ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 16
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
अवधपुरी में राम (Bal Ram Katha)
ऐतिहासिक एवं भौगोलिक पृष्ठभूमि तथा अयोध्या नगरी का अलौकिक वैभव:
प्रस्तुत अध्याय 'अवधपुरी में राम' पूरक पाठ्यपुस्तक 'बाल रामकथा' का प्रथम एवं अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह कथा मूल रूप से महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य 'रामायण' तथा गोस्वामी तुलसीदास रचित कालजयी महाकाव्य 'रामचरितमानस' पर आधारित है, जिसका सुगम, रोचक एवं बाल-सुलभ गद्य संक्षेपण प्रसिद्ध लेखक मधुकर उपाध्याय द्वारा किया गया है। कथा का आरंभ प्राचीन भारत के अत्यंत समृद्ध एवं विख्यात कोशल राज्य की राजधानी 'अयोध्या' के सजीव चित्रण से होता है। अयोध्या नगरी पावन सरयू नदी के सुरम्य तट पर बसी हुई थी। यह नगर केवल सुंदर ही नहीं, अपितु भव्यता, सुरुचि और स्थापत्य कला का अप्रतिम उदाहरण था। नगर की चौड़ी और स्वच्छ सड़कें दोनों ओर छायादार वृक्षों से सुशोभित थीं। विशाल और सुसज्जित भवनों के कंगूरे आकाश को छूते प्रतीत होते थे। नगर के चारों ओर गहरी खाई और सुदृढ़ सुरक्षा प्राचीर थी, जिसे भेद पाना शत्रुओं के लिए असंभव था। इसी कारण इस अजेय नगरी को 'अयोध्या' कहा गया (जिसे युद्ध में जीता न जा सके)। अयोध्या के उपवन, आम्रकुंज और सरोवर सुगंधित वायु और प्रफुल्लित कमलों से महकते रहते थे। सरयू का निर्मल, अविरल जल नगरवासियों के जीवन में पवित्रता और स्निग्धता का संचार करता था। नगर में कोई भी व्यक्ति निर्धन, दुखी, असहाय या अशिक्षित नहीं था। संपन्नता और सदाचार का ऐसा समन्वय केवल अयोध्या में ही दृष्टिगोचर होता था, मानो साक्षात इंद्रपुरी अमरावती भूतल पर उतर आई हो।
महाराज दशरथ का प्रजावत्सल शासन एवं रघुकुल की अमर मर्यादा:
अयोध्या के सिंहासन पर चक्रवर्ती महाराज अज के प्रतापी पुत्र राजा दशरथ आसीन थे। महाराज दशरथ अत्यंत शूरवीर, अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण, नीति-कुशल, धर्मपरायण और न्यायप्रिय शासक थे। वे केवल राजा नहीं, अपितु अपनी संपूर्ण प्रजा के पितामह समान संरक्षक थे। उनके राज्य में 'यथा राजा तथा प्रजा' की उक्ति चरितार्थ होती थी। प्रजा अपने राजा का अगाध सम्मान करती थी और सर्वत्र शांति, सुख तथा संतोष का साम्राज्य था। राजा दशरथ रघुकुल के गौरवशाली उत्तराधिकारी थे। रघुकुल की कीर्ति संपूर्ण आर्यावर्त में अपनी सत्यनिष्ठा और वचन-पालन के लिए विख्यात थी। रघुकुल की यह अटूट परंपरा थी—'रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्रान जाहुँ बरु बचन न जाई।' अर्थात रघुकुल के राजा अपने प्राण त्याग सकते थे, परंतु दिए गए वचन से कभी पीछे नहीं हट सकते थे। राजा दशरथ के पूर्वजों—राजा रघु, महाराज दिलीप, राजा सगर और सत्यवादी हरिश्चंद्र—ने इसी मर्यादा की रक्षा हेतु अपने सर्वस्व का उत्सर्ग किया था। दशरथ के मंत्रिगण, सेनापति और पुरोहित सभी नीतिज्ञ और निष्ठावान थे। राजकोष में अक्षय धन-धान्य संचित था और सेना अत्यंत अनुशासित तथा अजेय थी।
महाराज दशरथ की आन्तरिक व्यथा और संतानहीनता का संताप:
सांसारिक सुखों, अपार वैभव, कीर्ति और अजेय शक्ति के होते हुए भी महाराज दशरथ के जीवन में एक गहरा सूनापन था। उनकी कोई संतान नहीं थी। आयु के ढलने के साथ-साथ यह चिंता और भी सघन होती जा रही थी कि रघुकुल के गौरवशाली सिंहासन का उत्तराधिकारी कौन होगा? महाराज दशरथ की तीन रानियाँ थीं—महारानी कौशल्या, महारानी सुमित्रा और महारानी कैकेयी। महारानी कौशल्या स्वभाव से अत्यंत शांत, विदुषी और गंभीर थीं। महारानी सुमित्रा सौम्य, त्यागमयी और निष्काम भाव वाली थीं। महारानी कैकेयी अतीव रूपवती, चंचल और महाराज की विशेष प्रिय थीं। किंतु संतान के बिना तीनों रानियों के अंतःपुर में उदासी का सन्नाटा पसरा रहता था। जब भी राजसभा में या महलों में बच्चों की किलकारियों की चर्चा चलती, महाराज दशरथ का हृदय मसोसकर रह जाता था। संतानहीनता का यह संताप महाराज और तीनों रानियों को भीतर ही भीतर निरंतर दग्ध कर रहा था।
कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ का परामर्श एवं पुत्रकामेष्टि महायज्ञ का संपादन:
अंततः अपने संताप से मुक्ति पाने और रघुकुल के वंश को सुरक्षित रखने हेतु महाराज दशरथ ने अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ से एकांत में विमर्श किया। उन्होंने अत्यंत विनम्रतापूर्वक अपनी मनःस्थिति और उत्तराधिकारी के अभाव की पीड़ा गुरुदेव के चरणों में निवेदित की। त्रिकालदर्शी महर्षि वशिष्ठ महाराज के दुःख से भली-भाँति परिचित थे। उन्होंने राजा को धैर्य बँधाया और कहा कि उनके भाग्य में चार पराक्रमी पुत्रों का सुख लिखा है। महर्षि वशिष्ठ ने महाराज दशरथ को शास्त्रसम्मत 'पुत्रकामेष्टि महायज्ञ' कराने का परामर्श दिया। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि इस विशिष्ट यज्ञ के प्रधान आचार्य तपस्वी महर्षि ऋष्यशृंग (श्रृंगी ऋषि) होने चाहिए। महाराज दशरथ ने तत्काल यज्ञ की तैयारियाँ आरंभ करवा दीं। सरयू नदी के पावन तट पर एक भव्य, सुसज्जित यज्ञमंडप और यज्ञशाला का निर्माण किया गया। संपूर्ण आर्यावर्त के प्रसिद्ध राजाओं, तपस्वी मुनियों, वेदपाठी ब्राह्मणों और विद्वानों को सादर आमंत्रित किया गया। यज्ञशाला वेदमंत्रों की उदात्त ध्वनियों, शंखनाद और आहुतियों की सुगंध से गूँज उठी। महर्षि ऋष्यशृंग और महर्षि वशिष्ठ की देखरेख में यज्ञ संपूर्ण विधि-विधान से संपन्न हुआ।
अग्निदेव का प्राकट्य, दिव्य हविष्य (खीर) एवं चार राजकुमारों का जन्म:
जब पुत्रकामेष्टि यज्ञ की अंतिम पूर्णाहुति दी गई, तब यज्ञकुंड की प्रज्वलित लपटों के मध्य से साक्षात अग्निदेव एक स्वर्णपात्र में दिव्य हविष्य (खीर) लेकर प्रकट हुए। अग्निदेव ने राजा दशरथ से कहा कि वे इस अमृततुल्य प्रसाद को अपनी रानियों में बाँट दें, जिससे उन्हें अत्यंत तेजस्वी और यशस्वी पुत्रों की प्राप्ति होगी। महाराज दशरथ की प्रसन्नता का कोई पारावार न रहा। उन्होंने उस हविष्य का आधा भाग अपनी पटरानी कौशल्या को दिया। शेष आधे का आधा भाग महारानी कैकेयी को प्रदान किया, और बचे हुए भाग में से दोनों रानियों ने अपने-अपने हिस्से से थोड़ा-थोड़ा भाग महारानी सुमित्रा को समर्पित किया। इस प्रकार सुमित्रा को दो बार प्रसाद प्राप्त हुआ।
