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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 13
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Gram Shri

'ग्राम श्री' छायावाद के प्रमुख स्तंभ और प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित एक अत्यंत मनोरम, सजीव, चित्रात्मक और रससिक्त प्रकृति-कविता है। इस कविता में पंत जी ने भारतीय गाँव के प्राकृतिक सौंदर्य, खेतों की मखमली हरियाली, फसलों की समृद्धि, फूलों और फलों के रंग-बिरंगे वैभव और शिशिर व बसंत ऋतु के संधिकाल की अलौकिक सुषमा का ऐसा जादुई चित्र खींचा है मानो पूरा ग्रामीण भारत हमारी आँखों के सामने साकार हो उठता है। 'ग्राम श्री' का अर्थ है—'गाँव की लक्ष्मी / गाँव की प्राकृतिक शोभा'। गंगा की सतरंगी रेती पर अंगूठी के नगीने जैसी छटा बिखेरता, धूप-छाँव के रेशमी जालों से सजा भारतीय गाँव कवि को "मरकत डिब्बे सा खुला" प्रतीत होता है, जिसके सौंदर्य पर पूरा आकाश मुग्ध होकर झुकता है। इस विस्तृत अध्ययन सामग्री में JAC बोर्ड कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित प्रमुख आयाम समाहित हैं: कवि परिचय एवं प्रकृति-दृष्टि: प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत का सौंदर्य-दर्शन, कोमलकांत पदावली और छायावादी बिंब-विधान। काव्य-पंक्तियों का सप्रसंग भावार्थ एवं शिल्प-सौंदर्य: 'फैली खेतों में दूर तलक, मखमल की कोमल हरियाली...' (खेतों की हरियाली और चाँदी की उजली जाली जैसी धूप)। 'हँसमुख हरियाली हिम-आतप, सुख से अलसाए-से सोए...' (जाड़े की धूप और अलसाई हरियाली)। 'लो हरित धरा से झाँक रही, नीलम की कलि, तीसी नीली!' (अलसी, सरसों और मटर के रंग-बिरंगे फूलों का उत्सव)। 'रोमांचित-सी लगती वसुधा, आई जौ-गेहूँ में बाली...' (धरती का रोमांच और पकती फसलों की सुगंध)। 'अब रजत-स्वर्ण मंजरियों से, लद गई आम्र-तरु की डाली...' (आम के बौर, ढाक-पीपल के पत्ते और कोयल की कूक)। 'अमरूदों में अब लाल-लाल, चित्तियाँ पड़ीं, पक गए सुनहले मीठे बेर...' (फलों का पकना)। 'बालू के साँपों से अंकित, गंगा की सतरंगी रेती...' (गंगा तट की सुरम्य छटा)। 'मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम—जिस पर नीलम नभ आच्छादन!' (गाँव का पन्ना-तुल्य वैभव)। JAC बोर्ड परीक्षापयोगी प्रश्न-उत्तर: पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्न, अलंकार निरूपण (मानवीकरण, उपमा, रूपक) और भाव-सौंदर्य।

मरकत डिब्बे सा खुला गाँव और गंगा की सतरंगी रेती: प्रकृति के जादूगर का अमर कैनवास

क्या आपने कभी सुबह-सुबह खेतों की ओर निकलकर देखा है जब सूरज की सुनहरी किरणें ओस की बूँदों पर पड़ती हैं, तो सरसों के पीले फूलों की चादर, नीली तीसी की कलियाँ और मटर की हरी फलियों पर बैठी रंग-बिरंगी तितलियाँ ऐसा समां बाँध देती हैं मानो कुदरत ने जमीन पर रत्नों की सेज बिछा दी हो?

प्रकृति के सबसे लाडले कवि सुमित्रानंदन पंत जब अपने गाँव के खेतों को देखते हैं, तो उन्हें गाँव कोई साधारण बस्ती नहीं, बल्कि 'मरकत' (पन्ना नामक हरे रत्न) का एक ऐसा दिव्य डिब्बा दिखाई देता है जो आकाश के नीले ढक्कन के नीचे चमक रहा है! आइए, 'ग्राम श्री' के उस मनभावन संसार में चलें जहाँ हर फसल मुस्करा रही है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

