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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 10
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Vakh

'वाख' 14वीं सदी की प्रसिद्ध कश्मीरी संत-कवयित्री ललद्यद (लल्लेश्वरी / लल्ला आरिफा) की अमर, भावप्रवण और दार्शनिक वाणी का हिंदी काव्यानुवाद है। कश्मीरी भाषा में जिस प्रकार कबीर के 'दोहे', मीरा के 'पद', तुलसी की 'चौपाई' और रसखान के 'सवैये' प्रसिद्ध हैं, ठीक उसी प्रकार ललद्यद के 'वाख' (वाणी / कथन) कश्मीरी जनमानस में सदियों से रचे-बसे हैं। ललद्यद ने धार्मिक संकीर्णताओं, बाह्य कर्मकांडों, हठयोग के खोखलेपन और छुआछूत का विरोध करते हुए अंतःकरण की शुद्धि, प्रेम, सद्भाव और आत्मज्ञान को ईश्वर-प्राप्ति का एकमात्र सच्चा मार्ग बताया है। इस विस्तृत अध्ययन सामग्री में JAC बोर्ड कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित आयाम समाहित हैं: कवयित्री परिचय एवं वाख विधा: कश्मीरी भक्ति परंपरा, ललद्यद का रहस्यवादी चिंतन और वाख शैली। चारों वाखों का सप्रसंग भावार्थ एवं शिल्प-सौंदर्य: प्रथम वाख: 'रस्सी कच्चे धागे की, खींच रही मैं नाव...' (नश्वर जीवन, व्यर्थ प्रयास और प्रभु-मिलन की तड़प)। द्वितीय वाख: 'खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं, न खाकर बनेगा अहंकारी...' (मध्यम मार्ग / समभावी होने का उपदेश)। तृतीय वाख: 'आई सीधी राह से, गई न सीधी राह...' (हठयोग व सुषुम्ना नाड़ी का भटकाव, 'मांझी' को देने के लिए कौड़ी न होना)। चतुर्थ वाख: 'थल-थल में बसता है शिव ही, भेद न कर क्या हिंदू-मुसलमाँ...' (सर्वव्यापी शिव और आत्मज्ञान ही ईश्वर-दर्शन)। JAC बोर्ड परीक्षापयोगी प्रश्न-उत्तर: पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्न, प्रतीकार्थ स्पष्टीकरण और काव्यांश पर आधारित प्रश्न।

कच्चे धागे की रस्सी और भवसागर की नाव: कश्मीरी मीरा 'ललद्यद' का अमर रहस्यवाद

क्या आपने कभी सोचा है कि यह जीवन कितने कच्चे धागे पर टिका है? सांसों की डोरी इतनी कमजोर है कि कब टूट जाए, कोई नहीं जानता! और हम इस नश्वर डोरी से जीवन रूपी भारी नाव को भवसागर के उस पार ले जाने की व्यर्थ कोशिश कर रहे हैं!

कश्मीर की महान संत कवयित्री ललद्यद ने 700 साल पहले इसी मर्म को अपनी अमर वाणी में पिरोया था। जब लोग हठयोग और तपस्या के पाखंड में उलझ रहे थे, तब ललद्यद ने सरल वाणी में समझाया: "ज्ञानी है तो स्वयं को जान, वही है साहिब से पहचान!" आइए, कश्मीर की वादियों से गूंजती इस दिव्य वाणी के अमृत को चखें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

