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ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 20
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

चित्रकूट में भरत (Bal Ram Katha)

'चित्रकूट में भरत' बाल रामकथा (कक्षा 6 हिंदी, पूरक पाठ्यपुस्तक) का पाँचवाँ और सर्वाधिक भावनात्मक व नीतिपरक अध्याय है, जिसके लेखक मधुकर उपाध्याय हैं। यह अध्याय रामायण के उस गौरवशाली प्रसंग को उद्घाटित करता है जहाँ त्याग, भ्रातृ-प्रेम, राजधर्म, सत्यनिष्ठा और कर्तव्य-बोध की ऐतिहासिक कसौटी पर भरत का चरित्र कुंदन बनकर निखरता है। यह पाठ न केवल प्राचीन भारतीय आदर्शों की आधारशिला है, अपितु विद्यार्थियों को स्वार्थ-त्याग, मातृ-पितृ सम्मान, ज्येष्ठ भ्राता के प्रति निष्ठा और न्यायपूर्ण शासन के शाश्वत जीवन-मूल्यों से परिचित कराता है। ननिहाल में अमंगल स्वप्न और अयोध्या वापसी: कथा का आरंभ कैकेय देश की राजधानी राजगृह से होता है, जहाँ भरत और शत्रुघ्न अपने मामा के घर प्रवास कर रहे थे। अयोध्या के घटनाक्रम से वे सर्वथा अनभिज्ञ थे। एक रात भरत ने एक अत्यंत भयावह और अमंगलकारी स्वप्न देखा—उन्होंने देखा कि महाराज दशरथ काले वस्त्र धारण किए हुए हैं, उनका रथ गधों द्वारा खींचा जा रहा है, और वे एक विशाल अंधकारमय गर्त व सागर में डूब रहे हैं। प्रकृति में चारों ओर वृक्ष सूख रहे हैं और आकाश से तारे टूट रहे हैं। इस भयानक स्वप्न ने भरत के मन को अवसाद और गहरी आशंका से भर दिया। शत्रुघ्न और उनके मित्र उन्हें सांत्वना देने का प्रयास कर रहे थे, किंतु भरत का चित्त किसी अज्ञात अमंगल की आहट से थरथरा रहा था। तभी अयोध्या से राजा दशरथ और महर्षि वशिष्ठ द्वारा भेजे गए द्रुतगामी घुड़सवार दूत कैकेय पहुँचे। महर्षि वशिष्ठ की गुप्त आज्ञा थी कि दूत अयोध्या में घटी किसी भी अनहोनी या राम के वन-गमन का भेद भरत के सम्मुख न खोलें। दूतों ने राजसभा में केवल इतना ही निवेदन किया कि अयोध्या में सब सकुशल हैं किंतु महाराज और कुलगुरु ने उन्हें अत्यंत आवश्यक कार्य हेतु तुरंत स्मरण किया है। भरत ने बिना एक क्षण गंवाए अपने नाना और मामा से विदा ली और शत्रुघ्न सहित तीव्रगामी रथों पर सवार होकर अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। आठ दिन और आठ रातों की अविराम, थका देने वाली कठिन यात्रा के पश्चात भरत का रथ अयोध्या की सीमा में प्रविष्ट हुआ। अयोध्या की श्मशानवत नीरवता और गहरा संशय: अयोध्या नगरी के निकट पहुँचते ही भरत को एक विचित्र और डरावना परिवर्तन दिखाई दिया। जिस अयोध्या में सदा उत्सवों की गूँज, वेदमंत्रों का घोष, रथों की घरघराहट और नागरिकों का मधुर कोलाहल छाया रहता था, आज वह पूरी तरह मौन और निस्तब्ध थी। नगर के मुख्य सिंहद्वार बंद थे, बाज़ारों में सन्नाटा पसरा हुआ था, उपवनों के पुष्प मुरझाए हुए थे और पक्षी तक चहचहाना भूल चुके थे। नगर की वीथियों में भटकते हुए गिने-चुने नागरिकों के मुख मलिन, नेत्र अश्रुपूरित और सिर झुके हुए थे। भरत की ओर कोई भी नागरिक आँख उठाकर नहीं देख रहा था, बल्कि लोग दबी जुबान से कानाफूसी कर रहे थे। इस अपरिचित नीरवता ने भरत के मन में अनिष्ट की आशंका को दृढ़ कर दिया। वे विचलित होकर सीधे राजप्रासाद की ओर बढ़े। कैकेयी के प्रासाद में वार्तालाप और वज्राघात: राजप्रासाद पहुँचकर भरत अपने पिता दशरथ के भवन में गए, किंतु वहाँ शैया रिक्त थी। व्याकुल होकर वे अपनी माता कैकेयी के प्रासाद में प्रविष्ट हुए। कैकेयी ने अपने चिर-प्रतीक्षित पुत्र को देखकर बड़े उल्लास और स्नेह से गले लगाया, मस्तक चूमा और आरती उतारी। कैकेयी ने ननिहाल का कुशल-क्षेम पूछा। परंतु भरत का मन पिता के दर्शन के लिए छटपटा रहा था। उन्होंने कातर स्वर में पूछा—'हे माते! पूज्य पिता कहाँ हैं? राजभवन में ऐसा सन्नाटा क्यों है? बड़े भाई राम, सीता और लक्ष्मण कहाँ दिखाई नहीं दे रहे?' कैकेयी ने बिना किसी पश्चाताप या संकोच के अत्यंत क्रूर और कठोर सत्य को सहजता से व्यक्त किया। उसने कहा—'तात! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ उस गति को प्राप्त हो गए हैं जो संसार के समस्त प्राणियों की नियति है। वे अब देवलोक सिधार चुके हैं।' यह सुनते ही भरत पर मानो वज्रपात हुआ। वे 'हा तात! हा पिता!' पुकारते हुए भूमि पर गिर पड़े और विलाप करने लगे। जब भरत का शोक थोड़ा शांत हुआ, तो उन्होंने व्याकुलता से पूछा कि पिता ने अंतिम समय में उनके लिए क्या संदेश छोड़ा और ज्येष्ठ भ्राता राम कहाँ हैं, क्योंकि अब केवल राम ही उनका संबल हैं। तब कैकेयी ने अपने स्वार्थपूर्ण षड्यंत्र का समस्त रहस्य गर्व के साथ उद्घाटित किया। कैकेयी बोली—'भरत! तुम्हारे पिता ने अंतिम समय में केवल 'हे राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!' कहकर प्राण त्यागे। वे तुम्हारे लिए कोई संदेश न छोड़ सके, क्योंकि राम यहाँ नहीं हैं। मैंने तुम्हारे भविष्य को निष्कंटक बनाने के लिए महाराज से अपने दो पूर्व-प्रतिश्रुत वरदान माँग लिए थे। प्रथम वरदान से तुम्हारा राज्याभिषेक माँगा और द्वितीय वरदान से राम को चौदह वर्ष के लिए दंडकारण्य में वनवास दिलवा दिया। राम के साथ सीता और लक्ष्मण भी वन चले गए हैं। राम के विरह में महाराज ने अपने प्राण त्याग दिए। अब यह विशाल, समृद्ध और निष्कंटक अयोध्या का राज्य तुम्हारा है। उठो, शोक त्यागो और इस राज्य का उपभोग करो।' भरत का प्रचंड रोष, कैकेयी का तिरस्कार और मंथरा-प्रसंग: कैकेयी के मुख से यह विषैली बात सुनते ही भरत का शोक क्षणभर में प्रचंड क्रोधाग्नि में परिवर्तित हो गया। उनका शरीर काँपने लगा और नेत्र रक्तवर्ण हो गए। भरत ने अपनी माता की ओर घृणा से देखते हुए कहा—'धिक्कार है तुम पर! तुम मेरी माता नहीं, रघुकुल का विनाश करने वाली साक्षात कालरात्रि हो! पापिनी! कुलघातिनी! तूने केवल मेरे पिता के प्राण ही नहीं लिए, बल्कि मेरे भगवान तुल्य भ्राता राम को वनों में भटकने के लिए विवश कर दिया। तूने मुझे संसार भर में कलंकित कर दिया। क्या तू समझती है कि मैं राम के सिंहासन पर बैठकर पाप का भागी बनूँगा? रघुकुल की मर्यादा ज्येष्ठ पुत्र के राज्याधिकार की रही है। राम ही अयोध्या के वास्तविक राजा हैं और मैं उनका अदना सा दास हूँ।' भरत ने स्पष्ट घोषणा की कि वे इस कलंकित राजमुकुट को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उसी समय मंथरा दासी सुंदर आभूषण और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहनकर, प्रसन्न मुद्रा में कैकेयी के कक्ष में आई। वह भरत के आगमन और अपने षड्यंत्र की सफलता पर स्वयं को पुरस्कृत कराना चाहती थी। शत्रुघ्न ने जब मंथरा को देखा, तो उनका क्रोध भड़क उठा। शत्रुघ्न ने मंथरा को पकड़कर लात मारी और उसके केश पकड़कर घसीटने लगे। मंथरा चीखने-चिल्लाने लगी। तब भरत ने आगे बढ़कर शत्रुघ्न का हाथ पकड़ लिया और कहा—'हे अनुज शत्रुघ्न! शांत हो जाओ। एक अबला और कुबड़ी स्त्री पर प्रहार करना क्षत्रिय धर्म और रघुकुल की मर्यादा के विरुद्ध है। यदि आर्य राम को यह ज्ञात हो गया कि हमने क्रोध में आकर किसी स्त्री की हत्या कर दी, तो वे जीवनभर हमसे बात नहीं करेंगे और कभी अयोध्या नहीं लौटेंगे।' भरत के विवेकपूर्ण शब्दों ने शत्रुघ्न के क्रोध को शांत किया और मंथरा को छोड़ दिया गया। माता कौशल्या के सम्मुख भरत की निष्पाप प्रतिज्ञा: कैकेयी के भवन से निकलकर भरत अत्यंत व्याकुल होकर माता कौशल्या के भवन पहुँचे। कौशल्या पुत्र-शोक और पति-वियोग में अत्यंत दुर्बल और कृशकाय हो चुकी थीं। भरत को देखते ही कौशल्या के घाव हरे हो गए। उन्होंने करुण स्वर में कहा—'आओ भरत! तुम्हारी माता कैकेयी ने तुम्हारे लिए निष्कंटक राज्य प्राप्त कर लिया है। अब तुम सुख से राज्य करो। बस मुझे भी किसी रथ में बैठाकर वन भिजवा दो जहाँ मेरे राम, लक्ष्मण और जानकी रहते हैं।' कौशल्या के इन मर्मभेदी वचनों ने भरत के हृदय को चीर दिया। वे कौशल्या के चरणों में गिर पड़े और अश्रुधारा बहाते हुए बोले—'माते! यदि राम के वन-गमन अथवा पिता के देहावसान के षड्यंत्र में मेरा तनिक भी हाथ या सहमति हो, तो मुझे वे सारे घोर पाप और नर्क प्राप्त हों जो ब्रह्महत्यारे, गोहत्यारे, गुरु-द्रोही और विश्वासघाती को मिलते हैं। मैं निष्पाप हूँ माते! राम मेरे पूज्य पिता, भ्राता और ईश्वर हैं।' भरत के इन पवित्र और वेदनापूर्ण वचनों को सुनकर कौशल्या का सारा संशय दूर हो गया। उन्होंने रोते हुए भरत को अपनी छाती से लगा लिया और उनके आँसू पोंछते हुए कहा—'तात! मैं जानती हूँ कि तुम निष्पाप हो। तुम्हारा धर्म और तुम्हारी भ्रातृ-भक्ति रघुकुल को सदा आलोकित रखेगी।' महाराज दशरथ का अंतिम संस्कार और राजसभा का धर्म-संकट: अगले दिन महर्षि वशिष्ठ के निर्देश पर तेल की द्रोणी (नाव) में सुरक्षित रखे गए महाराज दशरथ के पार्थिव शरीर को बाहर निकाला गया। सरयू नदी के तट पर पूरे राजकीय सम्मान, वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ भरत द्वारा पिता का अंतिम संस्कार और श्राद्ध-कर्म संपन्न कराया गया। समस्त अयोध्या शोक के सागर में डूबी हुई थी। श्राद्ध-कर्म की समाप्ति के पश्चात चौदहवें दिन राजसभा आयोजित की गई। महर्षि वशिष्ठ, महामात्य सुमंत, अन्य मंत्रीगण और नगर के गणमान्य नागरिकों ने भरत से विनम्र अनुरोध किया—'हे भरत! अयोध्या का सिंहासन अब रिक्त नहीं रह सकता। राजा के बिना राष्ट्र अनाथ हो जाता है। पिता की आज्ञा और कुल-परंपरा का पालन करते हुए आप सिंहासनारूढ़ हों और प्रजा का पालन करें।' भरत ने भरी सभा में हाथ जोड़कर खड़े होकर जो उत्तर दिया, उसने इतिहास रच दिया। भरत ने कहा—'पूज्य गुरुदेव और सभासदों! रघुकुल की अनादि परंपरा है कि ज्येष्ठ पुत्र ही राजा बनता है। राम हम सबमें श्रेष्ठ, गुणवान और धर्मात्मा हैं। अयोध्या के सिंहासन पर केवल और केवल श्रीराम का अधिकार है। यदि कैकेयी ने लोभवश मेरे लिए राज्य माँगा, तो वह उनका अपराध था, मेरा संकल्प नहीं। मैं कल प्रातःकाल ही सेना, माताओं और प्रजा सहित वन प्रस्थान करूँगा और भ्राता राम को मनाकर अयोध्या वापस लाऊँगा। यदि वे नहीं माने, तो मैं भी चौदह वर्ष तक उन्हीं के साथ वन में कंद-मूल खाकर रहूँगा, किंतु अयोध्या के सिंहासन पर अन्याय से नहीं बैठूँगा।' भरत के इस त्यागपूर्ण निर्णय को सुनकर पूरी राजसभा 'भरत जी की जय!' के उद्घोष से गूँज उठी। चित्रकूट की ओर विशाल प्रस्थान और श्रृंगवेरपुर में गुह-मिलन: अगले ही दिन अयोध्या से एक अभूतपूर्व यात्रा आरंभ हुई। चतुरंगिणी सेना, मंत्रियों, महर्षि वशिष्ठ, तीनों माताओं (कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी) और सहस्रों अयोध्यावासियों के साथ भरत और शत्रुघ्न नंगे पैर, वल्कल वस्त्र धारण कर चित्रकूट की ओर चले। जब यह विशाल वाहिनी श्रृंगवेरपुर पहुँची, तो गंगा तट पर निषादराज गुह ने इतनी बड़ी सेना को देखकर संदेह किया। गुह ने सोचा कि भरत निष्कंटक राज्य के लोभ में राम पर आक्रमण करने या उन्हें समाप्त करने जा रहे हैं। उन्होंने अपनी निषाद सेना को सन्नद्ध कर दिया। किंतु जब गुह ने भरत के समीप जाकर उनके सात्विक मुख, अश्रुपूरित नेत्र और तपस्वी वेश को देखा, तो उनका सारा संदेह तिरोहित हो गया। भरत ने निषादराज को बड़े भाई राम का मित्र जानकर अपने गले से लगा लिया। गुह ने भरत को वह पावन इंगुदी वृक्ष और कुशासन दिखाया जहाँ राम और सीता ने भूमि पर सोकर रात बिताई थी। उस तृण-शय्या को देखकर भरत फूट-फूटकर रोए और स्वयं को धिक्कारने लगे कि उनके कारण उनके कोमल भाई और भाभी को भूमि पर शयन करना पड़ा। भरत ने भी उस रात केवल जल पीकर भूमि पर ही विश्राम किया। भारद्वाज आश्रम का आतिथ्य और लक्ष्मण की शंका: अगले दिन गंगा पार कर सेना प्रयागराज में महर्षि भारद्वाज के आश्रम पहुँची। महर्षि भारद्वाज ने भी आरंभ में भरत की परीक्षा लेने के उद्देश्य से पूछा कि वे सेना सहित वन में किस प्रयोजन से आए हैं? भरत के विनम्र और भ्रातृ-प्रेम से परिपूर्ण उत्तर को सुनकर महर्षि भावविभोर हो गए। उन्होंने अपनी तपोबल से संपूर्ण सेना, माताओं और नागरिकों को दिव्य आतिथ्य प्रदान किया। महर्षि भारद्वाज ने भरत को आशीर्वाद दिया और चित्रकूट पर्वत तथा मंदाकिनी नदी का सटीक मार्ग बताया। चित्रकूट के सुरम्य वन में जब अयोध्या की विशाल सेना पहुँची, तो हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की टाप और रथों के पहियों की गड़गड़ाहट से वन गूँज उठा। आकाश में धूल का विशाल मेघ छा गया। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता अपनी पर्णकुटी के बाहर बैठे थे। कोलाहल सुनकर लक्ष्मण ने एक ऊँचे साल वृक्ष पर चढ़कर देखा। अयोध्या की राजध्वजा (कोविदार वृक्ष का चिह्न) देखकर लक्ष्मण का क्षत्रिय रक्त खौल उठा। वे क्रोध में भरकर श्रीराम के पास आए और बोले—'भैया! कैकेयी का पुत्र भरत अपनी सेना लेकर हमें वन में अकेला पाकर मार डालने और निष्कंटक राज्य भोगने आ रहा है। आज मैं भरत और उसकी सेना का संहार कर अपने बाणों की प्यास बुझाऊँगा!' श्रीराम ने अत्यंत शांत और गंभीर भाव से लक्ष्मण को समझाया—'लक्ष्मण! तुम भरत के चरित्र को नहीं जानते। भरत धर्म और प्रेम की साक्षात मूर्ति हैं। उन्होंने स्वप्न में भी कभी अनीति का विचार नहीं किया। यदि भरत राज्य के लोभी होते, तो वे कभी सेना लेकर यहाँ न आते। वे मुझे अयोध्या वापस ले जाने के लिए ही आए हैं। यदि तुम्हें राज्य की लालसा है, तो मैं भरत से कहकर अयोध्या का राज्य तुम्हें दिलवा दूँगा, किंतु भरत पर कभी कटु वचन मत कहो।' राम के वचनों ने लक्ष्मण को लज्जित कर दिया और उनका क्रोध शांत हो गया। राम-भरत का अश्रुपूर्ण मिलन और दशरथ-तर्पण: भरत सेना को दूर छोड़कर शत्रुघ्न और सुमंत के साथ पैदल ही पर्णकुटी की ओर दौड़े। दूर से ही उन्होंने श्रीराम को एक शिला पर जटा बाँधे, वल्कल वस्त्र पहने, तपस्वी रूप में बैठे देखा। भरत 'आर्य! हे भ्राता!' पुकारते हुए दौड़े और श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। उनका कंठ रुंध गया, वाणी अवरुद्ध हो गई और वे केवल अश्रुओं से श्रीराम के चरण पखारने लगे। श्रीराम ने भरत को उठाकर अपनी छाती से भींच लिया। दोनों भाइयों के अश्रुजल से एक-दूसरे के वस्त्र भीग गए। लक्ष्मण, शत्रुघ्न और सीता का भी अत्यंत भावुक मिलन हुआ। जब भरत ने रोते हुए पिता दशरथ के देहावसान का समाचार सुनाया, तो श्रीराम संज्ञाशून्य होकर भूमि पर गिर पड़े। चारों ओर हाहाकार मच गया। तदुपरांत श्रीराम, लक्ष्मण और भरत ने मंदाकिनी नदी के तट पर जाकर पिता का विधिवत श्राद्ध और तिलांजलि (तर्पण) दी। तीनों माताओं और अयोध्यावासियों के आगमन से चित्रकूट की कुटिया एक तीर्थ बन गई। चित्रकूट की ऐतिहासिक धर्म-सभा और श्रीराम का अटल संकल्प: अगले दिन चित्रकूट में एक विशाल ऐतिहासिक सभा हुई जिसमें महर्षि वशिष्ठ, जाबालि, तीनों माताएँ, मंत्री और प्रजाजन उपस्थित थे। भरत ने अश्रुपूरित नेत्रों से हाथ जोड़कर श्रीराम से प्रार्थना की—'हे पूज्य भ्राता! अयोध्या का राज्य आपका है। मैं आपका अनुज और दास हूँ। आप अयोध्या चलकर राजसिंहासन को सुशोभित करें और प्रजा की रक्षा करें। कैकेयी के कुकृत्य को क्षमा करें।' कौशल्या और कैकेयी सहित सभी माताओं ने भी राम से लौटने की प्रार्थना की। कैकेयी ने अपने पश्चाताप के आँसू बहाते हुए राम से क्षमा माँगी। किंतु श्रीराम सत्य और धर्म के मेरुदंड की भाँति अडिग रहे। उन्होंने भरत को प्रेमपूर्वक समझाया—'तात भरत! पूज्य पिता ने सत्य की रक्षा हेतु अपने प्राण त्यागे। उन्होंने मुझे वनवास और तुम्हें अयोध्या का राज्य सौंपा। यदि हम उनके वचन को भंग करेंगे, तो सत्य और रघुकुल की मर्यादा नष्ट हो जाएगी। पिता की आज्ञा का पालन करना पुत्र का परम धर्म है। मैं चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण किए बिना अयोध्या के राजभवन में पैर नहीं रख सकता। तुम अयोध्या लौटकर प्रजा का पालन करो और पिता के दिए वचन को पूरा करो।' चरण-पादुका की प्राप्ति और नंदीग्राम का तपस्वी शासन: जब भरत ने देखा कि श्रीराम अपने धर्म-संकल्प से किसी भी स्थिति में विचलित नहीं होंगे, तब उन्होंने एक अद्भुत मार्ग निकाला। भरत ने श्रीराम के सम्मुख काष्ठ की नई चरण-पादुकाएँ (खड़ाऊँ) रखीं और प्रार्थना की—'हे आर्य! यदि आप नहीं लौटते, तो कृपया अपनी ये पावन चरण-पादुकाएँ मुझे प्रदान करें। ये पादुकाएँ ही अयोध्या के सिंहासन पर विराजेंगी।' श्रीराम ने अपनी पादुकाएँ उन पर रखीं और भरत को सौंप दीं। भरत ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन चरण-पादुकाओं को अपने मस्तक पर धारण किया और सबके सम्मुख कठोर प्रतिज्ञा ली—'हे भ्राता! मैं चौदह वर्ष तक अयोध्या नगर में प्रवेश नहीं करूँगा। मैं अयोध्या के बाहर नंदीग्राम में एक तृण-कुटिया बनाकर, आपकी भाँति जटा और वल्कल धारण कर, कंद-मूल खाकर संन्यासी का जीवन बिताऊँगा। आपकी ये पवित्र पादुकाएँ ही अयोध्या के राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित रहेंगी और मैं केवल आपके प्रतिनिधि (ट्रस्टी) के रूप में राजकाज सँभालूँगा। किंतु स्मरण रहे, चौदह वर्ष की अवधि समाप्त होते ही यदि आप अगले दिन के सूर्योदय तक अयोध्या न लौटे, तो यह भरत अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग देगा।' श्रीराम ने गद्गद होकर भरत को गले लगाया और विदा दी। भरत चरण-पादुकाओं को मस्तक पर रखकर अयोध्या लौटे। उन्होंने पादुकाओं को अयोध्या के राजसिंहासन पर चँवर डुलाते हुए स्थापित किया और स्वयं नंदीग्राम जाकर चौदह वर्ष की कठोर तपस्या में लीन हो गए। इस प्रकार भरत का यह त्याग विश्व-साहित्य में भ्रातृ-प्रेम और निष्काम सेवा का अप्रतिम शिखर बन गया।

