जाबिर हुसैन का परिचय एवं रचना का संदर्भ:
जाबिर हुसैन का जन्म सन् 1945 में बिहार के नालंदा जिले के नौनही राजगीर में हुआ था। वे अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक रहे और बाद में बिहार विधानसभा के सदस्य एवं विधान परिषद के सभापति भी रहे। वे हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी तीनों भाषाओं पर समान अधिकार रखते हैं।
'साँवले सपनों की याद' की पृष्ठभूमि:
जून 1987 में प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालिम अली का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन से उत्पन्न दुःख और अवसाद को लेखक ने इस संस्मरण में व्यक्त किया।
- 'साँवले सपने': वे सपने जो मन में एक मीठी कसक और याद बनकर बस जाते हैं। सालिम अली की मृत्यु के साथ ही पक्षियों की खोज का एक स्वर्णिम युग समाप्त हो गया।
- काव्यात्मक भाषा: इस पाठ की भाषा गद्य होते हुए भी कविता जैसी है। लेखक ने प्रतीकों, रूपकों और बिंबों (Images) का अत्यंत सजीव प्रयोग किया है:
"सुनहरे परिंदों के खूबसूरत पंखों पर सवार साँवले सपनों का एक हुजूम मौत की खामोश वादी की तरफ अग्रसर है। कोई रोक सके, कहाँ संभव है?"