ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 13
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
नौकर (Vasant)
अध्याय का परिचय एवं लेखिका का योगदान:
कक्षा 6 हिंदी 'वसंत भाग 1' का तेरहवाँ अध्याय 'नौकर' एक अत्यंत प्रेरक, विचारोत्तेजक और जीवन-मूल्यों से परिपूर्ण संस्मरणपरक निबंध है। इस पाठ की लेखिका अनु बंधोपाध्याय हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी के अत्यंत निकट रहकर उनके आश्रम-जीवन, उनकी कार्यशैली और उनके मानवीय स्वभाव का सूक्ष्म अवलोकन किया था। यह संस्मरण उनकी प्रसिद्ध और बहुचर्चित पुस्तक 'बहुरूपी गांधी' से साभार लिया गया है। 'बहुरूपी गांधी' में गांधी जी के जीवन के उन अनछुए और बहुरंगी पहलुओं को उजागर किया गया है जो साधारणतः राजनीतिक इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं होते। आम तौर पर इतिहास गांधी जी को सत्याग्रह, अहिंसा, सविनय अवज्ञा आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम के प्रणेता के रूप में चित्रित करता है, किंतु अनु बंधोपाध्याय ने इस निबंध में गांधी जी को एक रसोइया, आटा पीसने वाला चक्की चालक, बर्तन माँजने वाला, रोगी की सेवा करने वाला दाई, कपड़े धोने वाला धोबी और दूसरों का भार उठाने वाले 'नौकर' के रूप में प्रस्तुत किया है। लेखिका का उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि महानता बड़े-बड़े पदों और उपाधियों में नहीं, बल्कि अपने हाथों से छोटे-से-छोटे काम को पूरी लगन, श्रद्धा और स्वच्छता से करने में निहित है।
'नौकर' शीर्षक की प्रतीकात्मकता और दार्शनिक गहराई:
इस पाठ का शीर्षक 'नौकर' अत्यंत अर्थपूर्ण, मार्मिक और व्यंग्यात्मक है। सामान्य समाज में 'नौकर' शब्द का प्रयोग किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जिसे कुछ रुपयों के बदले घरेलू कामकाज करने के लिए रखा जाता है और जिसे प्रायः समाज में हेय, दीन-हीन अथवा निम्न श्रेणी का माना जाता है। सामंती सोच वाले लोग स्वयं को 'मालिक' और दूसरों को अपना 'गुलाम' या 'नौकर' समझने का दंभ पालते हैं। किंतु गांधी जी के शब्दकोश में 'नौकर' शब्द का अर्थ ही भिन्न था। गांधी जी का मानना था कि जो व्यक्ति समाज में दूसरों की सेवा करता है, वही सबसे बड़ा है। वे स्वयं को किसी का मालिक नहीं, बल्कि पूरी मानवता का 'नौकर' यानी सेवक मानते थे। उन्होंने अपने पूरे जीवन में यह सिद्धांत स्थापित किया कि जब तक हमारे हाथ-पाँव में शक्ति है, हमें अपने किसी भी काम के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को 'नौकर' नहीं बनाना चाहिए। और यदि किसी परिस्थिति में किसी सेवक की सहायता लेनी भी पड़े, तो उसे वेतनभोगी मजदूर न समझकर अपने परिवार का एक सम्मानित भाई या बहन माना जाना चाहिए। इस प्रकार, 'नौकर' शीर्षक समाज की उस झूठी प्रतिष्ठा और झूठी शान पर एक तमाचा है जो शारीरिक श्रम करने वालों को तिरस्कार की दृष्टि से देखती है।
दक्षिण अफ्रीका का दौर और बैरिस्टरी के साथ श्रम की साधना:
गांधी जी के जीवन का यह स्वावलंबन कोई बुढ़ापे की आदत या राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उनके स्वभाव का अभिन्न अंग था। जब वे दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते थे, तब वे एक अत्यंत सफल और संपन्न बैरिस्टर थे। उनकी मासिक आमदनी हजारों रुपयों में थी और वे चाहते तो अपने घर में नौकरों की पूरी फौज तैनात कर सकते थे। किंतु उस संपन्नता के दौर में भी गांधी जी अपने दैनिक कार्यों के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहते