ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 3
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
नादान दोस्त (Vasant)
कहानी का परिचय एवं बाल-मनोविज्ञान का सैद्धांतिक आधार:
आईसीएसई / सीआईएससीई कक्षा 6 हिन्दी पाठ्यक्रम के अंतर्गत 'वसंत भाग - 1' का तृतीय अध्याय 'नादान दोस्त' हिन्दी कथा-साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय, कालजयी और शिक्षाप्रद कहानियों में से एक है। इस अमर कहानी के रचयिता हिन्दी और उर्दू के युग-प्रवर्तक साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद (1880–1936) हैं। यह कहानी बाल-मनोविज्ञान (Child Psychology) के अत्यंत सूक्ष्म, संवेदनशील और यथार्थवादी धरातल पर रची गई है। कहानी के मुख्य पात्र दो छोटे भाई-बहन हैं—केशव और उसकी छोटी बहन श्यामा। उनके घर के छज्जे (कार्निस) पर एक चिड़िया ने तीन अंडे दिए हैं। बच्चों के मन में अंडों को लेकर असीम कौतूहल, उत्सुकता और दया का भाव जागता है। वे अपनी नादानी में अंडों की 'रक्षा' करने और उन्हें सुख-सुविधा पहुँचाने की योजना बनाते हैं, परंतु प्रकृति के नियमों और चिड़ियों के व्यवहार से अनभिज्ञ होने के कारण उनका वही प्रयास अंडों के टूटने और नष्ट होने का कारण बन जाता है। इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने यह उद्घाटित किया है कि केवल अच्छी नीयत होना ही पर्याप्त नहीं है; किसी भी कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न करने के लिए सही ज्ञान, परिपक्वता और बड़ों के मार्गदर्शन की अनिवार्य आवश्यकता होती है। यह कहानी बाल-सुलभ भावनाओं, मानवीय करुणा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का अनुपम दस्तावेज है।
कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद: व्यक्तित्व एवं साहित्यिक कृतित्व:
मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही गाँव में एक साधारण डाकमुंशी के परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उन्होंने आरंभ में उर्दू में 'नवाब राय' नाम से लिखना प्रारंभ किया, परंतु बाद में 'प्रेमचंद' के नाम से हिन्दी साहित्य में अमरता प्राप्त की। प्रेमचंद को हिन्दी साहित्य में सर्वसम्मति से 'उपन्यास सम्राट' और 'कहानी सम्राट' की उपाधि से विभूषित किया गया है। उन्होंने साहित्य को दरबारी ऐय्याशी और तिलिस्मी कल्पनाओं के दलदल से निकालकर आम जनता, किसान, मजदूर, दलित, शोषित नारी और मासूम बच्चों के यथार्थ जीवन की समस्याओं से जोड़ा। उनकी भाषा आम बोलचाल की अत्यंत सजीव, मुहावरेदार और प्रवाहमयी हिन्दुस्तानी (हिन्दी-उर्दू मिश्रित) है। प्रेमचंद ने लगभग तीन सौ कहानियाँ लिखीं, जो 'मानसरोवर' शीर्षक से आठ भागों में संकलित हैं। उनके अमर उपन्यासों में 'गोदान', 'गबन', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि', 'सेवासदन', 'निर्मला' और 'प्रेमाश्रम' भारतीय समाज का महाकाव्यात्मक दस्तावेज हैं। बाल-मनोविज्ञान पर आधारित उनकी कहानियों में 'ईदगाह', 'नादान दोस्त' और 'दो बैलों की कथा' विश्व साहित्य की श्रेष्ठतम रचनाओं में गिनी जाती हैं। 