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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 11
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Sawaiye

'सवैये' भक्तिकाल की सगुण कृष्ण-भक्ति शाखा के अनन्य प्रेमी कवि रसखान (सैयद इब्राहिम) की अप्रतिम, माधुर्यपूर्ण और समर्पणमयी वाणी का सर्वोत्कृष्ट संकलन है। रसखान का कृष्ण-प्रेम इतना सघन और अनन्य है कि वे न केवल श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य पर मुग्ध हैं, बल्कि कृष्ण की जन्मभूमि ब्रज, गोकुल, यमुना तट, कदम के पेड़ और यहाँ तक कि ब्रज की धूल तक पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर हैं। रसखान ने सवैया छंद में ब्रजभाषा के अत्यंत सरस, कोमल और संगीतात्मक रूप को प्रस्तुत किया है। उनके सवैयों में सगुण भक्ति का ऐसा रस बरसता है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने मुग्ध होकर कहा था: "इन मुसलमान जनन पर, कोटिन हिंदुन वारिए!" इस विस्तृत अध्ययन सामग्री में JAC बोर्ड कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित आयाम समाहित हैं: कवि परिचय एवं रसखान की अनन्य भक्ति: पठान सरदार सैयद इब्राहिम का रसखान बनना, गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा और ब्रजभूमि के प्रति आत्म-समर्पण। चारों सवैयों का सप्रसंग भावार्थ एवं काव्य-सौंदर्य: प्रथम सवैया: 'मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन...' (अगले जन्म में मनुष्य, पशु, पक्षी या पत्थर बनने पर भी केवल ब्रजभूमि में ही रहने की कामना)। द्वितीय सवैया: 'या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं...' (कृष्ण की लाठी और कंबल पर तीनों लोकों का राज्य और आठों सिद्धियों-नौ निधियों को न्योछावर करना)। तृतीय सवैया: 'मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी...' (गोपी का कृष्ण-स्वांग रचना, किंतु मुरली को अपने अधरों पर न लगाने की सौतिया डाह)। चतुर्थ सवैया: 'काननि दै अँगुरी रहिबौ, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै...' (कृष्ण की मुरली की मादक धुन और मुस्कान के वशीकरण से विवश गोपी का आत्म-समर्पण)। JAC बोर्ड परीक्षापयोगी प्रश्न-उत्तर: NCERT अभ्यास के सभी प्रश्न, काव्य-सौंदर्य (भाव-पक्ष व कला-पक्ष) और भाषा-बोध।

तीनों लोकों का राजपाट ठुकराकर ब्रज की लाठी-कंबल पर कुर्बान: रसखान का अलौकिक कृष्ण-प्रेम

सोचिए यदि आपको ब्रह्मा जी वरदान दें कि आप अगले जन्म में जो चाहें बन सकते हैं—तो क्या आप किसी राजा का बेटा बनना चाहेंगे या स्वर्ग का देवदूत?

लेकिन दिल्ली के एक पठान सरदार सैयद इब्राहिम ने हाथ जोड़कर कहा: "हे ईश्वर! अगर मुझे मनुष्य बनाओ तो गोकुल का ग्वाला बनाना, अगर पशु बनाओ तो नंद की गाय बनाना, अगर पत्थर बनाओ तो गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनाना और अगर पक्षी बनाओ तो यमुना किनारे कदम्ब के पेड़ पर बसेरा देना!" इस अनन्य प्रेम का नाम है 'रसखान'—अर्थात् रस की साक्षात खान! आइए, रसखान के उन सवैयों में खो जाएँ जो 400 साल से भक्तों के दिलों में रस घोल रहे हैं!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