  1. भारतीय भक्ति-आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप: यह पाठ सिद्ध करता है कि उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक सभी भारतीय संतों का मूल संदेश एक ही था—प्रेम, सादगी और आडंबर-विरोध।
  2. समभाव और मध्यम मार्ग की प्रेरणा: न तो अत्यधिक भोग में डूबना और न ही कठोर वैराग्य से अहंकारी बनना; जीवन में संतुलन रखना ही सच्चा धर्म है।
  3. आत्मज्ञान और सांप्रदायिक सौहार्द: हिंदू-मुस्लिम के भेद को मिटाकर प्रत्येक कण (थल-थल) में शिव (परमात्मा) का दर्शन करना।
  4. JAC बोर्ड परीक्षा में अनिवार्य प्रश्न: ललद्यद के वाखों के प्रतीकार्थ (कच्चे धागे की रस्सी, मांझी, जेब टटोली कौड़ी न पाई) पर 5 से 8 अंक के प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कश्मीर की शैव-भक्ति परंपरा और त्रिक दर्शन (Trika Philosophy) की सामान्य समझ।
  • वाख विधा (चार पंक्तियों में निबद्ध कश्मीरी आध्यात्मिक पद) का ज्ञान।
  • हठयोग (सुषुम्ना नाड़ी, कुंडलिनी जागरण) और भक्ति मार्ग के अंतर का बोध।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • ललद्यद के चारों वाखों का सप्रसंग भावार्थ और दार्शनिक संदेश स्पष्ट कर पाना।
  • 'कच्चे धागे की रस्सी', 'नाव', 'मिट्टी के सकोरे' और 'मांझी' जैसे प्रतीकों का अर्थ समझना।
  • अहंकार से मुक्ति और अंतःकरण के विकास के लिए समभावी होने के महत्व का विश्लेषण करना।
  • हठयोग की असफलता और सहज भक्ति की श्रेष्ठता को स्पष्ट करना।
  • JAC बोर्ड परीक्षा में आने वाले व्याख्यात्मक और काव्यांश-आधारित प्रश्नों के प्रामाणिक उत्तर लिखना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. कवयित्री परिचय एवं कश्मीरी 'वाख'...
2 2. प्रथम वाख: 'रस्सी कच्चे धागे की....
3 3. द्वितीय वाख: 'खा-खाकर कुछ पाएगा...
4 4. तृतीय वाख: 'आई सीधी राह से...'
5 5. चतुर्थ वाख: 'थल-थल में बसता है श...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. कवयित्री परिचय एवं कश्मीरी 'वाख' परंपरा

संत ललद्यद (1320 - 1392):

कश्मीरी भाषा की लोकप्रिय संत-कवयित्री ललद्यद का जन्म श्रीनगर के पास स्थित 'सिमपुरा' गाँव में हुआ था। उन्हें लल्लेश्वरी, लल्ला, लल-आरिफा आदि नामों से भी जाना जाता है।

  • उनका जीवन पारिवारिक अत्याचारों और संघर्षों से भरा था, जिसके बाद उन्होंने संन्यास ले लिया और शैव दर्शन तथा सूफी मत के समन्वय से एक नई मानवीय भक्ति धारा प्रवाहित की।
  • उनकी काव्य-शैली को 'वाख' कहा जाता है। जिस प्रकार हिंदी में कबीर की साखियाँ, मीरा के पद और तुलसी की चौपाइयाँ प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार कश्मीर में ललद्यद के वाख लोक-स्मृति में जीवित हैं।
  • उन्होंने संस्कृत के पांडित्य-प्रदर्शन के स्थान पर जनता की सरल कश्मीरी भाषा में उपदेश दिया। यहाँ प्रस्तुत वाखों का हिंदी अनुवाद प्रसिद्ध लेखिका मीरा कांत ने किया है।

2. प्रथम वाख: 'रस्सी कच्चे धागे की...'