क्या आपने कभी सोचा है?

कल्पना कीजिए कि एक राजकुमार अपने ननिहाल में निश्चिंत खेल रहा है, किंतु एक भयानक अमंगल स्वप्न उसकी रातों की नींद छीन लेता है। जब वह तीव्रगामी दूतों के बुलावे पर अपनी मातृभूमि अयोध्या लौटता है, तो उसे फूलों से सजी राजधानी नहीं, बल्कि श्मशान जैसी डरावनी नीरवता मिलती है। उसकी अपनी सगी माँ कैकेयी उसे गले लगाकर मुस्कुराते हुए बताती है कि तुम्हारे पिता अब इस संसार में नहीं रहे, तुम्हारे पूज्य ज्येष्ठ भ्राता राम चौदह वर्ष के लिए वन-वन भटकने चले गए हैं, और अब यह समूचा निष्कंटक राज्य तुम्हारा है! जिस राजसिंहासन के लिए संसार में भाई-भाई के रक्त का प्यासा हो जाता है, उस अकूत वैभव और सत्ता को यदि कोई राजकुमार विष की भाँति ठुकरा दे, अपनी ही माता के कुकृत्य पर पश्चाताप के आँसू बहाए, और वल्कल वस्त्र पहनकर नंगे पैर वन-वन भटकते हुए बड़े भाई के चरणों में राज्य लौटाने पहुँच जाए, तो त्याग और भ्रातृ-प्रेम की यह पराकाष्ठा मानव इतिहास में अमर हो जाती है। 'चित्रकूट में भरत' बाल रामकथा का वह अत्यंत मर्मस्पर्शी अध्याय है, जहाँ राजनीति पर धर्म की, लोभ पर त्याग की और स्वार्थ पर अगाध भ्रातृ-प्रेम की विजय होती है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

'चित्रकूट में भरत' अध्याय का अध्ययन आधुनिक विद्यार्थियों के लिए केवल एक पौराणिक कथा का पठन नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण, नैतिक विवेक और मानवीय मूल्यों की गहन पाठशाला है। समकालीन भौतिकवादी युग में, जहाँ सत्ता, संपत्ति और पद के लिए पारिवारिक संबंध बिखर जाते हैं और भाई-भाई के विरुद्ध न्यायालयों में खड़ा दिखाई देता है, वहाँ भरत का त्याग एक प्रकाशस्तंभ की भाँति मानवता का मार्गदर्शन करता है।