'नादान दोस्त' में प्रेमचंद ने बच्चों के आंतरिक संसार, उनके बीच की बातचीत, गुप्त योजनाओं और अपराध-बोध का अत्यंत सजीव और मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है।
कहानी का सांगोपांग कथानक एवं प्रमुख प्रसंग:
प्रस्तुत कहानी को सुगम अध्ययन और परीक्षा-विश्लेषण की दृष्टि से निम्नलिखित पाँच प्रमुख प्रसंगों में विभाजित किया जा सकता है:
कार्निस पर घोंसला एवं बाल-सुलभ जिज्ञासा:
केशव के घर में कार्निस के ठीक ऊपर एक चिड़िया ने अंडे दिए थे। केशव और उसकी बहन श्यामा सवेरे सोकर उठते ही आँखें मलते हुए कार्निस के सामने पहुँच जाते थे। वे वहाँ चिड़िया और चिड़ा दोनों को दाना चुगते या बैठे देखते तो उन्हें अपनी सुध-बुध भी न रहती। यहाँ तक कि उन्हें अपने नाश्ते में दूध और जलेबी खाने का ध्यान भी न रहता था। दोनों के मासूम दिलों में भाँति-भाँति के कौतूहलपूर्ण प्रश्न उठते थे—अंडे कितने बड़े होंगे? किस रंग के होंगे? उनमें से बच्चे कैसे निकलेंगे? बच्चों के पर (पंख) कैसे निकलेंगे? घोंसला कैसा है? परंतु इन प्रश्नों का उत्तर देने वाला घर में कोई नहीं था। अम्मा जी को घर-गृहस्थी के चौके-बर्तन और कामकाज से फुर्सत न थी, और बाबूजी हर समय अपनी पोथियों और किताबों में डूबे रहते थे। अतः दोनों बच्चे आपस में ही सवाल-जवाब करके अपने दिल को तसल्ली दे लिया करते थे। श्यामा भोली थी, वह पूछती—'क्यों भइया, बच्चे फुर्र से उड़ जाएँगे?' और केशव बड़े भाई के सयानेपन और गर्व के साथ कहता—'नहीं री पगली, पहले पर निकलेंगे, बगैर परों के बेचारे कैसे उड़ेंगे!' यह प्रसंग बच्चों की स्वाभाविक जिज्ञासा और कल्पनाशीलता का सजीव परिचय देता है।
अंडों की सुरक्षा एवं गुप्त त्रिसूत्रीय योजना:
तीन-चार दिन बीतने पर बच्चों की उत्सुकता और चिंता चरम पर पहुँच गई। उन्हें लगा कि अंडों से अब बच्चे निकल आए होंगे और बेचारी चिड़िया इतना सारा दाना कहाँ से लाएगी कि सब बच्चों का पेट भर सके! भूखे बच्चे चीं-चीं करके मर जाएँगे। इस करुणापूर्ण कल्पना से दोनों बच्चे सिहर उठे और उन्होंने अंडों की रक्षा की एक गुप्त योजना बनाई। इस योजना के तीन प्रमुख अंग थे:
पहला—भोजन का प्रबंध: श्यामा अपनी माँ की आँख बचाकर घर के मटके से चुपके से थोड़े से कच्चे चावल कटोरी में चुरा लाई ताकि चिड़िया को बच्चों के लिए दाना ढूँढने दूर न जाना पड़े।
दूसरा—पानी का प्रबंध: केशव ने घर में रखी तेल की पुरानी मिट्टी की प्याली को चुपके से पत्थर से रगड़कर साफ धोया और उसमें ताजा पानी भरा।
