ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 12
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
लोकगीत (Vasant)
१. निबंधकार का परिचय एवं पाठ की पृष्ठभूमि:
'लोकगीत' निबंध के रचयिता डॉ. भगवतशरण उपाध्याय (१९१०-१९८२) आधुनिक हिंदी साहित्य के एक मूर्धन्य निबंधकार, प्रख्यात इतिहासकार, पुरातत्त्ववेत्ता और भारतीय संस्कृति के गहन अध्येता थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के उजियारपुर गाँव में हुआ था। उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व में उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे। उन्होंने विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में भारतीय संस्कृति पर व्याख्यान दिए। डॉ. उपाध्याय ने 'कालिदास का भारत', 'प्राचीन भारत के इतिहास के आलोक-स्तंभ', 'खून के छींटे' और 'सांस्कृतिक निबंध' जैसी अनेक कालजयी कृतियों की रचना की। उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे गंभीर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषयों को भी अत्यंत रोचक, सरल, चित्रात्मक और प्रवाहमयी भाषा में प्रस्तुत करते हैं। 'लोकगीत' निबंध में उन्होंने भारत के ग्रामीण अंचलों, आदिवासी क्षेत्रों और लोक-संस्कृति की उस संगीतमयी आत्मा का अनावरण किया है जो सदियों से भारतीय समाज को उल्लास, जीवंतता और एकता के सूत्र में पिरोए हुए है।
२. लोकगीत की परिभाषा एवं शास्त्रीय संगीत से मूलभूत अंतर:
निबंध के प्रारंभ में लेखक स्पष्ट करते हैं कि लोकगीत अपनी लोच (लचीलापन), ताजगी और लोकप्रियता के कारण शास्त्रीय संगीत से सर्वथा भिन्न हैं। शास्त्रीय संगीत के लिए वर्षों के कठोर अभ्यास (रियाज़), रागों के सूक्ष्म नियमों और स्वरों की गणितीय शुद्धता की आवश्यकता होती है। यदि राग का एक स्वर भी विचलित हो जाए, तो शास्त्रीय संगीत की मर्यादा खंडित हो जाती है। इसके विपरीत, लोकगीत सीधे जनता के संगीत हैं। ये घर, गाँव और नगर की आम जनता के गीत हैं। इन्हें गाने के लिए किसी कठिन साधना की आवश्यकता नहीं होती। ये जन-साधारण के रोजमर्रा के जीवन से, उनके खेतों के पसीने से, उनकी फसलों के लहलहाने से और उनके तीज-त्योहारों से स्वतः स्फूर्त होते हैं। शास्त्रीय संगीत जहाँ राजदरबारों, कुलीन घरानों और विशिष्ट संगीत-मर्मज्ञों के सभागारों तक सीमित रहता था, वहीं लोकगीत चौपालों, पनघटों, खेतों और आँगन में मुक्त आकाश के नीचे गाए जाते हैं। लोकगीतों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी स्वाभाविकता और जन-संवेदना है; वे किसी व्याकरण के मोहताज नहीं होते, बल्कि सीधे श्रोता के हृदय में उतरकर उसे भाव-विभोर कर देते हैं।
३. वाद्य-यंत्रों की सरलता एवं सुलभता:
लोकगीतों के गायन के लिए किसी महंगे या जटिल वाद्य-यंत्र (जैसे सितार, सरोद, वीणा या तानपूरा) की तनिक भी आवश्यकता नहीं होती। ये गीत साधारण और सुलभ देशी वाद्यों की मदद से गाए जाते हैं। गाँवों में लोकगीतों का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय वाद्य 'ढोलक' है। ढोलक की गूँजती थाप सुनते ही गाँव की स्त्रियों और पुरुषों के पैर स्वतः थिरकने लगते हैं। ढोलक के अतिरिक्त झाँझ, मंजीरा, करताल, एकतारा, बाँसुरी अथवा मिट्टी के घड़े तक पर थाप देकर लोकगीत गाए जाते हैं। यहाँ तक कि यदि कोई भी वाद्य-यंत्र उपलब्ध न हो, तो भी केवल हाथों की ताली बजाकर और पैरों की थाप मिलाकर समूह में लोकगीत गाए जा सकते हैं। वाद्यों की यह सरलता ही लोकगीतों को प्रत्येक निर्धन से निर्धन ग्रामीण के लिए भी सहज और सुलभ बनाती है।
४. क्षेत्रीय बोलियों का जादू और भाषिक माधुर्य:
लोकगीतों की अपार सफलता और लोकप्रियता का दूसरा बड़ा रहस्य उनकी भाषा है। लोकगीत कभी किसी पराई, क्लिष्ट या पुस्तकीय भाषा में नहीं रचे जाते। वे सदैव उस अंचल की क्षेत्रीय बोली (Dialect) में गाए जाते हैं जहाँ के वे निवासी होते हैं। उदाहरण के लिए—भोजपुरी, मैथिली, मगही, अवधी, ब्रजभाषा, बुंदेली, मालवी, मारवाड़ी, पंजाबी, गढ़वाली और कुमाऊँनी। जब कोई व्यक्ति अपनी मातृबोली में कोई गीत सुनता है, तो उसे किसी शब्दकोश या अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती। बोली की अपनी मिठास, अपने मुहावरे और अपने स्थानीय संदर्भ सीधे श्रोता के अंतःकरण को स्पर्श करते हैं। यही कारण है कि लोकगीत श्रोताओं को अनायास ही अपनी ओर खींच लेते हैं और चारों ओर आनंद का समाँ बाँध देते हैं।
५. भारत के प्रमुख क्षेत्रीय लोकगीत एवं उनका सांस्कृतिक वैशिष्ट्य:
डॉ. उपाध्याय ने भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लोकगीतों का अत्यंत सजीव और प्रामाणिक सर्वेक्षण प्रस्तुत किया है:
(क) भोजपुरी एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार का अंचल:
यहाँ के लोकगीतों में 'विदेशिया' सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध है। बीसवीं शताब्दी में भिखारी ठाकुर ने विदेशिया नाटकों और गीतों के माध्यम से भोजपुरी जगत में क्रांति ला दी थी। इन गीतों में रोजी-रोटी कमाने के लिए परदेस गए पति और गाँव में विरह की वेदना सहती स्त्री के हृदय-द्रावक दुख, प्रेम और करुणा का ऐसा मार्मिक चित्रण होता है कि सुनने वालों की आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त पूर्वी जिलों में कजरी, चैता, बारहमासा, बिरहा और सोहर अत्यंत चाव से गाए जाते हैं।
(ख) बुंदेलखंड का वीर रस से ओतप्रोत 'आल्हा':
बुंदेलखंड के लोकगीतों में 'आल्हा' का स्थान सर्वोपरि है। यह मध्यकालीन महाकवि जगनिक द्वारा रचित 'आल्हा खंड' पर आधारित है, जिसमें महोबा के दो वीर भाइयों—आल्हा और ऊदल के अदम्य पराक्रम, स्वाभिमान और युद्धों का ओजस्वी वर्णन है। जब कोई गवैय्या ढोलक पर थाप देकर ओजपूर्ण स्वर में आल्हा गाता है, तो नवयुवकों की भुजाएँ फड़कने लगती हैं और रक्त में उत्साह का संचार हो जाता है। आज भी बुंदेलखंड के गाँवों में बरसात के दिनों में चौपालों पर आल्हा सुनने के लिए सैकड़ों लोग रात भर जमे रहते हैं।
(ग) राजस्थान का मरु-संगीत:
राजस्थान में ढोला-मारू, मूमल और पणिहारी के गीत अत्यंत विख्यात हैं। थार के विशाल रेगिस्तान में ऊँटों पर चलते हुए और कुएँ से पानी भरती पनिहारिनें जब सारंगी और रावणहत्था पर ढोला-मारू गाती हैं, तो रेगिस्तान की सूखी रेत भी प्रेम और त्याग के रस से भीग उठती है।