  1. निःस्वार्थ भ्रातृ-प्रेम का सर्वोच्च आदर्श: भरत को बिना माँगे एक विशाल साम्राज्य का चक्रवर्ती राज्य मिल रहा था, किंतु उन्होंने उसे अपने बड़े भाई के अधिकारों का हनन मानकर विष के समान ठुकरा दिया। यह प्रसंग सिखाता है कि सांसारिक धन और वैभव से कहीं अधिक मूल्यवान परस्पर प्रेम, विश्वास और पारिवारिक मर्यादाएँ होती हैं।

  2. सत्ता का 'न्यासी सिद्धांत' (Trusteeship Model): भरत ने चौदह वर्ष तक अयोध्या का शासन स्वयं राजा बनकर नहीं, बल्कि श्रीराम की चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर उनके प्रतिनिधि (Trustee) के रूप में चलाया। यह सिद्धांत महात्मा गांधी के 'ट्रस्टीशिप' के विचार का मूल आधार है, जो बताता है कि सत्ता शासक के व्यक्तिगत सुख-उपभोग के लिए नहीं, बल्कि जनता और धर्म की अमानत होती है। एक सच्चे प्रशासक को वैरागी और सेवक की भावना से कार्य करना चाहिए।

  3. मातृ-दोष से स्वयं को अलग करना और सत्य का पक्ष: यद्यपि कैकेयी भरत की सगी माँ थीं और उन्होंने यह सब भरत के लिए ही किया था, फिर भी भरत ने अधर्म और अन्याय का समर्थन नहीं किया। उन्होंने अपनी माँ के कुकृत्य की कठोर भर्त्सना की, किंतु साथ ही स्त्री-हत्या से शत्रुघ्न को रोककर मर्यादा और विवेक का परिचय भी दिया। यह सिखाता है कि संबंधों से ऊपर सत्य और न्याय की प्रतिष्ठा होती है।

  4. पितृ-आज्ञा और वचन-पालन का अटूट संकल्प: श्रीराम का यह दृढ़ विश्वास कि जीवन चला जाए पर वचन न जाए ('रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्रान जाहुं बरु बचनु न जाई'), विद्यार्थियों में अनुशासन, कर्तव्यपरायणता और सत्यवादिता का बीज बोता है।

  5. परीक्षा एवं भाषा-कौशल की दृष्टि से महत्व: CISCE कक्षा 6 की हिंदी परीक्षा में इस अध्याय से भरत का चरित्र-चित्रण, कैकेयी-भरत संवाद, लक्ष्मण का क्रोध और राम का समाधान, नंदीग्राम की प्रतिज्ञा, तथा आशय-स्पष्टीकरण संबंधी प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। यह अध्याय विद्यार्थियों की विश्लेषणात्मक क्षमता, संवाद-लेखन और तत्सम प्रधान मानक हिंदी अभिव्यक्ति को सुदृढ़ करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कक्षा 6 हिंदी पूरक पाठ्यपुस्तक 'बाल रामकथा' के पूर्ववर्ती अध्याय 4 'राम का वन-गमन' की मूल घटनाओं (दशरथ के प्राणत्याग, राम-लक्ष्मण-सीता के गंगा पार करने और चित्रकूट प्रवास) की स्पष्ट समझ।
  • रघुकुल की परंपरागत शासन व्यवस्था (ज्येष्ठ पुत्र का उत्तराधिकार नियम) और कैकेयी द्वारा माँगे गए दो वरदानों के ऐतिहासिक संदर्भ का सामान्य ज्ञान।
  • प्राचीन भारत के पारिवारिक संबंधों (मातृ-पितृ भक्ति, भ्रातृ-प्रेम, गुरु-शिष्य परंपरा) और नैतिक मूल्यों की बुनियादी अवधारणा।
  • कथा में प्रयुक्त भौगोलिक स्थानों जैसे राजगृह (कैकेय देश), अयोध्या, श्रृंगवेरपुर (गंगा तट), प्रयागराज (त्रिवेणी संगम) और चित्रकूट (मंदाकिनी तट) का सामान्य परिचय।
  • हिंदी भाषा के तत्सम प्रधान शब्दावली (यथा—श्मशानवत, कुलघातिनी, चरण-पादुका, तिलांजलि, निष्कंटक, नंदीग्राम, न्यासी) के अर्थ समझने की प्राथमिक क्षमता।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • भरत के कैकेय देश में देखे गए अमंगल स्वप्न और अयोध्या की मूक नीरवता के प्रतीकात्मक अर्थ का सटीक विश्लेषण कर सकेंगे।
  • कैकेयी के राजप्रासाद में भरत-कैकेयी संवाद, भरत के प्रचंड रोष तथा मंथरा को शत्रुघ्न द्वारा दंड दिए जाने पर भरत के विवेकपूर्ण हस्तक्षेप का वर्णन कर सकेंगे।
  • माता कौशल्या के सम्मुख भरत द्वारा ली गई निष्पाप शपथों और उनके शुद्ध अंतःकरण की मार्मिक अभिव्यक्ति की व्याख्या कर सकेंगे।
  • सरयू तट पर महाराज दशरथ के अंतिम संस्कार तथा राजसभा में वशिष्ठ मुनि के आग्रह पर भरत द्वारा दिए गए धर्म-निर्णय का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह के संशय और भरत-गुह के भावुक मिलन तथा प्रयाग में महर्षि भारद्वाज के आतिथ्य प्रसंग का सविस्तार वर्णन कर सकेंगे।
  • चित्रकूट पर्वत पर अयोध्या की सेना देखकर लक्ष्मण के क्रोधित होने और श्रीराम द्वारा दिए गए धैर्यवान एवं विवेकपूर्ण समाधान का तुलनात्मक विश्लेषण कर सकेंगे।
  • चित्रकूट में राम-भरत के अश्रुपूर्ण मिलन, पिता के देहावसान की सूचना तथा मंदाकिनी तट पर पितृ-तर्पण की शास्त्रीय प्रक्रिया को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • चित्रकूट की धर्म-सभा में भरत के अयोध्या लौटने के आग्रह और श्रीराम के पितृ-सत्य पर अटल रहने के दार्शनिक तर्कों का विवेचन कर सकेंगे।
  • श्रीराम की पावन चरण-पादुका (खड़ाऊँ) प्राप्त करने के आध्यात्मिक महत्व और नंदीग्राम में कुटिया बनाकर 14 वर्ष तपस्वी जीवन जीने की भरत की प्रतिज्ञा का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • भरत के चरित्र के आधार पर आधुनिक समाज में भ्रातृ-प्रेम, त्याग, सत्ता के न्यासी सिद्धांत (Trusteeship) और निष्काम कर्तव्य-पालन के नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में समाहित कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 कैकेय देश में दुःस्वप्न, दूतों का आ...
2 कैकेयी के प्रासाद में वार्ता, पिता...
3 मंथरा-दंड पर भरत का विवेक, माता कौश...
4 राजसभा में धर्म-निर्णय, साम्राज्य क...
5 श्रृंगवेरपुर में गुह-मिलन, प्रयाग म...
6 चित्रकूट में राम-भरत का अश्रुपूर्ण...
7 पावन चरण-पादुका की प्राप्ति, नंदीग्...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

कैकेय देश में दुःस्वप्न, दूतों का आगमन और अयोध्या की श्मशानवत नीरवता

बाल रामकथा — अध्याय 5: चित्रकूट में भरत भ्रातृ-प्रेम की पराकाष्ठा • कैकेयी का तिरस्कार • चरण-पादुका अर्पण • नंदीग्राम का तपस्वी शासन CISCE CLASS 6 HINDI (BAL RAM KATHA) • PEDAGOGICAL VISUAL ARCHITECTURE चरण 1: भरत का अमंगल स्वप्न, दूतों का आगमन एवं अयोध्या की श्मशान-सी नीरवता 🌙 भरत का अमंगल स्वप्न • ननिहाल (कैकेय देश) में भरत ने अत्यंत भयावह स्वप्न देखा। • पिता दशरथ को गोबर के गड्ढे में गिरते, यमदूतों संग जाते देखा। • समुद्र का सूखना, चंद्रमा गिरना। • हृदय में अनिष्ट की भारी आशंका। 🐎 द्रुतगामी दूतों का बुलावा • वशिष्ठ द्वारा भेजे दूत पहुँचे। • अयोध्या की घटनाओं का कोई विवरण नहीं दिया, केवल शीघ्र चलने का आग्रह किया। • भरत-शत्रुघ्न सात दिनों की कठिन यात्रा कर अयोध्या पहुँचे। 🏛️ सूनी अयोध्या का हाहाकार • नगर में प्रवेश करते ही स्तब्ध। • हाट-बाज़ार बंद, सूने राजपथ। • घरों से रोने की आवाजें। • अयोध्या श्मशान सी निष्प्राण। • पिता के महल में सन्नाटा मिला। चरण 2: कैकेयी द्वारा दशरथ-मरण की सूचना एवं भरत का पाषाण-विदारक रोष 👑 कैकेयी का अहंकार • कैकेयी ने पुत्र की आरती उतारी। • निर्दयी भाव से कहा: "दशरथ 'हा राम!' कहते स्वर्ग सिधारे।" • "मैंने तुम्हारे लिए राज्य निष्कंटक किया, राम को वन भेज दिया।" • अपने कुकृत्य पर गर्व किया। 💔 भरत पर वज्रपात • पिता की मृत्यु व राम के वनवास से भरत भूमि पर गिर पड़े। • आँखों से अश्रुओं की झड़ी। • "अरी कुलघातिनी! तूने यह क्या अनर्थ किया? तू मेरी माँ नहीं!" • कैकेयी को 'राक्षसी' कह धिक्कारा। ⚡ मंथरा-दंड एवं भरत का संयम • शत्रुघ्न ने मंथरा को बालों से घसीटकर वध करना चाहा। • भरत ने रोका: "स्त्री-वध पाप है, भैया राम कभी इसे क्षमा न करेंगे।" • राजसिंहासन को पैर से ठुकराया। चरण 3: माता कौशल्या के चरणों में निष्पाप शपथ एवं राजसभा में राजपद का अस्वीकार 🙏 कौशल्या के चरणों में • भरत रोते हुए कौशल्या के चरणों में गिर पड़े। • कौशल्या का संशय: "भरत! अब सुख से राज करो।" • भरत ने सैकड़ों घोर शापों की शपथ खाकर निष्पापता सिद्ध की। • कौशल्या ने छाती से लगा लिया। 🔥 सरयू तट पर अंत्येष्टि • तेल के द्रोण से राजा का शव निकाला। • वशिष्ठ के मार्गदर्शन में सरयू तट पर विधिपूर्वक दाह-संस्कार। • भरत-शत्रुघ्न द्वारा तिलांजलि। • संपूर्ण अयोध्या शोक-मग्न रही। ⚖️ भरत का अटल संकल्प • वशिष्ठ ने राज्याभिषेक का प्रस्ताव दिया। • भरत ने हाथ जोड़कर कहा: "राजा केवल श्रीराम हैं, मैं उनका दास हूँ।" • "मैं सेना व प्रजा सहित चित्रकूट जाकर भैया राम को मना लाऊँगा।" चरण 4: चित्रकूट की ओर महाप्रस्थान, गुह-भारद्वाज सत्कार एवं लक्ष्मण का रोष-निवारण 🛶 गुह का संशय व नमन • श्रृंगवेरपुर में सेना देख गुह को शंका हुई कि भरत युद्ध को आए। • भरत का तपस्वी वेष व अश्रु देखकर चरणों में गिर पड़े। • सैकड़ों नावों से गंगा पार कराया। 🌿 प्रयाग में भारद्वाज आशीर्वाद • भारद्वाज मुनि ने भरत के त्याग की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। • अलौकिक तपोबल से संपूर्ण सेना का भव्य आतिथ्य किया। • चित्रकूट का मार्ग दिखाया। 🏹 लक्ष्मण की शंका का समाधान • सेना की धूल देख लक्ष्मण कुपित: "भरत को युद्ध में मारूँगा!" • राम ने समझाया: "लक्ष्मण! भरत स्वप्न में भी द्रोह नहीं कर सकता, वह हमें लौटाने आ रहा है।" चरण 5: राम-भरत का अश्रुपूर्ण मिलन, चरण-पादुका अर्पण एवं नंदीग्राम में तपस्वी शासन 🫂 अश्रुओं का महामिलन • भरत दौड़कर राम के चरणों में गिरे। • राम ने छाती से लगाया, दोनों रोए। • दशरथ-मरण की सूचना पर राम का मंदाकिनी में तर्पण। • माताओं व राजा जनक का आगमन। 📜 पितृ-वचन की सर्वोच्चता • भरत ने अयोध्या लौटने की भीख माँगी। • राम अडिग: "पिता का वचन झूठा नहीं हो सकता। 14 वर्ष वनवास मेरा और राजकाज तुम्हारा धर्म है।" • भरत ने राम की खड़ाऊँ माँगीं। 👡 नंदीग्राम में तपस्वी जीवन • खड़ाऊँ को सिर पर रखकर लौटे। • राजसिंहासन पर पादुका प्रतिष्ठा। • नंदीग्राम में कुटिया बनाकर रहे, जटा-वल्कल पहन 14 वर्ष शासन किया। • 14 वर्ष बाद लौटने की शपथ। TARGETEXAMS GOLD STANDARD STUDY MATERIAL • CISCE CLASS 6 HINDI (BAL RAM KATHA) • CHAPTER 5: CHITRAKOOT MEIN BHARAT

