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ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 13
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

नौकर (Vasant)

अध्याय का परिचय एवं लेखिका का योगदान: कक्षा 6 हिंदी 'वसंत भाग 1' का तेरहवाँ अध्याय 'नौकर' एक अत्यंत प्रेरक, विचारोत्तेजक और जीवन-मूल्यों से परिपूर्ण संस्मरणपरक निबंध है। इस पाठ की लेखिका अनु बंधोपाध्याय हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी के अत्यंत निकट रहकर उनके आश्रम-जीवन, उनकी कार्यशैली और उनके मानवीय स्वभाव का सूक्ष्म अवलोकन किया था। यह संस्मरण उनकी प्रसिद्ध और बहुचर्चित पुस्तक 'बहुरूपी गांधी' से साभार लिया गया है। 'बहुरूपी गांधी' में गांधी जी के जीवन के उन अनछुए और बहुरंगी पहलुओं को उजागर किया गया है जो साधारणतः राजनीतिक इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं होते। आम तौर पर इतिहास गांधी जी को सत्याग्रह, अहिंसा, सविनय अवज्ञा आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम के प्रणेता के रूप में चित्रित करता है, किंतु अनु बंधोपाध्याय ने इस निबंध में गांधी जी को एक रसोइया, आटा पीसने वाला चक्की चालक, बर्तन माँजने वाला, रोगी की सेवा करने वाला दाई, कपड़े धोने वाला धोबी और दूसरों का भार उठाने वाले 'नौकर' के रूप में प्रस्तुत किया है। लेखिका का उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि महानता बड़े-बड़े पदों और उपाधियों में नहीं, बल्कि अपने हाथों से छोटे-से-छोटे काम को पूरी लगन, श्रद्धा और स्वच्छता से करने में निहित है। 'नौकर' शीर्षक की प्रतीकात्मकता और दार्शनिक गहराई: इस पाठ का शीर्षक 'नौकर' अत्यंत अर्थपूर्ण, मार्मिक और व्यंग्यात्मक है। सामान्य समाज में 'नौकर' शब्द का प्रयोग किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जिसे कुछ रुपयों के बदले घरेलू कामकाज करने के लिए रखा जाता है और जिसे प्रायः समाज में हेय, दीन-हीन अथवा निम्न श्रेणी का माना जाता है। सामंती सोच वाले लोग स्वयं को 'मालिक' और दूसरों को अपना 'गुलाम' या 'नौकर' समझने का दंभ पालते हैं। किंतु गांधी जी के शब्दकोश में 'नौकर' शब्द का अर्थ ही भिन्न था। गांधी जी का मानना था कि जो व्यक्ति समाज में दूसरों की सेवा करता है, वही सबसे बड़ा है। वे स्वयं को किसी का मालिक नहीं, बल्कि पूरी मानवता का 'नौकर' यानी सेवक मानते थे। उन्होंने अपने पूरे जीवन में यह सिद्धांत स्थापित किया कि जब तक हमारे हाथ-पाँव में शक्ति है, हमें अपने किसी भी काम के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को 'नौकर' नहीं बनाना चाहिए। और यदि किसी परिस्थिति में किसी सेवक की सहायता लेनी भी पड़े, तो उसे वेतनभोगी मजदूर न समझकर अपने परिवार का एक सम्मानित भाई या बहन माना जाना चाहिए। इस प्रकार, 'नौकर' शीर्षक समाज की उस झूठी प्रतिष्ठा और झूठी शान पर एक तमाचा है जो शारीरिक श्रम करने वालों को तिरस्कार की दृष्टि से देखती है। दक्षिण अफ्रीका का दौर और बैरिस्टरी के साथ श्रम की साधना: गांधी जी के जीवन का यह स्वावलंबन कोई बुढ़ापे की आदत या राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उनके स्वभाव का अभिन्न अंग था। जब वे दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते थे, तब वे एक अत्यंत सफल और संपन्न बैरिस्टर थे। उनकी मासिक आमदनी हजारों रुपयों में थी और वे चाहते तो अपने घर में नौकरों की पूरी फौज तैनात कर सकते थे। किंतु उस संपन्नता के दौर में भी गांधी जी अपने दैनिक कार्यों के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहते थे। वे प्रातःकाल उठकर अपने घर में आटा पीसने की हाथ वाली चक्की स्वयं चलाते थे। वे अपने बच्चों और पत्नी कस्तूरबा के साथ मिलकर चक्की के भारी पाटों को घुमाते थे और अपने हाथों से पिसे आटे की सादी और पौष्टिक डबलरोटी बनाते थे। उनका मानना था कि बाजार के मिलावटी या मशीनी आटे की तुलना में घर पर हाथ से पिसा आटा न केवल स्वास्थ्यवर्धक होता है, बल्कि चक्की चलाने से शरीर का सर्वांगीण व्यायाम भी हो जाता है, जिससे डॉक्टरों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। उन्होंने अपने दोनों बेटों को बचपन से ही यह सिखाया कि अपने कमरे की सफाई करना, बिस्तर उठाना और कपड़े धोना प्रत्येक व्यक्ति का पहला कर्तव्य है। साबरमती आश्रम की कार्यसंस्कृति और शारीरिक श्रम की अनिवार्यता: दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद जब गांधी जी ने अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर 'सत्याग्रह आश्रम' की स्थापना की, तो उन्होंने वहाँ भी इसी कार्यसंस्कृति को आश्रम का अनिवार्य नियम बना दिया। साबरमती आश्रम में कोई भी व्यक्ति केवल बैठकर उपदेश नहीं दे सकता था। आश्रम का स्पष्ट संविधान था कि प्रत्येक आश्रमवासी को चाहे वह कितना भी बड़ा विद्वान, नेता, धनी या संभ्रांत व्यक्ति क्यों न हो, प्रतिदिन अनिवार्य रूप से कम से कम कुछ घंटे शारीरिक श्रम करना ही होगा। आश्रम में भोजन पकाने, तरकारी काटने, अनाज से कंकड़ बीनने, चक्की पर आटा पीसने, कुएँ से पानी खींचने, बर्तन धोने और शौचालयों की सफाई करने का काम बारी-बारी से सभी आश्रमवासियों में बाँटा जाता था। गांधी जी स्वयं इस नियम का सबसे कठोरता से पालन करते थे। वे स्वयं सुबह उठकर अनाज बीनने बैठ जाते थे। वे एक बड़ी थाली या परात में गेहूँ लेकर बैठते और एक-एक कंकड़ को चुनकर अलग करते। जब लोग राष्ट्रपिता को इतनी तल्लीनता से कंकड़ बीनते देखते, तो किसी भी अन्य व्यक्ति के मन में यह अहंकार टिक ही नहीं पाता था कि वह कोई बड़ा आदमी है। गोपाल कृष्ण गोखले की सेवा: गुरु-भक्ति और निरभिमानता का अनुपम उदाहरण: निबंध का एक अत्यंत हृदयस्पर्शी और प्रेरक प्रसंग गोपाल कृष्ण गोखले से जुड़ा हुआ है। गोखले जी को महात्मा गांधी अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। जब गोखले जी दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर आए, तो गांधी जी ने उनकी सेवा का पूरा दायित्व स्वयं अपने कंधों पर ले लिया। गांधी जी एक उच्च कोटि के बैरिस्टर और जननेता होने के बावजूद गोखले जी के निजी सेवक यानी अर्दली की भाँति कार्य करने लगे। वे सवेरे उठकर गोखले जी का बिस्तर समेटते, उनके मैले कुर्ते और धोती को अपने हाथों से साबुन से धोते और फिर कोयले वाली भारी इस्तरी (प्रेस) से सिलवटें मिटाकर उन कपड़ों को चमकाते। वे गोखले जी को भोजन परोसते और रात को जब गोखले जी थक जाते, तो गांधी जी उनके पाँव दबाते। जब गोखले जी संकोचवश कहते कि "मोहन, तुम इतने बड़े बैरिस्टर और नेता हो, तुम मेरे कपड़े क्यों धो रहे हो और मेरे पाँव क्यों दबा रहे हो?", तो गांधी जी अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़कर उत्तर देते थे कि "गोखले जी, आप मेरे पूज्य गुरु हैं। आपकी सेवा करने का यह पावन अवसर मुझे जीवन में बार-बार नहीं मिलेगा। आपके काम को अपने हाथों से करने में मुझे जो आनंद और तृप्ति मिलती है, वह किसी अन्य कार्य में नहीं मिल सकती।" यह प्रसंग सिखाता है कि सच्ची गुरु-भक्ति केवल वाणी से स्तुति करने में नहीं, बल्कि निरभिमान होकर गुरु के चरणों में