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ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 12
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

लोकगीत (Vasant)

१. निबंधकार का परिचय एवं पाठ की पृष्ठभूमि: 'लोकगीत' निबंध के रचयिता डॉ. भगवतशरण उपाध्याय (१९१०-१९८२) आधुनिक हिंदी साहित्य के एक मूर्धन्य निबंधकार, प्रख्यात इतिहासकार, पुरातत्त्ववेत्ता और भारतीय संस्कृति के गहन अध्येता थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के उजियारपुर गाँव में हुआ था। उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व में उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे। उन्होंने विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में भारतीय संस्कृति पर व्याख्यान दिए। डॉ. उपाध्याय ने 'कालिदास का भारत', 'प्राचीन भारत के इतिहास के आलोक-स्तंभ', 'खून के छींटे' और 'सांस्कृतिक निबंध' जैसी अनेक कालजयी कृतियों की रचना की। उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे गंभीर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषयों को भी अत्यंत रोचक, सरल, चित्रात्मक और प्रवाहमयी भाषा में प्रस्तुत करते हैं। 'लोकगीत' निबंध में उन्होंने भारत के ग्रामीण अंचलों, आदिवासी क्षेत्रों और लोक-संस्कृति की उस संगीतमयी आत्मा का अनावरण किया है जो सदियों से भारतीय समाज को उल्लास, जीवंतता और एकता के सूत्र में पिरोए हुए है। २. लोकगीत की परिभाषा एवं शास्त्रीय संगीत से मूलभूत अंतर: निबंध के प्रारंभ में लेखक स्पष्ट करते हैं कि लोकगीत अपनी लोच (लचीलापन), ताजगी और लोकप्रियता के कारण शास्त्रीय संगीत से सर्वथा भिन्न हैं। शास्त्रीय संगीत के लिए वर्षों के कठोर अभ्यास (रियाज़), रागों के सूक्ष्म नियमों और स्वरों की गणितीय शुद्धता की आवश्यकता होती है। यदि राग का एक स्वर भी विचलित हो जाए, तो शास्त्रीय संगीत की मर्यादा खंडित हो जाती है। इसके विपरीत, लोकगीत सीधे जनता के संगीत हैं। ये घर, गाँव और नगर की आम जनता के गीत हैं। इन्हें गाने के लिए किसी कठिन साधना की आवश्यकता नहीं होती। ये जन-साधारण के रोजमर्रा के जीवन से, उनके खेतों के पसीने से, उनकी फसलों के लहलहाने से और उनके तीज-त्योहारों से स्वतः स्फूर्त होते हैं। शास्त्रीय संगीत जहाँ राजदरबारों, कुलीन घरानों और विशिष्ट संगीत-मर्मज्ञों के सभागारों तक सीमित रहता था, वहीं लोकगीत चौपालों, पनघटों, खेतों और आँगन में मुक्त आकाश के नीचे गाए जाते हैं। लोकगीतों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी स्वाभाविकता और जन-संवेदना है; वे किसी व्याकरण के मोहताज नहीं होते, बल्कि सीधे श्रोता के हृदय में उतरकर उसे भाव-विभोर कर देते हैं। ३. वाद्य-यंत्रों की सरलता एवं सुलभता: लोकगीतों के गायन के लिए किसी महंगे या जटिल वाद्य-यंत्र (जैसे सितार, सरोद, वीणा या तानपूरा) की तनिक भी आवश्यकता नहीं होती। ये गीत साधारण और सुलभ देशी वाद्यों की मदद से गाए जाते हैं। गाँवों में लोकगीतों का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय वाद्य 'ढोलक' है। ढोलक की गूँजती थाप सुनते ही गाँव की स्त्रियों और पुरुषों के पैर स्वतः थिरकने लगते हैं। ढोलक के अतिरिक्त झाँझ, मंजीरा, करताल, एकतारा, बाँसुरी अथवा मिट्टी के घड़े तक पर थाप देकर लोकगीत गाए जाते हैं। यहाँ तक कि यदि कोई भी वाद्य-यंत्र उपलब्ध न हो, तो भी केवल हाथों की ताली बजाकर और पैरों की थाप मिलाकर समूह में लोकगीत गाए जा सकते हैं। वाद्यों की यह सरलता ही लोकगीतों को प्रत्येक निर्धन से निर्धन ग्रामीण के लिए भी सहज और सुलभ बनाती है। ४. क्षेत्रीय बोलियों का जादू और भाषिक माधुर्य: लोकगीतों की अपार सफलता और लोकप्रियता का दूसरा बड़ा रहस्य उनकी भाषा है। लोकगीत कभी किसी पराई, क्लिष्ट या पुस्तकीय भाषा में नहीं रचे जाते। वे सदैव उस अंचल की क्षेत्रीय बोली (Dialect) में गाए जाते हैं जहाँ के वे निवासी होते हैं। उदाहरण के लिए—भोजपुरी, मैथिली, मगही, अवधी, ब्रजभाषा, बुंदेली, मालवी, मारवाड़ी, पंजाबी, गढ़वाली और कुमाऊँनी। जब कोई व्यक्ति अपनी मातृबोली में कोई गीत सुनता है, तो उसे किसी शब्दकोश या अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती। बोली की अपनी मिठास, अपने मुहावरे और अपने स्थानीय संदर्भ सीधे श्रोता के अंतःकरण को स्पर्श करते हैं। यही कारण है कि लोकगीत श्रोताओं को अनायास ही अपनी ओर खींच लेते हैं और चारों ओर आनंद का समाँ बाँध देते हैं। ५. भारत के प्रमुख क्षेत्रीय लोकगीत एवं उनका सांस्कृतिक वैशिष्ट्य: डॉ. उपाध्याय ने भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लोकगीतों का अत्यंत सजीव और प्रामाणिक सर्वेक्षण प्रस्तुत किया है: (क) भोजपुरी एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार का अंचल: यहाँ के लोकगीतों में 'विदेशिया' सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध है। बीसवीं शताब्दी में भिखारी ठाकुर ने विदेशिया नाटकों और गीतों के माध्यम से भोजपुरी जगत में क्रांति ला दी थी। इन गीतों में रोजी-रोटी कमाने के लिए परदेस गए पति और गाँव में विरह की वेदना सहती स्त्री के हृदय-द्रावक दुख, प्रेम और करुणा का ऐसा मार्मिक चित्रण होता है कि सुनने वालों की आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त पूर्वी जिलों में कजरी, चैता, बारहमासा, बिरहा और सोहर अत्यंत चाव से गाए जाते हैं। (ख) बुंदेलखंड का वीर रस से ओतप्रोत 'आल्हा': बुंदेलखंड के लोकगीतों में 'आल्हा' का स्थान सर्वोपरि है। यह मध्यकालीन महाकवि जगनिक द्वारा रचित 'आल्हा खंड' पर आधारित है, जिसमें महोबा के दो वीर भाइयों—आल्हा और ऊदल के अदम्य पराक्रम, स्वाभिमान और युद्धों का ओजस्वी वर्णन है। जब कोई गवैय्या ढोलक पर थाप देकर ओजपूर्ण स्वर में आल्हा गाता है, तो नवयुवकों की भुजाएँ फड़कने लगती हैं और रक्त में उत्साह का संचार हो जाता है। आज भी बुंदेलखंड के गाँवों में बरसात के दिनों में चौपालों पर आल्हा सुनने के लिए सैकड़ों लोग रात भर जमे रहते हैं। (ग) राजस्थान का मरु-संगीत: राजस्थान में ढोला-मारू, मूमल और पणिहारी के गीत अत्यंत विख्यात हैं। थार के विशाल रेगिस्तान में ऊँटों पर चलते हुए और कुएँ से पानी भरती पनिहारिनें जब सारंगी और रावणहत्था पर ढोला-मारू गाती हैं, तो रेगिस्तान की सूखी रेत भी प्रेम और त्याग के रस से भीग उठती है। (घ) पंजाब का जोशीला लोक-जीवन: पंजाब में हीर-राँझा, सोहनी-महिवाल और मिर्जा-साहिबाँ के प्रेम-गीत तथा 'माहिया' अत्यंत चाव से गाए जाते हैं। यहाँ के लोकगीतों में जीवन का प्रचंड वेग, उल्लास और खुलापन झलकता है, जो भांगड़ा और गिद्दा के साथ मिलकर संपूर्ण वातावरण को ऊर्जा से भर देता है। (ङ) पहाड़ी अंचल (गढ़वाल, कुमाऊँ, कांगड़ा): हिमालय की उपत्यकाओं में रहने वाले पहाड़ी लोगों के अपने विशिष्ट लोकगीत हैं। चंबा, कांगड़ा, गढ़वाल और अल्मोड़ा के गीतों की अपनी अलग धुन और राग है, जिसे संगीत शास्त्र में 'पहाड़ी' कहा जाता है। 'ओ चंबा कितणी दूर...' जैसे लोकगीत पहाड़ों की शांत वादियों में गूँजकर मन को अलौकिक शांति प्रदान करते हैं। (च) आदिवासियों के सामूहिक लोकगीत: मध्य प्रदेश, दक्कन और छोटानागपुर के जंगलों में रहने वाले गोंड, भील, संथाल, मुंडा और कोल जनजातियों के लोकगीत अपनी प्राचीनता और सामूहिक शक्ति के लिए विख्यात हैं। इन जातियों के गीत व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि बीस-तीस पुरुषों और स्त्रियों के समूहों (दलों) में बँटकर गाए जाते हैं। एक दल प्रश्न पूछता है और दूसरा दल गीत में ही उसका उत्तर देता है। रात के अंधकार में ढोल और मांदर की गूँज पर दिशाएँ गूँज उठती हैं। ६. स्त्रियों के लोकगीत एवं पारिवारिक संस्कारों का ताना-बाना: निबंध का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंश स्त्रियों के लोकगीतों पर केंद्रित है। डॉ. उपाध्याय बताते हैं कि लोकगीतों का एक बहुत बड़ा भंडार विशेष रूप से स्त्रियों का है। यद्यपि पुरुषों ने भी लोकगीत रचे हैं, किंतु स्त्रियों के गीतों में जो कोमलता, आत्मीयता और घरेलू अनुभूतियाँ होती हैं, वे अद्वितीय हैं। स्त्रियों के लोकगीत जीवन के प्रत्येक संस्कार और पर्व से जुड़े होते हैं: जन्म के अवसर पर: सोहर, बधाई और जच्चा के गीत। विवाह के विभिन्न चरणों पर: मटकोड़, तिलक, हल्दी, भात, बन्ना-बन्नी, समधी और बारातियों को दी जाने वाली प्रेम-भरी गालियाँ (हँसी-ठिठोली के गीत) और विदाई के कारुणिक गीत। ऋतु-उत्सवों पर: सावन के कजरी व हिंडोला (झूला) गीत, फागुन के रसिया व होली गीत, तीज व छठ के पावन गीत। संस्कृत के महाकवि कालिदास ने भी अपने महाकाव्यों में यह उल्लेख किया है कि उनके युग में भी स्त्रियाँ ऋतु-उत्सवों पर मधुर कंठ से लोकगीत गाया करती थीं। स्त्रियाँ प्रायः अकेले नहीं गातीं; वे दल बाँधकर कोरस में गाती हैं। यद्यपि उनके सुर शास्त्रीय रूप से सधे हुए नहीं होते, किंतु जब अनेक कंठ एक साथ उठते हैं, तो उनकी सामूहिक शक्ति और उल्लास हर श्रोता को मंत्रमुग्ध कर देता है। ७. आधुनिक युग में लोकगीतों की स्थिति एवं संरक्षण: निबंध के अंत में लेखक आधुनिक युग में लोकगीतों की स्थिति पर विचार करते हैं। औद्योगीकरण, सिनेमा, ग्रामोफोन और पाश्चात्य पॉप संगीत के प्रसार के कारण कुछ समय के लिए ऐसा प्रतीत हुआ कि लोकगीत दब गए हैं या उपेक्षित हो गए हैं। शहरों की चकाचौंध में लोग अपनी लोक-परंपराओं को देहाती और पिछड़ा मानने लगे थे। परंतु लेखक का दृढ़ विश्वास है कि लोकगीतों की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें कभी उखाड़ा नहीं जा सकता। जैसे ही कोई तीज, त्योहार, छठ, दीवाली या शादी का अवसर आता है, आधुनिक से आधुनिक परिवार भी पुनः ढोलक की थाप और सोहर-बन्ना की ओर लौट आता है। आज अनेक विद्वान, विश्वविद्यालय और शोध संस्थान विभिन्न अंचलों के लोकगीतों का संकलन और संरक्षण कर रहे हैं। ८. परीक्षा-उन्मुख विश्लेषण एवं उत्तर-लेखन की मार्गदर्शिका: बोर्ड परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है। परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रमुख प्रश्नों में शामिल हैं: शास्त्रीय संगीत और लोकगीत में अंतर; लोकगीतों के प्रमुख देशी वाद्य-यंत्र; विदेशिया और आल्हा के विशिष्ट लक्षण; स्त्रियों के लोकगीतों के अवसर और विशेषताएँ; तथा लोकगीतों की भाषा का जन-जीवन से संबंध। उत्तर लिखते समय विद्यार्थियों को केवल सतही विवरण न देकर सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों का उल्लेख करना चाहिए। 'लोक' शब्द का अर्थ ही जनसाधारण है, अतः लोकगीतों का मूल्यांकन जन-संवेदना की कसौटी पर ही किया जाना चाहिए। ९. लोकगीतों में प्रतिबिंबित सामाजिक यथार्थ एवं श्रम-सौंदर्य: लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे ग्रामीण भारत के कठोर श्रम और सामाजिक यथार्थ का काव्यात्मक संबल हैं। भारतीय किसान और मजदूर जब कड़ी धूप, मूसलाधार बारिश या कड़ाके की ठंड में खेतों में काम करते हैं, तो लोकगीत उनकी थकान को हर लेते हैं। धान की रोपाई के समय गाए जाने वाले गीत (रोपिनी), गेहूँ की कटाई के समय के गीत, कुएँ से रहट द्वारा पानी खींचते समय के गान और घरों में सुबह-सवेरे चक्की पीसते समय महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले 'जांतसार' गीत इस बात के साक्षी हैं कि हमारे पूर्वजों ने श्रम को कभी बोझ नहीं माना, बल्कि उसे संगीत के साथ जोड़कर एक उत्सव बना दिया। जब कोई किसान हल जोतते हुए ऊँचे स्वर में 'बिरहा' गाता है, तो उसकी आवाज़ मीलों दूर तक खेतों में गूँजती है और आसपास के खेतों में काम करने वाले अन्य मजदूर भी अपने-अपने सुर मिलाकर वातावरण को जीवंत बना देते हैं। इस प्रकार लोकगीत वर्ग-भेद और व्यक्तिगत एकाकीपन को समाप्त कर पूरे गाँव को एक परिवार की भावना में बाँध देते हैं। १०. लोक-संस्कृति की सार्वभौमिक अपील एवं आधुनिक पुनर्जागरण: आज के वैश्वीकरण और डिजिटल युग में जब सांस्कृतिक एकरूपता का खतरा बढ़ रहा है, तब लोकगीतों का संरक्षण हमारी विविध अस्मिताओं की रक्षा का सबसे सशक्त माध्यम है। हाल के वर्षों में यह सुखद परिवर्तन देखा गया है कि अनेक युवा संगीतकार और बैंड लोकगीतों की मूल धुनों को आधुनिक वाद्यों के साथ संयोजित करके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत कर रहे हैं। राजस्थानी लोक-गायक, मैथिली ठाकुर जैसे युवा कलाकार और विभिन्न राज्यों के लोक-कलाकार इंटरनेट मीडिया पर लाखों श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि लोकगीतों की माटी की महक कभी पुरानी या बासी नहीं होती; वह प्रत्येक युग में अपनी ताजगी और आकर्षण के साथ मानव-मन को आनंदित करने की क्षमता रखती है।