समय बीतने पर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पावन नवमी तिथि को संपूर्ण अयोध्या में परमानंद की वर्षा हुई। महारानी कौशल्या ने रघुकुल के ज्येष्ठ राजकुमार 'राम' को जन्म दिया। महारानी कैकेयी ने परम तेजस्वी 'भरत' को जन्म दिया, तथा महारानी सुमित्रा के गर्भ से दो जुड़वाँ राजकुमारों—'लक्ष्मण' और 'शत्रुघ्न'—का जन्म हुआ। चारों बालकों के अलौकिक सौंदर्य और तेज को देखकर अयोध्यावासी हर्षोल्लास से झूम उठे। नगर में मंगल-वाद्य बजने लगे, छतों से पुष्पवृष्टि हुई, बंदियों को मुक्त किया गया तथा याचकों को मुक्तहस्त से स्वर्ण, रत्न, गोदान और वस्त्र वितरित किए गए।
राजकुमारों का नामकरण, गुरुकुल शिक्षा-दीक्षा एवं अनुपम भ्रातृ-स्नेह:
महर्षि वशिष्ठ ने चारों बालकों के गुण, लक्षण और स्वरूप के अनुसार उनका नामकरण किया। ज्येष्ठ राजकुमार को 'राम' नाम दिया गया, जिसका अर्थ है जो समस्त लोकों को आनंद प्रदान करे। कैकेयी के पुत्र का नाम 'भरत' रखा गया, जो सबका भरण-पोषण करने वाला हो। सुमित्रा के प्रथम पुत्र का नाम 'लक्ष्मण' (शुभ लक्षणों से संपन्न) और द्वितीय पुत्र का नाम 'शत्रुघ्न' (शत्रुओं का संहारक) रखा गया। चारों राजकुमार धीरे-धीरे बड़े होने लगे। वे अत्यंत रूपवान, सुगठित शरीर वाले, चपल और कुशाग्रबुद्धि थे। उचित आयु होने पर उन्हें महर्षि वशिष्ठ के गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने भेजा गया। वहाँ उन्होंने वेदों, वेदांगों, धर्मशास्त्रों, नीतिशास्त्र और दर्शन का गहन अध्ययन किया। इसके साथ ही धनुर्विद्या, खड्ग-युद्ध, रथ-संचालन और अश्व-रोहण में वे अद्वितीय निपुणता प्राप्त कर लौटे।
चारों भाइयों में परस्पर अगाध, अलौकिक प्रेम था। उनमें कभी ईर्ष्या या कलह का लेशमात्र भी नहीं था। लक्ष्मण सदैव बड़े भाई राम की छाया बनकर उनके साथ रहते थे। राम का संकेत पाते ही लक्ष्मण अपने प्राण न्योछावर करने को तत्पर रहते थे। इसी प्रकार भरत और शत्रुघ्न की घनिष्ठ जोड़ी थी। चारों भाइयों में राम ज्येष्ठ होने के साथ-साथ अत्यंत विवेकशील, विनम्र, आज्ञाकारी और शांत प्रकृति के थे। उनका यह स्वाभाविक शालीन व्यवहार उन्हें न केवल माता-पिता, अपितु अयोध्या के जन-जन का प्राणप्रिय बनाए हुए था।
विवाह योग्य आयु एवं महर्षि विश्वामित्र का अप्रत्याशित आगमन:
राजकुमार अब युवावस्था की दहलीज पर खड़े थे और विद्या-कलाओं में पारंगत होकर राजकाज में रुचि लेने लगे थे। महाराज दशरथ के मन में अब राजकुमारों के विवाह का विचार आने लगा था। वे एक दिन राजसभा में अपने मंत्रियों और कुलगुरु वशिष्ठ के साथ इसी विषय पर विचार-विमर्श कर रहे थे कि सहसा द्वारपाल ने आकर काँपते हुए स्वर में सूचना दी कि महातपस्वी महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं। विश्वामित्र का नाम सुनते ही संपूर्ण राजदरबार स्तब्ध रह गया। विश्वामित्र पूर्व समय में एक अत्यंत पराक्रमी और प्रतापी राजा थे, किंतु बाद में उन्होंने राजपाठ त्यागकर घोर तपस्या की और 'राजर्षि' से 'ब्रह्मर्षि' का सर्वोच्च पद प्राप्त किया था। वे अपने उग्र स्वभाव और प्रचंड तपस्या के लिए संपूर्ण भूमंडल पर जाने जाते थे। महाराज दशरथ ने तत्काल सिंहासन से उठकर नंगे पाँव द्वार की ओर दौड़ लगाई। उन्होंने महर्षि के पाँव पखारे, उन्हें आदरपूर्वक लाकर सुवर्ण सिंहासन पर विराजमान किया और उनकी पूजा-अर्चना की। दशरथ ने विनीत भाव से कहा: 'हे महामुनि! आपके चरण पड़ने से मेरा यह राजभवन और संपूर्ण अयोध्या धन्य हो गई। आपकी जो भी आज्ञा हो, निस्संकोच कहें। रघुकुल का यह राजा आपकी सेवा में अपना सर्वस्व अर्पित करने को तत्पर है।'
