ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 19
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प्रगति: अध्ययनरत
राम का वन गमन (Bal Ram Katha)
पाठ परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 'बाल रामकथा' का चौथा अध्याय 'राम का वन-गमन' संपूर्ण रामायण का सबसे मार्मिक, भाव-विह्वल और नैतिक दृष्टि से सबसे उदात्त प्रसंग है। कथाकार मधुकर उपाध्याय ने इस अध्याय में श्रीराम के अद्वितीय धैर्य, मातृ-पितृ भक्ति, भ्रातृ-स्नेह, सीता के पातिव्रत्य धर्म, लक्ष्मण के प्रचंड रोष और राजा दशरथ व अयोध्या की प्रजा के दारुण विलाप का अत्यंत सजीव चित्रण किया है। पिछले अध्याय 'दो वरदान' में हमने देखा कि किस प्रकार मंथरा के कुचक्र में आकर रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से दो कठोर वरदान माँग लिए थे—भरत का राज्याभिषेक और श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का वनवास। राजा दशरथ रात भर कोपभवन में तड़पते रहे, किंतु कैकेयी अपने हठ से रंचमात्र भी नहीं डिगी। प्रभात होते ही जब संपूर्ण अयोध्या उत्सव की उमंग में डूबी थी, तब महामंत्री सुमंत्र कोपभवन पहुँचे। राजा दशरथ को संज्ञाशून्य देखकर रानी कैकेयी ने ही सुमंत्र को आदेश दिया कि वे अविलंब राजकुमार राम को कोपभवन में बुला लाएँ।
कोपभवन में श्रीराम का आगमन एवं कैकेयी का कठोर प्रकटीकरण: सुमंत्र का बुलावा पाते ही श्रीराम तत्काल अपने महल से निकलकर कोपभवन पहुँचे। वे अत्यंत शांत, सौम्य और प्रसन्न मुद्रा में थे। किंतु जैसे ही उन्होंने कोपभवन में प्रवेश किया, वहाँ का भयानक दृश्य देखकर वे स्तब्ध रह गए। चक्रवर्ती राजा दशरथ दीन-हीन अवस्था में धूल भरे फर्श पर पड़े कराह रहे थे। उनकी आँखें सूज चुकी थीं और वे अत्यंत दुर्बल दिखाई दे रहे थे। श्रीराम ने अत्यंत व्याकुल होकर कैकेयी के चरण स्पर्श किए और पूछा, 'माता! पिताजी को क्या कष्ट है? क्या मुझसे कोई ऐसा अपराध हुआ है जिससे पिताजी रुष्ट हैं? यदि कोई शारीरिक रोग है तो राजवैद्य को क्यों नहीं बुलाया गया?' राजा दशरथ ने काँपते हुए नेत्र खोले, केवल 'राम... राम...' पुकारा और अत्यधिक दुख के कारण पुनः मूर्छित हो गए। तब रानी कैकेयी ने बिना किसी संकोच या संकोच-भाव के कठोर वाणी में कहा, 'राम! महाराज तुमसे कुछ कह नहीं पा रहे हैं। इन्होंने देवासुर संग्राम के समय मुझे दो वरदान देने का वचन दिया था। आज जब मैंने अपने वे दोनों संचित वरदान माँगे, तो ये पुत्र-मोह में पड़कर रघुकुल की सत्य-प्रतिष्ठा को कलंकित करने पर उतारू हैं। यदि तुम एक सच्चे और आज्ञाकारी पुत्र हो और अपने पिता के वचनों की लाज रखना चाहते हो, तो सुनो—पहला वरदान यह है कि कल प्रातः जिस सिंहासन पर तुम्हारा अभिषेक होना था, उस पर भरत का राज्याभिषेक होगा; और दूसरा वरदान यह है कि तुम आज ही तापस-वेश धारण कर चौदह वर्ष के लिए दंडकारण्य वन में प्रस्थान करोगे।'
