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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 3
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Upabhoktawad Ki Sanskrti

'उपभोक्तावाद की संस्कृति' प्रख्यात समाजशास्त्री और निबंधकार डॉ. श्यामाचरण दुबे का एक अत्यंत विचारोत्तेजक और समसामयिक सांस्कृतिक-आलोचनात्मक निबंध है। इस निबंध में लेखक ने आधुनिक पूंजीवादी बाजार, विज्ञापनों के सम्मोहन और उपभोक्तावादी मानसिकता के खतरों का गहन समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि आज हमारा समाज 'उपभोग ही सुख है' के भ्रमजाल में फँस चुका है। हम विज्ञापनों की चकाचौंध में आकर गुणवत्ता देखे बिना केवल दिखावे और प्रतिष्ठा के लिए वस्तुएँ खरीद रहे हैं। टूथपेस्ट, साबुन, परफ्यूम, घड़ियाँ, संगीत सिस्टम और पाँच सितारा संस्कृति ने हमारी पारंपरिक सादगी, मर्यादा और सामाजिक सरोकारों को नष्ट कर दिया है। इस विस्तृत अध्ययन सामग्री में JAC बोर्ड कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित प्रमुख बिंदु शामिल हैं: लेखक परिचय एवं वैचारिक पृष्ठभूमि: डॉ. श्यामाचरण दुबे का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण और आधुनिकता की अंधी नकल पर प्रहार। उपभोक्तावाद का अर्थ एवं लक्षण: विज्ञापनों की सम्मोहन शक्ति, उपभोग का दर्शन, झूठी प्रतिष्ठा की होड़ और पाँच सितारा संस्कृति। सामाजिक दुष्प्रभाव: सांस्कृतिक अस्मिता का ह्रास, सीमित संसाधनों की बर्बादी, सामाजिक दूरी और मर्यादाओं का टूटना। गांधीवादी समाधान: गांधीजी का दृष्टिकोण—"हम सबके लिए अपने दरवाजे-खिड़कियां खुली रखें, लेकिन अपनी बुनियादी संस्कृति पर अडिग रहें।" JAC बोर्ड परीक्षापयोगी प्रश्न-उत्तर: NCERT अभ्यास के सभी प्रश्न, वैचारिक विश्लेषण और मूल्यपरक प्रश्न।

विज्ञापनों का मायाजाल और दिखावे की अंधी दौड़: क्या हम सामान के गुलाम बन रहे हैं?

क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप टीवी या मोबाइल पर विज्ञापन देखते हैं, तो किसी टूथपेस्ट में 'ऋषियों-मुनियों के दुर्लभ जड़ी-बूटियों का सार' बताया जाता है, किसी साबुन से 'सौंदर्य की रानी' बनने का दावा किया जाता है और केवल समय देखने के लिए पचास हजार से पाँच लाख की घड़ी खरीदना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाता है! क्या वास्तव में वस्तुएँ हमारे उपयोग के लिए हैं या हम वस्तुओं के गुलाम होते जा रहे हैं? डॉ. श्यामाचरण दुबे का यह निबंध हमें आईना दिखाता है कि कैसे बाजार की चमक-दमक हमारी सोच, संस्कृति और मानवीय रिश्तों को निगल रही है। यह पाठ हमें उपभोक्ता नहीं, बल्कि विवेकशील इंसान बनने की सीख देता है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