तीसरा—धूप से बचाव व गद्दी: कार्निस पर तेज धूप आती थी। केशव ने श्यामा से कूड़ा फेंकने वाली पुरानी बाँस की टोकरी मँगवाई। टोकरी के छेद में उसने एक कागज़ का टुकड़ा ठूँस दिया ताकि धूप अंदर न जा सके। साथ ही, अंडों को कठोर तिनकों पर कष्ट में समझकर उन्होंने पुरानी फटी धोती के चिथड़ों की चार तह बनाकर एक मुलायम गद्दी तैयार की। यह सारी योजना अम्मा जी से पूरी तरह गोपनीय रखी गई, क्योंकि उन्हें डर था कि अम्मा को पता चला तो वे बहुत डाँटेंगी और पीटेंगी।
दोपहर का जोखिम भरा उपक्रम और अंडों को छूना:
गर्मी के दिन थे। बाबूजी दफ्तर गए हुए थे और अम्मा जी दोनों बच्चों को सुलाकर कमरे का दरवाजा बंद करके सो गई थीं। जैसे ही अम्मा की आँख लगी, दोनों बच्चे दबे पाँव किवाड़ की सिटकनी खोलकर चुपचाप बाहर निकल आए। अब समस्या यह थी कि कार्निस बहुत ऊँचा था और केशव का हाथ वहाँ तक नहीं पहुँचता था। केशव कमरे से नहाने की लकड़ी की एक छोटी चौकी उठा लाया और उसके ऊपर मेज पर रखने वाला स्टूल रखा। परंतु स्टूल के चारों पावे बराबर न होने के कारण वह हिल रहा था। केशव ने श्यामा को नीचे खड़ा कर स्टूल को दोनों हाथों से कसकर पकड़ने का हुक्म दिया। केशव जब स्टूल पर चढ़ा, तो वह डर से कांप रहा था। जब भी स्टूल तनिक हिलता, केशव नीचे झुककर श्यामा को धीमी आवाज में धमकाता—'अच्छी तरह पकड़, नहीं तो उतरकर बहुत मारूँगा!' परंतु बेचारी श्यामा का ध्यान तो ऊपर कार्निस पर लगा था, उसका हाथ बार-बार ढीला पड़ जाता था।
जैसे ही केशव ने कार्निस पर हाथ रखा, दोनों चिड़ियाँ डरकर फुर्र से उड़ गईं। केशव ने देखा कि कार्निस पर थोड़े से सूखे तिनके बिछे हैं और उन पर तीन मटमैले-सफेद अंडे रखे हैं। केशव ने श्यामा से फटे कपड़े मँगवाए और बड़ी सावधानी से अंडों को उठाकर उस मुलायम गद्दी पर रख दिया। फिर उसने पानी की प्याली और चावल के दाने भी वहीं रख दिए और टोकरी को एक डंडे की टेक से टिकाकर अंडों पर छाया कर दी। श्यामा बार-बार नीचे से गिड़गिड़ाती रही—'भइया, मुझे भी दिखा दो, मैं भी देखूँगी!' परंतु केशव ने डाँटकर कहा—'तू गिर पड़ेगी तो अम्मा जी मेरी चटनी बना डालेंगी। पहले अंडे हिफाजत से रहने दे, जब बच्चे निकलेंगे तब तुझे दिखाऊँगा।' इसके बाद केशव ने सामान समेटा और दोनों बच्चे चुपचाप कमरे में जाकर सो गए।
चरमोत्कर्ष, त्रासदी और टूटे हुए अंडे:
शाम को चार बजे जब श्यामा की नींद खुली, तो किवाड़ खुला पाकर वह सीधे दौड़ती हुई कार्निस के पास पहुँची। उसने ऊपर देखा तो टोकरी नदारद थी। जब उसकी नजर अचानक नीचे ज़मीन पर पड़ी, तो उसके होश उड़ गए। उसने देखा कि तीनों अंडे ज़मीन पर टूटे पड़े हैं और उनमें से चूने जैसा सफेद और पीला तरल पदार्थ बाहर बह रहा है। पानी की प्याली भी एक तरफ टूटी पड़ी है। श्यामा ने उलटे पाँव दौड़कर कमरे में केशव को जगाया—'भइया! चिड़िया के अंडे तो नीचे पड़े हैं, बच्चे फुर्र से उड़ गए!'