1. ननिहाल (राजगृह) में भरत का अमंगलकारी दुःस्वप्न

कथा का आरंभ अयोध्या से सैकड़ों योजन दूर कैकेय देश की राजधानी राजगृह से होता है। भरत और उनके सबसे छोटे अनुज शत्रुघ्न अपने मामा युधाजित और नाना राजा अश्वपति के यहाँ प्रवास कर रहे थे। वे अयोध्या में घटित राजनैतिक उथल-पुथल, मंथरा के कुचक्र, कैकेयी द्वारा माँगे गए दो वरदानों, श्रीराम के वन-गमन तथा पिता दशरथ की अत्यंत संकटग्रस्त स्थिति से पूर्णतः अनभिज्ञ थे।

किंतु नियति के कठोर आघातों की पूर्व-सूचना अवचेतन मन को स्वप्नों के माध्यम से मिल जाती है। प्रातःकाल होने से ठीक पूर्व भरत ने एक अत्यंत भयावह और अमंगलकारी स्वप्न देखा। स्वप्न में उन्होंने देखा:

  • काले वस्त्रों में पिता दशरथ: महाराज दशरथ जीर्ण-शीर्ण काले वस्त्र पहने हुए, सिर के बाल बिखेरे, मलिन मुख लिए एक मलिन गर्त में गिर रहे हैं।
  • गधों द्वारा खींचा जाने वाला रथ: महाराज एक ऐसे रथ पर सवार हैं जिसे तीव्र गति से दौड़ने वाले गधे खींच रहे हैं और वह रथ दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर अंधकार में जा रहा है।
  • प्रकृति का संहारक दृश्य: समुद्र सूख चुका है, आकाश से चंद्रमा और तारे टूट-टूटकर पृथ्वी पर गिर रहे हैं, चारों ओर हरे-भरे फलदार वृक्ष पत्ते विहीन होकर ठूँठ बन गए हैं और पर्वत चूर-चूर हो रहे हैं।
  • अशुभ प्रतीकों का दर्शन: महाराज दशरथ पर्वत शिखर से नीचे गिद्धों और जंगली हिंसक पशुओं के बीच गिर रहे हैं और अंजुलि भर-भरकर तैल पी रहे हैं।
सांस्कृतिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्व:

प्राचीन भारतीय स्वप्न-शास्त्र (स्वप्न मीमांसा) में दक्षिण दिशा की ओर गधों के रथ पर गमन, काले वस्त्र, तेल पीना और समुद्र का सूखना साक्षात मृत्यु और घोर कुल-विनाश के सूचक माने गए हैं। यह स्वप्न भरत के अंतर्मन में पिता और ज्येष्ठ भ्राता के प्रति अगाध प्रेम और दैवीय संवेदनशीलता को प्रकट करता है।

जब भरत जागे, तो उनका शरीर पसीने से भीगा हुआ था और चित्त अत्यंत अशांत था। शत्रुघ्न और उनके मित्र उन्हें वीणा, संगीत और आमोद-प्रमोद से बहलाने का यत्न करने लगे, किंतु भरत ने गहरी उदासी में कहा—"हे सखा! मेरा मन किसी भयानक अनिष्ट की आशंका से काँप रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि या तो मेरे पूज्य पिता महाराज दशरथ पर कोई दारुण विपत्ति आ पड़ी है, या फिर ज्येष्ठ भ्राता राम संकट में हैं।"

2. अयोध्या से तीव्रगामी दूतों का आगमन

उसी समय कैकेय के राजमहल के द्वार पर अयोध्या से आए घुड़सवार दूतों की घंटी बजी। ये दूत महर्षि वशिष्ठ और मंत्रियों द्वारा अत्यंत गुप्त रूप से भेजे गए थे। महाराज दशरथ का देहावसान हो चुका था और उनका पार्थिव शरीर तैल-द्रोणी में रखा हुआ था। अयोध्या का सिंहासन शून्य था और प्रजा पर अराजकता का संकट मंडरा रहा था।

महर्षि वशिष्ठ ने दूतों को कठोर चेतावनी देकर भेजा था—"कैकेय में किसी को भी यह ज्ञात न होने पाए कि राजा दशरथ का देहावसान हो गया है या राम वन चले गए हैं। भरत से केवल इतना कहना कि कुलगुरु और महाराज ने उन्हें तुरंत स्मरण किया है।"

दूतों ने राजसभा में उपस्थित होकर राजा अश्वपति और युधाजित को प्रणाम किया और भरत से निवेदन किया—"राजकुमार! अयोध्या में सब सकुशल हैं, किंतु महर्षि वशिष्ठ और मंत्रिपरिषद ने आपको अत्यंत आवश्यक कार्य हेतु अविलंब अयोध्या बुलाया है।"

भरत ने दूतों से बार-बार पिता दशरथ, माताओं और भ्राता राम के विषय में पूछा। दूतों ने नीति का पालन करते हुए रहस्य नहीं खोला, केवल इतना ही कहा कि वहाँ पहुँचने पर सब विदित हो जाएगा। भरत ने नाना से आज्ञा ली। राजा अश्वपति ने भरत को बहुमूल्य उपहार, उत्तम घोड़े और गजराज भेंट किए, किंतु भरत का मन इन उपहारों में लेशमात्र भी नहीं था। वे शत्रुघ्न के साथ अत्यंत वेगवान रथ पर सवार होकर अयोध्या की ओर चल पड़े।

3. आठ दिनों की थकावट भरी कठिन यात्रा

कैकेय देश (वर्तमान पश्चिमी पंजाब/अफगानिस्तान सीमांत क्षेत्र) से अयोध्या की दूरी सैकड़ों कोस थी। सामान्य रूप से इस यात्रा में कई सप्ताह लगते थे, किंतु भरत की व्याकुलता इतनी तीव्र थी कि उन्होंने दिन-रात रथों को दौड़ाया। नदियों, पर्वतों, बीहड़ों और वनों को पार करते हुए भरत का काफिला लगातार आठ दिन और आठ रात चलता रहा। मार्ग में घोड़ों के हाँफने और पहियों के टूटने की परवाह किए बिना भरत केवल एक ही विचार से संचालित थे—शीघ्रातिशीघ्र अयोध्या पहुँचना।

4. अयोध्या में प्रवेश: श्मशानवत नीरवता और स्तब्धता

आठवें दिन की संध्या को जब भरत का रथ अयोध्या की पावन सीमा में प्रविष्ट हुआ, तो उनके नेत्र फटे के फटे रह गए। जो अयोध्या नगरी कभी इंद्र की अमरावती के समान जगमगाती थी, जहाँ चौराहों पर पुष्प-वर्षा होती थी, वीणा और मृदंग की मधुर ध्वनियाँ गूँजती थीं, सुगंधित धूप का धुआँ उठता था और हँसते-खेलते नागरिकों की चहल-पहल रहती थी, आज वही अयोध्या एक श्मशान भूमि जैसी वीरान और डरावनी प्रतीत हो रही थी।

अयोध्या की त्रासदी के प्रत्यक्ष लक्षण:

सामान्य अयोध्या का रूप भरत के आगमन पर अयोध्या का रूप
हाट-बाज़ार खुले, व्यापार और उत्सव की हलचल समस्त दुकानें और बाज़ार बंद, सड़कें धूल-धूसरित और सूनी
गृह-मंदिरों में यज्ञ-हवन, वेदपाठ और धूप की सुगंध घरों में चूल्हे बुझे हुए, चारों ओर अंधकार और सन्नाटा
उद्यानों में मयूरों का नृत्य और कोकिल की कूक वृक्षों के पत्ते पीले, पक्षी मूक और पशु उदास
राजकुमारों के स्वागत में जयघोष और पुष्प-वर्षा नागरिक मुँह छिपाकर रोते हुए, दबी जुबान से कानाफूसी

भरत ने सारथी से कांपते स्वर में कहा—"हे सारथी! यह क्या अनर्थ है? अयोध्या इतनी उदास क्यों है? कोई मेरा स्वागत क्यों नहीं कर रहा? मंदिरों में शंख की ध्वनि क्यों नहीं हो रही? लोग मुझे देखकर मुँह क्यों फेर रहे हैं?" सारथी के पास कोई उत्तर नहीं था, उसकी आँखें भी छलछला आईं। भरत का मन किसी महाविनाश के भय से बैठ गया और वे सीधे राजप्रासाद की ओर दौड़ पड़े।

कैकेयी के प्रासाद में वार्ता, पिता के देहावसान व वनवास का आघात और भरत का प्रचंड रोष

1. पिता के रिक्त भवन और माता कैकेयी के प्रासाद में आगमन

राजप्रासाद पहुँचकर भरत सर्वप्रथम अपने पिता महाराज दशरथ के भव्य भवन में गए। किंतु वहाँ महाराज की स्वर्णिम शैया सूनी पड़ी थी। न वहाँ चँवर डुलाने वाले सेवक थे, न अंगरक्षक, और न ही महाराज की मधुर वाणी। भरत का संशय और गहरा हो गया। वे तुरंत अपनी जन्मदात्री माता कैकेयी के प्रासाद की ओर भागे।

माता कैकेयी अपने स्वर्णिम आसन पर बैठी भरत की ही प्रतीक्षा कर रही थी। अपने प्राणप्रिय पुत्र को देखकर वह अत्यंत हर्षित होकर उठी, आगे बढ़कर भरत को अपनी छाती से चिपटा लिया, उनका माथा चूमा और कुशल-क्षेम पूछने लगी—"वत्स भरत! बहुत दिनों बाद आए। तुम्हारे ननिहाल में तुम्हारे नाना अश्वपति और मामा युधाजित सब सकुशल तो हैं? मार्ग में तुम्हें कोई कष्ट तो नहीं हुआ?"

भरत का हृदय कुशलता सुनने के लिए नहीं, बल्कि पिता और भ्राताओं को देखने के लिए तड़प रहा था। भरत ने कैकेयी के चरण छूकर अत्यंत कातर स्वर में पूछा:

"हे माते! ननिहाल में सब कुशल है। किंतु मुझे पिता के भवन में पिताजी नहीं दिखे। वे कहाँ हैं? अयोध्या में उत्सव की जगह ऐसा सन्नाटा क्यों पसरा है? मेरे पूज्य ज्येष्ठ भ्राता राम, लक्ष्मण और भाभी सीता कहाँ हैं? मुझे शीघ्र उनके दर्शन कराइए!"

2. पिता के देहावसान की कठोर सूचना और भरत का विलाप

कैकेयी ने बिना किसी झिझक, संकोच या पश्चाताप के अत्यंत निर्मम और रूखे स्वर में कहा—"तात भरत! जो गति संसार के समस्त पुण्यशाली धर्मात्मा राजाओं की होती है, तुम्हारे पिता महाराज दशरथ उसी परम गति को प्राप्त हो गए हैं। वे अब इस नश्वर संसार को छोड़कर देवलोक सिधार चुके हैं।"

यह सुनते ही भरत की आँखों के आगे घोर अंधकार छा गया। वे अपने दोनों हाथों से सिर पकड़कर 'हा तात! हा पिता!' चीखते हुए धरती पर गिर पड़े। उनका कंठ अवरुद्ध हो गया और वे धूल में लोट-लोटकर विलाप करने लगे। भरत रोते हुए बोले—

"हाय! मैं अभागा पुत्र अपने धर्मात्मा पिता के अंतिम समय में उनके दर्शन भी न कर सका! न उनके चरण दबा सका और न ही उनके मुख से अंतिम आशीर्वाद पा सका। हे पिताजी! आप अपने इन लाडले पुत्रों को अनाथ छोड़कर कहाँ चले गए? अब इस शून्य अयोध्या में हमें कौन सम्हालेगा?"