मूल वाख:

रस्सी कच्चे धागे की, खींच रही मैं नाव।
जाने कब सुन मेरी पुकार, करें देव भवसागर पार।
पानी टपके कच्चे सकोरे, व्यर्थ प्रयास हो रहे मेरे।
जी में उठती रह-रह हूक, घर जाने की चाह है घेरे॥

विस्तृत भावार्थ एवं प्रतीकार्थ:

  1. कच्चे धागे की रस्सी: मनुष्य की कमजोर, क्षणभंगुर और नश्वर सांसें।
  2. नाव: यह नश्वर मानव शरीर अथवा सांसारिक जीवन।
  3. कच्चे सकोरे से पानी टपकना: मिट्टी के कच्चे सकोरे (कुल्हड़) में पानी भरने पर वह रिस-रिसकर व्यर्थ बह जाता है; उसी प्रकार उम्र बीतती जा रही है और ईश्वर-प्राप्ति के सारे साधन व्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं।
  4. घर जाने की चाह: यहाँ 'घर' का अर्थ सांसारिक मकान नहीं, बल्कि परमात्मा का लोक (परम धाम) है जहाँ से आत्मा इस नश्वर संसार में आई है।
  • कवयित्री कहती हैं कि मैं अपनी नश्वर सांसों की कमजोर डोरी से इस शरीर रूपी नाव को संसार रूपी सागर में खींचने की चेष्टा कर रही हूँ। न जाने परमात्मा कब मेरी करुण पुकार सुनेंगे और मुझे इस भवसागर से पार उतारेंगे। दिन-प्रतिदिन आयु घटती जा रही है, मन में ईश्वर से मिलने की तड़प ('हूक') उठ रही है और अपने असली घर (परमात्मा) जाने की तीव्र व्याकुलता मुझे घेरे हुए है।

3. द्वितीय वाख: 'खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं...'

मूल वाख:

खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं,
न खाकर बनेगा अहंकारी।
सम खा तभी होगा समभावी,
खुलेगी साँकल बंद द्वार की॥

विस्तृत भावार्थ:

कवयित्री मनुष्य को अतिवाद से बचकर मध्यम मार्ग (समभाव) अपनाने का गहरा उपदेश देती हैं:

  1. खा-खाकर कुछ नहीं पाना: यदि मनुष्य केवल सांसारिक भोग-विलास, स्वादिष्ट भोजन और भौतिक सुखों में डूबा रहेगा, तो उसे आत्मज्ञान या ईश्वर की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती; वह केवल वासनाओं का दास बना रहेगा।
  2. न खाकर अहंकारी बनना: यदि वह सब कुछ छोड़कर कठोर तपस्या, उपवास और हठयोग करने लगेगा, तो उसके मन में 'मैं त्यागी और तपस्वी हूँ' का भारी अहंकार पैदा हो जाएगा, जो पतन का कारण बनेगा।
  3. सम खा (इंद्रियों पर संयम): न तो भोग में लिप्त हो, न ही शरीर को व्यर्थ कष्ट दे। अपनी इंद्रियों को वश में रखकर 'समभावी' (संतुलित) बनो।
  4. बंद द्वार की साँकल खुलना: जब मन में समभाव और करुणा जागृत होगी, तभी अज्ञान का ताला टूटेगा और ज्ञान तथा मुक्ति के बंद द्वार की जंजीर (साँकल) स्वतः खुल जाएगी।

4. तृतीय वाख: 'आई सीधी राह से...'

मूल वाख:

आई सीधी राह से, गई न सीधी राह।
सुषुम-सेतु पर खड़ी थी, बीत गया दिन आह!
जेब टटोली, कौड़ी न पाई।
माझी को दूँ, क्या उतराई?

विस्तृत भावार्थ:

  1. आई सीधी राह से: जब जीवात्मा संसार में जन्म लेती है, तो वह निष्पाप, पवित्र और सरल होती है।
  2. गई न सीधी राह (हठयोग का भटकाव): संसार में आकर मनुष्य सहज भक्ति को छोड़कर हठयोग, कुंडलिनी जागरण और जटिल तंत्र-मंत्र के टेढ़े रास्तों पर भटक जाता है।
  3. सुषुम-सेतु पर खड़े-खड़े दिन बीतना: हठयोग में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी के संगम पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। कवयित्री कहती हैं कि मैं इसी हठयोग के पुल पर खड़ी-खड़ी अपनी पूरी जिंदगी (दिन) गँवा बैठी, पर मुझे कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं हुआ।
  4. जेब टटोली कौड़ी न पाई: जब जीवन का अंतिम समय आया और मैंने अपने कर्मों का लेखा-जोखा देखा, तो मेरे पास सत्कर्मों और भक्ति रूपी कोई पूँजी (कौड़ी) नहीं बची थी।
  5. माझी को क्या दूँ उतराई: 'माझी' का अर्थ है परमात्मा / गुरु जो भवसागर से पार उतारता है। जब नाव किनारे लगेगी और प्रभु मुझसे उतराई (पार उतारने का किराया अर्थात् मेरे जीवन के सत्कर्म) माँगेंगे, तो मैं उन्हें क्या मुँह दिखाऊँगी? क्योंकि मेरा पूरा जीवन तो व्यर्थ के आडंबरों में नष्ट हो गया!

5. चतुर्थ वाख: 'थल-थल में बसता है शिव ही...'

मूल वाख:

थल-थल में बसता है शिव ही,
भेद न कर क्या हिंदू-मुसलमाँ।
ज्ञानी है तो स्वयं को जान,
वही है साहिब से पहचान॥

विस्तृत भावार्थ:

यह वाख ललद्यद के दर्शन का सर्वोच्च शिखर है जहाँ वे अद्वैत और सांप्रदायिक सौहार्द की घोषणा करती हैं:

  1. शिव की सर्वव्यापकता: 'शिव' का अर्थ केवल भगवान शंकर नहीं, बल्कि परम कल्याणकारी, सर्वव्यापी परमात्मा है। वह सृष्टि के प्रत्येक कण-कण (थल-थल), जल, थल, आकाश और हर प्राणी में विद्यमान है।
  2. सांप्रदायिक भेदभाव का निषेध: जब परमात्मा एक है और सर्वत्र व्याप्त है, तो हिंदू और मुसलमान के बीच दीवार खड़ी करना अज्ञानता का लक्षण है।
  3. आत्मज्ञान ही ब्रह्मज्ञान: यदि तू वास्तव में ज्ञानी और बुद्धिमान है, तो पहले अपनी अंतरात्मा को पहचान (आत्म-साक्षात्कार कर)। जिस दिन तू अपने भीतर के सत्य को जान लेगा, उसी दिन तुझे 'साहिब' (परमात्मा) का साक्षात दर्शन हो जाएगा, क्योंकि परमात्मा तेरे अपने ही भीतर ज्योति रूप में विराजमान है।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

कवयित्री एवं विधा
ललद्यद (14वीं सदी, कश्मीर); विधा: वाख (चार पंक्तियों का आध्यात्मिक गेय पद); हिंदी अनुवाद: मीरा कांत।
चारों वाखों के मुख्य सूत्र
  1. जीवन की नश्वरता एवं प्रभु-मिलन की तड़प। 2. भोग और त्याग के बीच समभाव (मध्यम मार्ग)। 3. हठयोग की व्यर्थता एवं सत्कर्मों की आवश्यकता (उतराई)। 4. सर्वव्यापी शिव एवं आत्मज्ञान।
प्रमुख रूपक एवं प्रतीक
कच्चे धागे की रस्सी = सांसें; नाव = जीवन; सकोरा = आयु; घर = परमात्मा का धाम; सुषुम-सेतु = हठयोग की सुषुम्ना नाड़ी; माझी = ईश्वर/गुरु; कौड़ी = सत्कर्म; शिव = सर्वव्यापी कल्याणकारी सत्ता।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
'रस्सी' यहाँ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है और वह कैसी है? (NCERT अभ्यास प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: यहाँ 'रस्सी' शब्द मनुष्य की क्षणभंगुर, नश्वर और दुर्बल सांसों (जीवन-डोर) के लिए प्रयुक्त हुआ है।