विश्वामित्र की कठिन माँग एवं सिद्धाश्रम का संकट:
महर्षि विश्वामित्र ने महाराज दशरथ के विनम्र वचनों की सराहना की और अपने आगमन का वास्तविक प्रयोजन स्पष्ट किया। उन्होंने कहा: 'हे राजन्! मैं एक सिद्ध-यज्ञ का अनुष्ठान कर रहा हूँ। मेरा आश्रम सिद्धाश्रम में है। किंतु जब भी मेरा अनुष्ठान पूर्णाहुति के निकट पहुँचता है, दो मायावी राक्षस—मारीच और सुबाहु—यज्ञवेदी पर माँस, रक्त और अपवित्र वस्तुएँ फेंककर यज्ञ को दूषित व विध्वंस कर देते हैं। इस अनुष्ठान के नियमों के कारण मैं स्वयं क्रोध नहीं कर सकता और न ही उन्हें शाप दे सकता हूँ, क्योंकि शाप देने से मेरी वर्षों की तपस्या क्षीण हो जाएगी। इसलिए मैं राक्षसों के संहार और अपने यज्ञ की रक्षा हेतु आपके ज्येष्ठ पुत्र राम को माँगने आया हूँ। मुझे केवल दस दिनों के लिए राम को सौंप दीजिए। केवल राम ही उन मायावी निशाचरों का वध करने में समर्थ हैं।'
राजा दशरथ का आघात, मोह-मूर्च्छा एवं विकल याचना:
विश्वामित्र के मुख से राम की माँग सुनते ही महाराज दशरथ पर मानो वज्र टूट पड़ा। उनका हृदय काँप उठा। वृद्धावस्था में बड़ी मन्नतों और यज्ञ के पश्चात प्राप्त हुए ज्येष्ठ पुत्र राम उनके जीवन का आधार थे। दशरथ के मुख का रंग उड़ गया, वे पुत्र-मोह के आघात को सहन न कर सके और राजसिंहासन से गिरकर अचेत हो गए। कुछ समय पश्चात जब उन्हें होश आया, तो वे हाथ जोड़कर फूट-फूटकर रोने लगे। दशरथ ने विलाप करते हुए मुनि से कहा: 'हे मुनिवर! राम तो अभी अबोध बालक है। उसकी आयु मात्र सोलह वर्ष है। उसने अभी संसार के छल-कपट और युद्धभूमि की विभीषिका को नहीं देखा है। वह मायावी, क्रूर राक्षसों का सामना कैसे कर पाएगा? राक्षसों से युद्ध करने के लिए मैं स्वयं अपनी चतुरंगिणी सेना (हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सैनिक) लेकर आपके साथ चलता हूँ। मैं स्वयं जब तक जीवित हूँ, आपके यज्ञ की रक्षा करूँगा। आप चाहें तो मेरा राजपाठ, मेरा कोष, मेरी सेना, यहाँ तक कि मेरा शीश भी ले लीजिए, परंतु मेरे राम को मुझसे अलग न कीजिए। राम के वियोग में मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह पाऊँगा।'
विश्वामित्र का प्रचंड क्रोध एवं महर्षि वशिष्ठ का युक्तिसंगत प्रबोधन:
राजा दशरथ के वचनों को सुनकर महर्षि विश्वामित्र की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। राजसभा में तनाव और भय छा गया। विश्वामित्र ने गरजते हुए कहा: 'महाराज दशरथ! आप रघुकुल की मर्यादा को कलंकित कर रहे हैं। आपके पूर्वजों ने सत्य और वचन की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया था। आपने अभी-अभी प्रतिज्ञा की थी कि आप मेरी हर आज्ञा पूरी करेंगे। किंतु अब आप अपने वचन से मुकर रहे हैं। यदि रघुकुल की रीति यही है कि वचन देकर पीछे हट जाया जाए, तो मैं खाली हाथ लौट जाता हूँ। किंतु स्मरण रखिए, आपका यह आचरण कुल की अक्षय कीर्ति पर अमिट कलंक लगा देगा!'