  1. आत्म-जागरूकता और बौद्धिक सतर्कता: यह निबंध विद्यार्थियों को विज्ञापनों के मनोवैज्ञानिक जाल को समझने और अंधाधुंध फिजूलखर्ची से बचने का विवेक प्रदान करता है।
  2. सांस्कृतिक अस्मिता का संरक्षण: पश्चिमी संस्कृति की अंधी नकल से अपनी भारतीय परंपराओं, सादगी और पर्यावरण-मित्र जीवनशैली की रक्षा करने की प्रेरणा।
  3. सामाजिक समानता का संदेश: अमीरी-गरीबी के बढ़ते दिखावे और सामाजिक दूरी को पाटने हेतु सादगीपूर्ण जीवन मूल्यों का महत्व।
  4. JAC बोर्ड परीक्षा में वैचारिक निबंध प्रश्न: कक्षा 9 हिंदी परीक्षा में निबंधात्मक और विश्लेषणात्मक प्रश्नों में इस पाठ से 5 से 8 अंक के प्रश्न निश्चित रूप से पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • निबंध विधा और समाजशास्त्रीय शब्दावली (उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक अस्मिता, प्रतिष्ठा, सम्मोहन) की समझ।
  • बाजार व्यवस्था, विज्ञापन उद्योग और आधुनिक जनसंचार माध्यमों के प्रभाव का बुनियादी ज्ञान।
  • महात्मा गांधी के ग्राम-स्वराज्य और सादगीपूर्ण जीवन दर्शन से परिचय।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • उपभोक्तावाद की संस्कृति के मूल कारणों और लक्षणों को स्पष्ट रूप से समझ पाना।
  • विज्ञापनों के सम्मोहन और अंधानुकरण के सामाजिक-आर्थिक परिणामों की समीक्षा करना।
  • सांस्कृतिक अस्मिता, प्रतिष्ठा का भ्रम और संसाधनों के अपव्यय पर तार्किक विचार प्रस्तुत करना।
  • गांधीजी की चेतावनी के संदर्भ में वर्तमान विकास मॉडल का आलोचनात्मक मूल्यांकन करना।
  • JAC बोर्ड परीक्षा के प्रश्नों के मानक और प्रभावशाली उत्तर तैयार करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. लेखक परिचय एवं निबंध का वैचारिक...
2 2. विज्ञापनों का सम्मोहन और 'उपभोग...
3 3. पाँच सितारा संस्कृति और 'दिखावे...
4 4. सामाजिक परिणाम: सांस्कृतिक अस्मि...
5 5. गांधीवादी चेतावनी और उज्ज्वल भवि...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. लेखक परिचय एवं निबंध का वैचारिक धरातल

डॉ. श्यामाचरण दुबे (1922 - 1996)

भारत के जाने-माने समाजशास्त्री, मानवविज्ञानी और कुशल निबंधकार डॉ. श्यामाचरण दुबे का जन्म मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में हुआ था। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से मानव-विज्ञान में पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने भारत के जनजातीय और ग्रामीण जीवन पर अनेक प्रामाणिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें 'मानव और संस्कृति', 'परंपरा और इतिहासबोध', 'संस्कृति तथा शिक्षा' और 'समय और संस्कृति' अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

निबंध का मुख्य सरोकार:

श्यामाचरण दुबे जी ने इस निबंध में स्पष्ट किया है कि भारत जैसे विकासशील देश में पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति का अंधानुकरण विनाशकारी सिद्ध होगा। हम आधुनिकता के झूठे प्रतिमान अपना रहे हैं, जहाँ प्रतिष्ठा केवल धन के प्रदर्शन में मानी जाने लगी है। यह संस्कृति न केवल हमारी सामाजिक संरचना को खोखला कर रही है, बल्कि हमारे सीमित प्राकृतिक संसाधनों का भी भीषण अपव्यय कर रही है।

2. विज्ञापनों का सम्मोहन और 'उपभोग ही सुख' का भ्रम

बदलती जीवनशैली और उपभोग का नया दर्शन:

आज हमारी पूरी जीवनशैली बदल चुकी है। चारों ओर उत्पादन बढ़ाने पर जोर है और यह प्रचारित किया जा रहा है कि यह सब 'आपके भोग और आपके सुख के लिए' है। सुख की परिभाषा ही बदल गई है:

  • पहले सुख का अर्थ आत्मिक शांति, संतोष और स्वास्थ्य माना जाता था।
  • आज सुख का अर्थ केवल "उपभोग भोगना" बन गया है! अर्थात् जितनी अधिक वस्तुएँ आप खरीदेंगे और इस्तेमाल करेंगे, आप उतने ही सुखी कहलाएँगे।