  1. भारतीय ग्रामीण संस्कृति एवं कृषि-सौंदर्य का आदर: यह कविता विद्यार्थियों में अपनी मिट्टी, किसानों के परिश्रम और ग्रामीण भारत की प्राकृतिक संपदा के प्रति असीम गर्व और प्रेम जगाती है।
  2. छायावादी चित्रात्मक भाषा (Imagery) का सर्वोच्च प्रतिमान: पंत जी की भाषा इतनी जीवंत है कि पढ़ते ही आँखों के सामने सतरंगी गंगा, मटर के फूल और अमरूदों की लाल चित्तियाँ तैरने लगती हैं।
  3. पर्यावरण एवं प्रकृति-सद्भाव की प्रेरणा: कंक्रीट के शहरों की घुटन से दूर प्रकृति की हरी-भरी गोद में जीवन के सच्चे आनंद की अनुभूति।
  4. JAC बोर्ड परीक्षा में पद्य खंड का अनिवार्य अध्याय: काव्यांश की व्याख्या, मानवीकरण अलंकार और 'मरकत डिब्बा' रूपक पर 5 से 8 अंक के प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • सुमित्रानंदन पंत की प्रकृति-काव्य धारा (प्रकृति के सुकुमार कवि) और छायावादी सौंदर्य-दृष्टि की समझ।
  • शिशिर और बसंत ऋतु के संधिकाल में भारतीय फसलों (गेहूँ, जौ, सरसों, चना, मटर, तीसी) और फलों (आम, अमरूद, बेर) की जानकारी।
  • मानवीकरण अलंकार (प्रकृति के उपादानों पर मानवीय क्रियाओं का आरोप) और उपमा अलंकार की पहचान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • कविता के सभी पद्यांशों का सप्रसंग सटीक भावार्थ और चित्रात्मक सौंदर्य स्पष्ट कर पाना।
  • खेतों की हरियाली, फसलों के खिलने और पकने के विभिन्न चरणों का क्रमबद्ध विवरण देना।
  • गाँव को 'मरकत डिब्बे सा खुला' क्यों कहा गया है, इसके दार्शनिक और दृश्य सौंदर्य का विश्लेषण करना।
  • कविता में प्रयुक्त मानवीकरण, उपमा, अनुप्रास और पुनरुक्ति प्रकाश अलंकारों की सटीक पहचान करना।
  • JAC बोर्ड परीक्षा में आने वाले सभी व्याख्यात्मक और बहुविकल्पीय प्रश्नों के मानक उत्तर लिखना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. कवि परिचय एवं पंत जी की सुकुमार...
2 2. खेतों की मखमली हरियाली और अलसाई...
3 3. रंग-बिरंगे फूलों और फलियों का उत...
4 4. फलों का पकना और गंगा तट का सुरम्...
5 5. गंगा की सतरंगी रेती और 'मरकत डिब...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. कवि परिचय एवं पंत जी की सुकुमार प्रकृति-दृष्टि

सुमित्रानंदन पंत (1900 - 1977):

छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में प्रकृति के सबसे अनन्य चितेरे कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक सुरम्य पर्वतीय गाँव में हुआ था।

  • बचपन से ही हिमालय की नैसर्गिक वादियों ने उनके मन में प्रकृति-सौंदर्य के प्रति गहरा अनुराग भर दिया। उन्हें 'प्रकृति का सुकुमार कवि' कहा जाता है।
  • वे हिंदी के पहले साहित्यकार थे जिन्हें सन् 1968 में उनकी अमर कृति 'चिदंबरा' पर देश का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया।
  • उनकी प्रमुख काव्य-कृतियों में 'पल्लव', 'वीणा', 'गुंजन', 'ग्राम्या', 'युगांत' और 'लोकायतन' अत्यंत प्रसिद्ध हैं। 'ग्राम श्री' कविता उनके प्रसिद्ध काव्य-संग्रह 'ग्राम्या' से ली गई है, जिसमें उन्होंने ग्रामीण जीवन के यथार्थ और सौंदर्य का मनोहारी संगम प्रस्तुत किया है।

2. खेतों की मखमली हरियाली और अलसाई धूप का सौंदर्य

काव्यांश:

फैली खेतों में दूर तलक, मखमल की कोमल हरियाली,
लिपटीं जिससे रवि की किरणें, चाँदी की सी उजली जाली!
तिनकों के हरे-हरे तन पर, हिल हरित रुधिर है रहा झलक,
श्यामल भू-तल पर झुका हुआ, नभ का चिर निर्मल नील फलक!
हँसमुख हरियाली हिम-आतप, सुख से अलसाए-से सोए,
भीगी अंधियाली में निसि की, तारक दुति में दीपे खोए!

