तक फैले पहाड़ों पर सूर्यास्त की नीली, गुलाबी और सुनहरी धारियाँ आकाश में फैल जाती थीं और दीप जलते ही रिज पर रोशनी का जादुई संसार चमक उठता था।
  • क्राइस्ट चर्च की घंटियाँ: रिज मैदान पर स्थित प्रसिद्ध ऐतिहासिक 'क्राइस्ट चर्च' से शाम को बजने वाली घंटियों की मधुर ध्वनि दूर घाटियों तक गूँजती थी, जिससे समूचा वातावरण आध्यात्मिक शांति में डूब जाता था।

2. स्कैंडल पॉइंट और शिमला-कालका टॉय ट्रेन का मॉडल

स्कैंडल पॉइंट के सामने एक जनरल स्टोर की दुकान थी जिसकी शो-विंडो में रखा एक मॉडल बच्चों के कौतूहल का सबसे बड़ा केंद्र था:

ट्रेन का मॉडल और उस जमाने की तेज गति

उस दुकान में शिमला-कालका रेलगाड़ी का एक हूबहू छोटा मॉडल रखा हुआ था। उसमें छोटी-छोटी पटरियाँ, छोटे डिब्बों वाली ट्रेन, लाल बत्ती वाला सिग्नल और सामने एक छोटा स्टेशन बना हुआ था। पिछली सदी में तेज गति से चलने वाली वह गाड़ी ही सबसे बड़ा आश्चर्य मानी जाती थी। कभी-कभी जब आसमान में हवाई जहाज उड़ता हुआ दिखाई देता, तो बच्चे घरों से बाहर दौड़ पड़ते थे। ऐसा लगता मानो कोई भारी-भरकम पंछी अपने पंख फैलाकर तेज गति से उड़ा जा रहा हो!

3. पहली बार चश्मा लगने की घटना: अपनी गलती की स्वीकारोक्ति

संस्मरण का यह मोड़ बाल-मनोविज्ञान और स्वास्थ्य संबंधी आदतों का अत्यंत महत्वपूर्ण पाठ है:

कम रोशनी में पढ़ाई की भूल

लेखिका स्पष्ट रूप से स्वीकार करती हैं कि उनकी आँखें कमजोर होने का पूरा दोष उनका अपना था। वे दिन की प्राकृतिक और पर्याप्त रोशनी में पढ़ने के बजाय रात के सन्नाटे में टेबल लैंप की धीमी रोशनी में देर तक किताबें पढ़ती थीं। आँखों पर अत्यधिक तनाव पड़ने के कारण उनकी नजर कमजोर हो गई और डॉक्टर ने उन्हें चश्मा लगाने की सलाह दी।

अंग्रेज डॉक्टर का दिलासा

दुकान पर बैठे अंग्रेज डॉक्टर ने चश्मा बनाते हुए उन्हें आश्वासन दिया था—"कुछ दिन लगातार चश्मा पहनोगी तो नजर ठीक हो जाएगी और चश्मा उतर जाएगा।" परंतु लेखिका व्यंग्य करते हुए कहती हैं कि डॉक्टर का वह आश्वासन कभी सच नहीं हुआ; चश्मा तो आज तक नहीं उतरा, उम्र के साथ केवल उसका नंबर ही बढ़ता चला गया।

चश्मे पर भाई की छेड़खानी, लंगूर का रूपक एवं आत्म-स्वीकृति

चश्मे का संकोच और भाई की छेड़खानी

जब किसी बच्चे के चेहरे पर पहली बार चश्मा चढ़ता है, तो उसे समाज, परिवार और मित्रों के सामने एक अजीब से संकोच और झिझक का सामना करना पड़ता है। कृष्णा सोबती के साथ भी यही हुआ। जब वे पहली बार चश्मा लगाकर आईं तो उनका चेहरा परिजनों को विचित्र लगा और उनके चचेरे भाई ने उन्हें छेड़ना शुरू कर दिया।

1. चचेरे भाई का व्यंग्य-शेर और लंगूर का रूपक

जब लेखिका चश्मा लगाकर अपने चचेरे भाई के सामने पहुँचीं, तो भाई ने उन्हें ध्यान से देखा और ताली बजाकर यह प्रसिद्ध शेर पढ़ा:

"आँख पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की,

यह नहीं लड़की को मालूम सूरत बनी लंगूर की!"

इस शेर में भाई ने लेखिका के चश्मे वाले चेहरे की तुलना चिड़ियाघर के लंगूर से कर दी थी। लेखिका को भाई के इस फब्ती पर अत्यधिक गुस्सा और खीझ आई कि उसने उन्हें 'लंगूर' कह दिया। परंतु भाई चाय पीकर चला गया और लेखिका गुस्से में अपने कमरे में आ गईं।

2. आईने के सामने आत्म-निरीक्षण (Mirror Confrontation)

कमरे में पहुँचकर लेखिका ने जो किया, वह बाल-मनोविज्ञान का अद्भुत यथार्थवादी उदाहरण है:

  • बार-बार चश्मा उतारना और पहनना: लेखिका सीधे ड्रेसिंग टेबल के आईने के सामने खड़ी हो गईं। उन्होंने चश्मा उतारा, आईने में देखा, फिर चश्मा पहना, फिर उतारा।
  • आंतरिक द्वंद्व: उनके मन में भाई की पंक्तियाँ गूँज रही थीं—"सूरत बनी लंगूर की? नहीं-नहीं, हाँ-हाँ, नहीं-नहीं!" वे सोच रही थीं कि क्या सचमुच उनका चेहरा लंगूर जैसा लग रहा है?
  • खीझ का हँसी में रूपांतरण: बार-बार खुद को देखने के बाद उनका गुस्सा शांत हो गया और वे स्वयं अपनी सूरत पर खिलखिलाकर हँस पड़ीं। यह प्रसंग दर्शाता है कि बच्चों में हास्य और आत्म-स्वीकृति का भाव कितना सहज होता है।