  1. सांप्रदायिक सीमाओं से परे विशुद्ध प्रेम का आदर्श: एक मुस्लिम कवि का भगवान श्रीकृष्ण और ब्रजभूमि के प्रति ऐसा निःस्वार्थ समर्पण भारतीय संस्कृति की साझी विरासत (गंगा-जमुनी संस्कृति) का सबसे देदीप्यमान उदाहरण है।
  2. सवैये छंद और ब्रजभाषा का माधुर्य: रसखान की ब्रजभाषा में ध्वनि-संगीत, अनुप्रास और यमक का ऐसा अद्भुत चमत्कार है जो विद्यार्थियों के काव्य-संस्कार को समृद्ध करता है।
  3. समर्पण और त्याग की पराकाष्ठा: भौतिक सुखों, सिद्धियों और स्वर्ग के वैभव पर ईश्वर के सान्निध्य और निष्काम प्रेम को वरीयता देने की सीख।
  4. JAC बोर्ड परीक्षा में पद्य खंड का प्रमुख अध्याय: रसखान के सवैयों की व्याख्या और काव्य-सौंदर्य पर 5 से 8 अंक के प्रश्न हर वर्ष पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • भक्तिकाल की सगुण कृष्ण-भक्ति शाखा (वल्लभ संप्रदाय, अष्टछाप) की सामान्य जानकारी।
  • सवैया छंद (वर्णिक छंद, 22 से 26 वर्णों का छंद) की लय और गेयता का बोध।
  • ब्रजभाषा की शब्दावली (लकुटी, कामरिया, कलिंद, कदंब, अधरान, गोधन) का अर्थ-ज्ञान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • रसखान के चारों सवैयों का सप्रसंग सटीक भावार्थ और निहितार्थ स्पष्ट कर पाना।
  • ब्रजभूमि से जुड़े प्रत्येक उपादान (ग्वाल, गाय, पत्थर, पक्षी, लाठी, कंबल) के प्रति रसखान के अनन्य लगाव की व्याख्या करना।
  • गोपी द्वारा कृष्ण का रूप धारण करने और मुरली को होंठों से न लगाने के पीछे की मनोवैज्ञानिक भावना को समझना।
  • अनुप्रास, यमक अलंकार और सवैया छंद के शिल्प-सौंदर्य का सटीक निरूपण करना।
  • JAC बोर्ड परीक्षा के प्रश्नों के मानक और सुरुचिपूर्ण उत्तर तैयार करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. कवि परिचय एवं रसखान का अनन्य कृष...
2 2. प्रथम सवैया: ब्रजभूमि के प्रति अ...
3 3. द्वितीय सवैया: लाठी-कंबल पर सर्व...
4 4. तृतीय सवैया: गोपी का कृष्ण-स्वां...
5 5. चतुर्थ सवैया: मुरली की मादक धुन...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. कवि परिचय एवं रसखान का अनन्य कृष्ण-प्रेम

रसखान (1548 - 1628):

कृष्ण-भक्त कवियों में रसखान का स्थान अनूठा है। उनका मूल नाम सैयद इब्राहिम था और वे दिल्ली के एक संपन्न पठान परिवार से संबंधित थे।

  • श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप-सौंदर्य पर मुग्ध होकर वे सब कुछ छोड़कर ब्रजभूमि आ गए।
  • वहाँ उन्होंने पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक वल्लभाचार्य के सुपुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ से विधिवत दीक्षा ली और अपना पूरा जीवन वृंदावन में कृष्ण-भक्ति में समर्पित कर दिया।
  • उनका उपनाम 'रसखान' सर्वथा सार्थक है, क्योंकि उनकी रचनाओं में भक्ति, प्रेम और माधुर्य का साक्षात रस बरसता है।
  • उनकी प्रमुख कृतियों में 'सुजान रसखान' और 'प्रेमवाटिका' अत्यंत विख्यात हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने उनकी निष्ठा पर मुग्ध होकर लिखा था:

    "इन मुसलमान जनन पर, कोटिन हिंदुन वारिए!"

