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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 2
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Lhaasa Ki Oor

'ल्हासा की ओर' हिंदी यात्रा-वृत्त साहित्य के पितामह राहुल सांकृत्यायन (महापंडित) का एक अत्यंत रोचक, रोमांचक और ज्ञानवर्धक यात्रा-संस्मरण है। यह वृत्तांत लेखक की सन् 1929-30 की प्रथम तिब्बत यात्रा पर आधारित है, जब अंग्रेजों के समय भारतीयों के लिए तिब्बत सीमा में प्रवेश पूर्णतः प्रतिबंधित था। लेखक ने एक बौद्ध भिक्षु 'भिstrategy/भिखमंगे' के छद्म वेश में नेपाल के दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होकर यह जोखिम भरी यात्रा की थी। इस संस्मरण में न केवल तिब्बत की राजधानी ल्हासा के भौगोलिक परिदृश्य और 17-18 हजार फीट ऊँचे खतरनाक 'डाँडों' का जीवंत वर्णन मिलता है, बल्कि तत्कालीन तिब्बती समाज की खुली संस्कृति, पर्दा-प्रथा की अनुपस्थिति, जागीरदारी व्यवस्था, बौद्ध धर्म के प्रभाव और हस्तलिखित दुर्लभ पोथियों का अद्वितीय ऐतिहासिक दस्तावेज प्रस्तुत किया गया है। इस विस्तृत अध्ययन सामग्री में समाहित प्रमुख बिंदु: लेखक परिचय एवं घुमक्कड़ दर्शन: महापंडित राहुल सांकृत्यायन का यायावरी जीवन, बहुभाषाविद् व्यक्तित्व और बौद्ध दर्शन से जुड़ाव। ऐतिहासिक एवं भौगोलिक संदर्भ: फरी-कलिङ्पोङ का व्यापारिक व सैनिक मार्ग, चीनी चौकियाँ, दुर्गम घाटियाँ और डाँडा थोङ्ला की प्राकृतिक चुनौतियाँ। तिब्बती समाज एवं संस्कृति: खुला समाज, छुआछूत व जाति-पांति का अभाव, अतिथि-सत्कार, बौद्ध भिक्षुओं (लामाओं) का सामाजिक दबदबा और बेगार प्रथा। चरित्र-चित्रण: लेखक (जिज्ञासु शोधार्थी) और उनके मंगोल मित्र सुमति (व्यवहारकुशल, यजमानों के प्रिय, बौद्ध गंडे बाँटने वाले भिक्षु)। शेकर विहार एवं दुर्लभ पोथियाँ: तिब्बती बौद्ध धर्म के धर्मग्रंथ (कंजुर की 103 हस्तलिखित पोथियाँ) और ज्ञान-पिपासा। JAC बोर्ड परीक्षा के सभी महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर एवं व्याकरण बोध।

भिखमंगे के भेष में 18,000 फीट की दुर्गम चढ़ाई: एक अज्ञात साम्राज्य की रहस्यमयी यात्रा

कल्पना कीजिए कि सन् 1929 में एक ऐसा देश था जहाँ भारतीयों के प्रवेश पर पूरी तरह पाबंदी थी! रास्ते इतने दुर्गम और भयानक कि 17-18 हजार फीट की बर्फीली ऊँचाई पर डाकुओं का राज था, जो पहले गोली मार देते थे और फिर जेब टटोलते थे!