श्रीराम की अप्रतिम धर्मनिष्ठा एवं प्रशांत स्वीकृति: इस भयानक वज्रपात को सुनकर भी श्रीराम के मुखमंडल पर न तो कोई शिकन आई, न दुख का लेशमात्र प्रभाव दिखा, और न ही कोई क्रोध। उनका मुखमंडल पूर्णिमा के चंद्रमा की भाँति शांत और कांतिमान बना रहा। श्रीराम ने अत्यंत विनम्र स्वर में हाथ जोड़कर कहा, 'माता! भरत मेरा छोटा भाई है। यदि वह अयोध्या का राजा बनता है, तो इससे बढ़कर मेरे लिए और क्या सुख हो सकता है? भरत को राज्य मिले, यह तो मेरी भी हार्दिक अभिलाषा है। और पिता की आज्ञा का पालन करना तो पुत्र का परम धर्म है। यदि पिता का वचन सत्य रहता है, तो मैं चौदह वर्ष क्या, संपूर्ण जीवन वनों में बिताने को सहर्ष तैयार हूँ। महाराज को मेरे कारण इतना संताप करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। मैं आज ही, इसी क्षण वन के लिए प्रस्थान करूँगा।' श्रीराम की इस अद्वितीय उदारता और निरहंकार भाव ने सिद्ध कर दिया कि वे संसार के तुच्छ राजपद और भौतिक सुखों से बहुत ऊपर हैं। श्रीराम ने कैकेयी के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लिया, अचेत पड़े पिता को मन ही मन प्रणाम किया और माता कौशल्या से विदा लेने के लिए उनके महल की ओर बढ़ चले।
माता कौशल्या का दारुण विलाप एवं मातृत्व का संताप: श्रीराम सबसे पहले अपनी जन्मदात्री माता कौशल्या के महल में पहुँचे। माता कौशल्या उस समय अपने इष्टदेव का पूजन कर रही थीं और ब्राह्मणों को स्वर्ण व गोदान दे रही थीं। वे अपने लाडले पुत्र के राज्याभिषेक की प्रतीक्षा में अपार आनंद से भरी हुई थीं। श्रीराम ने जाकर माता के चरण स्पर्श किए। कौशल्या ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और बड़े लाड़ से उनके मुख को चूमा। जब श्रीराम ने अत्यंत धीर-गंभीर स्वर में कहा, 'माता! पिताजी ने मुझे एक बहुत बड़ा दायित्व सौंपा है। उन्होंने मुझे चौदह वर्ष के लिए वन जाने की आज्ञा दी है और भरत को राजसिंहासन दिया है', तो माता कौशल्या पर मानो आकाशीय बिजली गिर पड़ी। वे चीत्कार कर संज्ञाशून्य होकर धरती पर गिर पड़ीं। जब उन्हें होश आया, तो वे रोते-रोते विलाप करने लगीं, 'हा राम! यह कैसा घोर अन्याय है! जिस पुत्र के अभिषेक के लिए पूरी अयोध्या दीप जला रही है, उसे वनवास? राम! यदि यह केवल तुम्हारे पिता की आज्ञा होती, तो माता होने के नाते मैं तुम्हें रोक लेती, क्योंकि पिता से माता का स्थान दस गुना श्रेष्ठ होता है। किंतु यह तुम्हारे पिता की स्वेच्छा नहीं, यह तुम्हारी सौतेली माँ कैकेयी का कुटिल षड्यंत्र है। तुम मुझे भी अपने साथ ले चलो, तुम्हारे बिना यह राजमहल मेरे लिए श्मशान के समान है।'
लक्ष्मण का प्रचंड क्रोधाग्नि एवं श्रीराम का विवेकपूर्ण प्रबोधन: उसी समय वहाँ उपस्थित अनुज लक्ष्मण का मुख क्रोध से तमतमा उठा। उनके नेत्र लाल हो गए और उनकी भौंहें तन गईं। लक्ष्मण का क्षत्रिय रक्त खौल उठा। उन्होंने अपनी तलवार की मूंठ पर हाथ रखकर गर्जना की, 'भैया! यह धर्म नहीं, घोर अन्याय और अधर्म है। हमारे पूज्य पिता वृद्ध हो चुके हैं और वे एक स्त्री के मोहपाश में बंधकर अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। जो राजा नीति और धर्म का मार्ग छोड़कर अन्यायपूर्ण आज्ञा दे, उसकी आज्ञा मानना क्षत्रिय धर्म नहीं है। आप मुझे केवल एक बार आज्ञा दीजिए, मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से अयोध्या के सिंहासन पर आपका विधिवत अधिकार स्थापित कर दूँगा। जो भी आपके मार्ग में बाधा बनेगा—चाहे वह भरत हो, कैकेयी हो या स्वयं देवराज इंद्र—मैं सबका संहार कर दूँगा!' लक्ष्मण की क्रोधाग्नि को देखकर संपूर्ण महल काँपने लगा। तब श्रीराम ने आगे बढ़कर बड़े वात्सल्य से लक्ष्मण के कंधे पर हाथ रखा