3. चश्मे का चेहरे में घुल-मिल जाना और हिमाचली टोपियाँ

समय बीतने के साथ चश्मा लेखिका के चेहरे का ऐसा स्वाभाविक अंग बन गया कि जब कभी वे चश्मा उतारतीं, तो उनका चेहरा सूना-सूना और अधूरा सा प्रतीत होने लगता था। संस्मरण के समापन पर लेखिका एक सुंदर सांस्कृतिक विवरण देती हैं:

"अब मैं दुपट्टे ओढ़ने के बजाय सिर पर शिमला की हिमाचली टोपियाँ पहनना पसंद करती हूँ। मैंने कई रंगों की टोपियाँ जमा कर रखी हैं। कहाँ दुपट्टों का संभालना और कहाँ सहज-सहल सुभीते वाली हिमाचली टोपियाँ!" यहाँ लेखिका वृद्धावस्था में सुविधा, सरलता और पहाड़ी संस्कृति के प्रति अपने गहरे अनुराग को व्यक्त करती हैं।

भाषा की बात एवं व्याकरणिक अनुशीलन

'भाषा की बात' — व्याकरणिक संप्रत्यय

'बचपन' पाठ की भाषा-शैली हिन्दी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेजी शब्दों के जीवंत समन्वय का अद्वितीय उदाहरण है। सीआईएससीई और राज्य बोर्ड परीक्षाओं में इस पाठ के व्याकरण खंड से विशेषण निर्माण और शब्द-भेद पर सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं।

1. भाववाचक संज्ञा से गुणवाचक विशेषण निर्माण नियम

पाठ में विशेषण निर्माण का मुख्य नियम है: जब किसी संज्ञा पद में प्रत्यय (जैसे—ईला, ई, क) जुड़ता है, तो वह गुणवाचक विशेषण बन जाता है।

मूल संज्ञा (Noun) जुड़ा प्रत्यय (Suffix) निर्मित गुणवाचक विशेषण (Adjective) वाक्य प्रयोग (Contextual Use)
चमक + ईला चमकीला पॉलिश करने के बाद जूता चमकीला हो गया।
रस + ईला रसीला काफल एक अत्यंत रसीला पहाड़ी फल है।
रंग + ईला रंगीला शिमला के रिज पर रंगीला गुब्बारा उड़ रहा था।
गुलाब + ई गुलाबी लेखिका के पास एक सुंदर गुलाबी फ्रॉक था।
चॉकलेट + ई चॉकलेटी उन्होंने बचपन में गहरे चॉकलेटी रंग के कपड़े पहने।

2. पाठ में आगत विदेशी (Loan Words) शब्दावली

लेखिका ने उस समय के परिवेश को प्रामाणिक बनाने के लिए कई आगत अंग्रेजी शब्दों का अत्यंत स्वाभाविक प्रयोग किया है:

वेशभूषा एवं पहनावा

फ्रॉक (Frock), ट्यूनिक (Tunic), स्टॉकिंग्स (Stockings), कॉलर (Collar), कफ (Cuff), फ्रिल (Frill), बूट (Boot), पॉलिश (Polish), ब्रश (Brush)

खान-पान, दवा एवं तकनीक

कैस्टर ऑयल (Castor Oil), ऑलिव ऑयल (Olive Oil), पेस्ट्री (Pastry), चॉकलेट (Chocolate), कन्फेक्शनरी (Confectionery), लेमनेड (Lemonade), विमटो (Vimto), ग्रामोफ़ोन (Gramophone), टेबल लैंप (Table Lamp), स्पीड (Speed)

3. रीतिवाचक क्रिया-विशेषण एवं मुहावरे

पाठ में क्रिया के होने की रीति (ढंग) को दर्शाने वाले कई सजीव क्रिया-विशेषण प्रयुक्त हुए हैं:

  • मजे ले-लेकर खाना: क्रिया (खाना) के संपादन की रीति को स्पष्ट करता है (आनंदपूर्वक खाना)।
  • छूटते ही भागना: तेजी से प्रस्थान करने की रीति।
  • खीझ उठना: तीव्र अप्रसन्नता या चिढ़ प्रकट करना।
  • सूरत लंगूर की बनना: मुहावरेदार प्रयोग, जिसका अर्थ है—चेहरे का हास्यास्पद या बेढंगा दिखाई देना।

पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap), जीवन-दर्शन एवं नैतिक संदेश

पीढ़ीगत अंतराल: समय की गति और मानवीय मूल्य

'बचपन' संस्मरण केवल अतीत का मोह (Nostalgia) नहीं है, बल्कि यह समय की निरंतर परिवर्तनशीलता और दो भिन्न पीढ़ियों के बीच संवाद स्थापित करने का एक उत्कृष्ट माध्यम है। लेखिका अपने बाल्यकाल की कथा सुनाकर नई पीढ़ी को यह समझाना चाहती हैं कि साधनों के बदलने से जीवन का मूल आनंद समाप्त नहीं होना चाहिए।

1. पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap) के मुख्य आयाम

संस्मरण के आधार पर पिछली पीढ़ी और आज की पीढ़ी के बीच तीन प्रमुख स्तरों पर अंतर देखा जा सकता है:

(क) तकनीकी एवं मनोरंजन के स्तर पर

पहले मनोरंजन सीमित था—ग्रामोफोन, मेले, रिज पर टहलना और मित्रों के साथ प्रत्यक्ष खेल। आज मनोरंजन असीमित और व्यक्तिगत हो गया है—मोबाइल, टैबलेट, ऑनलाइन गेमिंग और वर्चुअल मीडिया। तकनीकी प्रगति ने दूरियाँ घटाई हैं, परंतु प्रत्यक्ष पारिवारिक संवाद को कम कर दिया है।