ऐसे जानलेवा माहौल में एक भारतीय विद्वान फटे-पुराने चीथड़े पहनकर, हाथ में खप्पर लेकर 'कुची-कुची' (दया करो) कहता हुआ एक बौद्ध भिक्षु के साथ ल्हासा की ओर चल पड़ता है। उसका उद्देश्य कोई खजाना लूटना नहीं, बल्कि सदियों पुरानी बौद्ध पांडुलिपियों की खोज करना था! यही रोमांचक दास्तान है राहुल सांकृत्यायन की 'ल्हासा की ओर'!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

  1. यात्रा-वृत्त विधा का सर्वश्रेष्ठ प्रतिमान: हिंदी साहित्य में यात्रा-वृत्त को गंभीर ज्ञानपरक विधा बनाने का श्रेय राहुल सांकृत्यायन को जाता है।
  2. तिब्बत के इतिहास और समाज का प्रत्यक्ष दस्तावेज: 1950 के दशक में चीनी कब्जे से पूर्व तिब्बत की जागीरदारी व्यवस्था, मठ संस्कृति और जीवनशैली का यह दुर्लभ ऐतिहासिक साक्ष्य है।
  3. मानवीय संबंध और सह-अस्तित्व का पाठ: विपरीत परिस्थितियों में भी सुमति और लेखक की मित्रता तथा अपरिचित तिब्बती ग्रामीणों का आतिथ्य सत्कार सिखाता है कि विश्वास और सद्भाव से दुर्गम राहें भी सुगम हो जाती हैं।
  4. JAC बोर्ड परीक्षा में उच्च अंक: कक्षा 9 हिंदी बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से यात्रा-वर्णन, तिब्बती समाज की विशेषताओं और सुमति के चरित्र पर 5 से 8 अंक के प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • यात्रा-वृत्त (Travelogue) साहित्य विधा का स्वरूप—सच्ची यात्रा का साहित्यिक और सांस्कृतिक अंकन।
  • तिब्बत की भौगोलिक स्थिति (हिमालय के पार उच्च पठारी क्षेत्र) और बौद्ध धर्म का बुनियादी ज्ञान।
  • औपनिवेशिक काल में तिब्बत यात्रा पर लगे ब्रिटिश प्रतिबंधों की ऐतिहासिक समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • 1929-30 के समय तिब्बत की कानून व्यवस्था और डाँडों के खतरे का सजीव वर्णन कर पाना।
  • तत्कालीन तिब्बती समाज की सामाजिक विशेषताओं (पर्दा-प्रथा, छुआछूत का अभाव, अतिथि सत्कार) को रेखांकित करना।
  • सुमति के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं (मिलनसार, यजमानों के मार्गदर्शक, व्यवहारकुशल) का विश्लेषण करना।
  • पाठ में प्रयुक्त आंचलिक, तिब्बती और उर्दू-फारसी शब्दों (जैसे डाँडा, थुक्पा, छंग, गंडा, कंजुर) के अर्थ व संदर्भ समझना।
  • JAC बोर्ड परीक्षा में पूछे जाने वाले दीर्घ व लघु उत्तरीय प्रश्नों का प्रामाणिक उत्तर लिखना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. लेखक परिचय एवं यात्रा-वृत्त का ऐ...
2 2. तिब्बत का भौगोलिक स्वरूप: डाँडा...
3 3. तत्कालीन तिब्बती समाज की अनूठी स...
4 4. तिब्बत की जागीरदारी व्यवस्था एवं...
5 5. सुमति का चरित्र, लंकोर का भटकाव...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. लेखक परिचय एवं यात्रा-वृत्त का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

महापंडित राहुल सांकृत्यायन (1893 - 1963)

हिंदी के शीर्षस्थ विद्वान, इतिहासकार और यायावर (घुमक्कड़) लेखक राहुल सांकृत्यायन का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम केदारनाथ पांडेय था। काशी, आगरा और लाहौर में शिक्षा प्राप्त करने के बाद सन् 1930 में उन्होंने श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली, जिसके बाद उनका नाम 'राहुल सांकृत्यायन' पड़ा।

  • उन्हें 'महापंडित' की उपाधि दी गई क्योंकि वे पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, तिब्बती, चीनी, जापानी और रूसी सहित अनेक भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे।
  • उन्होंने 'अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा' लिखकर घुमक्कड़ी को जीवन का सर्वोच्च धर्म और ज्ञानार्जन का साधन घोषित किया।

'ल्हासा की ओर' का ऐतिहासिक संदर्भ:

  • यात्रा काल: सन् 1929-30।
  • रास्ता: नेपाल से होकर ल्हासा जाने वाला मुख्य मार्ग (उस समय फरी-कलिङ्पोङ का मार्ग अभी नया-नया खुला था, पर सैनिक कारणों से भारतीयों के लिए तिब्बत जाना वर्जित था)।
  • छद्म वेश का कारण: सुरक्षा और कानूनी पाबंदी के कारण लेखक को एक भिखमंगे (छद्म भिक्षु) के वेश में यात्रा करनी पड़ी, ताकि चीनी या तिब्बती सैनिक उन्हें रोक न सकें।

2. तिब्बत का भौगोलिक स्वरूप: डाँडा थोङ्ला और डाकुओं का आतंक

डाँडा क्या है?

तिब्बत में 16,000 से 18,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित ऊँचे-ऊँचे पर्वतीय मोड़ों और निर्जन रास्तों को 'डाँडा' कहा जाता है।

  • डाँडा थोङ्ला की भीषणता: यह तिब्बत का सबसे खतरनाक स्थान था। मीलों तक कोई गाँव या आबादी नहीं थी। दोनों तरफ नदियों के तीखे मोड़ और ऊँचे पहाड़ों के कारण दूर-दूर तक कोई आदमी दिखाई नहीं देता था।

डाकुओं के लिए सुरक्षित स्वर्ग:

  1. कानून व्यवस्था का अभाव: तत्कालीन तिब्बत में हथियार कानून (Arms Act) नहीं था। लोग लाठी की तरह पिस्तौल और बंदूकें हाथ में लेकर खुलेआम घूमते थे।
  2. पुलिस और गुप्तचर विभाग की शिथिलता: तिब्बती सरकार पुलिस पर अधिक खर्च नहीं करती थी और निर्जन डाँडों में गवाह न मिलने के कारण हत्यारे आसानी से बच निकलते थे।
  3. डाकुओं का क्रूर तरीका: डाकू पहले किसी भी राहगीर को सीधे गोली मार देते थे, फिर उसके शव की तलाशी लेते थे कि उसके पास कुछ रुपये या सामान है या नहीं। यदि पहले न मारें, तो उन्हें भय रहता था कि राहगीर उन पर गोली चला देगा।

लेखक की सुरक्षा युक्ति:

लेखक और सुमति भिखमंगे के वेश में थे। जब भी उन्हें कोई संदिग्ध डाकू जैसा व्यक्ति दिखता, वे अपनी टोपी उतारकर, जीभ निकालकर "कुची-कुची, एक पैसा!" (दया करो, एक पैसा दो) कहकर भीख माँगने लगते थे! भिखमंगा समझकर डाकू उन पर गोली नहीं चलाते थे।

3. तत्कालीन तिब्बती समाज की अनूठी सामाजिक व्यवस्था

राहुल सांकृत्यायन जी ने तत्कालीन तिब्बती समाज का अत्यंत निष्पक्ष और रोचक चित्र खींचा है, जो उस समय के रूढ़िवादी भारतीय समाज से बिल्कुल भिन्न था:

1. जाति-पांति और छुआछूत का पूर्ण अभाव:

तिब्बती समाज में ऊँच-नीच, जाति-पांति और छुआछूत जैसी कोई कुरीति नहीं थी। कोई भी अपरिचित व्यक्ति किसी के घर में बेधड़क जा सकता था।

2. महिलाओं की स्थिति एवं पर्दा-प्रथा की अनुपस्थिति:

तिब्बत में औरतें पर्दा नहीं करती थीं। वे पुरुषों के समान स्वतंत्र थीं और घर-गृहस्थी तथा व्यापार में सक्रिय भाग लेती थीं।

3. अद्भुत अतिथि सत्कार:

यदि कोई अपरिचित राहगीर भी किसी के घर में चला जाए, तो घर की महिला (सास या बहू) उसके लिए चाय पका देती थी।

  • मक्खन और सोड़ा की नमकीन चाय: तिब्बत में चाय को मिट्टी के टोटीदार बर्तन ('खोंटी') में कूटकर बनाया जाता था, जिसमें मक्खन और सोड़ा डाला जाता था। यदि यात्री को संदेह हो कि उसकी दी गई मक्खन पूरी चाय में नहीं डाली जाएगी, तो वह स्वयं चौके (रसोई) के अंदर जाकर अपनी चाय बना सकता था!