शारीरिक सेवा समर्पित करने में है। कॉलेज के अंग्रेजियत-प्रभावित छात्रों का अहंकार-भंजन: एक अन्य रोचक और अत्यंत शिक्षाप्रद प्रसंग दक्षिण अफ्रीका में अध्ययनरत भारतीय कॉलेज के छात्रों का है। कुछ युवा छात्र, जो अंग्रेजी शिक्षा पाकर स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान और बुद्धिजीवी मानते थे, गांधी जी से मिलने आए। वे कोट-पतलून और टाई पहनकर सजे-धजे थे और उनके मन में अंग्रेजी भाषा और किताबी ज्ञान का गहरा घमंड था। वे गांधी जी के सामने बड़ी-बड़ी राजनीतिक बातें करने लगे और बातचीत के अंत में औपचारिकता निभाते हुए बोले, "बापू, हम अंग्रेजी के अच्छे ज्ञाता हैं। क्या हम आपकी कोई सेवा कर सकते हैं? आप हमें कोई बौद्धिक कार्य दीजिए, जैसे कोई अंग्रेजी पत्र लिखना या दस्तावेज तैयार करना।" गांधी जी उनके मन के छिपे बौद्धिक घमंड को ताड़ गए। वे जानते थे कि इन छात्रों को अपनी शिक्षा का अहंकार है और ये शारीरिक काम को अपने स्तर से नीचा समझते हैं। गांधी जी मुस्कुराए और उन्होंने छात्रों के सामने गेहूँ से भरी एक बड़ी परात रख दी और बोले, "अगर आप सचमुच मेरी सहायता करना चाहते हैं, तो कृपया आज की रसोई के लिए इस गेहूँ को बीनकर साफ कर दीजिए।" छात्र हक्के-बक्के रह गए। वे मना भी नहीं कर सकते थे क्योंकि वे स्वयं सेवा का प्रस्ताव लेकर आए थे। छात्रों ने भारी मन से गेहूँ बीनना शुरू किया। थोड़ी ही देर में उनकी उँगलियाँ दुखने लगीं, पीठ में दर्द होने लगा और वे पसीने से तर-बतर हो गए। अंततः हाथ जोड़कर छात्रों ने विदा माँगी। इस घटना के माध्यम से गांधी जी ने बिना एक भी कटु शब्द कहे उन छात्रों को यह जीवन-पाठ पढ़ा दिया कि किताबी ज्ञान तब तक व्यर्थ और अधूरा है जब तक मनुष्य में शारीरिक श्रम करने का साहस और विनम्रता न हो। बर्तन माँजना और स्वच्छता का उच्चतम प्रतिमान: गांधी जी के आश्रम में बर्तनों की सफाई का प्रसंग भी अत्यंत अद्भुत है। आश्रम में लकड़ी के चूल्हों पर बड़े-बड़े पतीलों में भोजन पकता था, जिसके कारण बर्तनों की पेंदी और किनारों पर काले धुएँ और कालिख की मोटी परत जम जाती थी। एक बार जब गांधी जी ने देखा कि आश्रम के कुछ साथी बर्तनों को केवल ऊपर-ऊपर से पानी से धोकर रख रहे हैं और कालिख पूरी तरह नहीं छुड़ा रहे हैं, तो गांधी जी ने किसी को डाँटा नहीं। वे स्वयं बर्तनों के ढेर के पास बैठ गए। उन्होंने राख और गीली मिट्टी उठाई और उन विशाल पतीलों को अपने दोनों हाथों से तब तक रगड़ना शुरू किया जब तक कि पतीलों की कालिख पूरी तरह गायब नहीं हो गई और पीतल का चमकदार चेहरा आईने की तरह चमकने नहीं लगा। जब आश्रमवासियों ने देखा कि बापू स्वयं कालिख से सने बर्तनों को माँज रहे हैं, तो वे लज्जा से पानी-पानी हो गए और तुरंत दौड़कर बापू के हाथ से बर्तन लेने लगे। गांधी जी का यह सिद्धांत था कि उपदेश देने से कहीं अधिक शक्तिशाली प्रभाव 'स्वयं आचरण करके दिखाने' में होता है। उनके लिए स्वच्छता केवल बाहरी सफाई नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शुद्धि का साधन थी। वे मानते थे कि 'स्वच्छता ही ईश्वर-भक्ति है' (Cleanliness is next to godliness)। 'नौकर' नहीं अपितु 'पारिवारिक भाई': सामाजिक समता का उद्घोष: गांधी जी ने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त सामंती कुरीतियों और छुआछूत की व्यवस्था पर अत्यंत गहरा आघात किया। उस समय धनी लोग नौकरों को अछूत समझते थे, उन्हें जूठा खाना देते थे, फटे-पुराने कपड़े पहनने को देते थे और उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते थे। गांधी जी ने इस अमानवीय प्रथा को जड़ से नकार दिया। उन्होंने स्पष्ट घोषणा की कि किसी भी आश्रम या घर में किसी भी व्यक्ति को नौकर नहीं कहा जाएगा। वे कहते थे, "हम किसी को नौकर नहीं मानते, बल्कि अपना भाई मानते हैं। यदि हमारे घर में कोई व्यक्ति सेवा का काम करता है, तो वह हमारे परिवार का सम्मानित सदस्य है। उसे वही भोजन मिलेगा जो हम खाते हैं, वह उसी पंक्ति में बैठेगा जिसमें हम बैठते हैं और यदि वह बीमार पड़ेगा, तो हम स्वयं उसकी तीमारदारी और सेवा करेंगे।" गांधी जी ने स्वयं अपने घर में काम करने वाले सेवकों की बीमारी में रात-रात भर जागकर सेवा की। उनका मानना था कि यदि समाज से जाति-भेद, ऊँच-नीच और वर्ग-संघर्ष को समाप्त करना है, तो हमें हर श्रम को सम्मान देना होगा और श्रम करने वाले हर व्यक्ति को गले लगाना होगा। 'ब्रेड लेबर' (शरीर-श्रम) और टॉलस्टॉय का गहरा प्रभाव: गांधी जी के इस चिंतन के पीछे महान रूसी लेखक काउंट लियो टॉलस्टॉय और जॉन रस्किन की पुस्तक 'अनटू दिस लास्ट' (Unto This Last) का गहरा प्रभाव था। टॉलस्टॉय ने बाइबल के आधार पर 'ब्रेड लेबर' यानी 'शरीर-श्रम' का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। इस सिद्धांत का मूल भाव यह है कि ईश्वर ने मनुष्य को दो हाथ और दो पाँव दिए हैं, इसलिए प्रत्येक मनुष्य को अपनी आजीविका की रोटी कमाने के लिए प्रतिदिन अपने शरीर से पसीना बहाना चाहिए। जो व्यक्ति बिना शारीरिक श्रम किए दूसरों की कमाई पर पलता है, वह एक प्रकार से समाज का चोर है। गांधी जी ने इस विचार को पूरी तरह आत्मसात किया। उनका मत था कि एक वकील, डॉक्टर या इंजीनियर का श्रम भी उतना ही उपयोगी है जितना एक किसान, मोची या नाई का श्रम। जब तक समाज में बौद्धिक श्रम करने वाले स्वयं को शारीरिक श्रम करने वालों से श्रेष्ठ समझते रहेंगे, तब तक समाज में वास्तविक समता, शांति और न्याय की स्थापना नहीं हो सकती। आधुनिक विद्यार्थियों के जीवन में इस पाठ की प्रासंगिकता: आज के इक्कीसवीं सदी के डिजिटल युग में, जहाँ बच्चे शारीरिक गतिविधियों से दूर होकर मोबाइल फोन, कंप्यूटर और गैजेट्स पर निर्भर होते जा रहे हैं, 'नौकर' पाठ का महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है। आज प्रायः देखा जाता है कि बच्चे अपना बस्ता तक स्वयं नहीं उठाते, अपने जूते का फीता बाँधने या पानी का गिलास उठाने के लिए भी माता-पिता या घरेलू सहायकों को पुकारते हैं। यह प्रवृत्ति बच्चों को आलसी, परावलंबी, अहंकारी और असंवेदनशील बनाती है। अनु बंधोपाध्याय का यह पाठ विद्यार्थियों को यह अनमोल सीख देता है कि अपने व्यक्तिगत कार्य स्वयं करने में लज्जा नहीं, बल्कि स्वाभिमान होना चाहिए। अपना बिस्तर ठीक करना, अपने कपड़े संभालना, अध्ययन-कक्ष को स्वच्छ रखना और माता-पिता के घरेलू कार्यों में हाथ बँटाना ही सच्ची शिक्षा का लक्षण है। इसके अतिरिक्त, यह पाठ विद्यार्थियों में समाज के स्वच्छताकर्मियों, चालकों और घरेलू सहायकों के प्रति आदर, कृतज्ञता और मानवीय संवेदना का बीजारोपण करता है। निष्कर्ष: संक्षेप में कहें तो, 'नौकर' केवल महात्मा गांधी के जीवन की कुछ घटनाओं का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण कला और दर्शन है। यह पाठ हमें सिखाता है कि आत्म-निर्भरता ही स्वतंत्रता की जननी है, विनम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण है और सेवा ही मनुष्यता की सर्वोच्च साधना है। जब हम गांधी जी के इन आदर्शों को अपने दैनिक जीवन में उतारते हैं, तभी हमारा चरित्र उज्ज्वल बनता है और एक समतामूलक, शोषणमुक्त तथा मानवीय समाज का निर्माण संभव होता है।