विज्ञापनों का मनोवैज्ञानिक मायाजाल:

लेखक ने दैनिक जीवन की वस्तुओं के उदाहरण देकर इस दिखावे का सजीव चित्रण किया है:

  1. टूथपेस्ट का बाजार: एक टूथपेस्ट आपके दाँतों को मोतियों जैसा चमकाता है, दूसरा मसूड़ों को मजबूत करता है, तीसरा मुँह की दुर्गंध मिटाता है और चौथे में 'बबूल या नीम' के औषधीय गुण हैं! यहाँ तक कि कोई ऋषि-मुनियों का बनाया बताया जाता है। टूथपेस्ट के साथ उसी रंग और आकार का टूथब्रश भी चाहिए!
  2. साबुन और सौंदर्य प्रसाधन: किसी साबुन में गंगाजल मिला है, किसी में कस्तूरी, तो कोई प्रसिद्ध अभिनेत्रियों की खूबसूरती का राज है! चमत्कारी तेल, आफ्टरशेव लोशन और इत्र का इतना अंबार है कि महिलाएँ और पुरुष ड्रेसिंग टेबल पर हजारों-लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं।
  3. परिधान और फैशन: हर मौसम में नए फैशन के कपड़े आ रहे हैं। जो कपड़े पिछले साल पहने थे, उन्हें पहनना अब शर्मनाक माना जाता है। पाँच हजार की घड़ी के स्थान पर डेढ़ लाख की घड़ी बांधना केवल समय देखने के लिए नहीं, बल्कि समाज में अपनी 'हैसियत' जताने के लिए आवश्यक हो गया है।

3. पाँच सितारा संस्कृति और 'दिखावे की प्रतिष्ठा'

पाँच सितारा संस्कृति का प्रसार:

लेखक लिखते हैं कि उपभोक्तावाद केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह सेवाओं और सामाजिक जीवन में भी गहराई तक पैठ चुका है:

  • पाँच सितारा होटल: पहले भोजन घर में होता था, फिर विशेष अवसरों पर होटल आए, और अब पाँच सितारा होटलों में शादियाँ और पार्टियाँ करना प्रतिष्ठा बन गया है।
  • पाँच सितारा अस्पताल: इलाज के साथ-साथ सुख-सुविधाओं और ठाठ-बाट के लिए मरीज लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं।
  • पाँच सितारा पब्लिक स्कूल: शिक्षा की गुणवत्ता से अधिक स्कूल की भव्य इमारत और आधुनिक सुख-सुविधाओं पर ध्यान दिया जा रहा है।
  • अमेरिका और यूरोप की चरम विकृति: लेखक एक चौंकाने वाला उदाहरण देते हैं कि अमेरिका में तो लोग अपने मरने से पहले ही अपनी कब्र की व्यवस्था लाखों डॉलर देकर तय कर रहे हैं—जहाँ उनकी कब्र पर हमेशा हरी घास, फव्वारे और मधुर संगीत बजता रहेगा! भारत में भी कल यह दृश्य देखने को मिल सकता है।

4. सामाजिक परिणाम: सांस्कृतिक अस्मिता और संसाधनों का विनाश

उपभोक्तावाद के गंभीर दुष्परिणाम:

  1. सांस्कृतिक अस्मिता का क्षरण: हमारी अपनी सांस्कृतिक पहचान, त्यौहार, आत्मीयता और पड़ोस-संस्कृति समाप्त हो रही है। हम पश्चिमी अंधानुकरण में अपनी जड़ें खोते जा रहे हैं।
  2. सीमित संसाधनों का भारी अपव्यय: जिस देश में करोड़ों लोगों को शुद्ध पेयजल, भरपेट भोजन और बुनियादी दवाइयाँ नहीं मिल पातीं, वहाँ परफ्यूम, लग्जरी कारों और दिखावे की वस्तुओं पर अरबों रुपये व्यर्थ बहाए जा रहे हैं।
  3. सामाजिक विषमता और असंतोष: एक ओर संपन्न वर्ग का पाँच सितारा विलासिता भरा जीवन है, तो दूसरी ओर गरीब जनता विज्ञापनों में इन चीजों को देखकर ललचाई आँखों से घूरती है। इससे समाज में ईर्ष्या, तनाव और अशांति बढ़ रही है।
  4. नैतिक मर्यादाओं का पतन: स्वार्थ परमार्थ पर हावी हो गया है। व्यक्तिवाद बढ़ रहा है और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना समाप्त हो रही है।