क्या आपने कभी सोचा है?

जब हम किसी भव्य सभागार में शास्त्रीय संगीत की महफ़िल सुनते हैं, तो वहाँ जटिल राग, कठिन ताल और वर्षों के कठोर रियाज़ का अनुशासन दिखाई देता है। परंतु भारत के सुदूर गाँवों, खेतों की मेड़ों, नदियों के कछारों और पर्वतीय घाटियों में एक ऐसा संगीत गूँजता है जिसे किसी रियाज़, किसी गुरु की औपचारिक दीक्षा या किसी महंगे वाद्य की आवश्यकता नहीं होती। वह संगीत हमारी माटी की सोंधी सुगंध से महकता है, जिसे हम 'लोकगीत' कहते हैं। विख्यात संस्कृतिवेत्ता डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का यह सारगर्भित निबंध 'लोकगीत' हमें भारत के उस वास्तविक और जीवंत हृदय से परिचित कराता है जहाँ आम जनता अपने सुख-दुख, खेतों की बुवाई-कटाई, सावन के झूलों और शादी-ब्याह के उत्सवों में ढोलक की थाप पर एक साथ झूम उठती है। यह पाठ हमें सिखाता है कि जो कला जनता की छाती से सीधे फूटती है, वही युगों-युगों तक अमर रहती है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