क्या आपने कभी सोचा है?

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस महापुरुष के एक आह्वान पर करोड़ों भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ते थे, जो लंदन में बैरिस्टरी पढ़कर दक्षिण अफ्रीका में हजारों रुपये प्रतिमाह कमाते थे, वे प्रातःकाल उठकर अपने हाथों से 35-40 पौंड गेहूँ की चक्की चलाते थे, लकड़ी के चूल्हे पर बने पतीलों की कालिख को राख से रगड़-रगड़कर आईने जैसा चमकाते थे और आश्रम के शौचालयों की सफाई स्वयं अपने हाथों से करते थे? लेखिका अनु बंधोपाध्याय द्वारा रचित यह प्रेरक पाठ 'नौकर' हमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उस अद्भुत और विस्मयकारी रूप से परिचित कराता है जहाँ वे उपदेशक नहीं, अपितु स्वयं एक सजग सेवक और कर्मयोगी हैं। यह पाठ हमारी उस सामंती मानसिकता को झकझोरता है जो शारीरिक काम को छोटा और बौद्धिक काम को बड़ा मानती है, और हमें स्वावलंबन तथा प्रत्येक श्रमिक के प्रति बंधुत्व की अमर प्रेरणा देता है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

'नौकर' अध्याय का अध्ययन आधुनिक युग के प्रत्येक विद्यार्थी और नागरिक के लिए अत्यंत अनिवार्य और युगांतरकारी है। आज का उपभोक्तावादी समाज भौतिक सुख-सुविधाओं, दिखावे और बौद्धिक अहंकार की अंधी दौड़ में फँसता जा रहा है। इस व्यवस्था में प्रायः शारीरिक श्रम करने वाले मेहनतकश मजदूरों, किसानों और सफाई कर्मचारियों को निम्न समझा जाता है, जबकि बिना पसीना बहाए कुर्सी पर बैठकर आदेश देने वालों को प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता है। यह सामाजिक असंतुलन समाज में वर्ग-भेद, असंवेदनशीलता और अहंकार को जन्म देता है। अनु बंधोपाध्याय द्वारा लिखित यह पाठ हमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन के प्रत्यक्ष उदाहरणों से यह अकाट्य सत्य समझाता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि काम के प्रति हमारी सोच उसे महान या तुच्छ बनाती है। जब विश्व का सबसे बड़ा जननायक स्वयं चक्की चला सकता है, बड़े पतीलों की कालिख छुड़ा सकता है और शौचालय साफ कर सकता है, तो किसी भी सामान्य मनुष्य के लिए शारीरिक श्रम में संकोच या लज्जा का कोई स्थान नहीं रह जाता। यह अध्याय विद्यार्थियों में स्वावलंबन (Self-reliance), शारीरिक श्रम की गरिमा (Dignity of Labour), निरभिमानता (Humility) और सामाजिक समता (Social Equality) जैसे सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों का विकास करता है। यह पाठ हमें सिखाता है कि जो व्यक्ति अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहता है, वह कभी स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। साथ ही, यह अध्याय आज के राष्ट्रव्यापी 'स्वच्छ भारत अभियान' और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प की आत्मा को उजागर करता है, जहाँ स्वच्छता को किसी वर्ग विशेष का काम न मानकर प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रीय और नैतिक कर्तव्य माना गया है। परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ विद्यार्थियों को चरित्र-निर्माण, नैतिक चिंतन, सटीक भाषा-प्रयोग और मानवीय दृष्टिकोण प्रदान करने वाला एक अनिवार्य सेतु है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • महात्मा गांधी के सामान्य जीवन-परिचय और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके नेतृत्व की आधारभूत जानकारी।
  • दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए गांधी जी द्वारा किए गए सत्याग्रह और संघर्ष की प्राथमिक समझ।
  • स्वावलंबन (आत्मनिर्भरता) और शारीरिक श्रम के महत्व से संबंधित सामान्य नैतिक मूल्यों का परिचय।
  • हिंदी गद्य में संस्मरण और निबंध विधा की सामान्य संरचना तथा भाव-ग्रहण क्षमता।
  • संज्ञा, क्रिया, विशेषण तथा भाववाचक संज्ञा निर्माण से जुड़े सामान्य हिंदी व्याकरणिक नियमों का ज्ञान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • महात्मा गांधी के दैनिक जीवन, साबरमती आश्रम और दक्षिण अफ्रीका के आश्रमों की कार्यप्रणाली को विस्तार से समझ सकेंगे।
  • 'नौकर' शीर्षक के पीछे निहित प्रतीकात्मक, दार्शनिक और मानवीय अर्थ का सटीक तार्किक विश्लेषण कर सकेंगे।
  • गांधी जी द्वारा हाथ की चक्की चलाने, अनाज बीनने और रसोई के कार्यों में सहयोग करने के पीछे छिपे स्वावलंबन के सिद्धांत को समझ सकेंगे।
  • गोपाल कृष्ण गोखले की सेवा से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंग के माध्यम से सच्ची गुरु-भक्ति, निरभिमानता और सेवा-भाव का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • दक्षिण अफ्रीका के कॉलेज छात्रों के अहंकार-भंजन वाले प्रसंग के आधार पर किताबी ज्ञान बनाम शारीरिक श्रम की श्रेष्ठता को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • पतीलों की कालिख छुड़ाने और आश्रम के बर्तनों की सफाई के प्रसंग द्वारा गांधी जी की 'स्वच्छता ही ईश्वर-भक्ति' वाली कार्यशैली को रेखांकित कर सकेंगे।
  • नौकरों को वेतनभोगी दास मानने के बजाय 'परिवार का भाई' मानने के गांधीवादी सामाजिक समानता के विचार का आलोचनात्मक विश्लेषण कर सकेंगे।
  • लियो टॉलस्टॉय के 'ब्रेड लेबर' (शरीर-श्रम) के सिद्धांत और गांधी जी पर उसके प्रभाव की दार्शनिक समझ विकसित कर सकेंगे।
  • पाठ में प्रयुक्त क्रियाओं से भाववाचक संज्ञा निर्माण, मुहावरों के अर्थ एवं सटीक वाक्य प्रयोग में व्याकरणिक दक्षता प्राप्त कर सकेंगे।
  • अपने दैनिक जीवन में स्वावलंबन की आदतें अपनाते हुए घर, विद्यालय और समाज के सहायकों के प्रति संवेदनशीलता और आदर का आचरण कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: पाठ का परिचय, लेखिका और...
2 मॉड्यूल 2: साबरमती आश्रम की कार्यसं...
3 मॉड्यूल 3: दक्षिण अफ्रीका के प्रेरक...
4 मॉड्यूल 4: सेवा-भाव और गुरु-भक्ति:...
5 मॉड्यूल 5: बर्तन माँजना, कालिख छुड़...
6 मॉड्यूल 6: 'नौकर' नहीं, 'भाई' — साम...
7 मॉड्यूल 7: 'भाषा की बात', व्याकरण औ...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: पाठ का परिचय, लेखिका और गांधी जी का जीवन-दर्शन