5. गांधीवादी चेतावनी और उज्ज्वल भविष्य का मार्ग

गांधीजी का दूरदर्शी दृष्टिकोण:

निबंध के अंत में डॉ. श्यामाचरण दुबे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की उस ऐतिहासिक चेतावनी का स्मरण कराते हैं जो उन्होंने भारतीय संस्कृति के संदर्भ में कही थी:

"हम अपने दरवाजे और खिड़कियाँ खुली रखें ताकि बाहर की ताजी और स्वस्थ हवा अंदर आ सके, लेकिन हमें अपनी बुनियाद पर मजबूती से कायम रहना चाहिए।"

हमारा कर्तव्य:

  • उपभोक्तावादी संस्कृति हमारी बुनियाद को ही हिला रही है। यह हमारे भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा खतरा और गंभीर चुनौती है।
  • हमें वस्तुओं के उपयोग में विवेक और संतुलन बरतना होगा।
  • विकास का पैमाना विलासिता नहीं, बल्कि जन-कल्याण, पर्यावरण संतुलन और मानवीय मूल्यों की रक्षा होना चाहिए।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

उपभोक्तावाद का मूल मंत्र
उपभोग ही सुख है (उत्पादन और विलासिता को ही जीवन का एकमात्र ध्येय मान लेना)।
उपभोक्तावादी संस्कृति के 4 दुष्प्रभाव
  1. सांस्कृतिक अस्मिता का क्षरण। 2. संसाधनों का अपव्यय। 3. सामाजिक विषमता व अशांति। 4. नैतिक मूल्यों और मर्यादाओं का ह्रास।
गांधीजी का अमर सूत्र
खिड़कियाँ-दरवाजे खुले रखें, लेकिन अपनी सांस्कृतिक बुनियाद पर दृढ़ रहें।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
लेखक के अनुसार 'जीवन में सुख' से क्या अभिप्राय है? (NCERT अभ्यास प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: लेखक के अनुसार आज के उपभोक्तावादी युग में 'सुख' की परिभाषा पूरी तरह विकृत हो चुकी है:

  1. प्राचीन व वास्तविक अवधारणा: पारंपरिक रूप से सुख का अभिप्राय आत्मिक संतोष, शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और दूसरों के साथ प्रेमपूर्ण सहजीवन से था।
  2. वर्तमान उपभोक्तावादी अवधारणा: आज केवल विभिन्न सुख-सुविधाओं, आधुनिक गैजेट्स और भौतिक वस्तुओं के अंधाधुंध उपभोग को ही सुख मान लिया गया है। लोग सोचते हैं कि जितना अधिक बाजार से सामान खरीदेंगे और विलासिता में जिएंगे, वे उतने ही सुखी होंगे।
  3. लेखक का निष्कर्ष: वास्तव में यह उपभोग का सुख नहीं है, बल्कि व्यक्ति धीरे-धीरे इन भौतिक वस्तुओं का गुलाम बनता जा रहा है और उसका सच्चा मानसिक सुख छिनता जा रहा है।
उदाहरण 2
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? (JAC Board परीक्षा प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को निम्नलिखित रूपों में गहराई से प्रभावित कर रही है:

  1. दिखावे की प्रवृत्ति का वर्चस्व: लोग अपनी वास्तविक आवश्यकता और जेब को देखे बिना समाज में झूठी प्रतिष्ठा और हैसियत दिखाने के लिए महँगे मोबाइल, गाड़ियाँ और ब्रांडेड कपड़े खरीद रहे हैं।
  2. विज्ञापनों की दासता: हमारी पसंद-नापसंद अब हमारी अपनी नहीं रही; टीवी और इंटरनेट के विज्ञापनों द्वारा हमारी मानसिकता को नियंत्रित किया जा रहा है।
  3. सामाजिक संबंधों में दूरी: परिवार और समाज में आत्मीयता कम हो रही है। लोग एक-दूसरे को मानवीय गुणों से नहीं, बल्कि उनके पास मौजूद भौतिक वस्तुओं और बैंक बैलेंस से तौलते हैं।
  4. असंतोष और मानसिक तनाव: बाजार की अनंत लालसा कभी तृप्त नहीं होती, जिससे लोगों में निरंतर तनाव, ईर्ष्या और असंतोष बढ़ रहा है।
उदाहरण 3
लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए 'खतरा' क्यों कहा है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को समाज के लिए गंभीर खतरा इसलिए कहा है क्योंकि:

  1. सांस्कृतिक पतन: यह हमारी प्राचीन मर्यादाओं, सादगी और आध्यात्मिक मूल्यों को नष्ट कर रही है और हमें केवल स्वार्थी उपभोक्ता बना रही है।
  2. सामाजिक अशांति: संपन्न वर्ग के विलासी प्रदर्शन को देखकर अभावग्रस्त वर्ग में हीनभावना और आक्रोश जन्म लेता है, जिससे समाज में अपराध और विद्रोह की भावना पनपती है।
  3. संसाधनों की अंधी बर्बादी: पानी, ऊर्जा और कच्चे माल का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, जिससे भावी पीढ़ी के लिए गंभीर पर्यावरणीय संकट खड़ा हो रहा है। अतः गांधीजी के अनुसार यह हमारी बुनियादी नींव को खोखला करने वाला खतरा है।
उदाहरण 4
कोई वस्तु हमारे लिए उपयोगी हो या न हो, लेकिन टीवी पर विज्ञापन देखकर हम उसे खरीदने के लिए लालायित क्यों होते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: विज्ञापन कंपनियों द्वारा अपनाए गए मनोवैज्ञानिक सम्मोहन के कारण हम वस्तुओं की ओर आकर्षित होते हैं:

  1. दृश्य और संगीत का सम्मोहन: विज्ञापनों में आकर्षक दृश्य, मनमोहक संगीत और प्रभावशाली नारों (Slogans) का प्रयोग कर हमारे अवचेतन मन को प्रभावित किया जाता है।
  2. सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट: जब हमारे पसंदीदा फिल्मी सितारे या क्रिकेटर किसी वस्तु का प्रचार करते हैं, तो हम अंधविश्वास में मान लेते हैं कि वह वस्तु श्रेष्ठ ही होगी।
  3. झूठी हीनभावना जगाना: विज्ञापन यह अहसास कराते हैं कि यदि आपके पास यह विशेष वस्तु नहीं है, तो आप आधुनिक नहीं हैं और समाज में पीछे छूट गए हैं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

उपभोक्तावाद को केवल खरीदारी या व्यापार समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उपभोक्तावाद केवल व्यापार नहीं, बल्कि एक पूरी जीवन-दृष्टि और मानसिकता है जिसमें उपभोग और भौतिक सुख को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मान लिया जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मान लेना कि लेखक सभी आधुनिक तकनीकों और विकास का विरोधी है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लेखक तकनीक या विकास का विरोधी नहीं है; वह केवल अंधानुकरण, दिखावे की प्रवृत्ति और संसाधनों के निरर्थक अपव्यय का विरोध करता है।