4. निम्न श्रेणी के भिखमंगों पर प्रतिबंध:

केवल अत्यंत निम्न श्रेणी के, फटेहाल भिखमंगों को लोग चोरी के डर से घर के भीतर नहीं आने देते थे; बाकी सभी के लिए दरवाजे खुले रहते थे।

5. नशीला पेय 'छंग':

शाम के समय बहुत से तिब्बती लोग 'छंग' (चावल या जौ से बनी नशीली देशी मदिरा) पीकर अपने होशोहवास खो बैठते थे, जिसके बाद उनसे बात करना या मार्ग पूछना कठिन हो जाता था।

4. तिब्बत की जागीरदारी व्यवस्था एवं बौद्ध मठों (विहारों) का प्रभाव

भूमि की जागीरदारी व्यवस्था:

तिब्बत की अधिकांश कृषि-योग्य जमीन छोटे-बड़े जागीरदारों के हाथों में बँटी हुई थी।

  • इन जागीरों का एक बहुत बड़ा हिस्सा बौद्ध मठों (विहारों) की जागीर में शामिल था।
  • प्रत्येक जागीरदार अपनी जमीन पर स्वयं खेती करवाता था, जिसके लिए उन्हें बेगार मजदूर (बिना मजदूरी के काम करने वाले) आसानी से मिल जाते थे।

बौद्ध भिक्षुओं (लामाओं) का प्रभुत्व:

खेती का प्रबंध देखने के लिए किसी भिक्षु (लामा) को भेजा जाता था।

  • तिब्बती समाज में बौद्ध भिक्षु को राजा के समान सम्मान प्राप्त था।
  • शेकर विहार के भिक्षु 'नमसे': लेखक जब शेकर विहार पहुँचे, तो वहाँ के मुख्य भिक्षु 'नमसे' बड़े भद्र और शिष्ट पुरुष थे। यद्यपि लेखक भिखमंगे के वेश में थे, फिर भी नमसे ने उनका अत्यंत आत्मीय और सम्मानपूर्वक स्वागत किया।

5. सुमति का चरित्र, लंकोर का भटकाव एवं हस्तलिखित पोथियों का खजाना

सुमति का चरित्र-चित्रण:

सुमति एक मंगोल बौद्ध भिक्षु थे जो राहुल जी के अभिन्न मित्र और मार्गदर्शक थे।

  1. मिलनसार और लोकप्रिय: तिब्बत के लगभग हर गाँव में उनके परिचित और यजमान थे। वे जहाँ भी जाते, उनका भव्य स्वागत होता था।
  2. व्यावहारिक एवं अर्थ-कुशल: वे अपने यजमानों को बोधगया से लाए हुए लाल कपड़े के पतले-पतले गंडे (पवित्र धागे) बाँटते थे। यदि बोधगया का कपड़ा समाप्त हो जाता, तो वे किसी भी लाल कपड़े से गंडा बनाकर बाँट देते थे ताकि उन्हें दक्षिणा मिल सके!
  3. शीघ्र क्रोधी किंतु शीघ्र शांत: जब लेखक लंकोर के रास्ते में पिछड़ गए और देर से पहुँचे, तो सुमति क्रोध से लाल-पीले हो गए। पर जैसे ही लेखक ने सुस्त घोड़े का कारण बताया, वे तुरंत शांत और प्रसन्न हो गए।

लंकोर के मार्ग में भटकाव:

लंकोर की यात्रा के समय लेखक को जो घोड़ा मिला, वह बहुत सुस्त था। वह इतना धीरे चल रहा था कि लेखक को लगता था वह आगे जा रहा है या पीछे!