नौकर — अनु बंधोपाध्याय | कक्षा 6 हिंदी (वसंत भाग 1) स्वावलंबन एवं श्रम की गरिमा का जीवन-दर्शन पैनल 1: पाठ का केंद्रीय विचार, लेखक एवं मूल दर्शन विषय प्रवेश एवं ऐतिहासिक संदर्भ १. लेखक एवं स्रोत ग्रंथ लेखिका: अनु बंधोपाध्याय (Anu Bandyopadhyay) मूल पुस्तक: 'बहुरूपी गांधी' (Bahurupi Gandhi) विधा: प्रेरक जीवनीपरक निबंध (Biography Essay) मुख्य संदेश: • कोई भी शारीरिक कार्य छोटा या हीन नहीं होता। • स्वावलंबन मनुष्य को स्वाभिमानी बनाता है। • दूसरों से सेवा लेने के बजाय स्वयं सेवा करें। • सेवादार को नौकर नहीं, परिवार का भाई मानें। ध्येय: आत्म-निर्भरता ही सच्ची स्वतंत्रता है २. गांधी जी का आश्रम-दर्शन स्थान: साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) एवं दक्षिण अफ्रीका आश्रम का मूल नियम: • प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपना काम करेगा। • चक्की पीसना, कंकड़ बीनना, बर्तन माँजना। • जाति, धन, पद या विद्या का कोई घमंड नहीं। • बौद्धिक कार्य और शारीरिक श्रम का संतुलन। 'ब्रेड लेबर' (शरीर-श्रम): टॉलस्टॉय का सिद्धांत — जो अन्न खाता है, उसे पसीना बहाकर शरीर-श्रम अवश्य करना चाहिए। शारीरिक श्रम आत्मा को शुद्ध करता है ३. 'नौकर' की गांधीवादी परिभाषा पारंपरिक सोच: नौकर = वेतनभोगी सेवक/हीन गांधी जी की सोच: सेवक = साथी एवं भाई • "हम किसी को नौकर नहीं, अपना भाई मानते हैं।" • गांधी जी स्वयं सबके सेवक (नौकर) बन जाते थे। • सेवा लेना लज्जा की बात, सेवा करना पुण्य। • जब तक शरीर में शक्ति है, दूसरों पर बोझ न बनें। चारित्रिक गुण: अहंकार-शून्यता, विनम्रता, कर्मठता, समदृष्टि कस्तूरबा व बच्चों को भी श्रम में सहयोगी बनाया पैनल 2: दैनिक जीवन में श्रम के चार प्रमुख आयाम चक्की से लेकर स्वच्छता तक प्रत्यक्ष कार्य १. चक्की पर आटा पीसना • हाथ की चक्की का प्रयोग: आश्रम में चक्की स्वयं चलाते थे। • भारी वजन का कार्य: 35 से 40 पौंड आटा रोज़ पीसते। • शारीरिक व्यायाम: इसे उत्तम कसरत और स्वास्थ्य का आधार मानते थे। साबरमती में सुबह चक्की के साथ ही दिन की शुरुआत होती। साथी व आगंतुक भी हाथ बँटाते २. अनाज बीनना व तरकारी • कंकड़ चुनना: गेहूँ की थाली लेकर बैठते और बारीकी से एक-एक कंकड़ चुनते। • सब्जी काटना: सब्जियों को छीलना, धोना और स्वच्छता से काटना। • पोषण का ज्ञान: सब्जी के छिलकों व विटामिन्स की वैज्ञानिक समझ रखते थे। रसोई कार्य में सूक्ष्म अनुशासन भोजन सादा, पौष्टिक और सुपाच्य ३. बर्तन माँजना व स्वच्छता • बड़े पतीलों की सफाई: लकड़ी की कालिख लगे पतीले स्वयं रगड़कर धोते थे। • दर्पण जैसा चमकाना: राख व मिट्टी से तब तक माँजते जब तक चेहरा न दिख जाए। • साथियों को प्रेरणा: उपदेश देने के बजाय स्वयं करके दूसरों को लज्जित व प्रेरित करते। श्रम में परफेक्शन का उच्चतम स्तर कोई भी गंदा कोना असहनीय था ४. शौचालय व शारीरिक बल • मैला उठाना व सफाई: शौचालय की सफाई स्वयं करना; छुआछूत का विरोध। • लंबी पद-यात्राएँ: दक्षिण अफ्रीका में प्रतिदिन कई मील पैदल चलते। • बीमारों की सेवा: रोगी की चौबीसों घंटे टहल और दवा की जिम्मेदारी। शारीरिक शक्ति व समर्पण अस्पृश्यता पर सीधा आघात पैनल 3: दक्षिण अफ्रीका एवं साबरमती के ऐतिहासिक प्रेरक प्रसंग अहंकार-भंग एवं गुरु-भक्ति का सजीव प्रमाण १. गोखले जी की सेवा (गुरु-भक्ति) संदर्भ: दक्षिण अफ्रीका में गोखले जी का प्रवास गांधी जी की भूमिका: स्वयं बने गोखले के 'सचिव व नौकर' • गोखले का बिस्तर बिछाना व समेटना। • उनके मैले कपड़े धोना व इस्तरी (प्रेस) करना। • रात को पैर दबाना व भोजन परोसना। • गोखले के संकोच करने पर नम्र उत्तर: "आपकी सेवा करने का यह सौभाग्य मुझे बार-बार नहीं मिलेगा।" नैतिक मूल्य: अगाध गुरु-निष्ठा, निरभिमान व सेवा-भाव बड़ा नेता बनकर भी सेवक की तरह आचरण २. कॉलेज छात्रों का अहंकार-भंग संदर्भ: दक्षिण अफ्रीका में भारतीय छात्रों का आगमन छात्रों का अभिमान: अंग्रेजी शिक्षा व किताबी ज्ञान छात्रों की माँग: "हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं?" गांधी जी का कार्य-आवंटन: • छात्रों के सामने गेहूँ की बड़ी परात रख दी। • "कृपया यह गेहूँ बीनकर साफ कर दीजिए।" • छात्रों के हाथ थक गए, पर वे मना न कर सके। शिक्षा: किताबी ज्ञान से शारीरिक श्रम श्रेष्ठ है बौद्धिक अहंकार को शांत करने की अनुपम युक्ति ३. बैरिस्टर से कर्मयोगी का रूपांतरण दक्षिण अफ्रीका का जीवन: • हजारों रुपये कमाने वाले सफल बैरिस्टर। • चाहते तो दर्जनों नौकर रख सकते थे। किंतु उनका चयन: • खुद चक्की चलाना व बच्चों को पालना। • स्वयं रोटी पकाना और बर्तन साफ करना। • टॉलस्टॉय फार्म में सादगीपूर्ण जीवन बिताना। गांधी जी का संकल्प: "जो काम मैं खुद कर सकता हूँ, उसके लिए किसी दूसरे को नौकर नहीं बनाऊँगा।" पैनल 4: सामाजिक समानता — नौकर नहीं, 'परिवार का भाई' जाति, वर्ग एवं वर्ण भेद के विरुद्ध व्यावहारिक क्रांति १. नौकर बनाम पारिवारिक भाई शोषणकारी सामंती व्यवस्था: • नौकर को हीन, अछूत और पराधीन मानना। • जूठन खिलाना और दुर्व्यवहार करना। गांधी जी का मानवीय विकल्प: • नौकर को परिवार के सदस्य का दर्जा। • एक साथ बैठकर भोजन करना। • बीमारी में स्वयं मालिक द्वारा उसकी सेवा। "जिस घर में नौकर भाई जैसा न रहे, वह घर सुसंस्कृत नहीं हो सकता।" सहानुभूति व सम्मान की आधारशिला २. अस्पृश्यता पर सीधा प्रहार सामाजिक विडंबना: सफाई कर्मचारियों को हेय दृष्टि से देखना और अछूत करार देना। गांधी जी का क्रान्तिकारी कदम: • स्वयं शौचालय साफ करके मिसाल बनाई। • कस्तूरबा को भी यह कार्य सिखाया। • सफाई को पूजा और पवित्रतम कार्य माना। स्वच्छता = ईश्वरीय साधना कर्म के आधार पर ऊँच-नीच के पाखंड को जड़ से उखाड़ फेंकने का व्यावहारिक प्रयास। ३. स्वावलंबन से स्वराज्य व्यक्तिगत स्वावलंबन: अपने कपड़े खुद धोना, अपना खाना खुद बनाना, कमरे की झाड़ू स्वयं लगाना। राष्ट्रीय स्वावलंबन (स्वदेशी): चरखा कातना व खादी का निर्माण। विदेशी वस्त्रों और पराधीनता का बहिष्कार। "जो व्यक्ति अपने हाथ-पाँव का उपयोग नहीं करता, वह समाज का ऋणी है।" निष्कर्ष: श्रम ही स्वतंत्रता की नींव है पैनल 5: परीक्षा रणनीति, व्याकरण ('भाषा की बात') एवं जीवन-मूल्य बोर्ड परीक्षा में शत-प्रतिशत अंक प्राप्ति सूत्र १. बोर्ड परीक्षा के मुख्य प्रश्न Q1. गांधी जी आश्रम में क्या-क्या काम करते थे? Ans: चक्की पीसना, कंकड़ बीनना, सब्जी काटना, बर्तन माँजना, शौचालय साफ करना आदि। Q2. गांधी जी ने कॉलेज छात्रों को क्या काम दिया? Ans: गेहूँ बीनने का काम दिया ताकि उनका बौद्धिक अहंकार शांत हो सके। Q3. गोखले की सेवा गांधी जी ने किस प्रकार की? Ans: उनके कपड़े धोए, इस्तरी की, बिस्तर लगाया, पाँव दबाए और निजी सेवक बनकर सेवा की। Q4. 'नौकर' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। Ans: गांधी जी स्वयं नौकर की तरह काम करके नौकरों को भाई का दर्जा दिलाते हैं। उत्तर लिखते समय ठोस प्रसंग अवश्य लिखें २. भाषा की बात (व्याकरण ज्ञान) • संज्ञा से भाववाचक संज्ञा निर्माण: नौकर $ ightarrow$ नौकरी, दास $ ightarrow$ दासता, अहंकारी $ ightarrow$ अहंकार, विनम्र $ ightarrow$ विनम्रता। • क्रिया से संज्ञा रूप: पीसना $ ightarrow$ पिसाई, काटना $ ightarrow$ कटाई, धोना $ ightarrow$ धुलाई, माँजना $ ightarrow$ माँजने का कार्य। • मुहावरे एवं अर्थ: १. हाथ बँटाना = सहायता करना। २. दाँतों तले उँगली दबाना = दंग रह जाना। ३. मुँह लटकाना = उदास होना / लज्जित होना। • उपसर्ग-प्रत्यय: स्वावलंबन = स्व + अवलंबन; आत्मनिर्भर = आत्म + निर्भर अहंकार-शून्य = अहंकार + शून्य। व्याकरणिक शुद्धता से 100% अंक मिलते हैं ३. जीवन-मूल्य एवं व्यावहारिक शिक्षा विद्यार्थियों के लिए संदेश: • अपना कमरा, मेज व पुस्तकें स्वयं व्यवस्थित रखें। • अपनी थाली और गिलास खुद धोकर रखें। • विद्यालय या घर के सहायकों से आदर से बोलें। • शारीरिक श्रम को कभी छोटा या शर्मनाक न समझें। स्वच्छ भारत अभियान से जुड़ाव: गांधी जी का स्वच्छता दर्शन ही आज राष्ट्र के स्वच्छ भारत अभियान का मूल आधार है। "श्रम ही पूजा है, सेवा ही साधना है।" महात्मा गांधी का महामंत्र: स्वावलंबन + श्रम-निष्ठा + समता सच्चा मनुष्य वही जो कर्मठ और स्वावलंबी है

१. पाठ की पृष्ठभूमि, लेखिका एवं दार्शनिक उद्भव

महात्मा गांधी के बहुआयामी व्यक्तित्व के उन अनछुए पहलुओं का सजीव अनावरण जहाँ वे केवल राष्ट्रीय आंदोलन के नेता नहीं, अपितु स्वयं एक विनम्र सेवक और कर्मयोगी हैं।

१.१ लेखिका अनु बंधोपाध्याय एवं 'बहुरूपी गांधी'

इस प्रेरक पाठ की लेखिका अनु बंधोपाध्याय (Anu Bandyopadhyay) हैं। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी के आश्रमों में रहकर उनके दैनिक जीवन, उनकी दिनचर्या और उनके सूक्ष्म मानवीय व्यवहार का अत्यंत गहराई से अध्ययन किया था। यह संस्मरण उनकी सुप्रसिद्ध और कालजयी कृति 'बहुरूपी गांधी' (Bahurupi Gandhi) से संकलित किया गया है।

