ICSE • कक्षा 6 • Hindi • अध्याय 9
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प्रगति: अध्ययनरत
जो देखकर भी नहीं देखते (Vasant)
सीआईएससीई कक्षा 6 हिंदी (वसंत भाग 1) के पाठ्यक्रम में संकलित पाठ 'जो देखकर भी नहीं देखते' विश्वप्रसिद्ध अमेरिकी विदुषी, लेखिका एवं अद्वितीय समाज सुधारक हेलेन केलर (1880–1968) के जीवन-अनुभवों पर आधारित एक अत्यंत संवेदनशील, विचारोत्तेजक और दार्शनिक आत्मकथात्मक निबंध है। हेलेन केलर का जीवन मानवीय जिजीविषा, अदम्य संकल्प और आत्मिक शक्ति का वह स्वर्णिम इतिहास है जिसने यह सिद्ध कर दिया कि शारीरिक अक्षमता कभी भी आत्मा के प्रकाश और प्रतिभा के प्रस्फुटन में बाधा नहीं बन सकती। जब हेलेन केलर मात्र उन्नीस माह (डेढ़ वर्ष) की थीं, तब वे एक अज्ञात गंभीर मस्तिष्क ज्वर (Brain Fever) से ग्रस्त हो गईं। यद्यपि वे उस प्राणघातक बीमारी से बच तो गईं, परंतु उस भयानक ज्वर ने उनकी दोनों आँखें और दोनों कान सदा के लिए छीन लिए। वे न देख सकती थीं और न ही कुछ सुन सकती थीं। सुनने की क्षमता न होने के कारण वे बोलना भी नहीं सीख सकीं। इस प्रकार उनका बाल्यकाल घोर अंधकार, सन्नाटे और मौन के कारागार में कैद हो गया।
परंतु जब सात वर्ष की अवस्था में उनकी समर्पित शिक्षिका मिस ऐनी सुलिवन (Anne Sullivan) उनके जीवन में आईं, तो उन्होंने हेलेन की हथेली पर अपनी उँगलियों से अक्षरों को उकेरकर उन्हें स्पर्श द्वारा भाषा, शब्दों और विचारों की अद्भुत दुनिया से परिचित कराया। हेलेन केलर ने अपनी उँगलियों के पोरों (Fingertips) को ही अपनी 'आँखें' और 'कान' बना लिया। उन्होंने ब्रेल लिपि (Braille) सीखी, टाइपराइटर चलाना सीखा, अथक परिश्रम से बोलना सीखा और आगे चलकर विश्वप्रसिद्ध रेडक्लिफ कॉलेज (हार्वर्ड विश्वविद्यालय) से कला स्नातक (B.A.) की उपाधि प्राप्त करने वाली विश्व की प्रथम दृष्टिहीन एवं बधिर महिला बनीं। उन्होंने बारह से अधिक कालजयी पुस्तकें लिखीं और समूचे विश्व का भ्रमण कर दिव्यांगों के पुनर्वास, महिला अधिकारों और विश्व शांति के लिए अप्रतिम कार्य किया।
प्रस्तुत निबंध 'जो देखकर भी नहीं देखते' का आरंभ एक अत्यंत रोचक और आँखें खोल देने वाली वास्तविक घटना से होता है। लेखिका बताती हैं कि वे अक्सर अपने उन मित्रों की परीक्षा लेती हैं जिनके पास स्वस्थ और सामान्य आँखें हैं, ताकि वे यह जान सकें कि वे वास्तव में अपने आस-पास के वातावरण को कितना और कैसे देखते हैं। हाल ही में उनकी एक अत्यंत प्रिय सहेली जंगल की लंबी सैर करके लौटी थी। हेलेन केलर ने उससे स्वाभाविक उत्सुकता और प्रसन्नता से पूछा—'तुमने जंगल में क्या-क्या देखा? प्रकृति के कौन-से रूप तुम्हें आकर्षित कर गए?' सहेली ने अत्यंत लापरवाही और सपाट भाव से उत्तर दिया—'कुछ खास तो नहीं!'