  • आगे चलकर रास्ता दो भागों में बँट रहा था। लेखक गलत रास्ते पर डेढ़-दो मील आगे चले गए।
  • वहाँ एक घर में पूछने पर पता चला कि लंकोर का रास्ता दूसरा था। लेखक को वापस लौटना पड़ा, जिसके कारण वे शाम को 4-5 बजे अपने गंतव्य पहुँचे और सुमति प्रतीक्षा करते-करते अत्यधिक क्रोधित हो गए।

शेकर विहार की ज्ञान-गंगा: 103 हस्तलिखित पोथियाँ

शेकर विहार के एक बड़े मंदिर में तिब्बती बौद्ध धर्मग्रंथ 'कंजुर' (बुद्ध-वचन अनुवाद) की 103 हस्तलिखित पोथियाँ रखी हुई थीं।

  • प्रत्येक पोथी मोटे, उत्तम हस्तनिर्मित कागज पर सुंदर अक्षरों में लिखी गई थी।
  • एक-एक पोथी का वजन 15-15 सेर (लगभग 14-15 किलोग्राम) से कम नहीं था!
  • राहुल जी के लिए यह पोथियाँ किसी अमूल्य निधि से कम नहीं थीं। वे संसार को भूलकर उन पोथियों के अध्ययन में पूरी तरह लीन हो गए। इसीलिए उन्होंने लिखा: "अब मैं पुस्तकों के भीतर था।"

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

यात्रा के मुख्य पात्र
राहुल सांकृत्यायन (लेखक/जिज्ञासु घुमक्कड़ शोधार्थी), सुमति (मंगोल बौद्ध भिक्षु व यजमानों के गुरु), नमसे (शेकर विहार के मुख्य भद्र भिक्षु)।
तिब्बती समाज की 4 मुख्य विशेषताएँ
  1. जाति-पांति व छुआछूत रहित समाज। 2. महिलाओं में पर्दा-प्रथा नहीं। 3. सहज अतिथि सत्कार (मक्खन वाली चाय)। 4. हथियार कानून का अभाव (सुरक्षा संकट)।
प्रमुख तिब्बती शब्दकोश
डाँडा = ऊँचा निर्जन पहाड़ी मोड़; थुक्पा = सत्तू/हड्डी-मांस का गाढ़ा सूप; छंग = नशीला पेय; गंडा = अभिमंत्रित पवित्र धागा; कंजुर = बुद्धवचन अनुवाद पोथियाँ।
प्रसिद्ध साहित्यिक उद्धरण
"कुची-कुची एक पैसा!" (भिखमंगे की रक्षा-युक्ति) तथा "अब मैं पुस्तकों के भीतर था।" (पोथियों के अध्ययन में तल्लीनता)।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
थोङ्ला के पहले के आखिरी गाँव पहुँचने पर भिखमंगे के वेश में होने पर भी लेखक को ठहरने के लिए अच्छी जगह मिली, जबकि दूसरी यात्रा के समय भद्र वेश में भी उन्हें उचित स्थान नहीं मिला। क्यों? (NCERT अभ्यास प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: इसके दो प्रमुख कारण थे:

  1. सुमति की जान-पहचान और प्रभाव: पहली यात्रा में लेखक के साथ मंगोल भिक्षु 'सुमति' थे। उस गाँव में सुमति के बहुत-से यजमान और परिचित थे। सुमति के प्रति ग्रामीणों में अगाध श्रद्धा थी, इसलिए भिखमंगे के वेश में होने पर भी लेखक को रहने के लिए सबसे अच्छा कमरा मिल गया।
  2. लोगों की मनोवृत्ति और समय का अंतर: दूसरी यात्रा के समय लेखक एक भद्र (सभ्य) यात्री के वेश में घोड़े पर सवार होकर गए थे, किंतु वे शाम के समय पहुँचे थे। शाम के समय तिब्बत के अधिकांश लोग 'छंग' (नशीली देशी शराब) पीकर अपने होश खो बैठते थे और भले-बुरे का विवेक नहीं कर पाते थे। उस समय ग्रामीणों की मनोवृत्ति बदल चुकी थी और सुमति भी साथ नहीं थे, इसलिए उन्हें एक गरीब झोपड़े में शरण लेनी पड़ी।
उदाहरण 2
उस समय के तिब्बत में हथियार का कानून न रहने के कारण यात्रियों को किस प्रकार का भय बना रहता था? (JAC Board High-Yield Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: तत्कालीन तिब्बत में 'आर्म्स एक्ट' (हथियार कानून) लागू नहीं था, जिसके कारण यात्रियों को निम्नलिखित गंभीर भय बने रहते थे:

  1. डाकुओं द्वारा जान से मारने का आतंक: निर्जन डाँडों (16-18 हजार फीट ऊँचे वीरान मोड़ों) में डाकू खुलेआम लाठी की तरह पिस्तौल और बंदूकें लेकर घूमते थे। वे राहगीरों को लूटने से पहले ही गोली मार देते थे, ताकि गवाह न बचे और वे स्वयं सुरक्षित रहें।
  2. सुरक्षा एवं पुलिस का अभाव: तिब्बती सरकार वीरान पहाड़ी इलाकों और खुफिया विभाग पर अधिक खर्च नहीं करती थी। वहाँ गवाह भी नहीं मिलते थे, जिससे अपराधियों को दंडित करना असंभव था।
  3. अकेले यात्रा करना आत्मघाती होना: निर्जन मार्गों पर अकेले यात्री का जीवित लौटना असंभव माना जाता था, इसलिए लोग झुंड बनाकर या भिक्षुओं के वेश में ही यात्रा करते थे।
उदाहरण 3
लेखक लंकोर के मार्ग में अपने साथियों से किस कारण पिछड़ गया? (NCERT अभ्यास प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: लेखक लंकोर के मार्ग में अपने साथियों से दो मुख्य कारणों से पिछड़ गया:

  1. घोड़े की अत्यधिक सुस्ती: लेखक को जो घोड़ा मिला था, वह बहुत धीमा और कमजोर था। जब लेखक उसे आगे चलने को चाबुक लगाता, तो वह और सुस्त हो जाता था। लेखक को समझ ही नहीं आता था कि घोड़ा आगे बढ़ रहा है या पीछे।
  2. रास्ते का भटकाव: आगे चलकर मार्ग दो दिशाओं में बँट रहा था। लेखक अज्ञानतावश बाएँ रास्ते पर डेढ़-दो मील आगे चला गया। जब वहाँ एक घर में पूछा तो पता चला कि लंकोर का मार्ग दाएँ वाला था। लेखक को पुनः वापस लौटकर सही रास्ते पर आना पड़ा, जिससे काफी समय नष्ट हो गया और वे शाम को सुमति से बहुत देर बाद मिल पाए।
उदाहरण 4
सुमति के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: सुमति 'ल्हासा की ओर' यात्रा-वृत्त का अत्यंत सजीव और आकर्षक पात्र है। उसके व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. अत्यंत मिलनसार एवं लोकप्रिय: सुमति मंगोल बौद्ध भिक्षु थे। तिब्बत के लगभग हर गाँव में उनके परिचित, मित्र और यजमान थे। उनका संपर्क-क्षेत्र बहुत विस्तृत था।
  2. सदाशय और स्नेही मार्गदर्शक: उन्होंने कठिन और संकटपूर्ण यात्रा में लेखक का कदम-कदम पर साथ दिया और अपनी जान-पहचान के बल पर उन्हें सुरक्षित रखा।
  3. व्यावहारिक एवं चतुर: वे धर्म-कर्म के नाम पर अपनी आजीविका चलाना जानते थे। बोधगया से लाए लाल कपड़े के गंडे (ताबीज) बाँटकर यजमानों से दक्षिणा लेते थे।
  4. आशुतोष (शीघ्र क्रोधी, शीघ्र शांत): लेखक के देर से पहुँचने पर वे पहले तो लाल-पीले हो गए, किंतु जैसे ही लेखक ने घोड़े की सुस्ती का कारण बताया, वे तुरंत मुस्कुरा उठे और क्रोध भूल गए।
उदाहरण 5
"अब मैं पुस्तकों के भीतर था।" इस कथन का क्या आशय है? (NCERT अभ्यास प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: इस कथन का आशय है कि लेखक पुस्तकों के गंभीर अध्ययन में पूरी तरह तल्लीन (मग्न) हो गया था।