(घ) पंजाब का जोशीला लोक-जीवन:
पंजाब में हीर-राँझा, सोहनी-महिवाल और मिर्जा-साहिबाँ के प्रेम-गीत तथा 'माहिया' अत्यंत चाव से गाए जाते हैं। यहाँ के लोकगीतों में जीवन का प्रचंड वेग, उल्लास और खुलापन झलकता है, जो भांगड़ा और गिद्दा के साथ मिलकर संपूर्ण वातावरण को ऊर्जा से भर देता है।
(ङ) पहाड़ी अंचल (गढ़वाल, कुमाऊँ, कांगड़ा):
हिमालय की उपत्यकाओं में रहने वाले पहाड़ी लोगों के अपने विशिष्ट लोकगीत हैं। चंबा, कांगड़ा, गढ़वाल और अल्मोड़ा के गीतों की अपनी अलग धुन और राग है, जिसे संगीत शास्त्र में 'पहाड़ी' कहा जाता है। 'ओ चंबा कितणी दूर...' जैसे लोकगीत पहाड़ों की शांत वादियों में गूँजकर मन को अलौकिक शांति प्रदान करते हैं।
(च) आदिवासियों के सामूहिक लोकगीत:
मध्य प्रदेश, दक्कन और छोटानागपुर के जंगलों में रहने वाले गोंड, भील, संथाल, मुंडा और कोल जनजातियों के लोकगीत अपनी प्राचीनता और सामूहिक शक्ति के लिए विख्यात हैं। इन जातियों के गीत व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि बीस-तीस पुरुषों और स्त्रियों के समूहों (दलों) में बँटकर गाए जाते हैं। एक दल प्रश्न पूछता है और दूसरा दल गीत में ही उसका उत्तर देता है। रात के अंधकार में ढोल और मांदर की गूँज पर दिशाएँ गूँज उठती हैं।
६. स्त्रियों के लोकगीत एवं पारिवारिक संस्कारों का ताना-बाना:
निबंध का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंश स्त्रियों के लोकगीतों पर केंद्रित है। डॉ. उपाध्याय बताते हैं कि लोकगीतों का एक बहुत बड़ा भंडार विशेष रूप से स्त्रियों का है। यद्यपि पुरुषों ने भी लोकगीत रचे हैं, किंतु स्त्रियों के गीतों में जो कोमलता, आत्मीयता और घरेलू अनुभूतियाँ होती हैं, वे अद्वितीय हैं।
स्त्रियों के लोकगीत जीवन के प्रत्येक संस्कार और पर्व से जुड़े होते हैं:
जन्म के अवसर पर: सोहर, बधाई और जच्चा के गीत।
विवाह के विभिन्न चरणों पर: मटकोड़, तिलक, हल्दी, भात, बन्ना-बन्नी, समधी और बारातियों को दी जाने वाली प्रेम-भरी गालियाँ (हँसी-ठिठोली के गीत) और विदाई के कारुणिक गीत।
ऋतु-उत्सवों पर: सावन के कजरी व हिंडोला (झूला) गीत, फागुन के रसिया व होली गीत, तीज व छठ के पावन गीत।
संस्कृत के महाकवि कालिदास ने भी अपने महाकाव्यों में यह उल्लेख किया है कि उनके युग में भी स्त्रियाँ ऋतु-उत्सवों पर मधुर कंठ से लोकगीत गाया करती थीं। स्त्रियाँ प्रायः अकेले नहीं गातीं; वे दल बाँधकर कोरस में गाती हैं। यद्यपि उनके सुर शास्त्रीय रूप से सधे हुए नहीं होते, किंतु जब अनेक कंठ एक साथ उठते हैं, तो उनकी सामूहिक शक्ति और उल्लास हर श्रोता को मंत्रमुग्ध कर देता है।
७. आधुनिक युग में लोकगीतों की स्थिति एवं संरक्षण:
निबंध के अंत में लेखक आधुनिक युग में लोकगीतों की स्थिति पर विचार करते हैं। औद्योगीकरण, सिनेमा, ग्रामोफोन और पाश्चात्य पॉप संगीत के प्रसार के कारण कुछ समय के लिए ऐसा प्रतीत हुआ कि लोकगीत दब गए हैं या उपेक्षित हो गए हैं। शहरों की चकाचौंध में लोग अपनी लोक-परंपराओं को देहाती और पिछड़ा मानने लगे थे। परंतु लेखक का दृढ़ विश्वास है कि लोकगीतों की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें कभी उखाड़ा नहीं जा सकता। जैसे ही कोई तीज, त्योहार, छठ, दीवाली या शादी का अवसर आता है, आधुनिक से आधुनिक परिवार भी पुनः ढोलक की थाप और सोहर-बन्ना की ओर लौट आता है। आज अनेक विद्वान, विश्वविद्यालय और शोध संस्थान विभिन्न अंचलों के लोकगीतों का संकलन और संरक्षण कर रहे हैं।