3. कैकेयी द्वारा स्वार्थपूर्ण षड्यंत्र का गर्वोक्तिपूर्ण उद्घाटन

जब भरत का विलाप कुछ धीमा हुआ, तो उन्होंने सिसकते हुए कैकेयी से पूछा—"माते! पूज्य पिता ने अपनी अंतिम साँसों में मेरे लिए क्या आज्ञा दी? और मेरे धर्मात्मा बड़े भाई राम कहाँ हैं? वे मुझे इस शोक-सागर से उबारेंगे। वे कहाँ हैं, मुझे उनके पास ले चलो।"

तब कैकेयी ने जो कहा, वह भरत के हृदय को चीर देने वाला वज्रपात था। कैकेयी ने बड़े संतोष और आत्म-मुग्धता के साथ कहा:

  • पिता के अंतिम शब्द: "भरत! तुम्हारे पिता ने अंतिम समय में तुम्हारे लिए कोई संदेश नहीं छोड़ा। उनके अंतिम शब्द थे—'हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! धन्य हैं वे लोग जो चौदह वर्ष बाद राम को सकुशल अयोध्या लौटते देखेंगे!'"
  • दो वरदानों का रहस्य: "महाराज दशरथ ने राम के राज्याभिषेक की तैयारी की थी, किंतु मैंने तुम्हारे कल्याण और राज्याधिकार के लिए देवासुर संग्राम के समय के अपने दो वरदान माँग लिए।"
  • राम का वनवास और भरत का राज्याभिषेक: "प्रथम वरदान से मैंने तुम्हारा अयोध्या के सिंहासन पर राज्याभिषेक माँगा और द्वितीय वरदान से राम को चौदह वर्ष के लिए तपस्वी वेश में दंडकारण्य वन जाने का आदेश दिलवाया।"
  • सीता-लक्ष्मण का प्रस्थान और पिता की मृत्यु: "राम के साथ उनकी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण भी वन चले गए। अपने ज्येष्ठ पुत्र राम के विरह को न सह पाने के कारण महाराज दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए।"
  • निष्कंटक साम्राज्य का प्रलोभन: "अब अयोध्या का यह अकूत धन, सेना, हाथी-घोड़े और समूचा चक्रवर्ती साम्राज्य तुम्हारे लिए सर्वथा निष्कंटक (कांटों/प्रतिद्वंद्वियों से रहित) हो चुका है। उठो मेरे वीर पुत्र! व्यर्थ का शोक त्यागो, पिता का अंतिम संस्कार करो और महर्षि वशिष्ठ की उपस्थिति में इस विशाल राज्य के राजा बनो।"

4. भरत का प्रचंड रोष और कैकेयी का कठोर तिरस्कार

कैकेयी के ये विषैले शब्द सुनते ही भरत का शोक सहसा भयानक क्रोधाग्नि में परिवर्तित हो गया। जिस माता को वे पूज्य और ममतामयी समझते थे, वह उन्हें रघुकुल का सर्वनाश करने वाली साक्षात पिशाचिनी प्रतीत होने लगी। भरत का शरीर थर-थर काँपने लगा, उनके ओंठ फड़कने लगे और नेत्र लाल अंगारों की भाँति दहक उठे।

भरत पीछे हट गए और उन्होंने कैकेयी की ओर उंगली उठाकर गरजते हुए कहा:

भरत की प्रचंड गर्जना और धिक्कार:

"धिक्कार है तुझ पर, पापिनी! कुलघातिनी! तू मेरी माता नहीं, रघुकुल को भस्म करने वाली साक्षात कालरात्रि है! तूने महाराज जैसे सत्यवादी और धर्मनिष्ठ पति के प्राण ले लिए और मेरे भगवान तुल्य ज्येष्ठ भ्राता राम को, जो तुझे अपनी सगी माता कौशल्या से भी अधिक मानते थे, वल्कल वस्त्र पहनाकर वनों में भटकने के लिए निर्वासित कर दिया! क्या तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आई?

तूने मुझे संसार भर के सामने कलंकित कर दिया! लोग अब मुझे क्या कहेंगे? क्या वे यह नहीं समझेंगे कि भरत ने राज्य के लोभ में अपनी माँ के साथ मिलकर पिता की हत्या कराई और बड़े भाई को वन भिजवा दिया? अरे दुष्टा! क्या तू रघुकुल की मर्यादा नहीं जानती? रघुकुल में सदा ज्येष्ठ पुत्र ही सिंहासन का स्वामी होता है। राम ही अयोध्या के वास्तविक राजा हैं और मैं उनका अदना सा सेवक हूँ। जिस राज्य को तूने मेरे पिता के प्राणों और भाई के वियोग की कीमत पर खरीदा है, उस पापमय राज्य को मैं विष की भाँति ठुकराता हूँ! मैं कभी राजा नहीं बनूँगा।"

भरत के इस अप्रत्याशित और भयानक क्रोध को देखकर कैकेयी सन्न रह गई। उसने जिस पुत्र के लिए समस्त मर्यादाओं को ताक पर रख दिया था, उसी पुत्र ने उसे जीवन का सबसे बड़ा धिक्कार दे दिया था। कैकेयी का अहंकार और लोभ भरत के भ्रातृ-प्रेम की प्रखर ज्वाला में जलकर राख हो गया।

मंथरा-दंड पर भरत का विवेक, माता कौशल्या के सम्मुख निष्पाप शपथ और दशरथ का अंतिम संस्कार

1. मंथरा का आगमन और शत्रुघ्न का संहारक क्रोध

जिस समय भरत कैकेयी को धिक्कार रहे थे, उसी समय इस समस्त विनाश की मूल सूत्रधार दासी मंथरा सज-धजकर वहाँ पहुँची। वह बहुमूल्य रेशमी वस्त्र और स्वर्णाभूषण धारण किए हुए थी, और अपनी चाल में इतराती हुई आ रही थी। उसे अहंकार था कि उसी की कूटनीति के कारण कैकेयी का मनोरथ सिद्ध हुआ और भरत को चक्रवर्ती साम्राज्य प्राप्त हुआ, अतः उसे अपार धन और पुरस्कार मिलेगा।

कक्ष के बाहर खड़े अनुज शत्रुघ्न ने जब मंथरा को इस उद्धत रूप में देखा, तो उनके क्रोध की कोई सीमा न रही। शत्रुघ्न ने एक ही झपट्टे में मंथरा को दबोच लिया, उसे ज़मीन पर पटक दिया और लातों से प्रहार करने लगे। शत्रुघ्न ने उसके केश पकड़कर घसीटना शुरू कर दिया। मंथरा के आभूषण टूट-टूटकर फर्श पर बिखर गए और वह प्राण-रक्षा के लिए कैकेयी को पुकारते हुए चीखने-चिल्लाने लगी।

2. भरत का विवेकपूर्ण हस्तक्षेप और मर्यादा-रक्षा

मंथरा की चीखें सुनकर भरत तुरंत बाहर आए। उन्होंने देखा कि शत्रुघ्न क्रोध में अंधा होकर मंथरा का वध करने पर उतारू है। भरत ने तुरंत आगे बढ़कर शत्रुघ्न का हाथ पकड़ लिया और अत्यंत दृढ़ता एवं विवेक के साथ कहा:

भरत का विवेकपूर्ण नीति-वचन:

"हे अनुज शत्रुघ्न! अपने क्रोध को शांत करो। मंथरा निस्संदेह अत्यंत दुष्ट और पापिनी है, और सच पूछो तो इस अनर्थ की मूल जड़ मेरी माता कैकेयी है। यदि स्त्री-हत्या पाप न होती, तो मैं स्वयं कैकेयी का त्याग या वध कर देता। किंतु रघुकुल के क्षत्रिय कभी किसी असहाय, कुबड़ी और वृद्ध स्त्री पर शस्त्र नहीं उठाते।

स्मरण रखो अनुज! यदि हमारे धर्मपरायण ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम को लेशमात्र भी यह समाचार मिल गया कि हमने क्रोध में आकर किसी स्त्री की हत्या कर दी है, तो वे जीवनभर हमसे कभी बात नहीं करेंगे और कभी अयोध्या नहीं लौटेंगे।"

श्रीराम का नाम सुनते ही शत्रुघ्न का हाथ ढीला पड़ गया। उन्होंने मंथरा को झटककर छोड़ दिया। मंथरा थर-थर काँपती हुई कैकेयी के चरणों में जा गिरी। भरत के इस आचरण से स्पष्ट होता है कि वे अत्यंत विकट और उत्तेजक परिस्थितियों में भी धर्म, नीति और मर्यादा का संतुलन नहीं खोते थे।

3. माता कौशल्या के प्रासाद में भरत का क्रंदन और निष्पाप शपथ

कैकेयी के प्रासाद से निकलकर भरत और शत्रुघ्न सीधे बड़ी माता कौशल्या के प्रासाद की ओर दौड़े। कौशल्या अपने प्रिय पुत्र राम और पति दशरथ के वियोग में कृशकाय, निष्प्राण और आंसुओं में डूबी हुई भूमि पर पड़ी थीं। भरत को आते देखकर कौशल्या के हृदय में पीड़ा की एक टीस उठी।

कौशल्या ने करुण और व्यंग्य भरे स्वर में कहा—"आओ भरत! तुम्हारा स्वागत है। तुम्हारी माता कैकेयी ने छल-बल से तुम्हारे लिए अयोध्या का निष्कंटक राज्य प्राप्त कर लिया है। अब तुम सुख से राजा बनो और इस राज्य का उपभोग करो। बस मुझ अभागिन पर इतनी दया करो कि मुझे भी किसी रथ में बैठाकर उस वन में भिजवा दो जहाँ मेरे सुकुमार राम, सीता और लक्ष्मण नंगे पैर भटक रहे हैं।"

माता कौशल्या के इन तीखे वचनों ने भरत के कलेजे को छलनी कर दिया। वे कौशल्या के दोनों चरण पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगे। अपनी निष्पाप आत्मा का प्रमाण देने के लिए भरत ने जो कठोर शपथें लीं, वे इतिहास में अनुपमेय हैं:

भरत द्वारा ली गई भीषण आत्म-शपथें:

  • "हे माते! यदि श्रीराम के वनवास और पिताजी के निधन के षड्यंत्र में मेरी लेशमात्र भी सहमति या पूर्व-जानकारी रही हो, तो मुझे वह घोर पाप लगे जो गुरु-द्रोही, माता-पिता के अपमानकर्ता और मित्रघाती को लगता है।"
  • "मुझे वह भयंकर दुर्गति मिले जो वेदों को बेचने वाले, पराई स्त्री का हरण करने वाले और गऊ तथा ब्राह्मण की हत्या करने वाले अधम पापी को रौरव नर्क में मिलती है।"
  • "जो पाप संध्या-वंदन न करने वाले, राजा के साथ विश्वासघात करने वाले और भूखे अतिथि को द्वार से लौटाने वाले को प्राप्त होता है, वह समस्त पाप मुझे लगे यदि मेरे मन में राज्य का स्वप्न भी आया हो!"

भरत के इन करुण और निष्कपट वचनों ने कौशल्या के हृदय से संशय का हर कण धो दिया। कौशल्या का वात्सल्य उमड़ पड़ा। उन्होंने भरत को भूमि से उठाकर अपनी छाती से चिपटा लिया और रोते हुए उनके आँसू पोंछे। कौशल्या ने कहा—"तात भरत! मैं जानती हूँ कि तुम निष्पाप हो। तुम्हारा धर्म और तुम्हारी निष्ठा श्रीराम के प्रति सुमेरु पर्वत के समान अडिग है। तुमने अपने निर्मल चरित्र से रघुकुल की कीर्ति को और ऊँचा उठा दिया है।" दोनों माता और पुत्र देर तक एक-दूसरे के गले लगकर विलाप करते रहे।

4. महाराज दशरथ का अंतिम संस्कार और श्राद्ध-कर्म

अगले दिन प्रातःकाल कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ मंत्रियों सहित राजमहल पहुँचे। उन्होंने भरत को ढांढस बंधाया और स्मरण कराया कि शोक में समय गंवाना राजा और राजकुमारों के लिए अनुचित है। पिता के शरीर को सुरक्षित रखे कई दिन बीत चुके थे, अतः उनका अंतिम संस्कार अविलंब होना आवश्यक था।

तैल-द्रोणी से महाराज दशरथ के पावन शरीर को बाहर निकाला गया। उन्हें दिव्य वस्त्रों, गंध, पुष्पों और आभूषणों से सुसज्जित कर एक विशाल स्वर्णिम शिविका (विमान) पर रखा गया। संपूर्ण अयोध्या नगरी अश्रु बहाती हुई सरयू नदी के पावन तट की ओर चल पड़ी।

  • सरयू तट पर सुगंधित चंदन, अगरु और कपूर की विशाल चिता बनाई गई।
  • वैदिक मंत्रोच्चार और सामवेद के ऋचाओं के पाठ के बीच भरत ने जेष्ठ पुत्र (राम) की अनुपस्थिति में पिता को मुखाग्नि दी।
  • तीनों माताओं और समस्त रनिवास ने सरयू के जल में खड़े होकर महाराज को जलांजलि अर्पित की।
  • दशरथ जी के अंतिम संस्कार के पश्चात दस दिनों तक विधिवत अशौच-पालन किया गया और ग्यारहवें तथा बारहवें दिन ब्राह्मणों को अपार दान-दक्षिणा, गायें, वस्त्र और अन्न देकर श्राद्ध-कर्म संपन्न हुआ।

इस प्रकार पिता के लौकिक ऋण से मुक्त होने के पश्चात भरत के सम्मुख अयोध्या के शासन और भविष्य का सबसे बड़ा धर्म-संकट उपस्थित हुआ।

राजसभा में धर्म-निर्णय, साम्राज्य का त्याग और सेना सहित चित्रकूट की ओर महाप्रस्थान

1. चौदहवें दिन राजसभा का आयोजन और सिंहासन का प्रस्ताव

महाराज दशरथ के श्राद्ध-कर्म की समाप्ति के पश्चात चौदहवें दिन अयोध्या की मुख्य राजसभा बुलाई गई। राजमहल का विशाल सभा-मंडप मंत्रियों, सेनापतियों, सामंतों, महर्षि वशिष्ठ, वामदेव, जाबालि और नगर के प्रमुख श्रेष्ठियों (व्यापारियों एवं गणमान्य नागरिकों) से खचाखच भरा हुआ था। सभा के मध्य में रघुकुल का वह प्रतापी मणिरत्न-जटित राजसिंहासन रखा था, जो आज राजा के अभाव में सूना और उदास था।