'बहुरूपी गांधी' शीर्षक स्वयं में यह दर्शाता है कि गांधी जी के व्यक्तित्व के अनेक रूप थे—वे एक कुशल राजनीतिज्ञ और स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक कुशल रसोइये, दर्जी, चर्मकार (जूते बनाने वाले), धोबी, नाई, शिक्षक, डॉक्टर और सफाई कर्मचारी भी थे। वे किसी भी कार्य को अपनी प्रतिष्ठा से नीचे नहीं मानते थे। लेखिका ने इस निबंध में अत्यंत सरल, रोचक और प्रवाहपूर्ण भाषा में गांधी जी के इस रूप को उजागर कर विद्यार्थियों को सच्ची महानता की परिभाषा समझाई है।

१.२ 'नौकर' शीर्षक की सार्थकता और व्यंग्यात्मक सौंदर्य

पाठ का शीर्षक 'नौकर' प्रथम दृष्ट्या सामान्य प्रतीत होता है, किंतु इसके भीतर एक गहरा सामाजिक व्यंग्य और दार्शनिक क्रांति छिपी हुई है। सामंती समाज में 'नौकर' शब्द को अपमानजनक और हीन माना जाता है। धनी लोग स्वयं कोई काम नहीं करते और छोटे-छोटे कामों के लिए नौकरों पर आश्रित रहते हैं, जिससे उनके भीतर अहंकार और आलस्य पनपता है।

गांधी जी ने इस सामंती मानसिकता को उलट दिया। उनके जीवन में 'नौकर' शब्द का अर्थ किसी का गुलाम होना नहीं, बल्कि मानवता की निःस्वार्थ सेवा करना था। गांधी जी कहते थे:

"जो व्यक्ति दूसरों से अपनी सेवा करवाता है, वह वास्तव में पराधीन और लाचार है। सच्चा स्वतंत्र और स्वाभिमानी मनुष्य वही है जो अपने हाथ-पाँव से अपना समस्त कार्य स्वयं करता है और दूसरों की सेवा करने के लिए सदैव तत्पर रहता है।"

१.३ दृष्टिकोण का तुलनात्मक विश्लेषण: सामंती बनाम गांधीवादी सोच

तुलना का आधार पारंपरिक/सामंती दृष्टिकोण गांधीवादी/आश्रम दृष्टिकोण
शारीरिक श्रम का स्तर शारीरिक श्रम को निम्न, घटिया और हीन माना जाता है। शारीरिक श्रम को ईश्वरीय साधना और आत्म-शुद्धि का मार्ग माना जाता है।
नौकर की परिभाषा वेतनभोगी दास, जिसके साथ हीनता और तिरस्कार का व्यवहार हो। परिवार का आदरणीय भाई/साथी; कोई मालिक-नौकर भेद नहीं।
व्यक्तिगत कार्य पानी का गिलास उठाने तक के लिए सेवकों पर निर्भर रहना। कपड़े धोना, बर्तन माँजना, कमरा साफ करना स्वयं करना।
अहंकार और ज्ञान किताबी शिक्षा और डिग्री को शारीरिक काम से बड़ा समझना। शारीरिक श्रम से रहित किताबी ज्ञान को अधूरा और घमंडी मानना।

मॉड्यूल 2: साबरमती आश्रम की कार्यसंस्कृति और दैनिक शारीरिक श्रम

२. साबरमती आश्रम: कर्म और श्रम की तपोभूमि

अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम में गांधी जी द्वारा स्थापित श्रम-संविधान जहाँ शारीरिक पसीना बहाना प्रत्येक नागरिक का अनिवार्य आध्यात्मिक कर्तव्य था।

२.१ चक्की पर आटा पीसना: स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता का साधन

आश्रम में गांधी जी प्रतिदिन स्वयं हाथ की चक्की पर गेहूँ पीसते थे। आश्रमवासियों की संख्या काफी अधिक होती थी और पूरे आश्रम के लिए प्रतिदिन 35 से 40 पौंड (लगभग 16 से 18 किलोग्राम) आटे की आवश्यकता होती थी। गांधी जी सुबह-सुबह उठकर अन्य साथियों के साथ चक्की के भारी पत्थरों को घुमाने में जुट जाते थे।

गांधी जी केवल आटा पीसते ही नहीं थे, बल्कि वे चक्की के भारी पाटों को उठाना और चक्की को ठीक करना भी जानते थे। जब एक बार आश्रम के एक साथी ने चक्की ठीक करने में असमर्थता जताई, तो गांधी जी ने तुरंत लोहे की छैनी और हथौड़ी लेकर चक्की के पाटों को ठीक कर दिया। वे चक्की चलाने को एक उत्तम शारीरिक व्यायाम मानते थे। उनका मानना था कि हाथ से चक्की चलाने से छाती, फेफड़े और भुजाएँ मजबूत होती हैं, शरीर में स्फूर्ति रहती है और पेट की बीमारियाँ दूर रहती हैं।

२.२ कंकड़ बीनना, तरकारी काटना और रसोई संचालन

आश्रम की रसोई केवल भोजन पकाने का स्थान नहीं थी, बल्कि वह अनुशासन और स्वच्छता की प्रयोगशाला थी। दोपहर के भोजन की तैयारी से पहले गांधी जी स्वयं एक चौड़े बर्तन (थाली या परात) में गेहूँ लेकर बैठ जाते थे और उसमें से अत्यंत एकाग्रता से एक-एक कंकड़ और तिनका बीनते थे। देश के बड़े-बड़े राजनीतिक नेता जब गांधी जी से गंभीर राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श करने आते, तो वे देखते कि बापू बातचीत करते जा रहे हैं और उनके हाथ निरंतर गेहूँ के कंकड़ बीन रहे हैं।

इसके अलावा गांधी जी रसोई में तरकारी (सब्जियां) छीलने और काटने में भी निपुण थे। वे जानते थे कि सब्जियों को धोने और काटने का सही वैज्ञानिक तरीका क्या है ताकि उनके पोषक तत्व नष्ट न हों। वे आश्रमवासियों को सिखाते थे कि सब्जियों को काटने के बाद धोने से उनके विटामिन्स बह जाते हैं, इसलिए पहले अच्छी तरह धोना चाहिए और फिर काटना चाहिए। भोजन सादा, बिना मसालों का और सुपाच्य बनाया जाता था।

२.३ आश्रम का संविधान: 'जो श्रम न करे, उसे खाने का अधिकार नहीं'

साबरमती आश्रम में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए चाहे वह काका कालेलकर हों, महादेव देसाई हों या कोई नया आगंतुक, सभी के लिए शारीरिक श्रम अनिवार्य था। वहाँ किसी को यह छूट नहीं थी कि वह केवल बौद्धिक या राजनीतिक कार्य करे और शारीरिक काम से बच जाए।

  • कुएँ से पानी खींचना: आश्रम के कुएँ से बाल्टियों में पानी खींचकर बड़े हौज में भरना।
  • आश्रम परिसर की सफाई: प्रतिदिन प्रातःकाल आश्रम के रास्तों और मैदानों में झाड़ू लगाना।
  • शौचालय की स्वच्छता: बाल्टियों से मैला ढोना और गड्ढों में मिट्टी डालकर स्वच्छता बनाए रखना।
  • चरखा कातना: प्रतिदिन सूत कातना और स्वावलंबन के वस्त्र तैयार करना।

मॉड्यूल 3: दक्षिण अफ्रीका के प्रेरक प्रसंग और छात्रों का अहंकार-भंग

३. दक्षिण अफ्रीका के ऐतिहासिक प्रसंग: कर्मयोगी बैरिस्टर

हजारों रुपये कमाने वाले प्रसिद्ध बैरिस्टर होने के बावजूद स्वयं के कार्य करना और शिक्षित युवाओं के बौद्धिक घमंड को शांत करने का अनूठा प्रसंग।

३.१ दक्षिण अफ्रीका में संपन्नता के बीच सादगी और स्वावलंबन

दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी ने जब वकालत शुरू की, तो कुछ ही वर्षों में वे वहाँ के सबसे सफल और प्रतिष्ठित भारतीय बैरिस्टर बन गए। वे अदालत में बड़े-बड़े मुकदमे लड़ते थे और उनकी मासिक आय उस जमाने में हजारों रुपयों में थी। समाज में उनका अत्यंत मान-सम्मान था और वे चाहते तो अपने घर में सुख-सुविधाओं के तमाम साधन जुटा सकते थे।

किंतु गांधी जी ने कभी भी नौकरों की विलासिता को स्वीकार नहीं किया। वे जोहान्सबर्ग और डरबन में भी अपने घर में आटा पीसने की चक्की स्वयं चलाते थे। वे बाजार से तैयार डबलरोटी खरीदने के बजाय घर पर ही कस्तूरबा और बच्चों के साथ मिलकर हाथ से पिसे आटे की स्वादिष्ट और पौष्टिक डबलरोटी सेंकते थे। वे कहते थे कि बच्चों को बचपन से ही अपने जूते पॉलिश करना, कपड़े धोना और बिस्तर लगाना सिखाना चाहिए, ताकि वे बड़े होकर किसी पर बोझ न बनें।

३.२ कॉलेज के छात्रों का अहंकार-भंजन (The Grain Sorting Incident)

यह प्रसंग पाठ का सर्वाधिक शिक्षाप्रद और रोचक अंश है। एक बार दक्षिण अफ्रीका में पढ़ने वाले कुछ भारतीय कॉलेज के छात्र गांधी जी से मिलने आए। वे आधुनिक अंग्रेजी वेशभूषा में सजे-धजे थे और उनके मन में यह तीव्र अहंकार था कि वे उच्च शिक्षित हैं और अंग्रेजी धाराप्रवाह बोल सकते हैं।

गांधी जी ने उनका स्वागत किया और उनसे कुशलक्षेम पूछा। बातों-बातों में छात्रों ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया और चलते समय शिष्टाचारवश कहा, "गांधी जी, हम आपकी कोई सेवा करना चाहते हैं। आप हमें कोई बौद्धिक कार्य बताइए, जैसे अंग्रेजी में कोई पत्र लिखना हो या कानूनी मसौदा तैयार करना हो।" छात्रों का मानना था कि गांधी जी उनसे कोई बहुत बड़ा दिमागी काम करवाएंगे जिससे उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

गांधी जी का मनोवैज्ञानिक उत्तर:

गांधी जी छात्रों के मन के बौद्धिक अहंकार को तुरंत पहचान गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "मेरे पास अंग्रेजी पत्र लिखने का काम तो पूरा हो चुका है, लेकिन अगर आप सचमुच मेरी सहायता करना चाहते हैं, तो कृपया आज की रसोई के लिए यह गेहूँ बीनकर साफ कर दीजिए।" और उन्होंने छात्रों के सामने गेहूँ से भरी एक विशाल परात रख दी!

