ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 8
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प्रगति: अध्ययनरत
झाँसी की रानी (Vasant)
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में राष्ट्रीय चेतना और वीर रस की अमर साधिका कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता 'झाँसी की रानी' भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की अमर गाथा है। यह कविता 1857 के प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है, जब भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्यवादी विस्तार और लॉर्ड डलहौजी की कुटिल 'हड़प नीति' (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) के कारण भारतीय रियासतों का अस्तित्व संकट में पड़ गया था। कवयित्री ने इस कविता में बुंदेलखंड के पारंपरिक लोकगायकों (बुंदेले हरबोलों) की वाचिक परंपरा के माध्यम से महारानी लक्ष्मीबाई के बाल्यकाल, शिक्षा, अस्त्र-शस्त्र साधना, विवाह, आकस्मिक वैधव्य, ब्रिटिश कुचक्रों के विरुद्ध ऐतिहासिक विद्रोह, रणक्षेत्र में अद्वितीय पराक्रम और अंततः मात्र तेईस वर्ष की आयु में मातृभूमि की बलिवेदी पर प्राप्त सर्वोच्च वीरगति का अत्यंत ओजस्वी, सजीव और मर्मस्पर्शी चित्रण किया है।
कविता का आरंभ 1857 की क्रांति की पूर्वपीठिका और भारत की तत्कालीन राजनीतिक दशा के मार्मिक चित्रण से होता है। ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के बहाने भारत में प्रवेश कर धीरे-धीरे यहाँ की आंतरिक फूट का लाभ उठाया और भारतीय राजाओं तथा नवाबों को पराधीन बना लिया। दिल्ली, लखनऊ, बिठूर, पेशवा, तंजौर, सतारा, कर्नाटक आदि शक्तिशाली राज्य एक-एक कर अंग्रेजों के षड्यंत्रों के शिकार होकर अपनी स्वाधीनता खो चुके थे। यहाँ तक कि भारतीय राजघरानों का मान-मर्दन करते हुए कलकत्ते के खुले बाज़ारों में नवाबों और रानियों के आभूषण नीलाम किए जा रहे थे। इस घोर पराधीनता, अपमान और निराशा के अंधकार में जब भारत को 'बूढ़ा' मान लिया गया था, तब 1857 में एकाएक क्रांति की चिनगारी प्रज्वलित हुई। राजवंशों ने अपनी भृकुटी तान ली, महलों के सिंहासन हिल उठे और भारतीय जनमानस में अपनी खोई हुई आज़ादी की वास्तविक कीमत को पहचानकर विदेशी फिरंगियों को देश से उखाड़ फेंकने का दृढ़ संकल्प जागृत हुआ। कवयित्री कहती हैं कि यह स्वतंत्रता की चिनगारी किसी बाहरी दबाव से नहीं, अपितु भारतीयों के अंतरतम की गहरी वेदना और स्वाभिमान से फूटी थी, जिसे महलों ने आग दी और झोपड़ियों ने अपनी ज्वाला से प्रचंड दावानल बना दिया।
इसके उपरांत कवयित्री महारानी लक्ष्मीबाई के आरंभिक जीवन और बाल्यकाल की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती हैं। कानपुर के बिठूर में नाना धुंधूपंत पेशवा के संरक्षण में पली-बढ़ी मनु (मणिकर्णिका) अपने पिता मोरोपंत तांबे की अकेली संतान थीं। नाना उन्हें प्रेम से 'छबीली' कहकर पुकारते थे। सामान्य बालिकाओं के विपरीत, जिनका बचपन गुड्डे-गुड़ियों और शृंगारिक खेलों में बीतता था, छबीली मनु की सहेलियाँ बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी थीं। वे बचपन से ही व्यूह रचना, दुर्ग तोड़ना, नकली युद्ध करना, घुड़सवारी और अचूक निशानेबाज़ी का कठोर अभ्यास करती थीं। उन्हें मराठा गौरव छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य और वीरता की कथाएँ कंठस्थ याद थीं। उनके अद्वितीय पराक्रम को देखकर मराठे गर्व से पुलकित हो उठते थे। कवयित्री उन्हें साक्षात वीरता की साक्षात अवतार तथा लक्ष्मी और दुर्गा का समन्वित दिव्य रूप मानती हैं।
मनु का विवाह झाँसी के महाराज गंगाधर राव के साथ अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ। झाँसी के महलों में खुशियों की शहनाई गूँज उठी और मानो चित्रा को अर्जुन तथा शिव को साक्षात भवानी मिल गई हों। परंतु विधि का विधान अत्यंत क्रूर और रहस्यमय था। सुख का यह सूर्य अधिक समय तक आलोकित न रह सका। कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई। महाराज गंगाधर राव अस्वस्थ हुए और असमय ही निसंतान परलोक सिधार गए। मात्र तेईस वर्ष की अल्हड़ आयु में रानी लक्ष्मीबाई विधवा हो गईं। झाँसी के महलों पर शोक का वज्रपात हुआ, विधाता को भी रानी के हाथों की सुहाग भरी चूड़ियाँ न भाईं और रानी शोक-सागर में डूब गईं।