  • रस्सी की विशेषता: यह रस्सी 'कच्चे धागे' की बनी हुई है, अर्थात् यह अत्यंत कमजोर, अस्थिर और नाशवान है। यह कब टूट जाए, इसका कोई भरोसा नहीं है। मनुष्य इसी कमजोर रस्सी से अपनी जीवन रूपी भारी नाव को खींचने का असफल प्रयास कर रहा है।
उदाहरण 2
कवयित्री द्वारा मुक्ति के लिए किए जाने वाले प्रयास व्यर्थ क्यों हो रहे हैं? (JAC Board High-Yield Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: कवयित्री द्वारा मुक्ति के प्रयास निम्नलिखित कारणों से व्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं:

  1. साधनों की नश्वरता: जिस प्रकार मिट्टी के कच्चे सकोरे में पानी भरने पर वह रिसकर बह जाता है और बर्तन खाली रह जाता है, उसी प्रकार कवयित्री के साधना के साधन कच्चे हैं और समय तेजी से बीत रहा है।
  2. हठयोग का आडंबर: वे सच्चे प्रेम और भक्ति के स्थान पर हठयोग और कठिन साधना के जटिल मार्ग पर भटकती रहीं, जिससे प्रभु-मिलन का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सका और जीवन का समय बीत गया।
उदाहरण 3
कवयित्री का 'घर जाने की चाह' से क्या तात्पर्य है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 'घर जाने की चाह' से कवयित्री का तात्पर्य इस नश्वर संसार को छोड़कर अपने वास्तविक और शाश्वत मूल निवास—परमात्मा के परम धाम (परमात्मा में विलीन होने) से है।

  • कवयित्री मानती हैं कि आत्मा मूल रूप से परमात्मा का ही अंश है जो इस संसार में आकर भटक गई है। अब वह सांसारिक मोह-माया के दुखों से मुक्त होकर अपने प्रियतम परमात्मा की शरण में लौट जाना चाहती हैं।
उदाहरण 4
'ज्ञानी है तो स्वयं को जान, वही है साहिब से पहचान'—इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से कवयित्री ने आत्मज्ञान को ही ईश्वर-प्राप्ति का एकमात्र द्वार बताया है:

  1. आत्मज्ञान का महत्व: सच्चा ज्ञानी वह नहीं है जो वेद, कुरान या शास्त्रों को रटता है, बल्कि सच्चा ज्ञानी वह है जो अपने अंतःकरण की बुराइयों, अहंकार और वासनाओं को पहचानकर अपने भीतर छिपी दिव्य ज्योति का साक्षात्कार करता है।
  2. ईश्वर से एकाकार: ईश्वर कोई बाहर मंदिर या मस्जिद में बैठा अलग व्यक्ति नहीं है; वह तो मनुष्य की अपनी ही आत्मा का मूल सत्य है। जब व्यक्ति स्वयं को पहचान लेता है (आत्म-ज्ञान पा लेता है), तो उसे साहिब (परमात्मा) का दर्शन स्वतः हो जाता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सुषुप-सेतु को कोई नदी का वास्तविक पुल समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सुषुम-सेतु हठयोग की 'सुषुम्ना नाड़ी' का प्रतीकात्मक नाम है, जहाँ हठयोगी कुंडलिनी जागरण का जटिल प्रयास करते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'शिव' को केवल भगवान शंकर के संप्रदाय तक सीमित मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ललद्यद के वाख में 'शिव' का अर्थ संपूर्ण चराचर जगत में व्याप्त सर्वशक्तिमान, कल्याणकारी और निराकार परमात्मा है।

