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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 8
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Ek Kutta Aur Ek Maina

'एक कुत्ता और एक मैना' हिंदी के मूर्धन्य आलोचक, उपन्यासकार और निबंधकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित एक अत्यंत मर्मस्पर्शी, सूक्ष्म और दार्शनिक संस्मरण-निबंध है। इस निबंध में लेखक ने विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर (गुरुदेव) के शांतिनिकेतन जीवन, उनके संवेदनशील व्यक्तित्व और मूक पशु-पक्षियों के साथ उनके अगाध आत्मिक संबंध का अत्यंत भावुक चित्रण किया है। द्विवेदी जी ने स्पष्ट किया है कि मनुष्य का प्रेम केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं होना चाहिए। बेजुबान पशु और पक्षी भी प्रेम, करुणा, वफादारी और उपेक्षा की भाषा को इंसानों से कहीं अधिक गहराई से समझते हैं। इस विस्तृत अध्ययन सामग्री में समाहित प्रमुख आयाम: लेखक परिचय एवं संस्मरण की पृष्ठभूमि: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का शांतिनिकेतन में अध्यापन काल और गुरुदेव का सान्निध्य। गुरुदेव का शांतिनिकेतन से श्रीनिकेतन प्रस्थान: वृद्धावस्था और अस्वस्थता के कारण शांतिनिकेतन के कोलाहल से दूर श्रीनिकेतन के तीसरे तल्ले के शांत एकांत में वास। मूक कुत्ते की अलौकिक स्वामिभक्ति: बिना किसी के बताए दो मील दूर श्रीनिकेतन के तीसरे तल्ले पर गुरुदेव के चरणों में पहुँच जाना और स्पर्श मात्र से आनंद-विभोर होना। गुरुदेव के महाप्रयाण पर कुत्ते का शोक: गुरुदेव के पार्थिव शरीर की भस्म जब शांतिनिकेतन लाई गई, तो कुत्ते का कलश के पास मूक बैठकर अश्रु बहाना। लंगड़ी मैना का जीवन-दर्शन: यूथभ्रष्ट (झुंड से अलग) अकेली लंगड़ी मैना का स्वाभिमान, करुणा और एकाकीपन का दार्शनिक अवलोकन। JAC बोर्ड परीक्षापयोगी प्रश्न-उत्तर: NCERT अभ्यास के सभी प्रश्न, आशय-स्पष्टीकरण और मूल्यपरक प्रश्न।

मूक आँखों में असीम भक्ति और लंगड़ी चिड़िया की करुणा: गुरुदेव टैगोर की अद्भुत पशु-संवेदना

क्या आपने कभी देखा है कि कोई कुत्ता बिना किसी नक्शे या गंध के, दो मील दूर किसी अनजान मकान के तीसरे तल्ले की सीढ़ियाँ चढ़कर सीधे अपने मालिक के कमरे में पहुँच जाए और उसके चरणों में अपना सिर रखकर आँखें मूँद ले? और क्या कभी आपने गौर किया है कि आपके आँगन में फुदकने वाली एक छोटी-सी लंगड़ी मैना के मन में भी वियोग और करुणा का कितना गहरा सागर छिपा हो सकता है? विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर की दिव्य दृष्टि ने उस मूक कुत्ते की भक्ति में ईश्वर का साक्षात दर्शन किया था! आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह निबंध हमारी पत्थर जैसी आँखों को बेजुबानों के आंसुओं को पढ़ने का कोमल चश्मा पहना देता है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