'लोकगीत' निबंध कक्षा ६ के विद्यार्थियों के लिए केवल एक पाठ नहीं, बल्कि भारत की विराट सांस्कृतिक धरोहर, विविधता और लोक-आत्मा से साक्षात्कार करने की एक अमूल्य खिड़की है। आधुनिक युग में जहाँ नई पीढ़ी पश्चिमी पॉप संगीत, यूट्यूब रील्स और इलेक्ट्रॉनिक धुनों के शोर में अपनी माटी की जड़ों से कटती जा रही है, वहाँ यह पाठ उन्हें अपनी समृद्ध लोक-परंपराओं, लोक-भाषाओं और लोक-कलाओं के प्रति स्वाभिमान और कृतज्ञता से भर देता है। प्रथम, यह पाठ विद्यार्थियों में भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक 'विविधता में एकता' की भावना को दृढ़ करता है। गढ़वाल के पहाड़ों से लेकर राजस्थान के रेगिस्तानों तक, और पंजाब के खेतों से लेकर छोटानागपुर के वनों तक—हर अंचल का अपना विशिष्ट लोक-संगीत है, फिर भी उन सब में बहने वाली मानवीय संवेदना एक समान है। द्वितीय, यह पाठ विद्यार्थियों को यह गहरी सीख देता है कि सच्ची कला और सच्चा आनंद केवल महंगे उपकरणों, चकाचौंध या औपचारिक डिग्रियों में नहीं होता, बल्कि वह जनता के सहज श्रम, अपनत्व और मिट्टी की सुगंध में बसता है। तृतीय, परीक्षा की दृष्टि से यह निबंध अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें से अंतर-आधारित प्रश्न (शास्त्रीय बनाम लोकगीत), क्षेत्रीय वर्गीकरण तालिकाएँ, स्त्रियों के गीतों की विशेषताएँ और भाषा-शिल्प पर आधारित प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। यह अध्याय विद्यार्थियों की विश्लेषणात्मक क्षमता, शब्द-भंडार और सांस्कृतिक चेतना का परिष्कार करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • भारतीय समाज, गाँव और देहाती परिवेश के जन-जीवन की सामान्य समझ होना।
  • विभिन्न भारतीय पर्वों (होली, दीवाली, सावन, तीज, छठ) और संस्कारों (जन्म, विवाह) से सामान्य परिचय होना।
  • संगीत की मूलभूत विधाओं—गीत, वाद्य और नृत्य के सामान्य स्वरूप का बोध होना।
  • हिंदी भाषा के तद्भव, देशज और क्षेत्रीय शब्दों के प्रति स्वाभाविक जिज्ञासा और समझ होना।
  • भारत के विभिन्न राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश) की भौगोलिक स्थिति से सामान्य परिचय होना।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • निबंध 'लोकगीत' का शुद्ध पठन करके उसके केंद्रीय वैचारिक संदेश और सांस्कृतिक गरिमा को स्पष्ट करना।
  • निबंधकार डॉ. भगवतशरण उपाध्याय के व्यक्तित्व, लेखन-शैली और सांस्कृतिक दृष्टि का मूल्यांकन कर पाना।
  • शास्त्रीय संगीत और लोकगीत के मध्य के चार प्रमुख अंतरों (साधना, नियम, वाद्य-यंत्र, श्रोता-वर्ग) को सारणीबद्ध करना।
  • लोकगीतों के गायन में प्रयुक्त होने वाले पारंपरिक देशी वाद्य-यंत्रों (ढोलक, झाँझ, मंजीरा, बाँसुरी आदि) को पहचानना।
  • भारत के विभिन्न अंचलों के लोकगीतों (भोजपुरी के विदेशिया/कजरी, बुंदेलखंड का आल्हा, राजस्थान का ढोला-मारू, पंजाब का हीर) का सटीक वर्गीकरण करना।
  • भोजपुरी के विख्यात लोक-नाटककार भिखारी ठाकुर और बुंदेलखंडी महाकवि जगनिक के ऐतिहासिक योगदान को स्पष्ट करना।
  • लोकगीतों के सृजन और संरक्षण में स्त्रियों की विशेष भूमिका एवं पारिवारिक संस्कारों (सोहर, बन्ना, विदाई) के गीतों का विश्लेषण करना।
  • आदिवासी जातियों (संथाल, भील, गोंड) के सामूहिक गान-नृत्य की विशेषताओं और दलों में सवाल-जवाब की पद्धति को समझाना।
  • पाठ में प्रयुक्त व्याकरणिक तत्वों—समास (लोकगीत), विशेषण-विशेष्य, उपसर्ग-प्रत्यय और मुहावरों का शुद्ध प्रयोग करना।
  • अपनी क्षेत्रीय लोक-संस्कृति, मातृबोली और लोक-परंपराओं के संरक्षण के प्रति संवेदनशील और जागरूक नागरिक बनना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 निबंधकार डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का व्...
2 शास्त्रीय संगीत बनाम लोकगीत: साधना,...
3 भारत की लोक-विविधता: भोजपुरी (विदेश...
4 पहाड़ी, रेगिस्तानी एवं आदिवासी लोकग...
5 स्त्रियों का लोकगीतों में वर्चस्व:...
6 पारंपरिक देशी वाद्य-यंत्र एवं संगीत...
7 भाषा की बात, व्याकरणिक संरचना एवं ल...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

निबंधकार डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का व्यक्तित्व, सांस्कृतिक दृष्टि एवं लोकगीत का भाव-प्रवेश

CISCE CLASS 6 • HINDI VASANT • CHAPTER 12 लोकगीत (निबंध) लेखक: डॉ. भगवतशरण उपाध्याय (संस्कृति एवं पुरातत्त्ववेत्ता) 🎶 पाठ का मूल सार (Essence of the Essay): लोकगीत हमारी माटी, जन-संस्कृति, खेतों और ग्रामीण जीवन की साक्षात् धड़कन हैं। ये शास्त्रीय संगीत की भाँति नियमों, रियाज़ और जटिल तालों में बँधे नहीं होते, बल्कि जनता के सुख-दुख, त्योहारों, संस्कारों और ऋतु-परिवर्तनों से स्वतः फूट पड़ते हैं। ढोलक, झाँझ, मंजीरा और बाँसुरी की सहज थाप पर गूँजने वाले ये गीत सीधे हृदय को छूकर असीम उल्लास भर देते हैं। विधा: सांस्कृतिक निबंध • मुख्य स्वर: भारतीय लोक-संस्कृति की विविधता • वाद्य: ढोलक, मंजीरा, बाँसुरी १. शास्त्रीय संगीत बनाम लोकगीत: मौलिक तुलना डॉ. उपाध्याय के अनुसार लोकगीत अपनी सरलता, लोच और लोकप्रियता के कारण शास्त्रीय संगीत से सर्वथा भिन्न हैं: 🎻 शास्त्रीय संगीत (Classical Music) • कठोर साधना एवं रियाज़: वर्षों के गुरु-शिष्य अभ्यास और कठिन स्वर-साधना की आवश्यकता। • नियमों एवं रागों का बंधन: निश्चित राग (भैरवी, दरबारी आदि) और ताल की कठोर सीमा। • जटिल एवं विशिष्ट वाद्य-यंत्र: सितार, सरोद, तानपूरा, तबला जैसे विशिष्ट वाद्यों की अनिवार्यता। • सीमित एवं अभिजात्य श्रोता: दरबारों, सभागारों और संगीत मर्मज्ञों तक मुख्य रूप से सीमित। 🥁 लोकगीत (Folk Songs — जनसाधारण का गान) • सहज स्फूर्ति एवं बिना साधना के: किसी औपचारिक रियाज़ की जरूरत नहीं; हृदय से स्वतः फूटते हैं। • नियमों से मुक्त, जन-जीवन से जुड़े: खेत-खलिहान, ऋतुओं और संस्कारों के उल्लास में सहज गायन। • सरल एवं सुलभ देशी वाद्य: ढोलक, झाँझ, करताल, एकतारा, बाँसुरी या मात्र ताली की थाप। • जनसाधारण का सामूहिक आनंद: गाँव, देहात और आम जनता की सामूहिक भागीदारी व उमंग। २. भारत के प्रमुख क्षेत्रीय लोकगीत एवं उनकी शैलियाँ भारत के विभिन्न अंचलों में गूँजने वाले लोकगीतों का समृद्ध सांस्कृतिक परिदृश्य: 🌾 भोजपुरी अंचल (पूर्वी UP व बिहार) • विदेशिया, कजरी, चैता, सोहर भिखारी ठाकुर के 'विदेशिया' गीतों में परदेस गए पति के विरह व करुणा का अत्यंत मार्मिक चित्रण है। ⚔️ बुंदेलखंड (वीर रस के आल्हा) • आल्हा-ऊदल के वीर गाथा गीत जगनिक के 'आल्हा खंड' पर आधारित; युद्ध के मैदान और वीरता का ऐसा वर्णन कि सुनते ही भुजाएँ फड़क उठें। 🏜️ राजस्थान (मरुभूमि की मधुर तान) • ढोला-मारू, पणिहारी, मूमल रेगिस्तान के खुले विस्तार में प्रेम, त्याग और शौर्य की गाथाएँ सारंगी और रावणहत्था पर गाई जाती हैं। 🌾 पंजाब (उमंग व रोमांस के गीत) • माहिया, हीर-राँझा, सोहनी-महिवाल पंजाब के भांगड़ा और गिद्दा के साथ गाए जाने वाले जोशीले और प्रेम-रस से सराबोर लोकप्रिय लोकगीत। ⛰️ पहाड़ी अंचल (गढ़वाल, कांगड़ा) • चंबा गीत, पहाड़ी राग 'ओ चंबा कितणी दूर...' जैसे विख्यात गीत। पहाड़ों की अपनी विशिष्ट धुन होती है जिसे 'पहाड़ी' कहा जाता है। 🌿 आदिवासी गान (संथाल, मुंडा, भील) • सामूहिक गान व वृत्ताकार नृत्य मध्य प्रदेश, छोटानागपुर के वनों में २०-३० स्त्री-पुरुष दलों में बँटकर एक-दूसरे को जवाब देते हुए गाते हैं। ३. स्त्रियों के लोकगीत एवं प्रमुख जीवन-संस्कार लोकगीतों का एक बहुत बड़ा भाग स्त्रियों द्वारा रचा और गाया जाता है; महाकवि कालिदास ने भी इनका उल्लेख किया है: 👶 १. जन्म एवं सोहर (Childbirth & Sohar) संतान के जन्म पर सोहर और बधाई गीत गाए जाते हैं, जिनमें नवजात के दीर्घायु होने और माता की ममता की स्तुति होती है। 💍 २. विवाह एवं विदाई (Wedding & Banna-Banni) विवाह के अवसर पर मटकोड़, भात, बन्ना-बन्नी, समधी की हँसी-ठिठोली (गालियाँ) और विदाई के कारुणिक आँसुओं के गीत गाए जाते हैं। 🌧️ ३. ऋतु एवं पर्व गीत (Season & Festival Songs) सावन के झूले, तीज, कजरी और फागुन की होली के रसिया गीत। प्रकृति के खिलने और वर्षा की फुहारों के साथ स्त्रियों का उल्लास गूँजता है। 👥 ४. सामूहिक गायन शैली (Chorus Singing) स्त्रियाँ प्रायः अकेले नहीं गातीं, बल्कि दल बाँधकर गाती हैं। अनेक कंठों का एक साथ उठना लोकगीतों को अपार शक्ति व आकर्षण देता है। ४. देशी वाद्य-यंत्र, भाषा-माधुर्य एवं परीक्षा सफलता सूत्र लोकगीतों की वाद्य परंपरा, क्षेत्रीय बोलियों का प्रभाव और परीक्षा हेतु आवश्यक बिंदु: 🪘 प्रमुख देशी वाद्य-यंत्र • ढोलक (मुख्य वाद्य): गाँवों में स्त्रियों का सबसे प्रिय वाद्य। • झाँझ एवं मंजीरा: लय और ताल को गति देने वाले धातु-वाद्य। • करताल, एकतारा व बाँसुरी: भजन, आल्हा और बिरहा में प्रयुक्त। विशेष: मात्र ताली बजाकर भी गायन संभव! 🗣️ क्षेत्रीय बोलियों का माधुर्य • अपनी बोली का रस: भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रज, बुंदेली, मारवाड़ी, मालवी आदि में रचना। • सीधे दिल तक पहुँच: श्रोता बिना किसी शब्दकोश के अर्थ समझकर आनंद में झूम उठता है। लोकगीत = माटी की अमर सुगंध 🎯 परीक्षा सफलता सूत्र • विदेशिया के रचयिता: भिखारी ठाकुर (भोजपुरी के शेक्सपियर)। • आल्हा का मूल आधार: कवि जगनिक का 'आल्हा खंड'। • कालिदास का साक्ष्य: ऋतु-गीतों में स्त्रियों के गान की प्रशंसा। ⭐ १००% अंक हेतु पूर्ण प्रामाणिक नोट्स!