थे। वे प्रातःकाल उठकर अपने घर में आटा पीसने की हाथ वाली चक्की स्वयं चलाते थे। वे अपने बच्चों और पत्नी कस्तूरबा के साथ मिलकर चक्की के भारी पाटों को घुमाते थे और अपने हाथों से पिसे आटे की सादी और पौष्टिक डबलरोटी बनाते थे। उनका मानना था कि बाजार के मिलावटी या मशीनी आटे की तुलना में घर पर हाथ से पिसा आटा न केवल स्वास्थ्यवर्धक होता है, बल्कि चक्की चलाने से शरीर का सर्वांगीण व्यायाम भी हो जाता है, जिससे डॉक्टरों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। उन्होंने अपने दोनों बेटों को बचपन से ही यह सिखाया कि अपने कमरे की सफाई करना, बिस्तर उठाना और कपड़े धोना प्रत्येक व्यक्ति का पहला कर्तव्य है।
साबरमती आश्रम की कार्यसंस्कृति और शारीरिक श्रम की अनिवार्यता:
दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद जब गांधी जी ने अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर 'सत्याग्रह आश्रम' की स्थापना की, तो उन्होंने वहाँ भी इसी कार्यसंस्कृति को आश्रम का अनिवार्य नियम बना दिया। साबरमती आश्रम में कोई भी व्यक्ति केवल बैठकर उपदेश नहीं दे सकता था। आश्रम का स्पष्ट संविधान था कि प्रत्येक आश्रमवासी को चाहे वह कितना भी बड़ा विद्वान, नेता, धनी या संभ्रांत व्यक्ति क्यों न हो, प्रतिदिन अनिवार्य रूप से कम से कम कुछ घंटे शारीरिक श्रम करना ही होगा। आश्रम में भोजन पकाने, तरकारी काटने, अनाज से कंकड़ बीनने, चक्की पर आटा पीसने, कुएँ से पानी खींचने, बर्तन धोने और शौचालयों की सफाई करने का काम बारी-बारी से सभी आश्रमवासियों में बाँटा जाता था। गांधी जी स्वयं इस नियम का सबसे कठोरता से पालन करते थे। वे स्वयं सुबह उठकर अनाज बीनने बैठ जाते थे। वे एक बड़ी थाली या परात में गेहूँ लेकर बैठते और एक-एक कंकड़ को चुनकर अलग करते। जब लोग राष्ट्रपिता को इतनी तल्लीनता से कंकड़ बीनते देखते, तो किसी भी अन्य व्यक्ति के मन में यह अहंकार टिक ही नहीं पाता था कि वह कोई बड़ा आदमी है।
गोपाल कृष्ण गोखले की सेवा: गुरु-भक्ति और निरभिमानता का अनुपम उदाहरण:
निबंध का एक अत्यंत हृदयस्पर्शी और प्रेरक प्रसंग गोपाल कृष्ण गोखले से जुड़ा हुआ है। गोखले जी को महात्मा गांधी अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। जब गोखले जी दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर आए, तो गांधी जी ने उनकी सेवा का पूरा दायित्व स्वयं अपने कंधों पर ले लिया। गांधी जी एक उच्च कोटि के बैरिस्टर और जननेता होने के बावजूद गोखले जी के निजी सेवक यानी अर्दली की भाँति कार्य करने लगे। वे सवेरे उठकर गोखले जी का बिस्तर समेटते, उनके मैले कुर्ते और धोती को अपने हाथों से साबुन से धोते और फिर कोयले वाली भारी इस्तरी (प्रेस) से सिलवटें मिटाकर उन कपड़ों को चमकाते। वे गोखले जी को भोजन परोसते और रात को जब गोखले जी थक जाते, तो गांधी जी उनके पाँव दबाते। जब गोखले जी संकोचवश कहते कि "मोहन, तुम इतने बड़े बैरिस्टर और नेता हो, तुम मेरे कपड़े क्यों धो रहे हो और मेरे पाँव क्यों दबा रहे हो?", तो गांधी जी अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़कर उत्तर देते थे कि "गोखले जी, आप मेरे पूज्य गुरु हैं। आपकी सेवा करने का यह पावन अवसर मुझे जीवन में बार-बार नहीं मिलेगा। आपके काम को अपने हाथों से करने में मुझे जो आनंद और तृप्ति मिलती है, वह किसी अन्य कार्य में नहीं मिल सकती।" यह प्रसंग सिखाता है कि सच्ची गुरु-भक्ति केवल वाणी से स्तुति करने में नहीं, बल्कि निरभिमान होकर गुरु के चरणों में शारीरिक सेवा समर्पित करने में है।