2. प्रथम सवैया: ब्रजभूमि के प्रति अनन्य अनुराग

मूल सवैया:

मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो कियो छत्र पुरंदर धारन।
जौ खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन॥

विस्तृत भावार्थ:

रसखान ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि पुनर्जन्म में उन्हें चाहे जो भी रूप मिले, उनका संबंध केवल और केवल ब्रजभूमि से ही रहे:

  1. यदि मनुष्य बनें: तो वे गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच में बसना चाहते हैं, ताकि श्रीकृष्ण की सखा-मंडली का सान्निध्य मिल सके।
  2. यदि पशु बनें: (यद्यपि पशु बनने पर उनका अपना कोई वश नहीं होगा), फिर भी वे यही कामना करते हैं कि वे प्रतिदिन नंदबाबा की गायों के बीच चरने वाले पशु बनें, जिन्हें कान्हा अपने हाथों से चराते थे।
  3. यदि पत्थर (पाहन) बनें: तो वे उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनना चाहते हैं जिसे इंद्र के क्रोध (पुरंदर) से गोकुलवासियों को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका उँगली पर छाते की तरह धारण किया था।
  4. यदि पक्षी (खग) बनें: तो वे यमुना (कालिंदी) के तट पर स्थित कदंब के पेड़ों की डालियों पर बसेरा करना चाहते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण बैठकर मुरली बजाया करते थे।

3. द्वितीय सवैया: लाठी-कंबल पर सर्वस्व न्योछावर

मूल सवैया:

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवौ निधि के सुख, नंद की गाइ चराइ बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सौं, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक एक कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

विस्तृत भावार्थ:

रसखान श्रीकृष्ण से जुड़ी तुच्छ से तुच्छ वस्तु पर भी संसार के सर्वोच्च वैभव को न्योछावर करने को तत्पर हैं:

  1. लाठी और कंबल पर तीनों लोक: जिस छोटी लाठी (लकुटी) और काले कंबल (कामरिया) को लेकर कन्हैया गायें चराने जाते थे, उस पर वे तीनों लोकों (स्वर्ग, मर्त्य और पाताल) का राज-सिंहासन भी त्यागने को तैयार हैं।
  2. गायें चराने में सिद्धियों का त्याग: नंदबाबा की गायों को चराने का जो दिव्य सुख है, उसके आगे वे योग की आठों सिद्धियों और कुबेर की नौ निधियों के अलौकिक सुख को भी भूलने (बिसारने) को तैयार हैं।
  3. ब्रज के वन-बाग देखने की ललक: रसखान तड़पकर कहते हैं कि न जाने कब मुझे इन आँखों से ब्रज के वनों, सुंदर उपवनों और पवित्र सरोवरों (तड़ाग) को निहारने का सौभाग्य मिलेगा!
  4. करील के कुंजों पर सोने के महल: ब्रज की जिन कंटीली करील की झाड़ियों (कुंजन) में कान्हा ने रासलीलाएं रची थीं, उन कँटीली झाड़ियों पर वे करोड़ों सोने-चाँदी के महल (कलधौत के धाम) भी सहर्ष न्योछावर (वारने) को तैयार हैं।

4. तृतीय सवैया: गोपी का कृष्ण-स्वांग एवं मुरली से ईर्ष्या

मूल सवैया:

मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन, गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी॥
भावतो वोहि मेरो रसखानि, सो तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी॥

विस्तृत भावार्थ:

श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि वह कान्हा का सारा रूप धारण करने को तैयार है:

  1. कृष्ण का रूप धारण करना: वह अपने सिर पर मोर का पंख धारण करेगी, गले में गुंजा (जंगली बीजों) की माला पहनेगी, पीले वस्त्र (पीतांबर) ओढ़ेगी और हाथ में लाठी लेकर गायों और ग्वालों के साथ वन-वन घूमेगी।
  2. सखी के कहने पर स्वांग: क्योंकि वह रसमय कन्हैया मेरे मन को बहुत भाता है, इसलिए तेरे कहने पर मैं उसके सारे रूप (स्वांग) बना लूँगी।
  3. मुरली से सौतिया डाह (ईर्ष्या): किंतु उस 'मुरलीधर' (कृष्ण) के होंठों पर सजी रहने वाली उस बाँसुरी (मुरली) को मैं कभी अपने होंठों (अधरा) पर नहीं रखूँगी!
  • शिल्प-सौंदर्य: यहाँ 'अधरान धरी अधरा न धरौंगी' में अद्भुत यमक अलंकार है। गोपी मुरली को अपनी सौत मानती है, क्योंकि मुरली हमेशा कृष्ण के अधरों का अमृत पीती रहती है और कृष्ण को गोपियों से दूर रखती है।