१. डॉ. भगवतशरण उपाध्याय: लोक-संस्कृति के प्रामाणिक चितेरे

हिंदी साहित्य में डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का नाम एक ऐसे मूर्धन्य विद्वान के रूप में आदर से लिया जाता है जिन्होंने इतिहास, पुरातत्त्व और ललित साहित्य के बीच के सेतु का निर्माण किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि किसी भी देश का वास्तविक इतिहास केवल राजाओं के युद्धों और राजमहलों की गाथाओं में नहीं, बल्कि वहाँ की आम जनता के गीतों, नृत्यों, रीति-रिवाजों और लोक-परंपराओं में जीवित रहता है।

🏛️ जन्म एवं ऐतिहासिक दृष्टि

डॉ. उपाध्याय का जन्म १९१० में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के उजियारपुर गाँव में हुआ था। ग्रामीण परिवेश और स्वतंत्रता सेनानियों की उर्वर भूमि बलिया ने उन्हें लोक-जीवन की जीवंत धड़कन और राष्ट्रीय स्वाभिमान की गहरी समझ दी।

📚 प्रमुख कृतियाँ एवं शोध

उनकी प्रमुख रचनाओं में 'कालिदास का भारत', 'खून के छींटे', 'इतिहास के पन्नों पर', 'सांस्कृतिक निबंध' और 'प्राचीन भारत के इतिहास के आलोक-स्तंभ' अत्यंत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों के आधार पर भारतीय जन-जीवन का यथार्थवादी खाका खींचा।

✍️ भाषा एवं निबंध-शैली

उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी अत्यंत प्रवाहमयी, चित्रात्मक और जन-सुलभ है। वे अमूर्त सांस्कृतिक अवधारणाओं को सुंदर उदाहरणों, मुहावरों और सजीव रूपकों के माध्यम से अत्यंत सरल बनाकर प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त हैं।

🎼 'लोकगीत' निबंध का केंद्रीय भाव-प्रवेश

'लोक' शब्द का अर्थ है—समस्त जनसाधारण, आम जनता या समाज की मूल धारा। अतः लोकगीत वे गीत हैं जो किसी व्यक्ति विशेष की बौद्धिक रचना न होकर पूरे समाज की सामूहिक अभिव्यक्ति होते हैं। ये गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा (Oral Tradition) द्वारा एक कंठ से दूसरे कंठ तक जीवित रहते आए हैं। इनमें किसी बनावट, आडंबर या तकनीकी जटिलता का कोई स्थान नहीं होता।

"लोकगीत हमारी माटी की वह अमर खुशबू हैं जो कभी पुरानी नहीं होती। जब तक खेतों में फसलें लहलहाती रहेंगी, जब तक नदियों में जल बहता रहेगा और जब तक आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूँजती रहेंगी, तब तक लोकगीतों का उल्लास भारतीय जीवन को स्पंदित करता रहेगा।"

शास्त्रीय संगीत बनाम लोकगीत: साधना, नियम, वाद्य-यंत्र एवं श्रोता-वर्ग की तुलना

२. शास्त्रीय संगीत और लोकगीत: दो समानांतर संगीत धाराएँ

डॉ. भगवतशरण उपाध्याय ने निबंध के आरंभ में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकगीत को शास्त्रीय संगीत की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। दोनों की प्रकृति, उद्देश्य, तकनीक और श्रोता-वर्ग में मौलिक भिन्नता है।

📊 शास्त्रीय संगीत और लोकगीत की चार-स्तंभीय तुलना सारणी

तुलना का आधार शास्त्रीय संगीत (Classical Music) लोकगीत (Folk Music / Songs)
१. साधना एवं अभ्यास कठोर साधना, गुरु-शिष्य परंपरा और वर्षों के अनवरत रियाज़ की अनिवार्यता। किसी औपचारिक साधना या रियाज़ की आवश्यकता नहीं; हृदय से स्वतः स्फूर्त।
२. नियम एवं अनुशासन निश्चित राग, वादी-संवादी स्वर, आरोह-अवरोह और कठोर तालों का कड़ा बंधन। नियमों के बंधन से पूरी तरह मुक्त; लयात्मक लोच (flexibility) और सहजता।
३. वाद्य-यंत्रों की प्रकृति सितार, सरोद, तानपूरा, तबला, पखावज जैसे परिष्कृत और महंगे वाद्य। ढोलक, झाँझ, मंजीरा, करताल, एकतारा, बाँसुरी अथवा केवल ताली की थाप।
४. भाषा एवं संप्रेषण संस्कृत या साहित्यिक ब्रज/अवधी; समझने के लिए संगीत-ज्ञान आवश्यक। स्थानीय क्षेत्रीय बोलियाँ (Dialects); सीधे आम जनता के दिल को छूती हैं।
५. श्रोता एवं विस्तार राजदरबारों, संगीत-सभागारों और विशिष्ट कला-प्रेमियों तक सीमित। गाँव, चौपाल, खेत-खलिहान और करोड़ों जनसाधारण का सामूहिक उत्सव।

💡 लोकगीत की 'लोच' (Flexibility) का वास्तविक अर्थ

पाठ में लेखक ने लोकगीत की सबसे बड़ी शक्ति 'लोच' को बताया है। 'लोच' का अर्थ है लचीलापन—अर्थात् परिस्थिति, अवसर और गायक की सुविधानुसार गीत के शब्दों, ताल या लय में फेरबदल करने की स्वतंत्रता। शास्त्रीय संगीत में ऐसा परिवर्तन 'दोष' माना जाता है, किंतु लोकगीत में यही लचीलापन उसे जीवित और हर पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बनाए रखता है।

भारत की लोक-विविधता: भोजपुरी (विदेशिया, कजरी) एवं बुंदेलखंड के वीर रस का 'आल्हा'

३. भोजपुरी का 'विदेशिया' एवं बुंदेलखंड का 'आल्हा'

हिंदी प्रदेशों में दो ऐसी लोक-शैलियाँ हैं जिन्होंने जन-मानस पर अमिट छाप छोड़ी है—एक है भोजपुरी अंचल का करुण रस से भीगा 'विदेशिया' और दूसरा है बुंदेलखंड का वीर रस से दहकता 'आल्हा'।