कुलाधिपति महर्षि वशिष्ठ ने सभा को संबोधित करते हुए अत्यंत गंभीर स्वर में कहा:

महर्षि वशिष्ठ का राजधर्म-प्रस्ताव:

"हे तात भरत! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ ने अपने सत्य और वचनों का पालन करते हुए परमगति प्राप्त की। श्रीराम पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर वन प्रस्थान कर चुके हैं। अब यह निष्कंटक, समृद्ध और विशाल साम्राज्य तुम्हारे पिता द्वारा तुम्हें सौंपा गया है। बिना राजा के राष्ट्र जल विहीन नौका और बिना सारथी के रथ की भाँति नष्ट हो जाता है। अराजकता से प्रजा की रक्षा करना तुम्हारा परम धर्म है। अतः तुम कुल-परंपरा और पितृ-आज्ञा के अनुसार इस राजसिंहासन पर विराजमान होकर प्रजा का पालन करो।"

2. भरत का ऐतिहासिक धर्म-निर्णय: साम्राज्य का अस्वीकार

महर्षि वशिष्ठ का प्रस्ताव सुनकर भरत सभा के मध्य खड़े हो गए। उनकी आँखें डबडबा आईं और हाथ जोड़कर कांपते कंठ से उन्होंने जो उत्तर दिया, उसने समूची राजसभा को विस्मय और श्रद्धा से स्तब्ध कर दिया:

भरत का अमर वक्तव्य:

"हे पूज्य कुलगुरु! हे धर्मज्ञ सभासदों! आप सब मुझे यह कैसा पापमय परामर्श दे रहे हैं? क्या इक्ष्वाकु वंश में कभी कनिष्ठ पुत्र ने अपने धर्मात्मा ज्येष्ठ भ्राता के जीवित रहते राजमुकुट धारण किया है? रघुकुल की अनादि रीति है—'ज्येष्ठो राजा भवेत्' (ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता है)। श्रीराम हम सबमें ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, धर्मपरायण, नीतिवान और सर्वप्रिय हैं। अयोध्या का राजसिंहासन केवल और केवल मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का है।

मेरी माता कैकेयी ने जो कुबुद्धि और लोभवश राज्य माँगा, वह उनका अज्ञान था, मेरा संकल्प नहीं। मैं उस पाप का भागीदार कभी नहीं बनूँगा। मैं घोषणा करता हूँ कि मैं राजा नहीं बनूँगा! मैं कल प्रातःकाल ही समस्त अयोध्यावासियों, सेना और माताओं सहित चित्रकूट वन जाऊँगा। मैं भ्राता राम के चरणों में गिरकर क्षमा माँगूँगा और उन्हें ससम्मान अयोध्या वापस लाकर इसी सिंहासन पर प्रतिष्ठित करूँगा। यदि वे नहीं लौटे, तो मैं भी चौदह वर्ष तक उन्हीं के साथ वन में कंद-मूल खाकर तपस्या करूँगा!"

भरत के इस अलौकिक त्याग और भ्रातृ-भक्ति को सुनकर राजसभा में उपस्थित मंत्रियों, मुनियों और नागरिकों की आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे। समूचा सभा-भवन 'जय भरत! धन्य भरत!' के गगनभेदी जयकारों से गूँज उठा।

3. चित्रकूट प्रस्थान की अभूतपूर्व तैयारियाँ

भरत के निर्णय के साथ ही संपूर्ण अयोध्या में नई चेतना और आशा की लहर दौड़ गई। नगर-निवासियों को लगा कि उनके प्राणप्रिय राम अब पुनः लौट आएँगे। सुमंत और सेनापतियों को तुरंत आदेश दिए गए कि चित्रकूट यात्रा की व्यापक तैयारियाँ की जाएँ:

  • मार्ग-निर्माण दल: बीहड़ जंगलों, काँटों और नदियों को पार करने के लिए कुशल वास्तुकारों, बढ़इयों, सुरंग-खोदकों और श्रमिकों का एक विशाल दल आगे भेजा गया, जिसने मार्गों को समतल किया और नदियों पर अस्थायी पुल बनाए।
  • चतुरंगिणी सेना: लाखों पैदल सैनिक, हज़ारों सुसज्जित रथ, अश्वारोही और गजसेना भरत की सुरक्षा और सम्मान हेतु साथ चली।
  • रनिवास और ऋषिगण: तीनों माताएँ—कौशल्या, सुमित्रा और पश्चाताप में दग्ध कैकेयी अलग-अलग पालकियों में सवार हुईं। महर्षि वशिष्ठ, वामदेव और अनेक ब्रह्मर्षि अपने शिष्यों सहित चले।
  • अयोध्या के नागरिक: व्यापारी, शिल्पी, वैद्य, किसान और सामान्य नागरिक अपने-अपने वाहनों, बैलगाड़ियों और पैदल ही राम-दर्शन की लालसा में चल पड़े। ऐसा प्रतीत होता था मानो समूची अयोध्या नगरी ही उठकर चित्रकूट की ओर चल पड़ी हो।

किंतु भरत और शत्रुघ्न ने राजसी सुखों का पूर्ण त्याग कर दिया था। दोनों भाइयों ने रेशमी वस्त्र उतारकर सूती वल्कल धारण किए और राजरथ का त्याग कर सामान्य रूप से सेना के अग्रभाग में चले।

श्रृंगवेरपुर में गुह-मिलन, प्रयाग में भारद्वाज आश्रम का आतिथ्य और लक्ष्मण की शंका

1. श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह का संशय और भावुक मिलन

अयोध्या की विशाल वाहिनी जब गंगा नदी के पावन तट पर स्थित श्रृंगवेरपुर पहुँची, तो वहाँ के राजा निषादराज गुह ने दूर से चतुरंगिणी सेना की विशाल धूल और अयोध्या की ध्वजा देखी।

गुह के मन में भीषण संदेह उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा—"कैकेयी का पुत्र भरत इतनी विशाल सेना लेकर वन में क्यों आया है? अवश्य ही वह निर्दोष और असहाय राम-लक्ष्मण को समाप्त करके अपने राज्य को सदा के लिए निष्कंटक बनाना चाहता है।" गुह ने तुरंत अपने निषाद वीरों को सावधान किया और गंगा के घाटों पर सैकड़ों नावें तैनात कर युद्ध की घोषणा कर दी।

किंतु जब महामात्य सुमंत ने गुह को संदेश भेजा और गुह स्वयं भरत के निकट पहुँचे, तो दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। भरत किसी विजयी राजा की भाँति नहीं, बल्कि एक दीन-हीन तपस्वी की भाँति अश्रु बहा रहे थे। भरत ने निषादराज को देखते ही उन्हें बड़े भाई राम का आत्मीय सखा मानकर अत्यंत प्रेम से गले लगा लिया।

इंगुदी वृक्ष और तृण-शय्या का मर्मस्पर्शी प्रसंग:

निषादराज गुह भरत को उस पवित्र इंगुदी वृक्ष के नीचे ले गए जहाँ राम और सीता ने वन जाते समय पहली रात विश्राम किया था। गुह ने वह कुश और तृण (घास) की शैया दिखाई जिस पर कोमल अंगों वाले राम-जानकी सोए थे।

उस तृण-शय्या को देखकर भरत व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़े। उन्होंने तृणों को अपने माथे से लगाया और विलाप करते हुए बोले—"हाय! जो मेरे भगवान राम अयोध्या के महलों में मणियों और हंस-तूलिका के गद्दों पर सोते थे, उन्हें इस कठोर और कँटीली धरती पर सोना पड़ा! यह सब मेरे ही कारण हुआ। धिक्कार है मुझ पापी के जन्म पर!" भरत ने उस रात राजसी भोजन ग्रहण नहीं किया; केवल गंगा-जल पीकर वे भी उसी धूल और घास पर सोए।

2. प्रयाग में महर्षि भारद्वाज का आश्रम और दिव्य आतिथ्य

अगले दिन निषादराज गुह ने पाँच सौ बड़ी नावों की सहायता से भरत की समूची सेना, रनिवास और नागरिकों को गंगा पार कराया। वहाँ से वाहिनी प्रयागराज (गंगा, यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम) पहुँची, जहाँ महर्षि भारद्वाज का दिव्य तपोवन था।

भरत ने सेना को आश्रम से एक कोस दूर ही रोक दिया और स्वयं नंगे पाँव, हाथ जोड़े महर्षि भारद्वाज के चरणों में उपस्थित हुए। महर्षि भारद्वाज ने भरत के मन की परीक्षा लेने के लिए पूछा—"हे भरत! तुम विशाल चतुरंगिणी सेना लेकर वन में क्यों घूम रहे हो? क्या तुम्हारा उद्देश्य राम पर कोई अनुचित दबाव बनाना है?"

भरत की आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने कहा—"भगवन! क्या आप भी मुझे दोषी समझते हैं? मैं तो केवल प्रभु राम को अयोध्या लौटाने और उनका दास बनकर उनकी चरण-सेवा करने आया हूँ।" भरत की निर्मलता देखकर भारद्वाज मुनि भावविभोर हो गए। उन्होंने अपनी तपोबल और कामधेनु के प्रभाव से संपूर्ण सेना, मंत्रियों और रनिवास को एक ही रात में अलौकिक दिव्य भोजन, आवास और विश्राम प्रदान किया। प्रातःकाल महर्षि ने भरत को आशीर्वाद दिया और चित्रकूट पर्वत तथा मंदाकिनी नदी का मार्ग दिखाया।

3. चित्रकूट में सेना की आहट और लक्ष्मण का भयानक रोष

जब अयोध्या की विशाल सेना मंदाकिनी के निकट चित्रकूट पर्वत की घाटी में पहुँची, तो हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की हिनहिनाहट और रथों के पहियों की घर्घराहट से पूरा वन काँप उठा। आकाश में धूल का विशाल गुबार छा गया।

पर्णकुटी के बाहर बैठे लक्ष्मण ने जब यह कोलाहल सुना और वन के हिंसक पशु-पक्षियों को भयभीत होकर भागते देखा, तो वे तुरंत एक ऊँचे साल वृक्ष पर चढ़ गए। दूर क्षितिज पर अयोध्या की चतुरंगिणी सेना और उस पर फहराती हुई कोविदार वृक्ष के चिह्न वाली राजध्वजा देखकर लक्ष्मण का खून खौल उठा।

लक्ष्मण का उग्र आक्रोश:

लक्ष्मण वृक्ष से कूदकर नीचे आए, अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई और क्रोध से काँपते हुए श्रीराम से बोले—"भैया! सावधान हो जाइए! धनुष-बाण उठा लीजिए और सीता जी को गुफा में सुरक्षित कर दीजिए! वह दुष्ट कैकेयी-पुत्र भरत सेना लेकर हमें वन में अकेला पाकर मार डालने आया है ताकि वह निष्कंटक राज्य भोग सके। आज मैं अपने तीखे बाणों से भरत, उसकी सेना और कैकेयी के षड्यंत्र का समूल नाश कर दूँगा! आज मेरा धनुष रक्त की प्यास बुझाएगा!"