छात्र स्तब्ध रह गए। वे मना भी नहीं कर सकते थे क्योंकि सेवा का प्रस्ताव उन्होंने स्वयं रखा था। छात्रों ने टाई और कोट पहने-पहने गेहूँ बीनना शुरू किया। थोड़ी ही देर में उनकी नाजुक उँगलियाँ दुखने लगीं, कलाई में दर्द होने लगा और वे पसीने से भीग गए। लगभग एक घंटे तक गेहूँ बीनने के बाद जब वे बुरी तरह थक गए, तो उन्होंने हाथ जोड़कर बापू से जाने की आज्ञा माँगी। गांधी जी ने मुस्कुराते हुए उन्हें धन्यवाद दिया। इस घटना ने छात्रों को जीवन भर के लिए यह सीख दे दी कि कोई भी विद्या तब तक अधूरी है जब तक व्यक्ति शारीरिक काम करने में संकोच करता है।

मॉड्यूल 4: सेवा-भाव और गुरु-भक्ति: गोपाल कृष्ण गोखले का प्रसंग

४. गुरु-भक्ति और निरभिमान सेवा: गोखले जी का संस्मरण

महात्मा गांधी द्वारा अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की निजी अर्दली की भाँति सेवा करने का पावन और प्रेरक प्रसंग।

४.१ गोपाल कृष्ण गोखले के प्रति अगाध आदर और समर्पण

गांधी जी गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। जब गोखले जी भारतीय गिरमिटिया मजदूरों की स्थिति का अध्ययन करने और सत्याग्रह को समर्थन देने दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर आए, तो गांधी जी के आनंद का पारावार न रहा। वे चाहते तो गोखले जी की सेवा के लिए कई सेवकों और सहायकों की व्यवस्था कर सकते थे, किंतु उन्होंने निश्चय किया कि वे किसी अन्य व्यक्ति को गोखले जी की सेवा नहीं करने देंगे।

गांधी जी स्वयं गोखले जी के निजी सचिव और अर्दली (नौकर) बन गए। वे प्रतिदिन गोखले जी के कमरे की सफाई करते, उनका बिस्तर ठीक करते, उनके मैले कपड़े अपने हाथों से धोते और भारी कोयले वाली इस्तरी से कपड़ों की सिलवटें मिटाते। गोखले जी के भोजन की व्यवस्था देखना और उनके स्वास्थ्य की निगरानी करना भी गांधी जी का ही कार्य था।

४.२ गोखले जी का संकोच और गांधी जी का भावपूर्ण संवाद

गोखले जी बहुत संकोची और संवेदनशील स्वभाव के थे। जब वे देखते कि दक्षिण अफ्रीका का इतना बड़ा जननायक और प्रख्यात बैरिस्टर उनके जूते साफ कर रहा है, उनके मैले कपड़े धो रहा है और रात को थक जाने पर उनके पाँव दबा रहा है, तो गोखले जी अत्यंत व्याकुल हो उठते थे। वे गांधी जी को बार-बार रोकते हुए कहते:

"मोहन! तुम यह क्या कर रहे हो? तुम यहाँ के प्रमुख नेता और बैरिस्टर हो। तुम्हें मेरे कपड़े धोने और पाँव दबाने की आवश्यकता नहीं है। मुझे संकोच होता है।"

गांधी जी ने सिर झुकाकर अत्यंत नम्रता से उत्तर दिया:

"गोखले जी, आप मेरे पूज्य गुरु हैं। आपकी सेवा करने का यह सौभाग्य मुझे बार-बार नहीं मिलेगा। अपने गुरु की सेवा को मैं अपना सबसे बड़ा धर्म और विशेषाधिकार मानता हूँ। कृपया मुझे इस पुण्य कार्य से वंचित न करें।"

यह प्रसंग विद्यार्थियों को यह अनमोल शिक्षा देता है कि व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा पद या ख्याति प्राप्त कर ले, अपने माता-पिता, गुरुओं और बुजुर्गों के प्रति उसकी सेवा-भावना और विनम्रता कभी कम नहीं होनी चाहिए।

मॉड्यूल 5: बर्तन माँजना, कालिख छुड़ाना और स्वच्छता का दर्शन

५. बर्तनों की सफाई और स्वच्छता का उच्चतम प्रतिमान

चूल्हे के विशाल बर्तनों की कालिख को राख और मिट्टी से रगड़कर आईने जैसा चमकाने का प्रसंग और गांधी जी का 'करके सिखाना' सिद्धांत।

५.१ कालिख लगे पतीलों को आईने की तरह चमकाना

आश्रम में जब सैकड़ों लोगों का भोजन लकड़ी और उपलों के चूल्हे पर पकता था, तो बड़े-बड़े पीतल और ताँबे के पतीलों की पेंदी पर काले धुएँ की मोटी और चिकनी कालिख जम जाती थी। आश्रम के युवा साथी जब बर्तन धोने बैठते, तो वे कालिख छुड़ाने की मेहनत से बचने के लिए बर्तनों को केवल अंदर से साफ कर देते थे और बाहर की कालिख को वैसे ही छोड़ देते थे।

एक दिन गांधी जी की दृष्टि इन अधकचरे साफ किए गए पतीलों पर पड़ी। उन्होंने किसी साथी को फटकार नहीं लगाई, न ही कोई लंबा भाषण दिया। वे चुपचाप बर्तनों के उस बड़े ढेर के पास बैठ गए। उन्होंने चूल्हे की राख और गीली मिट्टी उठाई और पूरी ताकत से एक विशाल पतीले को रगड़ना शुरू कर दिया। उनके हाथ और कपड़े कालिख से भर गए, पर वे तब तक रगड़ते रहे जब तक कि पतीले का एक-एक इंच चमकने नहीं लगा और उस पीतल की सतह में अपना चेहरा साफ दिखाई देने लगा।

५.२ 'करके सिखाना' (Leading by Example) का मनोविज्ञान

जब आश्रम के युवा कार्यकर्ताओं ने देखा कि बापू स्वयं काले पतीलों को रगड़-रगड़कर माँज रहे हैं, तो वे लज्जा और पश्चाताप से भर गए। वे तुरंत दौड़कर आए और बोले, "बापू, यह काम आप मत कीजिए। यह काम हमारा है, हम इसे साफ करेंगे।" गांधी जी ने मुस्कुराते हुए पतीला उन्हें सौंपा और कहा, "जब कोई काम करो, तो उसे पूरे मन और स्वच्छता से करो। आधा-अधूरा काम काम नहीं कहलाता।"

गांधी जी की इस कार्यशैली ने पूरे आश्रम को यह सिखा दिया कि नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं होता, बल्कि सबसे कठिन काम को स्वयं अपने हाथों से करके दिखाना होता है। स्वच्छता उनके लिए बाह्य दिखावा नहीं, अंतःकरण की पवित्रता थी।

मॉड्यूल 6: 'नौकर' नहीं, 'भाई' — सामाजिक समता और जाति-भेद पर प्रहार

६. सामाजिक समानता: 'नौकर' नहीं, परिवार का 'भाई'

सामंती दासता और जातिवादी छुआछूत पर गांधी जी का वज्रप्रहार — समाज के प्रत्येक श्रमिक को आत्मसम्मान और भ्रातृत्व की प्रतिष्ठा।

६.१ सामंती सोच का तिरस्कार और मानवीय भ्रातृत्व

गांधी जी के समय में सामंती समाज में घरेलू सहायकों को गुलामों जैसा समझा जाता था। उन्हें अलग बर्तनों में खाना दिया जाता था, जमीन पर सुलाया जाता था और जरा-सी भूल पर अपमानित किया जाता था। गांधी जी ने इस अमानवीय प्रथा को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया।

गांधी जी का स्पष्ट आदेश था कि उनके आश्रम या घर में किसी भी व्यक्ति को 'नौकर' नहीं कहा जाएगा। वे कहते थे, "हम किसी को नौकर नहीं मानते, बल्कि अपना भाई मानते हैं।" उनके घर में जो भी सहायक काम करता था, वह परिवार के सभी सदस्यों के साथ एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करता था। जब भी कोई सहायक बीमार पड़ता, तो गांधी जी स्वयं डॉक्टर की भाँति उसकी देखभाल करते, उसे दवा देते और रात-रात भर उसके सिरहाने बैठकर उसकी सेवा करते थे।