🌾 भोजपुरी का 'विदेशिया' एवं भिखारी ठाकुर का अमर योगदान

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बीसवीं शताब्दी में विदेशिया गीतों की जो लहर उठी, उसने लाखों श्रोताओं को रुला दिया। इसके सबसे बड़े सर्जक भिखारी ठाकुर थे, जिन्हें जनसाधारण 'भोजपुरी का शेक्सपियर' कहता है।

विदेशिया का मूल विषय (The Theme of Migration & Pathos):

गाँव के गरीब नवयुवक रोजी-रोटी कमाने के लिए सुदूर शहरों (कलकत्ता, बर्मा आदि) चले जाते हैं। पीछे गाँव में उनकी विरहिणी पत्नी, वृद्ध माता-पिता और सूना घर छूट जाता है। विदेशिया गीतों में परदेसी पति के लौटने की प्रतीक्षा, विरह की तड़प, पारिवारिक पीड़ा और गरीबी का ऐसा कारुणिक क्रंदन होता है कि कठोर से कठोर हृदय भी पिघल जाता है।

⚔️ बुंदेलखंड का 'आल्हा': शौर्य एवं राष्ट्रीय पराक्रम की हुंकार

यदि विदेशिया करुणा का सागर है, तो बुंदेलखंड का 'आल्हा' शौर्य, वीरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान की ज्वाला है। यह मध्यकालीन कवि जगनिक द्वारा रचित महाकाव्य 'आल्हा-खंड' (परमाल रासो) पर आधारित है।

आल्हा गायन की अनूठी विशेषताएँ:
  • नायकों का शौर्य: महोबा के दो वीर चंदेल भाइयों—आल्हा और ऊदल के ५२ भीषण युद्धों का ओजस्वी वर्णन।
  • ओजपूर्ण गायन शैली: ढोलक की तीव्र थाप पर ऊँचे तार-सप्तक में जब गायक गाता है, तो श्रोताओं में रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
  • बरसात की रातों का सम्मोहन: वर्षा ऋतु में बुंदेलखंड के गाँवों में आल्हा सुनने के लिए दूर-दूर से सैकड़ों ग्रामीण जुटते हैं।

पहाड़ी, रेगिस्तानी एवं आदिवासी लोकगीत: राजस्थान, पंजाब, कांगड़ा एवं छोटानागपुर

४. भारत की भौगोलिक विविधता में गूँजते लोक-स्वर

भारत की भौगोलिक बनावट जितनी विविध है, उसके लोकगीत भी उतने ही बहुरंगी हैं। पहाड़ों की शांत वादियों से लेकर राजस्थान के तपते धोरों और छोटानागपुर के घने जंगलों तक, हर भूभाग का अपना अनूठा संगीत है।

⛰️ १. पहाड़ी अंचल के गीत

गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल के कांगड़ा अंचल के लोकगीतों की अपनी अलग धुन होती है जिसे संगीत में 'पहाड़ी' राग कहा जाता है। 'ओ चंबा कितणी दूर...' जैसे गीतों में पहाड़ों की दुर्गमता, विरह और निर्मल प्रकृति का ऐसा जादू होता है कि मन अनायास ही शांत हो जाता है।

🏜️ २. राजस्थान का 'ढोला-मारू'

राजस्थान में 'ढोला-मारू' के गीत अत्यंत चाव से गाए जाते हैं। रेगिस्तान के सूने विस्तार में प्रेम, वियोग और त्याग की यह अमर गाथा जब स्थानीय वाद्यों पर गूँजती है, तो मरुभूमि का कण-कण संगीतमय हो उठता है।

🌾 ३. पंजाब के 'माहिया' व 'हीर'

पंजाब में हीर-राँझा और सोहनी-महिवाल के प्रेम-आख्यानों पर आधारित लोकगीत तथा 'माहिया' अत्यंत लोकप्रिय हैं। इन गीतों में पंजाब की उर्वर मिट्टी का उल्लास, मस्ती और खुलापन झलकता है।

🌿 आदिवासियों के सामूहिक गान-नृत्य: सामूहिक चेतना का अद्भुत पर्व

मध्य प्रदेश, दक्कन और छोटानागपुर के वनों में रहने वाली गोंड, भील, संथाल, मुंडा और कोल जनजातियों के लोकगीत अपनी प्राचीनता और सामूहिक स्वरूप के लिए अद्वितीय हैं:

  • दलों में गायन: पुरुष और स्त्रियाँ बीस-तीस के समूहों में आमने-सामने खड़े होकर वृत्ताकार घेरा बनाते हैं।
  • सवाल-जवाब की पद्धति: एक दल गीत के माध्यम से सवाल पूछता है और दूसरा दल अपने सुर में उसका जवाब देता है।
  • मांदर और ढोल की थाप: रात के सन्नाटे में जब मांदर गूँजता है, तो पूरा जंगल और पहाड़ियाँ संगीतमय हो उठती हैं।

स्त्रियों का लोकगीतों में वर्चस्व: संस्कार, त्योहार एवं सामूहिक गायन की परंपरा

५. स्त्रियों का लोक-संगीत: संस्कारों और उत्सवों का प्राण

डॉ. भगवतशरण उपाध्याय रेखांकित करते हैं कि भारत में लोकगीतों का अधिकांश भाग विशेष रूप से स्त्रियों द्वारा रचा और संरक्षित किया गया है। स्त्रियों के गीतों की कोमलता, माधुर्य और पारिवारिक संदर्भ उन्हें शास्त्रीय संगीत से भी अधिक प्रिय बनाते हैं।

🌸 जीवन-संस्कारों के अनुसार स्त्रियों के प्रमुख लोकगीत

संस्कार / अवसर गीत का प्रकार भाव एवं विषय-वस्तु
संतान का जन्म सोहर, बधाई, जच्चा गीत नवजात शिशु के आगमन का उल्लास, माता की ममता व मंगल-कामना।
विवाह के चरण मटकोड़, भात, हल्दी, बन्ना-बन्नी वर-वधू के रूप-सौंदर्य की प्रशंसा और मंगल-विधान।
बारात का स्वागत गालियाँ (हँसी-ठिठोली के गीत) समधी और संबंधियों पर मीठे और चुटीले व्यंग्य, जिससे उत्सव जीवंत हो उठे।
कन्या की विदाई विदाई गीत (बाबुल की दुआएँ) मायका छूटने का कारुणिक वियोग, जो उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें नम कर दे।
सावन एवं तीज कजरी, हिंडोला (झूला) गीत वर्षा की बूँदों के साथ सखियों का झूला झूलना और सुहाग की कामना।

📜 महाकवि कालिदास का ऐतिहासिक साक्ष्य:

डॉ. उपाध्याय उल्लेख करते हैं कि प्राचीन भारत के महान संस्कृत कवि कालिदास ने भी अपने ग्रंथों में यह स्वीकार किया है कि उनके समय में भी नगरों और गाँवों की स्त्रियाँ ऋतु-गीत और विवाह-गीत गाया करती थीं। इससे सिद्ध होता है कि भारत की लोकगीत परंपरा सहस्रों वर्षों से अक्षुण्ण रूप से प्रवाहित हो रही है।

पारंपरिक देशी वाद्य-यंत्र एवं संगीतात्मक संरचना (ढोलक, मंजीरा, बाँसुरी व ताली)

६. लोकगीतों के वाद्य-यंत्र: सादगी में छिपा अमर संगीत

लोकगीतों की सबसे बड़ी सुंदरता यह है कि वे किसी महंगे, नाजुक या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के मोहताज नहीं होते। भारत के लोक-वाद्यों का निर्माण मिट्टी, लकड़ी, चमड़े और सामान्य धातुओं से स्थानीय स्तर पर किया जाता है।

🪘 १. ढोलक (The Heartbeat of Folk)

गाँवों में स्त्रियों का सबसे प्रमुख वाद्य ढोलक है। इसके दोनों ओर चमड़े की खाल मढ़ी होती है। एक ओर थाप और दूसरी ओर गूँज उत्पन्न होती है। ढोलक की लय पर स्त्रियाँ घंटों तक थके बिना गाती और थिरकती रहती हैं।

🔔 २. झाँझ, मंजीरा व करताल

काँसे और पीतल की बनी छोटी-छोटी कटोरियाँ (मंजीरा) जब आपस में टकराती हैं, तो एक मधुर खनकती हुई ताल उत्पन्न होती है। भजन, कीर्तन और आल्हा गायन में मंजीरे और करताल की गति गीत को तीव्र ऊर्जा प्रदान करती है।

🪕 ३. एकतारा एवं बाँसुरी

बाँस और तुम्बे से बना एक तार वाला 'एकतारा' संतों, जोगियों और लोक-गायकों का प्रिय वाद्य है। इसी प्रकार बाँस से बनी सरल बाँसुरी खेतों और चारागाहों में चरवाहों द्वारा बजाई जाती है जो दूर तक गूँजती है।