(ख) खान-पान एवं स्वास्थ्य के स्तर पर

पहले भोजन ताजा, स्थानीय और प्राकृतिक फलों (शहतूत, फाल्सा, काफल, खसखस) पर आधारित था। आज का खान-पान प्रसंस्कृत (Processed), जंक फूड और रासायनिक कोल्ड ड्रिंक्स पर आधारित है, जिससे बच्चों में कम उम्र में ही मोटापा, कमजोरी और चश्मे जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं।

(ग) अनुशासन एवं स्वावलंबन के स्तर पर

पहले बच्चों को अपने व्यक्तिगत कार्य स्वयं करने की सख्त आदत डाली जाती थी। वे श्रम को हीन दृष्टि से नहीं देखते थे। आज अत्यधिक लाड़-प्यार और नौकरों पर निर्भरता के कारण बच्चों में शारीरिक परिश्रम और स्वावलंबन की भावना में कमी आई है।

2. पाठ से मिलने वाले नैतिक संदेश एवं जीवन-मूल्य

'बचपन' पाठ आधुनिक विद्यार्थियों को निम्नलिखित चार शाश्वत नैतिक संदेश प्रदान करता है:

  1. श्रम और स्वावलंबन का सम्मान: अपने छोटे-मोटे कार्य (जैसे अपने कपड़े व्यवस्थित रखना, जूते पॉलिश करना, कमरा साफ रखना) स्वयं करना आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी है।
  2. स्वास्थ्य और नेत्र-सुरक्षा के प्रति जागरूकता: लेखिका की भूल (धीमी रोशनी में पढ़ना) से सीख लेकर विद्यार्थियों को अपनी आँखों की सुरक्षा करनी चाहिए। स्क्रीन और किताबों का उपयोग सदैव पर्याप्त और उचित रोशनी में ही करना चाहिए।
  3. हँसी और आत्म-स्वीकृति का महत्व: जब भाई ने लेखिका को 'लंगूर' कहा, तो वे कुछ देर नाराज हुईं लेकिन बाद में हँस पड़ीं। जीवन में दूसरों के निरपराध मज़ाक को खेल-भावना से लेना और अपनी कमियों को सहज रूप से स्वीकार करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
  4. बुजुर्गों के अनुभवों का आदर: हमारे घर के बुजुर्ग (दादा-दादी, नाना-नानी) बीते युग के जीवंत इतिहास हैं। उनसे संवाद करके हम अपनी जड़ों, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रह सकते हैं।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

संस्मरण विधा संरचना समीकरण (Memoir Architecture Paradigm)
उत्कृष्ट संस्मरण = स्मृति (यथार्थपरक सत्य) + आत्मीयता (उत्तम पुरुष 'मैं/हम') + युगीन सांस्कृतिक दस्तावेज
संज्ञा से गुणवाचक विशेषण निर्माण सूत्र (Adjective Derivation Rule)
मूल संज्ञा + तद्धित प्रत्यय ('ईला' / 'ई') = गुणवाचक विशेषण (उदा: चमक + ईला = चमकीला, गुलाब + ई = गुलाबी)
पीढ़ीगत अंतराल (तब बनाम अब) रूपांतरण मॉडल (Generational Paradigm Shift)
जीवन-शैली : प्राकृतिक व स्थानीय (शहतूत/कुल्फी/ग्रामोफोन) →{शताब्दी का बदलाव} प्रसंस्कृत व वैश्विक (कोक/आइसक्रीम/डिजिटल स्क्रीन)
पारिवारिक स्वावलंबन संस्कार ढांचा (Self-Reliance Formation Framework)
आत्मनिर्भरता = निजी कार्य स्वयं करना (मोज़े धोना) + शारीरिक श्रम का आदर (जूता पॉलिश) + पारिवारिक अनुशासन
बाल-मनोवैज्ञानिक संकोच एवं आत्म-स्वीकृति प्रतिमान (Psychological Self-Acceptance Model)
परिपक्व व्यक्तित्व = शारीरिक परिवर्तन (चश्मा) → संकोच व खीझ (लंगूर का व्यंग्य) → हास्य व सहज आत्म-स्वीकृति
दृष्टि-दोष एवं स्वास्थ्य-सुरक्षा नियम (Eye Health & Illumination Law)
स्वस्थ दृष्टि = पर्याप्त प्राकृतिक प्रकाश - मंद अप्रत्यक्ष रोशनी (टेबल लैंप / स्क्रीन)
आगत (विदेशी) शब्द भाषिक समीकरण (Loan Words Contextual Equation)
प्रामाणिक युगीन भाषा = खड़ी बोली हिन्दी + आगत अंग्रेजी शब्द (फ्रॉक/ट्यूनिक/कन्फेक्शनरी) + देशज मुहावरे
बोर्ड परीक्षा गद्यांश व्याख्या चतुष्पदीय प्रारूप (Four-Step Prose Exegesis Protocol)
गद्यांश व्याख्या = संदर्भ (लेखिका/पुस्तक) + प्रसंग (केंद्रीय घटना) + विस्तृत भावार्थ + विशेष (भाषा/शैली/शिल्प)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
लेखिका के बचपन में बच्चों को अपने मोज़े खुद क्यों धोने पड़ते थे और रविवार की सुबह वे क्या करते थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

लेखिका के परिवार में स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का अत्यंत कड़ा नियम था। बच्चों को अपने मोज़े और स्टॉकिंग्स स्वयं साबुन से धोने पड़ते थे, क्योंकि उन्हें किसी नौकर या नौकरानी को धोने के लिए देने की सख्त मनाही थी।