६.२ अस्पृश्यता (छुआछूत) पर करारी चोट: शौचालय की स्वयं सफाई

भारतीय समाज में सदियों से सफाई कर्मचारियों (वाल्मीकि समाज) को अछूत मानकर उपेक्षित किया जाता था। गांधी जी ने इस सामाजिक कलंक को मिटाने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और साबरमती आश्रम दोनों जगह यह नियम बनाया कि शौचालय की सफाई किसी तथाकथित 'अछूत' कर्मचारी से नहीं करवाई जाएगी, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपना और दूसरों का शौचालय साफ करना होगा।

गांधी जी ने स्वयं अपने हाथों से मैला ढोया और शौचालयों को स्वच्छ बनाया। जब कस्तूरबा ने आरंभ में इस कार्य पर संकोच और विरोध प्रकट किया, तो गांधी जी ने उन्हें प्रेम और दृढ़ता से समझाया कि मैला साफ करने से कोई अछूत नहीं होता, बल्कि मन में छुआछूत की भावना रखने वाला व्यक्ति वास्तव में अपवित्र होता है। गांधी जी का यह कदम जाति-प्रथा की जड़ पर सबसे बड़ा प्रहार था।

६.३ लियो टॉलस्टॉय का 'ब्रेड लेबर' (शरीर-श्रम) सिद्धांत

गांधी जी के चिंतन पर रूसी दार्शनिक लियो टॉलस्टॉय और ब्रिटिश विचारक जॉन रस्किन (पुस्तक: 'अनटू दिस लास्ट') का गहरा प्रभाव था। टॉलस्टॉय का 'ब्रेड लेबर' (Bread Labour) सिद्धांत कहता है:

"प्रत्येक मनुष्य को अपनी दैनिक रोटी कमाने के लिए प्रतिदिन अपने शरीर से पसीना बहाना अनिवार्य है। जो मनुष्य बिना शारीरिक श्रम किए खाता है, वह समाज की चोरी कर रहा है।"

गांधी जी ने चरखा कातने और खेती करने को इसी 'ब्रेड लेबर' का हिस्सा बनाया ताकि देश का प्रत्येक नागरिक आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी बन सके।

मॉड्यूल 7: 'भाषा की बात', व्याकरण और आधुनिक जीवन में स्वावलंबन

७. भाषा की बात (व्याकरण) एवं आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

एनसीईआरटी एवं सीआईएससीई पाठ्यक्रम के अनुसार शब्द-रचना, भाववाचक संज्ञाएँ, मुहावरे और समसामयिक जीवन-मूल्य।

७.१ संज्ञा एवं विशेषण से भाववाचक संज्ञा निर्माण (Board Grammar)

पाठ में प्रयुक्त प्रमुख मूल शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाने के नियम:

मूल शब्द शब्द भेद भाववाचक संज्ञा प्रत्यय जुड़ाव
नौकर जातिवाचक संज्ञा नौकरी 'ई' प्रत्यय
दास जातिवाचक संज्ञा दासता 'ता' प्रत्यय
अहंकारी विशेषण अहंकार मूल भाव
विनम्र विशेषण विनम्रता 'ता' प्रत्यय
स्वावलंबी विशेषण स्वावलंबन स्व + अवलंबन

७.२ क्रिया पदों से कार्य-संज्ञा निर्माण

पाठ में आश्रम के अनेक शारीरिक कार्यों के क्रिया रूप आए हैं। इनसे कार्य-संज्ञाएँ इस प्रकार बनती हैं:

  • पीसना (क्रिया) $ ightarrow$ पिसाई (संज्ञा): चक्की पर गेहूँ की पिसाई गांधी जी स्वयं करते थे।
  • काटना (क्रिया) $ ightarrow$ कटाई (संज्ञा): सब्जियों की कटाई बहुत बारीकी से की जाती थी।
  • धोना (क्रिया) $ ightarrow$ धुलाई (संज्ञा): गोखले जी के कपड़ों की धुलाई गांधी जी ने की।
  • सिलना (क्रिया) $ ightarrow$ सिलाई (संज्ञा): आश्रम में वस्त्रों की सिलाई हाथ से होती थी।
  • बीनना (क्रिया) $ ightarrow$ बिनाई/चुनना (संज्ञा): गेहूँ के कंकड़ों की बिनाई में छात्र थक गए।

७.३ पाठ के महत्वपूर्ण मुहावरे एवं वाक्य प्रयोग

  1. हाथ बँटाना: (अर्थ: सहायता करना, काम में सहयोग देना)
    वाक्य: रोहन प्रतिदिन विद्यालय से लौटकर माँ के घरेलू कार्यों में हाथ बँटाता है।
  2. दाँतों तले उँगली दबाना: (अर्थ: अत्यधिक आश्चर्यचकित या दंग रह जाना)
    वाक्य: बैरिस्टर गांधी को स्वयं चक्की पर आटा पीसते देखकर आगंतुकों ने दाँतों तले उँगली दबा ली।
  3. मुँह लटकाना: (अर्थ: उदास होना, लज्जित होना)
    वाक्य: परीक्षा में अपेक्षित अंक न आने पर छात्र मुँह लटकाकर बैठ गया।
  4. पसीना बहाना: (अर्थ: कठोर शारीरिक श्रम करना)
    वाक्य: किसान जेठ की दोपहरी में खेतों में पसीना बहाकर देश का पेट भरता है।

७.४ विद्यार्थियों के लिए जीवन-मूल्य एवं 'स्वच्छ भारत अभियान'

गांधी जी का यह जीवन-दर्शन आज इक्कीसवीं सदी में और भी अधिक प्रासंगिक है:

  • दैनिक स्वावलंबन: अपनी अध्ययन-मेज, बस्ता, जूते और बिस्तर स्वयं व्यवस्थित रखें।
  • घरेलू सहायकों का सम्मान: घर या विद्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से कभी भी हीनता से बात न करें; उन्हें 'भैया', 'दीदी' या 'काका' कहकर आदर दें।
  • स्वच्छता का राष्ट्रीय संकल्प: भारत सरकार का 'स्वच्छ भारत अभियान' बापू के इसी स्वच्छता दर्शन का मूर्त रूप है—जहाँ स्वच्छता प्रत्येक भारतीय का निजी दायित्व है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
गांधी जी साबरमती आश्रम में प्रतिदिन हाथ की चक्की स्वयं क्यों चलाते थे? इसके पीछे उनका क्या उद्देश्य था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (2 अंक):
गांधी जी साबरमती आश्रम में हाथ की चक्की स्वयं इसलिए चलाते थे क्योंकि:

  1. स्वावलंबन (आत्मनिर्भरता): वे आश्रमवासियों के लिए आवश्यक 35 से 40 पौंड आटा बाजार से खरीदने के बजाय स्वयं अपने परिश्रम से तैयार करना चाहते थे।
  2. शारीरिक व्यायाम एवं स्वास्थ्य: गांधी जी चक्की चलाने को एक सर्वोत्तम कसरत मानते थे, जिससे छाती और भुजाएँ पुष्ट होती थीं तथा शरीर निरोगी और स्फूर्तिवान बना रहता था।
उदाहरण 2
दक्षिण अफ्रीका में कॉलेज के अंग्रेजी पढ़े-लिखे छात्रों के मन में क्या अहंकार था और गांधी जी ने उस अहंकार को किस प्रकार शांत किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (3 अंक):

  • छात्रों का अहंकार: कॉलेज के छात्र अंग्रेजी शिक्षा और वेशभूषा के घमंड में चूर थे। वे स्वयं को उच्च बुद्धिजीवी मानते थे और गांधी जी से अंग्रेजी पत्र लिखने या कानूनी मसौदा तैयार करने जैसे किसी 'बौद्धिक कार्य' की माँग कर रहे थे।
  • गांधी जी की युक्ति: गांधी जी उनके छिपे घमंड को समझ गए। उन्होंने कोई उपदेश देने के बजाय उनके सामने गेहूँ से भरी एक बड़ी परात रख दी और विनम्रता से कहा कि वे रसोई के लिए यह गेहूँ बीनकर साफ कर दें।
  • परिणाम: लगभग एक घंटे तक गेहूँ बीनने से छात्रों की उँगलियाँ दुखने लगीं और वे पसीने से भीग गए। इस प्रकार बिना डाँटे गांधी जी ने उन्हें यह सिखा दिया कि शारीरिक श्रम के बिना किताबी ज्ञान अधूरा और दंभी है।
उदाहरण 3
गोपाल कृष्ण गोखले की सेवा से जुड़े प्रसंग से गांधी जी के किन मानवीय और चारित्रिक गुणों का परिचय मिलता है? स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (3 अंक):
गोपाल कृष्ण गोखले की सेवा के प्रसंग से गांधी जी के निम्नलिखित चारित्रिक गुणों का परिचय मिलता है:

  1. अगाध गुरु-भक्ति: गांधी जी गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। उनके दक्षिण अफ्रीका प्रवास में गांधी जी ने किसी सेवक की सहायता न लेकर स्वयं उनके कपड़े धोए, बिस्तर लगाया और पैर दबाए।
  2. निरभिमानता (अहंकार-शून्यता): उच्च पद, विपुल धन और ख्याति प्राप्त बैरिस्टर होने के बावजूद गांधी जी के मन में जरा-सा भी घमंड नहीं था। वे स्वयं को गुरु का विनम्र 'नौकर' कहलाने में गर्व महसूस करते थे।
  3. निःस्वार्थ सेवा-भाव: गोखले के संकोच करने पर गांधी जी ने कहा कि अपने पूज्य गुरु की सेवा का अवसर जीवन में बार-बार नहीं मिलता, जो उनके हृदय की असीम श्रद्धा को प्रकट करता है।
उदाहरण 4
आश्रम में बर्तनों की कालिख छुड़ाने के प्रसंग से गांधी जी के 'करके सिखाने' (Leading by Example) के सिद्धांत पर प्रकाश डालिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (4 अंक):