विश्वामित्र के क्रोध से संपूर्ण सृष्टि में अनिष्ट की आशंका देखकर कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ आगे आए। वशिष्ठ जी ने राजा दशरथ को एकांत में समझाया और उनका मोह दूर करते हुए कहा: 'हे राजन्! महर्षि विश्वामित्र साक्षात धर्म और तप के प्रतीक हैं। वे केवल एक मुनि नहीं, अपितु गुप्त विद्याओं, दिव्य अस्त्र-शस्त्रों और अलौकिक शक्तियों के महान ज्ञाता हैं। जब तक राम विश्वामित्र के संरक्षण में हैं, त्रिलोक की कोई भी शक्ति उनका बाल भी बाँका नहीं कर सकती। विश्वामित्र राम को केवल यज्ञ की रक्षा हेतु नहीं ले जा रहे, अपितु वे राम को अनेक दिव्य अस्त्रों और गुप्त विधाओं से संपन्न बनाकर उनके भावी जीवन का कल्याणकारी मार्ग प्रशस्त करेंगे। यह राम के यश और सामर्थ्य के विस्तार का स्वर्णिम अवसर है। सबसे बढ़कर, रघुकुल की सत्यवादिता और वचन-पालन की प्रतिष्ठा किसी भी परिस्थिति में खंडित नहीं होनी चाहिए। अतः आप निःशंक होकर राम को महर्षि के साथ भेज दीजिए।'
महाराज का आत्मसमर्पण, लक्ष्मण का सान्निध्य एवं वीर-प्रस्थान:
कुलगुरु वशिष्ठ के विवेकपूर्ण और धर्मसंगत वचनों ने महाराज दशरथ के हृदय से पुत्र-मोह का आवरण हटा दिया। उन्होंने रघुकुल की मर्यादा और राम के उज्ज्वल भविष्य को सर्वोपरि मानते हुए विश्वामित्र की माँग स्वीकार कर ली। किंतु राजा दशरथ ने अत्यंत विनीत भाव से मुनि से एक और प्रार्थना की: 'हे मुनिवर! राम के बिना लक्ष्मण नहीं रह सकते। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं लक्ष्मण को भी राम की सेवा और रक्षा हेतु आपके साथ भेजना चाहता हूँ।' विश्वामित्र ने प्रसन्नतापूर्वक इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
तत्पश्चात राम और लक्ष्मण को राजसभा में आमंत्रित किया गया। माता कौशल्या ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने दोनों लाडलों का मंगलाचरण किया, तिलक लगाया और विजयी होने का शुभाशीष दिया। दोनों राजकुमारों ने माता-पिता और कुलगुरु वशिष्ठ के चरण स्पर्श किए। उनकी पीठ पर बाणों से भरे तरकश बँधे थे, हाथों में धनुष और कमर में खड्ग सुशोभित थीं। उनके मुख पर किसी प्रकार का भय या विषाद नहीं था, बल्कि अपूर्व तेज, सौम्यता और कर्तव्य-पालन का उत्साह झलक रहा था।
आगे-आगे दीर्घ डग भरते हुए तेजस्वी महर्षि विश्वामित्र चल रहे थे, उनके ठीक पीछे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और उनके पीछे सजग प्रहरी की भाँति लक्ष्मण अनुगमन कर रहे थे। अयोध्या की प्राचीर से निकलकर वे पवित्र सरयू के किनारे-किनारे घने वनों और अज्ञात भविष्य की ओर बढ़ चले। यह प्रस्थान केवल सिद्धाश्रम के यज्ञ की रक्षा का नहीं, अपितु समूचे संसार को अन्याय और असुरत्व से मुक्त कराने वाली महागाथा का भव्य शुभारंभ था।