साखी 4:
पखापखी के कारनै, सब जग रहा भुलान।
निरपख होइ कै हरि भजै, सोई संत सुजान॥
- शब्दार्थ: पखापखी = पक्ष-विपक्ष, मत-मतांतरों का विवाद; कारनै = कारण; भुलान = भुलावे में पड़ा हुआ; निरपख = निष्पक्ष; सुजान = चतुर, ज्ञानी संत।
- भावार्थ: कबीर कहते हैं कि यह सारा संसार 'मेरा धर्म श्रेष्ठ है, तेरा धर्म निकृष्ट' जैसे पक्ष-विपक्ष के व्यर्थ विवाद में पड़कर अपने वास्तविक परमात्मा को भूल गया है। कबीर के अनुसार वही सच्चा और ज्ञानी संत है जो इन सांप्रदायिक झगड़ों से ऊपर उठकर निष्पक्ष भाव से ईश्वर का भजन करता है।
साखी 5:
हिंदू मूआ राम कहि, मुसलिम कहि रहिमान।
कहै कबीर सो जीवता, जो दुहुँ के निकटि न जाइ॥
- शब्दार्थ: मूआ = मर गया, नष्ट हो गया; निकटि न जाइ = दोनों के संकीर्ण भेदभाव में नहीं पड़ता।
- भावार्थ: हिंदू जीवन भर 'राम-राम' रटते हुए और मुसलमान 'रहमान' कहते हुए आपस में लड़-लड़कर मर मिटे, पर दोनों में से किसी को ईश्वर का मर्म प्राप्त नहीं हुआ। कबीर कहते हैं कि वास्तव में वही व्यक्ति जीवित (आत्म-ज्ञानी) है जो राम और रहीम के इस सांप्रदायिक भेद के प्रपंच में नहीं पड़ता और दोनों में एक ही परम तत्व को देखता है।
साखी 6:
काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम।
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम॥
- शब्दार्थ: काबा = मुसलमानों का पवित्र तीर्थ; कासी = हिंदुओं का पवित्र तीर्थ; मोट चून = मोटा आटा (अखाद्य); मैदा = बारीक पिसा आटा; जीम = भोजन करना, तृप्त होना।
- भावार्थ: जब कबीर के मन से संकीर्ण धार्मिक भेदभाव मिट गया, तो मुसलमानों का काबा ही उनके लिए काशी बन गया और राम ही रहीम हो गए! जिस प्रकार मोटे आटे को बारीक पीस देने पर वह मैदा बन जाता है और खाने योग्य हो जाता है, उसी प्रकार भेदभाव का अखाद्य रूप जब समाप्त हुआ तो कबीर आराम से उस भक्ति रस का भोग कर रहे हैं।
साखी 7:
ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होइ।
सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदा सोइ॥
- शब्दार्थ: जनमिया = जन्म लेने वाला; करनी = कर्म, आचरण; सुबरन = स्वर्ण, सोना; कलस = घड़ा; सुरा = मदिरा, शराब।
- भावार्थ: कबीर कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति का कर्म श्रेष्ठ नहीं है, तो केवल उच्च कुल में जन्म लेने से वह महान नहीं बन सकता। उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि यदि सोने के घड़े में शराब भरी हो, तो भी साधु और सज्जन लोग उसकी निंदा ही करते हैं। मनुष्य की पहचान उसके जन्म या जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्मों की पवित्रता से होती है।