झाँसी का कुलदीपक बुझते ही ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी मन-ही-मन अत्यधिक प्रसन्न हुआ। उसने अपनी साम्राज्यवादी 'हड़प नीति' के अंतर्गत झाँसी को लावारिस राज्य घोषित कर दिया और रानी द्वारा गोद लिए गए बालक दामोदर राव के उत्तराधिकार को अवैध ठहराते हुए झाँसी के ऐतिहासिक दुर्ग पर ब्रिटिश झंडा (यूनियन जैक) फहराने की घोषणा कर दी। डलहौजी की इस धृष्टता और अन्याय ने शोक-मग्न रानी के भीतर सोई हुई सिंहनी को जगा दिया। रानी ने अश्रु बहाने के स्थान पर अपनी तलवार पर सान चढ़ाई और इतिहास प्रसिद्ध सिंहनाद किया—'मैं अपनी झाँसी किसी भी मूल्य पर फिरंगियों को नहीं दूँगी!' रानी ने झाँसी की प्रजा, सैनिकों और विश्वासपात्र सरदारों को संगठित किया। महिलाओं की एक विशेष 'दुर्गा वाहिनी' सैन्य टुकड़ी तैयार की गई तथा झाँसी के प्राचीर पर कड़क बिजली और भवानी जैसी प्रचंड तोपों की कमान देशभक्त तोपचियों के हाथों में सौंपी गई।
कविता में 1857 की व्यापक राष्ट्रीय क्रांति का भी विस्तृत परिदृश्य प्रस्तुत किया गया है। झाँसी की यह लड़ाई अकेली नहीं थी; मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, पटना, बरेली, फैज़ाबाद, जबलपुर और कोल्हापुर जैसे सुदूर नगरों में क्रांति की ज्वाला फैल चुकी थी। नाना धुंधूपंत, तांतिया टोपे, अज़ीमुल्ला ख़ाँ, अहमद शाह मौलवी और बिहार के वयोवृद्ध वीर कुँवर सिंह जैसे महानायकों ने इस स्वाधीनता महायज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने का मार्ग प्रशस्त किया। कवयित्री स्पष्ट करती हैं कि इस राष्ट्रीय यज्ञ में यद्यपि अनेक वीर अमर होकर इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर हो गए, किंतु झाँसी के रणक्षेत्र में नारी शक्ति का जो विराट् और अकल्पनीय रूप प्रकट हुआ, उसने समूचे विश्व को स्तब्ध कर दिया।
जब अंग्रेज सेनापति लेफ्टिनेंट वाकर भारी सैन्य टुकड़ी लेकर झाँसी के मैदान में उतरा, तब रानी ने मर्दानी वेश धारण कर अपनी दोनों हाथों में तलवारें खींच लीं। रणक्षेत्र में नर और नारी के बीच असमान द्वंद्व छिड़ा। रानी के विद्युत-गति प्रहारों के सामने वाकर टिक न सका और लहूलुहान होकर प्राण बचाकर भाग खड़ा हुआ। उसे इस बात का असीम आश्चर्य था कि एक भारतीय नारी युद्ध-कला में इतनी प्रवीण और संहारक कैसे हो सकती है। तत्पश्चात विशाल अंग्रेज सेना द्वारा झाँसी को घेर लिए जाने पर रानी दुर्ग के प्राचीर से अपने विश्वस्त घोड़े पर सवार होकर छलाँग लगाकर बाहर निकल आईं। अपनी पीठ पर दत्तक पुत्र दामोदर राव को बाँधे हुए रानी ने सौ मील की निरंतर, अविराम यात्रा कर कालपी की ओर कूच किया। लगातार दौड़ने के कारण उनका वफादार घोड़ा थककर भूमि पर गिरा और तत्काल स्वर्ग सिधार गया। रानी ने यमुना के तट पर अंग्रेजों की पुनः घेराबंदी को तोड़ा और उन्हें करारी शिकस्त देकर आगे बढ़ते हुए ऐतिहासिक ग्वालियर दुर्ग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। अंग्रेजों के वफादार मित्र ग्वालियर के राजा सिंधिया अपनी राजधानी छोड़कर भाग खड़े हुए।
ग्वालियर में विजय प्राप्त करने के उपरांत अंग्रेजों ने जनरल स्मिथ और मेजर जनरल ह्यूरोज़ के नेतृत्व में रानी को चारों ओर से घेर लिया। रानी के साथ उनकी दो वीर सखियाँ—कान्हा और मंदरा—युद्धभूमि में उतरीं। उन्होंने जनरल स्मिथ की सेना में भारी संहार मचाया और रानी के साथ मिलकर अंग्रेजी कतारों को तहस-नहस कर दिया। परंतु नियति ने एक बार पुनः विषम परीक्षा ली। पीछे से मेजर जनरल ह्यूरोज़ की विशाल तोपखाने वाली सेना आ धमकी। रानी चारों ओर से अंग्रेज घुड़सवारों और सैनिकों से घिर गईं। फिर भी वह अदम्य वीरांगना मार-काट मचाती हुई अंग्रेजी घेरे को चीरकर बाहर निकल आई। परंतु दुर्भाग्यवश, सामने एक गहरा नाला आ गया। रानी का पूर्व परिचित घोड़ा कालपी में वीरगति पा चुका था और यह नया घोड़ा अभी युद्ध के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं था। वह नाले के किनारे अड़ गया। बस, यही क्षण रानी के लिए घातक सिद्ध हुआ। पीछे से दर्जनों अंग्रेज घुड़सवार सैनिकों ने आकर रानी पर चारों ओर से एक साथ अनगिनत वार कर दिए। रानी अकेली थीं और उन पर हजारों वार हो रहे थे। अंततः वह घायल होकर सिंहनी की भाँति रणभूमि में गिर पड़ीं।