सहेली का यह संक्षिप्त और उदासीन उत्तर सुनकर हेलेन केलर को कोई भारी आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि वे ऐसे अनुभवों की अभ्यस्त हो चुकी थीं। उनका दृढ़ विश्वास हो चुका था कि 'जिन लोगों के पास आँखें होती हैं, वे सचमुच बहुत कम देखते हैं!' लेखिका अपने मन में चिंतन करती हैं कि क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति पूरे एक घंटे तक घने, हरे-भरे, जीवंत जंगल में टहलता रहे, जहाँ लाखों प्रकार के पेड़-पौधे, पक्षी, लताएँ, पुष्प और प्राकृतिक दृश्य विद्यमान हों, और फिर भी उसे कुछ भी खास या सुंदर दिखाई न दे? यह सोचना भी हेलेन केलर के लिए अकल्पनीय था।
इसके विपरीत, लेखिका अपने स्वयं के संवेदी अनुभवों का सजीव वर्णन करते हुए कहती हैं कि वे जो कुछ भी नहीं देख सकतीं, फिर भी केवल स्पर्श के माध्यम से सैकड़ों रोचक और मनोहारी चीजों को पहचान लेती हैं। प्रकृति के साथ उनका संबंध भौतिक दृष्टि से नहीं, अपितु गहन स्पर्श-संवेदना और हृदय की चेतना से जुड़ा है। वे जब जंगल या बगीचे में जाती हैं, तो पेड़ों की छाल को छूकर ही उनके नाम और स्वरूप का साक्षात्कार कर लेती हैं। वे भोजपत्र (Birch tree) के पेड़ की अत्यंत चिकनी और रेशमी छाल को तथा चीड़ (Pine tree) के पुराने पेड़ की खुरदरी और दरारयुक्त छाल को केवल अपनी उँगलियों के स्पर्श से बिना किसी दुविधा के पहचान लेती हैं।
वसंत ऋतु के आगमन पर जब प्रकृति में नव-जीवन का संचार होता है, तब हेलेन केलर बड़ी आतुरता और उत्सुकता से पेड़ों की डालियों और टहनियों में नई-नई फूटती हुई कलियों (Buds) को ढूँढती हैं। कली का वह नन्हा, सुकुमार और कोमल उभार उनकी उँगलियों को असीम आनंद और विस्मय से भर देता है। वे जब किसी खिले हुए फूल की पंखुड़ियों को स्पर्श करती हैं, तो उनकी मखमली (Velvety) कोमलता और उनकी सुंदर घुमावदार बनावट को महसूस कर वे आत्मविभोर हो उठती हैं। वे उस फूल की पंखुड़ी को छूते हुए प्रकृति के उस असीम जादुई कारीगरी का अनुभव करती हैं जो सामान्य आँखों वाले लोग नित्य देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। इस स्पर्श मात्र से उनके हृदय में प्रकृति के प्रति अपार श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव जाग्रत हो जाता है।
प्रकृति का आनंद केवल स्थिर वनस्पतियों तक सीमित नहीं है। हेलेन केलर जब किसी प्राकृतिक झरने या पहाड़ी जलधारा के पास पहुँचती हैं, तो वे तुरंत पानी में अपनी उँगलियाँ डाल देती हैं। जब शीतल, निर्मल जलधारा उनकी उँगलियों के बीच से होकर बहती है, तो वे आनंद से पुलकित हो उठती हैं। उन्हें लगता है कि जीवन की सजीव धारा उनकी धमनियों में प्रवाहित हो रही है। कभी-कभी यदि उनका भाग्य अच्छा होता है, तो वे किसी वृक्ष की डाल पर धीरे से अपना हाथ रख देती हैं और डाली के भीतर होने वाले हल्के सूक्ष्म कंपन को महसूस कर लेती हैं। उस कंपन से उन्हें पता चल जाता है कि ऊपर बैठी नन्हीं चिड़िया अपनी मधुर तान में कोई गीत गा रही है। बिना सुने भी चिड़िया के आनंदमय स्वर का यह कंपन उनकी आत्मा को छू जाता है।