विस्तृत भावार्थ:

  1. मखमल की कोमल हरियाली: खेतों में दूर-दूर तक फैली हुई हरी-भरी फसलें ऐसी प्रतीत होती हैं मानो धरती पर हरे मखमल की मुलायम चादर बिछी हो।
  2. चाँदी की उजली जाली: जब सुबह के समय उस ओस-भीगी हरियाली पर सूर्य (रवि) की सुनहरी किरणें पड़ती हैं, तो वे चमकती हुई चाँदी की महीन जाली के समान जगमगा उठती हैं।
  3. हरा रक्त (हरित रुधिर): नन्हें-नन्हें तिनकों के भीतर जो हरा क्लोरोफिल (रस) बह रहा है, धूप पड़ने पर ऐसा लगता है मानो उनके हरे शरीर में हरा रक्त साफ झलक रहा हो।
  4. अलसाई धूप (मानवीकरण): जाड़े की ऋतु की गुनगुनी धूप (हिम-आतप) और हरी-भरी फसलें दोनों एक-दूसरे से लिपटकर ऐसे शांत पड़े हैं मानो दो मित्र सुख से अलसाकर सो रहे हों। रात में ओस से भीगी अंधियारी में आकाश के तारे अपनी टिमटिमाती रोशनी में खोए हुए लगते हैं।

3. रंग-बिरंगे फूलों और फलियों का उत्सव

काव्यांश:

रोमांचित-सी लगती वसुधा, आई जौ-गेहूँ में बाली,
अरहर-स Benईं की सोने की, किंकिणियाँ हैं शोभाशाली!
उड़ती भीनी तैलाक्त गंध, सरसों की पीली-पीली,
लो हरित धरा से झाँक रही, नीलम की कलि, तीसी नीली!
रंग-रंग के फूलों में रिलमिल, हँस रही सखियाँ मटर खड़ी,
मखमली पेटियों-सी लटकीं, छीमियाँ, छिपाए बीज लड़ी!

विस्तृत भावार्थ:

  1. धरती का रोमांच: जौ और गेहूँ की बालियाँ निकलने से ऐसा लगता है मानो हमारी धरती माता खुशी से रोमांचित (पुलकित) हो उठी हो।
  2. सोने की करधनी (किंकिणियाँ): अरहर और सनई के पीले फूल हवा में लहलहाते हुए ऐसे लगते हैं मानो धरती माता ने अपनी कमर में सोने की छोटी-छोटी घंटियों वाली करधनी (किंकिणी) पहन रखी हो।
  3. सरसों की तैलीय महक: चारों ओर खिली पीली सरसों की भीनी-भीनी तेल की सुगंध हवा में तैर रही है।
  4. नीलम की कलि (तीसी): हरी-भरी धरती से अलसी (तीसी) के नीले-नीले फूल ऐसे झांक रहे हैं मानो किसी ने हरे रेशम पर नीलम रत्न जड़ दिए हों।
  5. मटर सखियों की हँसी: रंग-बिरंगे फूलों के बीच मटर के पौधे ऐसे खड़े हैं मानो सुंदर सखियाँ एक-दूसरे से मिलकर हँस रही हों, और उनकी फलियाँ (छीमियाँ) मखमल की थैलियों की तरह लटकी हैं जिनके भीतर मोतियों जैसे गोल बीज छिपे हुए हैं।

4. फलों का पकना और गंगा तट का सुरम्य सौंदर्य

काव्यांश:

अब रजत-स्वर्ण मंजरियों से, लद गई आम्र-तरु की डाली,
झर रहे ढाक, पीपल के दल, हो उठी कोकिला मतवाली!
महके कटहल, मुकुलित जामुन, जंगल में झरबेरी झूली,
फूले आडू, नीबू, दाड़िम, आलू, गोभी, बैंगन, मूली!
पीले मीठे अमरूदों में, अब लाल-लाल चित्तियाँ पड़ीं,
पक गए सुनहले मधुर बेर, आँवली से तरु की डाल जड़ी!