कॉलेज के अंग्रेजियत-प्रभावित छात्रों का अहंकार-भंजन:
एक अन्य रोचक और अत्यंत शिक्षाप्रद प्रसंग दक्षिण अफ्रीका में अध्ययनरत भारतीय कॉलेज के छात्रों का है। कुछ युवा छात्र, जो अंग्रेजी शिक्षा पाकर स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान और बुद्धिजीवी मानते थे, गांधी जी से मिलने आए। वे कोट-पतलून और टाई पहनकर सजे-धजे थे और उनके मन में अंग्रेजी भाषा और किताबी ज्ञान का गहरा घमंड था। वे गांधी जी के सामने बड़ी-बड़ी राजनीतिक बातें करने लगे और बातचीत के अंत में औपचारिकता निभाते हुए बोले, "बापू, हम अंग्रेजी के अच्छे ज्ञाता हैं। क्या हम आपकी कोई सेवा कर सकते हैं? आप हमें कोई बौद्धिक कार्य दीजिए, जैसे कोई अंग्रेजी पत्र लिखना या दस्तावेज तैयार करना।" गांधी जी उनके मन के छिपे बौद्धिक घमंड को ताड़ गए। वे जानते थे कि इन छात्रों को अपनी शिक्षा का अहंकार है और ये शारीरिक काम को अपने स्तर से नीचा समझते हैं। गांधी जी मुस्कुराए और उन्होंने छात्रों के सामने गेहूँ से भरी एक बड़ी परात रख दी और बोले, "अगर आप सचमुच मेरी सहायता करना चाहते हैं, तो कृपया आज की रसोई के लिए इस गेहूँ को बीनकर साफ कर दीजिए।" छात्र हक्के-बक्के रह गए। वे मना भी नहीं कर सकते थे क्योंकि वे स्वयं सेवा का प्रस्ताव लेकर आए थे। छात्रों ने भारी मन से गेहूँ बीनना शुरू किया। थोड़ी ही देर में उनकी उँगलियाँ दुखने लगीं, पीठ में दर्द होने लगा और वे पसीने से तर-बतर हो गए। अंततः हाथ जोड़कर छात्रों ने विदा माँगी। इस घटना के माध्यम से गांधी जी ने बिना एक भी कटु शब्द कहे उन छात्रों को यह जीवन-पाठ पढ़ा दिया कि किताबी ज्ञान तब तक व्यर्थ और अधूरा है जब तक मनुष्य में शारीरिक श्रम करने का साहस और विनम्रता न हो।
बर्तन माँजना और स्वच्छता का उच्चतम प्रतिमान:
गांधी जी के आश्रम में बर्तनों की सफाई का प्रसंग भी अत्यंत अद्भुत है। आश्रम में लकड़ी के चूल्हों पर बड़े-बड़े पतीलों में भोजन पकता था, जिसके कारण बर्तनों की पेंदी और किनारों पर काले धुएँ और कालिख की मोटी परत जम जाती थी। एक बार जब गांधी जी ने देखा कि आश्रम के कुछ साथी बर्तनों को केवल ऊपर-ऊपर से पानी से धोकर रख रहे हैं और कालिख पूरी तरह नहीं छुड़ा रहे हैं, तो गांधी जी ने किसी को डाँटा नहीं। वे स्वयं बर्तनों के ढेर के पास बैठ गए। उन्होंने राख और गीली मिट्टी उठाई और उन विशाल पतीलों को अपने दोनों हाथों से तब तक रगड़ना शुरू किया जब तक कि पतीलों की कालिख पूरी तरह गायब नहीं हो गई और पीतल का चमकदार चेहरा आईने की तरह चमकने नहीं लगा। जब आश्रमवासियों ने देखा कि बापू स्वयं कालिख से सने बर्तनों को माँज रहे हैं, तो वे लज्जा से पानी-पानी हो गए और तुरंत दौड़कर बापू के हाथ से बर्तन लेने लगे। गांधी जी का यह सिद्धांत था कि उपदेश देने से कहीं अधिक शक्तिशाली प्रभाव 'स्वयं आचरण करके दिखाने' में होता है। उनके लिए स्वच्छता केवल बाहरी सफाई नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शुद्धि का साधन थी। वे मानते थे कि 'स्वच्छता ही ईश्वर-भक्ति है' (Cleanliness is next to godliness)।
'नौकर' नहीं अपितु 'पारिवारिक भाई': सामाजिक समता का उद्घोष:
गांधी जी ने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त सामंती कुरीतियों और छुआछूत की व्यवस्था पर अत्यंत गहरा आघात किया। उस समय धनी लोग नौकरों को अछूत समझते थे, उन्हें जूठा खाना देते थे, फटे-पुराने कपड़े पहनने को देते थे और उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते थे। गांधी जी ने इस अमानवीय प्रथा को जड़ से नकार दिया। उन्होंने स्पष्ट घोषणा की कि किसी भी आश्रम या घर में किसी भी व्यक्ति को नौकर नहीं कहा जाएगा। वे कहते थे, "हम किसी को नौकर नहीं मानते, बल्कि अपना भाई मानते हैं। यदि हमारे घर में कोई व्यक्ति सेवा का काम करता है, तो वह हमारे परिवार का सम्मानित सदस्य है। उसे वही भोजन मिलेगा जो हम खाते हैं, वह उसी पंक्ति में बैठेगा जिसमें हम बैठते हैं और यदि वह बीमार पड़ेगा, तो हम स्वयं उसकी तीमारदारी और सेवा करेंगे।" गांधी जी ने स्वयं अपने घर में काम करने वाले सेवकों की बीमारी में रात-रात भर जागकर सेवा की। उनका मानना था कि यदि समाज से जाति-भेद, ऊँच-नीच और वर्ग-संघर्ष को समाप्त करना है, तो हमें हर श्रम को सम्मान देना होगा और श्रम करने वाले हर व्यक्ति को गले लगाना होगा।
'ब्रेड लेबर' (शरीर-श्रम) और टॉलस्टॉय का गहरा प्रभाव:
गांधी जी के इस चिंतन के पीछे महान रूसी लेखक काउंट लियो टॉलस्टॉय और जॉन रस्किन की पुस्तक 'अनटू दिस लास्ट' (Unto This Last) का गहरा प्रभाव था। टॉलस्टॉय ने बाइबल के आधार पर 'ब्रेड लेबर' यानी 'शरीर-श्रम' का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। इस सिद्धांत का मूल भाव यह है कि ईश्वर ने मनुष्य को दो हाथ और दो पाँव दिए हैं, इसलिए प्रत्येक मनुष्य को अपनी आजीविका की रोटी कमाने के लिए प्रतिदिन अपने शरीर से पसीना बहाना चाहिए। जो व्यक्ति बिना शारीरिक श्रम किए दूसरों की कमाई पर पलता है, वह एक प्रकार से समाज का चोर है। गांधी जी ने इस विचार को पूरी तरह आत्मसात किया। उनका मत था कि एक वकील, डॉक्टर या इंजीनियर का श्रम भी उतना ही उपयोगी है जितना एक किसान, मोची या नाई का श्रम। जब तक समाज में बौद्धिक श्रम करने वाले स्वयं को शारीरिक श्रम करने वालों से श्रेष्ठ समझते रहेंगे, तब तक समाज में वास्तविक समता, शांति और न्याय की स्थापना नहीं हो सकती।
आधुनिक विद्यार्थियों के जीवन में इस पाठ की प्रासंगिकता:
आज के इक्कीसवीं सदी के डिजिटल युग में, जहाँ बच्चे शारीरिक गतिविधियों से दूर होकर मोबाइल फोन, कंप्यूटर और गैजेट्स पर निर्भर होते जा रहे हैं, 'नौकर' पाठ का महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है। आज प्रायः देखा जाता है कि बच्चे अपना बस्ता तक स्वयं नहीं उठाते, अपने जूते का फीता बाँधने या पानी का गिलास उठाने के लिए भी माता-पिता या घरेलू सहायकों को पुकारते हैं। यह प्रवृत्ति बच्चों को आलसी, परावलंबी, अहंकारी और असंवेदनशील बनाती है। अनु बंधोपाध्याय का यह पाठ विद्यार्थियों को यह अनमोल सीख देता है कि अपने व्यक्तिगत कार्य स्वयं करने में लज्जा नहीं, बल्कि स्वाभिमान होना चाहिए। अपना बिस्तर ठीक करना, अपने कपड़े संभालना, अध्ययन-कक्ष को स्वच्छ रखना और माता-पिता के घरेलू कार्यों में हाथ बँटाना ही सच्ची शिक्षा का लक्षण है। इसके अतिरिक्त, यह पाठ विद्यार्थियों में समाज के स्वच्छताकर्मियों, चालकों और घरेलू सहायकों के प्रति आदर, कृतज्ञता और मानवीय संवेदना का बीजारोपण करता है।
निष्कर्ष:
संक्षेप में कहें तो, 'नौकर' केवल महात्मा गांधी के जीवन की कुछ घटनाओं का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण कला और दर्शन है। यह पाठ हमें सिखाता है कि आत्म-निर्भरता ही स्वतंत्रता की जननी है, विनम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण है और सेवा ही मनुष्यता की सर्वोच्च साधना है। जब हम गांधी जी के इन आदर्शों को अपने दैनिक जीवन में उतारते हैं, तभी हमारा चरित्र उज्ज्वल बनता है और एक समतामूलक, शोषणमुक्त तथा मानवीय समाज का निर्माण संभव होता है।