5. चतुर्थ सवैया: मुरली की मादक धुन और गोपी की विवशता

मूल सवैया:

काननि दै अँगुरी रहिबौ, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।
मोहिनी ताननि सौं रसखानि, अटा चढ़ि गोधन गैहै पै गैहै॥
टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि, काल्हि कोऊ कितनो समुझैहै।
माइ री वा मुख की मुसकानि, सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै॥

विस्तृत भावार्थ:

कृष्ण की मुरली की जादूगरी और उनकी मोहिनी मुस्कान के सम्मोहन का गोपी पर जो प्रभाव पड़ता है, उसका सजीव चित्रण:

  1. कानों में उँगली देने का संकल्प: गोपी कहती है कि जब कृष्ण मंद-मंद मधुर स्वर में बाँसुरी बजाएँगे, तो मैं अपने कानों में उँगली डाल लूँगी ताकि वह मादक संगीत मुझ तक न पहुँचे। भले ही वे अट्टालिकाओं (अटा) पर चढ़कर मोहिनी तानों में 'गोधन' लोकगीत गाते रहें, गाते रहें!
  2. ब्रजवासियों को चेतावनी: मैं सारे ब्रजवासियों को पुकारकर (टेरकर) कहे देती हूँ कि कल को मुझे कोई कितना भी समझाए, मेरी कोई गलती नहीं होगी!
  3. मुस्कान के आगे विवशता: हे माँ! उस कन्हैया के मुख की मोहिनी मुस्कान इतनी जादुई और प्राणलेवा है कि उसे देखकर मैं अपने आपको तनिक भी संभाल नहीं पाऊँगी, नहीं पाऊँगी, नहीं पाऊँगी! (उसकी एक मुस्कान देखते ही मेरा सारा लोक-लाज और कुल की मर्यादा का बंधन टूट जाएगा और मैं पूर्णतः उसकी हो जाऊँगी!)

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

रसखान का परिचय एवं रचनाएं
मूल नाम: सैयद इब्राहिम; गुरु: गोस्वामी विट्ठलनाथ; रचनाएं: 'सुजान रसखान' और 'प्रेमवाटिका'; विधा: सवैया छंद (ब्रजभाषा)।
चारों सवैयों का मूल भाव
  1. ब्रजभूमि के प्रति अनन्य प्रेम (ग्वाल, गाय, पाहन, खग)। 2. कृष्ण-उपादानों पर सर्वस्व त्याग (लकुटी-कामरिया)। 3. कृष्ण-स्वांग एवं मुरली से ईर्ष्या। 4. मुरली-धुन व मुख-मुस्कान के आगे गोपी की विवशता।
प्रमुख अलंकार एवं भाषा सौंदर्य
अनुप्रास अलंकार ('कालिंदी कूल कदंब की डारन' में 'क' की आवृत्ति); यमक अलंकार ('अधरान धरी अधरा न धरौंगी'); रस: शृंगार एवं भक्ति रस; माधुर्य गुण।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
ब्रजभूमि के प्रति कवि रसखान का प्रेम किन-किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है? (NCERT अभ्यास प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: कवि रसखान का ब्रजभूमि के प्रति अनन्य और निःस्वार्थ प्रेम उनके प्रथम सवैये में निम्नलिखित चार रूपों में साकार हुआ है:

  1. मनुष्य रूप में: यदि उन्हें अगले जन्म में मनुष्य का जीवन मिले, तो वे गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच जन्म लेकर श्रीकृष्ण के सखाओं के साथ रहना चाहते हैं।
  2. पशु रूप में: यदि पशु का जन्म मिले, तो वे नंदबाबा की गायों के बीच चरना चाहते हैं जिन्हें कन्हैया चराया करते थे।
  3. पत्थर (पाहन) रूप में: यदि निर्जीव पत्थर बनें, तो वे उसी गोवर्धन पर्वत का अंग बनना चाहते हैं जिसे कृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से गोकुल की रक्षा के लिए अपनी उँगली पर उठाया था।
  4. पक्षी रूप में: यदि पक्षी का रूप मिले, तो वे यमुना किनारे स्थित कदंब के पेड़ों की डालियों पर बसेरा करना चाहते हैं जहाँ बैठकर कान्हा मुरली बजाते थे। इस प्रकार रसखान हर जन्म में, हर परिस्थिति में केवल ब्रजभूमि में ही श्रीकृष्ण का सान्निध्य पाना चाहते हैं।
उदाहरण 2
रसखान कृष्ण की लाठी और कंबल पर तीनों लोकों का राज्य क्यों न्योछावर करना चाहते हैं? (JAC Board High-Yield Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: रसखान कृष्ण की लाठी (लकुटी) और काले कंबल (कामरिया) पर तीनों लोकों का राज्य इसलिए न्योछावर करना चाहते हैं क्योंकि:

  1. परम पावन सानिध्य: वह साधारण लाठी और कंबल नहीं हैं, बल्कि वे साक्षात परब्रह्म श्रीकृष्ण के हाथों और कंधों से स्पर्श की गई पावन वस्तुएं हैं जिन्हें लेकर कन्हैया नंगे पाँव वन-वन गायें चराते थे।
  2. भौतिक सुखों की तुच्छता: रसखान के लिए संसार का कोई भी राज-पाट, स्वर्ग का सुख, आठों सिद्धियाँ या कुबेर की नौ निधियाँ भगवान के उस निष्काम प्रेम और सान्निध्य के आगे तिनके के समान तुच्छ हैं। कृष्ण-प्रेम ही उनका एकमात्र और सर्वोच्च जीवन-ध्येय है।
उदाहरण 3
सखी ने गोपी से कृष्ण का कैसा रूप धारण करने का आग्रह किया था? अपने शब्दों में लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: सखी ने गोपी से भगवान श्रीकृष्ण का वही मनमोहक रूप धारण करने का आग्रह किया था जो वे वन में गायें चराते समय धारण करते थे:

  1. सिर पर मोरपंखों का मुकुट धारण करना।
  2. गले में गूँज (जंगली बीजों) की मनमोहक माला पहनना।
  3. शरीर पर पीतांबर (पीले रेशमी वस्त्र) ओढ़ना।
  4. हाथ में छोटी लाठी लेकर गायों और ग्वालों के साथ वन-वन विचरण करना। गोपी यह सारा रूप धारण करने को सहर्ष तैयार हो जाती है, किंतु कृष्ण की बाँसुरी को अपने होंठों से लगाने से मना कर देती है क्योंकि वह बाँसुरी को अपनी सौत मानती है।
उदाहरण 4
'कालिंदी कूल कदंब की डारन' और 'अधरान धरी अधरा न धरौंगी' पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है? स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. 'कालिंदी कूल कदंब की डारन':
    • यहाँ 'क' वर्ण की क्रमिक आवृत्ति (कालिंदी, कूल, कदंब) हुई है, अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार (छेकानुप्रास/वृत्त्यानुप्रास) है। इससे भाषा में अत्यंत संगीतात्मक माधुर्य उत्पन्न हुआ है।
  2. 'अधरान धरी अधरा न धरौंगी':
    • यहाँ 'अधरान' (अधरों पर / होंठों पर) और 'अधरा न' (होंठों पर नहीं) शब्दों का चमत्कारपूर्ण प्रयोग हुआ है। दोनों स्थानों पर शब्द-समूह समान जैसा है, किंतु अर्थ भिन्न है:
      • प्रथम 'अधरान' = कृष्ण के होंठों पर रखी हुई।
      • द्वितीय 'अधरा न' = मैं अपने होंठों पर नहीं रखूँगी।
    • अतः यहाँ अत्यंत सुंदर यमक अलंकार है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

रसखान को केवल हिंदू कवि समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था; वे मुस्लिम पठान होते हुए भी भगवान कृष्ण के अनन्य और निष्काम भक्त बने।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गोपी द्वारा मुरली को होंठों पर न लगाने का कारण घृणा समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

