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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 14
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Is Jal Pralay Mein

'इस जल प्रलय में' प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यासकार फणीश्वरनाथ 'रेणु' द्वारा रचित हिंदी साहित्य का एक अत्यंत सजीव, मार्मिक और कालजयी रिपोर्ताज (Reportage) है। इसमें लेखक ने सन् 1975 में बिहार की राजधानी पटना में आई विनाशकारी बाढ़ की विभीषिका, जन-जीवन के आतंक, कौतूहल, मानवीय संवेदनाओं और तत्कालीन परिस्थितियों का आँखों देखा, संवेदनशील और हृदयस्पर्शी दस्तावेजीकरण किया है। रेणु जी का जन्म बिहार के पूर्णिया (वर्तमान अररिया) जिले के औड़ाही हिंगना गाँव में हुआ था। वे आजीवन बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में रहे, बाढ़ पीड़ितों के राहत कार्यों में स्वयंसेवकों का नेतृत्व किया, किंतु उन्होंने स्वयं कभी बाढ़ में घिरने का व्यक्तिगत अनुभव नहीं किया था। सन् 1975 में जब पुनपुन, सोन और गंगा का प्रलयंकारी जल पटना शहर के निचले रिहायशी इलाकों—कंकड़बाग, राजेंद्र नगर, बोरिंग रोड में प्रवेश करने लगा, तब लेखक को अपने ही घर में जल-प्रलय का साक्षी बनना पड़ा। इस विस्तृत अध्ययन सामग्री में JAC बोर्ड कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित आयाम समाहित हैं: रिपोर्ताज विधा एवं लेखक परिचय: फणीश्वरनाथ 'रेणु' का आंचलिक कथा-शिल्प तथा रिपोर्ताज विधा की विशिष्टता। बाढ़ की विभीषिका का क्रमिक विकास: बाढ़ देखने का कौतूहल: कॉफी हाउस, गांधी मैदान और सड़कों पर जन-सैलाब का नजारा। लाउडस्पीकर द्वारा चेतावनी: 'मृत्यु का तरल दूत' और जन-मानस में फैला मनोवैज्ञानिक भय। रात का सन्नाटा और पानी की बढ़ती आहट: छत से पानी की लहरों की निगरानी और अनिद्रा। अतीत की स्मृतियों का अंतर्गुंफन: सन् 1947 की मनिहारी बाढ़ में गुरुजी के साथ रिलीफ वर्क का अनुभव। सन् 1949 की महानंदा बाढ़ में 'भाट' की नौटंकी और बैलगाड़ी पर नाच-गान। कुकुर (कुत्ते) और डॉक्टर बाबू की मानवीय संवेदना का मर्मस्पर्शी प्रसंग। JAC बोर्ड परीक्षापयोगी प्रश्न-उत्तर: 'मृत्यु का तरल दूत' की व्याख्या, आपदा प्रबंधन, मानवीय रिश्ते और भाषा-शिल्प का संपूर्ण विश्लेषण।

जब शांत शहर की सड़कों पर 'मृत्यु का तरल दूत' झाग फेंकता हुआ उतर आया!

कल्पना कीजिए कि आप अपने कमरे में बैठे चाय पी रहे हैं और अचानक लाउडस्पीकर पर गूँजती है एक भयावह आवाज—"भाइयों और बहनों! रात के बारह बजे तक बाढ़ का पानी आपके घरों में घुस जाएगा! सावधान हो जाइए!" और कुछ ही घंटों में शहर की पक्की सड़कें गहरे समुद्र में तब्दील हो जाती हैं। रिक्शे, गाड़ियाँ, दुकानें सब पानी में समाने लगती हैं और सामने से मटमैले, गेरुए पानी का एक विशालकाय अजगर झाग-फेन फेंकता हुआ आगे बढ़ता है। फणीश्वरनाथ रेणु ने प्रकृति के इसी रौद्र रूप को 'मृत्यु का तरल दूत' कहा है। इस पाठ में आप केवल बाढ़ का विनाश नहीं पढ़ेंगे, बल्कि उस खौफनाक रात में इंसान और बेजुबान जानवर के बीच के उस रिश्ते को भी महसूस करेंगे जो आँखों में आँसू ला देता है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