4. श्रीराम का विवेकपूर्ण समाधान और भरत के प्रति अटूट विश्वास

लक्ष्मण के इस भयानक क्रोध को देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम लेशमात्र भी विचलित नहीं हुए। वे मंद-मंद मुस्कुराए और अत्यंत शांत, मधुर एवं गंभीर स्वर में बोले:

श्रीराम का लक्ष्मण को उपदेश:

"लक्ष्मण! जब भरत स्वयं यहाँ आ रहे हैं, तो तुम्हें धनुष-बाण उठाने की क्या आवश्यकता है? तुम भरत के शील और अंतःकरण को नहीं पहचानते। भरत मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं और मैं भरत को। भरत ने स्वप्न में भी कभी अनीति का आचरण नहीं किया।

वे अयोध्या का समाचार देने और मुझे वापस अयोध्या ले जाने के लिए ही इतनी बड़ी सेना और माताओं को साथ लाए हैं। यदि तुम्हारे मन में अयोध्या के राजसिंहासन का कोई लोभ है, तो कहो, मैं आज ही भरत से कहकर वह राज्य तुम्हें दिलवा दूँगा। किंतु भरत के प्रति ऐसा संशय अपने मन में कभी मत लाना।"

श्रीराम के इन गंभीर और मर्मस्पर्शी वचनों को सुनकर लक्ष्मण लज्जा से गड़ गए। उनका सिर नीचे झुक गया, उन्होंने धनुष-बाण नीचे रख दिए और अपने अग्रज की अंतर्दृष्टि के सम्मुख नतमस्तक हो गए।

चित्रकूट में राम-भरत का अश्रुपूर्ण मिलन, पितृ-तर्पण और ऐतिहासिक धर्म-सभा का संवाद

1. पर्णकुटी के समीप राम-भरत का अश्रुपूर्ण महामिलन

भरत ने अपनी विशाल सेना को पर्णकुटी से पर्याप्त दूरी पर ही ठहरने की आज्ञा दी ताकि आश्रम की पवित्र शांति और वन्य जीवों को कोई कष्ट न हो। वे स्वयं अनुज शत्रुघ्न और सुमंत के साथ पैदल ही उस दिशा में दौड़े जहाँ से हवन के पवित्र धुएँ की सुगंध आ रही थी।

सामने का दृश्य देखकर भरत की गति सहसा रुक गई। एक शिला पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बैठे थे—मस्तक पर जटाजूट बँधा हुआ था, शरीर पर वल्कल वस्त्र (वृक्षों की छाल) थे, कंधे पर धनुष-बाण रखे थे और मुखमंडल पर असीम तेज और करुणा थी। उनके पास ही जनकनंदिनी सीता और अनुज लक्ष्मण खड़े थे।

भरत 'हे आर्य! हे भ्राता!' की करुण पुकार करते हुए पागलों की भाँति दौड़े और सीधे श्रीराम के श्रीचरणों में गिर पड़े। भरत का कंठ रुंध गया, वाणी स्तब्ध हो गई और उनके नेत्रों से अश्रुओं की ऐसी अविरल धारा बही कि श्रीराम के चरण धुल गए। भरत केवल रो रहे थे, एक शब्द भी उनके मुख से नहीं निकल पा रहा था।

अलौकिक भ्रातृ-मिलन:

श्रीराम ने झुककर भरत को दोनों हाथों से उठाया और अपनी छाती से भींच लिया। दोनों भाइयों के अश्रुओं का ऐसा संगम हुआ जिसे देखकर वन के मृग और पक्षी भी ठिठक कर खड़े हो गए। श्रीराम ने शत्रुघ्न को भी गले लगाया। लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न गले मिले। सीता जी ने दोनों देवरों को आशीर्वाद दिया। उस समय पर्णकुटी का वातावरण प्रेम और वेदना के चरम उत्कर्ष पर था।

2. पिता के देहावसान का समाचार और मंदाकिनी तट पर तर्पण

कुशल-क्षेम के अनंतर जब श्रीराम ने स्नेह से पूछा—"तात भरत! पूज्य पिता महाराज दशरथ सकुशल तो हैं? वे यहाँ क्यों नहीं आए?" तब भरत का धैर्य पूरी तरह टूट गया। वे फूट-फूटकर रोते हुए बोले—"हे भैया! जिन पिता के प्राण केवल आप में बसते थे, वे आपके वन-गमन का दारुण वियोग न सह सके और 'हा राम!' पुकारते हुए स्वर्ग सिधार गए। हम अनाथ हो गए भैया!"

पिता के निधन का समाचार सुनते ही श्रीराम पर मानो वज्रपात हुआ। वे संज्ञाशून्य होकर भूमि पर गिर पड़े। लक्ष्मण, भरत और सीता ने जल छिड़ककर उन्हें चेतना में लाया। श्रीराम देर तक पिता के गुणों का स्मरण कर विलाप करते रहे।

तदुपरांत महर्षि वशिष्ठ के निर्देश पर श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न पवित्र मंदाकिनी नदी के तट पर गए। श्रीराम ने पिता के निमित्त मंदाकिनी के पावन जल से तिलांजलि (तर्पण) दी और वन में उपलब्ध इंगुदी के गूदे और बदरी (बेर) का पिंड बनाकर अर्पित किया। श्रीराम ने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा—"हे पूज्य पिता! जो अन्न मनुष्य स्वयं खाता है, वही अपने देवताओं और पितरों को अर्पित करता है। वनवासी रूप में आज मैं आपको यही अर्पण कर रहा हूँ, इसे स्वीकार करें।"

3. चित्रकूट की ऐतिहासिक धर्म-सभा: भरत-राम का दार्शनिक संवाद

अगले दिन प्रातःकाल पर्णकुटी के सम्मुख एक विशाल धर्म-सभा बैठी। इसमें महर्षि वशिष्ठ, जाबालि, तीनों माताएँ (कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी), मंत्री सुमंत और प्रमुख नागरिक उपस्थित थे। पश्चाताप की अग्नि में जल रही कैकेयी भी सिर झुकाए बैठी थी।

भरत ने हाथ जोड़कर भरी सभा में श्रीराम से करबद्ध प्रार्थना की:

भरत की प्रार्थना:

"हे रघुकुल-भूषण! अयोध्या का साम्राज्य आपका है। धर्म और न्याय के अनुसार आप ही हमारे राजा हैं। मेरी माता कैकेयी ने जो अपराध किया, उसे क्षमा कीजिए। एक बालक के रूप में मैं आपके चरणों में यह समूचा राज्य लौटाने आया हूँ। आप अयोध्या चलिए, राज्याभिषेक कराइए और अनाथ प्रजा को सनाथ कीजिए।"

माता कौशल्या और यहाँ तक कि कैकेयी ने भी अश्रुपूरित नेत्रों से राम से अयोध्या लौटने का अनुरोध किया। महर्षि जाबालि ने सांसारिक और लौकिक तर्कों का सहारा लेकर राम को समझाने का यत्न किया, किंतु श्रीराम सत्य और धर्म के मेरुदंड की भाँति अडिग रहे।

श्रीराम का धर्मनिष्ठ और अडिग उत्तर:

"हे तात भरत! तुम धर्म के ज्ञाता हो। पूज्य पिता ने सत्य की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। उन्होंने मुझे चौदह वर्ष के लिए वनवास और तुम्हें अयोध्या का राज्य सौंपा। यदि हम दोनों में से किसी ने भी पिता की आज्ञा का उल्लंघन किया, तो पिता के सत्य पर कलंक लग जाएगा।

सत्य ही संसार की आधारशिला है। पुत्र का सर्वोच्च धर्म पिता के वचनों को जीवित रखना है। अतः मैं चौदह वर्ष की अवधि पूर्ण किए बिना अयोध्या के राजभवन में प्रवेश नहीं करूँगा। तुम अयोध्या लौटकर प्रजा का पालन करो और मैं यहाँ वन में रहकर पितृ-आज्ञा का पालन करूँगा। हम दोनों मिलकर पिता के धर्म-संकल्प को पूर्ण करेंगे।"

श्रीराम के इस अकाट्य और परम धर्मनिष्ठ उत्तर के सम्मुख वशिष्ठ, जाबालि और भरत सहित समूची सभा निरुत्तर हो गई।

पावन चरण-पादुका की प्राप्ति, नंदीग्राम की कठोर तपस्या और सत्ता का न्यासी स्वरूप

1. चरण-पादुका (खड़ाऊँ) की याचना और समर्पण

जब भरत ने भली-भाँति देख लिया कि श्रीराम अपने सत्य-व्रत और पितृ-आज्ञा के संकल्प से किसी भी प्रकार विचलित नहीं होंगे, तब उन्होंने एक अद्भुत, युगांतकारी और अप्रतिम मार्ग चुना।

भरत ने अपने साथ लाई हुई काष्ठ (लकड़ी) की नई चरण-पादुकाएँ (खड़ाऊँ) निकालीं और अत्यंत आदरपूर्वक श्रीराम के चरणों के सम्मुख रख दीं। भरत ने करबद्ध होकर प्रार्थना की:

भरत की पादुका-याचना:

"हे नाथ! यदि आप अयोध्या नहीं लौट सकते, तो कृपा करके इन चरण-पादुकाओं पर अपने पावन चरण रख दीजिए। ये चरण-पादुकाएँ ही अब अयोध्या के राजसिंहासन को सुशोभित करेंगी। ये पादुकाएँ ही समस्त प्रजा की रक्षा करेंगी और रघुकुल का शासन चलाएँगी। मैं केवल इन पादुकाओं का सेवक बनकर इनकी आज्ञा का पालन करूँगा।"

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भरत के असीम प्रेम और त्याग को स्वीकार करते हुए उन काष्ठ-पादुकाओं पर अपने चरण रखे। भरत ने उन पवित्र पादुकाओं को अपनी दोनों आँखों से लगाया और अत्यंत श्रद्धापूर्वक अपने मस्तक पर धारण कर लिया।

2. भरत की कठोर प्रतिज्ञा: नंदीग्राम में तपस्वी जीवन

पादुकाओं को मस्तक पर धारण कर भरत ने श्रीराम, कुलगुरु वशिष्ठ, माताओं और समूची प्रजा के सम्मुख एक अत्यंत कठोर और रोमांचकारी प्रतिज्ञा ली:

भरत की अग्नि-प्रतिज्ञा:
  • "हे पूज्य भ्राता! जब तक आप वन में वल्कल पहनकर तपस्वी का जीवन बिताएँगे, तब तक यह भरत भी अयोध्या के राजमहल में प्रवेश नहीं करेगा और किसी राजसी सुख का उपभोग नहीं करेगा।"
  • "मैं अयोध्या के बाहर नंदीग्राम में एक साधारण तृण-कुटिया बनाकर रहूँगा। आपकी भाँति जटा धारण करूँगा, वल्कल वस्त्र पहनूँगा और भूमि पर शयन कर कंद-मूल खाऊँगा।"
  • "आपकी ये चरण-पादुकाएँ अयोध्या के सिंहासन पर प्रतिष्ठित रहेंगी। प्रतिदिन प्रातःकाल इन पादुकाओं को प्रणाम कर, इनके आदेशानुसार एक सेवक और न्यासी (Trustee) की भाँति मैं राजकार्य सँभालूँगा।"
  • अग्नि-प्रवेश की चेतावनी: "किंतु स्मरण रहे प्रभु! चौदह वर्ष की अवधि पूर्ण होते ही जिस दिन आपका वनवास समाप्त होगा, यदि उसके अगले दिन सूर्योदय तक आप अयोध्या न लौटे, तो यह भरत जीवित नहीं रहेगा। मैं उसी क्षण चिता सजाकर अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दूँगा!"

श्रीराम ने भावविह्वल होकर भरत को गले लगाया, उन्हें वचन दिया कि वे चौदह वर्ष पूर्ण होते ही तुरंत लौटेंगे, और उन्हें माताओं तथा प्रजा की रक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा। भारी मन से अश्रु बहाती हुई अयोध्या की वाहिनी वापस लौटी।

3. नंदीग्राम में तपस्वी शासन और सत्ता का 'न्यासी सिद्धांत'

अयोध्या लौटकर भरत ने सर्वप्रथम एक भव्य राजदरबार में श्रीराम की पावन चरण-पादुकाओं को स्वर्ण-सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया। उन पर राजछत्र लगाया गया और चँवर डुलाए गए। इसके पश्चात भरत सीधे अयोध्या से कुछ मील दूर नंदीग्राम चले गए।

नंदीग्राम में भरत ने भूमि में एक गड्ढा खोदकर अपनी कुटिया बनाई ताकि वे श्रीराम से भी नीचे धरातल पर रह सकें। उन्होंने चौदह वर्ष तक संन्यासी की भाँति जीवन व्यतीत किया।

भरत के शासन का 'न्यासी सिद्धांत' (Trusteeship Model):

आधुनिक राजनीति और समाजशास्त्र में महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित 'ट्रस्टीशिप' (न्यासधारिता) का सिद्धांत भरत के इस आचरण से ही प्रेरित है:

  • सत्ता का विकेंद्रीकरण और वैराग्य: भरत ने सिद्ध किया कि सत्ता उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जनता की सेवा का उत्तरदायित्व है।
  • स्वामित्व का अभाव: भरत राज्य के स्वामी नहीं, बल्कि श्रीराम और प्रजा की धरोहर के संरक्षक (Caretaker) मात्र थे।
  • आदर्श प्रशासनिक शुचिता: प्रत्येक राजकीय निर्णय, कर-संग्रह और न्याय-प्रक्रिया पादुकाओं की अनुमति और रघुकुल की मर्यादा के अनुकूल की जाती थी। चौदह वर्ष बाद जब राम लौटे, तो अयोध्या का खजाना और राज्य पहले से कहीं अधिक समृद्ध और सुरक्षित था।

इस प्रकार 'चित्रकूट में भरत' अध्याय मानव-इतिहास में भ्रातृ-प्रेम, स्वार्थ-त्याग, राजधर्म और निष्काम सेवा का ऐसा स्वर्णिम अध्याय बन गया, जिसकी तुलना विश्व-साहित्य में कहीं अन्यत्र नहीं मिलती।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
कैकेय देश में प्रवास के दौरान भरत ने क्या अमंगल स्वप्न देखा और उसका उनके मन पर क्या प्रभाव पड़ा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

कैकेय देश (राजगृह) में भरत ने प्रातःकाल एक भयानक अमंगल स्वप्न देखा कि महाराज दशरथ जीर्ण-शीर्ण काले वस्त्र पहने हुए हैं, उनका रथ गधों द्वारा दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर खींचा जा रहा है और वे एक गहरे अंधकारमय गर्त में डूब रहे हैं। साथ ही समुद्र सूख गया है और आकाश से तारे टूट रहे हैं।

प्रभाव: इस भयानक स्वप्न से भरत का चित्त अत्यंत अशांत और भयभीत हो उठा। मित्रों द्वारा संगीत और मनोरंजन कराने पर भी उनकी उदासी दूर न हुई और उनके मन में यह पक्का विश्वास बैठ गया कि पिता दशरथ या भ्राता राम पर कोई दारुण विपत्ति आ पड़ी है।