👏 ताली की थाप: प्रकृति का आदिम वाद्य

यदि किसी अवसर पर कोई भी वाद्य उपलब्ध न हो, तो ग्रामीण महिलाएँ और पुरुष केवल अपनी दोनों हथेलियों को मिलाकर ताली बजाते हैं और पैरों से जमीन पर थाप देते हैं। यह ताल शास्त्रीय तबले से भी अधिक उन्मुक्त और संक्रामक होती है जो हर किसी को अपने में समेट लेती है।

भाषा की बात, व्याकरणिक संरचना एवं लोकगीतों का समकालीन संरक्षण

७. 'भाषा की बात' — व्याकरण, शब्द-साधना एवं संरक्षण

पाठ 'लोकगीत' में भाषा और व्याकरण के अनेक महत्वपूर्ण आयाम उभरते हैं, जो विद्यार्थियों के भाषिक कौशल का परिष्कार करते हैं:

🧩 १. समास-विग्रह एवं शब्द-रचना

  • लोकगीत: लोक का गीत (संबंध तत्पुरुष समास)।
  • जन-जीवन: जन का जीवन (संबंध तत्पुरुष समास)।
  • ऋतु-गीत: ऋतु के गीत (संबंध तत्पुरुष समास)।
  • स्त्री-पुरुष: स्त्री और पुरुष (द्वंद्व समास)।

🗣️ २. पाठ में प्रयुक्त विशिष्ट मुहावरे

  • रंग जमना: वातावरण अत्यंत आनंदमय और प्रभावी हो जाना।
  • जान फूँकना: किसी नीरस वस्तु में नई स्फूर्ति व प्राण भर देना।
  • सीधे दिल को छूना: अत्यंत भावुक और गहरा प्रभाव छोड़ना।
  • हाथ बँटाना: किसी कार्य में सहयोग या मदद करना।

🏛️ ३. लोकगीतों का आधुनिक पुनरुत्थान

आधुनिक युग में जब संगीत के पाश्चात्यीकरण का संकट गहराया, तो संगीत नाटक अकादमी, विश्वविद्यालयों और लोक-कला संरक्षण केंद्रों ने इन दुर्लभ गीतों को रिकॉर्ड करके सुरक्षित किया। आज इंटरनेट मीडिया के युग में भी लोकगीत नए रूपों में लाखों युवाओं को अपनी माटी से जोड़ रहे हैं।

💡 परीक्षा हेतु मुख्य सारांश:

लोकगीत किसी समाज की आत्मा की पहचान होते हैं। जब विद्यार्थी इस पाठ को पढ़ते हैं, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति उसके राजमहलों में नहीं, बल्कि उसके चौपालों और खेतों में गाए जाने वाले लोकगीतों में सुरक्षित है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
लोकगीत किसे कहते हैं और इन्हें गाने के लिए किन प्रमुख वाद्य-यंत्रों की आवश्यकता होती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
लोकगीत: लोकगीत वे गीत हैं जो किसी शास्त्रीय नियम या कठोर साधना में बँधे बिना आम जनता (घर, गाँव और नगर) के सुख-दुख, त्योहारों और जीवन-संस्कारों से स्वतः स्फूर्त होते हैं। ये जनसाधारण की सामूहिक अभिव्यक्ति हैं।

प्रमुख वाद्य-यंत्र: लोकगीतों को गाने के लिए किसी महंगे वाद्य की आवश्यकता नहीं होती। ये मुख्यतः ढोलक, झाँझ, मंजीरा, करताल, एकतारा, बाँसुरी अथवा केवल हाथों की ताली की थाप पर गाए जाते हैं।

उदाहरण 2
शास्त्रीय संगीत और लोकगीत में कोई तीन प्रमुख अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
शास्त्रीय संगीत और लोकगीत के मध्य तीन प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं:

आधार शास्त्रीय संगीत लोकगीत
१. साधना वर्षों के कठोर अभ्यास और रियाज़ की आवश्यकता होती है। किसी औपचारिक साधना के बिना सीधे हृदय से फूटते हैं।
२. नियम कठोर रागों, सुरों और तालों के कड़े नियमों में बँधा होता है। नियमों से मुक्त, अत्यंत लचीला (लोचदार) और सहज होता है।
३. वाद्य व भाषा सितार, तबला जैसे परिष्कृत वाद्य व साहित्यिक भाषा। साधारण ढोलक, मंजीरा व स्थानीय क्षेत्रीय बोलियाँ।
उदाहरण 3
भोजपुरी अंचल के 'विदेशिया' गीतों की अपार लोकप्रियता का क्या कारण है? इसके प्रमुख रचयिता कौन थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
भोजपुरी अंचल में 'विदेशिया' गीतों के प्रमुख और सबसे लोकप्रिय रचयिता भिखारी ठाकुर थे, जिन्हें जनसाधारण 'भोजपुरी का शेक्सपियर' भी कहता है।

विदेशिया की अपार लोकप्रियता के मुख्य कारण:

  • सच्चा सामाजिक यथार्थ: गाँव के निर्धन नवयुवक आजीविका के लिए सुदूर शहरों (कलकत्ता आदि) परदेस चले जाते थे। विदेशिया में गाँव में छूटी विरहिणी पत्नी की तड़प, अकेलेपन और प्रतीक्षा का यथार्थ चित्रण है।
  • हृदय-द्रावक करुण रस: इन गीतों में परदेसी प्रेमी के प्रति विरह और विवशता का ऐसा मार्मिक स्वर होता है जो श्रोताओं को आंसुओं से भिगो देता है।
  • घर-घर की अपनी कहानी: चूँकि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लगभग हर परिवार से कोई न कोई परदेस जाता था, अतः यह हर घर की अपनी व्यथा बन गई।
उदाहरण 4
बुंदेलखंड के 'आल्हा' की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। यह किस ग्रंथ पर आधारित है और जन-मानस पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
बुंदेलखंड का 'आल्हा' भारतीय लोक-साहित्य में वीर रस की एक अद्वितीय और अमर गाथा है:

  • मूल ग्रंथ एवं रचयिता: आल्हा मध्यकालीन बुंदेली महाकवि जगनिक द्वारा रचित महाकाव्य 'आल्हा खंड' (परमाल रासो) पर आधारित है।
  • कथावस्तु एवं नायक: इसमें महोबा के चंदेल राजा परमार्दिदेव (परमाल) के दो अत्यंत शूरवीर सेनापतियों—आल्हा और ऊदल के अदम्य साहस, मातृभूमि-प्रेम और ५२ भीषण युद्धों का ओजस्वी वर्णन है।
  • गायन शैली एवं वाद्य: आल्हा गायक ढोलक और झाँझ की तीव्र थाप पर ऊँचे तार-सप्तक में जब ओजपूर्ण स्वर में गाते हैं, तो पूरा वातावरण युद्ध के मैदान जैसा प्रतीत होने लगता है।
  • गायन का समय: विशेष रूप से वर्षा ऋतु (सावन-भादों) की रातों में ग्रामीण चौपालों पर सैकड़ों लोग रात भर जागकर आल्हा सुनते हैं।

जन-मानस पर प्रभाव: आल्हा सुनने से नवयुवकों के रक्त में देशभक्ति और वीरता का संचार होता है, उनकी भुजाएँ फड़कने लगती हैं और कायर भी साहसी बन जाता है।

उदाहरण 5
लोकगीतों के सृजन और संरक्षण में स्त्रियों की क्या भूमिका रही है? विभिन्न संस्कारों और अवसरों पर गाए जाने वाले प्रमुख गीतों का सोदाहरण उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
डॉ. भगवतशरण उपाध्याय के अनुसार, भारत में लोकगीतों का एक विशाल और सर्वाधिक जीवंत भंडार स्त्रियों का है। स्त्रियों ने ही सदियों से इन गीतों को अपनी स्मृति और परंपरा में जीवित रखा है:

१. जन्म-संस्कार के गीत: बच्चे के जन्म पर 'सोहर', 'बधाई' और जच्चा-गीत गाए जाते हैं, जिनमें शिशु के मंगलमय भविष्य और माता की ममता की स्तुति होती है।
२. विवाह एवं पारिवारिक गीत: विवाह के विविध अवसरों पर मटकोड़, भात, हल्दी, बन्ना-बन्नी, समधी के स्वागत में हास्य-व्यंग्य भरी 'गालियाँ' और विदाई के समय करुण अश्रु-गीत गाए जाते हैं।
३. ऋतु एवं पर्व-गीत: सावन के झूले, तीज और कजरी गीत तथा फागुन में होली के रसिया गीत स्त्रियों के कंठ से फूट पड़ते हैं।

विशेषता: स्त्रियाँ प्रायः अकेले नहीं, बल्कि दल बाँधकर गाती हैं। महाकवि कालिदास ने भी अपने काव्यों में स्त्रियों के ऋतु-गायन की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

उदाहरण 6
'लोकगीत' निबंध के आधार पर भारत की लोक-सांस्कृतिक विविधता, जन-जीवन से इसके घनिष्ठ संबंध और आधुनिक युग में इसके संरक्षण की आवश्यकता का सम्यक् मूल्यांकन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
डॉ. भगवतशरण उपाध्याय द्वारा रचित 'लोकगीत' निबंध भारतीय संस्कृति की आत्मा का एक अत्यंत प्रामाणिक और सजीव दस्तावेज है:

१. भारत की अप्रतिम लोक-सांस्कृतिक विविधता:

निबंध भारत के विशाल भूभाग को संगीतमयी एकता में पिरोता है। गढ़वाल और कांगड़ा के शांत 'पहाड़ी' गीत, राजस्थान का मरु-गान 'ढोला-मारू', पंजाब का मस्ती-भरा 'माहिया', बुंदेलखंड का ओजस्वी 'आल्हा', भोजपुरी का विरह-काव्य 'विदेशिया' और छोटानागपुर के वनों में आदिवासियों का सामूहिक गान-नृत्य—ये सभी भारत की सांस्कृतिक बहुरंगता के साक्षात् प्रमाण हैं।

२. जन-जीवन और श्रम से अटूट संबंध:

लोकगीत किसी बंद कमरे या कृत्रिम कल्पना की उपज नहीं हैं। वे खेतों में हल जोतते किसान, धान रोपते मजदूरों, कुएँ से पानी खींचती पनिहारिनों और सुबह चक्की पीसती ग्रामीण माताओं के श्रम की मधुर संजीवनी हैं। संगीत ने भारतीय समाज में शारीरिक थकान को मिटाकर श्रम को उत्सव में रूपांतरित कर दिया है।

३. आधुनिक युग की चुनौतियाँ एवं संरक्षण की अनिवार्यता:

आज के तीव्र औद्योगीकरण, पाश्चात्य पॉप-संगीत और मोबाइल-स्क्रीन के दौर में लोक-कलाओं के विस्मृत होने का खतरा उत्पन्न हुआ है। लेखक आगाह करते हैं कि अपनी लोक-परंपराओं को भूलना अपनी जड़ों को काटना है। अतः विश्वविद्यालयों, शोधकर्ताओं, आकाशवाणी और सोशल मीडिया के माध्यम से इन दुर्लभ क्षेत्रीय बोलियों और लोकगीतों का संकलन व संवर्धन राष्ट्रीय प्राथमिकता होना चाहिए।

निष्कर्ष:

लोकगीत हमारी राष्ट्रीय चेतना की अमर धरोहर हैं। वे बताते हैं कि भारत की वास्तविक आत्मा उसकी माटी, उसकी बोलियों और उसके लोक-संगीत में स्पंदित होती है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह सर्वथा भ्रामक धारणा है। लोकगीत भारतीय संस्कृति, इतिहास, लोक-मन और मानवीय संवेदनाओं का अमूल्य भंडार हैं। स्वयं महाकवि कालिदास ने अपने काव्यों में इनकी प्रशंसा की है और गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने इन्हें जीवित कविता माना है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

लोकगीतों के लिए किसी औपचारिक साधना, कठिन रियाज़ या गुरु-दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती। ये साधारण देशी वाद्यों जैसे ढोलक, झाँझ, मंजीरा, बाँसुरी अथवा केवल हाथों की ताली की थाप पर हृदय से स्वतः स्फूर्त होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

लोक-परंपरा में ये 'गालियाँ' वर-पक्ष, समधी और बारातियों से की जाने वाली अत्यंत मीठी, स्नेहिल और हास्य-व्यंग्य भरी हँसी-ठिठोली के मांगलिक गीत होते हैं। इनसे कोई बुरा नहीं मानता, बल्कि उत्सव का वातावरण अत्यंत आनंदमय हो जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

'आल्हा' बुंदेलखंड का वीर रस प्रधान काव्य है जो कवि जगनिक के 'आल्हा खंड' पर आधारित है; जबकि 'विदेशिया' भोजपुरी अंचल (बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश) का विरह-गीत है जिसके प्रसिद्ध रचयिता भिखारी ठाकुर हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

लोकगीत मूलतः सामूहिक गान (Chorus/Group singing) हैं। विशेषकर स्त्रियाँ और आदिवासी समुदाय दल बाँधकर गाते हैं। यद्यपि सबके सुर एक समान नहीं होते, फिर भी अनेक कंठों का एक साथ उठना ही इसकी असली शक्ति है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सही वैज्ञानिक तथ्य

'लोकगीत' का सही समास-विग्रह 'लोक का गीत' (जनसाधारण का गीत) है। उत्तर पद प्रधान होने और संबंध कारक विभक्ति 'का' का लोप होने के कारण यह 'संबंध तत्पुरुष समास' (षष्ठी तत्पुरुष) है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

CISCE CLASS 6 • HINDI VASANT • CHAPTER 12 लोकगीत (निबंध) लेखक: डॉ. भगवतशरण उपाध्याय (संस्कृति एवं पुरातत्त्ववेत्ता) 🎶 पाठ का मूल सार (Essence of the Essay): लोकगीत हमारी माटी, जन-संस्कृति, खेतों और ग्रामीण जीवन की साक्षात् धड़कन हैं। ये शास्त्रीय संगीत की भाँति नियमों, रियाज़ और जटिल तालों में बँधे नहीं होते, बल्कि जनता के सुख-दुख, त्योहारों, संस्कारों और ऋतु-परिवर्तनों से स्वतः फूट पड़ते हैं। ढोलक, झाँझ, मंजीरा और बाँसुरी की सहज थाप पर गूँजने वाले ये गीत सीधे हृदय को छूकर असीम उल्लास भर देते हैं। विधा: सांस्कृतिक निबंध • मुख्य स्वर: भारतीय लोक-संस्कृति की विविधता • वाद्य: ढोलक, मंजीरा, बाँसुरी १. शास्त्रीय संगीत बनाम लोकगीत: मौलिक तुलना डॉ. उपाध्याय के अनुसार लोकगीत अपनी सरलता, लोच और लोकप्रियता के कारण शास्त्रीय संगीत से सर्वथा भिन्न हैं: 🎻 शास्त्रीय संगीत (Classical Music) • कठोर साधना एवं रियाज़: वर्षों के गुरु-शिष्य अभ्यास और कठिन स्वर-साधना की आवश्यकता। • नियमों एवं रागों का बंधन: निश्चित राग (भैरवी, दरबारी आदि) और ताल की कठोर सीमा। • जटिल एवं विशिष्ट वाद्य-यंत्र: सितार, सरोद, तानपूरा, तबला जैसे विशिष्ट वाद्यों की अनिवार्यता। • सीमित एवं अभिजात्य श्रोता: दरबारों, सभागारों और संगीत मर्मज्ञों तक मुख्य रूप से सीमित। 🥁 लोकगीत (Folk Songs — जनसाधारण का गान) • सहज स्फूर्ति एवं बिना साधना के: किसी औपचारिक रियाज़ की जरूरत नहीं; हृदय से स्वतः फूटते हैं। • नियमों से मुक्त, जन-जीवन से जुड़े: खेत-खलिहान, ऋतुओं और संस्कारों के उल्लास में सहज गायन। • सरल एवं सुलभ देशी वाद्य: ढोलक, झाँझ, करताल, एकतारा, बाँसुरी या मात्र ताली की थाप। • जनसाधारण का सामूहिक आनंद: गाँव, देहात और आम जनता की सामूहिक भागीदारी व उमंग। २. भारत के प्रमुख क्षेत्रीय लोकगीत एवं उनकी शैलियाँ भारत के विभिन्न अंचलों में गूँजने वाले लोकगीतों का समृद्ध सांस्कृतिक परिदृश्य: 🌾 भोजपुरी अंचल (पूर्वी UP व बिहार) • विदेशिया, कजरी, चैता, सोहर भिखारी ठाकुर के 'विदेशिया' गीतों में परदेस गए पति के विरह व करुणा का अत्यंत मार्मिक चित्रण है। ⚔️ बुंदेलखंड (वीर रस के आल्हा) • आल्हा-ऊदल के वीर गाथा गीत जगनिक के 'आल्हा खंड' पर आधारित; युद्ध के मैदान और वीरता का ऐसा वर्णन कि सुनते ही भुजाएँ फड़क उठें। 🏜️ राजस्थान (मरुभूमि की मधुर तान) • ढोला-मारू, पणिहारी, मूमल रेगिस्तान के खुले विस्तार में प्रेम, त्याग और शौर्य की गाथाएँ सारंगी और रावणहत्था पर गाई जाती हैं। 🌾 पंजाब (उमंग व रोमांस के गीत) • माहिया, हीर-राँझा, सोहनी-महिवाल पंजाब के भांगड़ा और गिद्दा के साथ गाए जाने वाले जोशीले और प्रेम-रस से सराबोर लोकप्रिय लोकगीत। ⛰️ पहाड़ी अंचल (गढ़वाल, कांगड़ा) • चंबा गीत, पहाड़ी राग 'ओ चंबा कितणी दूर...' जैसे विख्यात गीत। पहाड़ों की अपनी विशिष्ट धुन होती है जिसे 'पहाड़ी' कहा जाता है। 🌿 आदिवासी गान (संथाल, मुंडा, भील) • सामूहिक गान व वृत्ताकार नृत्य मध्य प्रदेश, छोटानागपुर के वनों में २०-३० स्त्री-पुरुष दलों में बँटकर एक-दूसरे को जवाब देते हुए गाते हैं। ३. स्त्रियों के लोकगीत एवं प्रमुख जीवन-संस्कार लोकगीतों का एक बहुत बड़ा भाग स्त्रियों द्वारा रचा और गाया जाता है; महाकवि कालिदास ने भी इनका उल्लेख किया है: 👶 १. जन्म एवं सोहर (Childbirth & Sohar) संतान के जन्म पर सोहर और बधाई गीत गाए जाते हैं, जिनमें नवजात के दीर्घायु होने और माता की ममता की स्तुति होती है। 💍 २. विवाह एवं विदाई (Wedding & Banna-Banni) विवाह के अवसर पर मटकोड़, भात, बन्ना-बन्नी, समधी की हँसी-ठिठोली (गालियाँ) और विदाई के कारुणिक आँसुओं के गीत गाए जाते हैं। 🌧️ ३. ऋतु एवं पर्व गीत (Season & Festival Songs) सावन के झूले, तीज, कजरी और फागुन की होली के रसिया गीत। प्रकृति के खिलने और वर्षा की फुहारों के साथ स्त्रियों का उल्लास गूँजता है। 👥 ४. सामूहिक गायन शैली (Chorus Singing) स्त्रियाँ प्रायः अकेले नहीं गातीं, बल्कि दल बाँधकर गाती हैं। अनेक कंठों का एक साथ उठना लोकगीतों को अपार शक्ति व आकर्षण देता है। ४. देशी वाद्य-यंत्र, भाषा-माधुर्य एवं परीक्षा सफलता सूत्र लोकगीतों की वाद्य परंपरा, क्षेत्रीय बोलियों का प्रभाव और परीक्षा हेतु आवश्यक बिंदु: 🪘 प्रमुख देशी वाद्य-यंत्र • ढोलक (मुख्य वाद्य): गाँवों में स्त्रियों का सबसे प्रिय वाद्य। • झाँझ एवं मंजीरा: लय और ताल को गति देने वाले धातु-वाद्य। • करताल, एकतारा व बाँसुरी: भजन, आल्हा और बिरहा में प्रयुक्त। विशेष: मात्र ताली बजाकर भी गायन संभव! 🗣️ क्षेत्रीय बोलियों का माधुर्य • अपनी बोली का रस: भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रज, बुंदेली, मारवाड़ी, मालवी आदि में रचना। • सीधे दिल तक पहुँच: श्रोता बिना किसी शब्दकोश के अर्थ समझकर आनंद में झूम उठता है। लोकगीत = माटी की अमर सुगंध 🎯 परीक्षा सफलता सूत्र • विदेशिया के रचयिता: भिखारी ठाकुर (भोजपुरी के शेक्सपियर)। • आल्हा का मूल आधार: कवि जगनिक का 'आल्हा खंड'। • कालिदास का साक्ष्य: ऋतु-गीतों में स्त्रियों के गान की प्रशंसा। ⭐ १००% अंक हेतु पूर्ण प्रामाणिक नोट्स!