  1. रिपोर्ताज विधा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण: यह पाठ विद्यार्थियों को पत्रकारिता और साहित्यिक रिपोर्ताज के संगम से परिचित कराता है, जहाँ तथ्य और अनुभूति एकाकार हो जाते हैं।
  2. प्राकृतिक आपदा एवं जन-संवेदना की समझ: आपदा के समय समाज के विभिन्न वर्गों (दुकानदार, रिक्शेवाले, आम नागरिक, प्रशासन) के व्यवहार और मानसिक स्थिति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण।
  3. पर्यावरण व आपदा प्रबंधन की अनिवार्यता: आज के अनियोजित शहरीकरण और जल-निकासी की विफलताओं पर 1975 की यह घटना एक ज्वलंत चेतावनी है।
  4. JAC बोर्ड परीक्षा में कृतिका खंड का अनिवार्य पाठ: इस पाठ से 'मृत्यु का तरल दूत', बाढ़ के प्रति लोगों का कौतूहल और कुत्ते के प्रसंग पर 5 से 8 अंक के प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • रिपोर्ताज (Reportage) विधा का सामान्य ज्ञान (आँखों देखी घटना का साहित्यिक, सजीव चित्रांकन)।
  • फणीश्वरनाथ 'रेणु' की आंचलिक भाषा-शैली और देशज शब्दावली की समझ।
  • बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति मानवीय प्रतिक्रियाओं का सामान्य बोध।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • बाढ़ को 'मृत्यु का तरल दूत' कहे जाने के औचित्य को स्पष्ट कर पाना।
  • आपदा के समय आम लोगों के कौतूहल, भय और दैनिक आवश्यकताओं के संचय की प्रवृत्ति का विश्लेषण करना।
  • लेखक की अतीत की स्मृतियों (मनिहारी और महानंदा बाढ़) के माध्यम से मानवीय संवेदना को समझना।
  • कुत्ते और मालिक के प्रसंग द्वारा प्राणी-मात्र के प्रति आत्मीयता के महत्व को अभिव्यक्त करना।
  • JAC बोर्ड परीक्षा के सभी वर्णनात्मक एवं व्याख्यात्मक प्रश्नों के उत्कृष्ट उत्तर लिखना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. लेखक परिचय एवं रिपोर्ताज विधा
2 2. बाढ़ देखने की उत्सुकता और शहर का...
3 3. 'मृत्यु का तरल दूत' और राजेंद्र...
4 4. अतीत की स्मृतियाँ: आपदा में मानव...
5 5. जल-प्रलय का प्रात:काल और जीवन की...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. लेखक परिचय एवं रिपोर्ताज विधा

फणीश्वरनाथ 'रेणु' (1921 - 1977):

हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आंचलिक कथाकार फणीश्वरनाथ 'रेणु' का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के औड़ाही हिंगना गाँव में हुआ था।

  • उन्होंने 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' और नेपाल के राणा-विरोधी लोकतांत्रिक आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
  • उनका उपन्यास 'मैला आँचल' (1954) हिंदी का पहला और सबसे प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यास माना जाता है, जिसने हिंदी गद्य को नई ताजगी और मिट्टी की गंध दी।
  • उनकी प्रमुख कृतियों में 'परती परिकथा', 'जुलूस', 'ठुमरी', 'आदिम रात्रि की महक' और 'तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम' (जिस पर प्रसिद्ध फिल्म बनी) शामिल हैं।

रिपोर्ताज विधा की विशेषताएं:

'रिपोर्ताज' मूलतः फ्रेंच भाषा का शब्द है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यह विधा साहित्य में आई। जब किसी घटना या आँखों देखे दृश्य का ऐसा कलात्मक, सजीव और संवेदनशील वर्णन किया जाए कि वह पाठक के हृदय को छू ले और आँखों के सामने चित्र बनकर उपस्थित हो जाए, तो उसे 'रिपोर्ताज' कहते हैं। 'इस जल प्रलय में' हिंदी का एक श्रेष्ठ रिपोर्ताज है।