  • शेकर विहार के मंदिर में बुद्धवचन अनुवाद की 'कंजुर' नामक 103 भारी-भरकम हस्तलिखित पोथियाँ रखी थीं।
  • महापंडित राहुल सांकृत्यायन एक महान विद्वान और शोधार्थी थे। उन दुर्लभ पोथियों को देखकर उनकी ज्ञान-पिपासा जाग उठी।
  • वे अपने आसपास के संसार, सुमति के यजमानों से मिलने जाने और अन्य सभी चिंताओं को भूलकर एकाग्रचित्त होकर उन पोथियों को पढ़ने लगे। वे इतने लीन हो गए मानो उनका अस्तित्व ही पुस्तकों का हिस्सा बन गया हो।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सुमति को केवल एक साधारण नौकर या कुली समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सुमति एक आदरणीय मंगोल बौद्ध भिक्षु और लेखक के घनिष्ठ मित्र थे, जिनका तिब्बत के समाज में व्यापक धार्मिक और व्यक्तिगत प्रभाव था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि लेखक ने ल्हासा की यात्रा भारतीय पासपोर्ट या अनुमति से की थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उस समय अंग्रेजों द्वारा भारतीयों का तिब्बत जाना प्रतिबंधित था, इसलिए लेखक ने भिखमंगे के छद्म वेश में अवैध रूप से नेपाल के रास्ते यात्रा की थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

"पुस्तकों के भीतर था" का शाब्दिक अर्थ यह निकाल लेना कि लेखक पुस्तकों की अलमारी में बंद हो गए।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह एक मुहावरेदार साहित्यिक अभिव्यक्ति है जिसका अर्थ है: पुस्तकों के अध्ययन में इतना गहरा डूब जाना कि बाह्य संसार की सुध न रहे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

तिब्बती चाय को भारत की दूध वाली मीठी चाय जैसा समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तिब्बती चाय नमकीन होती है, जिसमें मक्खन, नमक और सोड़ा डालकर खोंटीदार बर्तन में कूटकर तैयार किया जाता है।

ल्हासा की ओर: यात्रा मार्ग, तिब्बती संस्कृति एवं शेकर विहार ज्ञान-कोश

दुर्गम यात्रा मार्ग • नेपाल-तिब्बत मुख्य मार्ग • भिखमंगे का छद्म वेश (भारतीयों पर प्रतिबंध के कारण) • डाँडा थोङ्ला (17,000 फीट) • हथियार कानून का अभाव (डाकुओं द्वारा पहले हत्या, फिर लूट) • सुरक्षा: "कुची-कुची एक पैसा!" रोमांचक यायावरी साधना तिब्बती समाज एवं संस्कृति 1. समतामूलक सामाजिक ढाँचा: • जाति-पांति व छुआछूत का अभाव। • पर्दा-प्रथा से मुक्त स्वतंत्र नारियाँ। 2. विशिष्ट जीवनशैली: • मक्खन-सोड़ा वाली नमकीन चाय (खोंटी)। • शाम को नशीला पेय 'छंग'। 3. बौद्ध जागीरदारी व्यवस्था: • भूमि विहारों/मठों के अधीन। • भिक्षु को राजा के समान सम्मान। सहज अतिथि सत्कार की परंपरा शेकर विहार: ज्ञान का खजाना • भद्र भिक्षु 'नमसे' का स्वागत • कंजुर (बुद्धवचन अनुवाद): 103 हस्तलिखित पोथियाँ • प्रत्येक पोथी 15-15 सेर भारी • सुंदर अक्षरों में स्वर्ण-तुल्य ज्ञान • "अब मैं पुस्तकों के भीतर था।" (अध्ययन में पूर्ण आत्म-विस्मृति) दुर्लभ भारतीय पांडुलिपियाँ