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
'लोकगीत' निबंध के रचयिता डॉ. भगवतशरण उपाध्याय हैं, जो एक प्रख्यात इतिहासकार, पुरातत्त्ववेत्ता एवं संस्कृति-चिन्तक थे।
मुख्य बिंदु 2
लोकगीत अपनी लोच (लचीलापन), ताजगी और जनसाधारण से सीधे जुड़ाव के कारण शास्त्रीय संगीत से सर्वथा भिन्न और स्वतंत्र हैं।
मुख्य बिंदु 3
शास्त्रीय संगीत के लिए वर्षों के कठोर रियाज़ और रागों के नियमों की आवश्यकता होती है, जबकि लोकगीत बिना किसी साधना के स्वतः फूट पड़ते हैं।
मुख्य बिंदु 4
लोकगीतों को गाने के लिए किसी महंगे वाद्य की आवश्यकता नहीं होती; ये ढोलक, झाँझ, मंजीरा, बाँसुरी या मात्र ताली की थाप पर गाए जाते हैं।
मुख्य बिंदु 5
लोकगीत हमेशा स्थानीय क्षेत्रीय बोलियों (भोजपुरी, ब्रज, अवधी, बुंदेली, मारवाड़ी, पंजाबी आदि) में गाए जाते हैं, जिससे ये सीधे दिल को छूते हैं।
मुख्य बिंदु 6
भोजपुरी अंचल में भिखारी ठाकुर द्वारा रचित 'विदेशिया' गीत परदेस गए पति के विरह और करुण रस के लिए जन-जन में विख्यात हैं।
मुख्य बिंदु 7
बुंदेलखंड में कवि जगनिक के 'आल्हा खंड' पर आधारित 'आल्हा' के वीर रस से भरे गीत वर्षा ऋतु में चौपालों पर गाए जाते हैं।
मुख्य बिंदु 8
राजस्थान में 'ढोला-मारू' के प्रेम-गीत, पंजाब में 'हीर-राँझा' व 'माहिया', तथा गढ़वाल-कांगड़ा में 'पहाड़ी' धुनें अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
मुख्य बिंदु 9
आदिवासी जातियों (संथाल, भील, गोंड, मुंडा) में बीस-तीस स्त्री-पुरुषों के दल आमने-सामने खड़े होकर सवाल-जवाब की शैली में सामूहिक गान करते हैं।
मुख्य बिंदु 10
लोकगीतों का एक बहुत बड़ा भाग स्त्रियों द्वारा जन्म (सोहर), विवाह (बन्ना, गालियाँ), विदाई और सावन (कजरी) के अवसरों पर दल बाँधकर गाया जाता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
शास्त्रीय संगीत और लोकगीत के मध्य के किन्हीं दो प्रमुख अंतरों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: १. शास्त्रीय संगीत के लिए वर्षों के कठोर अभ्यास (रियाज़) और रागों के नियमों की आवश्यकता होती है, जबकि लोकगीत बिना किसी साधना के स्वाभाविक रूप से गाए जाते हैं। २. शास्त्रीय संगीत में सितार, तबला जैसे परिष्कृत वाद्य प्रयुक्त होते हैं, जबकि लोकगीत साधारण ढोलक, मंजीरा या केवल ताली की थाप पर गाए जाते हैं।
साधना/रियाज़ और नियमों के बंधन के आधार पर विचार करें।
2
भोजपुरी अंचल में 'विदेशिया' गीतों के प्रसिद्ध रचयिता कौन थे और इन गीतों का मुख्य विषय क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भोजपुरी अंचल में 'विदेशिया' गीतों के प्रमुख रचयिता भिखारी ठाकुर थे। इन गीतों का मुख्य विषय रोजी-रोटी कमाने परदेस गए पति और गाँव में छूटी पत्नी के विरह, गरीबी, अकेलेपन और करुणा का मार्मिक चित्रण है।
भिखारी ठाकुर और रोजी-रोटी के लिए परदेस गए पति के विरह को याद करें।
3
बुंदेलखंड के 'आल्हा' गीत किस ऐतिहासिक काव्य पर आधारित हैं और यह किस रस का गान है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बुंदेलखंड के आल्हा गीत मध्यकालीन कवि जगनिक द्वारा रचित 'आल्हा खंड' पर आधारित हैं। इसमें महोबा के वीर भाइयों आल्हा और ऊदल के ५२ युद्धों का वर्णन है और यह विशुद्ध वीर रस का ओजस्वी गान है।
कवि जगनिक का 'आल्हा खंड' (परमाल रासो) और महोबा के वीर आल्हा-ऊदल का स्मरण करें।
4
स्त्रियों द्वारा विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले किन्हीं तीन प्रकार के लोकगीतों के नाम लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: १. जन्म के अवसर पर: सोहर और बधाई गीत। २. विवाह के अवसर पर: बन्ना-बन्नी और गालियाँ (हँसी-ठिठोली के गीत)। ३. सावन और तीज के अवसर पर: कजरी और हिंडोला (झूला) गीत।
संतान के जन्म, विवाह और सावन के झूलों से संबंधित गीतों को याद करें।
5
आदिवासी लोकगीतों की गायन शैली की क्या मुख्य विशेषता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: आदिवासी लोकगीत अकेले नहीं, बल्कि बीस-तीस स्त्री-पुरुषों के दलों (समूहों) में गाए जाते हैं। एक दल गीत के रूप में सवाल पूछता है और दूसरा दल अपने सुर में उसका जवाब देता है। यह गायन मांदर और ढोल की थाप पर वृत्ताकार घेरे में होता है।
दलों में बँटना और सवाल-जवाब की पद्धति पर ध्यान दें।
6
'लोकगीत' शब्द का समास-विग्रह करते हुए समास का नाम लिखिए तथा 'रंग जमना' मुहावरे का वाक्य-प्रयोग कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: १. लोकगीत = लोक का गीत (संबंध तत्पुरुष समास)। २. रंग जमना (अर्थ: समाँ बँध जाना / अत्यंत आनंदमय हो जाना): 'होली के उत्सव पर जब ढोलक की थाप के साथ रसिया शुरू हुआ, तो पूरी चौपाल पर रंग जम गया।'
'लोक का गीत' और वातावरण का अत्यंत आनंदमय हो जाना याद करें।
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