८. परीक्षा-उन्मुख विश्लेषण एवं उत्तर-लेखन की मार्गदर्शिका:
बोर्ड परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है। परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रमुख प्रश्नों में शामिल हैं: शास्त्रीय संगीत और लोकगीत में अंतर; लोकगीतों के प्रमुख देशी वाद्य-यंत्र; विदेशिया और आल्हा के विशिष्ट लक्षण; स्त्रियों के लोकगीतों के अवसर और विशेषताएँ; तथा लोकगीतों की भाषा का जन-जीवन से संबंध। उत्तर लिखते समय विद्यार्थियों को केवल सतही विवरण न देकर सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों का उल्लेख करना चाहिए। 'लोक' शब्द का अर्थ ही जनसाधारण है, अतः लोकगीतों का मूल्यांकन जन-संवेदना की कसौटी पर ही किया जाना चाहिए।
९. लोकगीतों में प्रतिबिंबित सामाजिक यथार्थ एवं श्रम-सौंदर्य:
लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे ग्रामीण भारत के कठोर श्रम और सामाजिक यथार्थ का काव्यात्मक संबल हैं। भारतीय किसान और मजदूर जब कड़ी धूप, मूसलाधार बारिश या कड़ाके की ठंड में खेतों में काम करते हैं, तो लोकगीत उनकी थकान को हर लेते हैं। धान की रोपाई के समय गाए जाने वाले गीत (रोपिनी), गेहूँ की कटाई के समय के गीत, कुएँ से रहट द्वारा पानी खींचते समय के गान और घरों में सुबह-सवेरे चक्की पीसते समय महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले 'जांतसार' गीत इस बात के साक्षी हैं कि हमारे पूर्वजों ने श्रम को कभी बोझ नहीं माना, बल्कि उसे संगीत के साथ जोड़कर एक उत्सव बना दिया। जब कोई किसान हल जोतते हुए ऊँचे स्वर में 'बिरहा' गाता है, तो उसकी आवाज़ मीलों दूर तक खेतों में गूँजती है और आसपास के खेतों में काम करने वाले अन्य मजदूर भी अपने-अपने सुर मिलाकर वातावरण को जीवंत बना देते हैं। इस प्रकार लोकगीत वर्ग-भेद और व्यक्तिगत एकाकीपन को समाप्त कर पूरे गाँव को एक परिवार की भावना में बाँध देते हैं।
१०. लोक-संस्कृति की सार्वभौमिक अपील एवं आधुनिक पुनर्जागरण:
आज के वैश्वीकरण और डिजिटल युग में जब सांस्कृतिक एकरूपता का खतरा बढ़ रहा है, तब लोकगीतों का संरक्षण हमारी विविध अस्मिताओं की रक्षा का सबसे सशक्त माध्यम है। हाल के वर्षों में यह सुखद परिवर्तन देखा गया है कि अनेक युवा संगीतकार और बैंड लोकगीतों की मूल धुनों को आधुनिक वाद्यों के साथ संयोजित करके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत कर रहे हैं। राजस्थानी लोक-गायक, मैथिली ठाकुर जैसे युवा कलाकार और विभिन्न राज्यों के लोक-कलाकार इंटरनेट मीडिया पर लाखों श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि लोकगीतों की माटी की महक कभी पुरानी या बासी नहीं होती; वह प्रत्येक युग में अपनी ताजगी और आकर्षण के साथ मानव-मन को आनंदित करने की क्षमता रखती है।