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
राहुल सांकृत्यायन ने सन् 1929-30 में नेपाल के रास्ते भिखमंगे के छद्म वेश में तिब्बत की राजधानी ल्हासा की यात्रा की।
मुख्य बिंदु 2
डाँडा थोङ्ला 17-18 हजार फीट ऊँचा सबसे खतरनाक स्थान था जहाँ डाकू निर्दोष यात्रियों को गोली मारकर लूटते थे।
मुख्य बिंदु 3
तिब्बत में हथियार कानून न होने से लोग लाठी की तरह बंदूक और पिस्तौल लेकर खुलेआम घूमते थे।
मुख्य बिंदु 4
लेखक डाकुओं से बचने के लिए "कुची-कुची एक पैसा!" कहकर भीख माँगने का नाटक करते थे।
मुख्य बिंदु 5
तिब्बती समाज में जाति-पांति, ऊँच-नीच और छुआछूत नहीं था; औरतें पर्दा नहीं करती थीं और अपरिचितों का भी सत्कार करती थीं।
मुख्य बिंदु 6
तिब्बत में मक्खन और सोड़ा मिलाकर खोंटी में कूटकर नमकीन चाय तैयार की जाती थी।
मुख्य बिंदु 7
सुमति एक मिलनसार मंगोल भिक्षु थे जिनके तिब्बत के हर गाँव में यजमान थे और वे बोधगया के गंडे बाँटते थे।
मुख्य बिंदु 8
लंकोर के मार्ग में घोड़ा सुस्त होने और गलत रास्ते पर चले जाने से लेखक अपने साथियों से पिछड़ गया।
मुख्य बिंदु 9
शेकर विहार के मुख्य भिक्षु नमसे अत्यंत भद्र पुरुष थे जिन्होंने भिखमंगे के वेश में भी लेखक का आदर किया।
मुख्य बिंदु 10
शेकर विहार के मंदिर में कंजुर (बुद्धवचन) की 103 भारी हस्तलिखित पोथियाँ पाकर लेखक उनके अध्ययन में पूर्णतः लीन हो गए।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
लेखक ने ल्हासा की यात्रा किस वेश में और क्यों की?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

लेखक ने भिखमंगे के छद्म वेश में यात्रा की क्योंकि उस समय अंग्रेजों द्वारा भारतीयों का तिब्बत में प्रवेश प्रतिबंधित था।


2
तिब्बत में डाँडा किसे कहते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

तिब्बत में 16,000 से 18,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित निर्जन, वीरान और खतरनाक पहाड़ी मोड़ों को 'डाँडा' कहा जाता है।


3
तिब्बती समाज में महिलाओं की स्थिति कैसी थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

तिब्बत में महिलाएँ पर्दा नहीं करती थीं, किसी भी अपरिचित का सत्कार करती थीं और समाज में उन्हें पुरुषों के समान पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी।


4
सुमति अपने यजमानों को क्या बाँटते थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

सुमति अपने यजमानों को बोधगया से लाए लाल कपड़े के अभिमंत्रित गंडे (पवित्र धागे) बाँटते थे।


5
शेकर विहार के मंदिर में लेखक को कौन-सा बौद्ध ग्रंथ मिला और उसमें कितनी पोथियाँ थीं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

शेकर विहार में बुद्ध-वचन अनुवाद 'कंजुर' की 103 हस्तलिखित पोथियाँ मिलीं, जिनमें से प्रत्येक लगभग 15 सेर भारी थी।


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