  1. मानवेतर प्राणियों के प्रति संवेदना और सह-अस्तित्व: आज जब मनुष्य पशु-पक्षियों के प्रति क्रूर होता जा रहा है, यह पाठ मूक जीवों के आत्मिक गौरव और उनके अधिकारों की रक्षा का संदेश देता है।
  2. गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के विराट मानवीय स्वरूप का दर्शन: नोबेल पुरस्कार विजेता टैगोर का सादगीपूर्ण जीवन और उनकी असीम करुणा का प्रत्यक्ष साक्ष्य।
  3. सूक्ष्म निरीक्षण एवं दार्शनिक गद्य का उत्कृष्ट नमूना: हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की लालित्यपूर्ण भाषा-शैली विद्यार्थियों में उच्च कोटि की साहित्यिक समझ विकसित करती है।
  4. JAC बोर्ड परीक्षा में उच्च भारांक: कुत्ते की भक्ति, गुरुदेव के विचार और लंगड़ी मैना के स्वभाव पर आधारित 5 से 8 अंक के प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की लालित्यपरक निबंध शैली (Humanistic Essay Style) की समझ।
  • विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर, शांतिनिकेतन और उनके मानवतावादी दर्शन की बुनियादी जानकारी।
  • पशु-पक्षियों के मनोवैज्ञानिक व्यवहार और इंसानों से उनके आत्मिक संबंध का बोध।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • गुरुदेव के कुत्ते की स्वामिभक्ति के माध्यम से मूक पशुओं की आत्मिक चेतना का विश्लेषण कर पाना।
  • गुरुदेव द्वारा कुत्ते के स्पर्श में 'समग्र मानव-सत्य' देखने के दार्शनिक अर्थ को स्पष्ट करना।
  • लंगड़ी मैना के व्यवहार के सूक्ष्म अवलोकन से जीव-जगत के एकाकीपन और करुणा को समझना।
  • मानव और प्रकृति के पारस्परिक सहजीवन पर तार्किक और संवेदनशील निबंधात्मक उत्तर लिखना।
  • JAC बोर्ड परीक्षा के प्रश्नों के मानक और प्रामाणिक उत्तर तैयार करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. लेखक परिचय एवं शांतिनिकेतन की प्...
2 2. गुरुदेव का श्रीनिकेतन वास एवं कु...
3 3. कुत्ते की भक्ति का दार्शनिक रहस्...
4 4. गुरुदेव का महाप्रयाण और कुत्ते क...
5 5. लंगड़ी मैना का जीवन-दर्शन: करुणा...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. लेखक परिचय एवं शांतिनिकेतन की प्रेरक पृष्ठभूमि

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907 - 1979):

हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ निबंधकार, उपन्यासकार, समालोचक और सांस्कृतिक इतिहासकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के 'दुबे का छपरा' गाँव में हुआ था। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की उपाधि प्राप्त की।

  • सन् 1940 से 1950 तक वे विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्वभारती (शांतिनिकेतन) में हिंदी भवन के निदेशक और प्राध्यापक रहे। वहाँ उन्हें गुरुदेव टैगोर और क्षितिमोहन सेन जैसे मनीषियों का सान्निध्य मिला, जिसने उनकी दृष्टि को अत्यंत विशाल और मानवतावादी बनाया।
  • उनकी प्रमुख कृतियों में 'अशोक के फूल', 'कुटज', 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'चारु चंद्रलेख' और 'कबीर' अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

संस्मरण का संदर्भ:

यह संस्मरण गुरुदेव के अंतिम दिनों का है जब वे अस्वस्थ थे और शांतिनिकेतन के कोलाहल से दूर सांत्वना और एकांत की तलाश में थे। द्विवेदी जी ने गुरुदेव के साथ बिताए उन पलों को बड़ी सूक्ष्मता से दर्ज किया है।

2. गुरुदेव का श्रीनिकेतन वास एवं कुत्ते का अलौकिक आगमन

श्रीनिकेतन के तीसरे तल्ले पर वास:

शांतिनिकेतन में गुरुदेव से मिलने प्रतिदिन सैकड़ों देशी-विदेशी दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती थी। शारीरिक अस्वस्थता और वृद्धावस्था के कारण गुरुदेव ने शांतिनिकेतन छोड़कर पास ही स्थित श्रीनिकेतन के एक पुराने, छोटे मकान के तीसरे तल्ले पर रहना तय किया।

  • तीसरे तल्ले पर पहुँचने के लिए एक संकरी लोहे की घुमावदार सीढ़ी थी।
  • वहाँ एकांत और शांति थी जहाँ गुरुदेव खुले आकाश और पेड़ों को देखते हुए विश्राम करते थे।