और उन्हें हृदय से लगाते हुए अत्यंत कोमल वाणी में समझाया, 'शांत हो जाओ लक्ष्मण! धर्म का मार्ग क्रोध, हिंसा और रक्तपात का नहीं, बल्कि सत्य, धैर्य और क्षमा का मार्ग है। पिताजी ने जो वचन दिया है, उसकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। यदि हम ही अपने पिता की आज्ञा का उल्लंघन करेंगे, तो रघुकुल की सत्यनिष्ठा और मर्यादा की रक्षा कौन करेगा? अनुज! इसमें माता कैकेयी का भी कोई दोष नहीं है। यह सब दैव (भाग्य) का विधान है। क्रोध को त्यागो और धर्म के मार्ग पर चलो।'
सीता का अनन्य पातिव्रत्य एवं छायावत साथ चलने का हठ: कौशल्या को सांत्वना देकर श्रीराम अपने भवन में पहुँचे, जहाँ जनक-नंदिनी माता सीता राज्याभिषेक के वस्त्र और आभूषण पहनकर पति की प्रतीक्षा कर रही थीं। श्रीराम ने सीता को वनवास का समाचार सुनाया और अत्यंत कोमल शब्दों में समझाया, 'प्रिये वैदेही! मुझे चौदह वर्ष के लिए दंडक वन जाना है। वन का मार्ग अत्यंत दुर्गम, कंटीला और हिंसक पशुओं से भरा है। वहाँ न तो सुकोमल शय्या होगी, न स्वादिष्ट भोजन। अतः तुम अयोध्या में ही रहो। तुम मेरी पूज्य माताओं—विशेषकर माता कौशल्या—की सेवा करना और भरत को राजा मानकर उसका आदर करना।' यह सुनते ही सीता की आँखों से अश्रुओं की झड़ी लग गई। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, 'प्राणनाथ! आप यह कैसी बात कह रहे हैं? एक पतिव्रता नारी का स्थान उसके पति के चरणों में होता है। जहाँ आप हैं, वही मेरा स्वर्ग और वही मेरी अयोध्या है। आपके बिना स्वर्ग का सुख भी मेरे लिए नरक के समान है। मैं वन के कष्टों से तनिक भी भयभीत नहीं हूँ। मैं आपके आगे-आगे चलकर मार्ग के काँटे चुनूँगी और आपकी सेवा करूँगी। मुझे अपने चरणों से अलग मत कीजिए।' सीता के इस अप्रतिम प्रेम, पातिव्रत्य और अडिग संकल्प के सम्मुख श्रीराम को नतमस्तक होना पड़ा और उन्होंने सीता को साथ चलने की सहर्ष अनुमति दे दी।
लक्ष्मण का भ्रातृ-समर्पण एवं माता सुमित्रा का अमर उपदेश: उधर लक्ष्मण ने भी श्रीराम के चरणों में अपना मस्तक रख दिया और हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि वे भी उनके साथ वन चलेंगे। लक्ष्मण ने कहा, 'भैया! मैं आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। वन में मैं आपकी और भाभी सीता की सुरक्षा करूँगा, मार्ग प्रशस्त करूँगा, आपके लिए कंद-मूल और फल लाऊँगा और रात भर जागकर पहरा दूँगा।' श्रीराम ने लक्ष्मण के अगाध प्रेम को देखकर उन्हें भी साथ चलने की अनुमति दी, किंतु उनसे कहा कि वे पहले अपनी जन्मदात्री माता सुमित्रा से आज्ञा ले आएँ। जब लक्ष्मण माता सुमित्रा के पास गए, तो त्याग की देवी माता सुमित्रा ने जो अमर उपदेश दिया, वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया। सुमित्रा ने कहा, 'तात लक्ष्मण! राम तुम्हारे पिता हैं, सीता तुम्हारी माता हैं और जिस वन में राम रहें, वही तुम्हारी अयोध्या है। जाओ वत्स, अपने भ्रातृ-धर्म का अखंड पालन करो!' तीनों ने वन-प्रस्थान से पूर्व अपने समस्त राजसी आभूषण, स्वर्ण, रत्न और विपुल धन-संपत्ति याचकों, ब्राह्मणों और दीनों में मुक्त हस्त से दान कर दी।