गोपी मुरली से घृणा नहीं करती, बल्कि वह मुरली को अपनी 'सौत' मानती है जो हमेशा कृष्ण के अधरों से सटी रहकर उन्हें गोपियों से दूर रखती है (सौतिया डाह)।

रसखान के सवैये: अनन्य कृष्ण-प्रेम, ब्रज-अनुराग एवं माधुर्य सौंदर्य

ब्रजभूमि के प्रति अनुराग • मानुष = गोकुल का ग्वाला • पशु = नंदबाबा की धेनु • पाहन = गोवर्धन का पत्थर • खग = कालिंदी कूल कदंब • हर जन्म में केवल ब्रज का वास अनन्य आत्म-समर्पण लाठी-कंबल पर सर्वस्व त्याग 1. लकुटी और कामरिया: • तीनों लोकों का राज्य त्यागना। 2. नंद की गायें चराना: • 8 सिद्धियाँ और 9 निधियाँ बिसारना। 3. करील के कँटीले कुंज: • करोड़ों स्वर्ण महलों का न्योछावर। भक्ति के आगे वैभव तुच्छ स्वांग & मुरली की मोहिनी • मोरपंख, पीतांबर, लाठी • सखी के कहने पर सब स्वांग • मुरली से सौतिया डाह: "अधरान धरी अधरा न धरौंगी" • कृष्ण की मोहिनी मुस्कान: "सम्हारी न जैहै, न जैहै!" प्रेम में पूर्ण विवशता

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था; वे गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य और अनन्य कृष्ण-भक्त थे।
मुख्य बिंदु 2
प्रथम सवैये में रसखान ने अगले जन्म में मनुष्य, पशु, पत्थर या पक्षी बनने पर भी केवल ब्रजभूमि में ही रहने की प्रार्थना की है।
मुख्य बिंदु 3
वे गोकुल के ग्वालों, नंद की गायों, गोवर्धन पर्वत और यमुना के कदंब वृक्षों से अपना अटूट संबंध बनाए रखना चाहते हैं।
मुख्य बिंदु 4
द्वितीय सवैये में कृष्ण की लाठी और कंबल पर तीनों लोकों के राज्य और आठों सिद्धियों व नौ निधियों को न्योछावर करने का भाव है।
मुख्य बिंदु 5
वे ब्रज के करील कुंजों के सान्निध्य के लिए करोड़ों सोने-चाँदी के महलों को भी तुच्छ मानते हैं।
मुख्य बिंदु 6
तृतीय सवैये में गोपी कृष्ण का मोरमुकुट, पीतांबर और लाठी धारण करने को तैयार है, पर मुरली को होंठों से लगाने से मना करती है।
मुख्य बिंदु 7
गोपी मुरली को अपनी सौत मानती है जो हमेशा कृष्ण के अधरों का रसपान करती रहती है।
मुख्य बिंदु 8
चतुर्थ सवैये में कृष्ण की मुरली की मादक धुन और उनकी प्राणलेवा मुस्कान के सामने गोपी अपनी विवशता प्रकट करती है।
मुख्य बिंदु 9
गोपी कहती है कि कान्हा की मुस्कान देखकर कोई भी ब्रजवासी अपने आपको संभाल नहीं सकता और सुध-बुध खो बैठता है।
मुख्य बिंदु 10
रसखान की भाषा अत्यंत मधुर, कोमलकांत ब्रजभाषा है जिसमें सवैया छंद, अनुप्रास और यमक का अप्रतिम सौंदर्य है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
रसखान का मूल नाम क्या था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था।


2
रसखान पत्थर बनने पर किस पर्वत का अंग बनना चाहते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

रसखान पत्थर बनने पर गोवर्धन पर्वत का अंग बनना चाहते हैं जिसे कृष्ण ने अपनी उँगली पर उठाया था।


3
गोपी कृष्ण का सारा स्वांग रचने पर भी क्या करने से मना करती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

गोपी कृष्ण की मुरली को अपने होंठों (अधरों) पर रखने से मना करती है।


4
'कालिंदी कूल कदंब की डारन' में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

यहाँ 'क' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।


अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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