वाख: जीवन की नश्वरता, मध्यम मार्ग एवं आत्म-साक्षात्कार

जीवन की नश्वरता • कच्चे धागे की रस्सी = सांसें • नाव = नश्वर शरीर/जीवन • कच्चा सकोरा = घटती आयु • मन में उठती हूक (तड़प) • "घर जाने की चाह है घेरे" (परमात्मा के परम धाम) प्रभु-मिलन की व्याकुलता समभाव: मध्यम मार्ग 1. भोग की अति: • "खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं।" 2. त्याग का अहंकार: • "न खाकर बनेगा अहंकारी।" 3. समभावी साधना: • सम खा, खुलेगी साँकल बंद द्वार की। • इंद्रिय-संयम और मानसिक संतुलन। संतुलित जीवन दर्शन सर्वव्यापी शिव & आत्मज्ञान • थल-थल में बसता है शिव • हिंदू-मुस्लिम भेद का त्याग • हठयोग (सुषुम्ना) की विफलता • मांझी (प्रभु) को सत्कर्मों की उतराई • "ज्ञानी है तो स्वयं को जान" आत्म-साक्षात्कार ही ईश्वर दर्शन

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
ललद्यद 14वीं सदी की प्रसिद्ध कश्मीरी संत-कवयित्री हैं जिनकी वाणी को वाख कहा जाता है।
मुख्य बिंदु 2
प्रथम वाख में कवयित्री ने सांसों को 'कच्चे धागे की रस्सी' और शरीर को 'नाव' बताकर जीवन की नश्वरता का चित्रण किया है।
मुख्य बिंदु 3
समय बीतने के साथ मुक्ति के प्रयास कच्चे सकोरे से रिसते पानी की तरह व्यर्थ हो रहे हैं और मन में ईश्वर के घर जाने की चाह है।
मुख्य बिंदु 4
द्वितीय वाख में केवल भोग में न डूबने और त्याग के अहंकार से बचकर 'समभावी' (संतुलित) बनने की प्रेरणा दी गई है।
मुख्य बिंदु 5
समभाव अपनाने पर ही अज्ञान का पर्दा हटेगा और प्रभु-मिलन के बंद द्वार की साँकल खुलेगी।
मुख्य बिंदु 6
तृतीय वाख में कवयित्री हठयोग और सुषुम्ना नाड़ी के व्यर्थ भटकाव पर पश्चाताप करती हैं।
मुख्य बिंदु 7
जीवन के अंत में जब सत्कर्मों की जेब टटोली तो कुछ नहीं मिला, और वे चिंतित हैं कि भवसागर पार कराने वाले मांझी (प्रभु) को क्या उतराई देंगी।
मुख्य बिंदु 8
चतुर्थ वाख में घोषणा की गई है कि कल्याणकारी 'शिव' (परमात्मा) सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है।
मुख्य बिंदु 9
हिंदू और मुसलमान के बीच का भेदभाव अज्ञानता है; सच्चा ज्ञानी वही है जो अपनी अंतरात्मा को पहचानता है।
मुख्य बिंदु 10
आत्मज्ञान ही परमात्मा को जानने और पाने का एकमात्र सच्चा मार्ग है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
वाख किस भाषा की प्रसिद्ध काव्य-शैली है और इसकी रचयिता कौन हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

वाख कश्मीरी भाषा की प्रसिद्ध काव्य-शैली है और इसकी रचयिता 14वीं सदी की संत-कवयित्री ललद्यद हैं।


2
'कच्चे सकोरे' का क्या प्रतीकार्थ है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

'कच्चे सकोरे' का प्रतीकार्थ नश्वर मानव शरीर और तेजी से घटती हुई आयु है जिससे साधना के अवसर हाथ से निकलते जा रहे हैं।


3
कवयित्री ने मांझी को देने के लिए क्या ढूँढ़ा और उन्हें क्या मिला?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

कवयित्री ने मांझी (परमात्मा) को उतराई देने के लिए अपनी जेब (कर्मों का लेखा-जोखा) टटोली, पर उन्हें एक कौड़ी (सत्कर्म) भी नहीं मिली।


4
ललद्यद के अनुसार साहिब (ईश्वर) से पहचान का क्या उपाय है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

ललद्यद के अनुसार 'स्वयं को जानना' (आत्मज्ञान प्राप्त करना) ही साहिब से पहचान का सच्चा उपाय है।


अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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