2. बाढ़ देखने की उत्सुकता और शहर का बदलता वातावरण

बाढ़ का आगमन और आम जन का कौतूहल:

सन् 1975 के अगस्त महीने में लगातार कई दिनों की मूसलाधार बारिश के बाद पुनपुन नदी का पानी पटना के रिहायशी इलाकों की ओर बढ़ने लगा।

  1. बाढ़ देखने का रोमांच: लेखक अपने मित्र कवि-कथाकार के साथ रिक्शे पर सवार होकर बाढ़ का पानी देखने निकले। गांधी मैदान, कॉफी हाउस और सड़कों पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ी हुई थी। लोग हँसते-बोलते, पान चबाते हुए पानी का मुआयना कर रहे थे, मानो कोई मेला लगा हो।
  2. बाजार का दृश्य: दुकानदार अपना सामान सुरक्षित ऊँचे स्थानों पर पहुँचा रहे थे। पान वालों की बिक्री अचानक दस गुना बढ़ गई थी क्योंकि लोग रेडियो पर बाढ़ के समाचार सुनने और चर्चा करने के लिए दुकानों पर जमा हो रहे थे।
  3. कॉफी हाउस का जलमग्न होना: लेखक जब कॉफी हाउस पहुँचे तो देखा कि वहाँ प्रवेश द्वार तक पानी पहुँच चुका था और कॉफी हाउस बंद कर दिया गया था। तभी एक नौजवान ने रिक्शा मोड़ने को कहा—"आगे मत जाओ, पानी बहुत तेज रफ्तार से आ रहा है!" लेखक ने देखा कि गेरुआ रंग का झाग-फेन उगलती हुई जलधारा बड़ी तेजी से उनकी ओर बढ़ रही थी।

3. 'मृत्यु का तरल दूत' और राजेंद्र नगर का सन्नाटा

'मृत्यु का तरल दूत' का अर्थ:

लेखक ने बाढ़ के उफनते, झागदार और मटमैले जल को 'मृत्यु का तरल दूत' (Liquid Messenger of Death) कहा है।

  • जिस प्रकार यमराज का दूत चुपचाप आकर प्राण हर लेता है, उसी प्रकार बाढ़ का यह जल बिना किसी चेतावनी के नगरों, बस्तियों, मवेशियों और इंसानों को लील जाने के लिए आगे बढ़ रहा था।
  • इस जल के स्पर्श मात्र से जीवन समाप्त हो सकता था; यह विनाश और संहार का साक्षात तरल रूप था।

लाउडस्पीकर का उद्घोष और घरों की तैयारी:

राजेंद्र नगर चौराहे पर जनसंपर्क विभाग की गाड़ी लाउडस्पीकर पर घोषणा कर रही थी:

"भाइयों और बहनों! संभावना है कि बाढ़ का पानी रात के करीब बारह बजे तक लोहानीपुर, कंकड़बाग और राजेंद्र नगर में घुस जाए। अतः आप लोग सावधान हो जाएं!"

इस घोषणा के बाद चारों ओर सन्नाटा और आतंक छा गया। लोगों ने तुरंत गैस-सिलेंडर, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी, आलू-प्याज और कंपोज (नींद की गोली) जमा करना शुरू कर दिया। लेखक भी अपने फ्लैट में राशन, केरोसिन तेल और पढ़ने के लिए किताबें (शरतचंद्र के उपन्यास, सिनेमा पत्रिकाएं) इकट्ठा करके छत पर चले गए।

4. अतीत की स्मृतियाँ: आपदा में मानवीय संवेदना और कुत्ता प्रसंग

रात में जब बाहर पानी तेजी से चढ़ रहा था और नींद नहीं आ रही थी, तब लेखक की स्मृति के पर्दे पर अतीत की बाढ़ की घटनाएं कौंधने लगीं:

1. सन् 1947 मनिहारी की बाढ़ (गुरुजी का आदर्श):

लेखक अपने पूज्य गुरुजी सतीनाथ भादुड़ी के साथ बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए नाव पर जा रहे थे। गुरुजी का कड़ा नियम था—"नाव पर पानी में पैर लटकाकर मत बैठो, जहरीले बिच्छू और साँप बहते हुए आ सकते हैं।" साथ ही, राहत सामग्री में दियासलाई और किरासन तेल रखना सबसे जरूरी होता था, क्योंकि जल-प्रलय में रोशनी और आग ही जीवन की सबसे बड़ी उम्मीद होती है।

2. सन् 1949 महानंदा की बाढ़ और 'भाट' का लोकनृत्य:

बाढ़ से घिरे टीले पर जब लोग भूख-प्यास से व्याकुल थे, तभी एक नाव पर नौटंकी की मंडली आई और लोकगीत गाने लगी। विपत्ति के समय भी लोक-संस्कृति और कला मनुष्य के जीने की जिजीविषा (जीने की इच्छा) को बनाए रखती है।

3. कुत्ता और डॉक्टर बाबू का आत्मीय प्रसंग:

एक बीमार व्यक्ति को लेने जब रेस्क्यू टीम पहुँची, तो डॉक्टर बाबू अपने पालतू कुत्ते के साथ नाव पर चढ़ने लगे। रिलीफ नाव वालों ने कहा—"कुत्ते को छोड़ दीजिए, केवल इंसान जाएगा!"

  • डॉक्टर बाबू ने दृढ स्वर में कहा—"हमारा कुकुर नहीं जाएगा, तो हम भी नहीं जाएगा!"
  • और कुत्ता भी पानी में छलांग लगाकर नाव के पीछे-पीछे तैरने लगा और भौंकने लगा। अंततः कुत्ते को भी नाव में बैठाना पड़ा। यह प्रसंग मनुष्य और पशु के बीच के उस निस्वार्थ प्रेम को दर्शाता है जो मृत्यु के भय से भी बड़ा है।

5. जल-प्रलय का प्रात:काल और जीवन की पुनर्वापसी

सुबह का खौफनाक नजारा:

रात भर जागने के बाद जब सुबह 5 बजे लेखक की आँख खुली, तो बाहर एक कोलाहल मचा था—"आ गया! आ गया! पानी आ गया!"

  • लेखक ने खिड़की से देखा कि पूरा राजेंद्र नगर जलमग्न हो चुका था। चारों ओर मटमैला पानी हिलोरे मार रहा था।
  • पानी में झाग और फेन ऐसे तैर रहे थे जैसे अनगिनत जहरीले फन वाले साँप रेंग रहे हों। बिजली के खंभे डूब चुके थे, पेड़ों के तने जलमग्न थे।
  • नावों पर लाउडस्पीकर वाले, चाय और ब्रेड बेचने वाले फेरीवाले घूम रहे थे। लोग छत से टोकरियाँ लटकाकर अखबार और खाने-पीने का सामान खरीद रहे थे।
  • लेखक ने अनुभव किया कि प्रलय के बीच भी मनुष्य का जीवन संघर्ष कभी नहीं थमता; इंसान हर परिस्थिति में जीवित रहने का रास्ता खोज ही लेता है।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

पाठ की विधा एवं लेखक
विधा: साहित्यिक रिपोर्ताज (Reportage); लेखक: फणीश्वरनाथ 'रेणु' (आंचलिक साहित्यकार); संदर्भ: 1975 की पटना बाढ़।
प्रमुख बिंब व रूपक
मृत्यु का तरल दूत = गेरुआ, झाग-फेन वाला उफनता बाढ़ का पानी; कुकुर प्रसंग = मनुष्य-पशु का निस्वार्थ प्रेम; रिलीफ का मूल मंत्र = दियासलाई और किरासन तेल।
आपदाकालीन मानवीय प्रवृत्तियाँ
प्रारंभ में कौतूहल व उत्साह -> घोषणा के बाद मनोवैज्ञानिक आतंक -> अनिवार्य वस्तुओं का संचय -> अतीत की स्मृतियों का अंतर्द्वंद्व -> सुबह का जिजीविषापूर्ण संघर्ष।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
बाढ़ के पानी को 'मृत्यु का तरल दूत' क्यों कहा गया है? (JAC Board High-Yield Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: बाढ़ के पानी को 'मृत्यु का तरल दूत' (Liquid Messenger of Death) निम्नलिखित कारणों से कहा गया है:

  1. विनाशकारी एवं भयावह स्वरूप: बाढ़ का पानी सामान्य शांत जल नहीं था; वह गेरुए रंग का, कीचड़, झाग और फेन उगलने वाला उफनता हुआ एक विशाल सैलाब था जो रास्ते में आने वाली हर चीज को लील रहा था।
  2. यमराज के दूत की तरह अचूक संहारक: जिस प्रकार मृत्यु का दूत बिना किसी दया या पक्षपात के किसी भी प्राणी के प्राण हर लेता है, उसी प्रकार बाढ़ का यह जल बस्तियों, झोपड़ियों, मवेशियों और मनुष्यों के जीवन को समाप्त करने के लिए आगे बढ़ रहा था।
  3. लाचारी और असहायता का बोध: इस पानी की तेज गति और फैलाव के सामने मनुष्य पूरी तरह लाचार था; उसके स्पर्श मात्र से जीवन का अंत निश्चित था। अतः लेखक ने इसे मृत्यु का तरल दूत कहा।
उदाहरण 2
आपदाओं से निपटने के लिए अपनी तरफ से कुछ सुझाव दीजिए। (NCERT अभ्यास प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: प्राकृतिक या मानव-निर्मित आपदाओं (जैसे बाढ़, भूकंप) से निपटने के लिए निम्नलिखित सुझाव अत्यंत प्रभावी हैं:

  1. पूर्व-चेतावनी प्रणाली (Early Warning System): मौसम विभाग और प्रशासन को उपग्रह तकनीक व सायरन/लाउडस्पीकर के माध्यम से निचले इलाकों के नागरिकों को समय रहते सटीक चेतावनी देनी चाहिए।
  2. अनिवार्य जीवन-रक्षक सामग्री का पूर्व-संग्रह: नागरिकों और राहत शिविरों में पीने का स्वच्छ पानी, सूखा भोजन (चूड़ा-गुड़, बिस्कुट), जीवनरक्षक दवाइयाँ, दियासलाई, मोमबत्ती और टॉर्च पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होने चाहिए।
  3. सुरक्षित ऊँचे आश्रय स्थलों की व्यवस्था: प्रशासन को पक्के और सुरक्षित सामुदायिक भवनों, स्कूलों को राहत शिविरों में बदलने की पूर्व-योजना रखनी चाहिए।
  4. सशक्त जल-निकासी व्यवस्था (Drainage System): नगरों में नालों और जल-प्रवाह मार्गों पर अवैध कब्जों को हटाकर जल-निकासी की नियमित सफाई की जानी चाहिए।
  5. स्वयंसेवी दलों का प्रशिक्षण: युवाओं को प्राथमिक चिकित्सा, नौका-चालन और आपदा-प्रबंधन का विधिवत प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
उदाहरण 3
'हमारा कुकुर नहीं जाएगा, तो हम भी नहीं जाएगा!'-इस कथन से मालिक और कुत्ते के संबंध पर क्या प्रकाश पड़ता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: यह कथन मनुष्य और पशु के बीच के निस्वार्थ प्रेम, आत्मीयता और निष्ठा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है:

  1. परिवार के सदस्य जैसा सम्मान: डॉक्टर बाबू के लिए उनका कुत्ता केवल एक जानवर या चौकीदार नहीं था, बल्कि परिवार के सदस्य के समान अभिन्न अंग था।
  2. सच्ची वफादारी का प्रतिदान: कुत्ता अपने मालिक के प्रति सदैव वफादार रहता है; डॉक्टर बाबू ने भी संकट के समय अपने कुत्ते का साथ न छोड़कर यह सिद्ध कर दिया कि वफादारी केवल जानवर की नहीं, संवेदनशील इंसान का भी कर्तव्य है।
  3. मृत्यु के भय पर प्रेम की विजय: बाढ़ के रूप में सामने साक्षात मृत्यु खड़ी थी, फिर भी डॉक्टर बाबू ने अकेले सुरक्षित जाने से इनकार कर दिया। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि मूक पशुओं के प्रति भी हमारी उतनी ही नैतिक जिम्मेदारी है जितनी अन्य मनुष्यों के प्रति।
उदाहरण 4
बाढ़ की खबर सुनकर शहर के आम लोगों की दिनचर्या और व्यवहार में क्या परिवर्तन आया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: बाढ़ की खबर सुनते ही शहर में अफरा-तफरी, कौतूहल और आशंका का मिला-जुला वातावरण बन गया:

  1. बाढ़ देखने का रोमांच: लोग बाढ़ की भयावहता को समझे बिना रिक्शों, साइकिलों और पैदल ही कॉफी हाउस और गांधी मैदान की ओर पानी देखने उमड़ पड़े।
  2. आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी: जैसे ही जनसंपर्क विभाग की गाड़ी ने लाउडस्पीकर पर पानी घुसने की चेतावनी दी, लोग किराना दुकानों, दवा की दुकानों और सब्जी मंडियों पर टूट पड़े। गैस, मोमबत्ती, आलू-प्याज और पीने का पानी जमा किया जाने लगा।
  3. दुकानों की सुरक्षा: निचले तलों पर स्थित दुकानों के व्यापारी अपना सामान ऊँचे तलों या छतों पर सुरक्षित पहुँचाने में जुट गए।
  4. रेडियो से चिपके लोग: हर नुक्कड़ और पान की दुकान पर लोग रेडियो के इर्द-गिर्द खड़े होकर समाचार सुनने और अनुमान लगाने में व्यस्त थे।
उदाहरण 5
लेखक ने अपनी अनिद्रा भरी रात में किन पुरानी स्मृतियों को याद किया और क्यों?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: बाढ़ के पानी के कमरे में घुसने के खौफ और मानसिक तनाव के कारण लेखक को रात भर नींद नहीं आ रही थी। मन को शांत करने के लिए लेखक ने अपने अतीत की बाढ़-संबंधी स्मृतियों को याद किया:

  1. 1947 मनिहारी की बाढ़: जहाँ वे अपने गुरुजी सतीनाथ भादुड़ी के साथ रिलीफ वर्क में गए थे और गुरुजी ने उन्हें बाढ़ में पैरों की सुरक्षा और दियासलाई-किरासन तेल के महत्व की सीख दी थी।
  2. 1949 महानंदा की बाढ़: जहाँ भूख और संकट से घिरे टीले पर एक नाव पर 'भाट' की नौटंकी ने लोगों के मुरझाए चेहरों पर हँसी ला दी थी।
  3. कुत्ता प्रसंग: जहाँ एक बाढ़ पीड़ित ने कुत्ते को छोड़े बिना नाव में बैठने से मना कर दिया था। लेखक ने इन स्मृतियों को इसलिए याद किया क्योंकि ये स्मृतियाँ उन्हें यह विश्वास दिलाती थीं कि भयंकर से भयंकर जल-प्रलय में भी मानवीय संवेदना, कला और साहस कभी नहीं मरते।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

बाढ़ को केवल एक प्राकृतिक दुर्घटना समझकर उत्तर लिखना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पाठ में बाढ़ केवल एक भौगोलिक घटना नहीं है, बल्कि वह मानवीय मनोविज्ञान, समाज की असमानता और आपदा में संवेदनशीलता की परीक्षा है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'मृत्यु का तरल दूत' केवल पानी की अधिकता को मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह विशेषण बाढ़ के उस उफनते, मटमैले और झागदार रूप के लिए प्रयुक्त हुआ है जो यमराज के दूत की तरह प्राण हरने के लिए आगे बढ़ रहा था।