लेखिका आगे कहती हैं कि उनके लिए चीड़ की भूमि पर गिरी सूखी, खुशबूदार पत्तियाँ या हरी मखमली घास का फैला हुआ मैदान किसी भी राजा-महाराजा के राजमहल में बिछे अत्यंत बहुमूल्य और कीमती ईरानी कालीन से कहीं अधिक सुखद और प्रिय है। वे घास के मैदान पर नंगे पैर चलना या उस पर हाथ फेरना जीवन का परम सुख मानती हैं। मौसम के बदलते हुए तेवर, हवा की दिशा में आने वाली ताजगी, और ऋतुओं का परिवर्तन उनके जीवन में एक नया उल्लास, नया रंग और एक नई अंतर्कथा लिख जाता है।
इन सब अनुभवों का वर्णन करने के उपरांत हेलेन केलर एक अत्यंत मार्मिक और गहरा दार्शनिक प्रश्न उठाती हैं। वे कहती हैं कि कभी-कभी उनका हृदय इन सभी अद्भुत दृश्यों को अपनी आँखों से साक्षात देखने के लिए तड़प उठता है। वे सोचती हैं कि जब केवल छूने मात्र से, मात्र एक संवेदी अंग के स्पर्श से उन्हें इतना असीम आनंद और तृप्ति मिलती है, तो यदि उनके पास आँखें होतीं और वे प्रकृति के इन मोहक रंगों, सूर्योदय की स्वर्णिम किरणों, संध्या की लालिमा, और पुष्पों के विविध रंगों को अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देख पातीं, तो उनकी आत्मा न जाने कितनी मुग्ध और आनंदमग्न हो उठती! उनका मन यह सोचकर विस्मित हो जाता है कि जिन लोगों के पास दृष्टि का यह अनमोल वरदान है, वे प्रकृति के इस विराट् सौंदर्य को देखकर भी मुग्ध क्यों नहीं होते?
लेखिका यहाँ मानव मनोविज्ञान और उसकी चिरंतन विडंबना का अत्यंत यथार्थवादी विश्लेषण करती हैं। वे कहती हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलता यह है कि वह अपनी उन क्षमताओं और वरदानों की कभी कद्र नहीं करता जो ईश्वर ने उसे सहज रूप में प्रदान किए हैं। मनुष्य हमेशा उस वस्तु की तृष्णा और अभिलाषा में दुखी और बेचैन रहता है जो उसके पास नहीं है। जिसके पास स्वस्थ आँखें, कान और शरीर है, वह प्रतिदिन मिलने वाले इन प्राकृतिक वरदानों को अपना जन्मसिद्ध और साधारण अधिकार मानकर उनकी उपेक्षा करता रहता है, जबकि किसी वस्तु का वास्तविक मूल्य केवल वही व्यक्ति समझ सकता है जो उससे वंचित रहा हो। दृष्टिहीन हेलेन केलर के लिए आँखें ईश्वरीय कृपा का सर्वोच्च शिखर हैं, जबकि आँखों वाले लोग उसे एक सामान्य और तुच्छ वस्तु मानकर व्यर्थ की सांसारिक चिंताओं में नष्ट कर देते हैं।
निबंध के अंतिम भाग में हेलेन केलर समूची मानव-जाति को एक अमूल्य और शाश्वत जीवन-संदेश देती हैं। वे कहती हैं कि दृष्टि (Eyesight) मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा, सबसे सुंदर और सबसे अलौकिक उपहार है। यह वह शक्ति है जिसके माध्यम से मनुष्य न केवल अपने भौतिक कार्यों को सुगमता से संपन्न कर सकता है, बल्कि अपने संपूर्ण जीवन को खुशियों के इंद्रधनुषी रंगों से भर सकता है। आँखों के माध्यम से मनुष्य प्रकृति की कलाकृति, अपने प्रियजनों के चेहरों पर खिलती मुस्कान, ज्ञान की अनमोल पुस्तकें और ईश्वर की इस विराट् सृष्टि के प्रत्येक कण में छिपी दिव्यता का दर्शन कर सकता है। हेलेन केलर आह्वान करती हैं कि मनुष्य को अपनी आँखों का सदुपयोग संवेदनशीलता, कृतज्ञता, और सौंदर्य-दृष्टि के विकास में करना चाहिए।