विस्तृत भावार्थ:

बसंत के आगमन पर संपूर्ण वनस्पति जगत् फल-फूलों से भर गया है:

  • आम के पेड़ों की डालियाँ सोने और चाँदी जैसी आभा वाली मंजरियों (बौर) से लद गई हैं। ढाक और पीपल के पुराने पत्ते झड़ रहे हैं और नए पत्तों की सुगंध पाकर कोयल मतवाली होकर कूक रही है।
  • कटहल महक रहे हैं, जामुनों पर बौर आ गए हैं, जंगल में मीठी झरबेरियाँ लटक रही हैं और आड़ू, नींबू, अनार (दाड़िम) तथा सब्जियाँ (आलू, गोभी, बैंगन, मूली) लहलहा रहे हैं।
  • पके हुए अमरूदों पर लाल-लाल मीठी चित्तियाँ पड़ गई हैं, सुनहरे बेर पक चुके हैं और आँवलों से लदी डालियाँ ऐसी लगती हैं मानो मोतियों से जड़ी हुई हों।

5. गंगा की सतरंगी रेती और 'मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम'

काव्यांश:

बालू के साँपों से अंकित, गंगा की सतरंगी रेती,
सुंदर लगती सरपत छाई, तट पर तरबूजों की खेती!
अंगुली की कंघी से बगुले, कलँगी संवारते हैं कोई,
तिरते जल में सुरखाब, पुलिन पर मँगरौठी रहती सोई!
हँसमुख हरियाली हिम-आतप, सुख से अलसाए-से सोए,
मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम—जिस पर नीलम नभ आच्छादन,
निरुपम हिमांत में स्निग्ध शांत, निज शोभा से हरता जन-मन!

विस्तृत भावार्थ:

  1. गंगा की सतरंगी रेती: गंगा नदी के किनारे धूप और हवा के कारण रेत पर जो लहरदार निशान बने हैं, वे बालू पर रेंगते हुए साँपों जैसे लगते हैं। सूरज की किरणों से बालू सात रंगों में चमक रही है और वहाँ तरबूजों की सुंदर खेती लहलहा रही है।
  2. पक्षियों का कलरव: गंगा के जल में बगुले अपने पंजों की उँगलियों से अपने सिर की कलँगी को कंघी की तरह संवार रहे हैं; चक्रवाक (सुरखाब) पक्षी जल में तैर रहे हैं और किनारे (पुलिन) पर मँगरौठी चिड़िया आराम से सोई हुई है।
  3. 'मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम' (सर्वोच्च रूपक):
    • मरकत: पन्ना (Emerald) नामक बहुमूल्य हरा रत्न।
    • नीलम नभ: नीले आकाश का आवरण (ढक्कन)।
    • चारों ओर फैली मखमली हरियाली के कारण पूरा गाँव एक ऐसे खुले पन्ने (मरकत) के डिब्बे जैसा लगता है जिसके ऊपर स्वच्छ, नीले आकाश का ढक्कन लगा हुआ है!
    • शीत ऋतु के अंत में यह शांत, स्निग्ध और अलौकिक शोभा वाला भारतीय गाँव अपनी अनुपम सुंदरता से हर देखने वाले के मन को हर लेता है!

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

कवि एवं काव्य-संग्रह
सुमित्रानंदन पंत (प्रकृति के सुकुमार कवि); काव्य-संग्रह: 'ग्राम्या'; विधा: छायावादी प्रकृति-कविता।
कविता के प्रमुख दृश्य बिंब
  1. मखमली हरियाली पर चाँदी की जाली (धूप)। 2. अरहर-सनई की सोने की किंकिणियाँ। 3. नीलम कलि तीसी नीली। 4. बालू के साँपों से अंकित गंगा तट। 5. 'मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम'।
प्रमुख अलंकार
मानवीकरण अलंकार (हँसमुख हरियाली, अलसाए सोए); उपमा अलंकार (चाँदी की सी उजली जाली, मरकत डिब्बे सा); अनुप्रास ('कलिंदी कूल', 'हिम-आतप'); रूपक (नीलम नभ आच्छादन)।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
कवि ने गाँव को 'मरकत डिब्बे सा खुला' क्यों कहा है? (NCERT अभ्यास प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: कवि सुमित्रानंदन पंत ने गाँव को 'मरकत डिब्बे सा खुला' निम्नलिखित कारणों से कहा है:

  1. पन्ने जैसी मखमली हरियाली: 'मरकत' पन्ना नामक एक अत्यंत बहुमूल्य, चमकदार और हरे रंग का रत्न होता है। वसंत ऋतु में गाँव के खेतों में चारों ओर जौ, गेहूँ, सरसों, चना और मटर की जो लहलहाती हरी-भरी फसलें फैली हैं, वे पन्ने के समान चमकीली और हरी दिखाई देती हैं।
  2. खुले डिब्बे का दृश्य: जिस प्रकार किसी पन्ने के डिब्बे को खोल देने पर उसके भीतर के सारे रत्न जगमगा उठते हैं, उसी प्रकार गाँव की यह अपार हरियाली और रंग-बिरंगे फूल-फल खुले रूप में बिखरे हुए हैं।
  3. नीलम नभ का ढक्कन: इस हरे-भरे गाँव के ऊपर फैला हुआ स्वच्छ, निर्मल नीला आकाश ऐसा प्रतीत होता है मानो उस पन्ने के डिब्बे पर नीलम रत्न का सुंदर ढक्कन लगा हुआ हो। गाँव के इस अनुपम सौंदर्य को व्यक्त करने के लिए यह उपमा सर्वथा सटीक है।
उदाहरण 2
कविता में किस मौसम के सौंदर्य का वर्णन है? फसलों के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (JAC Board High-Yield Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: कविता में शिशिर (शीत ऋतु के अंत) और वसंत ऋतु के संधिकाल (आगमन) के सौंदर्य का मनोहारी वर्णन है। यह निम्नलिखित फसलों और प्राकृतिक परिवर्तनों से स्पष्ट होता है:

  1. खेतों की फसलें: जौ और गेहूँ में बालियाँ आ चुकी हैं, सरसों पर पीले-पीले फूल खिलकर खुशबू बिखेर रहे हैं, अरहर और सनई में फूल आ चुके हैं और अलसी (तीसी) नीली कलियों के साथ लहलहा रही है।
  2. मटर और सब्जियाँ: मटर की छीमियों (फलियों) में दाने पड़ चुके हैं और आलू, गोभी, बैंगन, टमाटर आदि सब्जियाँ तैयार हैं।
  3. फलों की स्थिति: आम के पेड़ों पर सोने-चाँदी जैसी मंजरियाँ (बौर) आ चुकी हैं, अमरूदों में लाल चित्तियाँ पड़ गई हैं, बेर पक गए हैं और ढाक-पीपल के पत्ते झड़ रहे हैं। यह सारा परिदृश्य फाल्गुन-चैत्र (फरवरी-मार्च) के वसंत ऋतु के आगमन को प्रमाणित करता है।
उदाहरण 3
'तिनकों के हरे-हरे तन पर, हिल हरित रुधिर है रहा झलक'—इस पंक्ति का भाव और शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: भाव-सौंदर्य: कवि ने नन्हें-नन्हें तिनकों की जीवंतता का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक निरीक्षण प्रस्तुत किया है। जब सुबह की तीखी धूप ओस से भीगे हरे तिनकों पर पड़ती है, तो तिनकों के भीतर प्रवाहित होने वाला हरा क्लोरोफिल (रस) इतना पारदर्शी और चमकदार दिखाई देता है मानो उनके हरे शरीर की नसों में लाल रक्त के स्थान पर 'हरा रक्त' (हरित रुधिर) धड़क रहा हो। इससे प्रकृति की असीम प्राण-ऊर्जा साकार हो उठती है।

शिल्प-सौंदर्य:

  1. अलंकार: 'हरे-हरे' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है; 'हिल हरित रुधिर' में 'ह' और 'र' की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार है; तथा तिनकों के तन पर रुधिर का आरोप होने से मानवीकरण अलंकार है।
  2. भाषा: अत्यंत कोमलकांत, संस्कृतनिष्ठ तत्सम प्रधान ब्रज-मिश्रित खड़ी बोली हिंदी है जिसमें सुंदर दृश्य बिंब (Visual Imagery) विद्यमान है।
उदाहरण 4
गंगा के तट के सौंदर्य का चित्रण कवि ने किन शब्दों में किया है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: कवि ने गंगा तट के सौंदर्य का अत्यंत मोहक और सजीव चित्रांकन किया है:

  1. सतरंगी रेती और बालू के साँप: गंगा के किनारे फैली बालू पर हवा और पानी के बहाव से जो टेढ़ी-मेढ़ी लहरदार लकीरें बन गई हैं, वे धूप में चमकती हुई 'बालू के रेंगते हुए साँपों' जैसी प्रतीत होती हैं। सूरज की किरणों से रेत सात रंगों में जगमगा रही है।
  2. तरबूजों की खेती: नदी के तट पर सरकंडों (सरपत) की झाड़ियों के बीच तरबूजों की हरी-भरी खेती फैली हुई है।
  3. पक्षियों की जलक्रीड़ा: बगुले अपने पंजों से अपने सिर की कलँगी को कंघी की तरह संवार रहे हैं, चक्रवाक (सुरखाब) जल में तैर रहे हैं और किनारे पर मँगरौठी चिड़िया धूप सेंकते हुए अलसाई सोई है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मरकत का अर्थ मिट्टी या धूल समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