उपभोक्तावाद की संस्कृति: विज्ञापनों का सम्मोहन एवं सामाजिक संकट

विज्ञापनों का सम्मोहन • 'उपभोग ही सुख है' का भ्रम • टूथपेस्ट, साबुन, सौंदर्य प्रसाधन • महँगी घड़ियाँ और फैशन • पाँच सितारा संस्कृति (होटल, अस्पताल, स्कूल व कब्रगाह) • झूठी प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ बाजार का मानसिक नियंत्रण गंभीर सामाजिक दुष्परिणाम 1. सांस्कृतिक अस्मिता का क्षरण: • पश्चिमी आधुनिकता का अंधानुकरण। 2. संसाधनों का भीषण अपव्यय: • विलासिता पर राष्ट्रीय धन की बर्बादी। 3. सामाजिक विषमता & तनाव: • अमीर-गरीब में बढ़ती खाई व ईर्ष्या। सामाजिक ताने-बाने का विखंडन गांधीवादी समाधान • सांस्कृतिक स्वावलंबन • "दरवाजे-खिड़कियां खुली रखें, पर अपनी नींव पर मजबूती से कायम रहें।" • सादगी और पर्यावरण संतुलन • विवेकशील उपभोक्ता बनना सच्ची प्रगति और आत्म-सम्मान

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
डॉ. श्यामाचरण दुबे ने आधुनिक समाज में तेजी से फैल रही उपभोक्तावादी संस्कृति के खतरों का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया है।
मुख्य बिंदु 2
आज हमारे समाज में उपभोग और विलासिता को ही सुख का पर्याय मान लिया गया है।
मुख्य बिंदु 3
विज्ञापनों के सम्मोहन जाल में फँसकर लोग गुणवत्ता की अनदेखी कर केवल दिखावे और ब्रांड के पीछे भाग रहे हैं।
मुख्य बिंदु 4
दैनिक उपयोग की वस्तुओं जैसे टूथपेस्ट, साबुन, परफ्यूम और घड़ियों में प्रतिष्ठा का झूठा प्रदर्शन देखा जा सकता है।
मुख्य बिंदु 5
होटल, अस्पताल, स्कूल और यहाँ तक कि पश्चिम में कब्रगाहों तक में पाँच सितारा संस्कृति का वर्चस्व स्थापित हो चुका है।
मुख्य बिंदु 6
उपभोक्तावाद के कारण हमारी पारंपरिक सांस्कृतिक अस्मिता नष्ट हो रही है और हम पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण के शिकार हो रहे हैं।
मुख्य बिंदु 7
इस दिखावे की संस्कृति से देश के सीमित प्राकृतिक और आर्थिक संसाधनों का भारी अपव्यय हो रहा है।
मुख्य बिंदु 8
अमीरों की विलासिता और गरीबों के अभाव से समाज में ईर्ष्या, तनाव और अशांति बढ़ रही है।
मुख्य बिंदु 9
गांधीजी ने चेतावनी दी थी कि हमें बाहरी संस्कृतियों के अच्छे तत्वों को अपनाना चाहिए, किंतु अपनी सांस्कृतिक बुनियाद को नहीं छोड़ना चाहिए।
मुख्य बिंदु 10
पाठ का संदेश है कि हमें वस्तुओं के उपयोग में संयम और विवेक बरतना चाहिए ताकि मानवीय मूल्य सुरक्षित रह सकें।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
उपभोक्तावाद की संस्कृति निबंध के लेखक कौन हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

इस निबंध के लेखक प्रसिद्ध समाजशास्त्री डॉ. श्यामाचरण दुबे हैं।


2
आज के युग में 'सुख' की क्या नई परिभाषा बन गई है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

आज केवल भौतिक वस्तुओं और विलासिता के 'उपभोग को भोगना' ही सुख मान लिया गया है।


3
लेखक ने किस संस्कृति को भारतीय समाज के लिए गंभीर चुनौती कहा है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

लेखक ने दिखावे और भौतिकता पर आधारित उपभोक्तावादी संस्कृति को भारतीय समाज के लिए गंभीर चुनौती कहा है।


4
गांधीजी ने अपनी संस्कृति के संरक्षण के लिए कौन-सी उपमा दी थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

गांधीजी ने कहा था कि हमें घर की खिड़कियाँ और दरवाजे खुले रखने चाहिए ताकि ताजी हवा आ सके, पर बुनियाद पर दृढ़ रहना चाहिए।


अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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