1. ननिहाल (राजगृह) में भरत का अमंगलकारी दुःस्वप्न
कथा का आरंभ अयोध्या से सैकड़ों योजन दूर कैकेय देश की राजधानी राजगृह से होता है। भरत और उनके सबसे छोटे अनुज शत्रुघ्न अपने मामा युधाजित और नाना राजा अश्वपति के यहाँ प्रवास कर रहे थे। वे अयोध्या में घटित राजनैतिक उथल-पुथल, मंथरा के कुचक्र, कैकेयी द्वारा माँगे गए दो वरदानों, श्रीराम के वन-गमन तथा पिता दशरथ की अत्यंत संकटग्रस्त स्थिति से पूर्णतः अनभिज्ञ थे।
किंतु नियति के कठोर आघातों की पूर्व-सूचना अवचेतन मन को स्वप्नों के माध्यम से मिल जाती है। प्रातःकाल होने से ठीक पूर्व भरत ने एक अत्यंत भयावह और अमंगलकारी स्वप्न देखा। स्वप्न में उन्होंने देखा:
- काले वस्त्रों में पिता दशरथ: महाराज दशरथ जीर्ण-शीर्ण काले वस्त्र पहने हुए, सिर के बाल बिखेरे, मलिन मुख लिए एक मलिन गर्त में गिर रहे हैं।
- गधों द्वारा खींचा जाने वाला रथ: महाराज एक ऐसे रथ पर सवार हैं जिसे तीव्र गति से दौड़ने वाले गधे खींच रहे हैं और वह रथ दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर अंधकार में जा रहा है।
- प्रकृति का संहारक दृश्य: समुद्र सूख चुका है, आकाश से चंद्रमा और तारे टूट-टूटकर पृथ्वी पर गिर रहे हैं, चारों ओर हरे-भरे फलदार वृक्ष पत्ते विहीन होकर ठूँठ बन गए हैं और पर्वत चूर-चूर हो रहे हैं।
- अशुभ प्रतीकों का दर्शन: महाराज दशरथ पर्वत शिखर से नीचे गिद्धों और जंगली हिंसक पशुओं के बीच गिर रहे हैं और अंजुलि भर-भरकर तैल पी रहे हैं।
प्राचीन भारतीय स्वप्न-शास्त्र (स्वप्न मीमांसा) में दक्षिण दिशा की ओर गधों के रथ पर गमन, काले वस्त्र, तेल पीना और समुद्र का सूखना साक्षात मृत्यु और घोर कुल-विनाश के सूचक माने गए हैं। यह स्वप्न भरत के अंतर्मन में पिता और ज्येष्ठ भ्राता के प्रति अगाध प्रेम और दैवीय संवेदनशीलता को प्रकट करता है।
जब भरत जागे, तो उनका शरीर पसीने से भीगा हुआ था और चित्त अत्यंत अशांत था। शत्रुघ्न और उनके मित्र उन्हें वीणा, संगीत और आमोद-प्रमोद से बहलाने का यत्न करने लगे, किंतु भरत ने गहरी उदासी में कहा—"हे सखा! मेरा मन किसी भयानक अनिष्ट की आशंका से काँप रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि या तो मेरे पूज्य पिता महाराज दशरथ पर कोई दारुण विपत्ति आ पड़ी है, या फिर ज्येष्ठ भ्राता राम संकट में हैं।"
2. अयोध्या से तीव्रगामी दूतों का आगमन
उसी समय कैकेय के राजमहल के द्वार पर अयोध्या से आए घुड़सवार दूतों की घंटी बजी। ये दूत महर्षि वशिष्ठ और मंत्रियों द्वारा अत्यंत गुप्त रूप से भेजे गए थे। महाराज दशरथ का देहावसान हो चुका था और उनका पार्थिव शरीर तैल-द्रोणी में रखा हुआ था। अयोध्या का सिंहासन शून्य था और प्रजा पर अराजकता का संकट मंडरा रहा था।
महर्षि वशिष्ठ ने दूतों को कठोर चेतावनी देकर भेजा था—"कैकेय में किसी को भी यह ज्ञात न होने पाए कि राजा दशरथ का देहावसान हो गया है या राम वन चले गए हैं। भरत से केवल इतना कहना कि कुलगुरु और महाराज ने उन्हें तुरंत स्मरण किया है।"