केशव घबराकर बाहर दौड़ा। ज़मीन पर टूटे अंडों को देखते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया। वह अवाक्, सन्न रह गया। उसकी आँखें ज़मीन पर गड़ गईं। श्यामा ने मासूमियत से पूछा—'बच्चे कहाँ उड़ गए भइया?' केशव ने अत्यंत करुण और उदास स्वर में कहा—'अंडे तो फूट गए पगली!' श्यामा ने रोनी सूरत बनाकर कहा—'और बच्चे कहाँ गए?' केशव ने अपने गुस्से और निराशा में कहा—'तेरे सिर में! देखती नहीं है अंडों में से उजला-उजला पानी निकल आया है, वही तो दो-चार दिनों में बच्चे बनते!' यह दृश्य कहानी का चरमोत्कर्ष (Climax) है जहाँ बच्चों की खुशी एक झटके में गहरे शोक में बदल जाती है।
माँ का प्रबोधन एवं केशव की अंतहीन आत्म-ग्लानि:
इतने में हाथ में धूप की छड़ी लिए अम्मा जी भी बाहर आ गईं। उन्होंने टूटे अंडों को देखकर गुस्से में पूछा—'तुम दोनों धूप में बाहर क्या कर रहे हो? ये अंडे किसने तोड़े?' श्यामा को अपने भाई पर अब तनिक भी तरस नहीं आया। उसे लगा कि भइया ने ही अंडों को ठीक से नहीं रखा होगा, जिससे वे लुढ़ककर नीचे गिर पड़े। श्यामा ने तुरंत माँ से चुगली कर दी—'अम्मा जी, केशव भइया ने अंडों को छेड़ा था।' अम्मा ने केशव से कड़ाई से पूछा तो केशव भीगी बिल्ली बना सिर झुकाए खड़ा रहा। तब माँ ने दोनों बच्चों को प्रकृति का वह कठोर सत्य बताया जिसे वे नहीं जानते थे:
'क्या तुम्हें इतना भी नहीं मालूम कि जब कोई इंसान चिड़िया के अंडों को हाथ से छू लेता है, तो वे अंडे अपवित्र और गंदे हो जाते हैं! चिड़िया फिर उन अंडों को कभी नहीं सेती और उन्हें अपने घोंसले से नीचे गिराकर फोड़ देती है!'
माँ की यह बात सुनते ही केशव के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। केशव कांप उठा। उसने तो केवल अंडों को सुख पहुँचाने के लिए गद्दी पर रखा था, परंतु उसकी उस नादानी ने तीन नन्हीं जानों की हत्या कर दी थी! माँ ने डाँटते हुए कहा—'तेरे सिर इसका पाप पड़ेगा! तीन जान ले लीं तूने!' केशव रोनी सूरत बनाकर गिड़गिड़ाया—'मैंने तो सिर्फ अंडों को गद्दी पर रख दिया था अम्मा जी!' केशव कई दिनों तक अपनी भूल पर फूट-फूटकर रोता रहा। वह अंडों की रक्षा करने चला था, परंतु उसका सर्वनाश कर बैठा। इस घटना के बाद वे दोनों चिड़ियाँ फिर कभी उस कार्निस पर दिखाई नहीं दीं।
भाषा-शिल्प एवं व्याकरणिक वैशिष्ट्य:
प्रेमचंद की भाषा-शैली अत्यंत सजीव, चित्रात्मक, मुहावरेदार और प्रवाहपूर्ण है। उन्होंने बाल-संवादों में छोटे-छोटे वाक्यों और स्वाभाविक प्रश्नोत्तरी का प्रयोग किया है। कहानी में प्रयुक्त मुहावरे—जैसे 'सुध-बुध न रहना', 'चेहरे का रंग उड़ना', 'भीगी बिल्ली बनना', 'चटनी बना डालना', 'जान में जान आना'—भाषा को अत्यंत प्रभावशाली बनाते हैं। 'भाषा की बात' खंड में विशेषण-विशेष्य के संबंध (नादान दोस्त, उथली प्याली, फटी धोती) तथा रीतिवाचक क्रिया-विशेषण (दबे पाँव चलना, झटपट उतरना) जैसे व्याकरणिक नियमों का व्यावहारिक प्रयोग सिखाया गया है।
कहानी का नैतिक दर्शन एवं प्रकृति-संरक्षण संदेश:
प्रेमचंद की यह कहानी आधुनिक समाज को एक अमर नैतिक संदेश देती है। यह कहानी सिखाती है कि केवल करुणा और दया का भाव होना ही पर्याप्त नहीं है, उसके साथ विवेक और ज्ञान का होना अनिवार्य है। बिना ज्ञान के की गई सहायता कभी-कभी महाविनाश का कारण बन जाती है। दूसरा महत्वपूर्ण संदेश यह है कि वन्यजीवों और पक्षियों के प्राकृतिक जीवन में मनुष्यों को कभी अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। प्रकृति के अपने नियम होते हैं और उनका सम्मान करना ही सच्चा जीव-प्रेम है। साथ ही, बच्चों को कोई भी बड़ा या संवेदनशील कदम उठाने से पहले अपने माता-पिता और शिक्षकों से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।