'मरकत' पन्ना (Emerald) नामक बहुमूल्य, चमकदार हरे रत्न को कहते हैं, जिससे खेतों की असीम हरियाली की तुलना की गई है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'हरित रुधिर' को किसी हिंसक घटना से जोड़ना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

'हरित रुधिर' का अर्थ तिनकों के भीतर बहने वाला हरा जीवन-रस (क्लोरोफिल) है, जो प्रकृति की सजीवता का द्योतक है।

ग्राम श्री: खेतों की मखमली हरियाली, फसलों का उत्सव एवं मरकत ग्राम

मखमली हरियाली • दूर तक फैली हरी चादर • धूप की चाँदी सी उजली जाली • तिनकों में छलकता हरित रुधिर • हँसमुख हरियाली हिम-आतप • सुख से अलसाए सोए खेत प्रकृति का सजीव स्पंदन फसलों का रंगोत्सव 1. खेतों का श्रृंगार: • अरहर-सनई की सोने सी किंकिणियाँ। • पीली सरसों की महकती सुगंध। 2. नीलम व मखमल का संगम: • नीलम कलि तीसी नीली। • मटर सखियों की मखमली छीमियाँ। वसुधा का दिव्य रूप-वैभव मरकत डिब्बे सा गाँव • पन्ना (मरकत) सा हरा गाँव • नीलम नभ का सुंदर आच्छादन • गंगा की सतरंगी रेती • बालू के साँपों के अंकन • तरबूजों की लहलहाती खेती जन-मन को हरती शोभा

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
सुमित्रानंदन पंत को हिंदी में 'प्रकृति का सुकुमार कवि' कहा जाता है; यह कविता उनके संग्रह 'ग्राम्या' से ली गई है।
मुख्य बिंदु 2
कविता में वसंत ऋतु के आगमन पर भारतीय गाँव के खेतों, फसलों और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत चित्रांकन है।
मुख्य बिंदु 3
खेतों में फैली मखमली हरियाली पर सुबह की धूप चाँदी की जाली के समान जगमगाती है।
मुख्य बिंदु 4
तिनकों के भीतर बहने वाला रस ऐसा लगता है मानो उनके हरे शरीर में हरा रक्त (हरित रुधिर) धड़क रहा हो।
मुख्य बिंदु 5
जौ और गेहूँ की बालियाँ निकलने से धरती रोमांचित लगती है और अरहर-सनई के फूल सोने की करधनी जैसे सजते हैं।
मुख्य बिंदु 6
पीली सरसों की भीनी तैलीय सुगंध चारों ओर फैल रही है और नीली तीसी नीलम के नगीने जैसी चमक रही है।
मुख्य बिंदु 7
मटर की छीमियाँ मखमल की थैलियों जैसी लटकी हैं और आम की डालियाँ सुनहरी मंजरियों (बौर) से लद गई हैं।
मुख्य बिंदु 8
अमरूदों पर लाल चित्तियाँ पड़ गई हैं और बेर सुनहरे होकर पक चुके हैं।
मुख्य बिंदु 9
गंगा की सतरंगी रेती पर लहरदार बालू के साँपों जैसे निशान बने हैं और तरबूजों की खेती लहलहा रही है।
मुख्य बिंदु 10
कवि ने पूरे गाँव को 'मरकत (पन्ने) का खुला डिब्बा' कहा है जिस पर नीला आकाश ढक्कन के समान आच्छादित है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
ग्राम श्री कविता के रचयिता कौन हैं और उन्हें किस उपनाम से जाना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

इसके रचयिता सुमित्रानंदन पंत हैं और उन्हें 'प्रकृति का सुकुमार कवि' कहा जाता है।


2
कवि ने गाँव को किस रत्न के डिब्बे के समान बताया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

कवि ने गाँव को 'मरकत' (पन्ना) नामक हरे रत्न के खुले डिब्बे के समान बताया है।


3
'तीसी नीली' की तुलना कवि ने किस रत्न से की है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

कवि ने नीली तीसी (अलसी) के फूलों की तुलना 'नीलम' रत्न की कलियों से की है।


4
गंगा की रेती को कवि ने कैसा बताया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

कवि ने गंगा की रेती को धूप में चमकती हुई 'सतरंगी' और 'बालू के साँपों से अंकित' बताया है।


अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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