कोपभवन में विदाई, वल्कल वस्त्र एवं मुनि वशिष्ठ का हस्तक्षेप: श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अंतिम विदाई लेने पुनः राजा दशरथ और कैकेयी के समुख कोपभवन पहुँचे। वहाँ तीनों माताओं, कुलगुरु वशिष्ठ और महामंत्री सुमंत्र की उपस्थिति थी। कैकेयी ने स्वयं आगे बढ़कर तीनों को तपस्वियों के संन्यासी वस्त्र (वल्कल/चीर वस्त्र) दिए। श्रीराम और लक्ष्मण ने अपने राजसी वस्त्र उतारकर तत्काल वल्कल वस्त्र धारण कर लिए। किंतु जब सीता ने असमंजस में वल्कल वस्त्र हाथ में लिए, तो यह देखकर कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ का धैर्य टूट गया। वे अत्यंत क्रोधित होकर कैकेयी से बोले, 'पापिनी कैकेयी! तूने केवल राम के लिए वनवास माँगा था, सीता के लिए नहीं। सीता वन नहीं जाएगी, वह अयोध्या की राजमाता और पटरानी के रूप में सिंहासन पर बैठेगी! और यदि सीता अपने पति के साथ जा ही रही है, तो वह एक महारानी की तरह समस्त राजसी वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित होकर जाएगी!' राजा दशरथ ने तत्काल आज्ञा दी कि सीता को चौदह वर्षों के लिए पर्याप्त बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण दिए जाएँ।
अयोध्या से रथ का प्रस्थान, राजा दशरथ व प्रजा का क्रंदन: श्रीराम, सीता और लक्ष्मण महामंत्री सुमंत्र के भव्य रथ पर सवार हुए। रथ के आगे बढ़ते ही पूरी अयोध्या नगरी में ऐसा हाहाकार और दारुण रुदन मच गया, मानो प्रलय आ गई हो। वृद्ध राजा दशरथ और तीनों रानियाँ नंगे पैर धूल में दौड़ते हुए चिल्लाने लगे, 'सुमंत्र! रथ रोको! एक क्षण के लिए मेरे राम का मुख देख लेने दो!' किंतु श्रीराम ने सुमंत्र से अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा, 'सुमंत्र! रथ को तीव्र गति से हाँकिए। मुझसे माता-पिता और प्रजा का यह असहनीय दुख देखा नहीं जाता।' अयोध्या के सहस्रों नागरिक रथ के पीछे-पीछे दौड़ पड़े। उन्होंने पुकार कर कहा, 'जहाँ राम रहेंगे, वहीं हमारी अयोध्या होगी। हम सब भी आपके साथ वन में रहेंगे।' रथ के पहियों से उड़ने वाली धूल को नागरिकों ने अपने मस्तक पर तिलक की भाँति लगाया।
तमसा-तट की रात्रि, श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह व चित्रकूट निवास: संध्या होते-होते रथ तमसा नदी के तट पर पहुँचा। श्रीराम ने प्रजाजनों को बहुत समझाया कि वे अयोध्या लौट जाएँ, किंतु प्रजा नहीं मानी और तमसा तट पर ही सो गई। आधी रात को जब थकी-हारी प्रजा गहरी नींद में सो गई, तो श्रीराम ने प्रजा के कष्ट को देखकर सुमंत्र से कहा कि वे चुपचाप रथ को आगे बढ़ा लें, ताकि प्रजा भ्रमित होकर वापस लौट जाए। इसके उपरांत वे पवित्र गंगा के तट पर स्थित श्रृंगवेरपुर पहुँचे, जहाँ श्रीराम के बाल-सखा निषादराज गुह ने उनका अपार आदर-सत्कार किया। वहाँ श्रीराम और लक्ष्मण ने बड़ के दूध से अपने केशों की जटाएँ बनाईं। केवट ने अत्यंत भक्तिभाव से श्रीराम के चरण धोकर उन्हें नौका से गंगा पार कराया। श्रीराम ने सुमंत्र को रोते हुए अयोध्या वापस भेज दिया। आगे चलकर प्रयाग में महर्षि भारद्वाज के दर्शन कर उनके परामर्श से श्रीराम, सीता और लक्ष्मण मंदाकिनी नदी के सुरम्य तट पर स्थित चित्रकूट पर्वत पहुँचे। वहाँ लक्ष्मण ने सुंदर पर्णकुटी का निर्माण किया और तीनों आनंदपूर्वक निवास करने लगे। उधर अयोध्या में सुमंत्र के खाली हाथ लौटते ही राजा दशरथ ने 'हा राम! हा राम! हा रघुनंदन!' पुकारते हुए पुत्र-वियोग में अपने प्राण त्याग दिए।