कुत्ते का अविश्वसनीय आगमन:

एक दिन जब द्विवेदी जी और उनके कुछ साथी गुरुदेव के दर्शन करने पहुँचे, तो उन्होंने एक विस्मयकारी दृश्य देखा:

  • गुरुदेव का एक पालतू कुत्ता धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़कर कमरे में आया और चुपचाप गुरुदेव के चरणों के पास बैठ गया।
  • किसी ने उस कुत्ते को रास्ता नहीं बताया था, न किसी ने उसे वहाँ पहुँचाया था। वह शांतिनिकेतन से लगभग दो मील की दूरी तय करके, उस अजनबी मकान के तीसरे तल्ले पर ठीक गुरुदेव के कमरे में पहुँच गया था!
  • गुरुदेव ने स्नेह से उसकी पीठ पर हाथ फेरा। कुत्ता आनंद से अपनी आँखें मूँदकर अपने पूरे शरीर को गुरुदेव के स्पर्श में सौंप दिया। उसकी रोम-रोम से कृतज्ञता और आनंद का फव्वारा फूट रहा था।

3. कुत्ते की भक्ति का दार्शनिक रहस्य: समग्र मानव-सत्य का दर्शन

गुरुदेव के मुख से कुत्ते की महिमा:

गुरुदेव ने उस मूक कुत्ते को देखकर अत्यंत गंभीर और दार्शनिक वाणी में कहा:

"देखा तुमने, यह यहाँ कैसे आ पहुँचा? इसे यहाँ किसने रास्ता दिखाया? मनुष्य अपनी भाषा और बुद्धि से भी वह सत्य नहीं देख पाता जो यह मूक पशु अपने अंतःकरण से देख लेता है!"

मूक पशु का आत्म-समर्पण:

गुरुदेव ने अपनी प्रसिद्ध बंगाली कविता 'आरोग्य' में इस कुत्ते का उल्लेख करते हुए लिखा था:

  • इस मूक कुत्ते की करुण दृष्टि में एक ऐसा आत्म-समर्पण और असीम निष्ठा है जो केवल मनुष्य के भीतर के 'परम सत्य' को पहचानती है।
  • यह कुत्ता अपने मालिक से कोई धन, भोजन या पद नहीं चाहता; इसे केवल अपने प्रभु के हाथ का एक कोमल स्पर्श चाहिए। उस एक स्पर्श में यह अपने सारे अस्तित्व की सार्थकता पा लेता है।
  • द्विवेदी जी कहते हैं कि मनुष्य बुद्धिमान होकर भी स्वार्थी और संकीर्ण हो जाता है, किंतु यह जानवर बिना किसी छल-कपट के पूर्ण भक्ति का साक्षात रूप बन जाता है।

4. गुरुदेव का महाप्रयाण और कुत्ते का मौन विलाप

अंतिम विदाई का हृदयविदारक प्रसंग:

जब गुरुदेव का कोलकाता में देहांत हो गया और उनके पार्थिव शरीर की भस्म शांतिनिकेतन में लाई गई:

  • आश्रम के सभी छात्र, अध्यापक और संन्यासी अत्यंत विलाप कर रहे थे।
  • उस समय वही कुत्ता आश्रमवासियों के बीच में धीरे-धीरे चलता हुआ आया।
  • जहाँ गुरुदेव की चिता-भस्म का कलश रखा हुआ था, वह कुत्ता उस कलश के पास जाकर शांत भाव से बैठ गया।
  • उसने न किसी को काटा, न भौंका; बस अपनी उदास, नम आँखों से उस कलश को देखता रहा और सबके साथ सिर झुकाकर मौन श्रद्धांजलि दी। यह देखकर वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें छलक आईं कि बेजुबान जानवर भी मृत्यु के वियोग और शोक को कितनी गहराई से महसूस करता है!