रविवार की सुबह स्कूल की छुट्टी के दिन सभी भाई-बहन मिलकर अपने-अपने जूतों की मरम्मत और पॉलिश करने का काम करते थे। वे पहले ब्रश से धूल झाड़ते थे और फिर कपड़े या ब्रश से पॉलिश को रगड़-रगड़कर जूतों को शीशे की तरह चमकाते थे।

उदाहरण 2
शनिवार की सुबह लेखिका और उनके भाई-बहनों के लिए क्यों कष्टकारी होती थी? संस्मरण के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

शनिवार की सुबह लेखिका और उनके भाई-बहनों के लिए निम्नलिखित कारणों से अत्यंत कष्टकारी होती थी:

  1. कड़वे तेल की अनिवार्यता: प्रत्येक शनिवार को पेट साफ रखने के उद्देश्य से घर के सभी बच्चों को अरंडी का तेल (कैस्टर ऑयल) अथवा जैतून का तेल (ऑलिव ऑयल) अनिवार्य रूप से पीना पड़ता था।
  2. गंध और उबकाई का कष्ट: शनिवार की सुबह से ही घर में उस तेल की तीखी और अरुचिकर गंध फैलने लगती थी। मेज पर रखे खुराक के निशान वाले छोटे काँच के गिलासों को देखते ही बच्चों को मितली (उल्टी) आने लगती थी।
  3. लेखिका का व्यंग्य: लेखिका लिखती हैं कि यदि वे उस शनिवारीय दवा को न भी पीते, तो भी उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था; परंतु उस समय घरेलू नियमों का पालन करना अनिवार्य था।
उदाहरण 3
लेखिका के बचपन और आज के समय के खान-पान में क्या अंतर आया है? किन्हीं तीन प्रमुख बदलावों का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

लेखिका के बचपन और वर्तमान समय के खान-पान में आए तीन प्रमुख युगीन बदलाव निम्नलिखित हैं:

खान-पान का घटक लेखिका का बचपन (तब) आधुनिक समय (अब)
1. शीतल मिष्ठान्न देशी मटकों और ठेलों की कुल्फ़ी। विभिन्न फ्लेवर की आइसक्रीम।
2. नमकीन नाश्ता ताजी तली हुई कचौड़ी और समोसा। बेकरी में मिलने वाली पैटीज़ और बर्गर।
3. शीतल पेय शहतूत, फाल्से व खसखस का शरबत। रासायनिक कोक और पेप्सी।
उदाहरण 4
निम्नलिखित संज्ञा शब्दों में उपयुक्त प्रत्यय जोड़कर गुणवाचक विशेषण बनाइए तथा उनका एक-एक सार्थक वाक्य में प्रयोग कीजिए: (क) चमक, (ख) रस, (ग) गुलाब, (घ) रंग।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. चमक + ईला = चमकीला (गुणवाचक विशेषण)
    वाक्य प्रयोग: रविवार की सुबह बच्चों ने जूतों पर पॉलिश लगाकर उन्हें अत्यंत चमकीला बना दिया।
  2. रस + ईला = रसीला (गुणवाचक विशेषण)
    वाक्य प्रयोग: गर्मियों के मौसम में हिमालय की घाटियों में अत्यंत रसीला काफल फल मिलता है।
  3. गुलाब + ई = गुलाबी (गुणवाचक विशेषण)
    वाक्य प्रयोग: बचपन में लेखिका के पास एक महीन चुन्नटों वाला सुंदर गुलाबी फ्रॉक था।
  4. रंग + ईला = रंगीला (गुणवाचक विशेषण)
    वाक्य प्रयोग: शिमला के रिज मैदान पर हवा में उड़ता हुआ रंगीला गुब्बारा बच्चों को बहुत आकर्षित करता था।
उदाहरण 5
लेखिका को चश्मा क्यों लगाना पड़ा? पहली बार चश्मा लगाने पर उनके चचेरे भाई ने उन्हें क्या कहकर चिढ़ाया और लेखिका की क्या प्रतिक्रिया हुई?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

(१) चश्मा लगने का कारण: लेखिका की आँखें कमजोर होने का कारण उनकी अपनी लापरवाही थी। वे दिन की पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी में पढ़ने के बजाय रात के समय टेबल लैंप की मंद रोशनी में देर तक पढ़ाई किया करती थीं। आँखों पर अत्यधिक जोर पड़ने के कारण उनकी नजर कमजोर हो गई और डॉक्टर ने उन्हें चश्मा लगाने का परामर्श दिया।

(२) चचेरे भाई की छेड़खानी: जब लेखिका ने पहली बार चश्मा लगाया, तो उनके चचेरे भाई ने उनका मजाक उड़ाते हुए यह व्यंग्य-शेर पढ़ा:
"आँख पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की,
यह नहीं लड़की को मालूम सूरत बनी लंगूर की!"