दूतों ने राजसभा में उपस्थित होकर राजा अश्वपति और युधाजित को प्रणाम किया और भरत से निवेदन किया—"राजकुमार! अयोध्या में सब सकुशल हैं, किंतु महर्षि वशिष्ठ और मंत्रिपरिषद ने आपको अत्यंत आवश्यक कार्य हेतु अविलंब अयोध्या बुलाया है।"
भरत ने दूतों से बार-बार पिता दशरथ, माताओं और भ्राता राम के विषय में पूछा। दूतों ने नीति का पालन करते हुए रहस्य नहीं खोला, केवल इतना ही कहा कि वहाँ पहुँचने पर सब विदित हो जाएगा। भरत ने नाना से आज्ञा ली। राजा अश्वपति ने भरत को बहुमूल्य उपहार, उत्तम घोड़े और गजराज भेंट किए, किंतु भरत का मन इन उपहारों में लेशमात्र भी नहीं था। वे शत्रुघ्न के साथ अत्यंत वेगवान रथ पर सवार होकर अयोध्या की ओर चल पड़े।
3. आठ दिनों की थकावट भरी कठिन यात्रा
कैकेय देश (वर्तमान पश्चिमी पंजाब/अफगानिस्तान सीमांत क्षेत्र) से अयोध्या की दूरी सैकड़ों कोस थी। सामान्य रूप से इस यात्रा में कई सप्ताह लगते थे, किंतु भरत की व्याकुलता इतनी तीव्र थी कि उन्होंने दिन-रात रथों को दौड़ाया। नदियों, पर्वतों, बीहड़ों और वनों को पार करते हुए भरत का काफिला लगातार आठ दिन और आठ रात चलता रहा। मार्ग में घोड़ों के हाँफने और पहियों के टूटने की परवाह किए बिना भरत केवल एक ही विचार से संचालित थे—शीघ्रातिशीघ्र अयोध्या पहुँचना।
4. अयोध्या में प्रवेश: श्मशानवत नीरवता और स्तब्धता
आठवें दिन की संध्या को जब भरत का रथ अयोध्या की पावन सीमा में प्रविष्ट हुआ, तो उनके नेत्र फटे के फटे रह गए। जो अयोध्या नगरी कभी इंद्र की अमरावती के समान जगमगाती थी, जहाँ चौराहों पर पुष्प-वर्षा होती थी, वीणा और मृदंग की मधुर ध्वनियाँ गूँजती थीं, सुगंधित धूप का धुआँ उठता था और हँसते-खेलते नागरिकों की चहल-पहल रहती थी, आज वही अयोध्या एक श्मशान भूमि जैसी वीरान और डरावनी प्रतीत हो रही थी।
अयोध्या की त्रासदी के प्रत्यक्ष लक्षण:
| सामान्य अयोध्या का रूप | भरत के आगमन पर अयोध्या का रूप |
|---|---|
| हाट-बाज़ार खुले, व्यापार और उत्सव की हलचल | समस्त दुकानें और बाज़ार बंद, सड़कें धूल-धूसरित और सूनी |
| गृह-मंदिरों में यज्ञ-हवन, वेदपाठ और धूप की सुगंध | घरों में चूल्हे बुझे हुए, चारों ओर अंधकार और सन्नाटा |
| उद्यानों में मयूरों का नृत्य और कोकिल की कूक | वृक्षों के पत्ते पीले, पक्षी मूक और पशु उदास |
| राजकुमारों के स्वागत में जयघोष और पुष्प-वर्षा | नागरिक मुँह छिपाकर रोते हुए, दबी जुबान से कानाफूसी |
भरत ने सारथी से कांपते स्वर में कहा—"हे सारथी! यह क्या अनर्थ है? अयोध्या इतनी उदास क्यों है? कोई मेरा स्वागत क्यों नहीं कर रहा? मंदिरों में शंख की ध्वनि क्यों नहीं हो रही? लोग मुझे देखकर मुँह क्यों फेर रहे हैं?" सारथी के पास कोई उत्तर नहीं था, उसकी आँखें भी छलछला आईं। भरत का मन किसी महाविनाश के भय से बैठ गया और वे सीधे राजप्रासाद की ओर दौड़ पड़े।