5. लंगड़ी मैना का जीवन-दर्शन: करुणा और एकाकीपन

मैना के स्वभाव का सामान्य रूप:

द्विवेदी जी लिखते हैं कि साधारणतः मैना को कोई बहुत दयालु या करुणावान पक्षी नहीं माना जाता। वह हमेशा दूसरों के अंडों को फोड़ने, घोंसले छीनने और दिनभर कलह (झगड़ा) करने के लिए बदनाम रहती है।

लंगड़ी मैना का विशिष्ट अवलोकन:

किंतु गुरुदेव के बरामदे में रोज सुबह फुदकने वाली एक लंगड़ी मैना ने गुरुदेव और लेखक का ध्यान खींचा:

  • वह मैना एक पैर से लंगड़ी थी और अपने झुंड (यूथ) से अलग होकर बिल्कुल अकेली रहती थी।
  • वह अन्य मैनाओं की तरह शोर नहीं मचाती थी, न किसी से झगड़ती थी। वह चुपचाप कीड़े-मकोड़े चुगती और बरामदे में एकाकी भाव से टहलती थी।
  • गुरुदेव ने उस मैना को देखकर कहा: "देखते हो, यह मैना कितनी उदास और गंभीर है! मानो इसका कोई प्रियजन बिछुड़ गया हो या यह जीवन के किसी भारी शोक को अकेले झेल रही हो!"
  • लेखक कहते हैं कि पहले वे मैना को केवल एक साधारण झगड़ालू पक्षी समझते थे, किंतु गुरुदेव की संवेदनशील दृष्टि ने उन्हें उस लंगड़ी मैना के भीतर छिपे एकाकीपन, स्वाभिमान और करुणा का दर्शन करा दिया।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

संस्मरण के मुख्य पात्र एवं जीव
विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर (गुरुदेव), आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (लेखक), गुरुदेव का स्वामिभक्त कुत्ता, यूथभ्रष्ट लंगड़ी मैना।
प्रमुख ऐतिहासिक स्थल
शांतिनिकेतन (विश्वभारती, पश्चिम बंगाल) एवं श्रीनिकेतन (पुराने मकान का तीसरा तल्ला)।
केंद्रीय दार्शनिक विचार
मूक पशु-पक्षियों के भीतर भी असीम प्रेम, भक्ति, निष्ठा और शोक की चेतना विद्यमान होती है जिसे केवल संवेदनशील हृदय ही पहचान सकता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
गुरुदेव ने शांतिनिकेतन को छोड़कर श्रीनिकेतन के तीसरे तल्ले पर रहने का निर्णय क्यों लिया? (NCERT अभ्यास प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: गुरुदेव ने शांतिनिकेतन छोड़कर श्रीनिकेतन के तीसरे तल्ले पर रहने का निर्णय निम्नलिखित कारणों से लिया था:

  1. वृद्धावस्था और शारीरिक अस्वस्थता: गुरुदेव का शरीर दुर्बल हो चुका था और वे अस्वस्थ रहते थे। उन्हें पूर्ण विश्राम और शांति की आवश्यकता थी।
  2. दर्शकों की अत्यधिक भीड़ से बचना: शांतिनिकेतन में प्रतिदिन देश-विदेश से सैकड़ों मिलने वाले और दर्शनार्थी आते रहते थे, जिससे गुरुदेव को एकांत नहीं मिल पाता था और वे थक जाते थे।
  3. एकांत और प्रकृति का सान्निध्य: श्रीनिकेतन का वह पुराना मकान शांत वातावरण में था और उसके तीसरे तल्ले पर चढ़ने के लिए लोहे की संकरी सीढ़ी थी, जिससे हर कोई वहाँ आसानी से नहीं पहुँच सकता था। वहाँ से खुला आकाश और हरियाली दिखाई देती थी।
उदाहरण 2
कुत्ते ने गुरुदेव के प्रति अपनी निष्ठा और भक्ति किस प्रकार प्रकट की? (JAC Board High-Yield Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: कुत्ते ने गुरुदेव के प्रति अपनी अलौकिक भक्ति और निष्ठा निम्नलिखित रूपों में प्रकट की:

  1. अविश्वसनीय खोज और समर्पण: जब गुरुदेव दो मील दूर श्रीनिकेतन के तीसरे तल्ले पर चले गए, तो वह कुत्ता बिना किसी मार्गदर्शक के स्वयं खोजता हुआ वहाँ पहुँच गया और गुरुदेव के चरणों में अपना सिर रख दिया।
  2. स्पर्श मात्र में आनंद की अनुभूति: जब गुरुदेव ने स्नेह से उसकी पीठ पर हाथ फेरा, तो वह आँखें मूँदकर शांत खड़ा रहा। उस एक स्पर्श से उसके रोम-रोम में असीम तृप्ति और आनंद का संचार हो गया।
  3. चिता-भस्म के कलश के पास मौन शोक: गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद जब उनकी भस्म शांतिनिकेतन लाई गई, तो वह कुत्ता चुपचाप कलश के पास आकर बैठ गया और अपनी नम आँखों से मूक श्रद्धांजलि अर्पित की।
उदाहरण 3
गुरुदेव की दृष्टि में कुत्ते की चेतना का क्या महत्व था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: गुरुदेव की दृष्टि में कुत्ते की चेतना अत्यंत पवित्र, छल-कपट रहित और दिव्य थी:

  1. परम सत्य की पहचान: गुरुदेव मानते थे कि मनुष्य अपनी बुद्धि, तर्क और भाषा के अहंकार में अक्सर सच्चाई को नहीं देख पाता, किंतु यह मूक पशु बिना किसी भाषा के सीधे आत्मा के सत्य को पहचान लेता है।
  2. निस्वार्थ प्रेम का आदर्श: कुत्ते के प्रेम में कोई स्वार्थ, लोभ या अपेक्षा नहीं थी; उसका संपूर्ण जीवन अपने प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण का साक्षात प्रतीक था। गुरुदेव ने उसमें संपूर्ण 'मानव-सत्य' का साक्षात्कार किया था।
उदाहरण 4
लंगड़ी मैना को देखकर गुरुदेव और लेखक के मन में क्या भाव जगे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: लंगड़ी मैना को देखकर गुरुदेव और लेखक के मन में निम्नलिखित भाव जगे:

  1. सामान्य मैना से भिन्नता: साधारणतः मैना को ईर्ष्यालु, झगड़ालू और दूसरों के घोंसले छीनने वाला पक्षी माना जाता है। किंतु यह लंगड़ी मैना अपने झुंड से अलग होकर बिल्कुल शांत और एकांत में रहती थी।
  2. करुणा और वियोग का बोध: गुरुदेव ने उसकी चाल और मुखमुद्रा में एक गहरा एकाकीपन और करुणा देखी। उन्हें लगा मानो यह मैना किसी गंभीर वियोग या शोक को अपने भीतर समेटे हुए चुपचाप जीवन जी रही है।
  3. दृष्टि का परिवर्तन: लेखक ने स्वीकार किया कि गुरुदेव की संवेदनशील दृष्टि ने उन्हें एक तुच्छ समझी जाने वाली मैना के भीतर भी करुणा और गरिमा का दर्शन करा दिया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

श्रीनिकेतन को शांतिनिकेतन से बहुत दूर कोई दूसरा राज्य समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

श्रीनिकेतन शांतिनिकेतन के बिल्कुल निकट (लगभग दो मील की दूरी पर) स्थित रवींद्रनाथ टैगोर का ही एक ग्रामीण विकास केंद्र था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि कुत्ता किसी के द्वारा रस्सी से बांधकर लाया गया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कुत्ता अपनी आंतरिक सहज चेतना और स्वामिभक्ति के बल पर स्वयं दो मील की दूरी तय करके तीसरे तल्ले पर पहुँचा था।