(३) लेखिका की प्रतिक्रिया: भाई द्वारा 'लंगूर' कहे जाने पर लेखिका को अत्यधिक खीझ और गुस्सा आया। वे अपने कमरे में जाकर आईने के सामने खड़ी हो गईं और बार-बार चश्मा उतारकर और पहनकर अपना चेहरा देखने लगीं। अंत में उनका गुस्सा शांत हो गया और वे स्वयं अपनी सूरत देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ीं।

उदाहरण 6
'बचपन' संस्मरण के आधार पर लेखिका के बाल्यकाल की जीवन-शैली का सांगोपांग वर्णन कीजिए और बताइए कि वर्तमान पीढ़ी के बच्चों को इस संस्मरण से क्या प्रेरणा लेनी चाहिए?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

१. लेखिका के बचपन की जीवन-शैली:

  • सादगी और अनुशासन: लेखिका का बचपन प्राकृतिक सौंदर्य और घरेलू अनुशासन के बीच बीता। वे रंग-बिरंगे चटक कपड़े पहनती थीं, अपने मोज़े स्वयं धोती थीं और रविवार को जूतों पर पॉलिश करती थीं।
  • स्वास्थ्य और खान-पान: शनिवार को अरंडी का तेल पीने का कड़वा नियम स्वास्थ्य-रक्षा के लिए था। खान-पान में शहतूत और फाल्से का ताजा शरबत, देशी कुल्फी और रिज मैदान का 'चना जोर गरम' मुख्य थे। चॉकलेट केवल सप्ताह में एक बार मिलती थी।
  • मनोरंजन और प्रकृति: उस समय टेलीविजन या मोबाइल नहीं थे। बच्चे ग्रामोफोन सुनते थे, रिज मैदान पर टहलते थे, टट्टू की सवारी करते थे और शिमला-कालका टॉय ट्रेन के मॉडल को देखकर विस्मित होते थे।

२. वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक सीख:

  1. श्रम और स्वावलंबन: बच्चों को अपने दैनिक निजी कार्य (कपड़े, जूते, कमरा व्यवस्थित रखना) स्वयं करने चाहिए और नौकरों या माता-पिता पर पूर्णतः निर्भर नहीं रहना चाहिए।
  2. नेत्र-सुरक्षा और स्वास्थ्य: दिन के उजाले में पढ़ना चाहिए और डिजिटल स्क्रीनों के अत्यधिक उपयोग से बचना चाहिए ताकि कम उम्र में नजर कमजोर न हो।
  3. प्राकृतिक खान-पान: जंक फूड और रसायनों से युक्त कोल्ड ड्रिंक्स के स्थान पर ताजे फल, दूध और घर के बने सात्विक आहार को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  4. सकारात्मक दृष्टिकोण: जीवन में दूसरों के निरपराध परिहास को खेल-भावना से लेना चाहिए और अपनी कमियों को सहजता से स्वीकार करना चाहिए।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

आँखें कमजोर होने का कारण केवल पढ़ाई करना नहीं था, बल्कि दिन की पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी को छोड़कर रात में टेबल लैंप की मंद और अनुचित रोशनी में पढ़ना था। लेखिका ने स्पष्ट रूप से इसे अपनी असावधानी और गलती स्वीकार किया है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

कैस्टर ऑयल (अरंडी का तेल) और ऑलिव ऑयल (जैतून का तेल) अत्यंत कड़वी और दुर्गंधयुक्त घरेलू औषधियाँ थीं, जिन्हें पेट साफ रखने के लिए जबरन पिलाया जाता था। इसकी गंध और खुराक के निशान वाले गिलासों को देखते ही बच्चों को उबकाई (मितली) आने लगती थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह रचना काल्पनिक कहानी नहीं है, बल्कि विशुद्ध 'संस्मरण' (Memoir) है। इसमें ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कृष्णा सोबती ने अपने वास्तविक जीवन, बीसवीं सदी के शिमला के परिवेश और अपने परिवार के प्रामाणिक अनुभवों को शब्दबद्ध किया है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह कोई दुर्भावनापूर्ण अपमान नहीं था, बल्कि भारतीय संयुक्त परिवारों में भाई-बहनों के बीच होने वाला सहज, निश्छल और स्नेहपूर्ण बाल-सुलभ मजाक था। लेखिका ने आरंभ में थोड़ा खीझने के बाद आईने में स्वयं को देखकर इसे हँसी में स्वीकार कर लिया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

अंग्रेज डॉक्टर ने केवल झूठा दिलासा दिया था कि कुछ दिन पहनने पर चश्मा उतर जाएगा। वास्तव में चश्मा जीवन भर कभी नहीं उतरा; उम्र बढ़ने के साथ आँखों का नंबर केवल बढ़ता ही चला गया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

'चना जोर गरम' केवल नाश्ता नहीं था, बल्कि उस दौर की लोक-संस्कृति और रिज मैदान के सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक था, जिसे रद्दी कागजों की शंकु-नुमा तिरछी पुड़िया में अनारदाने के चूर्ण के साथ खाया जाता था।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