घायल अवस्था में भी रानी की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि उनका पवित्र शरीर अंग्रेजों के अपवित्र हाथों से न छुआ जाए। उनके विश्वासपात्र सैनिकों और साधु बाबा गंगादास ने रानी को निकट की कुटिया में ले जाकर गंगाजल से उनका अंतिम संस्कार किया। मात्र तेईस वर्ष की आयु में रानी ने अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे दी। वे मानुषी नहीं, साक्षात ईश्वर की दिव्य अवतार थीं, जो भारतीयों को अमर स्वाधीनता का पाठ पढ़ाने आई थीं। कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान अंत में कहती हैं कि रानी का यह बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाएगा। कृतज्ञ भारतवासी उनके इस अमर बलिदान को युगों-युगों तक श्रद्धा से स्मरण रखेंगे। जब तक संसार में स्वाभिमान, देशप्रेम और स्वतंत्रता की भावना जीवित रहेगी, तब तक बुंदेले हरबोलों के मुख से गूँजती यह अमर पंक्ति प्रत्येक भारतीय के हृदय में राष्ट्रभक्ति का संचार करती रहेगी—'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी'।
साहित्यिक एवं काव्य-शास्त्रीय दृष्टि से सुभद्रा कुमारी चौहान की यह कविता वीर रस के स्थायी भाव 'उत्साह' का अनुपम आदर्श है। कविता में आलंबन विभाव के रूप में विदेशी आक्रांता अंग्रेज शासक और उद्धारकर्ता के रूप में महारानी लक्ष्मीबाई उपस्थित हैं। उद्दीपन विभाव के रूप में रणक्षेत्र की भेरी, नगाड़े, तलवारों की झंकार, तोपों की गर्जना, सौ मील की अश्व-दौड़ और खून से रंगी रणभूमि का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। अनुभव के रूप में रानी की भृकुटी तनना, दोनों हाथों में तलवारें खींचना, मर्दानों के बीच मर्दानी बनकर युद्ध करना और अंतिम क्षणों तक प्रहार सहना वीर रस को परिपक्वता प्रदान करते हैं। कविता की भाषा ओज गुण संपन्न, प्रवाहपूर्ण और संगीतात्मक है। इसमें वीर रस के अनुकूल कठोर वर्णों और संयुक्त अक्षरों के साथ-साथ बुंदेलखंडी लोक-जीवन के सहज शब्दों का अत्यंत स्वाभाविक समन्वय मिलता है। अनुप्रास, उपमा (जैसे 'चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी', 'लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार') और रूपक अलंकारों के सटीक प्रयोग ने कविता के प्रभाव को द्विगुणित कर दिया है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में यह कविता आधुनिक भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक अप्रतिम वैचारिक संबल बनी। बीसवीं शताब्दी में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज (आईएनए) का गठन किया, तब उन्होंने अपनी पहली महिला सैन्य रेजीमेंट का नाम 'रानी झाँसी रेजीमेंट' रखकर महारानी लक्ष्मीबाई के इसी अदम्य शौर्य को अंतरराष्ट्रीय धरातल पर प्रतिष्ठित किया। कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने स्वयं भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भाग लेते हुए कई बार जेल की यातनाएँ सहीं, और उनका यही जीवंत राष्ट्रीय संकल्प इस कविता के प्रत्येक शब्द में धड़कता हुआ अनुभव होता है। यह कविता केवल अतीत का स्मरण नहीं कराती, बल्कि प्रत्येक पीढ़ी के भीतर अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार करने, मातृभूमि की संप्रभुता की रक्षा करने तथा व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर राष्ट्र-कल्याण के सर्वोच्च आदर्श पर चलने की अमिट प्रेरणा प्रदान करती है।
प्रस्तुत अध्ययन सामग्री सीआईएससीई कक्षा 6 के विद्यार्थियों को इस ओजस्वी काव्य के ऐतिहासिक, साहित्यिक, व्याकरणिक और मूल्याधारित पक्षों की गहन समझ प्रदान करती है। इसमें काव्य की भाषा-शैली (तद्भव-तत्सम मिश्रित खड़ी बोली), वीर रस के स्थायी भाव (उत्साह), अनुप्रास, उपमा व रूपक अलंकारों के प्रयोग, तथा बोर्ड परीक्षा में पूछे जाने वाले दीर्घ व लघु उत्तरीय प्रश्नों के सटीक उत्तर-लेखन की संपूर्ण पद्धति को समाहित किया गया है।