उदाहरण 2
आठ दिनों की यात्रा के पश्चात अयोध्या में प्रवेश करते ही भरत को क्या अस्वाभाविक परिवर्तन दिखाई दिए? स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

अयोध्या पहुँचने पर भरत को निम्नलिखित अस्वाभाविक और डरावने परिवर्तन दिखाई दिए:

  1. श्मशानवत सन्नाटा: जिस अयोध्या में सदा उत्सव, वीणा-मृदंग की ध्वनियाँ और वेदमंत्र गूँजते थे, आज वहाँ श्मशान जैसी मूक नीरवता और गहरा अवसाद पसरा हुआ था।
  2. हाट-बाज़ारों की बंदी: नगर के मुख्य सिंहद्वार बंद थे, सड़कें धूल-धूसरित थीं, दुकानें बंद थीं और घरों में चूल्हे तक नहीं जले थे। उद्यानों के वृक्ष सूख चुके थे और पक्षी मूक थे।
  3. नागरिकों का विचलित व्यवहार: मार्ग में जो भी गिने-चुने नागरिक दिखाई दे रहे थे, वे मलिन वस्त्रों में, सिर झुकाए अश्रु बहा रहे थे। कोई भी भरत का स्वागत नहीं कर रहा था, बल्कि लोग मुँह फेरकर दबी जुबान से कानाफूसी कर रहे थे।

इन लक्षणों को देखकर भरत का मन किसी अनिष्ट की आशंका से थरथरा उठा।

उदाहरण 3
सज-धजकर आई मंथरा को शत्रुघ्न द्वारा दंडित किए जाने पर भरत ने क्या कहकर रोका? इससे भरत के किस चरित्र-गुण का पता चलता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

षड्यंत्र की सफलता पर आभूषण पहनकर इतराती आई मंथरा को जब शत्रुघ्न क्रोध में लातों से मारकर घसीटने लगे, तब भरत ने आगे बढ़कर शत्रुघ्न का हाथ पकड़ लिया और कहा:

  • स्त्री-अवध्यता का धर्म: एक असहाय, कुबड़ी और वृद्ध स्त्री पर शस्त्र उठाना क्षत्रिय धर्म और रघुकुल की मर्यादा के विरुद्ध है।
  • श्रीराम की अप्रसन्नता का भय: यदि धर्मात्मा ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम को यह ज्ञात हो गया कि हमने क्रोध में किसी स्त्री की हत्या कर दी है, तो वे जीवनभर हमसे कभी बात नहीं करेंगे और कभी अयोध्या नहीं लौटेंगे।

चरित्र-गुण: इससे भरत के असाधारण विवेक, क्षत्रिय मर्यादा-पालन, आवेग-नियंत्रण तथा ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम के सिद्धांतों के प्रति पूर्ण समर्पण का पता चलता है कि वे घोर संकट और उत्तेजना में भी अधर्म नहीं होने देते।

उदाहरण 4
चित्रकूट में अयोध्या की विशाल सेना को देखकर लक्ष्मण क्यों क्रोधित हो उठे और श्रीराम ने उन्हें किस प्रकार शांत किया? सविस्तार समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

चित्रकूट में अयोध्या की विशाल वाहिनी के कोलाहल को सुनकर लक्ष्मण जब एक ऊँचे साल वृक्ष पर चढ़े, तो उन्होंने अयोध्या की कोविदार-चिह्नित राजध्वजा देखी।

लक्ष्मण के क्रोध का कारण: लक्ष्मण ने सोचा कि कैकेयी का पुत्र भरत समूची चतुरंगिणी सेना लेकर वन में असहाय राम-लक्ष्मण का वध करने आया है ताकि अयोध्या का राज्य सदा के लिए उसके लिए निष्कंटक हो जाए। क्षत्रिय रक्त खौलने पर लक्ष्मण ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा ली और भरत तथा उसकी सेना का संहार करने की गर्जना करने लगे।

श्रीराम द्वारा समाधान एवं उपदेश: मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अत्यंत शांत भाव से मुस्कुराते हुए लक्ष्मण को समझाया:

  • भरत की धर्मनिष्ठा: भरत धर्म और प्रेम की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं; उन्होंने स्वप्न में भी कभी अनीति का विचार नहीं किया।
  • आगमन का वास्तविक उद्देश्य: भरत सेना लेकर युद्ध करने नहीं, बल्कि हमें ससम्मान अयोध्या वापस ले जाने और राजसिंहासन लौटाने आए हैं।
  • भ्रातृ-स्नेह की कसौटी: श्रीराम ने मार्मिक शब्दों में कहा कि यदि लक्ष्मण को अयोध्या के राज्य का लोभ है, तो वे भरत से कहकर वह राज्य लक्ष्मण को दिलवा देंगे, किंतु भरत पर कभी संशय न करें।

श्रीराम के इन गंभीर वचनों को सुनकर लक्ष्मण अत्यंत लज्जित हुए और उन्होंने अपना धनुष-बाण नीचे रख दिया।

उदाहरण 5
चित्रकूट की ऐतिहासिक धर्म-सभा में भरत के अयोध्या लौटने के आग्रह और श्रीराम के पितृ-सत्य पर अटल रहने के क्या मुख्य तर्क थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

चित्रकूट की धर्म-सभा में भरत और श्रीराम के मध्य अत्यंत उच्च दार्शनिक और नीतिपरक संवाद हुआ:

भरत के मुख्य तर्क:

  1. रघुकुल की सनातन रीति: इक्ष्वाकु वंश की अनादि परंपरा है कि ज्येष्ठ पुत्र ही राजा बनता है। राम सर्वगुण संपन्न और ज्येष्ठ हैं, अतः राज्य पर केवल उनका अधिकार है।
  2. माता के अपराध का परिमार्जन: कैकेयी ने जो वरदान माँगे, वे उनका अज्ञान था। उस कुकृत्य के लिए पूरी अयोध्या पश्चाताप कर रही है और कैकेयी स्वयं क्षमा माँग रही हैं।
  3. प्रजा का रक्षण: राजा के बिना अयोध्या अनाथ हो गई है। भरत स्वयं को बालक और अयोग्य बताते हुए राम के चरणों में राज्य समर्पित करते हैं।

श्रीराम के अडिग तर्क:

  1. सत्य और पितृ-आज्ञा का पालन: पूज्य पिता दशरथ ने सत्य की वेदी पर अपने प्राण न्यौछावर किए। पिता ने राम को वनवास और भरत को राज्य दिया। पिता के वचनों को खंडित करना अधर्म होगा।
  2. सत्य ही धर्म का मूल: संसार की सत्ता सत्य पर टिकी है। यदि रघुकुल का श्रेष्ठ पुत्र ही सत्य से डिग जाएगा, तो समूचा समाज मर्यादाहीन हो जाएगा।
  3. अवधि-पालन: श्रीराम ने स्पष्ट किया कि चौदह वर्ष की वनवास-अवधि पूरी किए बिना वे अयोध्या के राजमहल में कभी पैर नहीं रखेंगे।
उदाहरण 6
भरत द्वारा श्रीराम की चरण-पादुकाएँ (खड़ाऊँ) माँगने का क्या उद्देश्य था? उन्होंने नंदीग्राम में किस प्रकार चौदह वर्ष तक शासन किया और यह आधुनिक राजनीति के किस सिद्धांत को दर्शाता है? सविस्तार स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

1. चरण-पादुकाएँ माँगने का उद्देश्य:

जब श्रीराम ने पितृ-सत्य की रक्षा हेतु चौदह वर्ष से पहले लौटने से स्पष्ट मना कर दिया, तब भरत ने काष्ठ की चरण-पादुकाएँ माँगीं। इसका उद्देश्य यह था कि अयोध्या के सिंहासन पर किसी मनुष्य का नहीं, बल्कि श्रीराम के धर्म और सत्य के प्रतीक स्वरूप उनकी चरण-पादुकाओं का अधिष्ठान हो। भरत यह स्पष्ट करना चाहते थे कि राज्य के वास्तविक स्वामी श्रीराम ही हैं और वे स्वयं केवल उनके प्रतिनिधि (सेवक) हैं।

2. नंदीग्राम में तपस्वी शासन और कठोर प्रतिज्ञा:

  • भरत ने पादुकाओं को अयोध्या के स्वर्ण-सिंहासन पर स्थापित किया और स्वयं अयोध्या के बाहर नंदीग्राम में तृण-कुटिया बनाकर रहने लगे।
  • उन्होंने राजसी वस्त्रों का त्याग कर श्रीराम की भाँति जटा धारण की, वल्कल वस्त्र पहने और भूमि पर गड्ढा खोदकर शयन करते हुए कंद-मूल खाया।
  • प्रतिदिन प्रातः पादुकाओं की अनुमति और पूजा करके ही वे राजकीय आदेश जारी करते थे।
  • अग्नि-प्रतिज्ञा: भरत ने संकल्प लिया था कि यदि चौदह वर्ष की अवधि पूर्ण होते ही अगले दिन सूर्योदय तक राम न लौटे, तो वे अग्नि-समाधि ले लेंगे।

3. सत्ता का 'न्यासी सिद्धांत' (Trusteeship Model):

भरत का यह शासन आधुनिक राजनीति और समाजशास्त्र में महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित 'ट्रस्टीशिप' (न्यासधारिता सिद्धांत) का सर्वश्रेष्ठ ऐतिहासिक उदाहरण है। यह सिद्धांत सिखाता है कि शासक सत्ता का 'स्वामी' या 'उपभोगकर्ता' नहीं, बल्कि जनता और ईश्वर की 'धरोहर का संरक्षक (Trustee)' होता है। सत्ता व्यक्तिगत विलास के लिए नहीं, बल्कि निष्काम सेवा और न्याय के लिए होती है। भरत ने चौदह वर्ष तक बिना एक पाई का व्यक्तिगत उपभोग किए अयोध्या के कोष और सुरक्षा को अक्षुण्ण रखा, जो सुशासन का सर्वोच्च प्रतिमान है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
कैकेय देश में प्रवास के दौरान भरत ने क्या अमंगल स्वप्न देखा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भरत ने देखा कि महाराज दशरथ काले वस्त्र पहने हैं, उनका रथ गधे खींच रहे हैं, वे अंधकारमय गर्त में गिर रहे हैं, समुद्र सूख गया है और आकाश से तारे टूट रहे हैं।
काले वस्त्र, गधों का रथ, दक्षिण दिशा और सूखता समुद्र स्मरण करें।
2
अयोध्या नगरी में पहुँचने पर भरत ने क्या विचित्र और अस्वाभाविक स्थिति देखी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भरत ने देखा कि अयोध्या में श्मशान जैसा सन्नाटा पसरा है, दुकानें और मुख्य द्वार बंद हैं, घरों में चूल्हे नहीं जले हैं और नागरिक सिर झुकाए अश्रु बहा रहे हैं।
सड़कों की दशा, बाज़ारों का सन्नाटा और नागरिकों का व्यवहार स्मरण करें।
3
मंथरा को शत्रुघ्न के क्रोध से बचाते हुए भरत ने क्या नीतिपूर्ण तर्क दिया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भरत ने कहा कि असहाय और वृद्ध स्त्री पर शस्त्र उठाना क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध है, और यदि आर्य राम को यह ज्ञात हुआ कि हमने स्त्री की हत्या की, तो वे कभी बात नहीं करेंगे और अयोध्या नहीं लौटेंगे।
स्त्री-अवध्यता और श्रीराम की अप्रसन्नता का विचार करें।
4
श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह ने भरत को कौन सा भावुक स्थल दिखाया जिससे भरत रो पड़े?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: निषादराज गुह ने भरत को वह पावन इंगुदी वृक्ष और कुश-तृण (घास) की शैया दिखाई जहाँ वन जाते समय राम और सीता ने भूमि पर सोकर रात बिताई थी।
गंगा तट पर स्थित इंगुदी वृक्ष और घास की शैया का स्मरण करें।
5
चित्रकूट में अयोध्या की सेना देखकर लक्ष्मण क्यों क्रुद्ध हुए और श्रीराम ने उन्हें क्या समझाया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: लक्ष्मण ने समझा कि भरत निष्कंटक राज्य के लिए राम को मारने आए हैं और वे युद्ध के लिए उद्यत हो गए। श्रीराम ने समझाया कि भरत धर्म की मूर्ति हैं, वे केवल राज्य लौटाने आए हैं, उन पर कभी संशय न करो।
लक्ष्मण का आक्रमण का भ्रम और श्रीराम का भरत पर अटूट विश्वास स्मरण करें।
6
भरत ने नंदीग्राम में रहने और शासन करने के संबंध में क्या कठोर प्रतिज्ञा की?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भरत ने प्रतिज्ञा की कि वे पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर स्वयं नंदीग्राम में तपस्वी की भाँति कुटिया में रहकर शासन करेंगे। यदि 14 वर्ष पूरे होते ही राम अगले दिन न लौटे, तो वे अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग देंगे।
पादुकाओं का अधिष्ठान, तपस्वी जीवन और 14 वर्ष बाद अग्नि-समाधि की शर्त स्मरण करें।
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