CISCE • CLASS 6 • HINDI वसंत भाग - 1 • पाठ 2 : बचपन (संस्मरण) लेखिका: ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित मूर्धन्य साहित्यकार कृष्णा सोबती (1925–2019) विधा: संस्मरण (Memoir) • ऐतिहासिक व सांस्कृतिक जीवन-झांकी 👓 पैनल 1: लेखिका एवं संस्मरण विधा कृष्णा सोबती का जीवन-वृत्त, वैचारिक वैशिष्ट्य एवं संस्मरण का स्वरूप 📌 लेखिका परिचय एवं उपलब्धियाँ जन्म: 18 फरवरी 1925, गुजरात (पश्चिम पंजाब, अब पाकिस्तान)। सर्वोच्च सम्मान: 53वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार (2017), साहित्य अकादमी पुरस्कार। कालजयी कृतियाँ: 'ज़िन्दगीनामा', 'मित्रो मरजानी', 'डार से बिछुड़ी', 'समय सरगम'। व्यक्तित्व चित्र: 'हम हशमत' (अपने समकालीनों का अद्वितीय रेखाचित्र संग्रह)। काव्य-गद्य दर्शन (Literary Vision): कृष्णा सोबती हिन्दी कथा-साहित्य की अप्रतिम शिल्पी हैं। उनकी भाषा में पंजाबी, उर्दू और ठेठ देशज शब्दों का सजीव प्रवाह और संस्मरण में गहरा आत्मीय भाव है। 📖 'संस्मरण' (Memoir) विधा की विशेषताएँ 1. स्मृति-आधारित प्रामाणिकता (Authenticity of Memory): लेखक अपने बीते जीवन की वास्तविक घटनाओं, परिवेश व व्यक्तियों को सजीव करता है। 2. आत्मकथात्मक उत्तम पुरुष शैली (First-Person Narrative): 'मैं तुम्हें अपने बचपन की ओर ले जाऊँगी...'—पाठक से सीधा आत्मीय संवाद। 3. युगीन सामाजिक व सांस्कृतिक दस्तावेज (Cultural Chronicle): बीसवीं सदी के आरंभिक भारत की वेशभूषा, खान-पान, तकनीक व सोच का जीवंत दर्पण। पाठ का उद्देश्य: नई पीढ़ी को अतीत की सादगी और बदलाव से परिचित कराना पैनल 2: वेशभूषा व शनिवार की दिनचर्या रंग-बिरंगे परिधानों से सफेद पोशाक तक एवं तेल पीने का कड़वा अनुभव 👗 परिधान एवं पहनावे का युगांतर (Fashion Evolution) बचपन के रंग-बिरंगे वस्त्र • फ्रॉक, निक्कर-वॉकर, गरारे • शरारे और चूड़ीदार-घेरदार कुर्ते • रंग: नीला, पीला, जामुनी, ग्रे, चॉकलेटी, कैस्टर धारी उमंग, चंचलता व उल्लास वृद्धावस्था का सादा पहनावा • केवल हल्के और सफेद वस्त्र • घेरदार पोशाकों की जगह सहज व ढीले-ढाले कुर्ते • चटक रंगों से दूरी गंभीरता, परिपक्वता व शांति स्वावलंबन का संस्कार (Self-reliance): बच्चों को अपने मोज़े व स्टॉकिंग्स खुद धोने पड़ते थे; नौकरों को देने की सख्त मनाही थी। रविवार की सुबह जूतों पर ब्रश और कपड़े से पॉलिश कर उन्हें चमकाया जाता था। 🧪 शनिवार का 'कैस्टर ऑयल' नियम (The Saturday Ritual) कैस्टर ऑयल (अरंडी का तेल) व ऑलिव ऑयल (जैतून का तेल): • प्रत्येक शनिवार सुबह पेट साफ रखने हेतु यह कड़वी दवा अनिवार्य रूप से पिलाई जाती थी। • शनिवार की सुबह से ही नाक में उस तेल की गंध आने लगती थी और मितली होने लगती थी। काँच का छोटा गिलासी माप (Dosing Glass): काँच के छोटे गिलास जिन पर खुराक के लिए निशान लगे होते थे; उन्हें देखते ही उबकाई आती थी। लेखिका कहती हैं: यदि हम न भी पीते तो कोई बड़ी बीमारी नहीं होने वाली थी! नए जूतों का दंश और रुई का उपाय: • उस समय के जूते सख्त होते थे; नए जूते पहनते ही पैरों में छाले (काटना) पड़ जाते थे। • नियम: "नया जूता लगा तो अंदर रुई!"—छाले से बचाव हेतु मोज़े के अंदर रुई ठोस ली जाती। पैनल 3: खान-पान व शिमला की स्मृतियाँ तुलनात्मक भोजन-संस्कृति, रिज मैदान, क्राइस्ट चर्च एवं मॉल रोड 🍽️ खान-पान में युगांतर: तब (Past) बनाम अब (Present) लेखिका का बचपन (तब) आधुनिक समय (अब) बदलाव का प्रभाव ग्रामोफ़ोन (Gramophone) रेडियो, टेलीविज़न, स्मार्टफोन डिजिटल संचार क्रांति कुल्फ़ी (Kulfi) आइसक्रीम (Ice Cream) प्रसंस्कृत डेज़र्ट्स समोसा और कचौड़ी पैटीज़ और बर्गर फास्ट-फूड का विस्तार शहतूत, फाल्सा, खसखस शरबत कोक, पेप्सी, कोल्ड ड्रिंक्स प्राकृतिक पेय से रसायनों की ओर लेमनेड और विमटो एनर्जी ड्रिंक्स, कार्बोनेटेड सोडा वैश्विक ब्रांड्स का दबदबा 🏔️ शिमला रिज मैदान, बेकरी एवं चना जोर गरम कन्फेक्शनरी शॉप (मॉल रोड): • शाम को ब्राउन ब्रेड लाने की ड्यूटी; पेस्ट्री और चॉकलेट की भीनी-भीनी मनमोहक खुशबू। • हफ्ते में केवल एक बार चॉकलेट खरीदने की सख्त पारिवारिक छूट थी। चना जोर गरम और अनारदाना चूर्ण: • पुरानी किताबों के कागज़ से बनी तिरछी नुकीली पुड़िया (नीचे से पतली, ऊपर से चौड़ी)। • प्रसिद्ध लोक-गीत: "चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार, चना जोर गरम..." रिज मैदान, घोड़े की सवारी व चर्च की घंटियाँ: • शिमला के बच्चों को कभी न कभी टट्टू (घोड़े) की सवारी का रोमांच अवश्य मिलता था। • शाम होते ही क्राइस्ट चर्च की बजती घंटियों की गूँज दूर-दूर तक फैल जाती थी। पैनल 4: चश्मा एवं भाई की छेड़खानी कम रोशनी में पढ़ाई का परिणाम, लंगूर का उपहास एवं आत्म-सम्मान 🔍 चश्मा लगने का कारण एवं डॉक्टर का आश्वासन कारण: अपनी ही गलती (Self-Neglect): दिन की प्राकृतिक रोशनी को छोड़कर रात में टेबल लैंप की मंद रोशनी में पढ़ाई करना। लेखिका स्पष्ट कहती हैं: "इसका सारा कसूर मेरा ही था!" अंग्रेज़ डॉक्टर का दिलासा: डॉक्टर ने कहा था—"कुछ दिन चश्मा लगाओगी तो नज़र सामान्य हो जाएगी और उतर जाएगा।" परंतु चश्मा आज तक नहीं उतरा; उम्र के साथ नंबर केवल बढ़ता ही चला गया। अटपटापन एवं रिश्तेदारों की सहानुभूति: पहली बार चश्मा लगाने पर चेहरा विचित्र लगा; रिश्तेदार कहते—"दूध पिया करो!" लेखिका डॉक्टर का वाक्य दोहरा देतीं कि कुछ दिन में उतर जाएगा। मनोवैज्ञानिक द्वंद्व: संकोच, असहजता एवं स्वयं को स्वीकार करने का संघर्ष। 🐒 चचेरे भाई की छेड़खानी: 'लंगूर' का रूपक भाई द्वारा बनाया गया व्यंग्य-शेर: "आँख पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की, यह नहीं लड़की को मालूम सूरत बनी लंगूर की!" लेखिका की तात्कालिक प्रतिक्रिया: • लेखिका को भाई के इस शेर पर बहुत खीझ (गुस्सा) आई। • परंतु अकेले कमरे में आईने के सामने बार-बार चश्मा उतारकर देखा और खुद हँसीं। हिमाचली टोपियाँ एवं सहज आत्म-स्वीकृति: • धीरे-धीरे चश्मा चेहरे में घुल-मिल गया; बिना चश्मे के चेहरा खाली-खाली लगने लगा। • अब दुपट्टे की जगह सिर पर रंग-बिरंगी हिमाचली टोपियाँ पहनना उन्हें अधिक भाता है। पैनल 5: व्याकरण एवं जीवन-दर्शन संज्ञा से विशेषण रचना, संस्मरण शिल्प एवं पीढ़ीगत अंतर का सार 📝 'भाषा की बात' — व्याकरणिक संप्रत्यय 1. भाववाचक संज्ञा से विशेषण निर्माण: • चमक (संज्ञा) + ईला (प्रत्यय) = चमकीला (गुणवाचक विशेषण) • गुलाबी, चॉकलेटी, कड़वा, खट्टा, सादा (गुण व स्वाद बोधक विशेषण) 2. संस्मरण में आगत विदेशी (अंग्रेज़ी) शब्द: • फ्रॉक, ट्यूनिक, स्टॉकिंग्स, ऑलिव ऑयल, कैस्टर ऑयल, ग्रामोफ़ोन • टेबल लैंप, पेस्ट्री, चॉकलेट, बेकरी, स्कैंडल पॉइंट, स्पीड 3. क्रिया-विशेषण एवं मुहावरेदार प्रयोग: • "हँसते-हँसते लोटपोट होना" (अत्यधिक हँसना) • "सूरत लंगूर की बनना" (चेहरा हास्यास्पद दिखना) • रीतिवाचक प्रयोग: "मज़े ले-लेकर खाना", "छूटते ही भागना" चित्रात्मक भाषा शैली पाठ को सजीव और दृश्यमान बनाती है। 💡 पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap) एवं जीवन-दर्शन 1. स्वावलंबन और आत्म-निर्भरता की सीख: लेखिका के बचपन में बच्चे अपने निजी कार्य (मोज़े धोना, जूते चमकाना) स्वयं करते थे। यह अनुशासन आधुनिक बच्चों को श्रम के सम्मान का पाठ पढ़ाता है। 2. सादगी बनाम कृत्रिमता: अतीत का खान-पान प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक था (शहतूत/फाल्से का शरबत, चना)। आधुनिक युग में रासायनिक कोल्ड ड्रिंक्स और जंक फूड स्वास्थ्य को हानि पहुँचा रहे हैं। 3. मानवीय संबंधों और बुजुर्गों का आदर: लेखिका स्वयं को अब दादी या नानी की उम्र का मानती हैं। वे स्पष्ट करती हैं कि समय के साथ केवल साधन बदलते हैं, जीवन के शाश्वत मूल्य नहीं बदलते। बुजुर्गों के अनुभवों का सम्मान करना ही संस्कारी समाज का आधार है। निष्कर्ष: परिवर्तन प्रकृति का नियम है, पर जीवन-मूल्य सदा अमर रहते हैं।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
'बचपन' हिन्दी की कालजयी कथाकार एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका कृष्णा सोबती (1925–2019) द्वारा रचित एक अत्यंत सजीव व हृदयस्पर्शी संस्मरण है।
मुख्य बिंदु 2
संस्मरण में लेखिका स्वयं को एक दादी/नानी की उम्र की बुजुर्ग महिला के रूप में प्रस्तुत कर पाठकों को बीसवीं सदी के आरंभिक भारत के अपने बाल्यकाल की स्मृतियों में ले जाती हैं।
मुख्य बिंदु 3
बचपन में लेखिका फ्रॉक, निक्कर-वॉकर, गरारे, शरारे जैसे चटक व रंग-बिरंगे (नीले, पीले, चॉकलेटी) परिधान पहनती थीं, जबकि वृद्धावस्था में वे केवल सादे व हल्के सफेद वस्त्र पहनती हैं।
मुख्य बिंदु 4
लेखिका के परिवार में स्वावलंबन का कड़ा नियम था; बच्चों को अपने मोज़े खुद धोने पड़ते थे और रविवार की सुबह जूतों पर पॉलिश करके उन्हें शीशे की तरह चमकाना पड़ता था।
मुख्य बिंदु 5
उस समय के जूते सख्त चमड़े के होते थे, जिससे पैरों में छाले पड़ जाते थे; अतः छाले से बचाव हेतु बच्चे मोज़े के अंदर रुई लगा लेते थे—'जूता लगा तो अंदर रुई!'