एक कुत्ता और एक मैना: गुरुदेव की जीव-संवेदना एवं मूक भक्ति

श्रीनिकेतन का एकांत • अस्वस्थता और वृद्धावस्था • शांतिनिकेतन के कोलाहल से दूर • तीसरे तल्ले पर संकरी सीढ़ी • खुला आकाश और शांत वातावरण • प्रकृति के बीच गुरुदेव का वास तपस्वी का शांत साधना-स्थल कुत्ते की अलौकिक स्वामिभक्ति 1. स्वयं खोजकर पहुँचना: • 2 मील दूर तीसरे तल्ले पर आगमन। 2. पावन स्पर्श का आनंद: • गुरुदेव के हाथ फेरने पर आंखें मूँदना। • निष्काम आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा। 3. भस्म-कलश पर मौन विलाप: • महाप्रयाण पर नम आँखों से नमन। समग्र मानव-सत्य का साक्षात रूप लंगड़ी मैना का जीवन • यूथभ्रष्ट (झुंड से अलग) अकेली • अन्य मैनाओं जैसी कलह नहीं • स्वाभिमान से कीड़े चुगना • गुरुदेव का सूक्ष्म अवलोकन: "कितनी उदास और गंभीर है!" • जीव-जगत की मूक करुणा करुणा का मूक संगीत

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन जीवन और जीव-संवेदना का सजीव चित्रण किया है।
मुख्य बिंदु 2
अस्वस्थता और भीड़-भाड़ से बचने के लिए गुरुदेव शांतिनिकेतन छोड़कर श्रीनिकेतन के पुराने मकान के तीसरे तल्ले पर रहने गए थे।
मुख्य बिंदु 3
गुरुदेव का एक पालतू कुत्ता बिना किसी सहायता के दो मील दूर श्रीनिकेतन के तीसरे तल्ले पर स्वयं पहुँच गया।
मुख्य बिंदु 4
गुरुदेव द्वारा पीठ पर हाथ फेरने मात्र से उस मूक कुत्ते के रोम-रोम में अपार आनंद और तृप्ति भर गई।
मुख्य बिंदु 5
गुरुदेव ने कहा कि यह मूक कुत्ता बिना भाषा के भी उस सत्य को देख लेता है जिसे मनुष्य अपनी बुद्धि से भी नहीं देख पाता।
मुख्य बिंदु 6
गुरुदेव के देहावसान के बाद जब उनकी चिता-भस्म शांतिनिकेतन लाई गई, तो कुत्ता चुपचाप कलश के पास बैठकर मौन शोक व्यक्त करता रहा।
मुख्य बिंदु 7
सामान्यतः मैना को कलहप्रिय और दूसरों के घोंसले छीनने वाला पक्षी माना जाता है।
मुख्य बिंदु 8
गुरुदेव के बरामदे में रोज आने वाली एक लंगड़ी मैना अपने झुंड से अलग होकर बिल्कुल शांत और स्वाभिमानी जीवन जीती थी।
मुख्य बिंदु 9
गुरुदेव ने उस लंगड़ी मैना की चाल और दृष्टि में एक गहरा एकाकीपन और करुणा का भाव देखा।
मुख्य बिंदु 10
पाठ का मूल संदेश है कि मूक पशु-पक्षियों के प्रति मानवीय संवेदना, आदर और सह-अस्तित्व का भाव रखना ही सच्ची मानवता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
एक कुत्ता और एक मैना पाठ के लेखक कौन हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

इस पाठ के लेखक हिंदी के प्रख्यात निबंधकार और विद्वान आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।


2
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर शांतिनिकेतन छोड़कर कहाँ रहने गए थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

गुरुदेव शांतिनिकेतन छोड़कर पास ही स्थित श्रीनिकेतन के एक पुराने मकान के तीसरे तल्ले पर रहने गए थे।


3
कुत्ते ने गुरुदेव के भस्म-कलश के पास क्या किया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

कुत्ता आश्रमवासियों के साथ शांत भाव से भस्म-कलश के पास बैठ गया और उसने अपनी नम आँखों से मौन श्रद्धांजलि दी।


4
गुरुदेव ने बरामदे में फुदकने वाली लंगड़ी मैना के स्वभाव में क्या विशेषता देखी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

गुरुदेव ने देखा कि वह अन्य मैनाओं की तरह शोर और झगड़ा नहीं करती थी, बल्कि अकेली, गंभीर और करुणावान भाव से रहती थी।


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