हेलेन केलर की आत्मकथा 'द स्टोरी ऑफ माय लाइफ' (मेरी जीवन कहानी) में उनके उस युगांतरकारी क्षण का वर्णन मिलता है, जिसने उनके संपूर्ण जीवन की दिशा बदल दी थी। कुएँ के पंप पर जब उनकी शिक्षिका ऐनी सुलिवन ने एक हाथ पर ठंडे पानी की फुहार डाली और दूसरी हथेली पर 'W-A-T-E-R' शब्द उकेरा, तो पहली बार बालक हेलेन के मस्तिष्क में यह दिव्य बोध हुआ कि संसार की प्रत्येक वस्तु का एक नाम है और वह नाम एक विचार को जन्म देता है। यही संवेदी चेतना आगे चलकर उनकी प्रकृति-साधना का आधार बनी। आधुनिक मनोविज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि जब मनुष्य का कोई एक संवेदी अंग निष्क्रिय हो जाता है, तो शेष संवेदी अंग अधिक सजग, प्रखर और संवेदनशील हो जाते हैं। इसे 'संवेदी प्रतिपूरण' (Sensory Compensation) कहा जाता है। हेलेन केलर की उँगलियाँ केवल छूने का साधन नहीं थीं, बल्कि वे उनकी चेतना, उनकी आत्मा और उनके विचारों का प्रत्यक्ष विस्तार थीं।
जब हेलेन केलर ने विश्व का भ्रमण किया, तो उन्होंने भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे महापुरुषों से भी भेंट की और उनके विचारों को अपनी उँगलियों के पोरों से उनके होठों और चेहरों के स्पंदन को छूकर समझा। उनका यह संदेश कि 'दुनिया की सबसे सुंदर और श्रेष्ठतम चीजों को न तो देखा जा सकता है और न ही छुआ जा सकता है, उन्हें केवल हृदय से महसूस किया जा सकता है'—प्रस्तुत निबंध का सर्वकालिक और सार्वभौमिक निष्कर्ष है। यह विचार प्रत्येक संवेदनशील मनुष्य को अपनी दृष्टि और जीवन के प्रति एक नए विस्मय, कृतज्ञता और सम्मान से भर देता है।
नैतिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से यह निबंध विद्यार्थियों को आत्म-मंथन (Self-Reflection) का अवसर देता है। यह पाठ हमें सिखाता है कि जब हम किसी प्राकृतिक स्थल पर भ्रमण के लिए जाएँ, तो केवल अपने मोबाइल कैमरों या सतही बातचीत में व्यस्त रहने के बजाय अपनी सभी ज्ञानेंद्रियों को जागृत करें। पत्तों की सरसराहट को सुनें, गीली मिट्टी की सोंधी सुगंध को महसूस करें, वृक्षों की छाल के स्पर्श को अनुभव करें और खुले आकाश के रंगों को अपनी आँखों में समाहित होने दें। यह समग्र संवेदी दृष्टिकोण विद्यार्थियों के अवगाहन, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन को सुदृढ़ बनाता है। हेलेन केलर का यह अमर निबंध प्रत्येक पाठक को दृष्टिहीनता के वास्तविक अर्थ को पुनर्परिभाषित करने की चुनौती देता है—वास्तविक अंधा वह नहीं है जिसकी आँखें नहीं हैं, बल्कि वास्तविक अंधा वह है जिसके पास आँखें होते हुए भी जो प्रकृति और मानवीय संवेदना के प्रति सर्वथा अंधा बना हुआ है।
सीआईएससीई कक्षा 6 के विद्यार्थियों के लिए यह पाठ केवल भाषा और व्याकरण का अभ्यास नहीं है, अपितु यह जीवन-मूल्यों की एक श्रेष्ठतम कार्यशाला है। यह पाठ विद्यार्थियों के भीतर दिव्यांगजनों (विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों) के प्रति गहरी सहानुभूति, संवेदनशीलता और आदर की भावना जाग्रत करता है। साथ ही, यह विद्यार्थियों को प्रकृति के सूक्ष्म रूपों के प्रति सजग बनना, कृतज्ञता का अभ्यास करना तथा जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है। प्रस्तुत अध्ययन सामग्री में पाठ के प्रत्येक विचार, शब्दार्थ, प्रश्नोत्तर और परीक्षा उपयोगी विश्लेषणात्मक ढाँचों को विस्तारपूर्वक समाहित किया गया है।