मुख्य बिंदु 6
प्रत्येक शनिवार की सुबह पेट साफ रखने हेतु बच्चों को अरंडी का तेल (कैस्टर ऑयल) या जैतून का तेल (ऑलिव ऑयल) अनिवार्य रूप से पीना पड़ता था, जिसकी गंध से ही उबकाई आने लगती थी।
मुख्य बिंदु 7
खान-पान और तकनीक में आए युगांतर को दर्शाते हुए लेखिका बताती हैं कि तब ग्रामोफोन थे, अब टीवी-रेडियो हैं; कुल्फी आइसक्रीम बन गई, समोसा-कचौड़ी पैटीज़ बन गए और शहतूत का शरबत कोल्ड ड्रिंक्स में बदल गया।
मुख्य बिंदु 8
शिमला के रिज मैदान पर टट्टू (घोड़े) की सवारी, क्राइस्ट चर्च की घंटियों की गूँज, स्कैंडल पॉइंट के जनरल स्टोर में रखी टॉय ट्रेन का मॉडल और अनारदाने वाला 'चना जोर गरम' प्रमुख आकर्षण थे।
मुख्य बिंदु 9
रात में टेबल लैंप की मंद रोशनी में पढ़ाई करने के कारण लेखिका की नजर कमजोर हो गई और उन्हें चश्मा लगाना पड़ा, जिस पर चचेरे भाई ने 'सूरत बनी लंगूर की' कहकर उन्हें खूब छेड़ा।
मुख्य बिंदु 10
व्याकरण खंड ('भाषा की बात') में चमक से 'चमकीला' जैसे भाववाचक संज्ञा से गुणवाचक विशेषण बनाने के नियम तथा संस्मरण में प्रयुक्त आगत अंग्रेजी व उर्दू शब्दों का विश्लेषण किया गया है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
लेखिका अपने बचपन में किस प्रकार के कपड़े पहनती थीं और अब वृद्धावस्था में उनका पहनावा कैसा हो गया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बचपन में लेखिका फ्रॉक, निक्कर-वॉकर, गरारे, शरारे और चूड़ीदार-घेरदार कुर्ते जैसे चटक और रंग-बिरंगे (नीले, पीले, जामुनी, चॉकलेटी) कपड़े पहनती थीं। वृद्धावस्था में उनका मन गहरे रंगों से हट गया और वे केवल सादे, हल्के और सफेद ढीले-ढाले कुर्ते पहनना पसंद करती हैं।
रंग-बिरंगे चटक परिधानों से हल्के सफेद वस्त्रों तक के बदलाव को याद करें।
2
रविवार की सुबह लेखिका और उनके भाई-बहन क्या काम करते थे और नए जूतों के संबंध में क्या नियम था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: रविवार की सुबह सारे बच्चे अपने-अपने जूतों की मरम्मत और ब्रश-कपड़े से रगड़कर पॉलिश करते थे ताकि वे चमक उठें। उस समय के जूते सख्त चमड़े के होते थे, अतः नए जूते पहनते ही छाले पड़ने के डर से मोज़े के अंदर रुई लगा ली जाती थी—'जूता लगा तो अंदर रुई!'
जूतों की पॉलिश और पैरों में छाले पड़ने पर अपनाए जाने वाले रुई के नुस्खे पर ध्यान दें।
3
लेखिका के बचपन के समय और आज के समय में मनोरंजन के साधनों में क्या अंतर आया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: लेखिका के बचपन में कुछ समृद्ध घरों में मनोरंजन का एकमात्र साधन केवल 'ग्रामोफ़ोन' हुआ करता था; रेडियो और टेलीविजन नहीं थे। आज मनोरंजन के लिए रंगीन टीवी, इंटरनेट, कंप्यूटर, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया जैसे अनंत साधन उपलब्ध हैं।
ग्रामोफोन से आधुनिक डिजिटल स्क्रीन और टेलीविजन तक के बदलाव को सोचिए।
4
लेखिका को पहली बार चश्मा क्यों लगाना पड़ा? इसका सारा दोष उन्होंने किसे दिया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: लेखिका को चश्मा इसलिए लगाना पड़ा क्योंकि वे दिन की पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी में पढ़ने के बजाय रात के समय टेबल लैंप की मंद रोशनी में देर तक किताबें पढ़ती थीं। इसका पूरा दोष उन्होंने अपनी असावधानी और लापरवाही को दिया।
दिन की प्राकृतिक रोशनी के बजाय रात में मंद रोशनी में पढ़ने की आदत पर विचार करें।
5
चचेरे भाई ने लेखिका को चिढ़ाते हुए कौन-सा शेर कहा था और इसका मुख्य व्यंग्य क्या था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: चचेरे भाई ने चिढ़ाते हुए कहा था—'आँख पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की, यह नहीं लड़की को मालूम सूरत बनी लंगूर की!' इसका मुख्य व्यंग्य यह था कि चश्मा लगाने के कारण लेखिका का मासूम चेहरा किसी लंगूर जैसा हास्यास्पद दिखाई दे रहा था।
'आँख पर चश्मा लगाया...' वाली पंक्तियों और लंगूर के रूपक को याद करें।
6
'चमक' और 'रस' संज्ञा शब्दों में उपयुक्त प्रत्यय जोड़कर गुणवाचक विशेषण बनाइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 'चमक' में 'ईला' प्रत्यय जोड़ने पर 'चमकीला' बनता है, तथा 'रस' में 'ईला' प्रत्यय जोड़ने पर 'रसीला' गुणवाचक विशेषण बनता है।
'ईला' प्रत्यय जोड़ने के व्याकरणिक नियम का प्रयोग कीजिए।
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