इस जल प्रलय में: बाढ़ की विभीषिका एवं मानवीय संवेदना का मानचित्र

बाढ़ का आगमन व कौतूहल • 1975 पटना: पुनपुन का सैलाब • कॉफी हाउस व गांधी मैदान • लाउडस्पीकर से मध्यरात्रि चेतावनी • आवश्यक वस्तुओं का संचय • राजेंद्र नगर की सीढ़ियों पर पानी आँखों देखा जीवंत रिपोर्ताज मृत्यु का तरल दूत • गेरुआ झाग-फेन वाला सैलाब • अजगर की भाँति निगलता पानी • बिजली के खंभे, सड़कें जलमग्न • अनिद्रा भरी काली रात • असहाय इंसान और प्रकृति का तांडव संहारकारी प्रकृति का रूप अतीत व मानवीय संवेदना • 1947 मनिहारी: गुरुजी की सीख • 'दियासलाई और किरासन तेल' • 1949 महानंदा: भाट की नौटंकी • कुकुर व डॉक्टर बाबू का निष्काम प्रेम • जिजीविषा: जीवन कभी नहीं रुकता संकट में मानवीय मूल्यों की जीत

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
यह पाठ फणीश्वरनाथ 'रेणु' द्वारा सन् 1975 में पटना में आई विनाशकारी बाढ़ का आँखों देखा साहित्यिक रिपोर्ताज है।
मुख्य बिंदु 2
लेखक स्वयं बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के निवासी थे, किंतु उन्होंने कभी शहर में अपने घर में बाढ़ में घिरने का अनुभव नहीं किया था।
मुख्य बिंदु 3
बाढ़ देखने के लिए लोग रिक्शों, साइकिलों से गांधी मैदान और कॉफी हाउस पहुँचे, जहाँ एक कौतूहल और मेले जैसा माहौल था।
मुख्य बिंदु 4
गेरुए रंग के झाग-फेन वाले पानी की तेज रफ्तार को देखकर लेखक ने इसे 'मृत्यु का तरल दूत' की संज्ञा दी।
मुख्य बिंदु 5
जनसंपर्क विभाग की गाड़ी ने लाउडस्पीकर से रात बारह बजे तक पानी राजेंद्र नगर में घुसने की चेतावनी दी।
मुख्य बिंदु 6
लोगों ने तुरंत गैस, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई और नींद की गोलियाँ (कंपोज) जमा करना शुरू कर दिया।
मुख्य बिंदु 7
रात की अनिद्रा में लेखक को 1947 की मनिहारी बाढ़ में गुरुजी सतीनाथ भादुड़ी के साथ रिलीफ कार्य की याद आई।
मुख्य बिंदु 8
गुरुजी ने सिखाया था कि बाढ़ में पैर लटकाकर न बैठें और दियासलाई-किरासन तेल रखना कभी न भूलें।
मुख्य बिंदु 9
1949 की बाढ़ में एक डॉक्टर बाबू ने अपने कुत्ते के बिना नाव में बैठने से इनकार कर दिया था, जो मूक पशु के प्रति प्रेम की मिसाल है।
मुख्य बिंदु 10
सुबह पूरा शहर जलमग्न हो चुका था, फिर भी छत से टोकरियाँ लटकाकर अखबार व सामान खरीदते लोगों ने जीवन की अटूट जिजीविषा सिद्ध की।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
लेखक ने बाढ़ के पानी को 'मृत्यु का तरल दूत' क्यों कहा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
2
बाढ़ पीड़ितों की राहत सामग्री में गुरुजी के अनुसार सबसे अनिवार्य वस्तु क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
3
'हमारा कुकुर नहीं जाएगा, तो हम भी नहीं जाएगा!'-यह कथन किस चरित्र का है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
4
प्रस्तुत पाठ 'इस जल प्रलय में' किस साहित्यिक विधा के अंतर्गत आता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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