गांधी जी केवल वाणी से उपदेश देने में विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि वे प्रत्येक सिद्धांत को पहले स्वयं अपने आचरण में उतारते थे। बर्तनों की सफाई का प्रसंग इसका ज्वलंत उदाहरण है:

  • घटना का संदर्भ: आश्रम में चूल्हे पर खाना बनने से पीतल के बड़े पतीलों की पेंदी पर काली कालिख जम जाती थी। आश्रम के युवा कार्यकर्ता कालिख पूरी तरह छुड़ाए बिना ही बर्तनों को केवल अंदर से धोकर रख देते थे।
  • गांधी जी का मौन आचरण: गांधी जी ने किसी को डाँटा या फटकारा नहीं। वे स्वयं चूल्हे की राख और गीली मिट्टी लेकर बर्तनों के ढेर के पास बैठ गए और पूरी शक्ति से उस विशाल पतीले को रगड़ने लगे।
  • परफेक्शन और स्वच्छता: वे तब तक उस पतीले को माँजते रहे जब तक कि कालिख का एक भी धब्बा नहीं बचा और पतीले की पीतल की सतह में चेहरा आईने की तरह साफ दिखाई देने लगा।
  • निष्कर्ष व प्रभाव: जब आश्रमवासियों ने बापू को कालिख से सने हाथों से बर्तन माँजते देखा, तो वे लज्जित हो गए और तुरंत काम अपने हाथों में ले लिया। गांधी जी ने सिद्ध कर दिया कि मौन कर्म का प्रभाव सौ उपदेशों से अधिक शक्तिशाली होता है।
उदाहरण 5
गांधी जी नौकरों को 'वेतनभोगी सेवक' न मानकर 'परिवार का भाई' क्यों मानते थे? इस दृष्टिकोण का सामाजिक महत्व स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (4 अंक):

गांधी जी समाज में किसी भी प्रकार के शोषण, वर्ग-भेद और हीनता के सख्त विरोधी थे। नौकरों के प्रति उनका दृष्टिकोण निम्नलिखित कारणों से क्रांतिकारी था:

  1. मानवीय गरिमा की रक्षा: सामंती समाज नौकरों को धन के बल पर खरीदा गया गुलाम समझता था और उनसे अमानवीय व्यवहार करता था। गांधी जी का मानना था कि प्रत्येक मनुष्य ईश्वर की संतान है, इसलिए धन के आधार पर किसी को छोटा या बड़ा नहीं माना जा सकता।
  2. परिवार का अभिन्न अंग: गांधी जी ने कहा कि जो व्यक्ति हमारे घर के भोजन, वस्त्र और सफाई में सहयोग देता है, वह हमारा पारिवारिक भाई या बहन है। उनके घर में सेवक भी उसी पंक्ति में बैठकर वही ताजा भोजन खाते थे जो परिवार के सदस्य खाते थे।
  3. बीमारी में सेवा: जब भी कोई सेवक बीमार होता, गांधी जी स्वयं डॉक्टर और नर्स बनकर उसकी रात-दिन सेवा करते थे, जिससे सेवकों के मन में आत्मसम्मान और कृतज्ञता की भावना जागती थी।
  4. सामाजिक समरसता: इस दृष्टिकोण ने समाज में जाति, वर्ग और आर्थिक आधार पर खड़ी की गई दीवारों को ढहा दिया और एक समतामूलक, मानवीय समाज की नींव रखी।
उदाहरण 6
'नौकर' पाठ का मूल संदेश क्या है? आधुनिक जीवन और इक्कीसवीं सदी के विद्यार्थियों के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर सविस्तार विचार कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर (5 अंक):

१. पाठ का मूल संदेश:
लेखिका अनु बंधोपाध्याय द्वारा रचित 'नौकर' पाठ का मूल संदेश है—'स्वावलंबन' (आत्मनिर्भरता), 'श्रम की गरिमा' (Dignity of Labour), और 'अहंकार-मुक्ति'। यह पाठ सिखाता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वयं चक्की चला सकते हैं, सब्जी काट सकते हैं, बर्तन माँज सकते हैं और शौचालय साफ कर सकते हैं, तो किसी भी अन्य व्यक्ति के लिए शारीरिक श्रम में लज्जा का कोई स्थान नहीं है।

२. विद्यार्थियों के लिए व्यावहारिक प्रासंगिकता:

  • आलस्य और परावलंबन से मुक्ति: आज के तकनीकी युग में बच्चे छोटी-छोटी आवश्यकताओं (पानी लेना, बस्ता लगाना, जूते पहनना) के लिए भी माता-पिता या घरेलू सहायकों पर आश्रित रहते हैं। यह पाठ विद्यार्थियों को अपने सभी व्यक्तिगत काम स्वयं करने की प्रेरणा देता है।
  • बौद्धिक अहंकार का निवारण: केवल अच्छे अंक लाने या अंग्रेजी बोल लेने से कोई महान नहीं बनता। सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य में विनम्रता और श्रम के प्रति आदर का भाव पैदा करे।
  • श्रमजीवियों के प्रति सम्मान: विद्यालय के सफाई कर्मचारियों, बस चालकों और घर के सहायकों को 'नौकर' समझने के बजाय उनके श्रम का आदर करना और उनसे मधुर व्यवहार करना ही सच्ची मानवता है।

३. राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य (स्वच्छ भारत अभियान):
यह पाठ भारत के 'स्वच्छ भारत अभियान' का वैचारिक आधार है। जब देश का प्रत्येक नागरिक स्वच्छता को अपना निजी दायित्व समझेगा और स्वयं अपने परिवेश को स्वच्छ रखेगा, तभी राष्ट्र स्वस्थ, स्वावलंबी और प्रगतिशील बन सकेगा।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
गांधी जी साबरमती आश्रम में प्रतिदिन लगभग कितने पौंड आटा हाथ की चक्की पर पीसते थे और वे इसे क्या मानते थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: गांधी जी साबरमती आश्रम में प्रतिदिन लगभग 35 से 40 पौंड आटा हाथ की चक्की पर पीसते थे। वे चक्की चलाने को एक सर्वोत्तम शारीरिक व्यायाम मानते थे जो शरीर को निरोगी और भुजाओं को मजबूत बनाता है।
आटे का वजन लगभग 16-18 किलोग्राम होता है और इसे वे स्वास्थ्य से जोड़ते थे।
2
दक्षिण अफ्रीका के कॉलेज छात्रों को गांधी जी ने कौन-सा कार्य सौंपा और क्यों?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: गांधी जी ने कॉलेज के छात्रों को गेहूँ बीनकर साफ करने का काम सौंपा ताकि उनके मन में अंग्रेजी शिक्षा और किताबी ज्ञान को लेकर बैठा बौद्धिक अहंकार बिना किसी कटुता के शांत हो सके।
छात्र बौद्धिक कार्य माँग रहे थे और गांधी जी ने उन्हें रसोई का काम दिया।
3
गोपाल कृष्ण गोखले की सेवा करते समय गांधी जी ने कौन-कौन से मुख्य कार्य स्वयं अपने हाथों से किए?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: गांधी जी ने गोखले जी के मैले कपड़े साबुन से धोए, भारी कोयले वाली इस्तरी से सिलवटें मिटाईं, बिस्तर बिछाया व समेटा, भोजन परोसा और रात को उनके पाँव दबाए।
बिस्तर, वस्त्र, इस्तरी और रात की सेवा का स्मरण करें।
4
आश्रम में जब साथियों ने पतीलों को केवल अंदर से धोकर छोड़ दिया, तो गांधी जी ने क्या किया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: गांधी जी ने किसी साथी को नहीं डाँटा। वे स्वयं बर्तनों के ढेर के पास बैठ गए और चूल्हे की राख तथा गीली मिट्टी से उस विशाल पतीले को तब तक माँजा जब तक कि वह आईने की तरह चमकने नहीं लगा।
गांधी जी ने किसी को डाँटा नहीं, बल्कि स्वयं राख और मिट्टी उठाई।
5
गांधी जी घरेलू सहायकों को 'नौकर' न कहकर क्या कहते थे और उनके साथ कैसा आचरण करते थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: गांधी जी घरेलू सहायकों को नौकर न कहकर 'भाई' मानते थे। वे उन्हें अपने साथ एक ही पंक्ति में बैठाकर भोजन कराते थे और उनके बीमार पड़ने पर स्वयं रात-दिन उनकी सेवा व तीमारदारी करते थे।
वे उन्हें परिवार का सदस्य मानते थे और समानता का व्यवहार करते थे।
6
पाठ के आधार पर 'हाथ बँटाना' और 'दाँतों तले उँगली दबाना' मुहावरों का अर्थ लिखकर एक-एक वाक्य बनाइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: १. हाथ बँटाना = सहायता करना। वाक्य: हमें घर में माता-पिता के दैनिक कार्यों में हाथ बँटाना चाहिए। २. दाँतों तले उँगली दबाना = दंग रह जाना। वाक्य: बैरिस्टर गांधी को चक्की चलाते देख लोगों ने दाँतों तले उँगली दबा ली।
एक का अर्थ सहायता करना और दूसरे का अर्थ अत्यधिक चकित होना है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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